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हेमराज ठाकुर

पशु बलि।

Kmsraj51 की कलम से…..

Animal sacrifice | पशु बलि।

Pashu Bli

न जाने समाज क्यों, कुछ पिशाचियत पर अड़ता है?
बे ज़ुबान निरीह पशुओं की, बलि चढ़ाने पर लड़ता है।

देवताओं के नाम पर लेता है, जान इन बे जुबानों की।
क्यों भुल जाता है फितरत तब, समाज यहां इंसानों की?

सनातन संस्कृति के भाल पर, बलि प्रथा एक कलंक है।
कर्म दण्ड तो प्रभु सबको देगा, चाहे राजा हो या रंक है।

जिद करता है देव समाज, “न बलि तो सबको देनी होगी।”
विवश करते है देवता को भी, बलि तो तुझको लेनी होगी।

कारिंदों की जिद के चलते, देवता सदियों से बलि लेता है।
दहशत फैलाई जाती है, जो न दे, उसकी जान भी लेता है।

कौन हुआ है अमर अब तक, इन पशुओं की जान चढ़ाने से?
मैं करता हूं ऐसे कई सवाल, कई बार इस बिगड़े जमाने से।

सब जानते हैं कि गलत है यह सब, पशु बलि सच खोटी है।
फिर भी अपनी जान बचाने के भ्रम से, मार काट तो होती है।

इसी से ही कई जगहों पर, हमारे देवों की बदनामी होती है।
सनातन संस्कृति की दया धर्मिता, हमारी नादानी खोती है।

पिशाच नहीं तो क्या है फिर हम, जो दया धर्म है छोड़ दिया।
वैदिक पुरखों के सनातन धर्म को, स्वाद, स्वार्थ में तोड़ दिया?

देव न लेता है जान किसी की, फिर वह काहे का देव हुआ?
बस कारिन्दों की मांसाहार की चाह, बलि लेता है देव हुआ।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सभी धर्मों में जीव-हिंसा को बहुत बड़ा पाप माना गया है। जो धर्म प्राणियों की हिंसा का आदेश देता है, वह कल्याणकारी हो सकता हैं, इसमें किसी प्रकार भी विश्वास नहीं किया जा सकता। धर्म की रचना ही संसार में शांति और सद्भाव बढ़ाने के लिये हुई है। लेकिन आज का मानव अपने स्वाद के लिए बलि के नाम पर बेजुबान निर्दोष प्राणियों की हिंसा कर अपना पेट भरने लगा। हे मानव अब भी समय है छोड़ दो “बेजुबान निर्दोष प्राणियों की हिंसा” कर अपना पेट भरना और बलि के नाम पर उनकी हत्या करना।

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यह कविता (पशु बलि।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हस्पताल की।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hospital | हस्पताल की।

उदासी में उगती हर सुबह यहां की,
उदासी में डूबती हर सांझ और रात।
उदासी में ही बीतता है दिन भी सारा,
बीमार बेटे के देख कर बिगड़े हालात।

कभी दिमाग में इन्फेक्शन तो कभी,
दिल में छेद की डाक्टर कहता बात।
हर रोज बीमारी नई – नई सुन कर,
कैसे खुश रहता जवान बेटे का बाप?

कब तक छुपाऊं बेटे से कितना और कैसे?
परेशान मां, दादी, छुटकू, कुल कुनबा साथ।
एक ही आश विश्वास कि रब राखेगा अब,
उसके आगे भला किसकी क्या औकात?

सिर तो फाड़ा है सीना भी चीरना है,
क्यों कर उदास न होगा एक बाप?
यह जगह है, जहां पैसा तो चाहिए ही,
पर सबसे ज्यादा चाहिए रब का साथ।

गुरुद्वारे का कीर्तन चहुँ ओर है गूंजता,
मस्जिद की गूंजती है ऊंची सी अजान।
मंदिरों का शंख – घंटा नाद भी है गूंजता,
पर तुम कहां छुपे हो हे करुणानिधान?

भूत का प्रारब्ध है भोग रहे यह या कि,
भविष्य का संचित वर्तमान का क्रियमाण?
पूछता हूं बार – बार सवाल कई ऐसे बस,
निरुत्तर है दीवारें हस्पताल की आलिशान।

जानता हूं हर जन्म का अन्त मरण है,
वह आएगा, यह एक कड़वी सच्चाई है।
अस्त व्यस्त हो जाए जवानी में जीवन,
कुदरत की भला इसमें कौन भलाई है?

हँसने खेलने के जो दिन होते हैं जीवन के,
क्या बीत जाएंगे बेटे के रोग शोकों में नाथ?
आक्रोश घना है, उतारूं तो उतारूं किस पर?
मानुष जीवन की विवशताएं कही न जात।

हर दोष दूसरों के ही सर पर मढ़ना,
यही तो फितरत जगत में इंसानी है।
गुनाह जरूर हमारा ही होगा दाता,
यह आक्रोश व तुझ पर मढ़ना दोष,
यह हमारी मनुष्य सोच की नादानी है।

Note : यह रचना मैंने अपने जीवन के वर्तमान हालात पर लिखी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कभी दिमाग में इन्फेक्शन तो कभी, दिल में छेद की डाक्टर कहता बात। हर रोज बीमारी नई – नई सुन कर, कैसे खुश रहता जवान बेटे का बाप? सिर तो फाड़ा है सीना भी चीरना है, क्यों कर उदास न होगा एक बाप? यह जगह है, जहां पैसा तो चाहिए ही, पर सबसे ज्यादा चाहिए रब का साथ। हँसने खेलने के जो दिन होते हैं जीवन के, क्या बीत जाएंगे बेटे के रोग शोकों में नाथ? आक्रोश घना है, उतारूं तो उतारूं किस पर? मानुष जीवन की विवशताएं कही न जात। जीवन को दर्द और आनंद के मिश्रण के रूप में देखने की हमारी क्षमता हमें जीवन को उसकी पूर्ण सीमा तक अनुभव करने की अनुमति देती है। जब आनंद आता है तो हम उसके लिए खुलना सीखते हैं, इसे अपनी इंद्रियों के माध्यम से लेना और इसकी सराहना करना सीखते हैं, ज्ञान के साथ यह एक आगंतुक है जो आता है और जाता है।

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यह कविता (हस्पताल की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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विज्ञान और ज्ञान की जंग।

Kmsraj51 की कलम से…..

