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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हेमराज ठाकुर

क्या निजीकरण का विरोध जायज है?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ क्या निजीकरण का विरोध जायज है? ♦

आजकल जिस तरह से सरकारी कर्मचारी की हालत हुई है। उस लिहाज से निजीकरण बहुत जरूरी है। काम करने को कहे तो लाख बहाने और कानून बताते हैं। जब तनखाओं की बात आती है तो उस के लिए तो सड़कों में उतरते हैं। एफसीलाखों की तनख्वाह चाहिए पर काम करना ही नहीं चाहते हैं। मुफ्त में चाहिए। जब कोई ऐसा कहे कि काम करो भाई तुम्हे इसकी तनख्वाह मिलती है। तो कहते हैं इसके लिए हमने दिन रात कड़ी मेहनत की है और ऊंची पढ़ाई की है। तब जाकर इस पद पर पहुंचे है। यूं ही नहीं मिली है नौकरी। जैसे उन्हे नौकरी लगने की प्रतियोगिता को पास करने के ईनाम के रूप में जिंदगी भर मोटी तनख्वाह देने का अनुबंध सरकार ने हस्ताक्षरित किया हो। जैसे टेस्ट पास कर के उन्होंने जनता पर बड़ा एसान किया हो। इतनी पढ़ी लिखी जनता बेरोजगारी से जूझ रही है और परेशान हैं। उसका शोषण हो रहा है। वह किसी को नहीं दिखता।

बस निजीकरण न हो। ठेकेदारी न हो। क्यों? जब लोग कुली के काम में भी ईमानदारी से काम करना ही नहीं चाहते हैं तो फिर तो ठेका जरूरी है। वहां प्रोग्रेस भी मिलती है और काम भी हो जाता है। रही गुणवाता की गड़बड़ी की बात तो उसके लिए फिर से सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ही दोषी हैं। जो घूंस खाकर ठेकेदारों के कामों को पास करते हैं। यदि ठेकेदार घूस न दे तो वे बिल ही पास नहीं करते। ऐसे में ठेकेदारों को भी गुणवत्ता में गड़बड़ करनी पड़ती है। यानी सरकारी सेक्टर में जो भी लगा समझो की पावर और कानूनों का दूर-उपयोग करना उसका निजी अधिकार बन जाता है।

जनता अपने-अपने काम को निकालने के चक्कर में और किसी से बुरा न बनने के चक्कर में घूस देने को विवश हो जाती है और अब धीरे-धीरे जनता को भी भ्रष्टाचार की लत लग गई है। सिखाई किसने? सरकारी अधिकारी और कर्मचारी वर्ग ने। छोटे से छोटा बाबू भी बिना घूस के फाइल नहीं सरकाता। चपरासी तक भ्रष्ट हैं, और तो और मनरेगा के मजदूरों से भी जबाव मिलता है कि जब सब खा रहे हैं तो हमारे लिए प्रोग्रेस क्यों? हम भी सारा दिन अपनी मर्जी का काम करेंगे और 203 रुपए पूरा दिन लेंगे। यदि वह तकनीकी लोगों ने कम आंका तो पंचायत प्रतिनिधि की खाल उधेड़ देते हैं। या तो प्रोग्रेस के बदले में दुगना तिगुना दिन मांगते हैं। अब वहां एडजस्टमेंट करनी पड़ेगी।

उस एडजस्टमेंट को कानूनी रूप से तकनीकी लोग या ओहदेदार लोग कानूनन गलत ठहराते हैं। ऐसे में पंचायत प्रतिनिधियों को ही नुकसान झेलना पड़ता है और हर तरफ से समझौता करना पड़ता है। लोगों को प्रोग्रेस के चक्कर में दुगना तिगुना दिन देना पड़ता है और तकनीकी तथा ओहदेदार लोगों को घूस खिलानी पड़ती है। ऐसे में कार्य की गुणवत्ता यदि लानी हो तो घाटा होगा नहीं तो गुणवत्ता से भी समझौता करना पड़ता है। अब दोषी कौन?

लोगों की नजरों में ठेकेदार या पंचायत प्रतिनिधि खा गए आदि-आदि, का भाव होता है और खाने वालों की एक लम्बी कतार होती है। यह सचाई सब जानते हैं पर मुंह कोई नहीं खोलना चाहते। अन्ना आंदोलन ने आवाज उठाई जरूर थी परन्तु वह भी समय और व्यवस्था की गर्त में दब गई। फिर ठेकेदारी प्रथा से नफरत क्यों? जब लोग ही मिलकर इसका विरोध नहीं करना चाहते तो सरकार का क्या कसूर?

गरीबों के काम तो कतई नहीं होते। इतनी तनख्वाह लेने के बाबजूद भी हर काम के लिए रिश्वत मांगते हैं। हद हो गई है अब तो। हां सेना के मामले में, पुलिस के मामले में ठेका सही नहीं है। बाकी देश के विकास के लिए सब जायज है। अध्यापक तनख्वाह लेने के बाबजूद भी क्लास को नहीं जाना चाहते और जाता है तो गाइडों से पढ़ाना शुरू करता है। कौन पढ़ता है आज किताबें? कौन जाता है आज लाइब्रेरी? जो काम करते हैं उन्हे उल्टा क्रश किया जाता है। उन्हे पफोन्नत नहीं मिलती पर वरिष्टता के हिसाब से पदोन्नति मिलती है।

सभी विभागों के कर्मचारी रिश्वत बिना काम नहीं करना चाहते। फिर क्या गलत है? सरकारी सेक्टर की तरह निजी में नहीं होता। वहां प्रोग्रेस के पैसे मिलते हैं न कि ओहदे और डिग्री के बल पर पास किए टेस्ट के। वहां पदोन्नति भी काम के हिसाब से होती है न कि सिनियोर्टी के आधार पर। तब इस क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाना कहां से गलत है? या तो लोग अपनी मानसिकता को सुधारे या फिर निजीकरण को स्वीकारें।

निजीकरण के सकारात्मक प्रभाव :

  1. सरकारी ऋण में कमी : निजीकरण के मुख्य आशावादी प्रभावों में से एक यह है कि इसने संघीय सरकार के पैसे को कम कर दिया है।
  2. बेहतर सेवाएं।
  3. नए-नए तरह के उत्पाद।
  4. कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं।
  5. प्रतियोगी दरें।

घोषणा :- यह मेरी मौलिक और स्वरचित रचना (विचार) है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — गरीबों के काम तो कतई नहीं होते। इतनी तनख्वाह लेने के बाबजूद भी हर काम के लिए रिश्वत मांगते हैं। हद हो गई है अब तो। हां सेना के मामले में, पुलिस के मामले में ठेका सही नहीं है। बाकी देश के विकास के लिए सब जायज है। अध्यापक तनख्वाह लेने के बाबजूद भी क्लास को नहीं जाना चाहते और जाता है तो गाइडों से पढ़ाना शुरू करता है। सभी विभागों के कर्मचारी रिश्वत बिना काम नहीं करना चाहते। फिर क्या गलत है? सरकारी सेक्टर की तरह निजी में नहीं होता। वहां प्रोग्रेस के पैसे मिलते हैं न कि ओहदे और डिग्री के बल पर पास किए टेस्ट के। वहां पदोन्नति भी काम के हिसाब से होती है न कि सिनियोर्टी के आधार पर। तब इस क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाना कहां से गलत है? या तो लोग अपनी मानसिकता को सुधारे या फिर निजीकरण को स्वीकारें।

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यह कहानी (क्या निजीकरण का विरोध जायज है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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लड़ाने वाले तो लड़ा गए।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ लड़ाने वाले तो लड़ा गए। ♦

नफरतों की आंधियां थम जाने दो,
आ जाने दो प्रेम की शीतल बयार।
बदल जाने दो अब आवोहवा को,
छट जाने दो युद्धिय मेघों को यार।

रक्तिम रंग से रंजित धरा को,
कर लेने दो जीवन का श्रृंगार।
मौत का खेल बहुतेरा हो लिया,
उग जाने दो अब पावन प्यार।

लड़ाने वाले तो लड़ा गए तुम्हें,
मकसद ही जिनका लड़ाना था।
तबाही तो तुम्हारी करा गए भाई,
उन्हे तो उल्लू सीधा करवाना था।

दो घरों के झगड़े में ओ बंधू!
भला पड़ता ही अब कौन है?
खाली बातें ही करते हैं लोग,
पड़ोसी भी रहते बस मौन है।

हां! निज घर की अस्मत के खातिर,
लड़ना भिड़ना भी तेरी मजबूरी था।
पर आग लगाने वाले मद मित्रों की,
कुटिल चालों को भांपना जरूरी था।

अपने ही घर को फूंक के पगले,
आग सेंकना तो निपट नादानी है।
अपनी ऐंठ में निर्दोष जनता को,
बेवजह मरवाना भी बेईमानी है।

कोसेगी कई पीढ़ियां तुमको, क्या;
निर्मित ढांचा ढहाना समझदारी थी ?
पुरखों की गढ़ी हर नींव उखाड़ डाली,
जनता भी बेवजह ही क्यों मारी थी?

सनक ही सनक में दो दिग्गजों ने,
क्यों लड़ी खूंखार खूनी लड़ाई थी?
जमाना तो पूछना छोड़ेगा नहीं जी,
आखिर ऐसी भी क्या नौबत आई थी?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — रूस – यूक्रेन युद्ध का अब छठवां सप्ताह चल रहा है, लड़ाने वाले तो लड़ा गए, इस युद्ध से दोनों देशों को अधिक नुक़सान झेलना पड़ रहा है, जहां एक तरफ रूस हमले को रोक नही रहा है, वही दूसरी तरफ यूक्रेन हार मानने को तैयार नहीं हो रहा। इस युद्ध से सबसे ज्यादा तकलीफ वहां की आम जनता को हो रही हैं। कोसेगी कई पीढ़ियां तुमको, क्या; निर्मित ढांचा ढहाना समझदारी थी ? पुरखों की गढ़ी हर नींव उखाड़ डाली, जनता भी बेवजह ही क्यों मारी थी?

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यह कविता (लड़ाने वाले तो लड़ा गए।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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नव संवत्सर आया री।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नव संवत्सर आया री। ♦

नव संवत्सर आया ओ आली! नव संवत्सर है आया री!
बसन्त मनभावन, चित लुभावन, आनंदोत्सव छाया री॥

हरे -भरे हर खेत – खलियान, वन – उपवन में फुलवारी है।
नील शुभ्र नभ सूरज जी उजियाली, मनमोहक मनुहारी है॥

यह भारतवर्ष के नव वर्ष आगमनोत्सव की हरियाली है।
भिनभिनाते भौंवरे, मधुमक्खियां, तितलियां भी मतवाली हैं॥

नव अंकुरित कोमल पात सब, तरुवर के स्वागत करते हैं।
मुक्त हुए सर्दी के कुंठित रक्तकण, बूढ़ों में स्फूर्ति भरते हैं॥

पश्चिम का नहीं भारत का संवत्सर, खुशियां ले के आता है।
देश को ही नहीं पूरी दुनियां को, नव वर्ष का अर्थ बताता है॥

खिलखिलाते बाल – वृद्धों के चेहरे, पर्यावरण भी हर्षाता है।
भारतवर्ष का यह वर्षोत्सव, सच में खुशहाली को लाता है॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — Hindu Calendar Vikram Samvat 2079, 2 अप्रैल, शनिवार से चैत्र नवरात्रि शुरू होने जा रहे हैं और इसी के साथ नया हिंदू वर्ष नवसंवत्सर 2079 भी आरंभ हो जाएगा। हर वर्ष चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष को हिंदू नववर्ष प्रारंभ होता है। चैत्र का महीना हिंदू नववर्ष का पहला महीना होता है। इसका प्रारंभ सम्राट विक्रमादित्य ने किया था, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरु होता है। इस बार 02 अप्रैल को हिंदू नववर्ष 2079 या विक्रम संवत 2079 का प्रारंभ होगा। हिंदू नववर्ष को विक्रम संवत, नव संवत्सर, गुड़ी पड़वा, उगाड़ी आदि नामों से भी जाना जाता है। विक्रम संवत के प्रथम दिन से ही बसंत नवरात्रि का प्रारंभ होता है, जो चैत्र नवरात्रि के नाम से लो​कप्रिय है।

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यह कविता (नव संवत्सर आया री।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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दास्तान ए जात पात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दास्तान ए जात पात। ♦

अपनी अरुणिमा को बिखेरते हुए सूर्य देव हिमालय की पावन वादियों में पहाड़ियों के बीचो बीच बसे इस छोटे से सुंदर एवं सुरम्य गांव को ऐसे नहला रहे थे, कि मानो आद्या सुंदरी परा शक्ति प्रकृति का चाकर बन कर अपनी सेवाएं नियमित दे रहे हो।घाटी के इस छोटे से गांव में कितनी आत्मीयता थी और कितना प्रेम और भाईचारा? कहते नहीं बनता। न कोई लड़ाई न कोई झगड़ा। न ही तो शहरों जैसी आपाधापी और लूट – खसोट। चारों ओर थी तो सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता और असीम सकून।

नित्य प्राकट्य की तरह आज भी आदित्य देव अपनी सेवाएं देने धीमे – धीमे तप और विशाल प्रकाश के साथ पहाड़ी की चोटी पर निकल आया था। गांव की जानकी चाची की आवाजे हर रोज की तरह कानों में गूंज उठी।

” राधा, शालू, कमला, मनु उठो भाई उठो। देखो तो सूरज चढ़ आया है। सारा संसार उजाला हो गया है और तुम ……….।” यह बोलते बोलते जानकी चाची उस कमरे में घुंस गई, जहां राधा सोई थी।

“अरे ओ मेरी भोली सी, प्यारी सी, अच्छी सी दादी। क्यों हर रोज सुबह – सुबह अपनी कोयल सी मधुर आवाज़ का प्रचार – प्रसार करती फिरती हो ? आस – पड़ोस को भी अलार्म का काम करती हो।” बिस्तर पर ऊंघते हुए से पलथी मार कर जानकी चाची के झुर्रियों से लबरेज चेहरे को चूमते हुए राधा बोली।

“तुझे अब सुबह इतनी देर तक सोए रहना शोभा नहीं देता राधा। शादी की उम्र हो गई है। मां का हाथ बंटाया कर। कुछ सीख भी जाएगी और मां की मदद भी हो जाएगी।”

जानकी चाची बूढ़ी आंखो की कोरों में पानी भरते हुए से बोली।
“बस भी कर मेरी प्यारी दादी। जब देखो तो तब उपदेश। और हां जो ये बात – बात पर इन झील सी आंखो में लहरे उठाती रहती हो ना, ये मत किया करो जी।” राधा जानकी चाची की झुर्रियों से लबरेज पोपलों को दोनों ओर से पकड़ते हुए और पुचकारते हुए से बोली।

“कैसे चुप रहूं बच्चा? दादी जो हूं तेरी।” जानकी चाची कोरो का पानी पोंछते हुए और राधा का सिर सहलाते हुए बोली।

“उमा। ओ उमा।” बाहर से मोहन भैया ने आवाज लगाई।
“जी आई।” अंदर से रोटियों को बेलते हुए उमा भाभी बोली।

“अरे मैं काम पर जा रहा हूं। देर हो रहा हूं। बाहर कुछ सामान रखा है। देखना उठा लेना। राधा को बोल दे चाहे।” जाते हुए से मोहन भैया बोले।

“जी उठा लूंगी। आपकी लाड़ली तो अभी खरांटे मार रही होगी। बिगाड़ रखा है बुढ़िया ने।” अंदर से उमा भाभी बोली।

“ठीक है। उठा लेना। बाहर गाय भी चुग रही है। कहीं खा न ले सामान।” मोहन भैया सड़क से बोले।

“जी उठा लूंगी। शाम को जल्दी अना।” अंदर से उमा भाभी बोली। पर शायद ये सब मोहन भैया ने नहीं सुना हो। वे निकल पड़े थे।

गाय को हट्टका करते हुए सामानों के थैले लिए हुए राधा और जानकी चाची रसोई में आई।

“क्यों री बुढ़िया की बच्ची? क्या कह रही थी ? बुढ़िया ने बिगाड़ रखा है!” जानकी चाची ने उमा भाभी के कान प्यार से पकड़ते हुए पुचकारते हुए से कहा।

“सॉरी – सॉरी अम्मा जी! अब नहीं बोलूंगी।” अपने कान पकड़ते हुए माफीनामे की तहजीब में उमा भाभी बोली।

“खबरदार जो आगे से किसी ने मेरी लाड़ली पोती को कुछ कहा तो।” फिर से आंखों की कोरें नम करते हुए से जानकी चाची बोली।

“नहीं कहूंगी कुछ अम्मा। पर इसकी मां हूं। चिंता तो होती है न! 24 की हो गई है।सबको आप जैसी सास थोड़े ही न मिलती है।” उमा भाभी रूआंसा चेहरा करके बोली।

