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हिन्दी साहित्य

नागचंद्रेश्वर मंदिर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Nagchandreshwar Mandir | नागचंद्रेश्वर मंदिर।

उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर।

भारतवर्ष के कोने-कोने में अलग-अलग शहरों नगर में मंदिर – मूर्ति हैं। चाहे जिस क्षेत्र में आपका कोई भी शहर, नगर, ऐसा नहीं होगा जिसमे मंदिर ना हो। परंतु उज्जैन एक ऐसा शहर है जहां पर भगवान नाग चंद्रेश्वर मंदिर है इस मंदिर की खास बात यह है कि इस मंदिर का कपाट केवल नाग पंचमी सावन मास की शुक्र पंचमी तिथि को ही खुलता है — सिर्फ साल में एक दिन।

भगवान शिव के आभूषण स्वरुप नागदेव की पूजा होती है। इस दिन दरवाजे पर नाग देवता की मूर्ति लगाई जाती है गाय का दूध और धान का लावा घर के हर कमरे में छिलका जाता है। मस्तक पर केसर चंदन लेप किया जाता है। यह सारी क्रियाएं सुबह स्नान करके घर की औरतें करती हैं।

मंदिरों का शहर उज्जैन

महाकाल का नगर उज्जैन को कौन नहीं जानता उज्जैन को मंदिरों के शहर के धाम नाम से जाना जाता है। उज्जैन शहर की गली-गली मोहल्ले-मोहल्ले में मंदिर स्थित है। उन्हीं मंदिरों में से एक विशेष मंदिर नागचंद्रेश्वर मंदिर है जो महाकाल मंदिर में अवस्थित है। नागचंद्रेश्वर मंदिर की आभा निराली है। यहां भी नागपंचमी को त्यौहार मनाया जाता है जबकि सम्पूर्ण भारतवर्ष में नागपंचमी का त्यौहार सावन मास की शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है।

नाग पंचमी के दिन औरतें नाग देवता की पूजा अर्चना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि नाग देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं। सनातन संस्कृति में नाग देवता का पूजन करने का विधान प्राचीन काल से प्रचलन में चलता चला रहा है। नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा का विधान है। पुनः गाय के दूध से स्नान कराया जाता है। इस दिन नाग पूजन के साथ ही भगवान शिव की पूजा रुद्राभिषेक करने से कालसर्प दोष खत्म हो जाता है। और राहु केतु के अशुभ दोष दूर हो जाते हैं।

वर्ष में केवल 24 घंटे के लिए खुलने वाला मंदिर

24 घंटे नागपंचमी के दिन भारतवर्ष में एक मात्र खुलने वाला मंदिर उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर है जो उज्जैन में महाकाल मंदिर के तीसरे भाग में विद्यमान है। नागचंद्रेश्वर मंदिर, यह नागचंद्रेश्वर की प्रतिमा उज्जैन के लिए नेपाल से लाई गई थी। यह प्रतिमा बहुत पुरानी है इस प्रतिमा के बारे में कहा जाता है कि यह प्रतिमा 11 वीं सदी की प्रतिमा है। खास बात तो यह है कि इस प्रतिमा में शिव – पार्वती अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान है। शिव परिवार के ऊपर नाग देवता फन फैलाएं हुए हैं। इस तरह की प्रतिमा के बारे में खासकर उज्जैन में चंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन के अलावा अन्यत्र कहीं भी नहीं है। ऐसी प्रतिमा देखने को भी नहीं मिलती है।

दुनिया का यह इकलौता मंदिर उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर है जहां शिव सपरिवार सांपों की शय्या पर विराजमान हो। मान्यता अनुसार सांपों के राजा तक्षक ने भगवान शिव को मनाने के लिए घोर तपस्या की। उनकी कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान भोलेनाथ तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया वरदान प्राप्त करने के बाद से ही तक्षक राज ने भगवान शिव के सानिध्य में वास करना शुरु कर दिया।

उज्जैन के महाकाल मंदिर के आस पास प्राचीन काल से ही घोर जंगल था। इस क्षेत्र को महाकाल वन उपवन के रुप ने जाना जाता था। नाग देवता को महाकाल में वास करने के पीछे उनकी मनसा रही होगी कि एकांत में विघ्न न हो!

शायद यही कारण था कि नाग चंद्रेश्वर मंदिर नाग देवता के रहने के स्थान पर बना। नाग चंद्रेश्वर मंदिर का कपाट बार-बार नहीं, “वर्ष में एक दिन खुलता है।” वह भी सावन की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी के दिन, नाग दर्शन को खुलता है। नाग पंचमी के दिन ही उनका दर्शन होता है। मेला लगता है सुदूर से लोग दर्शन के लिए आते हैं।

समय और परंपरा के अनुसार मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है। बाकी के दिनों में चंद्रेश्वर के सम्मान में प्राची परंपरा अनुसार मंदिर बंद ही रहता है। भगवान चंद्रेश्वर जी की त्रिकाल पूजा की जाती है। काल पूजा करने का विधान प्राचीन काल से चला रहा है।