War of Science and Knowledge | विज्ञान और ज्ञान की जंग।

विज्ञान और ज्ञान की जंग मानव समाज में बहुत पुरानी है। भारतीय पौराणिक कथाओं को पढ़े तो सुरों – असुरों या देव – दानवों की मुख्य लड़ाई ही शायद विज्ञान और ज्ञान की थी। सुर या देव जहां ज्ञान आधारित जीवन पद्धति के समर्थक थे तो असुर या दानव विज्ञान आधारित जीवन पद्धति के समर्थक थे शायद। ज्ञानाधारित जीवन पद्धति यदि मर्यादाओं, शालिंताओं, आस्थाओं और विश्वासों पर टिकी थी तो उसका मनोबल और नैतिक चरित्र भी उतना ही दृढ़ और उन्नत था।

उदाहरणार्थ — ऋषि मुनियों का जीवन देखा जा सकता है। वहीं आसुरी सिद्धांत की परम्परा इसके विपरित थी। वे स्व को महत्व देते थे तथा पुरुषार्थ को ही सब कुछ मानते थे। ज्ञानाधारित शिक्षा पद्धति परमार्थ प्रधान थी तो विज्ञानाधारित शिक्षा पद्धति स्वार्थ प्रधान थी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आसुरी सिद्धांत “वीर भोग्य वसुन्धरा” की सूक्ति पर चलता था।

असुर चमत्कार को प्रणाम करते थे तो देव और मानव भगवान को। तब सुरा, सुन्दरी, मांस, मदिरा का सेवन आसुरी प्रवृति का द्योतक था तो आज इनके सेवन से रहित प्राणी को गवार समझा जा रहा है। आज समाज की दशा और दिशा अलग होती जा रही है। आज पश्चिम की विज्ञानधारित शिक्षा पद्धति ने भारतीय समाज को पूरी तरह से जकड़ लिया है। जिसके चलते आज का मानव चालाक तो बहुत हो गया है पर मानसिक रूप से कमजोर और मलिन बहुत हो गया है। अब तो जबरन कहना पड़ता है:-

अपने ही देश में, अपनी ही सभ्यता संस्कृति बेगानी हो गई।
बस इसी के ही चलते, पश्चिम को घुसने में आसानी हो गई।

यह बात भी झुठलाई नहीं जा सकती कि संस्कारों, व्यवहारों तथा प्रतिकारों की जद्दोजहद नई और पुरानी पीढ़ी में हमेशा से चलती आई है और यह चलती रहनी चाहिए। क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और परिवर्तन संघर्ष धर्मी प्रक्रिया है।

सकारात्मक परिवर्तन सामाजिक विकास के लिए जरूरी है फिर भले ही पुरानी पीढ़ी चाहे उसका प्रतिकार ही क्यों न करती रहे। हां नकारात्मक परिवर्तन का प्रतिकार नई पीढ़ी को भी स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि हम मानव प्राणी है और मानव प्राणी होने के कारण हमे मानव समाज के हित के लिए प्रतिस्थापित नीति और नियमों को सहेज कर रखना चाहिए।

फिर भले ही वे नियम अवैज्ञानिक या अप्राकृतिक ही क्यों न हो। यदि ऐसा न किया गया तो सदियों से संस्कृति और सभ्यता की मर्यादाओं में बंधा मानव समाज पढ़ा लिखा पशु समाज बन जाएगा; जिसमें न ही तो दया शेष रहेगी और न ही लाज शर्म।

वह जंगली जीवन की तरह कामुक और शक्ति आधारित हो जाएगा। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। वह एक मनमुखी समाज को जन्म देगा, जो मानव समाज के लिए सुखद अनुभव नहीं होगा।

हमारी शिक्षा पद्धति भक्ति प्रधान थी तो आज हम पर संचालित मैकाले माडल की पश्चिमी शिक्षा आसक्ति और शक्ति आधारित हो गए है। यही कारण है कि आज समाज मानसिक रूप से तो अपवित्र होता जा रहा है पर शारीरिक तौर पर पवित्र और सुन्दर बनने की कोशिश कर रहा है। फिर वह बाह्य पवित्रता चाहे कासमैटिक फुहड़ता आधारित ही क्यों न हो।

आज सचमुच मानवीय मूल्यों का निरन्तर पतन होता जा रहा है। यह सब काम विज्ञान आधारित शिक्षा ने खराब किया है। हमारी ज्ञान आधारित शिक्षा बहुत उन्नत थी, है और रहेगी। हमारे यहां योग को महत्व दिया जाता है और उनके पश्चिम में प्रयोग को महत्व दिया जाता है। हमारे यहां प्यार को महत्व दिया जाता है तो उनके वहां विकार को महत्व दिया जाता है। हमारे यहां सम्भोग को दर्शन की दृष्टि से देखा जाता है तो उनके वहां सम्भोग को प्रदर्शन की दृष्टि से देखा जाता है शायद। यदि ऐसा नहीं है तो वर्तमान समाज में युवा पीढ़ी में फिल्मी जगत से प्रभावित हो कर अंग प्रदर्शन और अल्प वस्त्रीकरण की अवधारणा क्यों कर उत्पन हुई? क्या यह पछुआ का प्रभाव है या फिर कुछ और?

विज्ञान के मतानुसार संतानोत्पत्ति के लिए एक स्त्री और एक पुरुष चाहिए। वे आपस में रति क्रीड़ा करके दैहिक आनंद भी ले सकते हैं और संतान भी पैदा कर सकते हैं। उनके अनुसार यही प्राकृतिक नियम है। इसलिए मानव जाति को अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भौतिक, रासायनिक और जैविक जरूरतों को पूरा करना कोई अपराध नहीं है।

जैसे पशु समाज में नर – मादा संयोग ही उत्पत्ति का आधार होता है। फिर वे नर – मादा सगे भाई – बहन हो या फिर मां – बेटा या पिता – पुत्री। पूरी तरह से ऐसी तो नहीं पर कुछ ऐसी ही आजादी आज की युवा पीढ़ी चाहती है शायद। यदि उन्हे उनके मन माफिक आजादी मिली तो वह दिन भी दूर नहीं है, जिस दिन मानव और पशु समाज के संतानोत्पत्ति के क्रिया व्यापार एक जैसे हो जाएंगे। कोई नाता रिश्ता नहीं रहेगा। वे रति क्रीड़ा, व्यसनीय क्रीड़ा और सौंदर्य प्रदर्शन में, अंग प्रदर्शन की पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं। इस प्रणाली में अमर्यादा में जीना ही मानव जीवन का उद्देश्य समझा जाता है शायद। यहां चरित्र नाम की कोई चीज नहीं होनी चाहिए, ऐसी अवधारणा है।

जबकि हमारी संकृति ज्ञानाधारित शिक्षा की समर्थक है। यहां संतानोत्पत्ति के लिए एक पति और एक पत्नी मानव समाज में होना जरूरी है। यहां नातों रिश्तों की मानवीय सामाजिक नियमावली का बड़ा महत्व है। जो मानव समाज में बहुत ही जरूरी है। यहां पड़ोस की लड़की को भी लड़का बहन कहता है और लड़की उसे दिल से भाई कहती है। पर हां पछुआ रीत जब से आई है अब यह रिवायत बदलती जा रही है। बहन का स्थान मैडम और भाई का स्थान सर ने ले लिया है।

