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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2013-KMSRAJ51

मुंह के छाले और जीभ के छाले-उपचार हिन्दी में।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT08

Mouth ulcers and tongue ulceration treatment in Hindi

Mouth Ulcers treatment-KMSRAJ51

मुंह के छाले और जीभ के छाले।

Mouth Ulcers-KMSRAJ51

अक्सर पेट में कब्ज, पेट की गर्मी व दाँत से जीभ कट जाने या किसी अन्य कारण से जब भी मुँह में छाले हो जाते है तो कुछ भी खाना-पीना व निगलना तक बहुत ही मुश्किल हो जाता है, और जब जीभ पर भी छाले हो जाते हैं तब तो बहुत ही असहनीय हालात हो जाता हैं। पेट में गर्मी से या पेट साफ ना होने से भी अक्सर मुंह में छाले हो जाते हैं। मुंह के छाले गालों के अंदर और जीभ पर भी होते हैं। वैसे मुंह में छाले होना बहुत आम बात है, लेकिन इसके होने पर इन्सान का बुरा हाल हो जाता है। वो ना ढंग से खा-पी पाता है और ना ही सही से बोल पाता है। ये छाले दिखने में सफ़ेद व आजू-बाजु से लाल होते है। ये ज्यादातर गाल के पीछे, होंठ, जीभ के नीचे व मुंह ऊपरी हिस्से में होते हैं।

 मुलेठी का काढ़ा बनाकर ठंडा कर व छानकर दिन में ३-४ बार गरारा करने से मुंह व जीभ के छाले ठीक हो जाते है।

 एलोवेरा एक पूर्ण प्राकृतिक जड़ी बूटि हैं। एलोवेरा का उपयोग प्राचीन समय से ही कई स्वास्थ्य समस्याओं में दवा के रूप मे हाेता आ रहा हैं। एलोवेरा का गूदा और रस मुंह के छालो पर लगाने से दर्द से जल्दी राहत भी मिलता है और छाले भी जल्दी ही ठीक हाे जाते हैं।

 नारियल का पानी मुंह के छालो पर लगाने से दर्द से जल्दी राहत भी मिलता है और छाले भी ठीक हाे जाते हैं।

 हरे धनिया का रस मुंह के छालो पर लगाने और सूखे धनिये को पानी में उबालकर उस पानी को छान कर व ठंडा कर उससे गरारे करने से मुंह के छाले ठीक हो जाते है।

 शहद को पानी में मिलाकर कुल्ला करने से मुंह के छाले ठीक हो जाते है।

 इलायची चूर्ण को शहद में मिलाकर छालो पर लगाने और लार टपकाने से छाले ठीक हो जाते है।

 चमेली की पत्तियां चबाने से मुंह के छाले दूर होते है।

 अमरुद की पत्तियों को उबाल कर कुल्ला करने से गला-जीभ साफ़ होता है और मुंह के छाले ठीक होते हैं।

 हल्दी को पानी में डालकर कुछ देर रख दे, इस पानी को छान कर उससे कुल्ले करने से मुंह के छाले नष्ट होते है।

 मिश्री की डली, इलायची या गोंद की डली को पूरे दिन चूसते रहने से भी छाले ठीक होते है।

महत्वपूर्ण नोट:-

खान पान में सावधानी बरते. गरिष्ठ, मिर्च-मसालेदार व तैलीय पदार्थों से परहेज रखें। हरी रेशेदार सब्जियों का ही सेवन करें। विटामिन बी व सी से युक्त आहार ले जैसे : पालक, अंकुरित अनाज, अमरुद, संतरा, आवंला, बंद गोभी के पत्ते आदि।

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© आप सभी का प्रिय दोस्त ®

Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor, Founder & CEO
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

 ~Kmsraj51

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cymt-kmsraj51

– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

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Mahatma Gandhi Quotes in Hindi !!

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT04

 महात्मा गाँधी के अनमोल वचन हिन्दी में !!

महात्मा गांधी
महात्मा गांधी

 पहले वो आप पर ध्यान नहीं देंगे, फिर वो आप पर हँसेंगे, फिर वो आप से लड़ेंगे, और तब आप जीत जायेंगे।
 जो बदलाव आप दुनिया में देखना चाहते हैं वह पहले स्वयं में लायें।
 समाज में से धर्म को निकाल फेंकने का प्रयत्न बाँझ के पुत्र पैदा करने जितना ही निष्फल है और अगर कहीं सफल हो जाय तो समाज का उसमें नाश है।
 जो लोग अपनी प्रशंसा के भूखे रहते हैं, वो साबित करते हैं कि उनमें योग्यता नहीं है।
 यदि शारीरिक उपवास के साथ-साथ मन का उपवास न हो तो वह दम्भपूर्ण और हानिकारक हो सकता है।
 आप नम्र तरीके से दुनिया को हिला सकते हैं।
 अहिंसात्मक युद्ध में अगर थोड़े भी मर मिटने वाले लड़ाके मिलेंगे तो वे करोड़ों की लाज रखेंगे और उनमें प्राण फूकेंगे। अगर यह मेरा स्वप्न है, तो भी मेरे लिए मधुर है।

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खुद को साबित करने के लिए मौका मिलने के आप हकदार हैं। सफलता की नींव आप खुद हैं। 

दूसरे क्या सोच रहे हैं, इस बारे में अनुमान लगाते रहना नकारात्मक सोच की निशानी है।

 

 

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परीक्षा की तैयारी कैसे करें।

Kmsraj51 की कलम से…..

How to Prepare for The Examination | परीक्षा की तैयारी कैसे करें।

Exam Tips in Hindi

During examination days, food should be taken which is pure and full of nutrition. Dinner should be eaten early. परीक्षा प्रारंभ होने के कुछ महीने पहले से ही पढ़ना शुरू कर देना चाहिए। पहली बार पढ़ने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है दोहरान करना इसलिए रिवीजन के लिए पर्याप्त समय दें।

 जिन विषयों की परीक्षा बाद में है उन्हें पहले पढ़ना चाहिए ताकि आखिरी दिनों में वह विषय पढ़े जा सके जिनका एग्जाम सबसे पहले है। इसके लिए टाइम टेबल बना लें।

 पूर्व वर्षों के प्रश्न पत्रों को हल करना चाहिए। इससे परीक्षा का पैटर्न समझने में मदद मिलती हैं।

 स्टडी रूम व्यवस्थित होना चाहिए। कुर्सी आरामदायक होनी चाहिए। स्टडी टेबल पर अलार्म घड़ी रखी होनी चाहिए। स्टडी रूम में मोटिवेशनल चार्ट लगे होने चाहिए। रोशनी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

 परीक्षा के दिनों में तनाव का माहौल रहता है। तनाव को दूर करने और एकाग्रता बढ़ाने के लिए योग, व्यायाम आदि का सहारा लें और पर्याप्त मात्रा में नींद लें।

 परीक्षा के दिनों में ऐसा भोजन लिया जाना चाहिए जो सात्विक हो और पोषण से भरपूर हो। रात का खाना जल्दी खा लेना चाहिए। थोड़े-थोड़े अंतराल में पानी पीते रहना चाहिए।

cartoon-success mantra of exam-kmsraj51

 हाथ-पैर और मुंह धोकर पढ़ने बैठना चाहिए।

 खुश और तनावमुक्त रहें। सकारात्मक सोच रखें। परीक्षा को हौवा ना बनाये और आत्मविश्वास बनाये रखें।

 एग्जाम किट में पेंसिल और पेन के साथ रंगबिरंगे जेल पेन भी रखें। ये आपको जवाब को हाईलाइट करने और चित्र बनाने में मदद करेंगे।

 एग्जाम हॉल में बिना किसी डर के पूरी ऊर्जा और पॉजिटिव सोच के साथ प्रवेश करें।

 प्रश्न पत्र पढ़ने में जल्दबाजी ना करें। धैर्य से काम लें। पेपर और कॉपी पर लिखे गए निर्देशों को ध्यान से पढ़ें। अगर कोई संदेह है तो टीचर से पूछ लें।

 साफ़-सुथरी राइटिंग में लिखने का प्रयास करें। ताकि परीक्षक को कॉपी पढ़ने में दिक्कत ना आये। कई बार गन्दी राइटिंग की वज़ह से भी नंबर कम आते हैं।

 प्रश्नों के उत्तर में चित्रों, आंकड़ों और रेखांकन आदि का उपयोग करें। इससे उत्तर आकर्षक और प्रभावी बन जाता है।

 पेज भरने की बजाय सभी प्रश्नों का स्पष्ट और सटीक जवाब लिखें।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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स्वामी विवेकानंद के बहुमूल्य विचार हिन्दी में।

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स्वामी विवेकानंद के बहुमूल्य विचार हिन्दी में।

स्वामी विवेकानन्द जी

 उठो, जागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये ।

 जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।

 तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।

 ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं–इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।

 ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।

 मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं–निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।

 जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।

 जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है–अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत् को शिक्षा प्रदान करता है।

 आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।

 मुक्ति-लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है? देवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करते, इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता, अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।

 हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।

 मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।

 पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो।
 सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।

 संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।

________________________________________

 हे सखे, तुम क्योँ रो रहे हो ? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन्, अपना ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वन! डरो मत्; तुम्हारा नाश नहीं हैं, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार-सागर के पार उतरे हैं, वही श्रेष्ठ पथ मै तुम्हे दिखाता हूँ! (वि.स. ६/८)

 बडे-बडे दिग्गज बह जायेंगे। छोटे-मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो — यह दुनिया भयानक है, किसी पर विश्वास नहीं है। डरने का कोई कारण नहीं है, माँ मेरे साथ हैं — इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात का? किसका भय? वज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ।
(विवेकानन्द साहित्य खण्ड-४पन्ना-३१५) (४/३१५)

