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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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hemraj thakur poems

ओ नारी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ओ नारी। ♦

कभी लाड़ लड़ती कभी प्यार लड़ाती,
तेरे कोमल भावों ने जग को सींचा है।
परिवार की खुशी के खातिर तो तूने,
हर आंसू का कतरा कोरों में भींचा है।
फिर भी न जाने इस नृशंस समाज ने,
तेरा वीभत्स सा चित्र क्यों खींचा है?

तेरे कदम से तो ओ पगली उग आते हैं,
मरू भूमि के बंजर में भी हरित उद्यान।
तेरे स्पर्श से पस्त हुए पुरुरवा सरीखे,
हो जाते हैं द्रवित तब कठोर पाषाण।
जब नम्रता की प्रतिमूर्ति तुझ नारी की,
पड़ती है मंद – मंद वह मधुर मुस्कान।

तेरे रहमों करम की कायल यह दुनियां,
पगली क्या क्या में आज बखान करूं?
तुझ पर हो रहे अत्याचारों का ओ देवी!
हां किस विधि से आज मैं निदान करूं।
खुद मैं गुनहगार सदियों से शायद तेरा,
इस बात का कैसे किससे प्रचार करूं?

आज विश्व नारी दिवस के अवसर पर,
देख रहा हूं, दुनियां तेरी जयकार करें।
यह झूठा है सब मान – सम्मान या फिर,
क्यों तू नित दिन छुप छुप के आहें भरें?
बलिदान की अजीबोगरीब कहानी की,
तेरे यह मतलबी संसार क्यों कदर करें?

जब जन्म लेना था मुझ को पगली तो,
तू नारी से ममता की मूर्ति बन मां बनी।
फिर भगनी, भावज और चाची – ताई,
पत्नी बनकर तू मेरा सकल जहां बनी।
नर के इस नृशंस जीवन में ओ पगली!
तेरी हर पल ही तो खलती यहां कमी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कवि इस संसार के लोगो से प्रश्न कर रहे हैं – आखिर क्यों नारी को वह मान सम्मान सदैव नही दिया जाता जिसकी वह सदैव से हकदार हैं? क्या केवल एक दिन का मान सम्मान ही काफी हैं उनके लिए? इस पर गंभीरता से विचार करें। आखिर जो हर शक्ति से सम्पूर्ण हैं चाहे वो किसी भी रूप में हो, माँ, बहन, दादी, पत्नी, काकी हर रूप में सदैव ही हम पर प्यार, ममता बरसाती हैं। आज के समय में नारी हर क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं, चाहे वह आसमान हो, या समुद्र हर जगह अपना सम्पूर्ण योगदान दे रही हैं। माँ बन कर जीवन में पूर्णता पा लेती है नारी, सर्वस्व अपना सौंप कर, बच्चों को महान बनाती हैं नारी। जैसे प्रकृति धरती सदैव ही देना जानती है, उसी की तरह, बस देना ही जानती है नारी, प्रेम, भाव, इज्जत, बस यही तो मांगती हैं नारी। जीवन के हर पड़ाव में, बस आलंबन चाहती है नारी, वरना तो वो स्वयं शक्ति है, और हर किसी पर भारी है नारी। नारी को सरल समझने की भूल न करो, ईश्वरत्व का मिश्रण है नारी, हम खुद अपना सम्मान करें, और मान करें हम हैं नारी। ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ पर साहस व शौर्य की प्रतिमूर्ति नारी शक्ति को नमन। नारी सशक्तिकरण के बिना मानवता का विकास अधूरा है।

—————

यह कविता (ओ नारी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बस लिखना है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बस लिखना है। ♦

मैं कवि हूं कविताएं लिखता हूं, सुनाता हूँ,
मेरी लेखनी बेबाक कुछ न कुछ कह जाएगी।
लोगों की सम्पत्ति संजोकर भी ढह जाएगी,
मेरी लेखनी की ज़ुबान थाती बन कर रह जाएगी।

लोग लगे हैं सब धन दौलत ही बटोरने,
मैं भाव, कल्पना और शब्द बटोरता हूं।
लोग लगे हैं औलादों को विरासत छोड़ने,
मैं सदियों दर सदियों भाव छोड़ता हूं।