अब स्त्री – पुरुष एक दूसरे को भाई – बहन कहने से कतराते हैं। यहां पर स्त्री को बुरी नजर से देखना और पर पुरुष को बुरी नजर से देखना घोर अपराध समझा जाता हैं।यहां मर्यादा का पालन करना मानव जीवन का उद्देश्य समझा जाता है। यहां चारित्रिक पवित्रता की प्रधानता को महत्व दिया जाता है।

वहां पश्चिम में सब विपरीत है। हमारे गर्ल फ्रेंड या बॉय फ्रेंड की अवधारणा ही नहीं है और आज यह चलन भारतीय समाज में आम हो गया है। प्रेमी – प्रेमिका का रिश्ता हमारे यहां मुखर था और वह कुछ यूं था कि वे एक दूसरे के लिए मर मिटने वाले होते थे। प्रेमी के मृत्यु को प्राप्त होने पर प्रेमिका कई बार जौहर तक कर लेती थी। यह उनका पवित्र प्रेम और समर्पण था।

पर वहां पश्चिमी रिवायत में इसे तर्क की कसौटी पर कसा जाता है और इसे कोरी मूर्खता और नारी का शोषण कहते हैं। ठीक है कि यह नारी के ही साथ क्यों होता था।पत्नी की मृत्यु पर फिर पुरुषों को भी जौहर करना चाहिए था। पर यह भी झुठलाया नहीं जा सकता है कि जो माताएं बहनें जौहर करती थी, वे मानसिक रूप से कितनी दृढ़ और समर्पित रही होगी?

यही वे कारण थे जिनसे विदेशी उपनिवेशकों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करने की विचारणा जागी। उन्हे लगा कि यदि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के शैक्षिक ढर्रे को पश्चिमी रीत में नहीं बदला गया तो इनका मनोबल तोड़ना बहुत ही मुश्किल होगा। जो उनके उपनिवेशवाद की राह में निरन्तर रोड़ा बनता जा रहा था।

हमारे भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति थी। जिसमें अर्थोपार्जन की शिक्षा बाद में दी जाती थी, पहले सामर्थ्य उपार्जन और जनोपार्जन की शिक्षा दी जाती थी। हमारे यहां शिक्षार्थी को सरकारी सेवाओं में तैनात होने की शिक्षा बाद में दी जाती थी। पहले उसे मानव बनने की शिक्षा दी जाती थी। ऐसा नहीं है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में विज्ञान नहीं था। ऐसा विज्ञान था कि सुन कर सब दंग रह जाए। हमारे यहां शरीर छोड़ कर आत्मा को आकाश में भ्रमण कराने की विद्या आती थी।

पढ़े योग वशिष्ठ, जिसमें महर्षि वशिष्ठ भगवान राम को उस विद्या से परिचित करवाते हैं। भगवान शिव को मनुष्य का सिर काटकर पर जीवो का शीश स्थापित करने की विद्या भी आती थी। उदाहरण श्री गणेश जी और प्रजापति दक्ष के सिरों का पुनर्स्थापन है। पर यह विद्या अपात्र अर्थात स्वार्थी लोगों को नहीं दी जाती थी। यदि यह अपात्र को दी भी गई होती तो अनर्थ हो गया होता।

आज भले ही वे परम गोपनीय विज्ञानाधारित रहस्य हमारे पुरखों के साथ दफ़न हो गए हो। पर वह अपने आप में एक परम विज्ञान था। यदि ऐसी कला आज के वैज्ञानिक युग में हमे आ जाती तो हम तो अपने आप को ही हिरण्याक्षिपु की तरह भगवान कहलवाने लगते। अपनी ही संतानों के दुश्मन बन बैठते। छुटपुट उदाहरण तो फिर भी ऐसे देखने को आज भी मिल ही जाते हैं।

भारत में आज भी ऐसे वैद्य विद्यमान हैं, जो नाड़ी पकड़ कर आदमी का सारा एम आर आई, सी टी स्कैन तथा एक्स रे कर दे। मानो वे चलती फिरती सजीव पारदर्शी मशीनें हैं। पर उस सामर्थ्य उपार्जन वाली कड़ी साधना वाली विद्या को कोई क्यों सीखे और उसे कोई विज्ञान क्यों कहे? क्योंकि वह विद्या अनुशासन प्रधान है और आज आदमी अनुशासन चाहता ही नहीं है।

यह परम सत्य है कि 84 लाख योनियों से भटकता – भटकता मुश्किल से जीव अन्त में कहीं मनुष्य योनि में जन्म लेता है। बाकी सारी योनियां पशु योनियां या जड़ योनियां हैं। ऐसे में पाश्विकता का मनुष्य में रहना स्वभाविक है। पर वह पाश्विकता हमारे व्यवहार में दिखे, इसका मानव समाज में प्रतिकार अनादि काल से होता आ रहा है और होना भी चाहिए।

सभी जानते हैं कि विवाह करने के पश्चात पति – पत्नी क्या करते हैं? यहां तक कि मां – बाप, बहन – भाई सबको नव युग्म के पारस्परिक पति – पत्नी व्यवहार का पूरा पता होता है पर इसका यह मतलब तो कतई नहीं होता कि वे दोनों पति – पत्नी व्यवहार खुले आम पशुवत करे।

मानव समाज में हर कार्य की एक मर्यादा होती है, जो रहनी भी चाहिए। वरना मानव और पशु समाज में कोई खास अन्तर भविष्य में नजर नहीं आएगा। भविष्य पुराण और सूक्ष्म वेद की भविष्यवाणी क्यों इतनी पहले ही सिद्ध होती जा रही है कि घोर कलियुग में न ही तो सेवा, साधना रहेगी और न ही तो प्यार – प्रेम। हर नर – नारी चरित्रहीन होंगे और अल्पायु होंगे। नातों रिश्तों की कोई कद्र ही नहीं होगी।

खैर यह कहना भी गलत होगा कि विज्ञान पूरी तरह से खराब है। पर कई ऐसे पहलू हैं, जहां विज्ञान का सहारा लेना कतई ठीक नहीं है। मानवीय मूल्यों के क्षेत्र में विज्ञान को ठूंसेंगे तो स्त्री-पुरुषों में झगड़ा हो जाएगा। सामाजिक मान्यताओं में उथलपुथल मच जाएगी। निरन्तर होते जा रहे मानवीय मूल्यों के पतन के चलते देश की शासनिक और प्रशासनिक ताकतों को नैतिक मूल्यों के प्रतिस्थापन के लिए स्कूली शिक्षा प्रणाली में आज पुरातन योग और संस्कार शिक्षा को भी जोड़ना होगा। तभी मनुष्यों का और मानव समाज का उत्थान सम्भव है।

