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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Hindi Motivational Story !!

सन् 1600 बनाम सन् 2014 – 40।

kmsraj51 की कलम से …..

Kmsraj51-CYMT-Oct-14-1

सन् 1600 बनाम सन् 2014-40 ….. 

वर्तमान दौर चाहे वह राजनीति का हो या आर्थिक या फिर इस देश के चिर-संस्कारों से निर्मित नैतिक मूल्यों का ये सभी एक बहुत ही भयावह दौर से गुजर रहे हैं शायद कुछ लोग जो विद्वता के धनी है इसे संक्रमण काल के नाम से भी जानते हैं तो कुछ लोग इसे विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोगवाद कह रहे हैं लेकिन यह समय मात्र और मात्र एक सच्चे भारतीय जो इसकी अखंडता एवं गौरवमयी इतिहास से थोड़ा भी सरोकार रखता है, के लिए बहुत ही विषम एवं चिंताजनक है स्पष्ट रुप में कहें तो बहुत ही भयावह है।


इतिहास गवाह है कि इस देश की मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि इसने एक से एक संस्कारी महापुरुष तथा देशभक्त पैदा किए हैं लेकिन यह इस मिट्टी का दुर्भाग्य है कि विनाशकारी खरपतवार के रुप में यहां जयचंदों ने भी जन्म लिया है तथा इस पावन धरा को कलंकित किया है। आज का भारत भी इसी दौर से गुजर रहा है जहां ख्ररपतवार इतना बढ़ गया है कि अब पोषक फसलें नज़र ही नहीं आती और यह स्थिती केवल राजनीति ही नहीं कमोबेश हर क्षेत्र की हैं। इसका मात्र और एक मात्र कारण हमारे चिर-संस्कारों एवं मूल्यों का ह्रास होना है। मूल्यों एवं आदर्शों का प्रवाह सदैव शीर्ष से होता है और कहा भी है कि यथा राजा-तथा प्रजा लेकिन आज अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए हमारे देश के कर्णधार नेतृत्व कर्ताओं ने इस उक्ति को ही बदल दिया और बयान दिया कि जैसी जनता है वैसे ही नेतृत्व कर्ता बनेंगे अर्थात ये लोग जनता के इच्छानुसार ही अपने हित साधन के लिए सारे अपराध एवं भ्रष्ट तंत्र को बढ़ावा दे रहे हैं। आखिर वो कौन सी प्रजा या जनता है जिसने राजा को भ्रष्ट एवं डकैत बनने के लिए जनादेश दिया? शायद इसका उत्तर यह है कि इस देश में जनता या नागरिक नाम की कोई व्यवस्था अब अस्तित्व में ही नहीं है यहां केवल उपभोक्तावादी संस्कृति के पोषक मतदाता रहते हैं जिन्हें कोई भी खरीद सकता है तथा ये तथाकथित मतदाता भोली चिड़ियाओं की भांति किसी भी बहेलिए के जाल में फंसने को आतुर है। फिर चाहे वह बहेलिए देशी हो या विदेशी इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लालच ने संवेदनाओं को मृत प्राय: कर दिया है। इन चिड़ियाओं को स्वतंत्र आसमान से बेहतर सुख-सुविधा युक्त वो स्वप्निल सोने का पिंजड़ा अधिक रास आने लगा है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं और जो मात्र और मात्र एक छलावा भर है।

आज इस देश की जनता को देश के प्रोफाईल से अधिक अपना हाई प्रोफाईल प्रिय है कमोबेश आज हमारा देश गुलामी से पहले के उसी दौर से गुजर रहा हैं। जनता विभिन्न मुद्दों पर आपस में बंटी हुई है चाहे वो आरक्षण का मुद्दा हो या राज्यवाद या फिर धर्म या जातिवाद का चारों और विघटनकारी शक्तियों का बोलबाला हैं हर आदमी ने अपने चारों और अपने स्वार्थों का एक घेरा बना रखा है तथा इस घेरे या उसके क्षुद्र स्वार्थों को नुकसान पहुंचाने वाला हर आदमी उसका शत्रु है। इस देश में अपनी जातिगत गौरव गाथा गाने वाले इतने जातिगत व धार्मिक सामाजिक संगठन है जिनको शायद गिनना भी संभव नहीं होगा लेकिन दुर्भाग्य है कि वे महापुरुष जो राष्ट्र के लिए एक होकर लड़े उनको भी इन कम्बख्तों ने अपने स्वार्थ के अनुरुप बांट दिया । आज कहीं भी अखिल भारतीय समाज नाम की कोई संस्था नही है क्योंकि सभी ने अपने आपको कई सांचों में बांट लिया है तथा सभी के अपने अपने हित हैं जिनके लिए वे लड़ रहे है उनकी तरफ से देश भले गर्त में जाए कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उन्हें यह पता नही कि जब तक यह देश अखंड एवं सुरक्षित है तभी तक उनका या उनके समाज का अस्तित्व है: आज की युवा पीढ़ी को एक अदद नौकरी और सुख सुविधा युक्त घर से अधिक सोचने की जरूरत महसूस नहीं होती देश के विषय में या अपनी सभ्यता संस्कृति के बारे में मनन करने का कोई औचित्य नहीं हैं अपने घर की बनी रोटी भी यदि विदेशी पेकिंग में दी जाती है तो खुशी होती है। आज कमोबेश हर दूसरा आदमी मानसिक गुलामी के दौर से गुजर रहा है राष्ट्र छद्म अराजकता के वातावरण से गुजर रहा है। क्या यही स्वतंत्रता है? विकास के नाम पर अपने स्वाभिमान, राष्ट्रीय संस्कृति को भूलाना तथा भौतिकता के चकाचौंध में प्राकृतिक संसाधनों का बंदरबांट कर देश को रसातल की और ले जाना, क्या आजादी का यही मतलब है?

आज के दौर की तुलना भारत के राजपूतकालीन समय से की जा सकती है जब भारत कई छोटी- छोटी रियासतों में बंटा हुआ था तथा ये रियासतें छुद्र स्वार्थों की पूर्ती हेतु आपस में लड़ती रहती थीं। विलासिता एवं अकर्मण्यता की पर्याय बन चुकी ये रियासतें अंदर से जर्जर हो चुकी थी।परिणामस्वरूप ये रियासतें कमजोर होती गईं विदेशी आक्रांताओं ने अपनी हवस एवं बेलगाम क्षुधा की पूर्ति हेतु इसा पावन धरा को कलुषित किया ताकत का एक बड़ा भाग भारतीय समाज कई बुराईयों जैसे छुआछुत, उच्श्रंखल जातिवाद , संप्रदायवाद इत्यादि में जकड़ा हुआ था तो क्या आज कमोबेश हमारे सामने वही परिदृश्य नहीं दिखाई दे रहा है। किसी ने क्या खूब कहा है कि इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता है पर क्या इतने कम अंतराल पर और क्या हम इससे सीख लेने के बजाय इसकी पुनरावृति होने देंगें। आज ये छोटे-छोटे राज्य जो कि नदी के पानी, भाषा, खनिजों के आधिपत्य के लिए न्यायालय में हाजिरी दे रहे हैं और सैकड़ों पार्टियां जो क्षुद्र स्वार्थों के लिए जनता को सब्ज बाग दिखा कर उनका वोटा हासिल कर रही हैं तत्पश्चात उसी जनता का शोषण तो क्या ये आजादी और उससे भी पूर्व अंग्रेजों के आगमन के समय का परिदृश्य प्रस्तुत नहीं कर रही है तथा जनता लाचार कई मतभेदों में उलझी हुई निरिह बनी सब कुछ सहने को विवश है।अगर इसी का नाम आजादी है तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश के गद्दार इस देश की अमूल संपदा के साथ-साथ यहां के कथित मतदाताओं के भविष्य का भी किसी विदेशी के हाथों सौदा कर दें तथा बाद में कहें कि जीडीपी बढ़ाने के लिए यह जरूरी था।
जिस देश के पड़ोसी ताकतवर, कूटनीतिक एवं साम्राज्यवादी हों उस देश का राजनैतिक व नैतिक पतन की ओर अग्रसर होना उसके दुश्मनों के मार्ग को और सुगम बना देता है तथा वह देश बिना किसी युद्ध के ही गुलाम बनाया जा सकता है क्योंकि किसी देश का नेतृत्व ही उस देश की समृद्धि और ताकत का आईना होता है जिसमें उस देश की बाकी आवाम की झलक देखी जा सकती है।

संजय मिश्र “सदांश”

नोट: यह रचना किसी विशेष वर्ग, समुदाय या व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं है, न ही हमारा उद्देश्य किसी के दिल को ठेस पहुंचाना है । यह लेख पूर्ण रुप से मां भारती को समर्पित है। यदि कोई तथ्य किसी से मिलता है तो यह संयोग मात्र होगा।


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** संजय मिश्रा **

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आपका सबका प्रिय दोस्त,

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

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* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

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* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

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* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

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* चांदी की छड़ी।

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Meditation – Experiencing My Original Home

kmsraj51 की कलम से…..

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Meditation – Experiencing My Original Home (Part 1)

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In meditation, I focus my mind and intellect on that region which is called by names like soul world, paramdham, nirvandham, shantidham and so on. In fact, this is the region where the soul stays, when it has no body. Here the soul stays in the form of a star-like point of light, untouched by matter (five elements including the body). In this world, there exists neither thought, word nor action; just complete stillness, sweet silence and peace. When I first take a physical body, it is from here that I the soul come down into the material world i.e. the earth, which is the field of action.

With the practice of meditation, my third eye (eye of the mind) opens; and I see and experience my original home as an infinite (very large, unmeasurable) world of very subtle (light) golden-red light, situated beyond the physical world of five elements, beyond the sun, moon and stars.


 

Meditation – Experiencing My Original Home (Part 2)

Along with reading over the following words slowly and silently, make a sincere effort to create images of them in the eye of your mind:

I focus myself on the self, the soul, a golden point of light……..
I stay between the eyebrows in the middle of the forehead……..
I radiate golden rays of peace, purity and love in all directions……..
In this awareness of I the soul, with the power of my mind I can travel beyond the limits of my physical organs……..
I visualize myself gradually going out from this physical body……..
I, the sparkling star like energy, fly into the night sky……..
I see myself floating above thousands of buildings and lights……..
Slowly I rise higher and higher to enter space……..
I am surrounded by millions of stars and planets……..
Slowly I see myself flying beyond the world of five elements……..
I, the golden star, enter another world, a soft golden-red light world……..
A world of sweet silence and peace……..
full of peaceful light stretching very very far away……..
I feel pure warmth here, surrounded by light……..
I the point of light shine in this sixth element……..
I am free of all tensions, extremely light………
This is where I belong,
This is my home……..
I recognize this place……..
I had forgotten it, but now I have rediscovered it……..
Spend a few minutes in this positive experience and then gradually come downwards to take your seat back in the physical body.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

brahmakumaris-kmsraj51

 

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Book-Red-kmsraj51

 

 

 

100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

 

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

 

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

 

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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“सफल लोग अपने मस्तिष्क को इस तरह का बना लेते हैं कि उन्हें हर चीज सकारात्मक व खूबसूरत लगती है।”
-KMSRAJ51

“हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन का कुछ सेकंड, प्रतिघंटा और प्रतिदिन कैसे बिताते हैं”
-KMSRAJ51

-A Message To All-

मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से ……आने वाली नयी पीढ़ी को ,
वो भी करेंगे कुछ ऐसा एक दिन…. जिसे देखेगा ज़माना ….पकड़ती हुई नयी सीढ़ी को ॥

कुछ भी आप के लिए संभव है ॥

जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥

~kmsraj51

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“तू न हो निराश कभी मन से” book

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मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है?

kmsraj51 की कलम से…..

