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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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hemraj thakur poems

प्रकृति और खिलवाड़।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रकृति और खिलवाड़। ♦

पावन प्रकृति के आंचल में जब, मानव ने खोली आंखे थी।
कितना निश्छल रहा मानव होगा? खिलती उसकी बांछे थी।

वक्त गुजरा तो होड़ बढ़ी, उसने कुदरत से खिलवाड़ किया।
हरे भरे और खिलते चमन को, नादान मानुष ने उजाड़ दिया।

अब रोगी काया और भोगी मानस, बाँछों में पड गई झाईं है।
धन वैभव तो है बहुत बड़ा पर, सुख सन्तोष पास में नाही है।

प्रकृति महतारी जग सब जीवों की, मानव ने उसको लूटा है।
भूल गया वह मरना है इक दिन, मोह इस जग का झूठा है।

जंगल काटे, भूमि खोदी, हवा, पानी व व्योम को दूषित किया।
जोशीमठ की दरारें आज डराती, प्रकृति से खिलवाड़ किया।

काश ! यूं न रौंदता कुदरत को, खुद खुदा मान के भूल करी।
नतीजन सांसे उखड़ रही है, जवां फेफड़ों में है अब धूल भरी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस धरा पर इंसान से भी काफी समय पहले से ही प्रकृति अतिसुन्दर और मनोरम रूप में उपस्थित है। मनुष्य ने अपनी नाशवान भौतिक सुख सुविधा के लिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जिसके परिणाम स्वरूप आज अब रोगी काया और भोगी मानस हो गया है। धन वैभव तो है बहुत बड़ा पर, सुख सन्तोष उसके पास में नाही है। प्रकृति माँ है सभी जीवों की, मानव ने उसको इस क़दर लूटा है की भूल गया, वह मरना है इक दिन, मोह इस जग का सब झूठा है, सब कुछ यही रह जाना है। मानव ने जंगल काटे, भूमि खोदी, हवा, पानी व व्योम को भी दूषित किया, इसी कारण जोशीमठ की दरारें आज डराती, प्रकृति से खिलवाड़ किया बढ़चढ़ कर क्यों? काश ! यूं न रौंदता कुदरत को, मनुष्य ने खुद भगवान् मान के भूल करी। नतीजन सांसे उखड़ रही है, जवां फेफड़ों में है अब धूल भरी। अगर अब भी नहीं सुधरे तो, आने वाला समय और भी भयावह होगा।

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यह कविता (प्रकृति और खिलवाड़।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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जंगलों की बात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जंगलों की बात। ♦

आंधी तूफानों के गहन थपेड़ों में,
हमने झेली सदा से हर पीड़ा है।
हिले डुले और टूटे कभी बिखरे,
उठाया जीव संरक्षण का बीड़ा है।

हम धरती के वंशज धरती से उपजे,
कहां किसने हमको खुद से उपजाया है?
जीये सदा से अम्बर पिता की छत के नीचे,
पालती पोषती सदा से हमे हमारी जाया है।

न जाने क्यों नर नृशंस ने संघारा फिर हमको?
हमने आखिर उसका कब और क्या खाया है?
उल्टा उसने ही है हमको हमेशा लूटा खसोटा,
फल, छाया, सांसें ली लकड़ी से घर बनाया है।

अंधा मानुष नासमझी में जाने अनजाने ही,
क्यों मारता खुद के ही पांव में कुल्हाड़ी है?
अपने ही प्राणदाता को जो नर मारे काटे,
वह मंद बुद्धि है, न के कोई बड़ा खिलाड़ी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हम पेड़ों ने आंधी तूफानों के गहन थपेड़ों में, हमने झेली सदा से हर पीड़ा है। हिले डुले और टूटे कभी बिखरे भी उठाया जीव संरक्षण का बीड़ा है। वनों में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियाँ, झाड़ियाँ आदि होते हैं। उनमें से कई औषधीय मूल्य प्रदान करते हैं। हमें वनों से विभिन्न प्रकार के लकड़ी के उत्पाद भी प्राप्त होते हैं। इसके अलावा, वे वायु में प्रदूषकों को हटाने में भी सहायक होते हैं, इस प्रकार वायु प्रदूषण को कम करने में वन अहम भूमिका निभाते हैं। फिर भी आज का मानव विकास के नाम पर वनों को सम्पूर्ण रूप से ख़त्म करता जा रहा है, आखिर कब समझेगा ये मानव की पेड़ों का हमारे जीवन व श्वास से गहरा तार जुड़ा है। आओ हम सब मिलकर ये संकल्प ले की प्रत्येक वर्ष एक बड़े पेड़ को जरूर लगाएंगे और उसका रख रखाव तब तक करेंगे जब तक वह अपना खुराक जमीं से खुद न लेने लगे।