हमे आज पुनः अपनी विकार के दमन की शिक्षा प्रणाली को पाठ्यक्रम में जोड़ना होगा। यदि यूं ही विकार को जागृत करने वाली प्रणाली हावी रही तो हमारी आगामी पीढ़ियां भीरू और अपंग पैदा होगी। क्योंकि अति किसी भी चीज की ठीक नहीं होती।जब आदमी अति विकारी या अति संस्कारी हो जाता है तो वह मानव समाज के संतुलन में नहीं बैठता। इसलिए सृष्टि के संचालन के लिए न ही तो अति विकार भला है और न ही तो अति संस्कार। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन समत्व को ही योग कहते है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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यह लेख (विज्ञान और ज्ञान की जंग।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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शहीद दिवस।

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Shaheed Diwas | शहीद दिवस।

सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह को फंदे पर लटकाया था।
23 मार्च के दिन को इसी लिए ही शहीद दिवस मनाया था।

भारत मां के इन लालों ने, अंग्रेजों के नाकों चना चबाया था।
भारत को आजाद करवाने हेतु अपना बलिदान चढ़ाया था।

मेरा रंग दे बसंती चोला माए, कह कर जो फंदे पर झूल गए।
दुख होता है आज कि हम उनको, क्यों और कैसे भूल गए?

जब लुटती रहती बहु – बेटियां और बच्चे – बूढ़े पीटते जाते।
दावे से कहता हूं कि ऐसे में, इन वीरों को कोई भूल न पाते।

हैरान हूं जग की रीत को, सुख दिलाने वालों को भुलाया है।
महता उसको देते हैं, जो हाल में ही, हमारे जीवन में आया है।

खुश रहो पर याद रखो कि, यह आजादी पुरखों की थाती है।
खून बहाया है पुरखों ने, जिस पर नव पीढ़ी हक जताती है।

इसे सहेजना न कि गढ़े मुर्दों को कुरेदना, हमारी जिम्मेवारी है।
पर हमे तो मौज मस्ती में खो कर, हो गई भूलने की बीमारी है।

चलो जी कहें तो क्या कहें? आज हमारे हाथों में सरदारी है।
जमाने का प्रभाव है यह सब या कि, हमारी सोच नकारी है?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कितने दुःख की बात है की हमसब देशभक्त भारत माता के असली पुत्रों (सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह) को भूल कर, फालतू लोगो को याद रखते हैं। ये भूल ना जाना की आज जो तुम्हे आज़ादी हैं ये इन्हीं की दें है, जो इनके बलिदान से ही मिला है। जान हथेली पर लेकर सभी दुश्मन का चीर सीना दिया। फिर से वीर भारत माँ के शहीद (सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह) हो गए । याद करेगा तुमको ये भारत सदैव और वंदे मातरम् गायेगा। फिर से वीर भारत माँ के शहीद हो गए।

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यह कविता (शहीद दिवस।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नव संवत्सर आया है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Nav Sanvatsar Aaya Hai | नव संवत्सर आया है।

आओ रे भैया, आओ री बहना, नव संवत्सर आया है।
हमारे पुरखों ने भारत में, नया साल यहीं से मनाया है।

ब्रह्मा ने सृष्टि रची, राम, युधिष्ठिर राज्याभिषेक कराया है।
अंगददेव और संत झूलेलाल, इसी दिन जग में आया है।

चैत्र नवरात्र का शुभारम्भ है भाई, नव संवत्सर मनाया है।
विक्रमादित्य ने विक्रमी संवत को, इसी दिन से चलाया है।

दयानन्द ने इसी दिन ही, आर्य समाज स्थापित कराया है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हेडगेवार, आज जग में आया है।

भूल न जाए नई पीढ़ी, निज संस्कृति को याद करवाया है।
हमारे पुरखों ने सदियों से, नया साल आज से ही मनाया है।

रक्त में रवानगी, मौसम में दिवानगी, ले कर यह पर्व आया है।
चारो ओर को हरियाली ही हरियाली का आलम छाया है।

फैसले है लहलाती, तरु है फूले, वन पांखी कुल चहचाया है।
कुदरत के कण – कण ने मानो, आज नव संवत्सर मनाया है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — विक्रम-संवत के अनुसार नव वर्ष का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ‘विक्रम संवत’ अत्यंत प्राचीन संवत है। भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत ‘विक्रम संवत’ ही है। ‘विक्रम संवत’ के उद्भव एवं प्रयोग के विषय में विद्वानों में मतभेद है। मान्यता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व ५७ में इसका प्रचलन आरम्भ कराया था। फ़ारसी ग्रंथ ‘कलितौ दिमनः’ में पंचतंत्र का एक पद्य ‘शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनम्’ का भाव उद्धृत है। विद्वानों ने सामान्यतः ‘कृत संवत’ को ‘विक्रम संवत’ का पूर्ववर्ती माना है। विक्रम संवत :​​ विक्रम संवत में सभी का समावेश है।

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यह कविता (नव संवत्सर आया है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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यह डूबती सांझ।

Kmsraj51 की कलम से…..

Yah Doobati Sanjh | यह डूबती सांझ।

यह डूबती सांझ देखो, लेके, घना अंधेरा आएगी।
दिन भर की आपाधापी से, हमे मुक्ति दिलाएगी।

यह बात सच है कि यह, दैनिक प्रकाश छुपाएगी।
यह भी तो सच है कि, यह अपनी गोद में सुलाएगी।

मुमकिन है यह कि रात अंधेरी, हर दृश्य छुपाएगी।
पर यह भी वाजिब है कि, यह स्वप्न भी दिखाएगी।

कौन कहता है कि हर सांझ, दिवस को ही खाएगी?
मालूम है जग को यह भी कि, फिर नई भोर आएगी।

नाउम्मीदी में जीने से तो हमेशा, निराशा ही छाएगी।
सांझ ही तो रात को ला कर, सब थकान मिटाएगी।

आशावान को तो यह सांझ, पास मंजिल सी भाएगी।
निराशावान के लिए तो उसका, सारा संसार खाएगी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हम सब ये जानते है की सूर्यास्त के बाद शाम होगी ही और शाम होगी तभी रात भी होगा और इंसान दिन भर के कार्य से थका हारा आराम की नींद, ले पाता है जिससे उसकी सारी थकावट दूर होती है। आशावान को तो सदैव ही यह सांझ, पास मंजिल सी भाएगी, लेकिन निराशावान के लिए तो उसका, सारा संसार खाएगी। क्योकि आशावान जनता है की फिर भोर होगी और सूर्य उदय होगा। इसी तरह से जीवन में भी जब चारों तरफ से मुसीबत आ जाए तो घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि कोई भी समय लंबे वक्त तक नहीं रहेगा, उसके बाद अच्छा समय भी आएगा। इसलिए सदैव ही आशावान बने रहे और अच्छे कार्य करते चले जीवन में, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।

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यह कविता (यह डूबती सांझ।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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आई है होली।

Kmsraj51 की कलम से…..