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मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है?

मनुष्य जीवन का लक्ष्य  क्या है  ?मनुष्य का वर्तमान जीवन बड़ा अनमोल है क्योंकि अब संगमयुग में ही वह सर्वोत्तम पुरुषार्थ करके जन्म-जन्मान्तर के लिए सर्वोत्तम प्रारब्ध बना सकता है और अतुल हीरो-तुल्य कमाई कर सकता है I वह इसी जन्म में सृष्टि का मालिक अथवा जगतजीत बनने का पुरुषार्थ कर सकता है I परन्तु आज मनुष्य को जीवन का लक्ष्य मालूम न होने के कारण वह सर्वोत्तम पुरुषार्थ करने की बजाय इसे विषय-विकारो में गँवा रहा है I अथवा अल्पकाल की प्राप्ति में लगा रहा है I आज वह लौकिक शिक्षा द्वारा वकील, डाक्टर,इंजिनीयर बनने का पुरुषार्थ कर रहा है और कोई तो राजनीति में भाग लेकर देश का नेता, मंत्री अथवा प्रधानमंत्री बनने के प्रयत्न में लगा हुआ है अन्य कोई इन सभी का सन्यास करके, “सन्यासी” बनकर रहना चाहता है I परन्तु सभी जानते है की म्रत्यु-लोक  में तो राजा-रानी, नेता वकील, इंजीनियर, डाक्टर, सन्यासी इत्यादि कोई भी पूर्ण सुखी नहीं है I सभी को तन का रोग, मन की अशांति, धन की कमी, जानता की चिंता या प्रकृति के द्वारा कोई पीड़ा, कुछ न कुछ तो दुःख लगा ही हुआ है I अत: इनकी प्राप्ति से मनुष्य जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि मनुष्य तो सम्पूर्ण – पवित्रता, सदा सुख और स्थाई शांति चाहता है Iचित्र में अंकित किया गया है कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य जीवन-मुक्ति की प्राप्ति अठेया वैकुण्ठ में सम्पूर्ण सुख-शांति-संपन्न श्री नारायण या श्री लक्ष्मी पद की प्राप्ति ही है I क्योंकि वैकुण्ठ के देवता तो अमर मने गए है, उनकी अकाल म्रत्यु नही होती; उनकी काया सदा निरोगी रहती है I और उनके खजाने में किसी भी प्रकार की कमी नहीं होती इसीलिए तो मनुष्य स्वर्ग अथवा वैकुण्ठ को याद करते है और जब उनका कोई प्रिय सम्बन्धी शरीर छोड़ता है तो वह कहते है कि -” वह स्वर्ग सिधार गया है ” Iइस पद की प्राप्ति स्वयं परमात्मा ही ईश्वरीय विद्या द्वारा कराते हैइस लक्ष्य की प्राप्ति कोई मनुष्य अर्थात कोई साधू-सन्यासी, गुरु या जगतगुरु नहीं करा सकता बल्कि यह दो ताजो वाला देव-पद अथवा राजा-रानी पद तो ज्ञान के सागर परमपिता परमात्मा शिव ही से प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ईश्वरीय ज्ञान तथा सहज राजयोग के अभ्यास से प्राप्त होता है Iअत: जबकि परमपिता परमात्मा शिव ने इस सर्वोत्तम ईश्वरीय विद्या की शिक्षा देने के लिए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व-विद्यालय की स्थापना की है I तो सभी नर-नारियो को चाहिए की अपने घर-गृहस्थ में रहते हुए, अपना कार्य धंधा करते हुए, प्रतिदिन एक-दो- घंटे निकलकर अपने भावी जन्म-जन्मान्तर के कल्याण के लिए इस सर्वोत्तम तथा सहज शिक्षा को प्राप्त करे I

इस विद्या की प्राप्ति के लिए कुछ भी खर्च करने की आवश्यकता नही है, इसीलिए इसे तो निर्धन व्यक्ति भी प्राप्त कर अपना सौभाग्य  बना सकते है I इस विद्या को तो कन्याओ, मतों, वृद्ध-पुरुषो, छोटे बच्चो और अन्य सभी को प्राप्त करने का अधिकार है क्योंकि आत्मा की दृष्टी से तो सभी परमपिता परमात्मा की संतान है I
अभी नहीं तो कभी नहींवर्तमान जन्म सभी का अंतिम जन्म है I इसलिय अब यह पुरुषार्थ न किया तो फिर यह कभी न हो सकेगा क्योंकि स्वयं ज्ञान सागर परमात्मा द्वारा दिया हुआ यह मूल गीता – ज्ञान कल्प में एक ही बार इस कल्याणकारी संगम युग में ही प्राप्त हो सकता है I

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अपना एक उद्देश्य निश्चित करें!!

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प्रिय पाठकों,

एक लड़के ने एक बहुत धनी आदमी को देखकर धनवान बनने का निश्चय किया। कई दिन वह कमाई में लगा रहा और कुछ पैसे भी कमा लिया। इस बीच उसकी भेंट एक विद्वान से हुई। अब उसने विद्वान बनने का निश्चय किया और दूसरे ही दिन से कमाई-धमाई छोड़कर पढ़ने में लग गया।

अभी अक्षर अभ्यास ही सीख पाया था कि उसकी भेंट एक संगीतज्ञ से हुई। उसे संगीत में अधिक आकर्षण दिखाई दिया, अतः उस दिन से पढ़ाई बंद कर दी और संगीत सीखने लगा। काफी उम्र बीत गई, न वह धनी हो सका न विद्वान। न संगीत सीख पाया न नेता बन सका। तब उसे बड़ा दुःख हुआ। 

एक दिन उसकी एक महात्मा से भेंट हुई। उसने अपने दुःख का कारण बताया। महात्मा मुसकरा कर बोले- बेटा दुनियाँ बड़ी चिकनी है। जहाँ जाओगे कोई न कोई आकर्षण दिखाई देगा। एक निश्चय कर लो और फिर जीते- जी उसी पर अमल करते रहो तो तुम्हारी उन्नति अवश्य हो जाएगी। बार-बार रुचि बदलते रहने से कोई भी उन्नति न कर पाओगे।’’ युवक समझ गया और अपना एक उद्देश्य निश्चित कर उसी का अभ्यास करने लगा।

aim-kmsraj51

:=> Post inspired by-Poojya Acharya Bal Krishan Ji Maharaj

Bal Krishna Ji-2 Bal Krishna Ji

“पूज्य आचार्य बाल कृष्ण जी महाराज”

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किसी के किये गए उपकार को भूल उसे ही नीचा दिखाने वाले लोगों का हश्र !!

 

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Singh-kmsraj51

 

किसी के किये गए उपकार को भूल उसे ही नीचा दिखाने वाले लोगों का हश्र !!

बहुत समय पहले की बात है हिमालय के जंगलों में एक बहुत ताकतवर शेर रहता था | एक दिन उसने बारासिंघे का शिकार किया और खाने के बाद अपनी गुफा को लौटने लगा| अभी उसने चलना शुरू ही किया था कि एक सियार उसके सामने दंडवत करता हुआ उसके गुणगान करने लगा |

उसे देख शेर ने पूछा , ” अरे ! तुम ये क्या कर रहे हो ?”

” हे जंगल के राजा, मैं आपका सेवक बन कर अपना जीवन धन्य करना चाहता हूँ, कृपया मुझे अपनी शरण में ले लीजिये और अपनी सेवा करने का अवसर प्रदान कीजिये |” , सियार बोला|

शेर जानता था कि सियार का असल मकसद उसके द्वारा छोड़ा गया शिकार खाना है पर उसने सोचा कि चलो इसके साथ रहने से मेरे क्या जाता है, नहीं कुछ तो छोटे-मोटे काम ही कर दिया करेगा| और उसने सियार को अपने साथ रहने की अनुमति दे दी|

उस दिन के बाद से जब भी शेर शिकार करता , सियार भी भर पेट भोजन करता| समय बीतता गया और रोज भर पेट भोजन करने से सियार की ताकत भी बढ़ गयी , इसी घमंड में अब वह जंगल के बाकी जानवरों पर रौब भी झाड़ने लगा| और एक दिन तो उसने हद ही कर दी |

उसने शेर से कहा, ” आज तुम आराम करो , शिकार मैं करूँगा और तुम मेरा छोड़ा हुआ मांस खाओगे|”

शेर यह सुन बहुत क्रोधित हुआ, पर उसने अपने क्रोध पर काबू करते हुए सियार को सबक सिखाना चाहा|

शेर बोला ,” यह तो बड़ी अच्छी बात है, आज मुझे भैंसा खाने का मन है , तुम उसी का शिकार करो !”

सियार तुरंत भैंसों के झुण्ड की तरफ निकल पड़ा , और दौड़ते हुए एक बड़े से भैंसे पर झपटा, भैंसा सतर्क था उसने तुरंत अपना सींघ घुमाया और सियार को दूर झटक दिया| सियार की कमर टूट गयी और वह किसी तरह घिसटते हुए शेर के पास वापस पहुंचा |

” क्या हुआ ; भैंसा कहाँ है ? “, शेर बोला |

” हुजूर , मुझे क्षमा कीजिये ,मैं बहक गया था और खुद को आपके बराबर समझने लगा था …”, सियार गिडगिडाते हुए बोला|

“धूर्त , तेरे जैसे एहसानफरामोश का यही हश्र होता है, मैंने तेरे ऊपर दया कर के तुझे अपने साथ रखा और तू मेरे ऊपर ही धौंस जमाने लगा, ” और ऐसा कहते हुए शेर ने अपने एक ही प्रहार से सियार को ढेर कर दिया|

किसी के किये गए उपकार को भूल उसे ही नीचा दिखाने वाले लोगों का वही हश्र होता है जो इस कहानी में सियार का हुआ| हमें हमेशा अपनी वर्तमान योग्यताओं का सही आंकलन करना चाहिए और घमंड में आकर किसी तरह का मूर्खतापूर्ण कार्य नहीं करना चाहिए।

 

Post Inspired by:: Poojya Acharya Bal Krishan Ji Maharaj

Bal Krishna Ji-2 Bal Krishna Ji

 

“I am grateful to  Poojya Acharya Bal Krishan Ji Maharaj”

 

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माँ : ईश्वर का भेजा फ़रिश्ता

 

kmsraj51 की कलम से…..

maa

 

 

एक समय की बात है , एक बच्चे का जन्म होने वाला था. जन्म से कुछ क्षण पहले उसने भगवान् से पूछा : ” मैं इतना छोटा हूँ, खुद से कुछ कर भी नहीं पाता , भला धरती पर मैं कैसे रहूँगा , कृपया मुझे अपने पास ही रहने दीजिये , मैं कहीं नहीं जाना चाहता.”