बिकती है इस दुनियां में राख भी आज,
लकड़ियों के मुकम्मल जल जाने के बाद।
पर विडम्बना देखिए इस दुनियां में जनाब,
बिकती नहीं तो सिर्फ कवियों की किताब।

मैं निराश नहीं हूं खुद की बदहाली के ख्याल से,
मुझे समाज के भटक जाने का डर सता रहा है।
है नहीं मेरा कोई खून का रिश्ता इस दुनियां से,
फिर भी मुझे इसकी चिन्ता का घुन खा रहा है।

है नहीं याद यहां अपनी चौथी पीढ़ी के पुरखे किसी को,
फिर भी आदमी भगवान के होने पर सवाल उठा रहा है।
निकम्मी सोच की दात देनी होगी, है याद नहीं पुरखे ही,
तो क्या फिर तुम्हारा खानदान हवाओं से ही आ रहा है।

यकीन मानिए साहब भूल जाएगी बाप को भी दुनियां,
गर जीने का और आगे बढ़ने का यही… तरीका रहा।
मैं रहूं या न रहूं इस दुनियां में तब ए मेरे अजीज दोस्तो,
मेरी ओर से निशानी हर अल्फाज मेरा तुम्हें लिखा रहा।

सिर्फ बुद्धि – धन के बल पर ही इठलाना इतना,
ए जमाने! खुद ही बता कि जायज कितना है?
हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में,
थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।

पड़ता नहीं है कोई फर्क मुझे किसी के सुनने,
या न सुनने से, मुझे कौन सा महान दिखना है?
कवि हूं मैं प्रत्यक्ष द्रष्टा समाज की हर घटना का,
इसी लिहाज से ही तो मुझे सच बस लिखना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — एक कवि व लेखक सदैव ही सत्य को लिखने की कोशिश करता है वह भी बिना किसी दबाव के। इस संसार के लोग तो धन संपत्ति को इकट्ठा करने में ही सारा जीवन बिता देते है और अंत समय में उनके साथ कुछ भी नहीं जाता है। माना की एक कवि व लेखक के पास धन संपत्ति कम होती है दुनिया की नज़र में, लेकिन एक कवि / लेखक की लेखनी (मेरी लेखनी की ज़ुबान थाती बन कर रह जाएगी।) सदैव के लिए उसे अमर कर जाएगी। विडम्बना तो देखिये की आजकल के लोग लगे हैं सब धन दौलत ही बटोरने में। मैं भाव, कल्पना और शब्द बटोरता हूं। लोग लगे हैं औलादों को विरासत छोड़ने में, आने वाली पीढ़ी के लिए, मैं सदियों दर सदियों भाव छोड़ता हूं। “आजकल की पीढ़ी को नहीं याद यहां अपनी चौथी पीढ़ी के पुरखे किसी को, फिर भी आदमी भगवान के होने पर सवाल उठा रहा है। निकम्मी सोच की दात देनी होगी, है याद नहीं पुरखे ही, तो क्या फिर तुम्हारा खानदान हवाओं से ही आ रहा है।” आजकल की पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर भूलते जा रहे है अपनी ही प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को। याद रखें- हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में, थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।

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यह कविता (बस लिखना है।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बाप बेटी के रिश्ते।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बाप बेटी के रिश्ते। ♦

वह नन्ही सी कली जब, खिल आंगन में आई।
सारे घर की शोभा तब, थी उसीने ही बढ़ाई।
निज पेट काट – काटकर, तब पिता ने पढ़ाई।
ज्यों जवान हुई थी, त्यों ही कर दी थी सगाई।
भावना प्रेम की दोनों ने, अंदर ही अन्दर छुपाई।
‘शादी हुई तो सह न पाया’ बाप बेटी की विदाई।

पत्नी बोली बस करो जी, यह भी कैसी है रुलाई ?
छुपा लो चीखें ज्यूँ , अर्थी पे जवां बेटे की छुपाई।
बाप बेटी के रिश्ते को पगली, तू क्या समझ पाई ?
आज बेटी नहीं जी मैंने, अपनी रूह ही है बेहाई।
न जाने फूल सी पली को, कैसे रखेगा जंवाई ?
चिंता बाप की है पगली, तेरी समझ में न आई।

फूट – फूट कर बिटिया रोए, मां – बाप और भाई।
टाली भी न जाए जी रीत, न ही जाए यह निभाई।
पिता तो यूं रोता है जैसे, लुट गई हो उसकी कमाई।
गम, मौत बेटे की झेल लिया, झेल सका न विदाई।
जब डोली उठी तो पिता को, यादें बहुत सारी आई।
भला बेटी के जाने की, कर पाएगा कौन कहाँ भरपाई ?