Aaee Hai Holi | आई है होली।

होली रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।

आई है होली चौहूं ओर लोग झूमे हैं नाचे, रंगों की बौछार है।
किसी के दिल में वासनाएं हैं घनी, किसी के प्यार ही प्यार है।

आई है होली हरदम हृदय को, छेड़-छेड़ कर ये आती है।
फाल्गुन मास की यह क्रीड़ा, किसके मन को न भाती है?

कुदरत करती है वसंती श्रृंगार, तो हवा भी होती मदमाती है।
फूलों से सजते वन उपवन हैं, चौहूँ ओर से खुशबू आती है।

होलिका दहन से उपजी यह क्रीड़ा, ऐसे ही बस चलती है।
बुराई का दहन अच्छाई का वहन, परम्परा यूं ही फलती है।

बरसाणे की होली, कृपाण व गोली, रक्तिम रंग से खेली है।
वे प्रेम के रंग से खेले, इन्होंने प्रणाहुतियों की पीड़ा झेली है।

मलिन मन क्या जाने होली का उत्सव? पावनता जरूरी है।
तन के रंगने से नहीं मन के रंगे बिन, होली सबकी अधूरी है।

मौसम के बदलाव की, नव फसलों के उगाव की, यह धुरी है।
संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की, होली की क्रीड़ा पूरी है।

उछलते कूदते, नाचते गाते, खलियानों में युवक युवती है।
बाल वृद्ध सबको निज पाश में, बांधने की इसमें युक्ति है।

वीर शहीदों ने फिरंगी संघ, होली खेल के यातनाएं भुक्ति है।
प्रेम गुलाल से जो खेलेगा होली, उसी के लिए यह मुक्ति है।

नदी मानिद बहती परंपराएं, विकार आए हो कहां रुकती है?
भारत की अनूठी पर्व यात्रा, किसी के टोके कहां टूटती है?

बहन, भाई, मां, बेटी, पत्नी, पिता को, होली के रंग ही लहदे हैं।
प्रेम है सब में, पर रूप अनेक है, यही तो रिश्तों के ओहदे हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आत्मिक प्रेम, निस्वार्थ स्नेह, करुणा व मानवता का पवित्र महापर्व होली हैं। अपने सम्पूर्ण विकारों को अग्नि को समर्पित कर एक अच्छे व सच्चे योगी जैसे पवित्र जीवन के नियमों के अनुसार जीना ही सच्ची होली हैं। याद रहे मलिन मन क्या जाने इस होली का उत्सव? पावनता तो जरूरी है। तन के रंगने से नहीं मन के रंगे बिन, होली सबकी अधूरी है। मौसम के बदलाव की, नव फसलों के उगाव की, यह धुरी है। संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की, होली की क्रीड़ा पूरी है। बहन, भाई, मां, बेटी, पत्नी, पिता को, होली के रंग ही लहदे हैं। प्रेम है सब में, पर रूप अनेक है, यही तो रिश्तों के ओहदे हैं। भक्त प्रह्लाद विष्णु के भक्त थे। हिरण्यकश्यप के वध के बाद वे ही असुरों के सम्राज्य के राजा बने थे। प्रहलाद के महान पुत्र विरोचन हुए और विरोचन से महान राजा बलि का जन्म हुआ जो महाबलीपुरम के राजा बने। इन बलि से ही श्री विष्णु ने वामन बनकर तीन पग धरती मांग ली थी।

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यह कविता (आई है होली।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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पिता की सीख ही सच्ची थी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Pita Ki Seekh Hi Sacchi Thi | पिता की सीख ही सच्ची थी।

“कहलाना तो है मानव हमको,
पर पशु सा हमे सब करने दो।
पिता हो तुम तो फिर क्या हुआ?
हमे मर्जी से ही सब करने दो।”

“जन्म दिया और पाला – पोसा,
पढ़ाया – लिखाया, बड़ा किया।”
“कौन सा तीर मारा है तुमने?
फर्ज मां – बाप का अदा किया।”

“धन्य लला तुम जो जान खपा कर,
आज तुमसे ये शब्द उपहार मिला।
नेकी कर दरिया में डाल का उम्दा,
पितृ कर्म का उत्तम उपकार मिला।

निवाला अपने मुंह का छीन कर,
तेरे मुंह में, इसी लिए ही डाला था?
नूर गंवाया, तेरी मां ने तुझे जनाया,
क्या इसी लिए ही तुझे पाला था?”

सुन भारी-भरकम बोझिल शब्द पिता के,
हुए अनुगुंजित अधिभारित अनुशासित थे।
हुए अंकुशित बुद्धि के घोड़े डर बेदखली के,
पर मनोभाव तो अभी भी त्यों विलासित थे।

होते ही जायदाद नाम अपने पिता की,
हुआ बेटा फिर से आपे से ही बेकाबू था।
उद्भासित पिता के अनुभव को भुला कर,
किया दूर प्रयोग से विवेक का तराजू था।

कुछ यारों ने लुटा, कुछ विकारों ने लुटा,
शेष कुछ लूट गई बेवफा महबूबा थी।
पिता की कमाई तो जाती रही हाथ से,
खुद के लिए तो कमाई उसे अजूबा थी।

पिता की पीठ में बजे नगाड़े की धुन,
समझा, कितनी मीठी, कितनी खट्टी थी।
मालामाल था, कंगाल हो लिया था जब,
तब समझा, पिता की सीख ही सच्ची थी।

गर्म खून था ठंडने लगा जब उसका,
लगा तोलने हर सौदा विवेक तराजू से।
संभलती दुकान फिर से जिंदगानी की,
तब तक जा चुकी थी ताकत ही बाजू से।