भगवान् बोले, ” मेरे पास बहुत से फ़रिश्ते हैं , उन्ही में से एक मैंने तुम्हारे लिए चुन लिया है, वो तुम्हारा ख़याल रखेगा. “

“पर आप मुझे बताइए , यहाँ स्वर्ग में मैं कुछ नहीं करता बस गाता और मुस्कुराता हूँ , मेरे लिए खुश रहने के लिए इतना ही बहुत है.”

” तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हारे लिए गायेगा और हर रोज़ तुम्हारे लिए मुस्कुराएगा भी . और तुम उसका प्रेम महसूस करोगे और खुश रहोगे.”

” और जब वहां लोग मुझसे बात करेंगे तो मैं समझूंगा कैसे , मुझे तो उनकी भाषा नहीं आती ?”

” तुम्हारा फ़रिश्ता तुमसे सबसे मधुर और प्यारे शब्दों में बात करेगा, ऐसे शब्द जो तुमने यहाँ भी नहीं सुने होंगे, और बड़े धैर्य और सावधानी के साथ तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे बोलना भी सीखाएगा .”

” और जब मुझे आपसे बात करनी हो तो मैं क्या करूँगा?”

” तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करना सीखाएगा, और इस तरह तुम मुझसे बात कर सकोगे.”

“मैंने सुना है कि धरती पर बुरे लोग भी होते हैं . उनसे मुझे कौन बचाएगा ?”

” तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे बचाएगा , भले ही उसकी अपनी जान पर खतरा क्यों ना आ जाये.”

“लेकिन मैं हमेशा दुखी रहूँगा क्योंकि मैं आपको नहीं देख पाऊंगा.”

” तुम इसकी चिंता मत करो ; तुम्हारा फ़रिश्ता हमेशा तुमसे मेरे बारे में बात करेगा और तुम वापस मेरे पास कैसे आ सकते हो बतायेगा.”

उस वक़्त स्वर्ग में असीम शांति थी , पर पृथ्वी से किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी….बच्चा समझ गया कि अब उसे जाना है , और उसने रोते-रोते भगवान् से पूछा ,”

हे ईश्वर, अब तो मैं जाने वाला हूँ , कृपया मुझे उस फ़रिश्ते का नाम बता दीजिये ?’

भगवान् बोले, ” फ़रिश्ते के नाम का कोई महत्त्व नहीं है , बस इतना जानो कि तुम उसे “माँ” कह कर पुकारोगे .”

—— Dedicate this story to your beloved mother on Mother’s Day ————–

Note: The inspirational story shared here is not my original creation, I have read it before  and I am just providing a Hindi version of the same.

Post inspired by :: http://www.achhikhabar.com/

I am grateful to Mr. Gopal Mishra & AKC. 

Note::-

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Success Life_kmsraj51

 by- “तू न हो निराश कभी मन से” किताब से

100 शब्द – एक सफल जीवन के लिए-(100 Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

 

 

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‘शून्य’ – (Shunya) सस्पेंस थ्रिलर उपन्यास – हिन्दी में !!

kmsraj51 की कलम से …..

‘शून्य’
Real Art

प्रिय मित्रों,,

आज मैं आप सब के लिए हिंदी उपन्यास ‘शून्य’ – (Shunya) सस्पेंस थ्रिलर उपन्यास …..
लेकर आया हूँ,,,,,

“‘शून्य’ – (Shunya) Suspense Thriller Complete Novel in Hindi”

भाग-1 => हैप्पी गो अनलकी (शून्य-उपन्यास)-

हिमालय की वह उंचे पर्वतोंकी श्रुंखला और पर्वतोंपर लहराते हूए, आसमानमें बादलोंसे बातें करते हूए उंचे पेढ. आगे बर्फ से ढंकी हूई पर्वतोंकी ढलान चमक रही थी. उस चमकती ढलानसे लगकर कहीं दूरसे किसी सांप की तरह बल खाती हूई एक नदी गुजर रही थी. शुभ्र और अमृत की तरह निर्मल उस नदीका पाणी बहते हूए आसमंतमें जैसे एक मधूर धुन बिखेरता हूवा जा रहा था.

उंचे उंचे पेढ की सरसराहट , पंछींयोंकी चहचहाट, बहते नदी की मधूर धुन. इन कुदरती बातोंसे कौनसा युग चल रहा होगा यह बताना लगभग नामुमकीन. हजारो, लाखो सालोंसे चल रहे इन कुदरती करिश्मों में अगर मानवी उत्थान का प्रतीक समझे जाने वाली बातोंकी उपस्थीती ना हो तो पुराना युग क्या? और आधुनिक युग क्या? … दोनो एक समान. ऐसी इस जगह पर्वत की गोदमें नदीके किनारे एक पुरानी गुंफा थी. उस गुंफा के आस पास उंची हरी हरी घास हवा के साथ लहरा रही थी. गुंफामे एक ऋषी ध्यानस्थ बैठा हूवा था. सरपर बढी हूई जटायें, दाढी मुंछ बढ बढकर थकी हूई. न जाने कितने सालसे तप कर रहे ऋषी के चेहरेपर एक तेज, एक गांभीर्य झलक रहा था. आसपासके वातावरण से अनजान , या यूं कहीए वक्त, जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर युगो युगोतक चल रहा होगा. अनादि, अनंत, सनातन कालसे विचर करते हूए उस ऋषीकी सुक्ष्म अहसास ने इस आधुनिक युग में प्रवेश किया …

अमेरिकाके एक शहरमें एक रस्ते के फुटपाथपर शामके समय लोग अपनी आधूनिकता की शानमें अपने ही धुनमें चले जा रहे थे. रस्तेपर आलिशान गाडीयाँ दौड रही थी. लोग अपने आपमे ही इतने व्यस्त और मशगुल थे की उन्हे दुसरों की तरफ ध्यान देने की बिलकुल फुरसत नही थी. सब कैसे अनुशाशीत ढंग से एक स्वयंचलित यंत्र की तरह चल रहा था. चलते हूए सबकी नजर कैसी अपनी नाक की दिशा में सिधी थी. हो सकता है उन्हे इधर उधर देखते हूए चलना भी अपने शिष्टाचार के खिलाफ लगता होगा. ऐसेही लोगोंकी भिडमें चलती हूई एक बाईस तेईस साल की सुंदरी अँजेनी अपने हाथमें शॉपींग बॅग लिये एक दुकान मे जानेके लिये मुडी. चलते हूए एक हाथसे बडी खुबसुरतीसे वह बिच बिचमें अपने चेहरे पर आती लटोंको पिछे की ओर हटा रही थी. उसकी लबालब भरे शॉपिंग बॅगसे लग रहा था की उसकी खरीदारी लगभग पुरी हो गयी होगी, बस कुछ दो-एक चिजें रह गई होगी. अचानक एक पुलिस व्हन सायरन बजाती हूई रास्ते से गुजरने लगी. लोगोंका अनुशाशन जैसे भंग हो गया. अँजेनी दुकानमें जाते हूए रुक गई और मुडकर क्या हूवा यह देखने लगी. कोई चलते चलते रुककर, तो कोई चलते चलते मुडकर क्या हूवा यह देखने लगे. न जाने कितने दिनोंके बाद कुछ लोगोंके भावहिन चेहरे पर डर के भाव उमटने लगे थे. कुछ लोग तो चेहरे पर बिना कुछ भाव लाए उस व्हन की तरफ देखने लगे. शायद चेहरेपर कुछ भाव जताना भी उनको नागवार लगता होगा. पुलिस व्हन आई उसी गतीमें गुजर गई. रस्ता थोडी देर तक जैसे पाणी में पत्थर गिरने से निकलने वाले तरंग की तरह विचलित हूवा और फिर थोडी देरमें पुर्ववत हुवा. जैसे कुछ हूवा ही ना हो. अँजेनी फिरसे मुडकर दुकानमें जाने लगी. उसे क्या मालूम था? की अभी अभी जो व्हॅन रस्ते से गुजर गई उसका उसके जिंदगी से भी कुछ सरोकार होगा.

पुलिस व्हॅन एक साफ सुधरी कोलोनीमें एक अपार्टमेंट के निचे रुक गई. बस्तीमें एक अजीब सन्नाटा छाया हूवा था. पुलिस व्हॅनसे तप्तरताके साथ पुलिस ऑफीसर जॉन और उसकी टीम उतर गई. जो लोग अपार्टमेंटके बाल्कनीमें बैठकर सुस्ता रहे थे वह अचंभेसे निचे पुलिस व्हॅनकी तरफ देखने लगे. उतरते ही जॉन और उसकी टीम अपार्टमेंट की लिफ्ट की तरफ दौड गई. ड्रायव्हरने व्हॅन अंदर ले जाकर पार्किंग लॉटमें पार्क की. जॉन और उसके सहकारीयोंने लिफ्टके पास आकर देखा तो लिफ्ट जगह पर नही थी. जॉनने लिफ्टका बटन दबाया. बहुत देर से राह देखकरभी लिफ्ट निचे नही आ रही थी.
” शिट” चिढे हूए जॉनके मुंह से निकल गया.
अधिरतासे जॉन बार बार लिफ्टका बटन दबाने लगा. थोडी देरमें लिफ्ट निचे आ गई. जॉनने लिफ्टका बटन फिरसे दबाया. लिफ्टका दरवाजा खुल गया. अंदर काला टी शर्ट पहना हूवा एकही आदमी था. उस हालातमें भी उसके टी शर्टपर लिखे अक्षरोंने जॉन का ध्यान आकर्षित किया. उस काले टी शर्टपर सफेद अक्षरोंसे लिखा हुवा था –
‘ झीरो’.
वह आदमी बाहर आतेही जॉन और उसके साथीदार लिफ्टमें घुस गए. लिफ्टमें जातेही जॉनने 10 नं. फ्लोअरका बटन दबाया. लिफ्ट बंद होकर उपरकी तरफ दौडने लगी.