ससुराल में गम सब सहे पर, पिता को गाली न सह पाई।
स्वाभिमान जो है पिता उसका, चाहे हो जाए फिर लड़ाई।
दिक हुई तो लाडली, लौट, पुनः बाबुल के घर को आई।
लाड प्यार से समझा बुझा के, बाबुल ने वापिस भिजवाई।
मौत पे पिता की जिसने, दुख में छाती कूट कूट कर बजाई।
मां – बाप तक ही तो था ये मायका, हो गई हूँ अब मैं पराई।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस संसार में पिता और पुत्री का रिश्ता बहुत ही पवित्र और स्नेह भरा होता है। जहा माँ उसके स्वास्थ्य और तंदुस्र्स्ती का ध्यान रखती है, वही पिता उसके भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए अनवरत कार्य करता रहता है। एक माँ तो अपने पुत्री से अपना प्यार व स्नेह दिखाती रहती है, लेकिन एक पिता अपनी बेटी के प्रति अपना अति स्नेह व प्यार को कभी बताता या जताता नही है। अपनी बेटी की सुख सुविधाओं के लिए हर संभव कोशिश करता रहता है। जब बिटिया बड़ी होती है, उसका विवाह कर पिता को अपने आप से बिटिया का दूर चले जाना बहुत ही दुखमय होता है। पर क्या करें दुनिया की जो रीत है उसे भी तो निभाना है। ससुराल में वह गम सब सहे पर, पिता को गाली न सह पाई कभी। स्वाभिमान जो है पिता उसका, चाहे हो जाए फिर लड़ाई। दिक हुई तो लाडली, लौट, पुनः बाबुल के घर को आई। लाड प्यार से समझा बुझा के, बाबुल ने वापिस भिजवाई।

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यह कविता (बाप बेटी के रिश्ते।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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26 जनवरी की पावन बेला।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ 26 जनवरी की पावन बेला। ♦

जिन सूरमाओं ने रक्तिम रंग से, खेली क्रांति की होली थी।
भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी।
इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी।
वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी।
इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी?

जेल गए वे तख्त चढ़े, कलई अंग्रेजों की उन्होंने खोली थी।
हर वार सहे हर प्रहार सहे पर, उफ तक न उन्होंने बोली थी।
शूर वीर उन महारथियों की, एक नियत, एक ही तो बोली थी।
इंकलाब ज़िंदाबाद, गुलामी की बेड़ी उन्होंने ही खोली थी।
इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्जत, माटी में रोली थी?

सरताज तिरंगा भारत का बनाने हेतु, दुश्मनी तब मोली थी।
जुर्म सहे लाख अत्याचार भी, जो कोड़े खा खाल खोली थी।
निज लहू के पावन जन जल से, गुलामी की कीच धो ली थी।
फिरंगी को भगाकर भारत से, भारत मां की जय बोली थी।
इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्जत, माटी में रोली थी?

26 जनवरी की पावन बेला, यूं ही तो न भारत में आई थी।
इस दिन को देखने खातिर, पूर्वजों ने लड़ी कड़ी लड़ाई थी।
15 अगस्त को आजादी पाकर, संविधान सभा बनाई थी।
तब जाकर 26 जनवरी की, यह सद पावन बेला आई थी।
किताबी ज्ञान में नेता जी की, असलियत काहे छुपाई थी?