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यह कविता (जंगलों की बात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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मुश्किल नहीं नामुमकिन है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मुश्किल नहीं नामुमकिन है। ♦

मानव मन के मतभेदों को, धरती से मिटाना मुश्किल है,
रामायण हुआ महाभारत हुआ, मानव मदहोशी वैसी है।
मानव ही कहलाया कभी देव तो कभी दानव या राक्षस,
जाति धर्म में बंटे इंसानों की, आज भी यह लड़ाई कैसी है?

उम्मीद तो जागती है अंधेरे में जुगनुओं की रोशनी से भी,
पर उनकी टिमटिमाहट से मुकमल उजाला नहीं होता है।
लगता तो है दूर से कि मानो टीका अंबर क्षितिज पर ही है,
पर असल में तो अंबर को किसी ने संभाला नहीं होता है।

मुश्किल नहीं नामुमकिन है इस दौर में नीति समझाना,
क्योंकि आज हर तरकश में तर्कों के तीखे तीर भरे हैं।
जब पूछते हो सब कोई सवाल यही कि “ईश्वर कहां है?”
“तुमने देखा क्या?” ऐसे माहौल में भगवान से कौन डरे हैं?

मूर्खता है आज कहना किसी से कि भगवान से तो डरो,
इतनी भी लूटपाट और अभद्रता बिल्कुल ठीक नहीं है।
आज हर कोई देता फिरता है जवाब यही कि “बस करो,
यह जमाना है प्रैक्टिकल का, जिन्दगी कोई भीख नहीं है।

फिर सोचता हूं कि होना चाहिए फिर से कोई महाभारत,
जो बेकाबू इंसान सातवें आसमान से जमीन पर आ जाए।
फिर से जाग उठे इन्सान के भीतर वही पुरानी इंसानियत,
आदमी फितरतों को छोड़कर भगवान से डर खा जाए।

आज वश में नहीं है समझाइश चांद सितारों के भी शायद,
आज तो फिर से दुनियां में ज्ञान का सूरज उगना चाहिए।
मकसद नहीं है महज किसी की जिन्दगी में उजाला लाना,
कोशिश यह है कि जग में अहम अंधकार ही डूबना चाहिए।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज का इंसान इंसानियत को बिलकुल भूल गया है, उसे अपने स्वार्थ के अलावा और कुछ दिखता ही नहीं है। अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए आज का इंसान कोई भी बड़े से बड़ा विकर्म करने से डरता नहीं है। उसे भगवान या उस अनंत सत्ता का भी डर भी अब नहीं रहा। क्या फिर से इंसान को सुधारने के लिए महाभारत की जरूरत है। आखिर क्यों आज का इंसान इतना स्वार्थी हो गया है। अपने अहंकार में डूबा आज का इंसान अपने विकर्मो के कारण अपना सर्वनाश करता जा रहा है। आने वाली पीढ़ी का भविष्य और भी ज्यादा अंधकारमय बना रहा है। अगर अब भी नहीं संभले और सुधरे तो तुम्हारा विनाश निश्चित है।

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यह कविता (मुश्किल नहीं नामुमकिन है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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घोर कलयुग है आ गया क्या?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ घोर कलयुग है आ गया क्या? ♦

नेता है लेते लुत्फ सत्ता का, अधिकारी बने सहयोगी है।
भ्रष्टाचार और महंगाई हर राज में, जनता ने ही भोगी है।

यह पैट्रोल बढ़ा यह डीजल बढ़ा, यह तो बात पुरानी है।
सरकारी तन्त्र में भ्रष्टाचार की, सबको मालूम कहानी है।

बदसलूकों की महफिल में, शराफत की बात बेईमानी है।
नीचे से ऊपर ये सारे मिले हैं, किससे आवाज उठानी है?

खरीद तंत्र घोटाला, भर्ती घोटाला, सिर से ऊपर पानी है।
सब्सिडी लेती जनता भी देखो, हो गई कितनी शाणी है?

दुर्दशा देश की होती है तो होए, सबको अपनी चिन्ता है।
महा स्वार्थ के इस दौर में, हर मानव में कितनी हीनता है?