10 नं. फ्लोअरपर लिफ्ट रुक गई. जॉनके साथ सब लोग बाहर आ गए. उन्होने देखा की उनके सामने ही एक फ्लॅटका दरवाजा पुरा खुला हूवा था. सब लोग उस खुले फ्लॅटकी तरफ दौड पडे. वे सब लोग एक दुसरे को कव्हर करते हूए धीरे धीरे फ्लॅटके अंदर जाने लगे. हॉलमें कोई नही था. जॉन और उसके और दो साथीदार बेडरुमकी तरफ जाने लगे. बचे हूए कुछ किचनमें, स्टडी रुममें और बाकी कमरे देखने लगे. किचन और स्टडी रुम खालीही थी. जॉनको बेडरूममें जाते वक्त ही अंदर सब सामान बिखरा हूवा दीख गया. उसने अपने साथीदारको इशारा किया. जॉन और उसके दो साथीदार सतर्तकासे धीरे धीरे बेडरुममें जाने लगे. वे एक दुसरेको कव्हर करते हूए अंदर जातेही उनको सामने बेडरुममे एक भयानक दृष्य दिखाई दिया. एक खुन से लथपथ आदमी बेडपर लिटा हूवा था. उसके शरीर में कुछ हरकत नही दिख रही थी. या तो वह मर गया था या फिर बेहोश हो गया होगा. जॉनने सामने जाकर उसकी नब्ज टटोली. वह तो कबका मर चुका था.
” इधर है … इधर”
जॉनके साथ आया एक साथीदार चिल्लाया.
अब जॉनके पिछे उसके बाकी साथीदार भी अंदर आगए. जॉनने आजुबाजू अपनी मुआयना करती हूई नजर दौडाई. अचानक उसका ध्यान जिस दिवार को बेड सटकर लगा हूवा था उस दिवार ने आकर्षीत किया. दिवार पर खुन की छींटे उड गई थी या खुन से कुछ लिखा हूवा था. जॉनने गौर करकर देखा तो वह खुनसे कुछ लिखा हूवाही प्रतित हो रहा था क्योकी दिवारपर खुनसे एक गोल निकाला हूवा था.
गोल… गोल का क्या मतलब होगा…
जॉन सोचने लगा.
और वह खुन उस मरे हूए आदमी का है या और किसीका?…
वह गोल खुनी ने निकाला होगा या फिर जो मर गया उसने मरनेसे पहले वह निकाला होगा?
” यू पिपल कॅरी ऑन ”
जॉनने अपने टीमको उनकी इन्वेस्टीगेशन प्रोसीजर शुरु करने को कहा.
उसके साथीदार अपने अपने काममें व्यस्त हो गए. जॉनने अपनी पैनी नजर एकबार फिरसे बेडरुमकी सब चिजे निहारते हूए दौडाई. बेडरुममें कोनेमें एक टेबल रखा हूवा था. टेबलपर एक तस्वीर थी. तस्वीरके बाजुमें कुछ खत और लिफाफ़े पडे हूए थे. जॉन ने एक लिफाफ़ा उठाया. उसपर लिखा हूवा था-
”प्रति – सानी कार्टर’.
इसका मतलब जो मर गया था उसका नाम सानी कार्टर था और वह सब खत उसे पोस्टसे आये हूए थे. जॉन बाकी लिफाफ़े और खत उठाकर देखने लगा. वे खत छानते हूए जॉन खिडकीके पास गया. उसने खिडकीसे बाहर झांककर देखा. बाहर बडा खुबसुरत दृष्य था – एक गोल नयनरम्य तालाब का. उस तालाब को हरी हरी हरीयालीने घेर रखा था. वह दृष्य देखकर जॉन कुछ पलोंके लिये अपने आसपासके मौहोल को भूल सा गया. तालाब की तरफ देखते देखते तालाब के आकारने उसे अपने आसपासके मौहोलसे फिरसे जोड दिया. क्योंकी तालाब का आकार लगभग गोलही था. जॉन फिरसे सोचने लगा-
” दिवारपर… गोलसा क्या निकाला होगा?”
अचानक जॉनके दिमाग मे एक विचार चौंध गया..
” गोल यानी ‘झीरो’ तो नही होगा… हां गोल यानी जरुर ‘झीरो’ ही होगा”
जॉन ने आवाज दिया ” सॅम और तू डॅन “‘
” यस सर” सॅम और डॅन तत्परतासे आगे आते हूए बोले.
” हम जब निचे लिफ्टमें चढे… तब हमें एक काले टी शर्टवाला आदमी दिखाई दिया…और उसके टी शर्टपर ”झीरो” ऐसा लिखा हूवा था… तुमने देखाना?” जॉनने पुछा.
” हां सर…मुझे उसका चेहरा भी याद है” सॅमने कहा.
” हां सर…मुझेभी याद है” डॅन ने कहा.
” गुड … अब तेजीसे निचे जावो और देखो वह निचे मिलता है क्या? … जल्दी जावो … वह अबभी जादा दुरतक नही गया होगा.”
जॉनके साथीदार सॅम और डॅन लगभग दौडते हूए ही निकल गए.

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भाग-2 => आसमान गिर पड़ा (शून्य-उपन्यास)-

जब अँजेनीने अपनी कार अपार्टमेंटमें पार्किंगके लिए घुमाई उसे वहाँ वह शापींग करते वक्त रस्ते में दिखी पुलिस व्हॅन दिखाई दी. उसका दिल जोर जोर से धडकने लगा. क्या हूवा होगा? वह कार से उतरकर अपना शॉपींग किया हूवा सामान लेकर जल्दी जल्दी लिफ्ट की तरफ चल पडी. जब वह वहाँ पहूँची, लिफ्टका दरवाजा खुला और अंदरसे दो पुलिसके लोग बाहर आ गए. पुलीसको देखकर उसका दिल औरही बैठसा गया. उसने झटसे लिफ्टमें जाकर लिफ्टका बटन दबाया जिसपर 10 यह नंबर लिखा हूवा था.
लिफ्टसे बाहर आतेही जब अँजेनीने अपने खुले फ्लॅटके सामने लोगोंकी भीड देखी उसकेतो हाथ पांव कापने लगे. उसके हाथसे शॉपींगका सारा सामान निचे गीर पडा. वैसेही वह उस भीडकी तरफ दौड पडी.
” क्या हूवा?” उसने अंदर जाते हूवे वहाँ जमा हूई भीडको पुंछा. सब लोग गंभीर मुद्रामें सिर्फ उसकी तरफ देखने लगे. किसीकी उसको कुछ बताने की हिम्मत नही बनी. वह फ्लॅटके अंदर चली गई. सब पुलीसवालोंका बेडरुमकी तरफ रुख देखकर वह बेडरुमकी तरफ चली गई.
जाते जाते फीरसे उसने एक पुलीसवालेको पुछा, ” क्या हूवा?”
वह उससे आँखे ना मिलाते हूवे गंभीरतासे सिर्फ बेडरुमकी तरफ देखने लगा.
वह जल्दीसे बेडरुमके अंदर चली गई. सामनेका दृष्य देखकर जैसे अब उसकी बचीकुची जान निकल गई थी. उसके सामने उसके पती का खुनसे लथपथ शव पडा हूवा था. उसे अब सारा कमरा घुमता हूवा नजर आने लगा और वह अपना होशोहवास खोकर निचे गीर पडी. गिरते वक्त उसके मुंहसे निकल गया-
” सानी…”
उसकी वह हालत देखकर बगलमें खडा जॉन झटसे उसे सहारा देने के लिए सामने आया. उसने उसे हिलाकर उसे जगाने की कोशीश की. वह बेहोश हो गई थी. लेकिन जब जॉनने गौर किया की उसकी सांसभी शायद रुक चूकी थी, उसने बगलमें खडे अलेक्स को आदेश दिया ” कॉल द डॉक्टर इमीडीएटली … आय थींक शी हॅज गॉट अ ट्रिमेंडस शॉक”.
अलेक्स तत्परतासे बगलमें रखे फोनके पास जाकर फोन डायल करने लगा.
डॉक्टर के आने तक कुछ करना जरुरी था लेकिन जॉन को क्या करे कुछ सुझाई नही दे रहा था.
“सर शी नीड्स आर्टिफिशीअल ब्रीदिंग” किसीने सुझाव दिया.
फिर जॉन अपने मुंहसे उसके मुंहमे सांस भरने लगा और बिच बिचमे उसकी रुकी हूई धडकन शुरु होनेके लिए उसके सिनेपर जोर जोरसे दबाव देने लगा. दबाव देते हूए 101,102,103 गिनकर उसने फिरसे उसके मुंहमें हवा भरी और फिरसे 102,102,103 गिनकर उसके सिनेपर दबाव देने लगा. ऐसा दो-तीन बार करनेके बाद जॉनने अँजेनीकी सांस टटोली. लेकिन एक बार गई हूई उसकी सांस मानो लौटनेको तैयार नही थी. उसके सारे साथीदार उसके इर्द-गिर्द जमा हुए थे. उनको भी क्या करे कुछ समझ नही आ रहा था. डॉक्टरके आनेतक एक आखरी प्रयास सोचकर जॉनने फिरसे एकबार अँजेनीके मुंहमे हवा भरी और 101,102,103 गिनकर उसके सिनेपर दबाव देने लगा.
हॉस्पीटलमें अँजेनीको इंटेसीव केअर युनिट में रखा गया था. बाहर दरवाजे के पास जॉन और उसका एक साथीदार खडे थे. इतनेंमे आय.सी.यू का दरवाजा खुला और डॉक्टर बाहर आगए. जॉन वह क्या कहते है यह सुननेके लिए बेताब उनके सामने जाकर खडा होगया. डॉक्टरने अपने चेहरेसे हरा कपडा हटाते हूए कहा-
” शी इज आऊट ऑफ डेंजर …. नथींग टू वरी”
जॉनके जानमें जान आगई. इतनेमें जॉनके मोबाईलकी घंटी बजी. जॉनने मोबाईलके तरफ देखते हूए बटन दबाते हूए कहा-
” यस सॅम”
उधरसे आवाज आई ” सर , हमने उसे सब तरफ ढुंढा लेकिन वह हमें नही मिला.”
”नही मिला.?.. उसके जानेमें और हमारे ढुंढनेमें ऐसा कितना फासला था? ….वह वही कही आसपास होना चाहिए था. ” जॉनने कहा.
”सर… शायद उसने बादमें अपने कपडे बदले होगे.. क्योंकी हमने आसपासके सभी पुलीस स्टेशनमें उसका हूलिया और पहनावेके बारेंमे खबर कर दी थी…” उधरसे आवाज आई.
”अच्छा, अब एक काम करो…उसका स्केच बनानेके काममें जुड जावो… हमें उसे किसीभी हालमें पकडनाही होगा…” जॉनने अपना दृढ निश्चय जताते हूए आदेश दिया.
” यस सर …” उधर से आवाज आई.
जॉनने मोबाईल बंद किया और डॉक्टरसे कहा,” अच्छा अब हम निकलते है… टेक केअर ऑफ हर … और कोई मुसीबत या परेशानी हो तो हमें फोन करना ना भूलीएगा…”
”ओ.के…” डॉक्टरने कहां.
जानेसे पहले जॉनने अपने साथीदारसे कहा,” उसके रिश्तेदारके बारेमे मालूम करो…और उन्हे इन्फॉर्म करो…”
” यस सर” जॉनके साथीदारने कहा.
….क्रमश:…

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भाग-3 => वर्ल्ड अंडर अंडरवर्ल्ड (शून्य-उपन्यास)-

एक कोलनीमें एक छोटासा आकर्षक बंगला. बंगलेके बाहर एक कार आकर खडी हूई. कारसे उतरकर एक आदमी झटसे घरके कंपाऊंडमे घूस गया. कोई पच्चीसके आसपास उसकी उम्र होगी. उसने काला गॉगल पहन रखा था. अंदर जाते हूए आसपासके गार्डनपर अपनी नजरे दौडाते हूए वह दरवाजेके पास पहूंच गया. अपनी कारकी तरफ देखते हूए उसने दरवाजेकी बेल बजाई. दरवाजा खुलनेकी राह देखते हूए वह कोलनीके दुसरे घरोंकी तरफ देखने लगा. दरवाजा खुलने को बहुत समय लग रहा था इसलिए बंद दरवाजे के सामने वह चहलकदमी करने लगा. अंदरसे आहट सुनते ही वह दरवाजेके सामने अंदर जानेके लिए खडा होगया. दरवाजा खुला. सामने दरवाजेमें उसकाही हमउम्र एक आदमी खडा था. अंदरका आदमी दरवाजेसे हट गया और बाहरका आदमी बिना कुछ बोले अंदर चला गया. ना कुछ बातचीत ना भावोंका आदान प्रदान.