आजाद हुआ फिर भारत धन्य, संविधानी पोथी बनाई थी।
26 जनवरी1950 को तब, नियमावली भी लागू कराई थी।
इस बीच फिरंगी ने अपनी, फूट डालो की चाल चलाई थी।
भारत के टुकड़े करने हेतु, हिन्दू मुस्लिम में डाली लड़ाई थी।
किताबी ज्ञान में नेता जी की, असलियत काहे छुपाई थी।

नई पीढ़ी के लोग क्या जाने, कि ये घड़ियां कैसे आई थी?
पुरखों ने घड़ियां पाने खातिर, खून की नदियां जो बहाई थी।
कई कोखें उजड़ी, मांगे उजड़ी, तब जाकर आजादी आई थी।
छुप छुप कर गोरों से लड़े भिड़े, तब जाकर आजादी पाई थी।
किताबी ज्ञान में नेता जी की, असलियत काहे छुपाई थी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है… जिन सूरमाओं ने अपने रक्तिम रंग से खेली क्रांति की होली थी। भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी। सदैव ही इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी। वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी। इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी? यह राष्ट्रीय पर्व हमें देश की एकता और गौरव को बनाये रखने की प्रेरणा देता है। हम सभी को संविधान के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 26 जनवरी के दिन ही भारत को गणराज्य का सर्वोत्तम दर्जा प्राप्त हुआ। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक परेड निकाली जाती है। जिस वतन ने हमें प्यार, मां का आंचल, समरसता, रंग रूप भेष भाषा सभी को मिलता मान दिया उस वतन पे हमें नाज है। जिस वतन का सबसे बड़ा संविधान लोकतंत्र जिसकी शान वो भारत देश महान वो भारत देश महान। वतन हमारी आन हमारा सम्मान है उस मां को हमारा सलाम वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम्॥

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यह कविता (26 जनवरी की पावन बेला।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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नया आ रहा है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नया आ रहा है। ♦

होने लगी है नए साल की, अब थोड़ी-थोड़ी सुगबुगाहटें।
पुराना जा रहा है, नया आ रहा है, ले करके नई आहटें।

हे प्रभु! रहम करना, मत देना नए साल में कोई कड़वाहटें।
विनय है विश्व बंधुत्व दे, फैलें दशों दिशाओं में नई चाहतें।

पापित – शापित को क्षमा करो, हो नए ज्ञान का विमल उद्भास।
सत्ता – समाज में सौहार्द्र बने और जगे धरा पर नूतन विश्वास।

सीमाएं हो जाए निर्द्वंद्व और रिहाइशें हो महफूज और आवाद।
रोग शोक की गुलामी की जंजीरों से, बच्चा-बच्चा होवे आजाद।

क्षमा, दया, समता और वैभव की उमंग विश्व में अब छा जाए।
हर मानव के भीतर मानवता के हर गुण, आटे में नमक से समा जाए।
आ रहा है…

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हे प्रभु! रहम करना, मत देना नए साल में कोई कड़वाहटें। विनय है विश्व बंधुत्व दे, फैलें दशों दिशाओं में नई चाहतें। हे प्रभु! यही प्रार्थना है मेरी। बीत रहा वर्ष बहुत दर्द दे गया, बहुत सारे परिवार ने अपनों को खो दिया, लेकिन इस संकट के समय ने इंसान को बहुत कुछ सिखाया भी। अब भी समय है हे मानव तू सुधर जा प्रकृति को निखारने वाला कार्य कर, तूने प्रकृति के साथ बहुत खिलवाड़ किया। अब सुधर जा वरना रोने के सिवा कुछ नहीं बचेगा। हे मानव तूने प्रकृति के पांचो तत्वों को अपवित्र और प्रदूषित किया हद से ज्यादा, अब प्रकृति को निखारने व बचाने वाला कार्य कर तू, समय रहते प्रकृति को उसके ओरिजिनल रूप में सुरक्षित करो। जितना ज्यादा हो सके पेड़ लगाएं, जिससे प्रकृति अपने सभी ऋतुओं का समय पर संचालन करें, और फिर से ये धरा खिलखिला उठे। चारो तरफ खुशिया ही खुशिया बिखर जाये।

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यह लेख (नया आ रहा है।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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चुनावी मौसम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चुनावी मौसम। ♦

मौसम आया चुनावों का देखो,
हर दल जनता को लुभाते है।
लोक लुभवन घोषणा पत्र तो कभी,
विचित्र सा स्वप्न – डर दिखलाते हैं।