त्रिकाल पूजा अलग-अलग समय में होती है।
पहली मध्यान रात में महा निर्माणी होती है।

दूसरी पूजा नाग पंचमी के दिन दोपहर के समय शासन प्रशासन द्वारा करायी जाती है।
तीसरी पूजा नाग पंचमी की शाम को भगवान महाकाल की पूजा के बाद मंदिर समिति द्वारा की जाती है।

पहले की भांति रात्रि 12:00 बजे भगवान चंद्रेश्वर के मंदिर का कपाट पुनः एक वर्ष के लिए बंद कर दिया जाता है।

ओम् नागेश्वराए नमः

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — दुनिया का यह इकलौता मंदिर उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर है जहां शिव सपरिवार सांपों की शय्या पर विराजमान हो। मान्यता अनुसार सांपों के राजा तक्षक ने भगवान शिव को मनाने के लिए घोर तपस्या की। उनकी कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान भोलेनाथ तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया वरदान प्राप्त करने के बाद से ही तक्षक राज ने भगवान शिव के सानिध्य में वास करना शुरु कर दिया। 24 घंटे नागपंचमी के दिन भारतवर्ष में एक मात्र खुलने वाला मंदिर उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर है जो उज्जैन में महाकाल मंदिर के तीसरे भाग में विद्यमान है। नाग पंचमी के दिन औरतें नाग देवता की पूजा अर्चना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि नाग देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं। सनातन संस्कृति में नाग देवता का पूजन करने का विधान प्राचीन काल से प्रचलन में चलता चला रहा है। नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा का विधान है। इस दिन नाग पूजन के साथ ही भगवान शिव की पूजा रुद्राभिषेक करने से कालसर्प दोष खत्म हो जाता है। और राहु केतु के अशुभ दोष दूर हो जाते हैं।

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यह लेख (नागचंद्रेश्वर मंदिर।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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गुरु – शिष्य परम्परा की शुरुआत कब और कैसे?

Kmsraj51 की कलम से…..

Beginning of Guru Shishya tradition when and how | गुरु–शिष्य परंपरा की शुरुआत कब और कैसे हुई?

वैदिक युग के साहित्य अध्ययन की सुविधा से पूर्व वैदिक काल जो 1500 ई. पूर्व से लेकर 1000 ई. पूर्व तक तथा उत्तर वैदिक काल 1000 ई. पूर्व से लेकर 500 ई. पूर्व तक में विभक्त किया गया। ऋग्वेद से हमें पूर्णरूपेण ऋग्वैदिक काल का इतिहास ज्ञात होता है। उत्तर वैदिक काल का विकास संस्कृति का उत्थान ऋग्वेद से ही हुआ। इस काल का इतिहास संहिता अख्यक ग्रंथ ब्राह्मण एवं उपनिषदों से प्राप्त हुआ है। आर्य सभ्यता को फैलाव ऋग्वैदिक काल तक पंजाब एवं सिंध तक सीमित रहा, परंतु उत्तर वैदिक काल में आर्यों का प्रसार व्यापक क्षेत्र में हो गया। आर्य सभ्यता का केन्द्र सरस्वती से गंगा तक दोआब में विकसित-विस्तृत था। आध्यात्मिक तत्वों की विशाल राशि वेद है। इन तत्वों का अनुगमन ही धर्म है। धर्म का स्त्रोत वेद है।

वैदिक काल का जीवन दर्शन

वेद प्रत्यक्ष या अनुमान द्वारा अगम्य औषधि तत्वों का सुगमता से बोध अनुभव कराता है। अलौकिक तत्वों के रहस्य जानने के लिये वेद का अध्ययन जरूरी है। इसे जानने हेतु दर्शन एवं चिंतन की आवश्यता है। चिंतन से नवीन दार्शनिक आयाम प्राप्त होते है। वैदिक काल का जीवन दर्शन, निष्ठा, आस्था एवं अनुराग था। उक्त काल में कर्मठता, एकनिष्ठा, के आधार पर समन्वय अनुशासन अनुकरण करते रहे। वेदों के सूक्त, सरल, सुबोध, सुविधाजनक तथा देवताओं को प्रसन्न करने हेतु है। अथर्ववेद में वरुणा नदी का उल्लेख से कुछ विद्वान वाराणसी नाम की प्राचीनता का अनुमान करते हैं, तो भी यह नगर काशी की तुलना में जाती रही, परंतु मुख्य रूप से संस्कृत विद्या पर विशेष वद दिया जाता था।

ऋग्वेद कालीन समाज में भौतिक की अपेक्षा बौद्धिक ज्ञान के महत्व का लोगों के ऊँचे विचार ज्ञान की महिमा आध्यात्मिक चिंतन और भौतिक आकर्षण के प्रति विरक्त मनुष्य की जीवन के मूल्य थे। यहाँ वेद में गायत्री मंत्र ज्ञान के उच्चतम आधार थे। मंच द्रष्टा ऋषियों में उच्चतम दार्शनिक चिंतन दिग्दर्शिका होता था। ऋग्वेद के अनुसार स्वाध्याय एवं प्रवचन के अनुगमन से मनुष्य एकाग्र-चीना होता है। लोग विविध विद्या का अध्ययन कर देवताओं को प्रसन्न करते थे और अपनी कामयाबी की पूर्ति करते थे। वैदिक काल में प्रमुख रूप से वेद अध्ययन होता था।