बाहरका आदमी अंदर जानेके बाद दरवाजा अंदरसे बंद हूवा. दोनोंकी रहन सहन, कद काठी, रंग इससे तो वे दोनो अमेरीकी मुलके नही लग रहे थे. दोनोही बिना कुछ बोले घर के तहखानेकी तरफ जाने लगे. घरके ढाचेसे ऐसा कतई प्रतित नही होता था की इस घरको कोई तहखाना होगा.

जो बाहरसे आया था उसने पुछा, ” बॉसका कोई मेसेज आया?”

” नही अभीतक तो नही … कब क्या करना है , बॉस सब महूरत देखकर करता है” दुसरेने कहा.

पहला मन ही मन मुस्कुराया और बोला,” कौन किस पागलपनमें उलझेगा कुछ बोल नही सकते ”

दूसरेने गंभिरतासे कहा ” कमांड2 तुझे अगर हमारे साथ काम करना है तो यह सब समझकर अपने आपमें ढालना जरुरी है… यहां सब बातें तोलमोलकर प्रिकॅलक्यूलेटेड ढंगसे की जाती है.””

कमांड2 कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करे ये ना समझते हूए सिर्फ कमांड1 की तरफ देखने लगा.

”कोईभी बात करनेसे पहले बॉसको उसके नतिजे की जानकारी पहलेसेही होती है.” कमांड1ने कहा.

अब वे चलते चलते अंधेरे तहखानेमें आ पहूचें. वहां तहखानेमें बिचोबिच टेबलपर एक कॉम्प्यूटर रखा हूवा था. दोनो काम्प्यूटरके सामने जाकर खडे हूए. कमांड1ने कॉम्प्यूटरके सामने कुर्सीपर बैठते हूए कॉम्प्यूटर शुरू किया. कमांड2 उसकेही बगलमें एक स्टूलपर बैठ गया. कॉम्प्यूटरपर लिनक्स ऑपरेटींग सिस्टीम शुरू होने लगी.

” तूझे पता है हम लिनक्स क्यों युज करते है?” कमांड1ने पुछा.

अपना अज्ञान जताते हूए कमांड2 ने सिर्फ अपना सर हिलाया.

‘”कॉम्प्यूटरके लगभग सभी सॉफ्टवेअर जिसका सोर्स कोड युजर (उपभोक्ता) को नही दिया जाता कहां बनायें जातें है?” कमांड1ने जवाब देने के बजाय दुसरा सवाल पुछा.

” कंपनीमें…” कमांड2ने भोले भावसे कहा.

” मेरा मतलब कौनसे देशमें?”

” अमेरिकामें” कमांड2ने जवाब दिया.

” तुझे पता होगाही की जिस सॉफ्टवेअरका सोर्स कोड कस्टमरको दिया जाता है उसे ‘ओपन सोर्स’ सॉफ्टवेअर कहते है… मतलब उस सॉफ्टवेअरमें क्या होता है यह कस्टमर जान सकता है… … और जिस सॉफ्टवेअरका कोड कस्टमरको नही दिया जाता उस सॉफ्टवेअरमें ऐसा बहुत कुछ हो सकता है… जो की होना नही चाहिए.” कमांड1 कह रहा था.

‘”मतलब?'” कमांड2 ने बिचमेंही टोका.

‘”मतलब तुझे पताही होगा की मायक्रोसॉफ्ट कंपनीने एक बार ऐलान किया था की वे उनके प्रतिस्पर्धीयोंको काबूमें रखनेके लिए उनके सॉफ्टवेअर विंन्डोज ऑपरेटींग सीस्टीममें कुछ ‘टॅग्ज’ इस्तेमाल करने वाले है…” कमांड1 कह रहा था.

” हां … तो ?” कमांड2 कमांड1 आगे क्या कहता है यह सुनने लगा.

”और उन ‘टॅग्ज’ की वजहसे कंपनीको जो चाहिए वही प्रोग्रॅम ठीक ढंगसे काम करेंगे… और दुसरे यातो बहुत धीमी गतीसे चलेंगे, बराबर नही चलेंगे या चलेंगेही नही.” कमांड1ने कहा.

” लेकिन उसका अपने लिनक्स इस्तेमाल करनेसे क्या वास्ता?” कमांड2ने पुछा.

” वास्ता है… बल्की बहुत नजदीकी वास्ता है… सुनो … अगर वे अपने प्रतिस्पर्धीयोंको काबुमें करनेके लिए ऐसे ‘टॅग्ज’ इस्तेमाल कर सकते है की जिसकी वजहसे उनके प्रतिस्पर्धीयोंका पुरा खातमा हो जाए … तो ऐसाभी मुमकीन है की वे उनके सॉफ्टवेअर और हार्डवेअरमें ऐसे कुछ ‘टॅग्ज’ इस्तेमाल करेंगे की जिसकी वजह से पुरी दुनिया की महत्वपुर्ण जानकारी इंटरनेटके द्वारा उनके पास पहूंच जाए … उसमें हमारे जैसे लोगोंकी गतिविधीयाँ भी आगई… खासकर 9-11 के बाद यह सब उनके लिए बहुत महत्वपुर्ण होगया है…” कमांड1 ने कमांड2की तरफ देखते हूए उसकी प्रतिक्रिया लेते हूए कहा.

” हां तुम सही कहते हो… ऐसा हो सकता है” कमांड2 ने अपनी राय बताते हूए कहा.

” इसलिए मैने क्या किया पता है? … लिनक्स का सोर्स कोड लेकर उसे कंपाईल किया… और फिर उसे अपने कॉम्प्यूटरमें इन्स्टॉल किया… अपनेसे जो हो सकता है वह सभी तरह की एतीहात बरतना जरुरी है…” कमांड1 बोल रहा था.

उसके बोलनेमे गर्व और खुदका बडप्पन झलक रहा था.

” अरे यह अमेरिका क्या चीज है तुझे पताही नही … सारी दुनियापर राज करनेका उनका सपना है… और उसके लिए वह किसीभी हदतक गिर सकते है…” कमांड1 आगे बोल रहा था.

कमांड2ने कमांड1 की तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

” चांदपर सबसे पहले आदमी कब पहूँचा? … तुमने स्कुलमें पढाही होगा ना?..” कमांड1 ने सवाल किया.

” अमेरिकाने भेजे यान द्वारा 1969 को नील आर्मस्ट्राँग सबसे पहले चांदपर पहूंचा.” कमांड2 ने झटसे स्कुली बच्चे की तरह जवाब दिया.

”सभी स्कुली बच्चोंके दिमाग मे यही कुटकुटकर भरा हूवा है … और अभीभी भरा जा रहा है… लेकिन सच क्या है इसके बारेमे लोगोंने कभी सोचा है?… जो व्हीडीओ अमेरिकाने टी व्ही पर सारी दुनिया को दिखाया उसमें अमेरिकाका झंडा मस्त लहराता हूवा दिख रहा था… चांदपर अगर हवाही नही है … तो वह झंडा कैसा लहरेगा … जो लोग चांद पर उतरे उनके साये… यान की बदली हूई जगह… ऐसे न जाने कितने सबुत है जो दर्शाते है की अमेरीकाका यान चांदपर गयाही नही था…” कमांड1 आवेशमें आकर बोल रहा था.

” क्या बात करता है तू … फिर यह सब क्या झूट है? …” कमांड2 ने आश्चर्यसे पुछा.

” झूठ ही नही … सफेद झूठ… इतनाही नही उस वक्त सॅटेलाईटसे जमीन की ली हूई तस्वीरोंमे जो सेट उन लोगोंने बनाया था उसकी तस्वीर भी मिली है…”

” ठिक है मान लेते है की यह सब झूठ … लेकिन अमेरिका यह सब किसलिए करेगा?”

” हां यह अच्छा सवाल है … की उन्होने वह सब क्यों किया? … इतना सारा झंझट करने की उन्हे क्या जरुरत थी? … जिस वक्त अमेरिकाने उनका यान चांदपर उतरनेका दावा किया तब रशीया अमेरिकाका सबसे बडा प्रतिस्पर्धी था… हम रशीयासे दो कदम आगे है यह दिखानेके लिये उन्होने यह सब किया … और उसमें वे कामयाबभी रहे…” हर एक शब्दके साथ कमांड1का आवेश बढता दिखाई दे रहा था.

” माय गॉड… मतलब इतना बडा धोखा और वह भी सारी दुनियाको…” कमांड2के मुंहसे निकल गया.

” अमेरिका अब अंग्रेज पहले जिस रास्तेसे जा रहे थे उस रस्ते से चल रहा है… दुसरे वर्ल्ड वार के पहले ब्रिटीश लोगोंने सारी दुनियापर राज किया… उस वक्त कहते थे की उनकी जमिनपर सुरज कभी डूबता नही था… अब अमेरिकाभी वही करनेका प्रयास कर रही है…. फर्क सिर्फ इतना है की ब्रिटीश लोगोंने आमनेसामने राज किया और ये अब छुपे रहकर राज करना चाहते है… मतलब ‘प्रॉक्सी रूलींग’. अफगाणिस्थान, इराक, कुवेत, साऊथ कोरिया यहाँ पर वे क्या कर रहे है … प्रॉक्सी रूलींग … और क्या?”

” हां तुम बिलकुल सही कहते हो…” कमांड2ने सहमती दर्शाई.

” और यही अमेरिकाका अधिपत्य, प्रभुत्व खतम करना अपना परम हेतू है ..” कमांड1ने जोशमें कहा.

कमांड2के चेहरेसे ऐसा लग रहा था की वह उसकी बातोंसे बहुत प्रभावित हुवा है. और कमांड1के चेहरेपर कमांड2को ब्रेन वॉश करनेमें उसे जो सफलता मिली थी उसका आनंद झलक रहा था.