कुछ का बिगड़ा मिजाज है देखो,
मय – माया से वोट खरीदवाते हैं।
सत्ता हो हासिल जैसे भी कैसे,
साम, दाम, दंड, भेद सभी अपनाते हैं।

धिक्कार है ऐसी जनता को जो,
अपना जमीर बेच के खाती है।
किस्मत फोड़ के खुद ही अपनी,
क्यों कहती है? सत्ताएं हमें सताती हैं।

तब थे देखो हुए तुम मदमाते,
अब सत्ताएं भी हुई मदमाती हैं।
तुम ने लूटा इनसे तब थोड़ा – थोड़ा,
अब सब ये तुमसे पूरा करवाती हैं।

देश की हो गई है देखो हालत पतली,
जनता – सत्ता अदला-बदली ही चुकाती हैं।
कैसे सुधरेगी हालत देश की तब तक?
जब तक जनता खुद ही न जाग जाती है।

है किसी भी दल के नेता के यहां,
नेक न देखो कोई भी इरादे।
सत्ता को हथियाने के चलते सब,
करते हैं देखो हर वादे पे वादे।

यह रोग नहीं है मात्र ऊपर ही ऊपर,
इसकी गिरफ्त में है स्थानीय निकाय।
इलाज एक ही दुरुस्त है इसका बस,
कि कैसे ना कैसे जनता जाग जाए।

सवाल एक ही चूहे – बिल्ली के खेल में,
बिल्ली के गले में घंटी कौन लटकाए?
सबकी हो गई है फितरत एक सी आज,
कैसे न कैसे जान बचे तो लाख उपाए।

देश की किसी को न चिंता है आज,
हसरत है, मेरा तुम्बा पहले भर जाए।
फिर कोई जाति – धर्म मे बांटें हमको,
या फिर खुद ही अपना वोट बिकवाए।

चुनावी मौसम है भाई हाथ मार लो,
फिर क्या मालूम फसल आए न आए?
मतदान है महा पुण्य दान, ये इनको,
कौन समझाए ? कि इसे न बिकवाए।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — चुनाव नजदीक आते ही नेता लोग आने लगते है हमारे घर पर वोट मांगने, जितने के बाद नेता जी 5 वर्ष के लिए लापतागंज में लापता हो जाते है। एक बार भी भूल से भी नज़र नहीं आते नेता जी। और तो और जनता के पैसे पर ऐश करेंगे और हमे ही डराएंगे व धमकाएंगे, कोई कार्य नहीं करेंगे, बस अपना खज़ाना भरेंगे। अपनी 12 पीढ़ियों के लिए खज़ाना भरेंगे। इनके नज़रिये से जनता जाए भाड़ में अपना खज़ाना भरेंगे दबा के। जनता भी कुछ कम नही है, चंद पैसो के लिए अपने वोट को बेच देती है। उसके बाद सरकार को कोसती रहती है।

—————

यह लेख (चुनावी मौसम।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मैं तो जनता हूं जनाब।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मैं तो जनता हूं जनाब। ♦

मैं तो जनता हूं जनाब,
पन्ने दर पन्ने की खुली किताब।
मुझे पढ़ने का देते हैं सभी सुझाव,
जो पढ़े न मुझको उसे देती हूं जवाब।
घटना के बाद फिजूल है हिसाब किताब,
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

समझ नहीं आते सत्ताधीशों के ख़्वाब,
भीगी बिल्ली वोटों को, कुर्सी पे रूआब।
मेरी हाट के सौदे का, मुझे ही बताते भाव,
फिर तो मुझे भी आता है, देना भाई जवाब।
मैने भी तो देखे हैं, पड़ावों पर आते पड़ाव,
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

भोली हूं मैं, कुछ बहुत ही ज्यादा साहब,
मुझ पर खेले हैं, कई शकुनी मामाओं ने दाव।
सबका बारी – बारी से, मैने पूरा किया है चाव,
मेरी ही धौंकनी से, मिला है सबको सदा से ताव।
फिर भी न जाने क्यों? करते नहीं है मेरा बचाव?
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