पछतावा तो था पर किस काम का ?
चिड़िया ने चुग लिए खेत अब सारे थे।
स्मृति पटल में अनुगुंजित शब्द पिता के,
अब समझा कि उनमें कौन से इशारे थे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पिताजी मुझे हार न मानने और हमेशा आगे बढ़ने की सीख देते हुए मेरा हौसला बढ़ाते हैं। पिता से अच्छा मार्गदर्शक कोई हो ही नहीं सकता। हर बच्चा अपने पिता से ही सारे गुण सीखता है जो उसे जीवन भर परिस्थितियों के अनुसार ढलने के काम आते हैं। उनके पास सदैव हमें देने के लिए ज्ञान का अमूल्य भंडार होता है, जो कभी खत्म नहीं होता। आमतौर पर एक बच्चे का जुड़ाव सबसे अधिक उसके माता-पिता से होता है क्योंकि उन्हीं को वो सबसे पहले देखता और जानता है। माँ-बाप को बच्चे का पहला स्कूल भी कहा जाता है। लेकिन आजकल के बच्चों को हो क्या गया है ओ यह क्यों भूल जाते है की जैसा ओ अपने माता-पिता के साथ करेंगे वैसा ही उनके बच्चे भी उनके साथ करेंगे। एक बात याद रखें – पिता सदैव ही अपने अनुभव से आपको अच्छी सीख देते है, उनका कभी भी अनादर न करे, माता-पिता का यदि आप अनादर करेंगे तो सबकुछ मिल तो जायेगा लेकिन वह जल्द ही ख़त्म भी हो जायेगा। उनकी दुआओ व सीख से ही आप जीवन में आगे बढ़ेंगे।

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यह कविता (पिता की सीख ही सच्ची थी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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यह अकेला है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Yah Akela Hai | यह अकेला है।

हमने जाड़े की सर्दी है झेली,
हर गर्मी का मौसम है झेला।
वसन्त ऋतु की बहारें हैं देखी,
देखा वर्षा ऋतु का क्रुद्ध खेला।

स्मृति के विलासित गहवार में,
हैं उभरती धंसती कई यादें।
हसरतें जो कुछ थी पूरी हुई,
रह गए अधूरे ही थे कई वादे।

इस जिन्दगी के अधूरे सफर में,
खूब है देखा यह जग का मेला।
किसी के धन की अम्बर है देखी,
किसी के नसीब में न देखा धेला।

अजूबों से भरी इस दुनियां में,
मैंने सपने सबके अधूरे देखे।
राजा रंक सब परेशान हैं देखे,
किसी के ख़्वाब नहीं पूरे देखे।

किसी को अहम से इठलाते देखा,
तो किसी को शर्म से शर्मिंदा देखा।
अमीर – गरीब सबको मरते हैं देखा,
किसी को सदा न यहां जिन्दा देखा।

पर होड़ाहोड़ी और आपाधापी में,
निरन्तर छटपटाते हैं सबको देखा।
लक्ष्मण रेखा को लांघते जो संघर्ष में,
उनको समाज द्वारा नकारते हैं देखा।

अजीब करिश्मा है इस जीवन का,
इस भीड़ भड़ाक में यह अकेला है।
इस जीवन ने अपने पूरे सफर में,
हर वफा व छल प्रपंच को झेला है।

यह जीवन इस जग के लगभग,
हर सम्भव सुख दुख से खेला है।
हसरतें तो थी आकाश में उड़ने की,
पर जीवन की हद ने इसे नकेला है।

अनुभव में जो आया है अब तक मेरे,
कि यह जीवन तो निरन्तर अकेला है।
आया इस दुनियां में यह अकेला ही था,
जाता भी इस दुनियां से यह अकेला है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — किसी भी मनुष्य के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आते है, लेकिन एक बात सदैव ही कॉमन होती है, कोई भी मनुष्य आता भी अकेला है और सदैव जाता भी अकेला ही है, कुछ साथ भी लेकर नही जाता है, तो सोचने वाली बात है की फिर मनुष्य अपने जीवन में अहंकार क्यों करता है, इतना गुमान किस बात का करता है। भगवान कृष्ण ने कहा है कि शरीर का निर्माण पांच तत्वों-पृथ्वी, जल, आकाश, वायु व अग्नि और तीन गुणों- सतो (सत), रजो (रज) व तमो (तम) से हुआ है। इसके बाद ब्रह्म का अंश जीव के रूप में शरीर में प्रवेश करके उसे जीवात्मा बनाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति के गुण जीव निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिस प्रकार मनुष्य बाल्यावस्था से प्रौढ़ावस्था और प्रौढ़ावस्था से वृद्धावस्था तक पारिवारिक जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हैं, उसी प्रकार परिवार भी विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हैं।

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यह कविता (यह अकेला है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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आम जनता को कब मिलेगा उसका हक।

Kmsraj51 की कलम से…..

Aam Janta Ko Kab Milega Usaka Hak | आम जनता को कब मिलेगा उसका हक।

शहरातीयत की धक्कम-पेल, ठेलम-ठेल, रेलम-रेल और तिकड़मबाजी तो आज से पहले खूब देखी और सुनी थी पर हस्पताल में भी ऐसा परिदृश्य होता होगा कभी सोचा नहीं था। हर कोई बस इसी जद में लगा है कि मेरा नम्बर पहले लगना चाहिए, मेरा नम्बर पहले लगना चाहिए। सब्र रखने का शायद किसी को वक्त ही नहीं है। बहुत से लोग स्वार्थ और अमानवीयता को यहां भी नहीं छोड़ते और बहुत से ऐसे भी लोग हैं जो इंसानियत की मिसाल पेश करते हैं। बाहर रेहड़ी – फहड़ी तथा रेस्टोरेंट जैसी श्रेणी का खाना बनाने वाले ढाबे व सरकारी कैंटीन आदि वाले खाने-पीने के सामान में जहां मोल भाव करते हैं, वहीं कई लोग गरीबों और मरीजों तथा उनके परिजनों को निशुल्क भंडारा भी तो लगाते हैं।

इस कला में प्रवीण सिख धर्म के लोगों के हुनर को भला कौन नहीं जानता। ये भंडारा लगाने वाले लोग पकड़-पकड़ कर सभी को भंडारा मुफ्त में खिलाते हैं, चाय पिलाते हैं, उनके जूठे बर्तन धोते हैं और भी सेवाएं निशुल्क प्रदान करते हैं। तब लगता है कि दुनियां में दया और धर्म खत्म कहां हुआ है। वह तो आज भी जिंदा है। पर जब दवा और शल्य चिकित्सा के सामानों के दामों को एक दूसरे दुकानदारों के साथ तुलना करके देखते हैं तो लगता है कि दुनियां में चोर बाजारी बहुत है। सच क्या है झूठ क्या है? कुछ कहते नहीं बनता।

उस रोज रात 2:00 बजे जब हम मेरे बेटे को अति संवेदनशील हालत में पी जी आई चंडीगढ़ में लेकर पहुंचे तो वहां के आपातकालीन विभाग का परिदृश्य कोलकाता के मछली बाजार से कम नहीं था। कोई आ रहा था तो कोई जा रहा था। कोई सांस ले रहा था तो कोई साथ छोड़ रहा था। कुछ लोग तो प्राण छोड़ कर के ही इस संसार को हमारी आंखों के सामने अलविदा कह गए थे। खैर, जन्म और मरण तो इस संसार के सनातन सत्य है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में यूं ही उपदेश नहीं दिया कि अर्जुन इस संसार में जो आया है वह एक दिन जाएगा जरूर। पर राहत प्रदान करने वाली जगह भी किसी के दिल को इतना आहत करेगी, कभी सोचा भी नहीं था।