इतनेमें शुरु हुए कॉम्प्यूटरका बझर बजा. कमांड1को ईमेल आई थी. कमांड1ने मेलबॉक्स खोला. उसमें बॉसकी मेल थी.

” एक बात मेरे समझमें नही आती की यह बॉस है कौन?” कमांड2ने उत्सुकतापुर्वक पुछा.

” यह किसीकोभी पता नही … सिवाय खुद बॉसके… और इस बातसे हमें कोई सरोकार नही की बॉस कौन है?… क्योंकी हम सब लोगोंको एक सुत्रमें जिस बातने जोडा है वह कोई एक व्यक्ती ना होकर … एक विचारधारा है… वह विचारधाराही सबसे महत्वपुर्ण है… आज बास है कल नही होगा… लेकिन उसकी विचारधारा हमेशा जिंदा रहना चाहिए…” कमांड1 मेल खोलते वक्त बोल रहा था.

मेलमें सिर्फ ‘हाय’ ऐसा लिखा हूवा था और मेलको कोई फाईल अटॅच की हूई थी. कमांड1 ने अटॅचमेंट ओपन की. वह मॅडोनाकी एक ‘बोल्ड’ तस्वीर थी.

” यह क्या भेजा बॉसने?” कमांड2 ने आश्चर्यसे पुछा.

” तुम अभी बच्चे हो… धीरे धीरे सब समझ जावोगे… बस इतनाही जान लो की दिखाने के दात और खाने के दात हमेशा अलग रहते है… ” कमांड1 तस्वीर की तरफ देखकर मुस्कुराते हूए बोला.

कमांड1 ने बडी चपलतासे कॉम्प्यूटरके कीबोर्डके चार पाच बटन दबाए. सामने मॉनिटरपर एक सॉफ्टवेअर खुल गया. कमांड1ने मॅडोनाके उस तस्वीरको डबल क्लीक किया. एक निले रंग का प्रोग्रेस बार धीरे धीरे आगे बढने लगा. कमांड1 ने कमांड2की तरफ रहस्यतापुर्ण ढंग से देखा.

” लेकिन यह क्या कर रहे हो … स…” कमांड2ने कहा.

कमांड1ने झटसे कमांड2के मुंहपर हाथ रखकर उसकी बोलती बंद की.

” गलतीसेभी तुम्हारे मुंहमें मेरा नाम नही आना चाहिए… तुझे पता है… दिवार के भी कान होते है…”

”सॉरी” कमांड2 अपने गलती का अहसास होते हूए बोला.

” यहां गलतियोंको माफ नही किया जाता…” कमांड1ने दृढतापुर्वक कहा.

तबतक प्रोग्रेस बार आगे बढते हूए पुरीतरह निला हो चूका था.

” इसे स्टेग्नोग्राफी कहते है … मतलब तस्वीरोंमे संदेश छुपाना… देखनेवालोंको सिर्फ तस्वीर दिखाई देगी … लेकिन इस तस्वीरमेंभी बहोत सारी महत्वपुर्ण जानकारी छिपाई जा सकती है…” कमांड1 उसे समझा रहा था.

” लेकिन अगर यह तस्वीर यहां पहूचनेसे पहले किसी और के हाथ लगी तो?” कमांड2 अपनी शंका उपस्थीत की.

” यह सब जानकारी सिर्फ इस सॉफ्टवेअरके द्वारा ही बाहर निकाली जा सकती है… और उसे पासवर्ड लगता है…. यह सॉफ्टवेअर बॉसने खुद बनाया हूवा है…. इसलिये यह किसी दुसरे के पास रहने का तो सवाल ही पैदा नही होता” कमांड1ने उसके सवाल का यथोचीत उत्तर दिया था.

” कौनसी जानकारी छिपाई गई है इस तस्वीर में … जरा देखु तो” कमांड2 उत्सुकतावश देखने लगा.

इतनेमें मॉनिटरपर एक मेसेज दिखने लगा. ” अगले काम की तैयारी शुरु करो … उसका वक्त बादमें बताया जाएगा.”

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भाग-4 => वह कहाँ गई? (शून्य-उपन्यास)-

हॉस्पिटल के सामने एक सफेद कार आकर खडी हूई, उसमेंसे जॉन उतर गया. आज वह उसके हमेशाके पुलीस युनीफार्ममें नही था. और उसका मुडभी हमेशा का नही लग रहा था. उसके हाथमें सफेद फुलोंका एक गुलदस्ता था. सिधे लिफ्टके पास जाकर उसने लिफ्ट का बटन दबाया. लिफ्टमें प्रवेश कर उसने फ्लोअर नं. 12 का बटन दबाया. लिफ्ट बंद होकर उपरकी तरफ दौडने लगी. लिफ्टके रफ्तारके साथ उसके दिमाग में चल रहे विचारोंनेभी रफ्तार पकड ली….

दिवारपर खुनसे गोल क्यों निकाला गया होगा?….

फोरेन्सीक जांचमें खुन सानीकाही पाया गया था…..

जरुर जिसने भी वह गोल निकाला वह कुछ कहने का प्रयास कर रहा होगा…

खुन किसने किया इसका अंदाजा शायद अँजेनीको होगा…

लिफ्ट रुक गई और लिफ्टकी बेल बजी. बेलने जॉनके विचारोंके श्रुंखलाको तोडा. सामने इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्लेमें 12 यह नंबर आया था. लिफ्टका दरवाजा खुला और जॉन लिफ्टसे बाहर निकल गया. अपने लंबे- लंबे कदम से चलते हूए जॉन सिधा ‘बी’ वार्डमें घुस गया.

जॉनने एकबार अपने हाथमें पकडे फुलोंके गुलदस्तेकी तरफ देखा और उसने ‘बी2’ रूमका दरवाजा धीरेसे खटखटाया. थोडी देर तक राह देखी, लेकिन अंदर कोईभी आहट नही थी. उसने दरवाजा फिरसे खटखटाया – इस बार जोरसे. लेकिन अंदर से कोई प्रतिक्रिया नही थी. यह देखकर उसने अपनी उलझन भरी नजर इधर उधर दौडाई. उसे अब चिंता होने लगी थी. वह दरवाजा जोर जोरसे ठोकने लगा.

क्या हूवा होगा?…

यही तो थी अँजेनी …

आज उसे डिस्चार्ज तो नही करने वाले थे…

फिर .. वह कहाँ गई?

कुछ अनहोनी तो नही हूई होगी?…

उसका दिल धडकने लगा. उसने फिरसे आजूबाजू देखा. वार्डके एक सिरेको एक काऊंटर था. काऊंटरपर जानकारी मील सकती है… ऐसा सोचकर वह तेजीसे काऊंटरकी तरफ जाने लगा.

“एक्सक्यूज मी” उसने काऊंटरपर नर्सका ध्यान अपनी तरफ आकर्षीत करनेका प्रयास किया.

नर्सके लिए यह रोजका ही होगा, क्योंकी जॉनकी तरफ ध्यान न देते हूए वह अपने काममें व्यस्त रही.

” ‘बी2’ को एक पेशंट थी… अँजेनी कार्टर … कहा गई वह? … उसे डिस्चार्ज तो नही दिया गया? … लेकिन उसका डिस्चार्ज तो आज नही था … फिर वह कहाँ गई? … वहाँ तो कोई नही…” जॉन सवालों पे सवाल पुछे जा रहा था.

” एक मिनट … एक मिनट … कौनसी रूम कहां आपने?'” नर्सने उसे रोकते हुए कहा.

“बी2” जॉनने एक गहरी सास लेकर कहां.

नर्सने एक फाईल निकाली. फाईल खोलकर ‘बी2′ … बी2’ ऐसा बोलते हूए उसने फाईलके इंडेक्सके उपर अपनी लचीली उंगली फेरी. फिर इंडेक्समें लिखा हूवा पेज नंबर निकालने के लिए उसने फाईलके कुछ पन्ने अपने एक खास अंदाजमें पलटे.

“‘बी2’ … मिसेस अँजेनी कार्टर…” नर्स तसल्ली करने के लिए बोली.

” हां …अँजेनी कार्टर” जॉनने कंन्फर्म किया.

जॉन उत्सुकतासे उसकी तरफ देखने लगा. लेकिन वह एकदम शांत थी. जैसे वह जॉनके सब्रका इंतहान ले रही हो. जॉनको उसका गुस्सा भी आ रहा था.

” सॉरी … मिस्टर ..?” नर्सने जॉनका नाम जानने के लिए उपर देखा.

जॉन का दिल और जोर जोरसे धडकने लगा.

“जॉन” जॉनने खुदको संभालते हूए अपना नाम बताया.

” सॉरी … मिस्टर जॉन … सॉरी फॉर इनकन्व्हीनियंस … उसे दुसरी रूममें … बी23 में शीफ्ट किया गया है….” नर्स बोल रही थी.

जॉनके जान मे जान आई थी.

“ऍक्यूअली … बी2 बहुत कंजेस्टेड हो रहा था … इसलिए उनकेही कहने पर….” नर्स अपनी सफाई दे रही थी.

लेकिन जॉनको कहा उसका सुनने की फुरसत थी? नर्स अपना बोलना पुरा करनेके पहलेही जॉन वहांसे तेजीसे निकल गया … बी23 की तरफ.

….. उपन्यास ….. जारी रखा ……….. है ,,,,,

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भाग-5 => दिल-विल… (शून्य-उपन्यास)-

बी23 की तरफ जाते हूए जॉनको खुदका ही आश्चर्य लगने लगा था.

यह कैसी बेचैनी?…

ऐसा तो पहले कभी नही हूवा था…

अबतक न जाने कितनी केसेस उसके हाथके निचेसे गई थी… लेकिन एक स्त्री के बारेमें ऐसी बेचैनी…

और कुछ अनहोनी तो नही हूई होगी? ऐसी चिंता और इतनी चिंता उसे पहले कभी नही हूई थी…

उसने बी23 का दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खुलाही था. दरवाजा धकेलकर वह अंदर जाने लगा. अंदर बेडपर अँजेनी लेटी हूई थी. वह सोचमें डूबी खिडकीसे बाहर जैसे शुन्य भावसे देख रही थी. जॉन की आहट आतेही उसने दरवाजे की तरफ देखा. जॉनको देखतेही वह मुस्कुरा दी. लेकिन उसके चेहरेसे दुख का साया अभीभी हटा नही दिख रहा था. शायद अभीभी वह गहरे सदमेसे उभरी नही थी. वह उसके पास जाकर खडा हूवा. उसने उसे बगलमे रखे स्टूलपर बैठने का इशारा किया. स्टूलपर बैठनेके बाद फुलोंका गुलदस्ता उसके बाजूमे रखते हूवे जॉनने पुछा – ” कैसी हो?”

वह फिरसे उसकी तरफ देखकर मुस्कुराई. ऐसे लग रहा था जैसे मुस्कुरानेके लिए उसे बडा कष्ट हो रहा हो.