“सो तो मैं भी इसे समझाती रहती हूं बेटा। पर यह मानती कहां है?” यह बोलते – बोलते जानकी चाची की आंखे छलक आई थी।

“ओ री ओ सुंदर सास – बहू की जोड़ी। ये रोना धोना छोड़ो और कुछ नाशता – पानी कराओ। भूख लगी है। तुम्हारी राधा जिंदा है अभी। मरी नहीं है।” राधा ने दोनों को छेड़ते हुए से कहा।

“चल ! झल्ली कहीं की? पहले नहा – धोकर आ, फिर खाना कुछ।” जानकी काकी आंसू पोंच्छते हुए बोली।

अपनी अहलड मस्ती में राधा नहाने जाती है। इस बीच चाची और उमा भाभी में यह बात हो रही थी कि परसों राधा को देखने लड़के वाले आ रहे हैं। “उमा के बाबू जी बोल रहे थे कि बेटी जवान हो गई है। हाथ पीले करना हमारा फ़र्ज़ है। फिर बी ए भी इस साल इसकी पूरी हो जाएगी।” उमा भाभी चाची से बोल रही थी।

“सो तो है बच्चा। बेटियां तो है ही पराया धन। कब तक पास रखोगे?” चाची उमा भाभी से बोल रही थी।

” जब देखो तब सब बस मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। किसी न किसी तरह से मुझे जल्दी भगाने की तैयारी में चुपके – चुपके लगे हैं। मैं नहीं करूंगी अभी शादी हां। कह दिया मैंने। जब तक एम ए न कर लूं।” राधा बाल झाड़ते हुए झल्ला कर बोली।

“बस कर री ओ छमक-छलो। कब तक बाप के यहां बैठी रहेगी? 24 की हो ली फिर कब 50 की करेगी शादी क्या? कौन वरे गा तब तुझे। तेरी उम्र की थी न हम। तो दो – दो औलाद जन बैठे थे।” पास मनु को नहला रही चंपा दीदी व्यंग्य करते हुए बोली। वह यहां मायके अपने बच्चों के साथ मेहमान आई थी। शायद राधा का यह रिश्ता भी उसी की सलाह पर उमा भाभी और मोहन भैया करवा रहे थे। पर इसमें राधा को विश्वास में न लिया गया हो शायद।

“वह आप का जमाना था फूफी। अब मॉडर्न जमाना है। समझी !” राधा पुचकारते हुए से बोली।

“हां – हां तोड़ ले अपने बाप की रोटियां और! तुझे कौन समझाएं?” चंपा दीदी बोली।

“बस भी कर चंपा! तू हमेशा इसे छेड़ते हुए क्यों ताने मारती रहती है?” जानकी चाची डांटते हुए से बोली।

“हां – हां मां और चढ़ाओ इसे सर पर। तूने ही तो इसे बिगाड़ रखा है। ठीक कहती है भाभी।” चंपा दीदी बोली।

“हर चीज का एक समय होता है बच्चा। शादी की भी एक उम्र होती है। ठीक कह रहे हैं सब।” राधा की बेनी बनाते हुए चाची बोली। तीसरे दिन लोक रीत के तहत बुलाए गए मेहमान आते हैं और राधा जैसी सुंदर और पढ़ी लिखी लड़की को देख कर रिश्ता तुरंत पक्का कर लेते हैं।

दिन गुजरते गए। यहां राधा ने बुद्धि से तो यह रिश्ता कबूल लिया था पर दिल से नाखुश ही थी। एक दिन पास में एक मेला था। राधा अपनी सहेली रूपा के साथ मेला देखने चली गई। रास्ते में उन्हें पिंकू मिला, जो उन का क्लास मेट था। वह पास के गांव का रहने वाला था और एक अच्छा लड़का था। उसने गाड़ी रोकी।

“अरे राधा और रूपा कहां जा रही हो?” पिंकू ने कहा।
“ओह पिंकू! हम मेले जा रही है और तुम?” रूपा ने चौंकते हुए से कहा।
“मैं भी मेले जा रहा हूं। आओ चलो बैठो।” पिंकू ने कहा।
दोनों गाड़ी में बैठ जाती है। और तीनों बतियाते – बतियाते मेले पहुंचे। बातचीत से माहौल तो पहले ही खुशनुमा हो गया था उस पर मेला भी आ गया। मेले के पास रास्ता कुछ खराब था। सो राधा ने पिंकू को हाथ दे कर मदद करने को कहा।

पिंकू ने जैसे ही ऊपर से नीचे को राधा को ऊपर खेंचाने के लिए हाथ किया, त्यूं ही उसकी नजर राधा के वक्ष स्थल के ऊपर वाले अधखुले भाग पर पड़ी। राधा ने पिंकू को देखते हुए भांप लिया। दोनों के दिलो में एक अजीब सी हलचल हुई, जो शायद इन दोनों ने पहली बार महसूस की थी। वे एक दूसरे को संभालते – संभालते नयन मटके में उस मेले के पास वाली किचन में फिसल गए। दोनों के कपड़े खराब हो गए। रूपा को वहीं बिठा कर वे पास के नल में अपने कपड़े साफ करने गए।

“तुम्हारी सगाई सच में हो गई क्या?” कपड़ों को झाड़ता हुआ पिंकू शरमाते हुए सा बोला।

“क्यों? नहीं हुई होती तो तब क्या तू………….?” राधा ने स्त्री सुलभ मुस्कुराहट बिखेरते हुए नीची नजर कर के तिरछी चितवन निहार कर कपड़े धोते हुए कहा।

” नहीं – नहीं। बस सुना था। सो पूछ लिया।” पिंकू उसी मुद्रा में बोला।

“हां हो गई है। ठीक सुना है तुमने।” राधा ने भी उसी मुद्रा में जबाव दिया। वे दोनों बातों ही बातों में मस्त हो गए थे। बाहरी परिचय तो उनका पहले से ही था, पर आज तो उनका रूहानी परिचय भी हो गया था शायद। ऊपर से धीमे से रूपा की आवाज आई,” ओ री ओ राधा। जल्दी कर बच्ची। तेरा मंगेतर मेले में पहुंच गया है शायद।फोन कर रहा है।”

“उठा ले तू ही।” राधा ने ठिठोली करते हुए कहा।
“अरे ओ लैला! कहीं उसने तुम्हे यूं देख लिया न पानी में आग लग जाएगी आग हां।जल्दी कर।” रूपा ने चठकरी करते हुए कहा।

“अच्छा पिक्की!” हाथ हिलाते हुए राधा ने पिंकू से जाते हुए कहा।

राधा के मुख से अपने लिए पिंक्की सुन कर पिंकू के दिल की आग में घी पड़ गया। शाम को राधा अपने घर पहुंची और सीधा अपने कमरे में चली जाती है।

“राधा। ओ राधा।” जानकी चाची ने आवाज लगाई।
“जी दादी।” राधा अंदर से कपड़े बदलते हुए बोली।
“देख तो तेरा फोन आया है।” चाची बोली।

“किसका है दादी?” राधा बोली।
“किसका होगा ? तुझे नहीं मालूम क्या?” चाची ठिठोली करते हुए बोली।
चाची की बातों से राधा ने अंदाजा लगाया लिया कि उसके मंगेतर का ही होगा। उसने उतना तबजो न दिया। कपड़े बदलती रही। इतने में शालू खिखियाते हुए राधा के कमरे में फोन ले कर आया।

“सुन भी तो लो दीदी। जीजा जी नाराज हो जाएंगे नहीं तो।” वह छुटकू राधा को छेड़ते हुए से बोला।

“होने दे नाराज। पीछा छूटेगा।” राधा अपनी घर वाली कमीज़ पहनते हुए बोली और उसके हाथ से फोन झुंझला कर ले लेती है।

“हेलो ! कौन है? अब बोलो भी चुप क्यों हो। कपड़े बदल रही थी। देर लग गई। इसमें नाराज होने की क्या बात है?
बोलो भी कुछ नहीं तो मैं काट रही हूं।” राधा त्योरियों को चढ़ाते हुए बोली।

“सुन – सुन, मैं पिंक्की बोल रहा हूं। फोन मत काटना प्लीज!” फोन पर पिंकू ने धीरे से कहा।

यह सुन कर राधा घर के पिछवाड़े में फोन सुनने चली गई। घरवालों ने सोचा कि यह हमसे शर्मा कर दामाद से बात करने पिछवाड़े गई है। चाची ने राधा का फोन पहले उठाया था। उस पर किसी मर्द की आवाज सुन कर अंदाजे से दामाद का फोन होने का अनुमान लगाया था।

सब खुश थे कि बेटी को दामाद का फोन आया है। पर किसे मालूम कि राधा ने फोन पर किसी और से कल मुलाकात का प्रोग्राम फिट किया है।

हल्की – हल्की बारिश बाहर हो रही थीं। कस्बे के नुकड़ पर बने रेन शेल्टर में राधा और पिंकू दो के दो बैठे हैं। कोई उन्हें देख नहीं रहा है।

“क्या तुम अपने मंगेतर से खुश नहीं है?” पिंकू ने राधा से कहा।
“किसने कहा?” राधा ने तल्खियों में कहा।

“तुम ही तो कल फोन पर कह रही थी।” पिंकू ने कहा। पिंकू ने राधा को शालू के छेड़ने पर बड़बड़ाते हुए सुन लिया था।

“हां नहीं हूं खुश। तो क्या कर लोगे तुम?” राधा बोली।

“तूने क्या यह फिल्म समझी है? कि हीरो विलन को पीट देगा।” पिंकू बोला।

“हीरो। और वो भी तू?” राधा हंसते हुए से बोली।

“हां – हां मैं। क्यों आपको कोई शक है?” पिंकू बड़े रुआब से बोला।
पिंकू की यह अदा तो राधा को और भी घायल कर गई।

“अच्छा – अच्छा एक बार फिर से करो ऐसा भला।” राधा ने अनुनय किया।
पिंकू ने क्रिया पुनः दोहराई।

उस रोज राधा के ससुराल वाले राधा की शादी की बात करने आए थे।

“देख भाई कुडमा (समधी)। अगले महीने तक जो देना ब्याह करी एबे। से मठा भी आई जाना घरा जो। फेरी कंपनी मंझा छुट्टी नी मिलदी।” राधा का ससुर मोहन भैया से बोल रहा था।
“हां बेटा ब्राह्मणा ते लग्न जोड़ी ले ओ। बाकी फेरी ब्याह रे घरा निकलें कई काम।” चाची ने हामी भरते हुए कहा।

शादी का लग्न शोध लिया गया था और तैयारियां दोनों ओर जोरों से थी। एक दिन दोनों परिवारों के लोग शहर शादी के जेवर – कपड़े खरीदने आए थे। राधा को भी पसंद का सामान खरीदने के लिए साथ लाया गया था। सभी खरीद फरोक्त कर रहे थे।

इस बीच राधा टॉयलेट गई। वहां से वह वापिस नहीं आई। थोड़ी देर बाद सब का ध्यान जब इस ओर गया तो दोनों परिवारों में खलबली मची। फोन लगाया। वह स्विच ऑफ आ रहा था। शहर का कोना – कोना छान डाला पर कोई खबर नहीं मिली। शाम होने वाली थी। तब सब ने निर्णय लिया कि पुलिस में रपट दर्ज की जाए। रपट लिखवाते ही सब अपने – अपने घरों को चले गए।

तीन दिन बाद डाकिया चिट्ठी को चाची के पास दोपहर को छोड़ गया था। चाची को पढ़ना आता नहीं था।
शाम को जब भैया और भाभी आए तो उन्हें दे दी।
“देखना मोहन तेरे नाम डाकिया चिट्ठी दे गया था।” चाची बोली।
मोहन भैया ने जब चिट्ठी पढ़ी तो आग बबूला हो उठा।

“नालायक को यह दिन दिखाने के लिए ही पाला – पोसा था हमने। नाक कटा डाली मूर्ख ने हमारी। मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा कहीं। क्या बोलेंगे समधी जी को। चलो उनसे तो ले दे के निपट भी लेंगे पर समाज को क्या कहेंगे?” मोहन भैया गुस्से से लाल हो कर बोल रहे थे।

“अरे हुआ क्या है? जरा हमें भी तो बता। बस उसे कोसता ही जा रहा है। ऐसा क्या किया है उसने?” चाची ने डांटते हुए से बोली।

“तुम तो चुप ही रहो अम्मा। तुम्हीं ने उसे अपने लाड़ प्यार से बिगाड़ा, जिसका परिणाम आज हम भुगत रहे हैं।” मोहन भैया झल्ला कर बोले।
“अरे मुझे जो भला – बुरा कहना है सो बाद में कहना। पहले बता तो सही हुआ क्या है?” चाची भी कड़की से बोली।

“होना क्या है अम्मा? यह कोर्ट की न्यायिक सूचना है। जिसमें लिखा है कि राधा ने पवन सुपुत्र बृजमोहन से शादी कर ली है और क्या?” मोहन भैया गुस्से से बोले।
उस दिन चंपा दीदी पुनः राधा के गायब होने की खबर सुन कर यहां खबर संभाल करने आई थी। वह चौंक कर बोली,” क्या? उस बृजमोहन के लड़के से, जो पड़ोस के गांव का है?”
“हां वही।” मोहन भैया ने ऊंघते हुए से बोला।

“देखा न। आखिर उसने अपनी करतूत दिखा ही ली आखिर। मैं न कहती थी कि यह लड़की तुमने कुछ ज्यादा ही सिर पर चढ़ा रखी है। बिगाड़ दी ना उसने जात। मेरी सुनता ही कौन था?” चंपा दीदी इठलाते हुए सी बोली।

“इससे तो वह मर ही गई होती तो एक ही दुख तो होता। अब तो वह जिंदगी भर खुद भी मरेगी और हमें भी मारती रहेगी।” छाती पीटते और रोते हुए उमा भाभी बोली।

“वह जिए अब अपने हाल में। मैं उसे अपने घर में घुसने नहीं दूंगा। मेरे लिए वह मर गई समझो।” मोहन भैया ने झुंझलाते हुए से कहा और अंदर चला गया।

कुछ दिन बाद राधा ने घर पर फोन किया। उमा भाभी ने उठाया। रोते – रोते बोली,” बेटा क्या कसर रखी थी हमने तुझे पालने में? तूने तो हमें कहीं का न छोड़ा! भागना भी था तो किसी अपनी जाति वाले के साथ भागती। क्या जरूरत पड़ी थी पिंकू के साथ भागने की? रिश्ता मंजूर न था तो मुझसे कहती, अपनी दादी से कहती। पर तूने तो हमारी नाक कटवा दी।,” रोते – रोते उमा भाभी ने फोन काट दिया।

राधा अभी अपनी बात कह ही नहीं पाई थी। वह कैसे बताती कि इश्क जात – पात को नहीं देखता। वह तो बस हो जाता है। और जब होता है तो सब नियम तोड़ कर अपनी मंजिल को लक्ष्य कर निशाना साधता है। पर वह जानती थी कि अभी मां का ही गुस्सा नहीं ठंडा है तो पिता जी का तो सातवें आसमान पर होगा।

कई दिन बीते पीछे बृजमोहन जी मोहन भैया के घर सुलह की बात करने आए। वह अपनी बिरादरी का गांव में ही नहीं इलाके में रसूखदार आदमी था। ऊंची जाति के लोग भी उसके ओहदे की तासीर के चलते ऊंची जुबान में उन से बात नहीं करते थे। पर वे दिल और व्यवहार के बहुत अच्छे थे। उन्होंने ही उस दिन कोर्ट में राधा और पिंकू की शादी करवाई थी। पिंकू को फोन पर जब राधा ने अपनी शादी की बात बताई थी तो उन्होंने इन दोनों की बाते सुन ली थी। सारी सेटिंग फोन पर इन्हीं की छत्र छाया में संपन्न हुई थी।

“अब क्या लेने आए हो बृजमोहन साहब? बेटी को तो ले गए हो बहला – फुसलाकर । उससे पेट नहीं भरा क्या? और क्या हमारी किरकिरी करने में अपनी ऊंची समझते हो?” मोहन भैया ने अनमने मन से कहा।

“नहीं मोहन बाबू। हम किसी को नीचा दिखाने नहीं आए हैं।बस सुलह करने आए हैं।” बृजमोहन शांति से बोले।

“काहे की सुलह ? कोई सुलह नहीं होगी। जाओ, चले जाओ यहां से। हमारे लिए वह मर गई और उसके लिए हम।” मोहन भैया झल्ला कर बोले। यहां गांव वालों ने मोहन भैया की बात की दात दी। उससे वे और शेर बन बैठे। उन्हें लगा कि अब गांव वाले मेरा आदर फिर से वैसे ही करेंगे, जैसे पहले करते थे।