मेरे बेटे को मैंनेनजाइंटिस नामक दिमागी बीमारी ने अचानक बुरी तरह से जकड़ रखा था। मेरे जिले के स्थानीय अस्पताल में उस बीमारी का इलाज संभव ना होने के कारण चिकित्सक लोगों के द्वारा हमें पी जी आई चंडीगढ़ रेफर किया गया। रास्ते में जब हम एंबुलेंस में आ रहे थे तो सांसे गले में आकर अटकती जा रही थी कि न जाने कब और क्या घटना घट जाए ? शायद मैं अपने बेटे को खो न बैठूं। बाप जो हूं, ऐसे उल जलूल ख्यालात आना कोई नई बात नहीं थी। भगवान का शुक्र है कि हम सही सलामत पी जी आई पहुंच गए। उस भीड़ भड़ाके के बीच में रात 2:00 बजे बेटे की हालत को देखकर आपातकालीन विभाग ने दाखिला दे दिया था और सुबह 6:00 बजे तक सभी प्रकार की जांचें द्रुत गति से आपातकालीन विभाग के चिकित्सकों ने करवा ली थी।

बेटे को दर्द बहुत था। सर फटा जा रहा था। क्योंकि सर में दिमागी इंफेक्शन हो गया था। इस भीड़ को देखकर जो मेरे भीतर बेटे की उस पीड़ा को लेकर के एक अजीबोगरीब पीड़ा थी वह सहसा शान्त होती जा रही थी। चारों तरफ स्ट्रेचर पर ट्रॉलियों के ऊपर हर उम्र के छोटे – बड़े और हर प्रकार के मरीज चीख – चिल्ला रहे थे। अब मुझे औरों का दुख घना और अपना हल्का लग रहा था। यह बात जरूर है कि मेरा बेटा दिमागी रूप से बहुत परेशान था। उससे कोई बात नहीं हो पा रही थी और वह अपना दिमागी संतुलन पूर्ण रूप से खो चुका था। पर फिर भी उस चीर-फाड़ भरे मंजर को देखकर, छोटे – बड़े हर रोगियों की चीख-पुकार को सुनकर तथा प्राणों के संघर्ष को हारते हुए अपनी जीवन यात्रा का सफर इस दुनिया से उस दुनिया की ओर करते हुए लोगों को देखकर मेरी आंखें नम हुए जा रही थी।

ऐसा नहीं है कि मैं पहले अस्पताल में कभी नहीं आया था। मैंने दादी मां, छोटे ताया श्री, मंझले भैया तथा दोनों चाचाओं, बड़े तय – ताई के साथ-साथ अपनी सगी बहन को अपनी आंखों के सामने संसार छोड़ते देखा था। कई बार अस्पताल आ चुका था। भीड़ भी कई बार देख चुका हूं। पर जिस तरह की भीड़ और चीख-पुकार मैंने इस बार पी जी आई की आपातकालीन सेवा में देखी थी, वह अति भयानक परिदृश्य था।

आम अस्पतालों में चिकित्सकों को बार-बार हिदायत देते हुए सुना है कि ऐसे खुले वातावरण में ऑपरेशन किए हुए रोगी को या गंभीर हालत के रोगी को कभी नहीं रखना चाहिए। इंफेक्शन का डर रहता है। पर यह क्या? यहां तो हर कोई मरीज बिना बेड के बाहर स्ट्रेचर पर ही लेटे – लेटे अपना पूरा इलाज कर लेता है और यहीं से घर चला जाता है। जिन्हे जीना हो, वे तो जी जाते हैं पर जिन्हें संसार छोड़ना है वे भी यहीं पर अपने प्राण त्याग देते हैं।

हस्पताल की आलीशान पथरीली दीवारों से अपना हाड – मांस का माथा बार – बार टकराता हूं और भगवान से प्रार्थना करता हूं कि हे प्रभु! सबका भला करना। सबका पहले और मेरा पीछे। दिल की पीड़ा जितनी अपने बेटे के लिए सता रही थी, उससे कहीं ज्यादा आस – पास शल्य चिकित्सा से चीर – फाड किए हुए सरों वाले छोटे छोटे बच्चों को देखकर हो रही थी। सोचता हूं कि इन बच्चों ने इस छोटी सी उम्र में ऐसा क्या कर लिया कि ये इतनी गम्भीर दिमागी बीमारी के मरीज हो गए। खैर यह दुनियां है।फिर हस्पताल की दुनियां। जहां एक ओर बच्चों को जनने वालों की खुशी झलकती है तो दूसरी ओर से देह त्यागने वालों के परिजनों की पीड़ा दिखती है। सचमुच किसी ने ठीक ही कहा है कि यह संसार बड़ा रंगीन है।

फिर भीतर ही भीतर व्यवस्था और सत्ता के प्रति गहरी रोष उमड़ती है कि आजादी के 75 साल बीत गए पर हमारे हुक्मरान और अफसरान अभी तक आम और सर्वहारा वर्ग को स्वास्थ्य, शिक्षा और न्याय जैसी मूलभूत सुविधाओं को निशुल्क और अच्छी व्यवस्था के साथ क्यों नहीं मुहैया करवा पाए? देश के पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई जी की उस बात का ख्याल मस्तिष्क में पुनः गूंजता है “देश की जनता को कुछ भी मुफ़्त नहीं देना चाहिए। इससे जनता की आदत बिगड़ती है और देश कभी प्रगति नहीं करता। मुफ़्त यदि कुछ मिलना चाहिए तो वह है, स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और न्याय व्यवस्था।” कोई कुछ भी कहे बात सोलह आने सही है। आज के दौर में यदि जेब में पैसा न हो तो उपरोक्त तीनों मूलभूत सुविधाओं से आदमी को हाथ धोने पढ़ सकते हैं।

यूं तो कहते हैं कि आदमी के आगे पैसा कुछ भी नहीं है। कुछ हद तक यह सत्य भी है। आदमी ही जिंदा नहीं रहेगा तो पैसों का क्या अचार डालोगे? पर जब इस तरह की गंभीर बीमारी के चक्कर में निम्न मध्य वर्ग और उच्च मध्यवर्ग के साथ-साथ गरीब व्यक्ति फंसता है तो यही पैसे बहुत काम आते हैं। खैर जैसे ही मेरे बेटे की बीमारी की खबर मेरे इष्ट मित्रों और रिश्तेदारों में पहुंची। वैसे ही सभी ने उनके लिए ईश्वर से दुआ की। कहते हैं दवा से बड़ी दुआ होती है। शायद यह असर उन सबकी दुआओं का ही था कि आज मेरा बेटा उस भयानक बीमारी के जीवन नाशक खतरे से लगभग बाहर है। सबकी दुआ में असर होता है और भगवान उस सामूहिक पुकार को सुनता है।शायद परमात्मा ने सबकी सुनी और मानी।