मैं कहां कहती हूं? कि जश्न जीत का न मनाओ,
बल्कि मुझे भी जश्न ए जीत में चाहो तो बुलाओ।
मैं कहां कहती हूं? कि तुम भूखे रहो न खाओ,
मैने कब कहा? तुम अपनी उपलब्धियां न गिनाओं।
पर साहेब, मुझ पे ही सवार हो, मुझे ही तो न भुलाओ,
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — चुनाव नजदीक आते ही नेता लोग आने लगते है हमारे घर पर वोट मांगने, जितने के बाद नेता जी 5 वर्ष के लिए लापतागंज में लापता हो जाते है। एक बार भी भूल से भी नज़र नहीं आते नेता जी। और तो और जनता के पैसे पर ऐश करेंगे और हमे ही डराएंगे व धमकाएंगे, कोई कार्य नहीं करेंगे, बस अपना खज़ाना भरेंगे। अपनी 12 पीढ़ियों के लिए खज़ाना भरेंगे। इनके नज़रिये से जनता जाए भाड़ में अपना खज़ाना भरेंगे दबा के।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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बेटी पर है नाज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बेटी पर है नाज। ♦

बेटी पर है नाज, बेटी ही विश्वास,
बेटी घर की साज, करती सब काज।
दो कूलों को संवारती है बेटी,
पापा की पाग सजाती है बेटी।

उनके है रूप अनेक, हर रूपों में रम वो जाती,
जीवन में मिले हर रोल, बड़ी संजीदगी से निभाती।
हर दुःख दर्द सह जाती, उफ तक न करती,
बेटी बन… पापा का नूर बन जाती।

मां बन घर को है स्वर्ग बनाती,
बहन बन भाई का रक्षा कवच बन जाती।
पत्नी के रूपों में सफल संगनी का हर फर्ज निभाती,
जिंदगी जिससे शुरू होकर जिस पर हो जाती खत्म।

उस बेटी का करें सम्मान, है वो बेटा के ही समान।
बेटा – बेटी में न कर फर्क, बेटी ही मान, बेटी ही सम्मान।
जगत में जिसका बढ़ रहा शान, हर क्षेत्र में कर रही देश का नाम।
फिर क्यूं होता उनका अपमान, गर्भ में जिनका रूढ़िवादी सोच से,
कर दिया जाता बिन दुनिया देखे, भ्रूण का ही नाश।

ऐसी हैवानियत की इन्तहा से, हो रहा मानवता का है ह्रास।
विवेक कर रहा जनमानस से, एक ही गुहार,
बेटी ही मान, बेटी ही हमारा अभिमान,
फिर क्यूं हो रहा उनका अपमान, छू रही चोटी, उड़ रही आसमान।

बेटा संग बेटी कंधे से कंधा मिलाकर कर रही हर काम,
सृष्टि की रचनाकार, प्यार से परिवार को रखती बांध।
ऐसी बेटी का करें मान – सम्मान,
करें उनकी महिमा का बखान, उनका करें सदा गुणगान।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ संदेश का कर उदबोधन,
होगा जगत का उद्धार, बेटी ही मान बेटी ही सम्मान।
बेटी पर है नाज, बेटी ही विश्वास।

♦ विवेक कुमार जी – जिला मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — बेटियां शक्ति, प्रेम, करुणा, ममता की वह चुलबुली चिड़िया सी चहकती, फूल सी महकती मुस्कुराती, राजकुमारी सबकी प्यारी लाड़ली – दुलारी, सबका सदैव ही ध्यान रखने वाली। ईश्वर द्वारा मानव जाती के लिए प्रदान की गई अनमोल शक्तिपुंज हैं। जो हर रूप में प्रिय और पालनहार है। बेटा संग बेटी कंधे से कंधा मिलाकर कर रही हर काम, सृष्टि की रचनाकार, प्यार से परिवार को रखती बांध। ऐसी बेटी का करें मान – सम्मान, करें उनकी महिमा का बखान, उनका करें सदा गुणगान।

—————

यह कविता (बेटी पर है नाज।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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गलियां गांव की।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गलियां गांव की। ♦

आज न सखी महफूज रही,
अब देख ये गलियां गांव की।
अब मत करना आश कहीं तू,
घनी धूप में इनसे छांव की।

ये उगल रही है दारुण दंश निशी – दिन अब,
किसी का किसी पे रहा न आज भरोसा।
रही न नज़रें अब मां – बेटी को देखने वाली,
हर आंखों में आज बस गोश्त ही परोसा।

आज न जाने कब किस गली से?
निकल आए कोई हवस का प्यासा।
अपनी हिफाजत अब आप करो तुम,
मत बन जाना टी वी चैनल में तमाशा।

आज न है सिर्फ निशाचर से ही खतरे,
दिनचर ही झाड़ रहे हैं धूली निज पांव की।
साफगोई से झाड़ते हैं पल्ला फिर अपना,
महफूज कहां है अब गालियां गांव की?