 तुमने बहुत बहादुरी की है। शाबाश! हिचकने वाले पीछे रह जायेंगे और तुम कुद कर सबके आगे पहुँच जाओगे। जो अपना उध्दार में लगे हुए हैं, वे न तो अपना उद्धार ही कर सकेंगे और न दूसरों का। ऐसा शोर – गुल मचाओ की उसकी आवाज़ दुनिया के कोने कोने में फैल जाय। कुछ लोग ऐसे हैं, जो कि दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे हैं, किन्तु कार्य करने के समय उनका पता नही चलता है। जुट जाओ, अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढो।इसके बाद मैं भारत पहुँच कर सारे देश में उत्तेजना फूँक दूंगा। डर किस बात का है? नहीं है, नहीं है, कहने से साँप का विष भी नहीं रहता है। नहीं नहीं कहने से तो ‘नहीं’ हो जाना पडेगा। खूब शाबाश! छान डालो – सारी दूनिया को छान डालो! अफसोस इस बात का है कि यदि मुझ जैसे दो – चार व्यक्ति भी तुम्हारे साथी होते –
 तमाम संसा हिल उठता। क्या करूँ धीरे – धीरे अग्रसर होना पड रहा है। तूफ़ान मचा दो तूफ़ान! (वि.स. ४/३८७)

 किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (वि.स.४/३२०)

 लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो। (वि.स.६/८८)

 श्रेयांसि बहुविघ्नानि अच्छे कर्मों में कितने ही विघ्न आते हैं। — प्रलय मचाना ही होगा, इससे कम में किसी तरह नहीं चल सकता। कुछ परवाह नहीं। दुनीया भर में प्रलय मच जायेगा, वाह! गुरु की फतह! अरे भाई श्रेयांसि बहुविघ्नानि, उन्ही विघ्नों की रेल पेल में आदमी तैयार होता है। मिशनरी फिशनरी का काम थोडे ही है जो यह धक्का सम्हाले! ….बडे – बडे बह गये, अब गडरिये का काम है जो थाह ले? यह सब नहीं चलने का भैया, कोई चिन्ता न करना। सभी कामों में एक दल शत्रुता ठानता है; अपना काम करते जाओ किसी की बात का जवाब देने से क्या काम? सत्यमेव जयते नानृतं, सत्येनैव पन्था विततो देवयानः (सत्य की ही विजय होती है, मिथ्या की नहीं; सत्य के ही बल से देवयानमार्ग की गति मिलती है।) …धीरे – धीरे सब होगा।

 वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिध्दि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य — जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो — व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं। (वि.स. ४/३९५)

 इस तरह का दिन क्या कभी होगा कि परोपकार के लिए जान जायेगी? दुनिया बच्चों का खिलवाड नहीं है — बडे आदमी वो हैं जो अपने हृदय-रुधिर से दूसरों का रास्ता तैयार करते हैं- यही सदा से होता आया है — एक आदमी अपना शरीर-पात करके सेतु निर्माण करता है, और हज़ारों आदमी उसके ऊपर से नदी पार करते हैं। एवमस्तु एवमस्तु, शिवोsहम् शिवोsहम् (ऐसा ही हो, ऐसा ही हो- मैं ही शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। )

 मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना — इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता। (वि.स.६/३५२)

 मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसीको श्री रामकृष्ण कहा करते थे, “भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।” सब विषओं में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे क्या तुने नहीं सुना, कबीरदास के दोहे में है- “हाथी चले बाजार में, कुत्ता भोंके हजार साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार” ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता। (वि.स.३/३८१)

 अन्त में प्रेम की ही विजय होती है। हैरान होने से काम नहीं चलेगा- ठहरो- धैर्य धारण करने पर सफलता अवश्यम्भावी है- तुमसे कहता हूँ देखना- कोई बाहरी अनुष्ठानपध्दति आवश्यक न हो- बहुत्व में एकत्व सार्वजनिन भाव में किसी तरह की बाधा न हो। यदि आवश्यक हो तो “सार्वजनीनता” के भाव की रक्षा के लिए सब कुछ छोडना होगा। मैं मरूँ चाहे बचूँ, देश जाऊँ या न जाऊँ, तुम लोग अच्छी तरह याद रखना कि, सार्वजनीनता- हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते कि, “दुसरों के धर्म का द्वेष न करना”; नहीं, हम सब लोग सब धर्मों को सत्य समझते हैं और उन्का ग्रहण भी पूर्ण रूप से करते हैं हम इसका प्रचार भी करते हैं और इसे कार्य में परिणत कर दिखाते हैं सावधान रहना, दूसरे के अत्यन्त छोटे अधिकार में भी हस्तक्षेप न करना – इसी भँवर में बडे-बडे जहाज डूब जाते हैं पुरी भक्ति, परन्तु कट्टरता छोडकर, दिखानी होगी, याद रखना उन्की कृपा से सब ठीक हो जायेगा।

 जिस तरह हो, इसके लिए हमें चाहे जितना कष्ट उठाना पडे- चाहे कितना ही त्याग करना पडे यह भाव (भयानक ईर्ष्या) हमारे भीतर न घुसने पाये- हम दस ही क्यों न हों- दो क्यों न रहें- परवाह नहीं परन्तु जितने हों सम्पूर्ण शुध्दचरित्र हों।

 नीतिपरायण तथा साहसी बनो, अन्त: करण पूर्णतया शुध्द रहना चाहिए। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनो — प्रणों के लिए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरूष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते — यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते। प्राणिमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चो, तुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दूसरा धर्म नहीं। इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरता, पाप्, असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिए, बाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।(वि.स.१/३५०)

 शक्तिमान, उठो तथा सामर्थ्यशाली बनो। कर्म, निरन्तर कर्म; संघर्ष , निरन्तर संघर्ष! अलमिति। पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो — सारा धर्म इसी में है। (वि.स.१/३७९)

 क्या संस्कृत पढ रहे हो? कितनी प्रगति होई है? आशा है कि प्रथम भाग तो अवश्य ही समाप्त कर चुके होगे। विशेष परिश्रम के साथ संस्कृत सीखो। (वि.स.१/३७९-८०)

 शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अंग्रेज़ी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो। (वि.स.४/३१९)

 बच्चों, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करना, इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु-प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, किन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है। यदि कभी कभी तुमको संसार का थोडा-बहुत धक्का भी खाना पडे, तो उससे विचलित न होना, मुहूर्त भर में वह दूर हो जायगा तथा सारी स्थिति पुनः ठीक हो जायगी। (वि.स.१/३८०)

 बालकों, दृढ बने रहो, मेरी सन्तानों में से कोई भी कायर न बने। तुम लोगों में जो सबसे अधिक साहसी है – सदा उसीका साथ करो। बिना विघ्न – बाधाओं के क्या कभी कोई महान कार्य हो सकता है? समय, धैर्य तथा अदम्य इच्छा-शक्ति से ही कार्य हुआ करता है। मैं तुम लोगों को ऐसी बहुत सी बातें बतलाता, जिससे तुम्हारे हृदय उछल पडते, किन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तो लोहे के सदृश दृढ इच्छा-शक्ति सम्पन्न हृदय चाहता हूँ, जो कभी कम्पित न हो। दृढता के साथ लगे रहो, प्रभु तुम्हें आशीर्वाद दे। सदा शुभकामनाओं के साथ तुम्हारा विवेकानन्द। (वि.स.४/३४०)

 जब तक जीना, तब तक सीखना’ — अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। (वि.स.१/३८६)

 जीस प्रकार स्वर्ग में, उसी प्रकार इस नश्वर जगत में भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो, क्योंकि अनन्त काल के लिए जगत में तुम्हारी ही महिमा घोषित हो रही है एवं सब कुछ तुम्हारा ही राज्य है। (वि.स.१/३८७)

 पवित्रता, दृढता तथा उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूँ। (वि.स.४/३४७)

 भाग्य बहादुर और कर्मठ व्यक्ति का ही साथ देता है। पीछे मुडकर मत देखो आगे, अपार शक्ति, अपरिमित उत्साह, अमित साहस और निस्सीम धैर्य की आवश्यकता है- और तभी महत कार्य निष्पन्न किये जा सकते हैं। हमें पूरे विश्व को उद्दीप्त करना है। (वि.स.४/३५१)

 पवित्रता, धैर्य तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महान कार्य सभी धीरे धीरे होते हैं। (वि.स.४/३५१)

 साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना — यही एक मार्ग है। आगे बढो और याद रखो धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे — माँ तुम्हें कभी न छोडेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे। (वि.स.४/३५६)

 बच्चों, जब तक तुम लोगों को भगवान तथा गुरू में, भक्ति तथा सत्य में विश्वास रहेगा, तब तक कोई भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता। किन्तु इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर परिणाम विपत्तिजनक है। (वि.स.४/३३९)

 महाशक्ति का तुममें संचार होगा — कदापि भयभीत मत होना। पवित्र होओ, विश्वासी होओ, और आज्ञापालक होओ। (वि.स.४/३६१)

 बिना पाखण्डी और कायर बने सबको प्रसन्न रखो। पवित्रता और शक्ति के साथ अपने आदर्श पर दृढ रहो और फिर तुम्हारे सामने कैसी भी बाधाएँ क्यों न हों, कुछ समय बाद संसार तुमको मानेगा ही। (वि.स.४/३६२)

 धीरज रखो और मृत्युपर्यन्त विश्वासपात्र रहो। आपस में न लडो! रुपये – पैसे के व्यवहार में शुध्द भाव रखो। हम अभी महान कार्य करेंगे। जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हे सफलता मिलेगी। (वि.स.४/३६८)

 जो पवित्र तथा साहसी है, वही जगत् में सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूँ एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकडों मित्र भेजेंगे, आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः। (वि.स.४/२७६)

 ईर्ष्या तथा अंहकार को दूर कर दो — संगठित होकर दूसरों के लिए कार्य करना सीखो। (वि.स.४/२८०)

 पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो, और काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। आगे बढो तुमने बहुत अच्छा काम किया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेंगे अन्य सहायता के लिए हम प्रतीक्षा नहीं करते। मेरे बच्चे, आत्मविशवास रखो, सच्चे और सहनशील बनो।(वि.स.४/२८४)

 यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खडे हो जाओगे, तो तुम्हे सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले ‘अहं’ ही नाश कर डालो। (वि.स.४/२८५)

 पक्षपात ही सब अनर्थों का मूल है, यह न भूलना। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति-प्रदर्शन करते हो, तो याद रखो उसीसे भविष्य में कलह का बिजारोपण होगा। (वि.स.४/३१२)

 यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निन्दा करना चाहे, तो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान न दो। इन बातों को सुनना भी महान् पाप है, उससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा। (वि.स.४/३१३)