“देखो मोहन बाबू! अब छोड़ो भी सारा गुस्सा। बच्चों ने प्यार किया कोई पाप नहीं किया। अब दोनों की कानूनी शादी भी हो चुकी है। अब तो उन्हें माफ कर लो और अपना लो। बच्चो को जितनी ही जरूरत हमारी है, उतनी ही आपकी भी है।” बृजमोहन पुनः शांति से बोले।

“क्या बात करते हो बृजमोहन साहब? अपने ओहदे और पैसों की धौंस मत जमाना।किस कानून की बात करते हो तुम? वही कानून तो तुम्हे जाति – पाती के प्रमाण पत्र बांटता है। फिर हम कैसे तुम्हारे साथ उठना – बैठना मंजूर करें?” मोहन भैया त्योरियां चढ़ाते हुए बोले।

“देखो मोहन भैया। इस संसार में कुदरत ने दो ही जातियां बनाई है। एक स्त्री और दूसरी पुरुष। वही सृष्टि के घटना चक्र को चलाने में सदा से कुदरत का साथ दे रही हैं। बाकी तो सब मनुष्य मन की खुरापात है। इसलिए इस जात – पात के विवाद में न पड़ कर बच्चों के बारे में सोचो।” बृजमोहन ने शांति से समझाते हुए से बोला।

“अपना यह ज्ञान कहीं और सुनाना, यहां नहीं। बड़े आए उपदेश देने। जब तुम एस. सी. का प्रमाण पत्र ले कर आरक्षण लेने के लिए अपनी जाति बड़े फखर से बताते हो, तब यह उपदेश नहीं देते? तब नहीं कहते कि हमें जाति प्रमाण पत्र नहीं चाहिए। हमें मानव होने का प्रमाण पत्र दो। अब अपनी जाति स्वीकारने में हेठी समझ रहे हो।” मोहन भैया ने अपने मन की सारी भड़ास उतार दी।

“अरे भाई क्यों बात उलझा रहे हो? मैं मानता हूं कि आरक्षण होना ही नहीं चाहिए।हो भी तो जातियों के आधार पर न हो। आर्थिक आधार पर हो। यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। ऐसा अगर समय पर हो गया होता तो इन आजादी के सत्तर साल में हमारे बच्चों ने आपसी रिश्ते कायम कर जात – पात का रोग ही मिटा दिया होता।पर यह तो राजनीतिक मसला है। इसमें हम क्या कर सकते हैं? और फिर इन बच्चों का तो कोई दोष ही नहीं।” बृजमोहन ने पुनः समझाते हुए से कहा।

“अच्छा! तुम कुछ नहीं कर सकते हो या कि जानबूझ कर कुछ करना ही नहीं चाहते? बृजमोहन साहब तुम जैसे रसूखदार जब इस बुराई का विरोध करें ना, सरकारों को रातों रात सब बदलना पड़ेगा। हम तुम्हारी चालाकियों को खूब समझते हैं। उससे पहले कि गांव वाले तुम्हारे साथ कुछ बुरा कर डालें, अपने रास्ते चलते बनो।” मोहन भैया विलक्षण मुद्रा में बोले।

बृजमोहन समझ गए कि इन तिलों से तेल नहीं निकले गा।अपने छोटे को इशारा कर घर को चले गए।

वर्षों बीत गए। वहां राधा और पिंकू के एक बेटी हुई। वह चार – पांच साल की हो गई थी। अब सुंदर बहू का मोह धीरे – धीरे राधा की सास से उतर रहा था। हररोज दोनों में घर के किसी न किसी कामकाज पर नोक – झोक होती ही रहती थी। उस दिन सास ने राधा को बहुत खरी – खोटी सुनाई थी,” तेरे मां – बाप ने तुझे रखा कहां था? खाना भी बनाना नहीं सिखाया। किसी भी काम की नहीं है डायन। मेरे बेटे को डोरे डाल कर अपना उल्लू सीधा कर गई बेईमान।” और भी न जाने क्या कुछ?

राधा अपनी बच्ची को उठा कर दुखी हो कर अपने पिता के यहां चली आई। सोचा मां – बाप माफ कर लेंगे। शाम के समय में जब वह अपने मायके पहुंची तो उसके पिता आंगन में बैठे थे। उससे पहले कि वह अपना दुख कहती। मोहन भैया ने आते ही उसे डांटना शुरू किया,
” क्यों आईं है यहां अब नालायक ? रह गई है कुछ कसर क्या?”
राधा रो रही थी। उसकी नन्ही सी मुन्नी उसके आंसू पोंछ रही थी और तोतली आवाज में बोल रही थी,” तुप तरो मम्मा! तुम तियुं डो डही हो? यह तुम्हे डांट रहे हैं। ये कौन है?”

मोहन भैया की ऊंची आवाज सुन कर घर के सब बाहर आ गए। पड़ोस के लोग भी बाहर निकल आए। राधा अपराधिनी की तरह नजरे झुकाए खड़ी थी।

“चुप भी कर अब मोहन। बस बोले ही जा रहा है। देखता नहीं कि कितने दिनों बाद बेटी आईं है?” चाची ने डांटते हुए कहा। और राधा को गले से लगा कर हालचाल पूछा।

दोनों को बतियते और रोते हुए उमा भाभी की आंखे भी भर आई। लोगों को बाहर देख कर राधा को दोनों मियां बीबी ने पुनः डांटना शुरू किया। डांटते – डांटते अंदर चले गए। सब लोग बाहर दात दे रहे थे। मोहन बिल्कुल ठीक बोल रहा है। इस कुलटा ने तो सारे गांव की नाक काट ली। उधर चाची ने सब को डांटा और भगा दिया।

अंदर भैया और भाभी आपस में मशविरा कर रहे हैं कि इसे रात को रखना कहां है? लोक लाज से बचने के लिए उसे बेटी के साथ नीचे वाले कमरे में रखने का निर्णय हुआ। सोचा धीरे -धीरे लोग भूल जाते हैं, तब सब ठीक होगा।

उस रात राधा को निचले कमरे में रखा गया। सुबह जब राधा की नन्ही बच्ची ममी – ममी चिलाने लगी तो सब निचले कमरे की ओर दौड़े। देखा वहां राधा थी ही नहीं।बच्ची को पूछा गया कि ममी कहां गई? पर उसे कुछ भी मालूम नहीं था। वह तो बस रो रही थी।

शालू रोता – रोता आया,” अरे पापा, पापा दीदी वहां चटान के पास पड़ी है। उसके मुंह से खून निकल रहा है।”
सब वहां भागे – भागे जाते हैं। पर राधा अब चली गई थी।

बच्ची ममी से चपटना चाह रही थी। उसे दूर ले जाया गया। सब रो रहे हैं। मोहन भैया भी फुट – फुट कर रो रहे हैं। शायद राधा ने रात को बच्ची को सुला कर उस पास वाली चटान से कूद कर अपनी जान दे दी थी। वह कुछ सहन नहीं कर पाई थी शायद। उसकी सहन शक्ति जबाव दे गई होगी। वहां सास की खींच – खींच और यहां उसे निचले कमरे में रखा जाना शायद रास नहीं आया। वह अंदर ही अंदर कुढ़ कर अपनी जान दे देती है।

उधर शहर से राधा के पति व ससुर घर पहुंचते हैं। उनसे राधा की सास ने कहानी उल्टी बता दी थी। पोस्ट मार्टम हुआ और लाश जाला दी गई। पुलिस केस दोहरा हो गया था। राधा के घर वालो ने मोहन भैया का केस किया और मोहन भैया ने घरेलू हिंसा का केस किया। दोनों परिवारों में आग लगी है। यहां पिंकू भी बहुत दुखी है।वह तो शायद दूसरी शादी करके संभल जाएगा पर बेचारी उस नन्ही सी बेटी की मां को कौन वापिस लाएगा? वह हर रोज मायूस होकर उस रास्ते को देखती रहती है, जहां से उसकी मां को जलाने के लिए ले जाया गया था।

घोषणा :- यह मेरी मौलिक और स्वरचित कहानी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — यह एक प्रेम कहानी है। इस कहानी में हेमराज ठाकुर जी ने भारतीय समाज की जात पात की रूढ़ भावना के चंगुल में जकड़े होने के उन कारणों पर भी प्रकाश डाला है, जिन के कारण आज की युवा पढ़ी लिखी पीढ़ी भी उसी छुआ छूत के जंजाल में फंसी पड़ी है। लेखक ने यह सिद्ध करने की कोशिश भी की है शायद कि आज़ादी के 74 सालों बाद भी भारतीय समाज जात पात की निकृष्ठ विचारणा से बाहर नहीं आ पाया है। इतना ही नहीं प्रेम के पाश में बंधे जोड़ो में यदि विजातीय प्रेम विवाह बच्चों के द्वारा किया जाता है तो उच्च वर्गीय समाज के अभिभावक अपनी सन्तान से नाता ही तोड़ देते हैं पर इस सामाजिक बुराई का विरोध नहीं कर पाते। चाहे उन्हे अपनी संतानों की जान ही क्यों न खोनी पड़े। सामाजिक नियमों और प्रतिष्ठाओं का इस सम्बन्ध में इतना प्रभाव है कि देश का कानून भी इसके आगे कुछ नहीं कर पाता। लेखक ने पात्रों के माध्यम से यह भी सिद्ध करने की कोशिश की है कि इस समस्या का मुख्य कारण वर्तमान पढ़े लिखे समाज के सामने जातिगत आरक्षण भी है शायद। संविधान में तो इस भेद भाव को मिटाने की बात की गई है और निम्न समझा जाने वाला समाज संविधान की इस दलील को पूर्ण रूप से लागू करने की मांग भी समाज से करता है। परन्तु आरक्षण छोड़ने को तैयार नहीं है। जबकि संविधान में आरक्षण का प्रावधान मात्र 10 साल तक प्रभावी रखने के निर्देश संविधान निर्माताओं ने दिए थे। इधर उच्च वर्गीय समाज को इस प्रथा से बाहर आने को कहा जाता है तो वह इसी जातिगत आरक्षण की बात डंके की चोट देकर करता है। एक छोड़ने को तैयार नहीं और दूसरा मानने को तैयार नहीं। इसी कारण नई और पढ़ी लिखी पीढ़ी में भी यह भावना सब कुछ जानते और समझते हुए भी निरंत बढ़ती ही जा रही है। लेखक का मानना है कि संसार में मात्र दो ही जातियां हैं, एक स्त्री और दूसरी पुरुष। जो प्रकृति ने सृष्टि संचालन के उद्देश्य से अपना सहयोग करने के लिए बनाई है। बाकी सब मानव मस्तिष्क की खुराफत है। अतः इस कहानी से हमे यह संदेश मिलता है कि भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए हमे भारत से जात पात के भेद भाव को जड़ से मिटाना होगा। पुनः वैदिक दर्प को स्थापित करना होगा।

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यह कहानी (दास्तान ए जात पात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बस लिखना है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बस लिखना है। ♦

मैं कवि हूं कविताएं लिखता हूं, सुनाता हूँ,
मेरी लेखनी बेबाक कुछ न कुछ कह जाएगी।
लोगों की सम्पत्ति संजोकर भी ढह जाएगी,
मेरी लेखनी की ज़ुबान थाती बन कर रह जाएगी।

लोग लगे हैं सब धन दौलत ही बटोरने,
मैं भाव, कल्पना और शब्द बटोरता हूं।
लोग लगे हैं औलादों को विरासत छोड़ने,
मैं सदियों दर सदियों भाव छोड़ता हूं।

बिकती है इस दुनियां में राख भी आज,
लकड़ियों के मुकम्मल जल जाने के बाद।
पर विडम्बना देखिए इस दुनियां में जनाब,
बिकती नहीं तो सिर्फ कवियों की किताब।

मैं निराश नहीं हूं खुद की बदहाली के ख्याल से,
मुझे समाज के भटक जाने का डर सता रहा है।
है नहीं मेरा कोई खून का रिश्ता इस दुनियां से,
फिर भी मुझे इसकी चिन्ता का घुन खा रहा है।

है नहीं याद यहां अपनी चौथी पीढ़ी के पुरखे किसी को,
फिर भी आदमी भगवान के होने पर सवाल उठा रहा है।
निकम्मी सोच की दात देनी होगी, है याद नहीं पुरखे ही,
तो क्या फिर तुम्हारा खानदान हवाओं से ही आ रहा है।

यकीन मानिए साहब भूल जाएगी बाप को भी दुनियां,
गर जीने का और आगे बढ़ने का यही… तरीका रहा।
मैं रहूं या न रहूं इस दुनियां में तब ए मेरे अजीज दोस्तो,
मेरी ओर से निशानी हर अल्फाज मेरा तुम्हें लिखा रहा।

सिर्फ बुद्धि – धन के बल पर ही इठलाना इतना,
ए जमाने! खुद ही बता कि जायज कितना है?
हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में,
थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।

पड़ता नहीं है कोई फर्क मुझे किसी के सुनने,
या न सुनने से, मुझे कौन सा महान दिखना है?
कवि हूं मैं प्रत्यक्ष द्रष्टा समाज की हर घटना का,
इसी लिहाज से ही तो मुझे सच बस लिखना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — एक कवि व लेखक सदैव ही सत्य को लिखने की कोशिश करता है वह भी बिना किसी दबाव के। इस संसार के लोग तो धन संपत्ति को इकट्ठा करने में ही सारा जीवन बिता देते है और अंत समय में उनके साथ कुछ भी नहीं जाता है। माना की एक कवि व लेखक के पास धन संपत्ति कम होती है दुनिया की नज़र में, लेकिन एक कवि / लेखक की लेखनी (मेरी लेखनी की ज़ुबान थाती बन कर रह जाएगी।) सदैव के लिए उसे अमर कर जाएगी। विडम्बना तो देखिये की आजकल के लोग लगे हैं सब धन दौलत ही बटोरने में। मैं भाव, कल्पना और शब्द बटोरता हूं। लोग लगे हैं औलादों को विरासत छोड़ने में, आने वाली पीढ़ी के लिए, मैं सदियों दर सदियों भाव छोड़ता हूं। “आजकल की पीढ़ी को नहीं याद यहां अपनी चौथी पीढ़ी के पुरखे किसी को, फिर भी आदमी भगवान के होने पर सवाल उठा रहा है। निकम्मी सोच की दात देनी होगी, है याद नहीं पुरखे ही, तो क्या फिर तुम्हारा खानदान हवाओं से ही आ रहा है।” आजकल की पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर भूलते जा रहे है अपनी ही प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को। याद रखें- हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में, थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।

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यह कविता (बस लिखना है।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत। ♦

किसी भी देश के गौरव के वैभव की गाथा यदि समग्र रूप से कोई गा सकता है तो वह है उस देश की राष्ट्रभाषा का स्वरूप। बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि हमारे भारत देश की आज दिन तक कोई राष्ट्रभाषा निर्धारित ही नहीं हो सकी। भारत देश को आजाद हुए आज 7 दशक से ज्यादा समय हो चुका है परंतु इस देश की विडंबना देखिए कि अभी तक हम इस देश के गौरव का गुणगान करने वाली इसकी मातृ भाषा हिंदी को न्याय नहीं दिला सके।

हिंदी भाषा को राजनीति का शिकार बना दिया।

सन 1949 में अगर इस दिशा में कार्य कुछ हुआ भी तो वह भी अधूरा ही हुआ। भारत के अधिकतर लोगों द्वारा बोली जाने वाली और समझी जाने वाली हिंदी भाषा को राजनीति का शिकार बना दिया गया और इसे इस देश की अपनी भाषा होने के बावजूद विदेशी भाषा अंग्रेजी के समकक्ष भारत की मात्र राजभाषा ही स्वीकार किया गया।

यह सत्य किसी से छुपा नहीं है कि जब आर्यवर्त या जंबूद्वीप की राष्ट्रभाषा संस्कृत हुआ करती थी तो इस देश का अपना एक समृद्ध साहित्य था और उस भाषा में लिखित नाना प्रकार की विधाओं के ज्ञान विज्ञान थे। उस भाषा के बल पर भारत विश्व गुरु की उपाधि से सुसज्जित था।

उस समस्त ज्ञान-विज्ञान का लाभ मात्र भारतवासी ही नहीं लेते थे बल्कि उनका लाभ प्राप्त करने के लिए हयुत्संग और फाह्यान जैसे लोग विदेशों से भारत के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। समय बदला ,परिस्थितियां बदली, भारत पर हूणों,मंगोलों,डचों,तुर्कों, अफगानों आदि ने अपने आक्रमण किए।

भारत के इस गौरवशाली वैभव को धीरे-धीरे तोड़ने मरोड़ने की कोशिश।

भारत के इस गौरवशाली वैभव को धीरे-धीरे तोड़ने मरोड़ने की कोशिश की गई। 1000 ईसवी के आसपास शौरसेनी और अर्धमाग्धी अपभ्रांशों से विकसित हिंदी का स्वरूप स्वतंत्र रूप से साहित्यिक क्षेत्र में दिखने लगा। साहित्य संदर्भों में प्रयोग होने वाली यही भाषाएं बाद में विकसित होकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के रूप में अभिहित हुई।