” मुसिबतोंका पहाड जिसपर गिर पडता है वही उसकी मार समझ सकता है… आप किस पिडादायक मनस्थीतीसे गुजर रही होगी मै समझ सकता हू…” जॉन बोल रहा था.

अँजेनीके आँखोसे आसु बहने लगे. जॉन बोलते बोलते रुक गया. उसने उसे धिरज देता हूवा अपना हाथ उसके कंधेपर रख दिया. अब तो उसने जो आँसूओंका बांध रोकने की कोशीश की थी वह टूट गया और वह जॉनसे लिपटकर फुट फुटकर रोने लगी. जॉन उसे सहलाते हूए ढाढस बंधाने का प्रयास कर रहा था. उसे कैसे समझाया जाए कुछ समझ नही आ रहा था.

अब वह थोडी नॉर्मल हो गई थी. जॉनने अब जान लिया की अँजेनीको खुनके बारेमें पुछनेका यही सही वक्त है.

” किसने खुन किया होगा? … आपको कोई संदेह? … या अंदाजा? ‘” जॉनने धीरेसे पुछा.

अँजेनीने इन्कारमें अपना सर हिलाया और फिर खिडकीके बाहर देखते हूए फिरसे सोचमें डूब गई.

जॉनने उसकी जेबसे एक फोटो निकाला.

” यह देखो… यहाँ दिवारपर … खुनसे गोल निकाला गया है … यह क्या हो सकता है? …कुछ अंदाजा? … या फिर किसने निकाला होगा… इसके बारे मे कुछ बता सकती हो?” जॉनने पुछा.

अँजेनीने फोटो गौरसे देखा. दिवारपर लिखे हूए गोल के निचे बेडपर पडे हूए उसके पतीके मृत शरीरको देखकर फिरसे उसका गला भर आया… जॉनने फोटो फिरसे जेबमें रखा.

‘” नही मतलब इस गोलका कुछ अर्थ समझमें आता है क्या? … वह एबीसीडीका ‘ओ’ भी हो सकता है … या फिर शून्यभी हो सकता है …” जॉनने कहा.

” मै समझ सकता हूँ की यह आपके पती के खुन के बारे में पुछने का उचीत वक्त नही … लेकिन जानकारी जितनी जादा और जितने जल्दी मिल सकती है उतने जल्दी हम खुनीको पकड सकते है…” जॉन ने कहा.

अँजेनी अब अपने इरादे पक्के कर संभलकर सिधे बैठ गई ” पुछो आपको जो पुछना है ..”‘

जॉननेभी जान लिया की पुरी जानकारी निकालनेका यही उचीत समय है.

“‘ सानी क्या करता था? … मतलब बाय प्रोफेशन” जॉनने पहला सवाल पुछा.

” वह इंपोर्ट एक्सपोर्टका बिझीनेस करता था … मेनली गारमेंटस् … इंडीयन कॉन्टीनेंटमें उसका बिझीनेस फैला हूवा था ” अँजेनी बोल रही थी.

” कोई प्रोफेशनल रायव्हल?” जॉनने पुछा.

” नही… उसका डोमेन एकदम अलग होनेसे उसे कोई प्रोफेशनल रायव्हल्स होनेका सवालही पैदा नही होता. ‘” अँजेनी बोल रही थी.

“‘ अच्छा आप क्या करती है ?” जॉनने अगला सवाल पुछा.

” मै एक फॅशन डिझायनर हूँ” अँजेनीने कहा.

बहुत देरतक उनके सवाल जवाब चलते रहे. आखीर स्टूलसे उठते हूए जॉनने कहा ” ठीक है … अबके लिए इतनी जानकारी काफी है… अब आप थकी भी होगी… मतलब दिमागसे… आराम करो … फिरसे कुछ लगा तो हम आपसे पुछेंगेही …”

जॉन जाने लगा.

अँजेनी उसे दरवाजे तक छोडनेके लिए उठने लगी तो जॉन ने कहा ” आप पडे रहिए .. आपको आराम की सख्त जरुरत है'”

फिरभी वह उसे दरवाजेतक छोडनेके लिए उठ गई. जॉन दरवाजे तक पहूचता नही की उसे पिछेसे उसकी आवाज आई –

” थँक यू …”

जॉन एकदमसे रुक गया और उसने मुडकर पुछा ” किसलिए?”

” मेरी जान बचानेके लिए … डॉक्टरने मुझे सब बताया है… अगर आप समयपर मुझे कृत्रिम सांसे नही देते तो शायद मै अब जिवीत नही होती …” अँजेनी उसकी तरफ कृतज्ञता भरी निगाहोंसे देखते हूए बोली.

” उसमें क्या है… मैने मेरा कर्तव्य किया बस ‘” जॉनने कहा.

” वह आपका बडप्पन है” अँजेनी दरवाजेतक पहूचते हूए बोली.

जॉन अब वहा से निकल गया था. लंबे लंबे कदम डालते हूवे जल्दी जल्दी वह चलने लगा. शायद अपनी भावनाएँ छिपाने के लिए. थोडे ही समयमे वह कॉरीडोर के सिरेतक जा पहूंचा. दाई तरफ मुडनेसे पहले उसने एक बार पिछे मुडकर देखा. वह अभीभी उसके तरफही देख रही थी.

जॉन पॅसेजमेंसे लिफ्टकी तरफ जा रहा था. अँजेनीको छोडकर जाते हूए उसे अपना दिल भारी भारी लग रहा था. अचानक जॉनका ध्यान लिफ्टकी तरफ गया. लिफ्ट अभीभी वहासे दूरही थी. लिफ्टके उस तरफवाले हिस्सेसे एक युवक आया. उसने काला टी शर्ट पहना हूवा था और उस टी शर्टपर ‘झीरो’ निकाला हुवा था, जैसा उसने पहलेभी सानीके खुनके दिन देखा था. जॉन एकदम हरकतमें आया और लिफ्टकी तरफ दौडने लगा.

उसने आवाज दिया, “ए… हॅलो ”

लेकिन उसका आवाज पहूचनेसे पहलेही वह युवक लिफ्टमें घुस गया था. जॉन औरभी जोरसे दौडने लगा. लिफ्ट बंद होगई थी… लेकिन अभीभी निचे या उपर नही गई थी. जॉन दौडते हूए लिफ्टके पास गया. उसने लिफ्टका बटन दबाया. लेकिन व्यर्थ. लिफ्ट निचे जाने लगी थी. जॉनको क्या करे कुछ सुझ नही रहा था. वह युवक उस दिन देखे युवकके हूलिए जैसा नही था. लेकिन पता नही क्यों जॉनको लग रहा था की जरुर सानीके खुनका रहस्य उस ‘झीरो’ में छिपा हूवा है. जॉन बगलकी सिढीयोंसे तेजीसे निचे उतरने लगा. बिच बिचेमें उसका लिफ्टकी तरफभी ध्यान था. लेकिन मानो लिफ्ट बिचमें कही भी रुकनेके लिए तैयार नही थी. शायद वह एकदम ग्राऊंड फ्लोअरकोही रुकनेवाली थी. जब जॉनने देखा की लिफ्ट उससे दो माले आगे निकल गई तो वह और जोरसे सिढीयाँ उतरने लगा.

आखिर सासें फुली हूई हालतमे वह ग्राऊंड फ्लोअरको पहूँच गया. उसने लिफ्टकी तरफ देखा. लिफ्टमेंके लोग कबके बाहर आ चूके थे और लिफ्टका डिस्प्ले लिफ्ट उपरकी दिशामें जा रही है ऐसा दर्शा रहा था. जॉन दौडते हूए हॉस्पीटलके बाहर लपका. उसने सब तरफ अपनी पैनी नजरें दौडाई. पार्कीगमेभी जाकर देखा. हॉस्पीटलके बाहर रोडपर जाकर देखा. लेकिन वह काले रंगके टी शर्टवाला युवक कही भी दिखाई नही दे रहा था.

…..क्रमश::………..

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परमेश्वर से आस्था !!

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एक कहानी रामकृष्णा जी के सौजन्य से श्री रामा कृष्णा परमंहस हमेशा कहानियों से आत्म विश्वास के महत्ता को दर्शाने और बताने की कोशिश करते थे!

ये कहानी इस तथ्य को पूर्णतया प्रस्तुत करती हैं! कहानी एक ग़रीब किसान की लड़की की हैं जो अलग २ गावों के लोगों को दूध पहुचाने का काम करती थी ! उन्हीं लोगों मे एक पुरोहीत के घर भी दूध पहुचती थी ! उस पुरोहीत के घर जाने के लिए उस ग्वालिन को एक तेज धारा मे बहने वाली नदी को पार करके जाना पड़ता था !

दूसरे लोग उस नदी को एक टूटे से छोटी सी नाव से पार करते थे उसके बदले लोग, नाविक को एक छोटा सा धन का कुछ भाग नाविक को दे देते थे! एक दिन जब उस ग्वालिन को उस पुरोहित के घर आने मे देर हो गई और पुरोहित जो की रोज ताजे दूध से भगवान का अभिषेक करता था और देर हो जाने की वजह से उस पर चिल्लाया की अब मैं इससे क्या कर सकता हूँ? उस ग्वालिन ने कहा की रोज की तरह आज भी मैं सुबह ही घर से निकली थी लेकिन एक ही नाविक उस नदी मे नाव चलता हैं और उसी नाविक के वापस आने के इंतजार करने की वजह से देर हो गई! तब ये सुनकर पुरोहित ने गंभीर मुद्रा धारण करते हुए उसे कहा की लोग तो भगवान का नाम जपते हुए बड़े २ समुन्द्र पार कर जाते हैं और तुम ये छोटी सी नदी पार नही कर सकती?

उस ग्वालिन ने पुरोहित की इस बात को बड़ी ही गंभीरता से लिया! और रोज उस दिन के बाद से पुरोहित को सुबह ठीक समय पर दूध पहुचाने लगी! इतने सुबह सही समय पर ग्वालिन की आते देख, पुरोहित के मन मे उत्सुकता उत्पन्न हुई कि वो रोज सुबह समय पर कैसे आ जाती हैं ! तो एक दिन वो पुरोहित अपने आप को रोक नही पाया और उस ग्वालिन के आते ही पूछा कि अब तो तुम कभी देर नही करती लगता हैं नदी मे और भी नाविक आ गये हैं! तब वो ग्वालिन बोली नही पंडित जी अब तो मुझे नाविक की कोई ज़रूरत ही नही पड़ती ! आप ने ही तो उस दिन कहा था कि लोग बड़े २ समुंद्र भगवान का नाम जप कर पार कर लेते हैं और मैं ये छोटी सी नदी पार नही कर सकती ! तो बस रोज भगवान का नाम जपते हुए मैं वो छोटी सी नदी अब बस ५ मिनट मे पार कर लेती हूँ !