 गम्भीरता के साथ शिशु सरलता को मिलाओ। सबके साथ मेल से रहो। अहंकार के सब भाव छोड दो और साम्प्रदायिक विचारों को मन में न लाओ। व्यर्थ विवाद महापाप है। (वि.स.४/३१८)

 बच्चे, जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास- ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी — तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो। (वि.स.४/३३२)

 किसी को उसकी योजनाओं में हतोत्साह नहीं करना चाहिए। आलोचना की प्रवृत्ति का पूर्णतः परित्याग कर दो। जब तक वे सही मार्ग पर अग्रेसर हो रहे हैं; तब तक उन्के कार्य में सहायता करो; और जब कभी तुमको उनके कार्य में कोई ग़लती नज़र आये, तो नम्रतापूर्वक ग़लती के प्रति उनको सजग कर दो। एक दूसरे की आलोचना ही सब दोषों की जड है। किसी भी संगठन को विनष्ट करने में इसका बहुत बडा हाथ है। (वि.स.४/३१५)

 किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (वि.स. ४/३२०)

 क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुध्दिमानी नहीं है। बुध्दिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खडा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा। (वि.स. ४/३२८)

 बच्चे, जब तक हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास – ये तीनों वस्तुएम रहेंगी – तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो। (वि.स. ४/३३२)

 आओ हम नाम, यश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। काम, क्रोध एंव लोभ — इस त्रिविध बन्धन से हम मुक्त हो जायें और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा। (वि.स. ४/३३८)

 न टालो, न ढूँढों — भगवान अपनी इच्छानुसार जो कुछ भेहे, उसके लिए प्रतिक्षा करते रहो, यही मेरा मूलमंत्र है। (वि.स. ४/३४८)

 शक्ति और विशवास के साथ लगे रहो। सत्यनिष्ठा, पवित्र और निर्मल रहो, तथा आपस में न लडो। हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है। (वि.स. ४/३६९)

 एक ही आदमी मेरा अनुसरण करे, किन्तु उसे मृत्युपर्यन्त सत्य और विश्वासी होना होगा। मैं सफलता और असफलता की चिन्ता नहीं करता। मैं अपने आन्दोलन को पवित्र रखूँगा, भले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कार्यों से सामना पडने पर मेरा धैर्य समाप्त हो जाता है। यही संसार है कि जिन्हें तुम सबसे अधिक प्यार और सहायता करो, वे ही तुम्हे धोखा देंगे। (वि.स. ४/३७७)
________________________________________

 मेरा आदर्श अवश्य ही थोडे से शब्दों में कहा जा सकता है – मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश देना, तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना। (वि.स. ४/४०७)

 जब कभी मैं किसी व्यक्ति को उस उपदेशवाणी (श्री रामकृष्ण के वाणी) के बीच पूर्ण रूप से निमग्न पाता हूँ, जो भविष्य में संसार में शान्ति की वर्षा करने वाली है, तो मेरा हृदय आनन्द से उछलने लगता है। ऐसे समय मैं पागल नहीं हो जाता हूँ, यही आश्चर्य की बात है।
(वि.स. १/३३४, ६ फरवरी, १८८९)

 ‘बसन्त की तरह लोग का हित करते हुए’ – यहि मेरा धर्म है। “मुझे मुक्ति और भक्ति की चाह नहीं। लाखों नरकों में जाना मुझे स्वीकार है, बसन्तवल्लोकहितं चरन्तः- यही मेरा धर्म है।” (वि.स.४/३२८)

 हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है — उपहास, विरोध और स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता है, लोग उसे निश्चय ही ग़लत समझते है। इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैं; परन्तु मुझे दृढ और पवित्र होना चाहिए और भगवान् में अपरिमित विश्वास रखना चाहिए, तब ये सब लुप्त हो जायेंगे। (वि.स.४/३३०)

 यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता है, तो छुतही बिमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सीर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता है– वह कितना ही फटा-पुराना क्यों न हो– तब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जाय, उसके लिए कहीं रोक-टोक नहीं, ऐसा कोई नहीं, जो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी न दे! इससे अधिक विड्म्बना की बात क्या हो सकता है? आइए, देखिए तो सही, दक्षिण भारत में पादरी लोग क्या गज़ब कर रहें हैं। ये लोग नीच जाति के लोगों को लाखों की संख्या मे ईसाई बना रहे हैं। …वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है! मैं उन बेचारों को क्यों दोष दूँ? हें भगवान, कब एक मनुष्य दूसरे से भाईचारे का बर्ताव करना सीखेगा। (वि.स.१/३८५)

 प्रायः देखने में आता है कि अच्छे से अच्छे लोगों पर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सके, फिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी हों, परन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस अन्तराल तक नहीं पहुँचते, तभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफान के जितने तुमुल झकोरे आयें, वह मकान, जो सदियों की पुरानि चट्टान पर बना है, हिल नहीं सकता। (वि.स.१/३८९)

 यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को वन्द कर दो, वे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हे बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे – स्नेहियों द्वरा सदा ठगे जाते हैं।
(वि.स)

 मेरी केवल यह इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन जापान में आना चाहिए। जापानी लोगों के लिए आज भारतवर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? … जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवाद करने वालो, तुम लोग क्या हो? आओ, इन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुध्दिवालो, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूडा-कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? …किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी – गीरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी – जान से तडप रहे हो — यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्द बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर ‘ रोटी दो, रोटी दो ‘ चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उन्के हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड – मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखो, अन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम है? यदि ‘हाँ’ तो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखो; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पिछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है — मस्तिष्क – वाले युवकों का, पशुओं का नहीं। परमात्मा ने तुम्हारी इस निश्चेष्ट सभ्यता को तोडने के लिए ही अंग्रेज़ी राज्य को भारत में भेजा है… ( वि.स.१/३९८-९९)

 न संख्या-शक्ति, न धन, न पाण्डित्य, न वाक चातुर्य, कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुध्द जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी! प्रत्येक देश में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दो, जिन्होने अपने बन्धन तोड डाले हैं, जिन्होने अनन्त का स्पर्श कर लिया है, जिन्का चित्र ब्रह्मनुसन्धान में लीन है, जो न धन की चिन्ता करते हैं, न बल की, न नाम की और ये व्यक्ति ही संसार को हिला डालने के लिए पर्याप्त होंगे। (वि.स.४/३३६)

 यही रहस्य है। योग प्रवर्तक पंतजलि कहते हैं, ” जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्म मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह प्रमात्मा का दर्शन करता है, वह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसीका प्रचार करना है। जगत् में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैं, परन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्य्क्ष आचरण नहीं करता। (वि.स.४/३३७)

 एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है — वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यद्र्ष्ट महात्मा हैं, वे कभी किसी से बैर नहीं करते। वाचालों को वाचाल होने दो! वे इससे अधिक और कुछ नहीं जानते! उन्हे नाम, यश, धन, स्त्री से सन्तोष प्राप्त करने दो। और हम धर्मोपलब्धि, ब्रह्मलाभ एवं ब्रह्म होने के लिए ही दृढव्रत होंगे। हम आमरण एवं जन्म-जन्मान्त में सत्य का ही अनुसरण करेंगें। दूसरों के कहने पर हम तनिक भी ध्यान न दें और यदि आजन्म यत्न के बाद एक, देवल एक ही आत्मा संसार के बन्धनों को तोडकर मुक्त हो सके तो हमने अपना काम कर लिया। (वि.स. ४/३३७)

 जो सबका दास होता है, वही उन्का सच्चा स्वामी होता है। जिसके प्रेम में ऊँच – नीच का विचार होता है, वह कभी नेता नहीं बन सकता। जिसके प्रेम का कोई अन्त नहीं है, जो ऊँच – नीच सोचने के लिए कभी नहीं रुकता, उसके चरणों में सारा संसार लोट जाता है। (वि.स. ४/४०३)

 वत्स, धीरज रखो, काम तुम्हारी आशा से बहुत ज्यादा बढ जाएगा। हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैंकडो कठिनाइयों का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेंगे, वे आज या कल सफलता को देखेंगे। परिश्रम करना है वत्स, कठिन परिश्रम्! काम कांचन के इस चक्कर में अपने आप को स्थिर रखना, और अपने आदर्शों पर जमे रहना, जब तक कि आत्मज्ञान और पूर्ण त्याग के साँचे में शिष्य न ढल जाय निश्चय ही कठिन काम है। जो प्रतिक्षा करता है, उसे सब चीज़े मिलती हैं। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो। (वि.स. ४/३८७)

 अकेले रहो, अकेले रहो। जो अकेला रहता है, उसका किसीसे विरोध नहीं होता, वह किसीकी शान्ति भंग नहीं करता, न दूसरा कोई उसकी शान्ति भंग करता है। (वि.स. ४/३८१)

 मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे – धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। ‘साहसी’ शब्द और उससे अधिक ‘साहसी’ कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार – बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है? (वि.स. ४/४०८

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अगर जीवन में सफल हाेना हैं. ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर

१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए॥

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जिनके संकल्प में दृढ़ता की शक्ति है, उनके लिए हर कार्य सम्भव है।

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हर बच्चा अपने माता-पिता को ही भगवान समझे।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ हर बच्चा अपने माता-पिता को ही भगवान समझे। ϒ

लड़के सुधर जाओ नहीं तो, तुम्हें गर्लफ्रेंड के हवाले कर दिया जायेगा और वो तो सुधार ही देगी।maa

  • पापा कहते है “बेटा पढाई करके कुछ बनो” तो बुरा लगता है, पर यही बात जब गर्लफ्रेंड कहती है तो लगता है केयर करती है।
  • गर्लफ्रेंड के लिए माँ-बाप से झूठ बोलते है, पर माँ-बाप के लिए गर्लफ्रेंड से क्यूँ नहीं ?
  • गर्लफ्रेंड से शादी के लिए माँ-पापा को छोड़ देते है, पर माँ-पापा के लिए गर्लफ्रेंड को क्यूँ नहीं ?
  • गर्लफ्रेंड से रोज रात में मोबाइल से पूछते है खाना-खाया की नहीं या कितनी रोटी खाई, पर क्या आज तक ये बात माँ-पापा से पूछी ?
  • गर्लफ्रेंड की एक कसम से सिगरेट छुट जाती है, पर पापा के बार-बार कहने से क्यूँ नहीं ?
  • कृपया अपने माँ-बाप की हर बात माने और उनकी केयर करे, और करते हो तो आपके माँ-बाप आपके लिए कुछ भी गर्व से करने को तैयार है।
  • और ये सबको बताये और समझाए, क्या पता आपकी बात उसके समझ में आ जाये ? अपने को माहौल ही ऐसा बनाना है की हर बच्चा अपने माता-पिता को ही भगवान समझे।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