इस बीच भारत में मुगलों का आगमन हुआ। मुगल भारत में स्थाई रूप से बस गए। इससे पूर्व के आक्रमणकारी आक्रमण करते रहे और यहां से पुनः स्वदेश लौटते रहे। परंतु मुगल शासकों ने जिस तरह से भारतीय राजनीति को अपने हाथों में ले लिया, उससे भारत में अपभ्रंशों से विकसित एवं पलवित होने वाली हिंदी का स्वरूप हिंदुस्तानी में बदल गया।

यह सच है कि 1000 ईसवी के आसपास डिंगल पिंगल का बोलबाला भारतीय साहित्य में रहा हिंदी साहित्य का आदिकाल अधिकतर इसी दौर का है। मध्यकाल तक भक्ति साहित्य का वैभव हिंदी की विभिन्न उप भाषाओं ने कुछ यूं सुसज्जित कर दिया कि उसे चाह कर भी हम सदियों तक भुला नहीं सकते।

मिश्रित भाषा।

रीतिकाल तक आते-आते मुगल शासकों की शासकीय कामकाज की भाषा अरबी फारसी होने के कारण भारतीय जनमानस की आमजन भाषाएं उसमें मिश्रित हो गई जिस मिश्रित भाषा को हिंदुस्तानी का नाम दिया गया। जो भारतीय जनमानस की भाषा अपना एक राष्ट्रीय नया स्वरूप तैयार कर रही थी उसने एक नया मोड़ ले लिया। अर्यवर्त या जंबूद्वीप की राष्ट्रभाषा संस्कृत का प्रभाव धीरे- धीरे क्षीण होने लगा और हिंदुस्तानी ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया। जो हिंदी शौरसेनी और अर्धमाग्धी से 1000 ईस्वी के आसपास विकसित हुई थी उसको राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका।

हिन्द – यूरोपीय भाषा।

हिन्द – यूरोपीय भाषा परिवार से होती हुई हिंदी – ईरानी, हिन्दी – आर्य, संस्कृत, केंद्रीय क्षेत्र (हिन्दी), पश्चिमी हिंदी , हिंदुस्तानी और खड़ी बोली से हिंदी का रूप लेने वाली वर्तमान हिंदी भाषा लगभग 18वीं शताब्दी में मूलतः अस्तित्व में आई। इस नव विकसित हिंदी भाषा के स्वरूप को देवनागरी में ही लिखा जाने लगा जो संस्कृत की मानक लिपि थी और है।

भारतेंदु और द्विवेदी युग।

भारतेंदु और द्विवेदी युग ने इस नव विकसित भाषा को और दृढ़ता प्रदान की। हिंदी भारतीय साहित्य की एक मानक भाषा उभर कर सामने आई। भारतीय जनमानस की इस भाषा ने धीरे – धीरे भारत के अधिकतर प्रांतों में अपना अधिकार जमाया। इस बीच भारत में शासन कर रहे अंग्रेजों ने भी अपनी राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी के प्रचार – प्रसार में भारत में कोई कसर नहीं छोड़ी।

पुरातन वैदिक गुरुकुल परंपरा को खंडित कर नवीन शिक्षा नीति।

1936 में लार्ड मैकाले ने भारत की पुरातन वैदिक गुरुकुल परंपरा को खंडित कर नवीन शिक्षा नीति को इस उद्देश्य से स्थापित किया कि भारत के लोगों को न तो ठीक से हिंदी समझ में आ सके और न ही अंग्रेजी ही समझ में आ सके। अपने शासन को चलाने के लिए उन्हें सस्ते लिपिकों की जरूरत थी, जिन्हें तैयार करने में वे लगभग सफल भी हुए।

धीरे – धीरे तथाकथित अंग्रेजी शिक्षित भारतीयों के भीतर भी अंग्रेजी का ऐसा भूत सवार हुआ कि थोड़ी बहुत अंग्रेजी जान लेने के बाद वह अपने आपको अंग्रेजी का विद्वान समझने लगे और जो हिंदी बोलने वाला आम भारतीय था उसको तुच्छ एवम हेय समझने लगे। यह चलन भारत के आजाद होने तक इतना बढ़ गया था कि सरमायादार लोग दूर देशों में जाकर के अपने बच्चों को अंग्रेजी की तालीम लेने के लिए भेजने लगे।

फिर वे चाहे हिंदू थे या मुस्लिम। इस प्रक्रिया में सभी अपने देश की मातृभाषा हिंदी के वजूद को स्थापित करना ही भूल गए, जबकि भारत की आजादी के वक्त तक हिंदी में बहुत कुछ लिखा जा चुका था जो भारत के गौरव गान के लिए किसी भी दृष्टि से कम नहीं था। इस दृष्टि से शायद 1949 में हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने की मुहिम तेज हुई थी परंतु वहां हिंदी को पुनः राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया और हिंदी को मात्र राजभाषा का दर्जा दिया गया।

इसके पीछे साजिश शायद यह भी रही हो कि भारत के जो तथाकथित अंग्रेजी शिक्षित लोग मानसिक रूप से अभी भी अंग्रेजों के गुलाम ही थे, उन्होंने जानबूझकर यह चालाकी की हो कि हिंदी जानने और बोलने वाले लोगों के ऊपर राज करने के लिए यदि अंग्रेजी भाषा को हिंदी के समकक्ष रखा जाए तो अच्छा रहेगा। उससे उन तथाकथित अंग्रेजी शिक्षित सरमायादारों की संतानें भारत की हिंदी भाषी जनता पर शासन करती रही और भारत की हिंदी भाषी आम जनता उनकी सेवा करती रही।

भले ही अंग्रेज भारत से चले गए थे परंतु अंग्रेजी के मानसिक रूप से गुलाम ये भारतीय अंग्रेज लंबे समय तक भारत की इस हिंदी भाषी जनता को मूर्ख बनाने में कामयाब रहे। अब यदि यह कहा जाए कि आप की बात अतिशयोक्ति हो गई है तो मैं स्पष्टीकरण जरूर देना चाहूंगा।

क्यों राजभाषा होने के बावजूद भी भारत की न्यायिक व्यवस्थाओं के पत्राचार, राजस्व विभाग सम्बन्धी पत्राचार और चिकित्सीय व्यवस्था संबंधित शिक्षा प्रणाली हिंदी भाषा में न की गई? क्या यह एक सोचा समझा षड्यंत्र नहीं था? या फिर इसलिए कि आम जनमानस की जन भाषा में यदि इन व्यवस्थाओं की बातों को लिख दिया जाएगा या पढ़ा दिया जाएगा तो फिर तथाकथित अंग्रेजी शिक्षित लोग और उनकी संतान लोगों को मूर्ख बनाने में कामयाब कैसे हो पाएगी? उनकी रोजी रोटी कैसे चल पाएगी?

खैर कुछ भी हो, आज परिस्थितियां कुछ और ही है। आज हिंदी सिर्फ भारत के ही अधिकतर क्षेत्र में नहीं बोली जाती परंतु वैश्विक धरातल पर इसने अपनी एक विशेष पहचान बना ली है। इसलिए आज यह बहुत जरूरी हो जाता है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए। यह सिर्फ आधारहीन एवं तथ्य से हटकर बात नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बहुत लंबी – चौड़ी तथ्यपरक बातों की सूची है: —

  1. 2011 की भारतीय जनगणना के अनुसार भारत की 57.1% जनता हिंदी को बोल और समझ सकती है। जिसमें 43.63% भारतीयों ने तो हिंदी को अपनी मातृभाषा ही घोषित किया है। यह एक प्रबल आधार है कि भारत की अधिकतर जनता हिंदी बोलती है और समझती है। इस दृष्टि से हिंदी को अब भारत की राष्ट्रभाषा घोषित कर देना चाहिए ताकि भारत का आम नागरिक वैधानिक, प्रशासनिक, कार्मिक, व्यवहारिक और शैक्षिक आचार – विचारों को अपनी भाषा में प्राप्त कर सकें।
  2. हिंदी भाषा बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर के साथ – साथ उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली आदि जनसंख्या बाहुल्य क्षेत्रों की मात्र संपर्क भाषा ही नहीं है बल्कि वाच बाहुल्य के साथ – साथ यहां इन क्षेत्रों की रोजमर्रा की व्यवसायिक भाषा भी है।
  3. आज हिंदी सिर्फ भारत में ही नहीं बोली जाती है परंतु भारत के साथ-साथ कई अन्य देशों में भी इसे बोलने और समझने वालों की संख्या कम नहीं है। एक आंकड़े के मुताबिक हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बोली जाने वाली भाषाओं में दूसरा दर्जा प्राप्त है। आज हिंदी पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, मंयांमार, इंडोनेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, चीन, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, मारीशस, यमन, युगांडा, त्रिनाड एण्ड टोबैगो, कनाडा, अमेरिका तथा मध्य एशिया आदि कई देशों में बोली जाती है और समझी जाती है। यदि देखा जाए तो आज हिंदी लगभग 80 करोड से ज्यादा लोगों के द्वारा बोली और समझी जाती है।
    — इन देशों में से चीन में 6, जर्मनी में 7, ब्रिटेन में 4, अमेरिका में 5, कनाडा में 3, रूस, इटली, हंगरी, फ्रांस और जापान में 2 – 2 विश्वविद्यालयों में आज हिंदी पढ़ाई जाती है। एक आंकड़े के मुताबिक लगभग 150 के करीब – करीब विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज हिंदी को पढ़ाया जा रहा है। ऐसे में भारत को हिंदी को अपनी राष्ट्रीय भाषा घोषित करने में आखिर दिक्कत ही क्या है? भारत से बाहर के लोग आज हिंदी में कई सत्संग और अध्यात्म की चर्चाएं सुनने और समझने भारत में आते हैं और भारत से बाहर हमारे हिंदी भाषी मनीषियों को हिंदी में सत्संग और चर्चा परिचर्चा करने के लिए अपने देशों में ले जाते हैं। बहुत से विदेशी लोग बाहर से आकर भारत में भी हिंदी को समझने और जानने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में निश्चित है की हिंदी में कुछ तो खास है जो इसे समझने की और जानने की इतनी लालसा गैर हिंदी भाषी लोगों में भी निरंतर बढ़ती जा रही है। फिर भारतवासी और भारत की राजनीतिक शक्तियां क्यों हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने से परहेज कर रही है?
  4. पाठकों की जानकारी के लिए यह भी बताना उचित समझ रहा हूं कि आज सरकार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए तो प्रयास कर रही है परंतु अपने देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की ओर कोई भी ठोस कदम ठीक से नहीं उठाया जा रहा है।वैसे यूनेस्को की 7 भाषाओं में हिंदी पहले से ही शामिल है, परंतु फिर भी सरकार का इसे संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए प्रयास निरंतर जारी है।
  5. इतना ही नहीं विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार हिंदी विश्व की 10 शक्तिशाली भाषाओं में से एक है। यह बात भी अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक आचार व्यवहार की दृष्टि से हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान देने की पैरवी पुरजोर करती है। यदि हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की भाषा में मानक रूप प्राप्त हो जाता है तो निश्चित ही भारत के व्यापार एवं आर्थिक मोर्चों में भी हिंदी अपनी अहम भूमिका निभाएगी। परंतु इसके लिए हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देना बहुत ही जरूरी है।
  6. एथ्नोलॉग के अनुसार हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। यह बात भी हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए प्रबल सहयोग करती है। यह बात उन तथाकथित अवधारणाओं का भी खंडन करती है कि ‘अंग्रेजी विश्व की भाषा है, इसलिए इसे महत्व देना जरूरी है। हिन्दी तो कहीं स्टैण्ड ही नहीं करती।’इतना ही नहीं हिंदी व संस्कृत की लिपि को संगणकीय टंकण प्रणाली में वैज्ञानिक लिपि भी सिद्ध कर लिया गया है। ऐसे में हिन्दी को भारत में यूं नकारना कहीं से भी ठीक नहीं है।
  7. इधर आबूधाबी में हिंदी को 2019 में अपने वहां न्यायालय की तीसरी भाषा घोषित कर दिया गया है। परंतु एक भारत है कि अपने ही देश की मातृभाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के मामले में संजीदगी नहीं दिखा रहा है।

कई बातें हैं जो हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत को स्पष्ट करती है।

ऐसी कई बातें हैं जो हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत को स्पष्ट करती है परंतु यह सब भारत की राजनीतिक शक्तियों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। आज भारतवासियों की हालत यह हो गई है कि भले ही हम अंग्रेजी में एम ए क्यों ना हो परंतु जब बात करने की बारी हो तो वह हिंदी में ही की जाती है। यह जरूर है कि कुछ लोग अपना रौब झाड़ने के लिए उस हिंदी में अंग्रेजी मिक्स कर देते हैं परंतु वह खिचड़ी न ही तो ठीक से हिंदी का मान – सम्मान कर पाती है और न ही तो अंग्रेजी का। बात यह नहीं है कि हमें अंग्रेजी से नफरत है।

अंग्रेजी को भी पढ़ा जाना चाहिए और समझा जाना चाहिए। हर भाषा का मान – सम्मान करना हमारे देश की संस्कृति रही है परंतु किसी भी देश के उत्थान एवं विकास के लिए उस देश की अपनी राष्ट्रभाषा का होना नितांत आवश्यक होता है। देश कितनी भी तरक्की कर लें, परंतु जब तक उसके पास अपनी राष्ट्रभाषा नहीं है तब तक उस तरक्की का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

Conclusion:

अपने राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास को ही न भूल बैठे।

कहीं ऐसा न हो कि हम हिंदी का तिरस्कार करते – करते अपने राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास को ही भूल बैठे। यदि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत नहीं है तो फिर क्यों वे सारे कारोबार हिंदी में किए जाते हैं जिनसे राष्ट्रीय खजाने में निरंतर बढ़ोतरी होती रहती है।

उदाहरण के लिए फिल्मी कारोबार हिंदी में ही किया जाता है। आम जनमानस से संपर्क साधने के लिए राजनीतिक पार्टियां हिंदी में ही अपनी बातचीत करती है।अधिकतर समाचार पत्र – पत्रिकाएं तथा चैनल सब हिन्दी में ही कार्य करते हैं। बस हिंदी में अगर कुछ होता नहीं है तो वह सरकारी कार्यालयों का पत्राचार नहीं होता है। न जाने क्यों इतना महत्व सरकारी पत्राचार में अंग्रेजी को दिया जाता है जब कि हिंदुस्तान आज आजाद हो चुका है।

हमारे भारत के जन समुदाय में एक ट्रेंड सा बन चुका है कि पड़ोसी का बच्चा अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने जा रहा है तो मैं भी अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में ही पढ़ाऊंगा। भले ही वह वहां कुछ सीखे या न सीखे परंतु सोसाइटी की नकल करना हमारी आदत बन गई है। जबकि सत्य यह है कि बच्चा जो कुछ अपनी मातृभाषा में सीखता है वह किसी दूसरी भाषा में नहीं सीख सकता परंतु एक हम है कि अपनी जिद पर अड़े हुए हैं।

हां वर्तमान सरकार ने एक मेहरबानी जरूर की है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में अंग्रेजी को पांचवी तक मात्र एक विषय के रूप में पढ़ाने का प्रावधान किया है न कि माध्यम के रूप में। परंतु क्या हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए बिना इस प्रकार के प्रयासों का भी कोई महत्व सिद्ध हो सकेगा या नहीं? इस बात पर हमें आत्म चिंतन और मंथन करने की नितांत आवश्यकता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — अंग्रेजो से आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा की मान्यता आधिकारिक रूप से क्यों दर्ज नही हुआ, हिंदी को उसका सम्मान क्यों नहीं मिला? हिन्दी राष्ट्रभाषा के महत्व, गुणों और प्रभाव को बताया है। हिन्दी हर भारतीय के दिल से निकलने वाली भाषा हैं। हिन्दी भाषा दिल को दिल से जोड़ने का कार्य करती है। एकलौती हिन्दी भाषा ही है जिसमे अपनापन है दुनिया की किसी भी अन्य भाषा अपनापन का स्थान नहीं।

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यह लेख (हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आज की जरूरत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज की जरूरत। ♦

वैचारिक लेख —

वर्तमान में भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में एक भयानक महामारी ने अपना तांडव पुरजोर मचाया है। इस चपेट में विश्व का बड़े से बड़ा देश अपनी समस्त ताकतों को विफल-सा हुआ पा रहा है। ऐसे में जब हररोज हजारों लोग काल के गाल में समाते जा रहे हैं तो डर भला किसे नहीं लगेगा।