पंचायत से घोटाले संसद तक, जांच एजेंसियां भी डूबी है।
न्यायालयों के दरवाजों के आगे, विलम्ब की झाड़ उगी है।

गरीब जाए तो किधर को जाए? चारों ही ओर तो अंधेरा है।
वोट की चोट से हर राज है बदला, सबमें लुटेरों का डेरा है।

हम सब जानते सचाई पर जाने, कैसे इस आग में जिंदा है?
इसी में ढलना मजबूरी है सबकी, इस बात से मैं शर्मिंदा है।

घोर कलयुग है आ गया क्या? हर ओर जो आपाधापी है।
ऐसा है लगता, देखता हूं, इन्साफ की चौखट में बेइंसाफी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — नेता बड़े मजे से सत्ता का आनंद ले रहे है, उनको जनता की फिक्र ही नहीं है। पंचायत से लेकर संसद तक सब तरफ घोटाला ही घोटाला हो रहा है, क्या नेता क्या अधिकारी सबके सब मिले हुए है। खरीद तंत्र घोटाला, भर्ती घोटाला, सिर से ऊपर पानी है। सब्सिडी लेती जनता भी देखो, हो गई कितनी शाणी है? किसी को भी देश की चिंता नहीं है, दुर्दशा देश की होती है तो होए, सबको अपनी चिन्ता है। महा स्वार्थ के इस दौर में, हर मानव में कितनी हीनता भर गई है? पंचायत से घोटाले संसद तक, जांच एजेंसियां भी इनमें डूबी है। न्यायालयों के दरवाजों के आगे खड़े बेचारे, विलम्ब की झाड़ उगी है।

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यह कविता (घोर कलयुग है आ गया क्या?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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नया साल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नया साल। ♦

यह नया साल हमारा और वह तुम्हारा,
हैप्पी न्यू ईयर, नव संवत्सर की बधाई।
जश्न तो नए साल का है दोनो जगह पर,
फिर भी है भावों और विचारों की लड़ाई।

न जाने क्यों नफ़रत सी होती है मन में मुझे,
अंग्रेजी नव वर्ष के हर एक बधाई संदेश से।
जब ये नहीं मानते हैं नव संवत्सर हमारा तो,
मैं कहीं धोखा तो नहीं कर रहा हूं स्वदेश से?

हम क्यों भूल दें जी सनातन तहजीब हमारी?
और उपनिवेशवादियों का सब अपनाते चले।
भौतिक वैभव तो लूट ही गए थे हमारा ये सब,
और आज भावों से भी जाए क्यों हम ही छले?

आज, मंजूर है मुझको इनका हर त्यौहार मानना,
पर ये भी तो हमारे पर्वों को मिलजुल कर मनाएं।
पर हां, यह तो नहीं चलेगा कि हर बार ये इठले,
और हम हमेशा बस यूं ही मौन रह मुंह की खाएं।

ताली कहां सुना है बजाते तुमने एक हाथ से भाई,
आओ मिलकर मित्रवत दोनों ही हाथों से बजाएं।
हमने अपनाया आपका बहुतेरा है जी आज तक,
तुम भी तो संस्कृति का कुछ हमारी जी अपनाएं।

हमारे नव संवत्सर में मौसम नूतन वसंत है आता,
तुम्हारे नव वर्ष में आती महज पतझड़ और सर्दी।
अपनाने दो हमे भी कुछ अपनी ही संस्कृति का,
तुम्हारी नकल की तो हमने आज हद ही है कर दी।

लिवास तुम्हारे हैं, है हर एक अजब अंदाज़ तुम्हारा,
हमारे पास तो आज बचा ही क्या कुछ है हमारा?
अन्दर से बाहर, कुछ भी देखो, पैंट कोट चाहे शरारा,
चिन्तित हूं कि क्यों रंगा है पछुआ रंग में देश हमारा?