 

 

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देववाणी – संस्कृत भाषा की विशेषताएँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ देववाणी – संस्कृत भाषा की विशेषताएँ। ♦

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  • संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक (वेद) की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं किसी संशय की संभावना नहीं है।
  • इसकी सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है।
  • सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी होने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है।
  • इसे देवभाषा माना जाता है।
  • संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा भी है अतः इसका नाम संस्कृत है।
  • केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है।
  • संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है।
  • शब्द-रूप – विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं।
  • द्विवचन – सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है।
  • सन्धि – संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। संस्कृत में जब दो शब्द निकट आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है।
  • इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिये सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।
  • शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है। क्योंकि एकमात्र संस्कृत भाषा सोचते, लिखते, पढ़ते, व बोलते समय दिमाग की सारी नसें कार्य करती है।
  • संस्कृत विश्व की सर्वाधिक ‘पूर्ण’ (Perfect) एवं तर्क सम्मत भाषा है।
  • संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। जैसे – अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनो ही ठीक हैं।
  • देवनागरी एवं संस्कृत ही दो मात्र साधन हैं जो क्रमश: अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं। इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ ग्रहण करने में सहायता मिलती है।
  • एकमात्र संस्कृत भाषा ही – ब्रह्मांड की सबसे प्राचीन भाषा है।
  • संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से या उससे भी बहुत पहले से निरन्तर होती आ रही है। इसके कई लाख ग्रन्थों के पठन-पाठन और चिन्तन में भारतवर्ष के हजारों पुश्तक के करोड़ों सर्वोत्तम मस्तिष्क दिन-रात लगे रहे हैं और आज भी लगे हुए हैं। पता नहीं कि संसार के किसी देश में इतने काल तक, इतनी दूरी तक व्याप्त, इतने उत्तम मस्तिष्क में विचरण करने वाली कोई भाषा है या नहीं। शायद नहीं है।

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Krishna Mohan Singh(KMS)
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

———– © Best of Luck ® ———–

Note:-

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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मैं जोगी बनूँ या लुटेरा ?

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT08

ϒ मैं जोगी बनूँ या लुटेरा ? ϒ

दोस्तों – को राम राम, बच्चों को जय हिन्द , और बड़ों को धोक (बड़ो के आगे झुकना )…..

मैं पता नहीं किस किस्म का आदमी हूँ ? जिसे कुछ समझ ही नहीं आता जैसे दिमाग ना हो, खूब है मन में जोश…और भरपूर है शरीर में जान।

जुर्म अक्सर भोले-भाले या निर्बल पर ही होता है। क्या ये बात सही है ?

मेरे साथ या मेरे जैसे लोगो के साथ रोज ना जाने कितने जुर्म होते है, पर मेरा नंबर महीने में एक या दो बार आ ही जाता है चाहे वो जुर्म छोटा हो या बड़ा, नंबर तो आपका भी आता होगा ?

अब आप मुझे ये बतावो की मैं जोगी बनूँ या लुटेरा ? जोगी बनूँ या लुटेरा ? जोगी बनूँ या लुटेरा ?

जोगी बनने का कारण ये है…..
मैं जोगी बनूँ क्योंकि मेरे पर जुर्म होता है या में जुर्म होते चुपचाप देखता हूँ ?

मैं जोगी बनूँ क्योंकि मेरा एक परिवार है ?

मैं जोगी बनूँ क्योंकि जब मैं आवाज लगाऊ तो कोई सुने नहीं ?
मैं जोगी बनूँ क्योंकि जुर्म करने वाले मेरे सामने नहीं ?

मैं जोगी बनूँ क्योंकि मेरे देश में सब कुछ बिकाऊ है ?
लुटेरा बनने के कारण ये है…

मैं लुटेरा बनूँ क्योंकि तूने मेरे को पहले लूटा ?

मैं लुटेरा बनूँ क्योंकि जब मैंने आवाज दी तो सुनी नहीं, अब तू आवाज लगा ?

मैं लुटेरा बनूँ – क्योंकि मेरा देश तुम नौकर कैसे बेच सकते हो जब तुम्हारा कुछ है ही नहीं ?

मैं लुटेरा बनूँ – क्योंकि मैं आने वाले वंश को क्या जबाब और कैसा माहौल देकर जाने वाला हु।

आज तो सबने मुझे और खुद में जोगी बनकर बैठ जाऊंगा पर एकदिन तो लुटेरा बनना ही पड़ेगा की नहीं ?

आज बतावो?
प्रश्न : बलात्कार क्यों होते है? और क्या बलात्कार करने वाला ही अकेला दोषी है? अगर इस घिनौनी हरकत का अकेला बलात्कारी दोषी नहीं तो और कौन-कौन है?

उत्तर : सिनेमा, अश्लील फिल्में, संस्कृति और वातावरण, शिक्षा। मैं ये पूछता हु की उत्तेजित बलात्कारी में दिमाग होता है क्या जो ये सोच सके की मैं जो कर रहा हु वो सही है या गलत?

प्रश्न : जिस बेटे को मां-बाप ने जन्म दिया, पोषण दिया, उसे बड़ा किया। उसी बेटे ने उन्हें घर से बुढ़ापे में निकाल दिया क्यों ? क्या इस घिनौनी हरकत का बेटा अकेला जिम्मेदार है ?

उत्तर : मां-बाप ने या तो दादी-दादा के पास रहने नहीं दिया हो ?
या अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा दी होगी?
या उन्हें परिवार का मतलब नहीं बताया होगा ?

या उनको नयी जीवन शैली शिखा दी होगी जिसमे केवल मैं, मेरी बीवी,और मेरे प्यारे बच्चे आते हो?

या आपने अपने माँ-बाप के साथ ऐसा करके दिखाया हो की ऐसे घर से बेघर करते है माँ-बाप को।

प्रश्न : आजकल हर कोई आशिक बनकर किसी की भी जान ले लेता है या तेजाब डाल देता है या बेइज्जत कर देता है या शादी के बाद दूसरी/दूसरे से प्यार हो जाता है क्यों ?

उत्तर : क्योंकि बॉलीवुड, हॉलीवुड, टालीवुड और न जाने कितने वुड है और न जाने कितने धारावाहिक है जो ये ही सिखाने में व्यस्त है की कितने तरीको से प्यार होता है? ….. और सामने वाले को न मानते हुए भी कैसे मजबूर किया जाता है और भी बहुत कुछ ?

जाने अनजाने में लड़की ने आशिक तो बना लिया हो – पर अंजाम कही और ले गया हो।

घर वालो से सही शिक्षा ली नहीं हो यां घर वालो ने दी नहीं हो ?
या परिवार का माहौल ही ऐसा ही बना रखा हो।

मैं लुटेरा बनकर उस एक बलात्कारी को तो मार सकता हु पर जो करवाने वाला है उसे कहा ढूँढू? उन्हें कैसे मारू ?

मैं लुटेरा बनकर उस एक बेटे को तो मार दू पर आने वाले वंश का क्या करूँ जिसको अापने अकेला रहना सिखा दिया?

मैं लुटेरा बनकर उस आशिक का तो अंतिम संस्कार कर दू पर जो आज आशिकी सीख रहे है उनका क्या करू ?

अब आप ही बताओ मैं जोगी बनूँ या लुटेरा?

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सफलता कठोर मेहनत और खुद पर भरोसा करने से मिलती है।
यह गिफ्ट में या धनी परिवार में पैदा होने से नहीं मिलती है।
~Kmsraj51

– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

 

 

 

 

 

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हिंदी शायरी ..ठोकर ना लगा मुझे पत्थर नही हु मै,

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT-Oct-14-3

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http://kmsraj51.com/

ठोकर ना लगा मुझे पत्थर नही हु मै,

हैरत से ना देख कोई मंज़र नै हु मै,

उनकी नज़र में मेरी कदर कुछ भी नही,

मगर उनसे पूछो जिन्हें हासिल नही हु मै..

______

– Jokes –

1. लड़के और लड़की में फर्क –

लड़कियां 300 रुपये की एक सैंडल खरीद के लाएंगी और पूरे घर मे कहती फिरेंगी कि शॉपिंग करके आ रही हूं।

और लड़के हजार रुपये की दारू पीकर आते हैं, फिर भी चुप-चाप सो जाते हैं।

सादा जीवन, उच्च विचार।

2. जवानी के दर्द –

जवानी उम्र ही ऐसी होती है कि…

मोहल्ले की किसी भी लड़की की शादी हो जाए तो…

लगता है कि मेरे साथ धोखा हो गया…!!

3. किस गांव के हो ताऊ?

एक बस में ताऊ सफर कर रहे थे। तभी साथ वाले मुसाफिर ने बीड़ी जलाई और धुंआ ताऊ की ओर छोड़ दिया। ताऊ कुछ नहीं बोले। अचानक खिड़की से आई तेज हवा के कारण बीड़ी से एक चिंगारी निकली और ताऊ की नई कमीज जल गई। ताऊ फिर भी शांत रहे।

यह सब देख रहे मुसाफिर को शर्म आ गई और सोचा, कितना सब्र वाला नेक इंसान है। माफी मांगने के अंदाज में मुसाफिर ने पूछा, किस गावं के हो ताऊ?

ताऊ: क्यूं? अब गांव भी फूंकेगा के?

4. बगैर देखे साइन –

पप्पू: पापा, क्या आप बिना देखे लिख सकते हैं?

पापा: हां, इसमें कौन-सी बड़ी बात है?