बस डर नहीं रहे हैं तो कुछ सर फिर लोग और दिल्ली के निजामुद्दीन के मरकज में जमा हुई तब्बलिकी जमात। शायद उन्हें मृत्यु ने मानव जाति के विनाश का जिम्मा सौंपा हो या फिर यह उनके जहन जनित उस अल्लाह की शरणागति का मनमुखी खुरापात है जो किसी पवित्र धार्मिक ग्रंथ में नहीं मिलता है।

अब लीजिए आप पवित्र कुरान शरीफ़ को या फिर इस्लाम धर्म के जो चार पवित्र ग्रंथ माने जाते हैं “पवित्र इंजील, जबूर, तोरात और स्वयं पवित्र कुरान मजीद।” इनमें कहीं कोई जमाती यह सिद्ध कर दें कि वहाँ खुदा की ऐसी आज्ञा है कि किसी को जानबूझ कर मारने या फिर अनजाने में मारने से अल्लाह खुश होता है।

तो मैं मान जाऊंगा कि जिहाद जैसी, जो सोच इन लोगों ने अपनाई है और अपने अनुयायियों को भी उसका अनुसरण करने को कहते हैं; वह सच में ही वाजिब है। पर शर्त है कि यह सिद्ध करने के लिए ‘देवबंध’ जैसी संस्थाओं की स्वयंभु सोच का हवाला न दिया जाए।

मक्का की पवित्र दरगाह की मूल सामग्री का ही सहारा लिया जाए। कोई खुदा, अल्लाह, गॉड, वाहे गुरु, तीर्थंकर या भगवान किसी के प्राणों को लेने की बात नहीं करता है। चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो। हाँ यदि कोई करता है तो वह भगवान हो – ही नहीं सकता। क्योंकि किसी को काल के सिवा कोई मारने वाला शैतान कहलाता है भगवान नहीं।

चलो लगे हाथों जिहाद समझ लें। जेहाद पाक कुरान में अंकित है और वह सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय के लोगों के ही करने की नहीं है बल्कि समूचे मानव प्राणी को करनी चाहिए।

जिहाद का मतलब संघर्ष करने से है न की साज़िश और खून खराबा करने से। पवित्र कुरान कहता है कि जो लोग तुझे उस एक खुदा की इवादत से भटका कर किसी दूसरे की उपासना करने को मजबूर भी करता है तो उसका प्रभाव भले ही कितना ऊंचा हो, तू उसकी नहीं मानना।

तू अपने धर्म के लिए अपनी जान दे देना पर दूसरों को कष्ट मत देना। अब इन्होंने इसका अर्थ उल्टा ले लिया कि अपना धर्म बचाने के लिए दूसरों की जान ले लेना पर अपने धर्म को बचाए रखना। असल में ऐसा तो हजरत मुहम्मद साहब बयाँ ही नहीं करते।

अब रही धर्म की बात तो यह भी हमें समझना होगा कि धर्म क्या होता है और अध्यात्म क्या होता है? धर्म असल में किसी समुदाय या समाज के सामाजिक जीवन के जीने के तौर – तरीके का नाम है और अध्यात्म आत्मा और परमात्मा के मूल तत्व को जानने का नाम है।

दरअसल हुआ यूं कि लोग धर्म को ही अध्यात्म समझ बैठे। फिर चाहे वह हिन्दू धर्म की बात हो या फिर कोई और धर्म की बात हो। इसीलिए हर धर्म के नियंताओं ने अपने-अपने धर्म के संचालन हेतु किसी नियम का आगाज किया और उन्हें किसी ग्रंथ की सूरत दे दी। यह सच है कि वे नियंता पवित्र भावी थे और उन्होंने उन्हीं ग्रंथो में अध्यात्म को भी भर दिया। यह महज समाज को अनुशासन में बांधने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था।

अगर यूं कहा जाए कि “धर्म अध्यात्म का शरीर है और अध्यात्म उस देह की आत्मा तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह बात यहाँ से भी प्रमाणित होती है कि खुदा, भगवान, रब्बा कहो या प्रकृति, उसने तो समूचे जीव जगत को उत्पन किया।”

जब मानव प्राणी के अलावा किसी जीव जगत का कोई सामाजिक नियम ही नहीं है तो मानव का ही क्यों? शायद इसलिए कि उसमें बुद्धि है और वह भी इस प्रकार से उस बनाने वाले ने मानव में डाली कि सब के सब उसे एक बराबर प्रयोग नहीं कर पाते।

हमने इतिहास पढ़ा। जहाँ यह बताया जाता है कि असल में मानव पशुओं से विकसित हो कर बना है। वह भी पहले आदिमानव के रूप में असभ्य और पशु तुल्य जीवन जीता था। जैसे-जैसे उसने बौद्धिक विकास किया तो सभ्यता अस्तित्व में आई और धीरे-धीरे धर्म, समुदाय तथा संस्कृति चलन में आई। इन प्रमाणों को आधार माने तो, तो भी सिद्ध होता है कि धर्म मानव द्वारा स्थापित किया गया एक सामाजिक नियम है और कुछ नहीं।

प्रभु को पाना है तो उसके लिए धर्म की नहीं बल्कि अध्यात्म की ज़रूरत पड़ती है। आप निजी स्कूल में पढ़े या सरकारी में। बात एक ही है क्योंकि उद्देश शिक्षा प्राप्त करना है। वह दोनों जगह मिल जाएगी। मेरे कहने का भाव यह है कि धर्म कोई भी बुरा नहीं है। वे सभी समाज को सुंदर और पुष्ट करने की बृहद संस्थाएँ हैं।

इन्हे विकृत कुछ स्वयंभु धर्म के ठेकेदारों और कुछ राजनीतिक सरोकारों वाले लोगों द्वारा निज स्वार्थ साधने के चलते किया है। बेचारी साधारण जनता उनके बहकावे में आस्थाओं के मकड़ जाल में फंस कर बंध जाती है।

यह किसी धर्म विशेष की बात नहीं है। यह सभी धर्मों की दशा है। हिन्दू धर्म को ही ले लीजिए। हमारे तो यहाँ लोग पढ़-लिख कर भी अनपढ़ो की-सी बात करते हैं। किसी से पूछे कि —

  • हिन्दू धर्म के मूल ग्रन्थ कौन है?
  • पुराणों के नाम क्रमवार बताओ?
  • षड्दर्शन कौन-कौन से हैं?
  • 9 श्रुतियों और स्मृतियों को क्रमवार बताओ?

सब कन्नी काटते हैं। बस हम हिन्दू हैं। इस धर्म का अता पता चाहे कुछ भी न हो। और देखो, यह पूछे कि यह हिन्दू धर्म है क्या? वैदिक धर्म तो सनातन धर्म तथा आर्य धर्म की बात करता है। जिसमें वसुधैव कुटुंबकम की बात होती है। फिर यह हिन्दू धर्म कहाँ से और कैसे निकला? जैन, सिख जैसे धर्म कहाँ से निकले और क्यों?

इन बातों का सही तथा प्रामाणिक ज्ञान 95% लोग नहीं दे सकते। पर है हम फिर भी हिन्दू। तो सिद्ध हुआ कि धर्म असल में एक भीड़ का नाम ही रह गया है और कुछ नहीं। सबसे बड़ा धर्म मानव धर्म है, जिससे ये दुनियाँ के सारे धर्म निकले हैं। पर उसे मानने को कोई तैयार नहीं है।

सभी संतों और ज़िंदा महात्माओं ने चीख-चीख कर इसका प्रचार किया, जिन्होंने असल में जिहाद की। पर मानी किस ने। यह दुनियाँ अपने ही रसूख के लिए जीती है और इसमें मारा जाता है हमेशा गरीब, मजलूम तथा सर्वहारा और असहाय वर्ग।

कोरोना विदेशों से लाने वाले।

हाल ही में सफदर गंज की हालत आप सबने देखी। कोरोना विदेशों से लाने वाले वही रसूखदार लोग थे जिन्होंने अपनी कमाई का तो आधे से ज़्यादा पैसा विदेशों में ही ख़र्च कर दिया होता है, उल्टा हमारी गाढ़ी कमाई को भी वे सरकारी खर्चे से वहाँ उड़ाते आए हैं।

जो ये सुबह कमाते हैं और शाम को खाते हैं। ये लोग हमारे देश की फैक्ट्रियों और कारखानों में काम करने वाले वह लोग हैं, जो अपनी सुविधा बेच कर देश की अर्थव्यवस्था को संभालते हैं।

क्या कोरोना संकट में इनकी समस्याओं को दरकिनार करना उचित था। विदेशों में फंसे भारतीयों को, जो करोना पीड़ित भी थे; उन्हें लाने के लिए सरकार के पास प्लान हैं और सुविधा भी। पर अपने देश के निर्दोष लोगों की आंखों के आंसू पोंछने के लिए कुछ भी नहीं।

खैर ये लोग तो सदियों से इसी पीड़ा से गुजर रहे हैं और गुजरते रहेंगे। सताएँ और तमाम सियासी पार्टियों तो इस वक़्त भी सियासत करने से बाज नहीं आ रही है, जब विश्व व्यापी संकट सिर पर मंडरा रहा है। किसे मालूम कल क्या हो? पर ये है कि ख़ुद को खुदा समझते हैं।

इस गफलत भरे माहौल में यदि ये स्वयं सेवी संगठन और धार्मिक संगठन सामने न आते तो सरकारों की सारी हेकड़ी निकल जाती। अब आप कहेंगे कि ये दोगली बातें क्यों? एक ओर तो धर्म पर चोट करता है और दूसरी ओर उसी की प्रशंसा। नहीं भाई यह मानव धर्म की प्रशंसा है। जो हमें हमारे पुरखों ने और संतों ने विरासत में दिया था और एक हम है कि उस महा-पुनीत भाव बोध को भी अपनी रसुखता की भेंट चढ़ाने पर तुले हैं।

अब रही जमात की बात। तो बता दू कि जमात के द्वारा किया गया वाकया असल में एक अमानवीय कृत्य था। फिर चाहे वह जाने अनजाने कैसे भी हुआ हो। यह मायने नहीं रखता। मायने रखता है परिणाम। दीन बांटने वाले ही अगर नफ़रत बांटने लगे तो उस धर्म और समाज का क्या होगा? उस पर कुछ तथाकथित मानवतावादियों की भी अपनी एक जमात है, जो इस नाज़ुक घड़ी में इस घटना से पूरे मुस्लिम समाज को जोड़ने पर तुली हैं।

वे ये नहीं समझते कि इस समाज में भी सभी लोग एक जैसे नहीं है। बहुत से ऐसे भी मुस्लिम पैरोकार है जो हिन्दू-मुस्लिम की भावना से ऊपर उठ कर मानव धर्म की बात करते हैं। इस पूरे मामले में उन्हें क्यों घसीट रहे हो? यहाँ भी ध्रुवीकरण और मजहबवाद की बू आती है।

तो फिर मैं क्यों न कहूँ कि पूरे फसाद की जड़ धर्म ही है। यदि ये अलग-अलग धर्म न होते तो यह सब न घटता। यह सब सदियों से होता आ रहा है। पहले साम्राज्यवाद के नाम पर तो आज धर्मवाद के नाम पर।

मैं धर्मों का विरोधी नहीं हूँ। मैं विरोधी हूँ तो इन धर्मो की व्यवस्थाओं और सरकारी तंत्र की स्वार्थपरता का। सरकारें चाहें तो यह झगड़ा ही सदा को समाप्त हो सकता है। पर वे ऐसा नहीं करना चाहती। ऐसा करने से उनकी राजनीति नहीं चल पाएगी।

यह भारत है साहब। यहाँ कोई भी इमोशनली ब्लैकमेल हो ही जाता है बस। सरकारें ऐलान करें कि किसी भी धर्म या समुदाय के बच्चों को सरकारी शिक्षा ही लेनी होगी। कोई भी धर्म या समुदाय अपनी निजी पाठशाला नहीं चलाएगा। धर्म को लेकर की जाने वाली पढ़ाई भी स्कूलों में ही होगी। जो उलंघन करता है तो उसे सजा दी जाएगी। तो सारे फसाद बंद हो जाएंगे। पर नहीं, उन्हें तो निजीकरण से अपने चहेतों को लाभ पहुँचाना है। बस फिर उसी की आड में दूसरे लोग भी अपना उल्लू साधने में कामयाब हो जाते हैं।

बच्चों को मुफ्त और सरकारी गुणवत्ता युक्त शिक्षा क्यों नहीं मिल रही है?

सरकारें और सियासी पार्टियाँ तो उल्टा सरकारी अध्यापकों को बदनाम करने पर तुली रहती है और बेचारा समाज उनकी बातों में आ कर असलियत भूल जाता है। ज़रा सोचो भाई कि क्या आजादी के 70 साल बाद भी हमारे बच्चों को मुफ्त और सरकारी गुणवत्ता युक्त शिक्षा क्यों नहीं मिल रही है?

जिसका प्रावधान करने की बात संविधान में की गई है। क्यों गरीब का बेटा या बेटी अमीरों या हुक्मरानों के बच्चों की तरह अच्छी शिक्षा नहीं ले पा रहे हैं? क्योंकि यह एक बड़ी चालाकी है। ताकि इन्हीं के बेटे बड़े-बड़े पदों पर बने रहे और हमारे आजाद गुलाम। यह पूर्ण सत्य है।

आज दुनियाँ के उच्च शैक्षिक धरातल पर भारत की सरकारी शिक्षा प्रणाली की सुविधाओं को रखा जाए तो हम शायद कहीं खड़े ही न हो पाएंगे। कई बदलाव हर सरकारों में करवाए गए। पर सब आंकड़ों और कागजों में। क्योंकि इन स्कूलों में किसी बड़े आला अधिकारी या नेता के अपने बच्चे नहीं पढ़ते हैं। सब ख्याली घोड़े।

सब को बराबर लाने के लिए पूरे देश में एक ही पाठ्यक्रम होना चाहिए और सभी नागरिकों को सरकारी स्कूलों में ही बच्चे पढ़ाने के सरकारी आदेश होने चाहिए। संविधान में संशोधन पर संशोधन किए जा रहे हैं तो क्या यह नहीं हो सकता?

एक शिक्षा एक पाठ्यक्रम।

अब आप कहेंगे कि इस से क्या होगा? एक शिक्षा एक पाठ्यक्रम से गरीब-अमीर सबके बच्चों को समान शिक्षा मिलेगी और बराबर ज्ञान मिलेगा। उससे बड़े से बड़ी सरकारी सेवा में गरीबों के मेहनती बच्चे पहुँच जाएंगे और पूरे राष्ट्र की विचारधारा भी एक बनेगी।

जिससे ये जमात जैसी घटनाएँ नहीं घटेगी। ये सभी धार्मिक संगठन हो, पर धर्म की शिक्षा सरकार के अधीन हो। सरकार तय करें कि किस धर्म के लोगों और बच्चों को कैसी धार्मिक शिक्षा देनी है। नहीं तो हम सब लोग इन ठेकेदारों के यहाँ यूं ही लूटते रहेंगे। भारत में पहले भी धर्म गुरु राजदरबार के ही सदस्य होते थे।

अब तो धर्म के क्षेत्र में ऐसी बाढ़ आ गई है कि जिसे भी अच्छे से बोलना और गाना-बजाना या डराना – धमकाना आ गया, वहीं स्वयंभु धर्मगुरु बन जाता है। न कोई परीक्षा और न ही कोई रोक-टोक। न हींग लगे न फिटकरी रंग चोखे का चोखा।

मैं यह नहीं कहता कि सभी धर्म गुरु निकम्मे हैं। पर सवाल तो उठते हैं। जैसे ग़लत किया जमातियों ने उंगली उठी पूरे मुस्लिम समाज पर। मेरा तो मानना है कि सभी ज्योतिष, अध्यात्म, वास्तु और योग जैसे गूढ़ विषय स्कूलों में पढ़ाए जाने चाहिए और वे भी मुफ्त। तभी निरीह जनता लूटने से बचेगी और इस तरह की आफतों से भी बचेगी, जो आज आई है।

हमें बच्चों को मानव बनाना है न की किसी धर्म का पैरोकार या महज़ कोई कर्मचारी और अधिकारी। वे बने, पर पहले वह एक मानव बने। आज ज़रूरत है सर्व धर्म समभाव की। यह भारत को ही नहीं, पूरी दुनियाँ को समझना होगा।

आज हमें मशीनी – इंजीनियरों से ज़्यादा मानवता के इंजीनियरों की ज़रूरत है। यह महामारी चाहे मानव मस्तिष्क की खोपड़-वाजी हो या फिर किसी दैवी शक्ति का प्रकोप। चाहे फिर प्रकृति की विडम्बना हो। पर हर दृष्टि से कहीं न कहीं इस सब के लिए मानव की अमानवता जिम्मेवार है। अतः आज ज़रूरत है तो मानव को मानव बनाने की है।