घटना घट जाने के बाद है करते,
हंगामा फिर कानून के रखवाले।
रसूखदारों के चमकीले चांदी के जूते,
जड़ देते हैं इनके मुंह पर फिर ताले।

अब कहां बहती है वे पावन पवने?
गांव के छबीले सुंदर गलियारों में।
यहां महफूज नहीं बहू – बेटियां रही,
दिन के उजाले में न रात के अंधियारे में।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

• Conclusion •

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — अब क्या गांव ? क्या शहर ? कही भी बहू – बेटियां महफूज नहीं। कब किधर से निकल आए कोई हवस का प्यासा, कुछ नहीं खा जा सकता। इंसान के रूप में शैतान है अब यहां। जिस भी बहू – बेटी के साथ गलत होता है उनके दिलों – दिमाग पर नकारात्मक यादों के रूप में मन पटल पर लम्बे समय तक साया बनी रहती है। जो उनके दुखी करती रहती है। अब कहां बहती है वे पावन पवने? गांव के छबीले सुंदर गलियारों में।

—————

यह कविता (गलियां गांव की।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बेटियां।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बेटियां। ♦

कितनी कोमल कितनी सुंदर कितनी छबीली होती हैं बेटियां?
फिर भी न जाने क्यों करते हैं लोग मूर्खता में इनकी अनदेखियां?

दिख जाता है किसी मुस्कुराती बेटी का चेहरा जब सुबह सबेरे।
करुणा, ममता जगती है अन्तर मन में धुल जाते हैं पाप घनेरे।

वह चुलबुली चिड़िया सी चहकती फूल सी महकती गांव में मेरे।
उसकी मौजूदगी से ही तो आवाद है ये घर गांव और सबके डेरे।

लोग यूं ही है चिढ़ते और ऊंघते उसके घर में जन्म लेने के बाद।
वह बेचारी हर आंसू पी कर भी करती है दो – दो घरों को आवाद।

फूलों को यूं तोड़ना मरोड़ना तो जमाने की पुरानी सी आदत है।
वे क्या जाने कि इन्हीं फूलों से होती यहां खुदा की इबादत है।

क्यों कुचल देते हैं लोग जन्म लेने से पहले ही इसको गर्भ में?
क्या सम्भव है ऐसे पिशाचों को बेटा हो जाने पर, जगह स्वर्ग में?

बोझ नहीं उपहार है बेटी उस खुदा की कुदरत व रहनुमाई का।
क्यों हर बार पूछा जाता है हिसाब उससे ही उसकी बेगुनाही का?

किसी की मरती बहन है देखो, तो किसी की बहु – भाभी है।
किसी की मरती बेटी है देखो, क्या इसी का नाम आजादी है?

जहां महफूज नहीं है फिजाओं में खुले में सांसे भी लेना।
सुन नारी उस समाज को अपनी सुरक्षा का जिम्मा न देना।

माना कि कुछ नारियां चालाक है, पर सजा सब को तो न दो।
गुनाह जिसने किया है हिसाब तो लो, उसी को सजा भी दो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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• Conclusion •

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — बेटियां शक्ति, प्रेम, करुणा, ममता की वह चुलबुली चिड़िया सी चहकती, फूल सी महकती मुस्कुराती, राजकुमारी सबकी प्यारी लाड़ली – दुलारी, सबका सदैव ही ध्यान रखने वाली। ईश्वर द्वारा मानव जाती के लिए प्रदान की गई अनमोल शक्तिपुंज हैं। जो हर रूप में प्रिय और पालनहार है।

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यह कविता (बेटियां।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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