पप्पू: अच्छा, तो मेरे रिपोर्ट कार्ड पर बिना देखे साइन करके दिखाइए।

5. बीवी की विश पूरी कर दो भगवान –

पति- इस जीवन से मैं तंग आ गया हूं! हे प्रभु मुझे उठा ले।पत्‍‌नी- नहीं भगवान, मेरे पति से पहले मुझे उठा ले।पति- हे प्रभु, मैं अब अपनी मर्जी को वापिस लेता हूं, तू इसकी ही सुन ले।

6. अजी सुनते तो… 
सत्य वचन
शादीशुदा मर्दों के लिए ‘अजी सुनते हो…’ का वही मतलब होता है जो बिग बॉस के घर में रहने वालों के लिए ‘बिग बॉस चाहते हैं…’ का होता है।
7. डाबर का कालाधन –
स्विस बैंकों में डाबर वालों का भी काला धन है .
.
.
.
.वहीं मैं कहूं…च्यवनप्राश में डालने के लिए इतना सोना-चांदी आ कहां से रहा है।

8. वाइबर या वाइपर –
लड़का: Viber यूज करती हो…?लड़की: उफ, ये अनपढ़ लड़के भी न। बुद्धू Viber नहीं, Viper होता है… और मैं कभी-कभी यूज करती हूं जब पानी ज्यादा हो, वरना पोछा ही लगाती हूं।लड़का: हा हा हा हा हा हा हा हा हा। बस कर पगली रुलाएगी क्या…?

9. अच्छे दोस्त की तलाश –
मैंने एक दिन मंदिर की दानपेटी में एक सिक्का डालकर भगवान से एक अच्छा दोस्त मांगा।
.
.
.
.
.
तब भगवान तुम्हें मेरी जिंदगी में भेजा और बोले- एक रुपये में ऐसा ही मिलेगा।
10. बीवी और भूत –
सवाल: अगर आपकी पत्नी से भूत चिपक जाए तो आप क्या करेंगे।पति का जवाब: करना क्या है, गलती उसने की है अब वही भुगते।
11. बदनामी का सबूत –
दिवाली पर पता चला हम अपने मुहल्ले में कितने बदनाम हैं
.
.
.
जब गली के सारे बच्चे एक-एक कर घर आए और रॉकेट जलाने के लिए खाली बोतल मांगने लगे।
12. गर्लफ्रेंड का फोन उठाया –
एक दोस्त – नया मोबाइल कब लिया?

पप्पू – लिया नहीं, गर्लफ्रेंड का उठाया है।
.
.
.
दोस्त – क्यों???
.
.
.
पप्पू – वो रोज कहती थी, मेरा फोन क्यों नहीं उठाते… 🙂

13. दिवाली पर ये न करें… 
भारत के सभी नौजवानों को सूचित किया जाता है कि इस दिवाली पर एक ही तीली से 5-6 दीये न जलाएं। .
.
.
.
पिताजी का शक यकीन में बदल सकता है कि लड़का सिगरेट पीने लगा है।
14. शादी की रस्म –
एक बच्चे ने पिता से एक शादी समारोह में पूछा- पापा, शादी के मंडप में दूल्हा, दुल्हन का हाथ क्यों पकड़ता है?

पिता ने लंबी सांस भरते हुए कहा- बेटा यह तो एक रस्म है। कुश्ती से पहले पहलवान भी अखाड़े में हाथ मिलाते हैं।

15. कानून की सेल्फी –
‘कानून’ बेस्ट सेल्फी क्लिक कर सकता है, क्योंकि…

कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं।

16. रितिक जैसा पति –
कल रात मेरी बीवी ने मुझसे कहा कि तुम तो एक दम रितिक रोशन जैसे लगते हो।

मैंने साफ-साफ बोल दिया कि मेरे पास सिर्फ 400 रुपये हैं।

17. कुछ बात करनी है –
भगवान कसम, सारे पाप याद आ जाते हैं, जब…

घरवाले कहते हैं- बैठो, तुमसे कुछ बात करनी है।

18. अर्ज किया है –
अर्ज किया है…

एक लड़के और लड़की में हो रही थी किसिंग,

मुकर्रर!

एक लड़के और लड़की में हो रही थी किसिंग,

पर आप अभी छोटे हो, इसलिए…

19. लड़का लाया चांद!
लड़की: क्या तुम मेरे लिए चांद ला सकते हो?

लड़का गया और हाथ में आइना छिपाकर ले आया। उसने लड़की से आंखें बंद करने को कहा, और आइने को लड़की के हाथ पर रख दिया।

लड़का: अब आंख खोलो।

लड़की (इमोशनल होते हुए): How Romantic! तुम्हें मेरा चेहरा चांद जैसा लगता है?

लड़का: नहीं, मैंने तो आइना इसलिए रखा था, ताकि तू देख सके कि जिस थोबड़े से चांद मांग रही है, उसे कभी आइने में देखा भी है?

20. पेट में छूटे ग्लव्स –
डॉक्टर: वी आर सॉरी। ऑपरेशन के वक्त मेरे ग्लव्स आपके पेट में रह गए। दोबारा ऑपरेशन करना पड़ेगा।
.
.
.
पप्पू: पागल है क्या? ये ले 20 रुपये, नया ले लियो भाई…
21. इमरजेंसी में मजाक –
हम बिजली जाने के बाद मोमबत्ती लेकर टॉइलट जा रहे थे।

कोई कंबख्त फूंक मारकर कह गया- हैपी बर्थडे टु यू!

अब बताओ… इमरजेंसी में भी मजाक!!

22. संता बना भगवान –
संता काफी दिनों के बाद पार्क में घूमने गया। लौटकर उसने अपनी पत्नी से कहा, जानती हो, आजकल लोग मुझे भगवान मानने लगे हैं!

पत्नी: तुम्हें कैसे पता?

संता: आज जब मैं पार्क में घूमने गया तो लोग मुझे देखकर बोले- हे भगवान, तुम फिर आ गए!

23. पत्नी के 2 नंबर –
अगर आपकी पत्नी 2 सिम कार्ड वाला फोन यूज करती है तो केवल ‘वाइफ’ नाम से ही सेव करें। वाइफ-1 और वाइफ-2 नाम से कभी न सेव करें।

आईसीयू में भर्ती एक पति की सलाह- पतिहित में जारी।

24. गर्लफ्रेंड चली अमेरिका –
गर्लफ्रेंड: जानू, मुझे भूल जाओ। मेरी शादी अमेरिका में एक अमीर लड़के से तय हो गई है।

बॉयफ्रेंड: चलो कोई बात नहीं, जो होना था सो हो गया। बस तुम एक आईफोन 6 भेज देना वहां से। सुना है वहां सस्ता मिलता है।

25. लाइन मारने के तरीके –
लाइन मारने के बहुत से तरीके होते हैं। इनमें से 3 बेस्ट तरीके हैं…

1. पेंसिल से लाइन मारना
2. पेन से लाइन मारना
3. मार्कर से लाइन मारना

अच्छा सोचो! कुछ लोग शरीफ भी होते हैं।

26. पति ने की तारीफ –
पति: तुम बहुत हसीन हो।

पत्नी: छोड़िए ना।

पति: तुम्हारी आंखें बहुत खूबसूरत हैं।

पत्नी: छोड़िए ना।

पति: तुम्हारे बाल बिल्कुल रेशम जैसे हैं।

पत्नी: अजी छोड़िए भी।

पति: तुम्हारी आवाज कितनी सुरीली है।

पत्नी: हे भगवान! अब छोड़ भी दीजिए।

पति: इतनी लंबी-लंबी तो छोड़ रहा हूं अब और कितनी छोड़ूं?

27. बुद्धिमत्ता की इकाई –
वैज्ञानिकों ने बुद्धिमत्ता मापने की नई इकाई का पता लगाया है, जिसका नाम है भट्ट इकाई।

इसके अधिकतम स्तर को आर्य भट्ट का नाम दिया गया है, और न्यूनतम स्तर को आलिया भट्ट का 🙂

28. 3 रुपये का हिसाब –
एक करोड़पति मर गया, और ऊपर पहुंचकर स्वर्ग का दरवाजा खटखटाने लगा।

चित्रगुप्त: कौन हो तुम?

आत्मा: मैं धरती पर करोड़पति था। मुझे स्वर्ग में प्रवेश चाहिए।

चित्रगुप्त: स्वर्ग में रहने लायक तुमने कौन सा काम किया है?

आत्मा: एक बार मैंने भूखी भिखारिन को 2 रुपये दिए थे। (कुछ सोचकर) और एक बार मेरी कार से टकराकर घायल हुए एक बच्चे को एक रुपया दिया था।

चित्रगुप्त: और कुछ किया?

आत्मा: और कुछ तो याद नहीं आता।

चित्रगुप्त (यमराज से): भाई, क्या करें इसका?

यमराज: इसके तीन रुपये लौटा दो, इसे नरक ले जाता हूं।

29. ‘जय दुर्गा’ के बाद?
9 दिन तक,

जय दुर्गा!

जय दुर्गा!

जय दुर्गा!

और 10वें दिन,

दे मुर्गा!

दे मुर्गा!

दे मुर्गा!

30. पत्नी ने उठाया –
पति-पत्नी में बातचीत बंद थी। सुबह पति को जल्दी जाना था, तो उसने रात को पत्नी के तकिए के पास एक पर्ची रख दी, जिसपर लिखा था- मुझे सुबह 5 बजे उठा देना।

सुबह 8 बजे जब पति की नींद खुली तो उसके ऊपर ढेर सारी पर्चियां पड़ी हुई थीं, जिनपर लिखा था- उठ जाओ, 5 बज गए हैं। प्लीज उठ जाओ, नहीं तो लेट हो जाओगे।

31. कृपया ध्यान दें –
अपनी बीवी के डर से खुद के घर में किया गया झाड़ू-पोछा ‘स्वच्छ भारत अभियान’ में शामिल नहीं किया जाएगा।
32. वह बेचारी लड़की –
वह लड़की आज भी गर्मी में मर रही है।
जिसे एक बार बोला था
.
.
.
तुम इस स्वेटर में कटरीना लगती हो।
33. दिल की धड़कन –
किसी की धड़कन तेज़ करने के लिए प्यार की जरूरत नहीं, बस इतना ही कह दो कि . . . भाई तेरा रिजल्ट आ गया है। चेक कर।
34. भोजपुरी में अनुवाद –
अध्यापक: भोजपुरी में अनुवाद करो।

दिल के टुकड़े-टुकड़े करके मुस्कुरा के चल दिए…

छात्र: करेजवा के बुकनी-बुकनी कर के दांत चियार के चल देहलू…

35. मंगल का ताना –
अब से घरवालो को नया ताना मारने का मौका मिल जाएगा . . कि उठ जा बेटा दुनिया मंगल पर पहुंच गई और तू अभी यहीं पड़ा है।
36. पत्थर मार लो –
दोस्तों को मैसेज करने से बेहतर है कि किसी कुत्ते को पत्थर मार लो। .
कम से कम जवाब तो देता है।
37. रजनीकांत vs आलिया –
एक कॉम्पिटिशन में दोनों से एक सवाल पूछा गया कि 8 का आधा कितना होगा? रजनी ने सवाल सुनने से पहले ही कहा: 4

आलिया: डिपेंड करता है
यदि हॉरिजॉन्टल हाफ करो तो ‘0‘ और वर्टिकल करो तो ‘3‘

रजनीकांत लॉस्ट आलिया रॉक्स

बड़ा आया रजनीकांत!