सब जानते हैं कि चीन के बुहान से यह रोग दुनियाँ के कोने-कोने तक फैल गया। क्या इसके पीछे भी अमानवीयता का हाथ नहीं है? क्यों विश्व समुदाय के सामने यह बात चीन ने समय पर नहीं रखी? क्यों चीन अन्य देशों की यात्रा अपने लोगों से करवाता रहा, जबकि वह जानता था कि यह एक जानलेवा और लाइलाज घातक बीमारी है।

हम नहीं जानते कि यह चीन की चाल थी या फिर कोई प्राकृतिक घटना। परन्तु विश्व मानवतावादी दृष्टिकोण तो चीन को भी होना चाहिए था। वहीं नहीं रुकी यह गाड़ी। उस पर कई देशों के जमाती टूरिस्ट वीजा पर भारत घूमने आते हैं और यहाँ अपने ही धर्म को शर्मसार कर दिया। क्या फिर भी मानवता का पाठ स्कूलों में पढ़ाने के विपक्ष में खड़े होंगे हम? यह विश्व समुदाय को गहनता से सोचने की ज़रूरत है आज।

पूरे विश्व में ही धार्मिक शिक्षा को सरकारों को अपने हाथों में लेना चाहिए।

वरना भविष्य में इस के और भी गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। मैं तो कहता हूँ कि पूरे विश्व में ही धार्मिक शिक्षा को सरकारों को अपने हाथों में लेना चाहिए। भले ही उसके लिए सरकारें जनता की राय समय – समय पर लेती रहे। तभी यह भीड़ तंत्र राह पर आएगा। वरना यह पीढ़ी दर पीढ़ी यूं ही घटता जाएगा।

भले ही आज जान पर बन आई है, इसलिए लोग डाक्टरों को भगवान कहने लगे हैं। कहना भी चाहिए। पर असल में सबसे ज़्यादा ज़रूरी समाज को सही शिक्षा देना है। अगर शिक्षा का विकेंद्रीकरण और दोहरी व्यवस्थाएँ न रोकी गई तो भविष्य में डॉक्टर भी हाथ खड़े कर देंगे।

कुदरत या खुदा अपनी ओर से कुछ नहीं करता है। वह हमारे ही कर्मो को कई गुना बढ़ा कर हमें वापिस करती / करता है। किसी घाटी के बीच डाली जाने वाली आवाज़ ज्युं उल्टा हमारे ही कानों में कई गुना बढ़ कर प्रतिध्वनि के रूप में लौट आती है, उसी प्रकार कर्म भी लौटते हैं।

असल में सारे फसाद की जड़ कौन है?

इसलिए अच्छे कर्म करने की सीख जब तक न दी गई, तब तक अच्छे कर्म की उम्मीद रखना भी बेईमानी है। अब आप समझ गए होंगे कि असल में सारे फसाद की जड़ कौन है। सरकारें हैं कि इसका ठीकरा उसके सिर और उसका ठीकरा इसके सिर पर फोड़ती रहती है। अपनी गलती मानने को न पक्ष तैयार है और न विपक्ष। अब मेरे एक मित्र का कहना है कि ये मुस्लिम साले गद्दार है। ये मोदी जी से जलते हैं, इसलिए इन्होंने ऐसा किया। इन्हे तो गोली मार देनी चाहिए।

वह बेचारा भाजपाई है और उसके विरोध में दूसरे मित्र ने कहा कि हां-हाँ, जो तुम सोचते हो और बोलते हो वहीं सही है और सच भी वहीं होता है। माना कि ये जमाती साज़िश रच गए। तेरे मोदी जी की सरकार कहाँ सोई हुई थी। कहाँ थी खुफिया एजेंसियाँ। क्या वे सिर्फ़ और सिर्फ़ विरोधी पार्टियों की खुफिया जानकारी में ही लगा के रखी है? वे देश के लिए होती है जनाब किसी व्यक्ति या पार्टी की खुशामद के लिए नहीं। वह बेचारा कांग्रेसी था।

भाजपाई ने उसका दोष केजरीवाल के सर मढ़ दिया। यह तो राज्य सरकार को देखना चाहिए था। कांग्रेसी ने जबाव दिया कि पढ़ कल का अखबार। देख आपकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता शांत कुमार का बयान। वे कहते हैं कि इस मामले में चूक दोनों सरकारों ने की है। पर उनकी सुनता कौन है।

आपके तो यहाँ गुजराती जोड़ी की दादागिरी चलती है और भी बहुत कुछ वे अनापशनाप कह गए। सब यहाँ लिख पाना संभव नहीं है। यहाँ गुटवाजियों की बू आ रही थी। तो मुझे लगा कि असल में यह भीड़ तंत्र ही सारे फसाद की जड़ है। यदि आदमी दिमाग़ के बजाए दिल से पढ़ जाए तो सब ठीक हो जाएगा। पर अफसोस यह होगा कैसे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बताया है की — कोरोना संकट के समय पर भी इस्लामिक धार्मिक संगठन की जानबूझकर लापरवाही क्या ठीक था? याद रखे – सबसे बड़ा धर्म मानव धर्म है। “हमें बच्चों को मानव बनाना है न की किसी धर्म का पैरोकार या महज़ कोई कर्मचारी और अधिकारी। आज हमें मशीनी – इंजीनियरों से ज़्यादा मानवता के इंजीनियरों की ज़रूरत है।” यदि आदमी दिमाग़ के बजाए दिल से पढ़ जाए तो सब ठीक हो जाएगा। पर अफसोस यह होगा कैसे?

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यह वैचारिक लेख (आज की जरूरत।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आखिर कहां जा रही है भारत की शिक्षा व्यवस्था?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आखिर कहां जा रही है भारत की शिक्षा व्यवस्था? ♦

दिल्ली सिर्फ देश की राजधानी ही नहीं है। वह राजधानी होने के साथ-साथ हिंदुस्तान का दिल और एक महानगर भी है। देश का हर कोई छोटा बड़ा नागरिक अपने बच्चों को यहां के सरकारी शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने के लिए बेताब रहता है। हो भी क्यों ना? हर कोई चाहता है कि मेरे बच्चे को एक अच्छी और किफायती शिक्षा प्राप्त हो। वह शिक्षा किसी अच्छे संस्थान में और अच्छे स्थान में प्राप्त हो।

सबकी सोच होती है कि मेरा बच्चा सेंट्रल यूनिवर्सिटी के अधीन आने वाले शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेकर शिक्षा ग्रहण करें। परंतु उन बच्चों और अभिभावकों का सपना तब चूर- चूर हो जाता है जब सेंट्रल यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले सभी शैक्षणिक संस्थानों में बी ए ऑनर्स राजनीतिक शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि में भी 100% का कट ऑफ प्रथम सूची में लगाया जाता है। 2015 में यह कट ऑफ कंप्यूटर साइंस में पहली बार लगाया गया था अब तो तकरीबन – तकरीबन सभी विषयों में यह कट ऑफ लगाया जा रहा है।

सवाल यह खड़ा होता है कि…

सवाल यह खड़ा होता है कि यदि 100% ही कट ऑफ लगाया जाएगा तो क्या इससे भी आगे कोई और अंक प्राप्त होते हैं क्या? प्रतिस्पर्धा के इस दौर में गरीब, मजबूर और मेहनती तथा परिश्रमी वह बच्चा तब निराश होता है जब उसके 99.9 प्रतिशत अंक होने पर भी इन संस्थानों में दाखिला नहीं मिलता। तब तो और भी ज्यादा परेशान होता है जब आस – पड़ोस के लोग अपने 100% अंक प्राप्त किए हुए बच्चे का दाखिला इन संस्थानों में करवातें हैं और पड़ोस के 99.9 प्रतिशत अंको को प्राप्त करने वाले बच्चों को या अभिभावकों को चिढ़ाने का काम करते हैं कि मेरे बच्चे का दाखिला तो उस कॉलेज में हो गया है आपके बच्चे का नहीं हुआ क्या?

मजबूरन निजी संस्थानों में दाखिला लेना।

समझ ही नहीं आता कि हमारे देश की शिक्षा प्रणाली किस ढर्रे की ओर चली जा रही है? 100% कट ऑफ लिस्ट कहां तक जायज है? सभी जानते हैं कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले इन कॉलेजों में दूसरी, तीसरी या चौथी कट ऑफ लिस्ट बहुत ही कम निकलती है। यदि निकल भी गई तो उसमें भी 97% अंक प्राप्त करने वाले को ही स्थान मिलेगा।

परंतु जो 90% से ऊपर के अंको को प्राप्त किए हुए अन्य प्रखर बुद्धि के छात्र है, जिनका सपना इन प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने का रहा है, वे कहां जाएंगे? उन्हें मजबूरन निजी संस्थानों में दाखिला लेना पड़ता है, जहां लाखों की डोनेशन दे कर के बड़ी महंगी शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है। आखिर आजादी के 74 साल बाद भी वे क्यों इस खर्चीली शिक्षा व्यवस्था में उलझ कर अपने साथ – साथ अपने परिवार वालों का भी नुकसान करें।

1965 में कोठारी कमीशन।

1965 में कोठारी कमीशन की अनुशंसाओं ने भारत सरकार को भारतीय शिक्षा प्रणाली पर देश की जी डी पी का 6% खर्च करने की अनुशंसा की थी। परंतु कमीशन की एक न मानी गई। वही पुराना शैक्षणिक ढर्रा अद्यतन आजादी के बाद अपनाया जाता रहा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू जरूर की गई है, जिसमें देश की जी डी पी का 6% शिक्षा पर खर्च करने का दावा भी केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। परंतु जनता को न्याय तब तक नहीं मिलेगा जब तक यह सारी बातें जमीनी स्तर पर हकीकत में क्रियाशील नहीं होती।

मात्र घोषणा करवाना और किसी व्यवस्था में प्रावधान करवा देना किसी बात को पूर्ण रूप से फलीभूत होने का प्रमाण नहीं होता। किसी बात की पूर्णता के लिए उसका विधिवत धरातल पर घटित होना बहुत जरूरी होता है।

प्रश्न उठता है…

सवाल खड़े होते हैं कि इतने लंबे अरसे के बाद भी आखिर क्यों देश की राजधानी में सरकारी शिक्षण संस्थानों की बढ़ोतरी नहीं हो पाई? क्यों हर सरकारें ‘थोथा चना बाजे घना ‘वाला राग आलापती रही?

संस्थान वही, संस्थानों में सीटें वही और उस पर छात्रों की तादात निरंतर बढ़ती जा रही है। बढ़ती छात्र तादात के हिसाब से सरकारों को शिक्षण संस्थानों का विकास करना चाहिए था और इन संस्थानों में सीटों की अभिवृद्धि करनी चाहिए थी। परंतु ऐसा नाम मात्र को ही देखने में मिला है।

प्रश्न उठता है क्या सरकार जानबूझकर के भारतीय शिक्षा व्यवस्था को निजी शिक्षण व्यवस्था की झोली में डालने के चक्कर में है या फिर उसे अपने देश में जी रहे नव शिक्षार्थियों की कोई चिंता ही नहीं है?

देश के मानव संसाधन को संचालित करना, व्यवस्थित करना और उनकी सुविधाओं के प्रावधानों को प्रबंधित करना राज्य एवं केंद्र सरकार का संयुक्त दायित्व होता है। परंतु इस मुद्दे पर सब के सब अपना पल्ला झाड़ते हुए से नजर आ रहे हैं। 100% की कटऑफ कहां तक तर्क संगत और न्याय संगत है? इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

सवाल भारतीय शिक्षा व्यवस्था के मूल्यांकन ढांचे पर।

इसमें तो सवाल भारतीय शिक्षा व्यवस्था के मूल्यांकन ढांचे पर भी खड़े होते हैं कि क्या सारे की सारी परीक्षाएं वस्तुनिष्ठ विधि से ही करवाई जाती है? क्या स्कूली शिक्षा प्रणाली के मूल्यांकन में व्याख्यात्मक और सरांशात्मक परीक्षाओं का कोई स्थान नहीं है? यदि है तो फिर 100 में से 100 अंक प्राप्त होने का सवाल ही खड़ा नहीं होता?

आखिर क्यों हमारे देश के शिक्षाविद इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हैं? खैर सरकार और राजनीतिज्ञों से तो इस मामले में बात करना ही बेकार है। एक शिक्षक होने के नाते मैं यह बड़े दावे के साथ कह सकता हूं कि स्कूली शिक्षा में 100 में से 100 अंक प्राप्त करना वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता और वैधता पर कहीं ना कहीं सवाल जरूर खड़े करता है।

क्या एक भी बिंदी की गलती बच्चा नहीं कर रहा है? क्या एक भी सवाल या फिर एक भी शब्द बच्चों से गलत नहीं हो रहा है? इतना ही नहीं भाषा, राजनीतिक शास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और गणित जैसे कई विषयों में कहीं ना कहीं बच्चों से जरूर चूक हो जाती है। उन सब चूकों को नजरअंदाज करके 100 में से 100 अंक बच्चों को प्रदान करना कहीं से भी उचित नहीं जान पड़ता।

शिक्षा प्रणाली की और व्यवस्थाओं की तारतम्यता का ना होना।

इससे हम बच्चे को अहम और वहम के चक्रव्यू में डालते जा रहे हैं। और इसके साथ – साथ प्रतिस्पर्धात्मक बुद्धि को रखने वाले छात्रों और अभिभावकों को निराशा और हताशा की ओर धकेलते जा रहे हैं। अधिक से अधिक अंक प्राप्त करना आज के बच्चों और अभिभावकों का एक शौक और फैशन बन गया है।

यदि सर्वाधिक अंक किसी अभिभावक का बच्चा नहीं लाता है तो वह पड़ोसी के बच्चे का उदाहरण देकर उस पर अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने का दबाव बनाता है। प्रतिस्पर्धा की इस घिनौनी लड़ाई में वह बच्चा कई बार कम नंबर आने पर आत्महत्या जैसे कदम उठा लेता है, जो कहीं से भी तर्कसंगत और ठीक सिद्ध नहीं होता। इन सब बातों के पीछे मुख्य कारण शिक्षा प्रणाली की और व्यवस्थाओं की तारतम्यता का ना होना ही होता है।

भारत के बच्चे -बच्चे को सरकारी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने का पूरा-पूरा अधिकार प्राप्त हो।

जनसंख्या की दृष्टि से शिक्षण संस्थान और उनकी सीटें निरंतर बढ़ती जानी चाहिए न कि स्थिर रहनी चाहिए। कट ऑफ लिस्ट भी 100% कहीं से भी न्याय संगत नहीं हो सकती। निजी शिक्षण संस्थानों के चंगुल से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बाहर निकाल करके भारत के बच्चे -बच्चे को सरकारी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने का पूरा-पूरा अधिकार प्राप्त होना चाहिए।

भारत के शिक्षार्थी और अभिभावक का शोषण किसी भी हालत से नहीं होना चाहिए। इन्हीं सब बातों का प्रावधान करना देश की और राज्य की सरकारों का सामूहिक दायित्व होता है। परंतु सरकारें ऐसा कुछ भी नहीं कर रही है। आजादी के इतने दिनों के बाद भी देश में नाम मात्र को ही शिक्षण संस्थानों में वृद्धि की गई है और उन शिक्षण संस्थानों में सीटों के निर्धारण में भी नाम मात्र की ही वृद्धि हुई है।

देश का होनहार छात्र निराश – हताश।

ऐसे में देश का होनहार छात्र निराश – हताश होकर के गलत कदम नहीं उठाएगा तो और क्या करेगा? यहां यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि 90% अंक प्राप्त करने वाला छात्र भी कोई कमजोर नहीं होता। वह भी एक तीव्र बुद्धि और प्रखर व्यक्तित्व होता है। ऐसे में उसे निराश और हताश होने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि उसे अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहिए और निरंतर व्यवस्थाओं के साथ संघर्ष करके अपने भविष्य को संवार कर देश के भविष्य को संवारने की कोशिश करनी चाहिए।

निराशा और हताशा में गलत कदम उठाने की अपेक्षा विपरीत परिस्थितियों का सामना करके अपने लिए सफलता के नए रास्ते गढ़ना मानव जीवन का सबसे बड़ा कर्तव्य है। अतः देश के हर नौजवान को इन चुनौतियों से घबराना नहीं चाहिए बल्कि इनको उल्टी चुनौती देकर के इन्हें हराना चाहिए।

समाज की मानसिकता में बदलाव लाने की जरूरत।

समाज की मानसिकता को भी अपने आप में बदलाव लाने की जरूरत है। यदि आपके बच्चों ने सर्वाधिक अंक प्राप्त कर भी लिए हैं तो ऐसे में दूसरों को चिढ़ाने और जलील करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए बल्कि एक अच्छे नागरिक होने के नाते और एक अच्छा पड़ोसी होने के नाते या फिर एक अच्छा रिश्तेदार होने के नाते हमें एक दूसरे को निरंतर प्रोत्साहित करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय सर्वे में हमारे देश की शिक्षा प्रणाली।

सवाल यह भी खड़ा होता है कि यदि 100% अंक प्राप्त करने योग्य प्रतिभाएं निखारने की क्षमता हमारे देश की शिक्षा प्रणाली रखती है तो फिर वैश्विक शिक्षण पायदान पर अपने आप को लड़खड़ाता हुआ सा महसूस क्यों करती है? क्यों अंतरराष्ट्रीय सर्वे में हमारे देश की शिक्षा प्रणाली को विशेष स्थान प्राप्त नहीं होता?