लेकिन उस पुरोहित को उस ग्वालिन की बातों पर विश्वास नही हुआ उसने कहा की तुम उस नदी को कैसे पैदल पार करती हो ये मुझे दिखा सकती हो? तब ग्वालिन और पुरोहित दोनो उस नदी की तरफ चल पड़े! और वो ग्वालिन उस नदी के पानी पर पैदल चलने लगी ये देख कर वो पुरोहित भी उसके पीछे २ नदी पर चलने को आगे बढ़ा लेकिन जैसे ही पैर आगे नदी मे बढ़ाया वो नदी मे गिर पड़ा तब वो ग्वालिन ज़ोर से चिल्लाई की आपने भगवान का नाम नही लिया देखो आपके सारे कपड़े गीले हो गये!

ये भगवान मे विश्वास नही हैं! अगर आप विश्वास नही करते किसी पर तो आप सब कुछ खो देते हैं! विश्वास अपने आप पर और विश्वास भगवान पर यही जीवन का रहस्य हैं! यदि आप सभी तीन सौ और तीस लाख देवताओं में विश्वास है … और अपने आप पर विश्वास नही हैं तो भी आपका उद्धार नही होगा! उस पुरोहित ने उस ग्वालिन को जो कहा उस ग्वालिन ने सच माना और वैसा ही किया लेकिन उस पुरोहित को न अपने द्वारा कही गई बातों पर ही विश्वास था और न ही भगवान पर विश्वास किया!!

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मन के हारे हार है मन के जीते जीत !!

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“मन के हारे हार है मन के जीते जीत”

दोस्तों ,

बहुत दिनों से आप अपने आपको थका हुआ और कमजोर महसूस कर रहे हैं! मन में भी नकारात्मक भाव आ रहे हैं ,कोई उमंग महसूस नहीं हो रही है ! जिंदगी बोझिल सी हो रही है! ऐसे में आप किसी डॉक्टर के पास जाते हैं! वो आपकी पूरी जांच करने के बाद गंभीर स्वर में आपसे कहता है,–‘माफ़ कीजिएगा! लेकिन आपकी reports देख कर मुझे लगता है की अगले एक साल में आपको diabetes और heart problem होने वाली है,थोडा अपना ध्यान रखिए!!

आप ये सुन कर shocked हो जाते हैं! लेकिन अब इसके बाद जो आपकी प्रतिक्रिया होती है,वो महत्वपूर्ण है!

इस खबर को सुनने के बाद आप दो तरह से प्रतिक्रिया कर सकते हैं!

पहला, ये सुनते ही आपका मन कहता है, देखा, मैं तो पहले ही कह रहा था कुछ तो गड़बड़ है! तुम बीमार होने वाले हो! आप तुरंत doctor के prediction के आगे हथियार डाल देते हैं! आपकी नकारात्मक सोच आपकी उम्र को 10 साल आगे की स्थिति में पहुंचा देती है!!

आप हताश और निराश से कुर्सी से उठते हैं! किसी पराजित आदमी की तरह अपने कंधे झुका कर clinic से बाहर निकलते हैं! घर आकर चुपचाप या तो बिस्तर या TV के आगे बैठ जाते हैं!

आपके मन में ये prediction मजबूती से बैठ गई है की ये तो होना ही है तो क्यों मैं सुबह जल्दी उठूं ,व्यायाम करूँ, सही आहार लूँ, मेहनत करूँ! ये विचार आपके मनोमस्तिक्ष पर इतनी बुरी तरह हावी हो जाते हैं की सोते, जागते खाते-पीते आप बस ये ही सोचते रहते हैं की अब तो मुझे diabetes और heart problem होने वाली है आखिर अब तो doctor ने भी ये कह दिया है!

आप निरुत्साहित से अपने काम करते हैं! चिंता में TV के सामने बैठ कुछ ना कुछ खाते रहते हैं! आप अपनी चिंता को खाने की आड़ में दबाने की कोशिश करते हैं! फिर ऐसे ही हताशा, निराशा और आलस से भरी आपकी दिनचर्या हो जाती है!!

फिर एक दिन अचानक आपकी तबियत ज्यादा खराब हो जाती है! आप डॉक्टर के यहाँ जाते हैं! आपका सारा checkup करने के बाद doctor बड़े ही निराशा भरे स्वर में कहता है,– ‘मुझे अफ़सोस है! लेकिन मैं आपको ये बताना चाहता हूँ की आपको high BP, diabetes और heart problem हो चुका है! अगर अब भी आप अपना अच्छे से ख्याल नहीं रखेंगे तो गाडी ज्यादा देर और दूर तक नहीं चल पाएगी! आप shocked से सामने दिवार पर लगा कैलेंडर देखते हैं! अरे अभी तो केवल 5 महीने ही गुजरे हैं, डॉक्टर ने तो 1 साल की कहा था! आपकी सोच और मन की हार ने उस भविष्यवाणी को समय से पहले ही सच साबित कर दिया! आप फिर पहले से भी ज्यादा हताश, निराश और झुके हुए कन्धों के साथ clinic से बाहर निकलते हैं! और ये कहानी दोस्तों फिर ज्यादा लम्बी नहीं चलती है ……..!!

वहीं दूसरी तरफ doctor के ये कहते ही, की अगले एक साल में आपको diabetes और heart problem होने वाली है, आपको आपकी अंतरात्मा को एक झटका सा लगता है! आप इस बात को एक चुनोती की तरह लेते हैं! तुरंत आपका मन और आत्मबल एक निर्णय लेते हैं, की अरे ये सिर्फ एक prediction ही तो है, हकीकत नहीं है, और मैं इसे हकीकत बनने भी नहीं दूंगा! आप मन ही मन संकल्पित होते हैं, अपनी पिछली जिंदगी की कमियों, लापरवाहियों और आलस पर एक नजर डालते हैं और तुरंत निर्णय लेते हैं, बस अब और नहीं! अब मेरी जिंदगी, मेरी सेहत मेरे हाथ में है! आपकी सोच पूरा u-turn ले लेती है! आप ये ठान लेते हैं की आज से बल्कि अभी से मैं अपने आप को, अपनी आदतों को बदल दूंगा! इस prediction को मैं झूठा साबित कर के रहूँगा! आप एक संकल्प और मन के विश्वास के साथ कुर्सी से उठते हैं और clinic से बाहर निकलते हैं!!

आप अपनी दिनचर्या को पूरी तरह से बदल देते हैं! जल्दी उठना, ध्यान, व्यायाम, सही आहार, सकारात्मक सोच, श्रद्धा, आशावादिता, उमंग ,उत्साह और पर्याप्त मेहनत को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लेते हैं! कुछ दिनों के बाद जब मन में निराशा के भाव आने लगते हैं, आलस पुनः आप पर हावी होना चाहता है! तो डॉक्टर की भविष्यवाणी को याद कर आप अपनी हताशा को पीछे धकेल देते हैं!

आपका ये संकल्प की इस prediction को मैं सही साबित नहीं होने दूंगा, आप को वापस अपने सेहत के रास्ते पर अग्रसर कर देता है!!

फिर आप कई साल बाद ऐसे ही अपने routine checkup के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं! डॉक्टर बड़ी गर्मजोशी और उमंग से कहता है, -क्या बात है! आपने तो अपना कायाकल्प ही कर लिया है! आप तो पहले से भी ज्यादा सेहतमंद और जवान हो गए हैं! आप मुस्कुरा कर डॉक्टर से हाथ मिलाते हैं और सीटी बजाते हुए क्लिनिक से बाहर आ जाते हैं! और ये कहानी बहुत अच्छे तरीके से बहुत लम्बी चलती है!!

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तो दोस्तों ,
कहानी कैसी लगी? वैसे ये कहानी है ही नहीं! हकीकत है! हम लोगों में से 90 से 95 % लोग पहले वाली सोच के होते हैं, है ना? केवल 5 या 10 % लोग ही दूसरे नजरिये वाले होते हैं! जो अपने पुरुषार्थ, मनोबल और मेहनत से भविष्यवाणी को भी बदल देते हैं! आपके मन की नकारात्मक सोच आपको समय से पहले डूबा भी सकती हैं और सकारात्मक सोच अनेकों ऊँचाइयों तक उठा भी सकती है! इसलिए जिंदगी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और तदुपरांत सार्थक प्रयत्न आपकी सफल, सेहत भरी जिंदगी और उज्जवल भविष्य के लिए अति आवश्यक है! है ना?

तो मन का कैसा नजरिया रखना चाहेंगे आप? आखिर ………..

जैसा नजरिया है आपका, वैसी जिंदगी है आपकी ……………

Note::-
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बुढ़िया की सुई – हिंदी कहानी !!

kmsraj51 की कलम से …..
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बुढ़िया की सुई

एक बार किसी गाँव में एक बुढ़िया रात के अँधेरे में अपनी झोपडी के बहार कुछ खोज रही थी .तभी गाँव के ही एक व्यक्ति की नजर उस पर पड़ी , “अम्मा इतनी रात में रोड लाइट के नीचे क्या ढूंढ रही हो ?” , व्यक्ति ने पूछा.
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“कुछ नहीं मेरी सुई गम हो गयी है बस वही खोज रही हूँ .”, बुढ़िया ने उत्तर दिया.

फिर क्या था, वो व्यक्ति भी महिला की मदद करने के लिए रुक गया और साथ में सुई खोजने लगा. कुछ देर में और भी लोग इस खोज अभियान में शामिल हो गए और देखते- देखते लगभग पूरा गाँव ही इकठ्ठा हो गया.

सभी बड़े ध्यान से सुई खोजने में लगे हुए थे कि तभी किसी ने बुढ़िया से पूछा ,”अरे अम्मा ! ज़रा ये तो बताओ कि सुई गिरी कहाँ थी?”

“बेटा , सुई तो झोपड़ी के अन्दर गिरी थी .”, बुढ़िया ने ज़वाब दिया .

ये सुनते ही सभी बड़े क्रोधित हो गए और भीड़ में से किसी ने ऊँची आवाज में कहा , “कमाल करती हो अम्मा ,हम इतनी देर से सुई यहाँ ढूंढ रहे हैं जबकि सुई अन्दर झोपड़े में गिरी थी , आखिर सुई वहां खोजने की बजाये यहाँ बाहर क्यों खोज रही हो ?”

“क्योंकि रोड पर लाइट जल रही है…इसलिए .”, बुढ़िया बोली.

मित्रों,
शायद ऐसा ही आज के युवा अपने भविष्य को लेकर सोचते हैं कि लाइट कहाँ जल रही है वो ये नहीं सोचते कि हमारा दिल क्या कह रहा है ; हमारी सुई कहाँ गिरी है . हमें चाहिए कि हम ये जानने की कोशिश करें कि हम किस फील्ड में अच्छा कर सकते हैं और उसी में अपना करीयर बनाएं ना कि भेड़ चाल चलते हुए किसी ऐसी फील्ड में घुस जाएं जिसमे बाकी लोग जा रहे हों या जिसमे हमें अधिक पैसा नज़र आ रहा हो .

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नियंत्रण विचारों की गिनती पर

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