38. पियक्कड़ों का संतोष –
पियक्कड़ बड़े संतोषी किस्म के प्राणी होते हैं। दारू के दाम कितने भी बढ़ जाएं, वे कभी विरोध प्रदर्शन नहीं करते।
39. पति को अंदर बुला लो –
लेडी पेशंट: डॉक्टर, प्लीज मेरे पति को अंदर बुला लीजिए।

डॉक्टर: आप मेरे साथ सुरक्षित हैं। आप मुझपर भरोसा कर सकती हैं।

ले़डी पेशंट: नहीं, आपकी नर्स बाहर बैठी है, और मुझे अपने पति पर भरोसा नहीं है।

40. सुखी पति के गुण –
सभी सुखी पति गजनी के आमिर खान की तरह होते हैं।

बीवी की सुनते हैं,
समझते हैं,
और
15 मिनट के बाद सब भूल जाते हैं…

41. यू आर सो हॉट –
लड़के ने लड़की का हाथ पकड़कर कहा: यू आर सो हॉट, बेबी!

लड़की ने खींचकर उसे एक थप्पड़ मारा और कहा: कमीने, मुझे 103 डिग्री बुखार है और तुझे आशिकी सूझ रही है?

42. ट्रेन में बर्फ की कमी –
एक दबंग आदमी ट्रेन के एसी कोच में आराम से ड्रिंक कर रहा था। उसने अटेंडेंट को बुलाकर 100 रुपये का नोट देते हुए कहा: जा जल्दी से थोड़ा बर्फ और ले आ। आखिरी पैग लगाना है।

अटेंडेंट: साहब, अब और बर्फ नहीं मिल सकता।

दबंग आदमी: क्यों नहीं मिल सकता?

अटेंडेंट: साहब, डिसूजा साहब की डेड बॉडी तो पिछले स्टेशन पर ही उतर गई।

43. एक गाने में जिंदगी – 
एक गाने ने पूरी जिंदगी बयां कर दी-

5-15 साल: नैनों में सपना 15-25 साल: सपनों में सजना 25-35 साल: सजना पे दिल आ गया 35-75 साल: क्यूं सजना पे दिल आ गया???

44. फोन करने से पहले दो लगाएं –
संता पीसीओ पर फोन करने गया, फिर अचानक उसने पीसीओ वाले को दो थप्पड़ लगा दिए।

पीसीओ वालाः ये थप्पड़ क्यों लगाए?

संताः अबे उधर देख, वहां लिखा है फोन करने से पहले दो लगाएं।

45. पप्पू ‘जवान’, कैप्टन परेशान –
मिलिटरी का कैप्टनः नौजवानों, आगे बढ़ो

(पप्पू आगे नहीं बढ़ा)

कैप्टनः तुम आगे क्यों नहीं बढ़े?

पप्पूः आपने कहा 9 जवानों आगे बढ़ो, मैं 10वें नंबर पर खड़ा हूं…

46. दोस्त को किया फोन –
एक दोस्त को 3 बार कॉल किया। उसने फोन नहीं उठाया।

मैंने उसे एसएमएस किया- शाम को दारू पार्टी कर है, तू आएगा क्या?

अब वह मुझे 8 बार कॉल कर चुका है, और मैं फोन नहीं उठा रहा 🙂

47. डेटॉल की शीशी –
संता हाथ में ब्लेड मार रहा था।

बीवी: यह क्या कर रहे हो जी?

संता: डेटॉल की शीशी टूट गई है। यह बेकार हो जाए, उससे पहले ही यूज कर लेना चाहिए। ला, तेरी अंगुली भी काट दूं।

48. तीन गुप्त बातें –
जिंदगी में तीन बातें कभी किसी को नहीं बतानी चाहिए।

1)

2)

3)

नहीं बतानी, मतलब नहीं बतानी। किसी को भी नहीं।

49. महंगा पड़ा सपना –
शिक्षकः ओसामा की 5 बीवी हैं और 20 बच्चे, और लालू की एक बीवी और 12 बच्चे तो बताओ दोनों में से बेहतर कौन है?

संताः सर, स्कोर तो ओसामा का ज्यादा है पर स्ट्राइक रेट लालू की बेहतर है।

50. कितने भाई-बहन हो?
लड़के वाले एक लड़की को देखने पहुंचे। बातचीत के बाद घरवालों ने लड़के और लड़की को एक कमरे में अकेले बिठा दिया।

काफी देर की खामोशी के बाद लड़की ने ही डरते-डरते पूछा: भैया, आप कितने भाई-बहन हो?

लड़का: अब तक तो 3 थे, अब 4 हो गए।

51. सबसे प्यारा मेसेज –
लोग कहते हैं कि I LOVE YOU दुनिया का सबसे प्यारा मेसेज है।

लेकिन,

‘आ भाई, पेमेंट ले जा’

इस मेसेज जैसा दूसरा कोई मेसेज नहीं है।

Jokes Source: http://navbharattimes.indiatimes.com/
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बिल गेट्स ने बनाई मूवीज…

यदि बिल गेट्स बॉलीवुड फिल्में बनाने लगें तो उनकी फिल्मों के नाम कैसे होंगे ?

जरा इन नामों पर गौर फरमाएं –

1. हैंग तो होना ही था !!!!!!!!!!!!

2. मेरी डिस्क तुम्हारे पास है

3. आओ चेट करे
4. प्रोग्रामर नंबर.15. मेरा नाम डवलपर6. जावा वाले जॉब ले जायेंगे
7. हम आपके मेमोरी में रहते हैं
8. दो प्रोसेस्सर बारह टर्मिनल
9. तेरा कोड चल गया
10. हर दिन जो मेल करेगा
11. नेटवर्क के उस पार
12. देबुगिंग कोई खेल नहीं
13. जिश देश में बिल गेट्स रहता है14. राजू बन गया MCSE .!15. कलाइएंट  एक नम्बरी प्रोग्रामर  दस नम्बरी16. लोगिन करो सजना
17. नौकर PC का
18. 1942 — ऐ  बग स्टोरी
19. कहो ना वाइरस है
20. क्रेश से क्रेश तक

Note::-

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

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* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

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* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

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* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

http://wp.me/p3gkW6-Ig

* चांदी की छड़ी।

http://wp.me/p3gkW6-1ep

 

 

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बेनाम रिश्ता।

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♣♥ बेनाम रिश्ता। ♣♥

-मृदुला सिन्हा।

चित्राजी निमंत्रण-पत्र के साथ हाथ से लिखे मनुहार पत्र के हर अक्षर को अपनी नजरों से आँकती उनमें अंतर्निहित भावों को सहलाने लगीं। कई बार पढ़े पत्र। सोचा विवाह में इकट्ठे लोग पूछेंगे—मैं कौन हूँ? क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से मेरा? क्या जवाब दूँगी मैं? क्या जवाब देंगे शालिग्रामजी? दोनों के बीच बने संबंध को मैंने कभी मानस पर उतारा भी नहीं। नाम देना तो दूर की बात थी। बार-बार फटकारने के बाद भी वह अनजान, अबोल और बेनाम रिश्ता चित्राजी को जाना-पहचाना और बेहद आत्मीय लगने लगा था। कभी-कभी उसके बड़े भोलेपन से भयभीत अवश्य हो जाती थीं और तब उस रिश्ते के नामकरण के लिए मानो अपने शब्द भंडार में इकट्ठे हजारों शब्दों को खँगाल जातीं। नहीं मिला था नाम। और जब नाम ही नहीं मिला तो पुकारें कैसे?

इसलिए सच तो यही था कि उन्होंने कभी उस रिश्ते को आवाज नहीं दी। रिश्ते के जन्म और अपनी जिंदगी के रुक जाने के समय पर भी नहीं। जिंदगी के पुनःचालित होकर उसकी भाग-दौड़ में भी नहीं। शालिग्रामजी को कभी स्मरण नहीं किया। शालिग्रामजी ने ही बेनाम रिश्ते को याद रखने की पहल की थी।

बहुत सोच-विचार करने के बाद चित्राजी ने भोपाल जाना तय कर लिया। बहुत दूर जाना था। बस, और फिर ट्रेन की यात्रा। वह भी गरमी में। शालिग्रामजी ने दूरभाष पर ही विश्वास दिलाया था—‘आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। मेहमानों को ठहराने की व्यवस्था करते समय भी हमने मौसम का ध्यान रखा है। मैं समझता हूँ, हमारे मेहमानों को कोई कष्ट नहीं होगा। और आप तो खास मेहमान हैं।’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने जब जाने का निश्चय ही कर लिया था तो कष्ट और आराम का क्या? शिमला बस स्टैंड पर वॉल्वो बस में बैठ गई थीं। मोबाइल की घंटी बजी। शालिग्रामजी का फोन था। उन्होंने कहा, ‘‘आपकी बस के दिल्ली बस अड्डे पर रुकते ही हमारा एक आदमी मिलेगा। उसका नाम राकेश है। उसके पास आपकी रेल टिकट होगी।’’