किसी अमीर धनवान और रसूखदार घर आने का बच्चा तो निजी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर भी ले परंतु मध्यवर्ग और गरीब सर्वहारा वर्ग का होनहार छात्र इस 100% कटऑफ की व्यवस्था वाली शिक्षा प्रणाली में पिछड़ जाएगा।

.001 प्रतिशत से कटऑफ सूची में दाखिला ना मिलने के कारण एक तो वह बेचारा सरकारी शिक्षण संस्थानों से न्यारा रहेगा और उधर पैसों की तंगी के चलते उसे निजी स्कूलों से भी बाहर ही रहना पड़ेगा। ऐसे में उसकी अभिलाष, उसकी प्रतिभा और उसका स्वाभिमान सबका सब चोटिल हो जाता है।

सैद्धांतिक शिक्षा प्रणाली से हटकर प्रायोगिक शिक्षा प्रणाली की जरूरत।

समय रहते ही यदि देश की सरकारों ने इस दिशा की ओर ध्यान नहीं दिया तो देश में कुंठा और अराजकता का वातावरण धीरे – धीरे बढ़ता चला जाएगा। सैद्धांतिक शिक्षा प्रणाली से हटकर प्रायोगिक शिक्षा प्रणाली पर जब तक जोर नहीं दिया जाएगा तब तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति का समूचा मसौदा भी बेकार ही सिद्ध होगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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Conclusion:

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – सैद्धांतिक शिक्षा प्रणाली से हटकर प्रायोगिक शिक्षा प्रणाली पर जब तक जोर नहीं दिया जाएगा तब तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति का समूचा मसौदा भी बेकार ही सिद्ध होगा। 100% कटऑफ की व्यवस्था वाली शिक्षा प्रणाली को हटाना होगा।

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यह लेख (आखिर कहां जा रही है भारत की शिक्षा व्यवस्था?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में कौन बना है रोड़ा?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में कौन बना है रोड़ा? ♦

भारत के हिन्दी भाषी क्षेत्रों के अधिकांश पढ़े-लिखे लोग भी यही मानते है कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। यह जरूर है कि भारतीयों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा मान लिया है परंतु हमें शायद यह ज्ञान नहीं है कि संवैधानिक तौर पर हिन्दी आज भी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है। भले ही समूचे विश्व में हिन्दी को जानने वाले लोगों की तादाद 200 करोड़ से अधिक हो चुकी है, पर हिन्दी को अपने देश में न्याय नहीं मिल पाया है।

इतना ही नहीं संस्कृत भाषा की तकनीक को संगणकीय पृष्ठभूमि पर खरा पाए जाने के कारण आज हिन्दी को वैश्विक भाषा के रूप में प्रतिस्थापित किए जाने की मुहिम शुरू हो चुकी है क्योंकि संस्कृत तो अब अधिकतर चलन की भाषा नहीं रही, पर उससे उद्भूत हिन्दी को यह सम्मान दिए जाने की पूरी पैरवी की जा रही है। पर भारत में हिन्दी नगण्य क्यों है? इसके लिए हमें इतिहास से लेकर वर्तमान तक को एक नजर में जरूर देखना होगा।

इतिहास से लेकर वर्तमान तक को एक नजर में।

भारतीय इतिहास का ज्ञान रखने वाले प्रत्येक भारतीय को यह पूरी तरह से मालूम है कि हजारों वर्ष तक भारत की भाषाएं राजकाज के कार्यों से विदेशी आक्रांताओं की शासकीय पकड़ के चलते नदारद रही। मुगल शासन काल में राजकाज की भाषा अरबी और फारसी रही और उसके बाद अंग्रेजी शासन काल में यह स्थान अंग्रेजी ने लिया। भारत को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने के लिए आजादी की लड़ाई लड़ने वालों का एक लंबा चौड़ा इतिहास है।

उसी इतिहास में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एक विशेष स्थान रखते हैं। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए विशेष प्रयास किए थे। इसी के चलते उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के लिए सन 1917 में भरूच (गुजरात) में पहली बार हिंदी को राष्ट्रभाषा का नाम दिया था। इस मुहिम में नेहरू जी ने भी गांधी जी का साथ दिया था, यह भी पढ़ने को मिलता है। इसी के चलते आजादी के बाद इस मुद्दे पर भारतीय नेताओं के दो गुट बने, जिसके चलते संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को मुंशी आयंगर समझौते के तहत हिन्दी को संस्कृत की लिपि देवनागरी में टंकित किए जाने और राजभाषा का दर्जा दिए जाने की बात स्वीकार की।

भारतीय संविधान में केवल दो ऑफिशियल भाषाओं को स्थान।

भारतीय संविधान में केवल दो ऑफिशियल (राजभाषा भाषाओं) भाषाओं (अंग्रेजी और हिंदी) को स्थान दिया गया है। वहां किसी भी राष्ट्रभाषा का जिक्र न होने के कारण शायद हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के संदर्भ में एक बहुत बड़ा अड़ंगा बन गया है। इसमें यह भी जिक्र किया गया था की 26 जनवरी 1950 को भारत के संविधान के लागू होने से लेकर 26 जनवरी 1965 तक धीरे-धीरे अंग्रेजी का प्रयोग शासकीय कार्य में कम किया जाएगा और 15 सालों के बाद हिन्दी में ही भारत के शासकीय कार्य किए जाने हैं।

1950 में संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत देवनागरी लिपि में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया। ये राजभाषा संबंधी प्रावधान संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक अंकित किए गए हैं। 14 सितंबर 1953 को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर पहली बार हिंदी दिवस मनाया गया था। धीरे-धीरे हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की मुहिम और तेज होने लगी। इसमें हिन्दी के पक्षधर नेता बालकृष्ण और पुरुषोत्तम दास टंडन के आंदोलनों ने विशेष भूमिका निभाई।

1960 में राष्ट्रपति के आदेश पर इस संबंध में एक आयोग बना। 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित हुआ जिसके तहत राजभाषा के प्रयोग से सम्बन्धित तीन क्षेत्र क, ख, ग बनाए गए। इस अधिनियम में यह तय किया गया कि हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषा में किए गए पत्राचारों के जवाब:-

1. क क्षेत्र के राज्यों को हिन्दी में ही दिए जाएंगे।
2. ख क्षेत्र से प्राप्त अन्य भाषाई पत्रों का जवाब 60% हिन्दी और अंग्रेजी में तथा बाकी 40% सिर्फ अंग्रेजी में ही दिए जाएंगे।
3. ग क्षेत्र से प्राप्त ऐसे पत्राचारों का जवाब 40% हिन्दी और अंग्रेजी में और बाकी सिर्फ अंग्रेजी में दिया जाएगा।

ये प्रावधान संविधान में निर्दिष्ट संविधान लागू होने की 15 सालों के बाद हिन्दी को अधिमान दिए जाने के तहत किए गए।

द्विभाषी पद्धति को मान्यता।

1965 में जब कांग्रेस सरकार ने पूरे भारत में हिंदी के प्रयोग को सर्वत्र अनिवार्य किए जाने पर चर्चा की तो तमिलनाडु में इसके विरोध में हिंसक प्रदर्शन हुए। भले ही ये प्रदर्शन राजनीति प्रेरित थे, परंतु कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने इन प्रदर्शनों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया कि जब आजादी के 15 साल बाद भी पूरे भारत के सभी राज्य हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में ग्रहण करने को तैयार नहीं है तो यह फैसला वापस ले लेना चाहिए। इसी के चलते सन 1967 मैं पुनः 1963 के राजभाषा अधिनियम को संशोधित किया गया और पुनः शासकीय कार्य में राजभाषा के रूप में द्विभाषी पद्धति को मान्यता प्रदान की गई। ये दो भाषाएं वहीं पूर्व की अंग्रेजी और हिन्दी थी।

1971 मैं क्षेत्रीय भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने की कवायद तेज हुई। इसमें आजादी के समय में तो 14 भाषाएं जोड़ी गई थी। बाद में ये 17 हुई और अब 2007 तक इनकी संख्या 22 हो चुकी है। एक यह भी मुहिम चली कि इन्हें भी राजभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। ये भारतीय संविधान में भाषा अधिनियम के तहत भाषाएं तो स्वीकारी गई परंतु राजभाषा का दर्जा इन्हें पूर्ण तौर से नहीं दिया गया शायद।

फिर 1976 में राजभाषा अधिनियम की धारा 4 के तहत राजभाषा संसदीय समिति बनाई गई, जिसने राष्ट्रपति की अनुशंसा पर राजभाषा नीति बनाकर लागू की। अब राजभाषा विभाग मासिक, त्रैमासिक और अर्धवार्षिक सतत निगरानी व विश्लेषण भी करता है और समेकित रिपोर्ट 30 सदस्यों वाली (जिसमें 10 सदस्य राज्यसभा तथा 20 सदस्य लोकसभा के होते हैं) संसदीय राजभाषा समिति को सौंपता है। यह संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपती है।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के संबंध में गुजरात हाईकोर्ट में भी एक याचिका दायर की गई थी। 25 जनवरी 2010 को इस याचिका का फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों के आधार पर यह निर्णय दिया था कि जो दलीलें भारत में अधिकतर लोग हिन्दी भाषा बोलने और जानने वाले हैं आदि – आदि के आधार पर दी जा रही है। वे कहीं भी किसी रिकॉर्ड में अंकित नहीं है और न ही इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा किसी रिकॉर्ड में अंकित है। इसके अलावा संविधान में भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने की बात अंकित नहीं है। अतः यह पैरवी निराधार है। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद यह मामला पुनः ठंडे बस्ते में चला गया।

मुख्यतः चर्चित विवाद।

रही बात हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने वाले गुट और न देने वाले गुट की तो उसमें मुख्यत ये विवाद चर्चित रहे:-

1. हिन्दी का विरोध करने वाले गुट का यह मानना है कि जब भारत के 29 में से 20 राज्यों में हिन्दी बोलने वाले लोग बहुत ही कम है, तो फिर हिंदी को ही राष्ट्रभषा का दर्जा क्यों दिया जाए? राष्ट्रभाषा तो वह होनी चाहिए जिसे समूचे देश के अधिकतर भागों के लोग जानते, बोलते और समझते हो।

2. जो राज्य हिन्दी भाषी चिन्हित किए भी गए हैं, उनमें भी अधिकतर क्षेत्रों में जनजातिय और क्षेत्रीय भाषाएं बोली और समझी जाती है। ऐसे में उन्हें भी हिन्दी भाषी चिन्हित करना न्याय संगत नहीं है।

3. हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने वालों की यह दलील कि देश की पूर्ण जनसंख्या का 50% हिस्सा हिंदी बोलता और समझता है तथा शेष गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोगों का भी 20% हिस्सा हिन्दी समझता है। ऐसे में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला ही चाहिए।
उस पर विरोधी विद्वान टिप्पणी करते हैं कि जिन 50% लोगों की आप बात करते हैं, उनमें से अधिकतर जनजातिय और क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग करते हैं। तो फिर वे हिन्दी भाषी कैसे सिद्ध हुए?

4. हिन्दी विरोधी विद्वानों का तर्क यह भी है कि भारत में हिंदी से भी पुरानी तमिल, कन्नड़, तेलुगू , मलयालम, मराठी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी ओड़िया, बंगला, नेपाली और असमिया जैसी भाषाएं हैं। तो ऐसे में इनसे कहीं बाद दिल्ली के आसपास की चर्चित खड़ी बोली से विकसित हिन्दी को कैसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए?

तर्क – वितर्क का यह सिलसिला तो तब तक चलता ही रहेगा जब तक किसी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल जाता। चर्चा में तो यह भी एक विषय उठता है कि संविधान सभा के समक्ष नेहरू जी ने यह भी प्रस्ताव रखा था कि हिन्दी और अंग्रेजी दोनों को ही राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए, परंतु वह प्रस्ताव भी खारिज कर दिया गया था। खैर कुछ भी हो। किसी भी राष्ट्र की निजी पहचान और उन्नति के लिए उसकी अपनी राष्ट्रभाषा का होना बहुत जरूरी होता है। इस संबंध में हमारा भारत देश आज तक बौना है। एन डी ए सरकार ने 2014 में अपने मंत्रियों और अधिकारियों को सारे शासकीय कार्य हिन्दी में करने की हिदायत जरूर दी थी, परंतु हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के संदर्भ में वह भी चुप्पी साधे है।

मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेजी के गुलाम है।

बड़े हैरत में डालता है संविधान समिति का वह निर्णय, जिस निर्णय ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं बल्कि राजभाषा का दर्जा दिलाया। सब जानते हैं कि एक लंबी जद्दोजहद के बाद भारत मुश्किल से अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा प्राप्त करता है। असल में यह गुलामी आज भी बरकरार है। यह सत्य है कि भारत का प्रत्येक नागरिक शारीरिक रूप से आज अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हो चुका है, परंतु इस सत्य को भी झूठलाया नहीं जा सकता कि मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेजी के गुलाम है।

14 सितंबर 1949 को हमारे संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दिया गया, परंतु हिंदी की हालत आज भी ऐसी है कि मानो अपने ही घर में अपनी ही मां के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा हो। न्यायालय की बड़ी-बड़ी टिप्पणियां, बहसें और न्याय प्रक्रिया के बाद आने वाले निर्णय के लिखित प्रारूप, चिकित्सा व्यवस्था की सारी लिखित और मौखिक जानकारी, शिक्षा व्यवस्था के वैज्ञानिक पहलुओं का लिखित एवं मौखिक ढांचा तथा अधिकतर उच्च प्रतियोगिताओं की परीक्षा भाषा आज भी अंग्रेजी ही बनी हुई है।

इतना ही नहीं, ये सब प्रारूप इतने जटिल और दुरूह होते हैं कि इन व्यवसायों और प्रक्रियाओं पर जिसने शिक्षा प्राप्त नहीं कर रखी है, उस शिक्षित व्यक्ति को भी इन प्रारूपों और व्यवस्थाओं की भाषा शैली को समझाने के लिए, इन्हीं व्यवसायों में काम करने वाले लोगों के पास जाना पड़ता है।

भले ही इन व्यवसायों के अंतर्गत काम न करने वाला व्यक्ति कितना ही पढ़ा लिखा क्यों न हो? या यूं कहें कि उसे अंग्रेजी का कितना ही अच्छा ज्ञान क्यों न हो फिर भी उसे इन प्रारूपों और व्यवस्थाओं को समझने में कहीं न कहीं दिक्कत आ ही जाती है। ऐसे में उसे पढ़ा – लिखा होने के बावजूद भी कई बार लाखों का खर्चा मात्र इन चीजों को समझने और समझाने के लिए ही मुफ्त में करना पड़ता है।

प्रायोजित साजिश तो नहीं है?

समझ ही नहीं आता कि आखिर क्यों इन व्यवस्थाओं को आजादी के आज 74 साल बाद भी अंग्रेजी में प्रारूपित किया जाता है? किया भी जाता है तो फिर भी सवाल उठता है कि क्यों इतना जटिल भाषा शैली में यह सब लिखा जाता है? और देखिए! राजस्व विभाग की भाषा शैली आज भी मुगलिया सल्तनत के दौर की ही बरकरार है। फिर तो जहन में सवाल कौंधे गा ही कि कहीं यह एक सोची-समझी और प्रायोजित साजिश तो नहीं है?