फैला दिया है जैसे रायता सा मेरे देश में तुमने आज,
छोड़ा ही क्या है तुमने आज शेष, बाकी देने लेने को?
कुछ तो रहने दो हमारे भी शेष अपनी संस्कृति का,
हमारे पास भी कोई थाती हो, नई पीढ़ी को देने को।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अब भी समय है संभल जाओ, वर्ना अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद फिर सुगंध भी सुलभ न होगा। वैसे जश्न तो नए साल का है दोनो जगह पर फिर भी है भावों और विचारों की लड़ाई। न जाने क्यों नफ़रत सी होती है मन में मुझे, अंग्रेजी नव वर्ष के हर एक बधाई संदेश से। जब ये नहीं मानते हैं नव संवत्सर हमारा तो, मैं कहीं धोखा तो नहीं कर रहा हूं स्वदेश से? जरा सोचे हमने क्यों भूला दिया अपने सनातन तहजीब को? हमारी भौतिक वैभव तो लूट ही गए थे हमारा ये सब, और आज भावों से भी जाए क्यों हम ही छले? आज, मंजूर है मुझको इनका हर त्यौहार मानना, पर ये भी तो हमारे पर्वों को मिलजुल कर मनाएं। हमारे नव संवत्सर में मौसम नूतन वसंत है आता, चारों तरफ हरियाली और खुशियां ही खुशियां और तुम्हारे नव वर्ष में आती महज पतझड़ और सर्दी। अब तो लिवास तुम्हारे हैं, है हर एक अजब अंदाज़ तुम्हारा, हमारे पास तो आज बचा ही क्या कुछ है हमारा? फैला दिया है जैसे रायता सा मेरे देश में तुमने आज, छोड़ा ही क्या है तुमने आज शेष, बाकी देने लेने को हमारे पास? कुछ तो रहने दो हमारे भी शेष अपनी संस्कृति का, हमारे पास भी कोई थाती हो, अपनी नई पीढ़ी को देने को।

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तुलसी पूजन और क्रिसमस डे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तुलसी पूजन और क्रिसमस डे। ♦

यहां तुलसी पूजन, वहां क्रिसमस डे,
दिन एक पर धारणाएं लहदी – लहदी है।
यह जाड़े का शुष्क पतझड़ का मौसम,
तुलसी तो इस मौसम की परमौषधि है।

बनावट का हर सजोसामान कहां देगा?
राहत सर्दी – गर्मी और आधी व्याधि से।
चन्द लोगों के पर्व मानना कोई दोष नहीं,
वे हमारे न मनाए, है धोखा घनी आबादी से।

क्यों लगाए बैठे हैं आस कि पौधा,
प्लास्टिक का ऑक्सीजन छोड़ेगा।
वह तो तुलसी में ही क्षमता है साहेब,
जो रोग, शोक, दुख संताप को तोड़ेगा।

अपनी संस्कृति और सभ्यता तो यारो,
आखिर अपनी है और अपनी ही होती है।
क्रिसमस के फेर में भूल के पूजा तुलसी की,
यह भारत की सनातनी सभ्यता कहां खोती है?

अब हो गया दौर बहुतेरा भूलभुल्या का,
अपनी रीत पर फिर से लौट के आना होगा।
जो जागे हैं आज, वे तो जागते ही रहना,
पर जो सोए हैं, उन्हे भी जागना होगा।

हो गई दरिया दिली बहुतेरी है आज तक,
अब संस्कृति सभ्यता का गुण गाना होगा।
धर्म निर्पेक्षता के सुन्दर लिवास में हमको,
अपने धर्म की हर रसम को निभाना होगा।

कहीं भूल न जाए हमारी औलादें सब कुछ,
इतना भी पछुआ अंधानुकरण भला नहीं है।
बस सुरक्षित रहे हमारा भी सनातन जग में,
बाकी हमे किसी का कुछ भी खला नहीं है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज यानी 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। सनातन धर्म में तुलसी पूजा का अत्यधिक महत्व होता है। तुलसी की पूजा करने से घर में सुख-शांति का वास होता है। सनातन धर्म में तुलसी के पौधे को पवित्र माना गया है। इसलिए तुलसी पूजा का विशेष महत्व है। लेकिन आजकल लोग अपने प्राचीन संस्कृति को भूलकर क्रिसमस डे मना रहे है आखिर क्यों? अब भी समय है अपने अद्भुत गरिमामयी संस्कृति के अनुसार चले और सारे कार्य करें।

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यह कविता (तुलसी पूजन और क्रिसमस डे।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सुगंध भी सुलभ न होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सुगंध भी सुलभ न होगा। ♦

अगर न जागे आज दोस्तो,
कल को फिर से अंधेरा होगा।
पराधीनी में था किसने धकेला?
सवाल यह मेरा – तेरा होगा।

अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद,
फिर सुगंध भी सुलभ न होगा।
कहीं आ न जाए फिर दौर वही,
जो सैंतालीस से पहले था भोगा।