चित्राजी ने कुछ नहीं कहा। इतना भी नहीं कि मैंने टिकट ले रखी है। और वैसा ही हुआ। उनकी बस के रुकते ही एक व्यक्ति अंदर घुसा। उसकी खोजी नजर ने चित्राजी को पहचान लिया। उनकी अटैची नीचे उतारकर बोला, ‘‘आपके पास यदि कोई टिकट है तो मुझे दे दीजिए। मैं उसे कैंसिल करवा दूँ। ए.सी. द्वितीय श्रेणी की यह टिकट रख लीजिए। ट्रेन शाम को निजामुद्दीन स्टेशन से जाती है। मैं आपको लेने आ जाऊँगा। मैं भी आपके साथ चल रहा हूँ।’’

चित्राजी ने उस व्यक्ति को स्लीपर क्लास की टिकट निकालकर दे दी। वे थ्री-व्हीलर में बैठकर गोल मार्केट स्थित अपनी एक सहेली के क्वार्टर में चली गईं। शाम को सबकुछ वैसे ही घटा जैसा राकेश ने बताया था।

सुबह-सुबह गाड़ी के भोपाल जंक्शन पर रुकते ही एक नौजवान उनकी सीट तक आ गया। उनके पैर छूकर बोला, ‘‘मैं दीपक हूँ। मेरे पिता का नाम शालिग्राम कश्यप है।’’

चित्राजी ने ‘खुश रहने’ का आशीष दिया और उसके पीछे चल पड़ीं। गाड़ी आगे बढ़ रही थी। रोड पर भीड़ के कारण कभी-कभी उसका हॉर्न बजता। अंदर पूरी शांति बनी रही। कोई कुछ नहीं बोला। चित्राजी उस नौजवान से बातें करना चाहती थीं, पर शुरुआत कैसे करें।
उस घर की चौहद्दी, आबादी, संस्कार और स्थितियाँ, कुछ भी तो नहीं जानती थीं। भोपाल शहर के बारे में पूछने ही जा रही थीं कि दीपक बोल पड़ा—‘‘मैं आपको आंटी कहूँ ?’’

‘‘हुँ’’
‘‘तो आंटी! बारात आज शाम को आ रही है, लोकल बारात है, इसलिए समय से ही आ जाएगी। मैंने सुना कि आप कल ही लौट रही हैं। आपके पास समय बहुत कम है। पिताजी ने कहा है कि आप भोपाल शहर पहली बार आ रही हैं। इसलिए भोपाल भी तो देखना चाहेंगी। बड़ा सुंदर शहर है हमारा। आप जल्दी से तैयार हो जाएँ। आपको मेरा मौसेरा भाई घुमाने ले जाएगा।’’

‘‘ठीक है।’’ इतना ही बोल पाईं चित्राजी। मन तो उस व्यक्ति के प्रति आभार प्रकट करने को बन आया था। उनकी इतनी चिंता करनेवाले नौजवान को शाबासी भी दी जा सकती थी। पर वे कुछ नहीं बोलीं। दीपक बोला, ‘‘मेरे पिताजी आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं। कहते हैं, आप साक्षात् देवी की अवतार हैं। पर पता नहीं क्यों, न आप कभी भोपाल आईं, न हमें शिमला बुलाया। कुछ देर पहले ही आपके बारे में बताया। आपसे मिलने की चाहत पनप आई। इसलिए कई काम छोड़कर स्वयं स्टेशन आ गया।’’

चित्राजी कुछ बोलने के लिए जिह्वा पर शब्द सजाने लगीं कि ड्राइवर ने गाड़ी में ब्रेक लगा दिया था। गाड़ी किसी गेस्ट हाउस के सामने रुकी। गाड़ी से उनका सामान निकालकर दीपक आगे बढ़ा। वे पीछे-पीछे। उन्हें अंदर तक पहुँचाकर बोला, ‘‘आंटी! आप यहाँ नहा-धो लें। नाश्ता घर पर ही करना है। फिर आप भोपाल दर्शन के लिए निकलेंगी। दोपहर का भोजन भी घर पर ही है। भोजन के बाद फिर यहाँ आराम करिएगा। शाम को तो शादी ही है।’’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। दीपक के कमरे से निकलने पर अवश्य उसके पीछे गईं। आँखों की पहुँच से उसकी काया ओझल हो जाने पर पीछे लौट कमरे की सिटकिनी बंद कर बिस्तर पर बैठ गईं। सोचने लगीं—दीपक कितना लायक लड़का है। उन्नीस-बीस वर्ष का होगा। इतना जिम्मेदार और पितृभक्त! समाज नाहक परेशान है कि युवा पीढ़ी बिगड़ गई। मेरे साथ थोड़ी देर गुजारकर इस युवा ने मेरे मन में जगह बना ली। पर श्रेय तो इसके पिता को ही जाता है, शालिग्रामजी को। उनका ध्यान आते ही चित्राजी उठ बैठीं। अपना ध्यान बँटाने के लिए तैयार होने लगीं। चित्राजी के नहा-धोकर तैयार होते ही नरेश आ गया था। उन्हें नाश्ते के लिए ले जाते हुए पूछा, ‘‘आप दीपक की बुआजी हैं? उसकी दो बुआओं से मिल चुका हूँ। आपसे पहली बार मिला। दीपक का मैं मित्र हूँ।’’

शालिग्रामजी शीघ्रता से गेट पर पहुँचे। उन्होंने चित्राजी का अभिवादन किया। नरेश ने कहा, ‘‘घुमा लाया आंटी को भोपाल। इन्हें तीनों ताल अच्छे लगे।’’

नरेश इतना नहीं कहता तो शायद चित्राजी सामने खड़े व्यक्ति को पहचान भी नहीं पातीं। कुछ दरक गया था चित्राजी के अंदर। उन्होंने अपने को सँभाला। हाथ जोड़कर उनके अभिवादन का उत्तर देते हुए चेहरे पर भी मुसकान थी। नाश्ते का इंतजाम फ्लैट के बाहरवाले हिस्से में ही किया गया था। कुछ लोग नाश्ता समाप्त कर चुके थे, कुछ का जारी था, कुछ आनेवाले थे। शालिग्रामजी को चित्राजी को लेकर नाश्ते के स्थान पर पहुँचने में दो मिनट भी नहीं लगे होंगे, पर वहाँ उपस्थित नाश्ता कर रहे मेहमानों के प्लेट में पडें स्वादिष्ट व्यंजनों में मानो एक विशेष व्यंजन आ टपका।

‘‘ये कौन हैं?’’ प्रश्न पसरा।
‘‘इन्हें तो पहले कभी नहीं देखा।’’ स्वाद लेने लगे लोग।
आपस में प्रश्नों का आदान-प्रदान हो रहा था। उत्तर किसी के पास नहीं था। शालिग्रामजी की पत्नी माला भी आ गईं। रिश्तेदारों से नाश्ता का स्वाद पूछतीं, कुछ और लेने का आग्रह करतीं, आगे बढ़ रही थीं। किसी ने पूछ ही लिया—‘‘वे कौन हैं? कोटा की साड़ी में वे सुंदर सी महिला?’’
माला ने इधर-उधर आँखें दौड़ाईं। दूसरी ने स्वर दाबकर ही कहा, ‘‘वही, जो शालिग्रामजी के साथ हैं। उन्हें शालिग्रामजी ने स्वयं अपने हाथों से प्लेट लगाकर दी है। देखिए!’’ ठीक ही तो कहा था सबने। माला ने भी यही देखा। चाय का प्याला लिये खड़े थे शालिग्रामजी। सौम्य आकृति, लगभग उसकी ही हम-उम्र, बड़े सलीके से नाश्ता कर रही, कौन है यह महिला? शालिग्रामजी ने तो कभी इसका जिक्र नहीं किया। आमंत्रण भेजनेवाली सूची भी माला ने पढ़ी थी। किसी अनजान महिला का नाम नहीं था। फिर कौन है यह?

प्रश्न तो अनेक थे। पर वह अवसर नहीं था पति से प्रश्न पूछने का। जबकि अधिकांश मेहमानों के बीच यही प्रश्न बॉल की भाँति दिन भर उछलता उसकी पाली में भी आता रहा। रीति-रिवाज और रस्म अदाएगी में सब एक-दूसरे से पूछते रहे। दोपहर के लंच के समय भी चित्राजी आ गईं थीं।
शालिग्रामजी की एक साली उनके पास गई। पूछा, ‘‘आप कहाँ से आई हैं?’’

दूसरा प्रश्न पूछने ही वाली थी—‘‘आप मेरे जीजाजी को कैसे जानती हैं?’’
इस बीच स्वयं जीजाजी उपस्थित हो गए थे। उन्होंने अपनी साली को किसी और विशेष मेहमान की खातिरदारी में लगा दिया था।
गेस्ट हाउस में आराम करते हुए चित्राजी का मन कई मसलों में उलझ गया था। बहुत दिनों बाद पच्चीस वर्ष पूर्व घटी घटना का संपूर्ण दृश्य नजरों के सामने रूढ़ हो गया। शिमला से गाड़ी में पति-पत्नी और दोनों बच्चे का कुल्लु-मनाली के लिए प्रस्थान। थोड़ी दूरी पर जाते ही गाड़ी का खड्डे में गिरना। पति के सिर में चोट आना। उनका होश नहीं लौटना। डॉक्टर से बातचीत। बेहाल-बेहोश चित्राजी के सामने डॉक्टर की एक माँग। माँग पर शीघ्रता से विचार करने का आग्रह। अकेली खड़ी चित्राजी। दो नन्हे बच्चे माँ से चिपके। अपना-पराया कोई साथ न था। निर्णय लेना था चित्राजी को। सबकुछ चला गया था। जो बचा था, उसकी माँग थी। चित्राजी ने वह वस्तु देना स्वीकार कर लिया, जो उनकी थी। डॉक्टर का सुझाव। और फिर मृत्यु के करीब गया व्यक्ति जीवित हो गया।

स्मृतियों में जीवित था सब दृश्य। कभी-कभी जीवंत हो जाता। पर चित्राजी ने दृढ़ निश्चय कर उन यादों को नजर के सामने से हटा दिया था। शुभ-शुभ का अवसर था। ‘जो बीत गई, वह बात गई’ कविता वे क्लास में पढ़ाती आई हैं। जिस लड़की का विवाह है, उसके लिए शुभ सोचना है। अवसर और समय की वही माँग थी।

बारात दरवाजे लगी। स्वागत में खड़े स्त्री-पुरुष तिरछी नजरों से चित्राजी की ओर अवश्य देखते रहे। प्रश्न वही—‘‘कौन है यह?’’, ‘‘क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से?’’