भारत की अधिकांश जनता हिन्दी बोलती है, हिन्दी जानती है और हिन्दी समझती है। उसके बावजूद भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा आज तलक प्राप्त नहीं हो सका। राजभाषा होने के बावजूद भी राजकाज के अधिकतर कार्य आज तक अंग्रेजी में ही संपादित किए जाते हैं। सबसे बड़ी हैरत तो तब होती है, जब एक छोटे से छोटे कार्यालय का सामान्य दस – बारह पढ़ा-लिखा बाबू भी बड़े रूआब से जवाब देता है, “सर अंग्रेजी में बोलिए अंग्रेजी में, हिन्दी मुझे लिखनी नहीं आती।”

भले ही उसे अंग्रेजी समझ नहीं आती हो पर चिट्ठी वह भी अंग्रेजी में ही लिखता है। फिर चाहे उसे उसके लिए नकल ही क्यों ना मारनी पड़े? फिर हर कार्यालय में वही रटी रटाई अंग्रेजी की प्रारूपित चिट्ठियां अंग्रेजों के जमाने से आज तक प्रचलित है। कोई कुछ नया अपनी मौलिक शब्द शक्ति के साथ करना चाहे, तो कार्यालय के बड़े अधिकारी पुनः ड्राफ्टिंग करवाते हैं। यानी नकल करो बस। नया बिल्कुल भी न सोचो। यह उनका दोष नहीं है। यह तो हमारी अंग्रेजी मानसिकता का दोष है।

अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने का भूत।

आज के दौर में तो एक और नया भूत लोगों पर सवार हुआ है। अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने का भूत। बड़े-बड़े कान्वेंट स्कूल में तो व्यवस्था यह भी है कि बच्चों को दाखिल करवाने से पहले उनके अभिभावकों का टेस्ट होता है। यदि उन्हें अंग्रेजी बोलनी और समझनी न आए तो उनके बच्चों को इन कॉन्वेंट स्कूलों में दाखिला नहीं दिया जाता। ऐसी स्थिति में उन अभिभावकों को मायूस होना पड़ता है। आखिर इसमें बच्चों का क्या दोष?

भले ही हिन्दी स्कूल कितना ही अच्छा क्यों न हो? वहां पर कितने ही पढ़े लिखे और प्रशिक्षित अध्यापक क्यों न हो? फिर भी लोगों की मानसिकता शटर में चलने वाले अंग्रेजी स्कूलों के प्रति इतनी दृढ़ है कि जिसे तोड़ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

जब किसी कारोबार की बात होती है तो तब सारा का सारा बड़ा कारोबार हिन्दी में किया जाता है। राजनीति की भाषा (भाषण)हिन्दी। फिल्मी कारोबार की भाषा हिन्दी। प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अधिकतम भाषा हिन्दी।

अरे भाई जब अंग्रेजी इतनी महत्वपूर्ण है तो फिर ये सब कारोबार भी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं करते हो? सवाल तो बनता है। शायद इसलिए कि इन कारोबारों का उपभोक्ता या मतदाता आम व्यक्ति है, जिसे अंग्रेजी नहीं आती। कमाई तो उसी से करनी है। कमाने के लिए हिंदी और भुनाने के लिए अंग्रेजी। वाह! यह कैसी आजादी और कैसी व्यवस्था?

संत श्रेष्ठ तुलसीदास जी।

हमें याद है कि संत श्रेष्ठ तुलसीदास जी ने संस्कृत की अधिकृतता को चुनौती देते हुए अवधि में जब रामायण को लिखना शुरू किया था तो लोगों ने उनकी प्रतिलिपि को ही पानी में फेंक दिया था। क्योंकि संस्कृत को जानने वाले वर्ग के भीतर एक खासा आक्रोश था, कि कहीं यह महान ग्रंथ आम जन भाषा में संपादित हो गया तो हमारी प्रतिष्ठा और रोटी को बट्टा लग सकता है।

जिस तरह से वे नहीं चाहते थे कि आम जनता को इस समूची महाविद्या का सरल ज्ञान हो जाए, ठीक उसी तरह आजाद भारत का एक तथाकथित प्रतिष्ठित और शारीरिक रूप से आजाद तथा मानसिक रूप से अंग्रेजी का गुलाम वर्ग भी शायद यह नहीं चाहता कि भारत की आम जनता को उसकी जन भाषा में उपरोक्त सभी जटिल भाषाई पहलुओं के साथ जटिल विषयों का ज्ञान प्राप्त हो जाए। यदि ऐसा हुआ तो सभी व्यक्ति कानून के अच्छे खासे जानकार हो जाएंगे। सभी को चिकित्सा संबंधी और राजस्व संबंधी सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारियां स्वयं प्राप्त हो जाएगी।

आम जनता का मेहनती और बुद्धिमान बच्चा बड़े-बड़े ओहदों को प्राप्त कर लेगा। जनता इतनी चालाक हो जाएगी कि वह हुक्मरानों, अफसरानों और बड़े – बड़े कारोबारियों के नको दम कर देगी। अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। इसके बिना आज की दुनियां में जीना असंभव है। आदि – आदि बातें इतनी ज्यादा सशक्त नहीं है, जीतने की इन तथाकथित अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम लोगों के निजी स्वार्थ है।

शिक्षा संबंधी एक बार खड़ी करना चाहते हैं।

ये लोग जानबूझकर आम जनमानस और विशिष्ट जनमानस के बीच में शिक्षा संबंधी एक बार खड़ी करना चाहते हैं ताकि इनकी और इनके परिवारों की प्रतिष्ठा और विशिष्टत्व बना रहे। बाकी जनमानस इनके आगे हाजिर सलामी करता रहे। यदि ऐसा नहीं है तो फिर विश्व के अनेक विकसित देशों के लोग अपनी भाषा को महत्व देकर तरक्की क्यों कर रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर हमारे पड़ोसी देश चीन को ही लिया जाए। क्या वह वैश्विक धरातल पर खड़ा नहीं हुआ है? खड़ा होना ही नहीं बल्कि उसे तो वैश्विक धरातल पर दौड़ना आता है।

यह बात अलग है कि आज वह करोना, सीमा विवादों, तथा कूटनीतिक राजनीतिक हलचलों के चलते चौतरफा घिरा हुआ है, परंतु इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि उसने आज जो तरक्की प्राप्त की है वह अपनी भाषा के बलबूते ही प्राप्त की है।

उसने सूक्ष्म से सूक्ष्म विज्ञान को अपनी जन भाषा में लोगों को मुहैया करवाया और प्रत्येक व्यक्ति को इतना दक्ष बनाया कि वह छोटे से लेकर बड़ा प्रोडक्ट तैयार करने के लिए सक्षम है।

हमारे भारत में हमारे बच्चों की आधी जिंदगी तो अंग्रेजी सीखने में ही गुजर जाती है। जब उसे अंग्रेजी का थोड़ा बहुत ज्ञान होता है तो तब वह कहीं वैज्ञानिक पहलुओं को समझने लगता है। जितने को वह इन वैज्ञानिक पहलुओं की थोड़ी सी समझ तैयार करता है, उतने को उसकी जिंदगी ढल चुकी होती है।

मुझे राष्ट्रभाषा का दर्जा दो।

हमारी तो आज हालत यह है कि हम न तो अंग्रेजी के हो पा रहे हैं और न ही हिन्दी के रह गए हैं। हिंदी ने हर भाषा को अपने भीतर समेटा। तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी आदि विशाल शब्दकोश के साथ अब हमारे सामने खड़ी है। हमें पुकार रही है कि “मैं तुम्हारे हिसाब से हर तरह से ढलने को तैयार हूं, पर तुम मेरा दर्द समझो और मुझे राष्ट्रभाषा का दर्जा दो। मुझे हजारों सालों से आक्रांताओं के द्वारा कुचलने की पूरी कोशिश की गई, पर मैं तुम्हारे लिए आज तक जिंदा हूं।”

दुख तब होता है जब आजादी के इतने लंबे दौर के बाद भी हम अपने देश की जन भाषा को राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं दे पा रहे हैं। माना कि उस दौर में सब कुछ अंग्रेजी में और मुगलिया सल्तनत की भाषा शैली में प्रारूपित था। उस सब को एकदम से तब्दील नहीं किया जा सकता था।

परंतु आज तक तो धीरे-धीरे सब कुछ बदला जाना चाहिए था ना। फिर क्यों नहीं बदला गया? क्या यह एक साजिश है? ऐसे बहुत सारे सवाल आज की नई पीढ़ी के भीतर घर कर रहे हैं। हमारी हालत आज ऐसी हो गई है कि एक वाक्य में यदि चार शब्द हम अंग्रेजी के रूआब झड़ने के लिए बोलना शुरू करते हैं तो हर पांचवा शब्द हिन्दी का बोलना ही पड़ता है।

यह हालत बड़े से बड़े तथाकथित विद्वानों की भी कई बार हो जाती है। ऐसे में क्यों फिर यह बवंडर बना कर रखा है? क्यों न हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्रदान करके भारतीय जनमानस के शैक्षिक धरातल पर प्रस्तुत किया जाता है? ताकि आम व्यक्ति लूटने से बचे और अपने भारत के पुरातन विज्ञान को अपनी जन्म भाषा में खंगाल कर भारत को पुनः विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित कर सकें।

विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में एजुकेशन हब।

हम इतिहास को जानते है। हमें यह मालूम है कि एक समय भारत और चीन दो ऐसे देश थे जो पूरे विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में एजुकेशन हब माने जाते थे। भारत की तक्षशिला और नालंदा यूनिवर्सिटी पूरे विश्व में शिक्षा के लिए विख्यात थी।

क्या वहां पर उस दौर में अंग्रेजी में शिक्षा दी जाती थी? नहीं ऐसा नहीं है। यदि उस दौर में हमारी जन भाषा में या फिर संस्कृत में शिक्षा ग्रहण करने लोग बाहर से हमारे देश में आते थे, तो आज भी आ सकते हैं।

परंतु इस सब के लिए राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति का होना और भारतीय जनमानस को अंग्रेजी मानसिकता की गुलामी से मुक्त करवाना बहुत जरूरी है। चीन ने तो अपनी भाषा को आज तक बनाए रखा है, इसीलिए वह आज विकसित की श्रेणी में है शायद। और एक हम हैं कि अपनी भाषा को तवज्जो ही नहीं देना चाहते।

आज लोग अधिकतर मैकाले को ही हिन्दी की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। मैं कहूंगा इसमें न तो अंग्रेजी का दोष है और न ही तो मैकाले का। वे दोनों सन 1947 में भारत छोड़कर चले गए थे। फिर क्यों आजाद भारतीयों ने उनके द्वारा स्थापित किए गए मापदंडों को हारिल की लकड़ी की तरह पकड़ के रखा?

क्या हमारे आजाद देश की राजनीति, व्यवस्था और जनता इतने आलसी हो गए कि आजादी के 74 साल बीत जाने के बाद भी उन अंग्रेजों और मुगलों द्वारा प्रतिस्थापित किए गए मापदंडों को हटाकर हिंदी में प्रतिस्थापित नहीं कर सके? यह दोष न मुगलों का है और न ही तो अंग्रेजों का है।

यह हमारी राजनैतिक और व्यवस्था जनक साजिशों का परिणाम है। आज पार्टियां भले ही एक दूसरे के सिर पर इस बात का ठीकरा फोड़ती हो। परंतु यह कटु सत्य है कि ये सब पार्टियां सत्ता में बारी बारी से आ चुकी है। सब का यही परिणाम है। इसके लिए जनता भी कम उत्तरदाई नहीं है।

विदेशों में प्रतिष्ठित लोगों के घरों में भी अपनी भाषा की पत्रिकाएं और समाचार पत्र पढ़ने को मिलेंगे। एक हमारा देश है, जिसमें बड़े – बड़े घरानों में अपनी भाषा के पत्र – पत्रिकाओं के स्थान पर अंग्रेजी भाषा के अखबार या पत्रिकाएं पढ़ने को मिलेंगे। हमारे भारत के उच्च मध्यवर्गीय या फिर उच्च वर्गीय लोग तो इसको अपनी शान समझते हैं और हिन्दी में कुछ पढ़ना – लिखना अपनी तौहीन समझते हैं।

यह भी सत्य है।

यह भी सत्य है कि देश की सत्ता और व्यवस्था में इन्हीं लोगों का सिक्का चलता है। आम जनता का उसमें कोई लेना-देना नहीं होता। वह तो महज वोटर थी, है और रहेगी शायद।

फिर क्यों जनाक्रोश का बहाना बनाकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया जाता? यदि ये तीन समुदाय के लोग अपनी एंठ और राजनैतिक स्वार्थ छोड़ दें, तो भारत के किसी भी प्रांत और किसी भी धर्म, जाति तथा संप्रदाय के लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने से कभी मना नहीं करेंगे।

समूची शिक्षा प्रणाली भारतवर्ष में हिंदी होना चाहिए।

वैश्विक धरातल पर आज हिंदी का बोलबाला धीरे-धीरे हो रहा है। हमारे कई कवि महोदय और धर्मगुरु विदेशों में अपने धर्म का प्रचार – प्रसार और कविताओं का प्रचार – प्रसार करने जाते हैं।

करोड़ों की तादात में लोग विदेशों में भी उनके अनुयाई बन चुके हैं, तो फिर हमारी सरकारें और व्यवस्थाएं यह कैसे कह सकती है कि हिन्दी वैश्विक धरातल पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती? अंग्रेजी पूरे विश्व की भाषा है, इसलिए इसे महत्व देना ही होगा।

इन प्रचार – प्रसारों से यह स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि हिन्दी कमजोर नहीं है, कमजोर है तो वह है हमारी अपनी मानसिकता। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में यदि कोई रोड़ा है तो वह हमारी अंग्रेजी की गुलाम मानसिकता ही है, दूसरा कोई नहीं है।

अंग्रेजी बुरी नहीं है और न ही तो कोई दूसरी भाषा बुरी है। परंतु मेरे कहने का अर्थ यह है कि इन भाषाओं को मात्र एक विषय के रूप में, अन्य भाषाओं को सीखने की दृष्टि से स्कूलों कालेजों में पढ़ाया जाना चाहिए।

न कि इन्हें समूची शिक्षा प्रणाली का माध्यम बनाना चाहिए। समूची शिक्षा प्रणाली का यदि कोई माध्यम हो, तो भारतवर्ष में वह हिंदी होना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने से देश को कोई घाटा होगा बल्कि उल्टा मुनाफा होगा।

नई शिक्षा नीति।

आज जो नई शिक्षा नीति भारत में अधिसूचित की गई है उसमें प्रारंभिक स्तर पर स्थानीय भाषाओं को महत्त्व जरूर दिया गया है, परंतु हिन्दी को पूर्ण मान – सम्मान वहां भी नहीं मिल पाया है।

उच्च शिक्षाओं की किताबे फिर से उन्हीं जटिल भाषा और शिल्प में ही पढ़नी पड़ेगी। एक लंबे अरसे के बाद बड़ी जद्दोजहद के बाद भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने इस मसौदे को मंजूरी दी। पर उस मंजूरी में भी हिन्दी को न्याय नहीं मिल सका। प्रारंभिक स्तर में तो पहले भी ऐसी व्यवस्था थी।

हम लोगों ने अंग्रेजी पांचवी या छठी के बाद पढ़ी है। मेरे हिसाब से यह हिन्दी के लिए कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो पाया है। महत्वपूर्ण तो तब होता जब उच्च शिक्षा व्यवस्था में भी हिन्दी भाषा में ही शिक्षा देने का प्रावधान किया जाता। परंतु यह हमारे देश के शिक्षाविदों को और सत्ता धारियों को रास नहीं आया शायद।

आजादी से आज तक निरंतर राष्ट्रभाषा हिन्दी बनने का सपना बहुतों ने संजोया और वह अभी तक संजोया हुआ ही रह गया है। बस उम्मीद बाकी है कि एक न एक दिन यह सपना जरूर पूरा होगा। अब देखना यह है कि इस मुद्दे पर कौन कब क्या करता है? मेरे देश की आम जनता को कब न्याय मिलता है?

नोट: यह आर्टिकल बड़ा है, अगर आप एक बार में पूरा आर्टिकल नहीं पढ़ पा रहे है तो घबराये नही, आर्टिकल के लिंक को अपने लैपटॉप या कंप्यूटर / स्मार्टफोन के ब्राउज़र पर बुकमार्क कर ले, जिससे आप इस आर्टिकल को दो से तीन बार में पूरा पढ़ ले।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में आखिर कब तक रुकावट आता रहेगा। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का कब और किसके द्वारा क्या प्रयास हुआ, इसका विस्तार से वर्णन किया है। हिन्दी भाषा के महत्व को भी समझाया है, सभी जानते है की भारत देश में एकमात्र हिंदी भाषा ही राष्ट्रभाषा बनने लायक हैं। आखिर क्यों हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बनाया जा रहा है। क्यों हम अंग्रेजो की बनाई हुई नीति को आज तक ढ़ो रहे है। अपने आप से हम सभी क्यों प्रश्न नहीं करते की – मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेजी के गुलाम क्यों है। बहुत जल्द हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना ही होगा, इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। किसी भी देश के विकास के लिए एक राष्ट्रभाषा का होना बहुत जरूरी है।

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यह लेख (हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में कौन बना है रोड़ा?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

ठंडी व्यार।

रिश्तों को निभाना सीखो।

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