यह पछुआ बयार कहीं ले ही न डूबे,
फिर से भारत के गौरव को।
आओ मिलकर पलवित पुष्पित करते हैं,
अपनी संस्कृति सभ्यता के सौरभ को।

उदासीनता भली नहीं है राष्ट्र धर्म में,
अपनी रीत तो अपनी ही होती है।
परिणाम कभी न अच्छा है होता,
जब देश की जनता सोती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अब भी समय है संभल जाओ, वर्ना अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद फिर सुगंध भी सुलभ न होगा। कहीं आ न जाए फिर दौर वही, जो सैंतालीस से पहले था भोगा सभी ने। यह पछुआ बयार कहीं ले ही न डूबे, फिर से भारत के गौरव को। आओ मिलकर पलवित पुष्पित करते हैं, अपनी प्राचीन सभ्य संस्कृति सभ्यता के सौरभ को।

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यह कविता (सुगंध भी सुलभ न होगा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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वीरों की सदा से जाया है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वीरों की सदा से जाया है। ♦

यह धरा नहीं है अधीरों की,
यह वीरों की सदा से जाया है।
टीका नहीं है कोई इस धरा पर सदा,
हमने संघर्षों से सबको हटाया है।

आए कई और गए कई है,
सदियों से यहां आतताई हैं।
हम लड़े – भिड़े छल छद्म हटाया,
आज भी पछुआ से हमारी लड़ाई है।

दया धर्म को हटाने चले जो,
हमने उनको सबक सिखाना है।
जो इठला रहे हैं फूहड़ कामयाबी पर अपनी,
उन्हे औंधे मुंह गिराना है।

आओ मिलकर प्रयत्न करे हम,
संस्कृति विभंजकों को सबक सिखाना है।
पछुआ जीत का परचम फहराने वालों को,
हर हाल में धूल चटाना है।

भारत के खोए गौरव को फिर से,
विश्व पटल पर स्थापित करवाना है।
अभिभूत होकर के सब कह उठे कि,
चलो, भारत दर्शन को हमने जाना है।

कोई खून खराबा नहीं चाहते हैं हम,
बस कागज पर कलम चलाना है।
पछुआ ज्ञान को हटा कर भारत का,
मूल ज्ञान सबके सामने लाना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह भारतभूमि सदा से ही वीरों की भूमि रही है भारत मां के वीर सपूतों ने इतिहास में स्वर्णिम अध्याय रचा है ये सभी अपनी मातृभूमि को स्वर्ग से भी अधिक महान और पवित्र मानने वाले देश के ऐसे सपूत हैं जिन पर पूरा देश सदैव ही गर्व करता है। वर्तमान में भी वीरता की इस परंपरा को बरकरार रखते हुए हमारे बहादुर सैनिक बॉर्डर पर अपना फर्ज बखूबी निभाते हैं।

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यह कविता (वीरों की सदा से जाया है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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पुरुष बेचारा बिसारा गया।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पुरुष बेचारा बिसारा गया। ♦

औरत की पीड़ा तो सबने लिखी पर,
जाने क्यों, पुरुष बेचारा बिसारा गया?
औरत पर दया कर लेते हैं सब कोई,
गृहस्थी में पुरुष बेचारा मारा गया।

जोरू की सुने तो मां है कहती,
‘है बेटा ही हाथ से निकल गया।’
मां की सुने तो जोरू है रुसती,
करेगा, कौन बेचारे पर है जी दया?

घर वालों की सुने तो ससुराल है रुस्ता,
ससुराल की सुनने पर रूठतें हैं घर वाले।
शादी के बाद होती हैं ज्यों काली रातें,
मुश्किल ही होते हैं जीवन में उजाले।

बजुर्गों का दायित्व और बच्चों की चिन्ता,
किस बात को कैसे और कब तक निभाएं?
चेहरे पर मुस्कान और दिल में है हर पीड़ा ,
किसको बताएं और किस किससे छुपाएं?

चाहता है बताना कभी चाह कर किसी से,
उससे पहले ही, सुनने वाले अपनी सुनाएं।
इस नर पुराण में हैं नर की कई दुविधाएं,
नारी को यह सब कोई क्यों कर समझाएं?