शालिग्रामजी ने द्वार पर ही अपने समधी से चित्राजी का परिचय कराया था। उनकी दो सालियाँ अपने पतियों के साथ वहीं खड़ी थीं। उनका परिचय नहीं करवाया। और यह खबर उस भीड़ भरे स्थल पर भी आसानी से यात्रा कर गई। सबको मिल आई।

बराती और घराती के भोजनापरांत विवाह के रस्म पूरे किए जाने लगे। शालिग्रामजी को पंडितजी द्वारा मंडप पर कन्यादान के लिए बुलाया गया। मंडप पर बैठने के पूर्व उन्होंने चारों ओर निगाहें घुमाईं। उनकी दृष्टि के सम्मुख वह चेहरा नहीं आया, जिसकी उन्हें खोज थी। उनके आस-पास मंडप पर बैठी उनकी बहनों और सालियों ने भाँप लिया था। दो-तीन एक साथ बोल पड़ीं—‘‘वहाँ हैं आपकी मेहमान।’’

देखा माला ने भी। मानो खीझकर बोली, ‘‘अब बैठ जाइए। मनचित्त लगाकर कन्यादान करिए। इसी काम के लिए मेहमान और सारा इंतजाम है। बैठिए!’’

शालिग्रामजी ने ऊँची आवाज में कहा, ‘‘चित्राजी! आप इधर आइए। मंडप पर बैठिए। मेरी बेटी को आपका विशेष आशीर्वाद चाहिए।’’
चित्राजी अंदर से हिल गईं। ऊपर से उपस्थित जनों की निगाहों के तीरों से बिंध गईं। वे परेशान तो थी हीं। अपने स्थान पर खड़ी होकर बोलीं, ‘‘आप लोग शुभ कार्य के लिए वहाँ उपस्थित हुए हैं। बेटी का कन्यादान करिए। मुझे यहीं बैठना है। मैं विधवा हूँ। मेरा सुहाग नहीं है। समाज ऐसी महिला को किसी सौभाग्याकांक्षिणी को सुहाग देने की मनाही करता है। मैं दिल से आपकी बेटी का शुभ चाहती हूँ। इसलिए दूर बैठी हूँ। आप अपना पुनीत काम पूरा करें। मेरी चिंता छोड़ दें।’’ वे बैठ गईं।

‘‘मैं नहीं मानता ऐसे समाज के विधान को। मेरे परिवार के लिए, मेरी बेटी के लिए आपसे बढ़कर कोई शुभ नहीं हो सकता। आपकी कृपा के बिना तो न मैं होता न मेरी बेटी। आइए! आप मेरी प्रार्थना मानकर मेरी बेटी का कन्यादान करिए।’’ फिर तो पंडितजी भी परेशान हो गए। बोले, ‘‘शालिग्रामजी! आपकी मेहमान महिला ठीक कह रही हैं। आप कन्यादान करिए। अपनी पत्नी को साथ बैठाइए। मंडप पर बैठी सभी महिलाएँ सुहागन ही हैं।’’

शालिग्रामजी बिफर पड़े—‘‘आप सब आज सुबह से चित्राजी का परिचय जानने के लिए परेशान हैं। आपके बीच तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। कार्य व्यस्तता में भी मैं आपके प्रश्नों के बाणों से बिंधता रहा। जब तक मैं उनका परिचय न दे दूँ, आप सबों का ध्यान भी विवाह के रस्म-रिवाजों पर केंद्रित नहीं होगा। तो सुनिए!’’ और जो कुछ शालिग्रामजी ने सुनाया, सुनकर वहाँ बैठे उपस्थित लोगों के प्रश्न तो चुके ही, वे सब चित्राजी के प्रति नतमस्तक हो गए। वे अवाक् रह गए। ‘‘पच्चीस वर्ष पूर्व एक दुर्घटना में चित्राजी के पति घायल हो गए। उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था। जिस अस्पताल में उन्हें लाया गया, उसी के एक कमरे में मैं ऑपरेशन बेड पर लेटा था। मेरे दिल ने काम करना बंद कर दिया था। चिकित्सकों ने निर्णय लिया था—किसी का धड़कता दिल मिलने पर प्रत्यारोपण हो सकता है। आँख दान, किडनी दान जैसे अंग दान की बात तो सुनी गई थी। देहदान भी होने लगा था। पर हृदय दान तो तभी हो जब वह धड़कता हो, और जब तक दिल धड़कता है, आदमी जिंदा है। भला जीवित का हृदय कोई क्यों दान करे।

चित्राजी के पति का दिल धड़क रहा था। मस्तिष्क ने कार्य करना बंद कर दिया था। डॉक्टर शर्मा ने इनसे अनुरोध किया—‘‘आपके पति को अब हम नहीं बचा सकते। पर आपकी सहमति हो तो इनका दिल किसी और के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। वह जिंदा हो सकता है।

‘‘सुझाव सुनकर चित्राजी पर क्या बीती, मुझे नहीं मालूम। और किसी ने जानने की कोशिश भी की कि नहीं, मालूम नहीं। चित्राजी ने अनुमति दे दी थी। मेरा दिल पिछले पच्चीस वर्षों से धड़क रहा है, यह मेरा नहीं, इनके पति का दिल है। पर पिछले पच्चीस वर्षों में इन्होंने एक बार भी एहसान नहीं जताया। इन्होंने तो मुझे तब भी नहीं जाना, न देखा था। मैंने भी नहीं। इन्होंने कभी मुझे ढूँढ़ने की कोशिश भी नहीं की। पर मैं बहुत बेचैन था। जीवन देनेवाली के प्रति आभार भी नहीं प्रगट कर सका। दो वर्ष पूर्व इनके शहर में गया। डॉ. शर्मा मिल गए। मेरा दुर्भाग्य कि इनसे तब भी भेंट नहीं हो सकी। डॉ. शर्मा से इनका मोबाइल नंबर मिल गया। फोन पर ही मैंने इन्हें अपना परिचय दिया। मनुहार पत्र भेजा। फिर निमंत्रण। बहुत आग्रह करने पर ये मेरी बेटी के विवाह पर आईं हैं। मैंने भी इनको आज सुबह ही पहली बार देखा। अब आप ही सोचिए पंडितजी! हमारे परिवार के लिए इनसे बढ़कर शुभ और कौन होगा। मेरे विवाह और मेरे बच्चे होने के पीछे भी यही तो हैं। मैं हूँ, तभी तो सब है।’’

कन्यादान के रस्म के समय तो सबकी आँखें भरती हैं। शालिग्रामजी ने तो कन्यादान के पूर्व ही उपस्थित सभी आँखों में पानी भर दिया।
माला मंडप पर से उठी। सीधे चित्राजी के पास पहुँची। पैर छूकर आशीष लिये और हाथ पकड़कर मंडप पर ले आई। महिलाओं के झुंड ने आँसू पोंछकर गाना प्रारंभ किया —‘शुभ हो शुभ, आज मंगल का दिन है, शुभ होे शुुभ। शुभ बोलू अम्मा, शुभ बोलू पापा, शुभ नगरी के लोग सब, शुभ हो शुभ!’’

रिश्ते को नामकरण की आवश्यकता नहीं पड़ी। अनेक रिश्तों से भरा था प्रांगण। पर सबसे ऊँचा हो गया था शालिग्रामजी और चित्राजी का रिश्ता। बेनाम था तो क्या?

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गहरी नींद – मस्तिष्क को दुरुस्त बनाती है।

Kmsraj51 की कलम से…..

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◊ गहरी नींद – मस्तिष्क को दुरुस्त बनाती है। ◊

जब आप सोते हैं, तब वास्तव में आपके मस्तिष्क में कुछ जीन जागृत हो जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि मस्तिष्क की मरम्मत व मस्तिष्क कोशिकाओं के विकास के लिए ये जीन बहुत महत्वपूर्ण हैं।

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अमेरिका में वैज्ञानिकों का मानना है कि पर्याप्त नींद से विशिष्ट मस्तिष्क कोशिकाओं का निर्माण तेज होता है। इन कोशिकाओं को ओलिगोडेंड्रोसाइट्स कहा जाता है, जो मस्तिष्क के चारों ओर सुरक्षात्मक कवच तैयार करती हैं।

स्वस्थ मस्तिष्क में ओलिगोडेंड्रोसाइट्स माइलीन सुरक्षात्मक कवच का निर्माण करती हैं। यह कुछ वैसा ही कवच होता है, जैसा कि बिजली के तारों का रोधक कवच होता है। माइलीन विद्युत संवेगों को त्वरित रूप से एक कोशिका से दूसरी कोशिका में पहुंचने में मदद करता है।

‘साइंस डेली’ के मुताबिक ‘द जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस’ के चार सितंबर को जारी अंक में प्रकाशित जानवरों पर हुए एक अध्ययन के अनुसार ये परिणाम मस्तिष्क की मरम्मत व विकास में नींद की भूमिका के संबंध में वैज्ञानिकों को नई जानकारियां इकट्ठी करने में मदद करेंगे।

वैज्ञानिक सालों से यह जानते थे कि जीन सोने के दौरान सक्रिय हो जाते हैं, जबकि हमारे जागने के दौरान ये सुप्त अवस्था में चले जाते हैं।

वर्तमान अध्ययन मेडिसन के विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय की काइरा सिर्ली व उनके साथियों ने किया। जिसमें उन्होंने सोते हुए या जगाए रखे गए चूहों में ओलिगोडेंड्रोसाइट्स जीनों की सक्रियता मापी।

अध्ययनकर्ताओं के समूह ने पाया कि नींद के दौरान माइलीन निर्माण से जुड़े जीन सक्रिय हो जाते हैं। इसके विपरीत कोशिका मृत्यु व कोशिकीय तनाव प्रक्रिया की ओर इशारा करने वाले जीन जानवरों के जागने के दौरान जागृत हो जाते हैं।

स्विटजरलैंड के लॉसेन विश्वविद्यालय में निद्रा अध्ययनकर्ता मेहदी ताफ्ती ने कहा, ”ये परिणाम इशारा करते हैं कि नींद व अनिद्रा मस्तिष्क की किस तरह मरम्मत करते हैं या उसे नुकसान पहुंचाते हैं।”

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