हैरत इस बात की है कि देश को सबसे अधिक कर देने वाली और सबसे अधिक परिश्रम देकर उन्नत करने वाली इतनी बड़ी जमात को सरकार इस तरह से गैलरियों और बरामदों में जीने – मरने के लिए क्यों छोड़ देती है? पी जी आई की आपातकालीन सेवाओं की हर वार्ड में भीड़ इतनी है कि वार्डों में तो जगह ही नहीं होती पर गैलरियों में भी भीड़ इस तरह से लबालब भरी मिलती है मानो कोलकाता का मछली बाजार लग गया हो। बेड के नाम पर नाममात्र की सुविधा। अधिकतर रोगियों को ट्रालियों पर ही लेटे-लेटे अपना इलाज संपन्न करना पड़ता है। बेड तो बहुत ही मुश्किल से किसी भाग्यवान के हिस्से आता है। वह भाग्यवान भी वही व्यक्ति होता है जो जिंदगी और मौत की जंग से बिल्कुल समीप से लड़ रहा होता है। बाकी सब ट्रालियों पर ही होता है। ये ट्रालिया भी अलग-अलग धार्मिक संगठनों और सामाजिक संगठनों की भेंट की हुई है शायद।

सोचता हूं क्या मेरे देश की सरकार इतनी गरीब है कि चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू – कश्मीर तथा आंशिक रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे बड़े भू भाग के गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों का इलाज करने वाले इस हस्पताल की आपातकालीन सेवा को अभी तक वह उन्नत ही नहीं कर पाई। माना कि देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। पर इसका मतलब यह तो नहीं है कि जो ढांचा आज से वर्षों पहले खड़ा कर दिया गया था, बस उसी को ही बनाए रखें।

क्या सरकारें सिर्फ एक दूसरे पर इल्जाम ही लगाती रहेगी? आजादी के बाद आज तक सभी दलों ने केंद्र में राज किया है। क्या यह सभी दलों की सामूहिक जिम्मेवारी नहीं बनती है कि पी जी आई चंडीगढ़ के ट्रामा सेंटर और आपातकालीन सेवा के भवन को और उन्नत और विकसित किया जाए। वहां हर इमरजेंसी वार्ड में कम से कम 3 से 4 सौ बिस्तरों का आधुनिक तकनीकी सुविधाओं के साथ प्रबंध वर्तमान में सरकार को नहीं करना चाहिए ? क्या बड़े – बड़े लोग फोर्टिस और अपोलो जैसे हॉस्पिटल में अपना इलाज करते हैं, इसलिए इस गरीब और सर्वहारा तथा निम्न मध्य वर्ग के आश्रय स्थल की ओर कोई ध्यान नहीं देता?

इतना ही नहीं, गंभीर समस्याओं से जूझ रहे रोगियों के साथ इनकी देखभाल करने के लिए आए हुए तीमारदारों को भी रात में बाहर खुले में सड़क किनारे सोना पड़ता है। क्या आजादी के 75 साल बाद आजाद हिंदुस्तान में यह बात शोभा देती है? आखिर क्यों नहीं सोचती है सरकार इस दिशा में? कौन करेगा इन गरीबों की और आम जनमानस के हितों की बात? क्या इन सभी लोगों को सुविधा नहीं मिलनी चाहिए? सवाल अनगिनत है और जवाब अपेक्षित।

मैं चाहता हूं यह बात देश की संसद तक पहुंचे ताकि देश की आम जनता को न्याय मिल सके और सुविधा मिल सके। देश में कोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नहीं बनेगा तो शायद इतनी ज्यादा क्षति नहीं होगी जितनी ज्यादा क्षति इन गरीब एवं आम जनमानस के पीड़ित होने से देश को होगी। देश का मेहनतकश किसान, मजदूर सर्वहारा वर्ग जब जिंदगी और मौत की जंग से इसी प्रकार से खुले में अपने कठिन समय में लड़ता रहेगा तो वह देश की समस्याओं के साथ शायद उस ताकत से नहीं लड़ पाएगा जिससे उसे लड़ना चाहिए।

पर फिर भी देश की उन्नति और समृद्धि के लिए इस गरीब मजदूर और किसान वर्ग ने तथा निम्न मध्य वर्ग के कर्मचारी वर्ग ने अपनी एड़ी – चोटी का जोर लगा कर के भारत का नाम विश्व में रौशन किया है। इसलिए कुछ तो दायित्व देश को चलाने वाली सरकारों का भी बनता है कि और न सही तो मानवीय पहलुओं से सही, इस दृष्टि से जरूर विचार करें। सड़क नहीं बनेगी कोई बात नहीं, रेलमार्ग नहीं बनेगा तो भी चलेगा। किसी को सब्सिडी नहीं मिलेगी तो वह भी जी जाएगा। परन्तु सुविधा के अभाव में हस्पताल में किसी की जान चली जाए, यह तो बिल्कुल नहीं चलेगा।

यह हालत किसी एक हस्पताल की नहीं है। खबरों में ऐसे कई खुलासे हर राज्य से होते रहते हैं, जहां कहीं व्यवस्था के नाम पर तो कहीं प्रबंधन और प्रशासन के नाम पर बट्टा लगता रहता है। पर पी जी आई चंडीगढ़ का स्टॉफ पूरी मुस्तैदी के साथ सीमित सुविधाओं में भी लोगों को उचित सेवाएं देता है। कमी है तो वह है आपातकालीन विभाग में बिस्तर तथा भवन संबधी प्रबंधनों की। इस प्रकार की खामियां सरकारी स्कूलों और न्याय व्यवस्था में भी मौजूद है, जो आजाद देश की आजाद जनता के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ है। फिर से मन में सवाल उठता है कि आखिर देश की आम जनता को उसके हिस्से का हक कब और कैसे मिलेगा?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पुरे देश में बड़े सरकारी पी जी आई हस्पताल में सीमित सुविधाओं में लोगों का समय से उचित इलाज का ना होना। आपातकालीन विभाग में बिस्तर तथा भवन संबधी प्रबंधनों की कमी। इस प्रकार की खामियां सरकारी स्कूलों और न्याय व्यवस्था में भी मौजूद है, जो आजाद देश की आजाद जनता के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ है। फिर से मन में सवाल उठता है कि आखिर देश की आम जनता को उसके हिस्से का हक कब और कैसे मिलेगा? जय हिन्द – जय भारत।

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यह लेख (आम जनता को कब मिलेगा उसका हक।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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