पुरुष बेचारा हर गम को ले छाती में,
घुट-घुट है पिसता और मर है जाता।
कर दफ़न हर राज वह अपने ही साथ,
दिल की बात को न कभी सामने लाता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पुरुष बेचारा अपने मन की पीड़ा किससे कहे, आखिर उसकी भी तो अपनी भावनायें व स्वप्न है, आखिर उसे क्यों नहीं समझते है लोग। इस संसार में पुरुष व स्त्री एक दूसरे के पूरक है। अब महिलाएँ घर की चहारदीवारी लाँघकर प्रत्येक क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। इस बदलाव का मुख्य कारण है पुरुषों की सोच में समय के साथ बदलाव, उनकी मानसिकता में भी बदलाव। पुरुष सही मायने में प्रेम की परिभाषा को समझा और महिला को जीवन पथ पर उन्नति की तरफ़ जाने की प्रेरणा दी। वो पिता, भाई, पति, दोस्त कोई भी रूप में साथ देते रहते है। पुरुषों को भी अपने हक़ का पूरा प्यार व सम्मान मिलना चाहिए। पुरुष किसी से कह नहीं पाता है, लेकिन इसका ये मतलब बिलकुल भी नहीं की उनकी भावनावों को सम्मान ना दिया जाये। उन्हें भी समझे और उनका ख्याल रखें।

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यह कविता (पुरुष बेचारा बिसारा गया।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आज न होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज न होगा। ♦

आज न होगा कोई मंगल गान प्रिये,
विपदा में व्यथित जो समूची धरती है।
नफरत के शोलों से विदीर्ण हर वक्ष आज है,
मानवता तिल – तिल कर आज यहां मरती है।

दर्द का दरिया बह रहा है दिल में,
हृदय की जमीन हो गई अब परती है।
मानस कल्पना की लहरों से भी अब तो,
आक्रोश – कटाक्ष की आग ही झड़ती है।

अतृप्त लालसाओं ने जग को है घेरा,
स्वार्थ बेड़ियों ने रूह ही मानो जकड़ी है।
अब उठती ही कहां है कोमल भावनाएं मन में?
हृदय भाव की गति भौतिकता ने जो जकड़ी है।

होता न आदर आज गांव के गलियारों में,
शहरों में तो पहले से ही रही आपाधापी है।
आज न नातों – रिश्तों की कद्र है कहीं पर,
मानव रूप में पाश्विक सभ्यता देखो आती है।

गांव की गुड्डी को गभरू बहन यहां कहते थे,
आज नव जवान देहाती भी खुराफाती है।
महफूज कहां रही अब अस्मत बहू – बेटी की?
वह अपनों के ही हाथों आज लूटी जाती है।

पढ़े-लिखे आदिमानव हो चले हैं हम क्या?
अर्धनग्न घूमते हैं और मद्य – मांस ही खाते हैं।
पशु सी करते हैं करतूतें सब उन्मादी में,
फिर खुद को सभ्य – सुसंस्कृत मानव बताते हैं।

हाय – हाय री! फैशन लाचारी और मानव दुर्दशे,
सच में आज विद्रूपता है जीती और हम है हारे।
शहर – शहर और गांव – गांव में देखो आज तुम,
हर कोई फिरते हैं फैशन के पीछे मारे – मारे।

आज न होगा कोई मंगल गान प्रिये,
इन सब घटनाओं से भीतर भारी पीड़ा है।
मानव समाज में विकृतियों आते देख को,
सोचता हूं, यह विधि की कैसी क्रीड़ा है?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — समस्त संसार का एक ही मूलमंत्र होना चाहिए, वो है जीवमात्र पर दया करना। यह दया भाव मनुष्य का मनुष्य के प्रति या मनुष्य का अन्य जीवों के प्रति होती है। जीवमात्र पर दया करना ही मानवता है। पृथ्वी पर मनुष्य सबसे उत्तम और सर्वश्रेष्ठ प्रजाति है। पर आजकल हो क्या रहा है? इसके बिलकुल उलट – सबकुछ हो रहा है आज का मानव शैतान व राक्षस हो गया है, शराब पीना, मांस खाना, बलात्कार करना, काम वासना व नशे में चूर होकर बड़े से बड़ा विकर्म करने से भी जरा भी नही डरता, क्यों ? पूर्ण रूप से शैतान व राक्षस बन गया है आज का मानव पढ़-लिखकर भी ऐसे कुकर्म करने से पहले एक बार भी नहीं सोचता की आने वाली पीढ़ी के लिए हम क्या सीख दे रहे हैं, हद हैं तेरी रे मानव क्या से क्या हो गया तू !

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