शिक्षा शास्त्र का निर्माण स्वरों के अनुशासन एवं शुद्धता के लिये किया गया। योद्धा को धर्म की शिक्षायें कंठस्थ करायी जाती, तो वहीं पुरोहितों को संस्कार के मंत्रों का, शिक्षाओं की विस्तृत व्याख्या बतायी जाती थी। गुरू-शिष्य परम्परा का निर्वहन काशी में होता था। ब्रह्माघाट पर ब्रह्मशाला को ब्रह्मा जी ने आकर ब्राह्मण वंश चलाया था, ऐसी काशी की मान्यता है। विद्या, श्रद्धा और योग से किया गया कर्म संयुक्त होने का प्रबल हो जाता है। शिक्षा से सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का उत्कर्ष होता। ज्ञान शिक्षा से प्राप्त होता है, ज्ञान जीवन को प्रकाशवान बनाता है। मानव को संमार्ग अवलोकन कराता है। ज्ञान से जीवन का कठिनतम कठिनाइयों को दूर करने का सम्बल प्राप्त होता करने में शिक्षा का महत योगदान है। समाज को विकसित करने तथा जीवन को सात्विक और नैतिक निर्देशों का पालन करने का मार्ग शिक्षा द्वारा प्रदान होता है।

उपनयन संस्कार

व्यक्ति आत्मनिर्भर हो, बहुमूल्य शिक्षा का विकास करता है। पारिवारिक निर्वहन के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक नैतिक, धार्मिक उत्थान करते हुये चरित्रवान बनकर उत्कृष्ट व्यक्तित्व के उत्तरदायित्वों के साथ सभ्य समाज का नवनिर्माण करता है। मौखिक शिक्षा का प्रचलन वैदिक काल में था। आगे चल कर कमल एवं भोजपत्र पर मयूर पंखों से लिखा जाने लगा। शिक्षा का आरम्भ ब्रह्मचर्य आश्रमों में उपनयन संस्कार के बाद ही होता था। विद्यारम्भ संस्कार के समय बालक गुरूवंदना कर गुरू के प्रति निष्ठा व्यक्त करता था। उपनयन उपरांत ब्रह्मचारी बालक को विद्यामय शरीर और ज्ञानमुक्ति मस्तिष्क प्राप्त होता था, जो माता-पिता से प्राप्त स्थल शरीर से भिन्न था। शिक्षा ग्रहण करने के काल का निर्धारण किया गया था, जो क्रमशः 8-10 वर्ष क्षत्रिय, 11-12 , वर्ष की आयु में शिक्षा प्रारम्भ करने का निर्धारण था। गुरूकुल की प्रथा थी कि गृह त्याग कर बालक गुरू आश्रमों में रहते और योग्यतानुसार शिक्षा प्रदान की जाती रही। उपनिषदों के गुरूकुल के स्थान आचार्य कुल का प्रयोग आते हैं। शिक्षा और विद्या के अद्धतीय अधिष्ठानों का उल्लेख महाकाव्य में गुरुकुल का उल्लेख मिलता है।

उच्चकोटि के गुरूकुल व आश्रम

पूर्वकाल में भारद्वाज एवं वाल्मीकि आश्रम उच्चकोटि के गुरूकुल थे। { महाभारत के द्वारा } मार्कण्डेय एवं कण ऋषि के आश्रम शिक्षा के प्रधान विद्या स्थल थे। वैदिक काल में गुरू के निम्न प्रकार बताये गये हैं। आचार्य, उपाध्याय, प्रवक्ता, अध्यापक, श्रोचिय, गुरू, ऋत्विक, चरक। उक्त गुरूओं का वैदिक काल एवं सूक्तयुग में वेद का ज्ञान स्मरण ! शक्ति पर आधारित था। वेद मंत्रों का कंठस्थ! किया जाता था। गुरूकुल में ज्ञान प्राप्त करने हेतु अध्ययन-अध्यापन कंठस्थ कर होता था। वैदिक युग में आचार्य और गुरू का स्थान देवता-सा था, जो आदरयुक्त, गरिमामय और प्रतिष्ठित था। अग्नि का आचार्य अंगिरा के रूप में अतवरण हुआ, इंद्र के गुरू के रूप में प्रतिष्ठा थी। ऋग्वैदिक आचार्य दिव्य और आलौकिक ज्ञान के प्रतीक थे।

शिक्षा केंद्रों द्वारा समाज को नई दिशा

दृष्टि के धनी होने और बुद्धि तीक्ष्ण होना! शिक्षा के कारण स्वभाविक हो सकता है। एक व्यक्ति से दूसरा अधिक विवेकशील तथा विद्वान हो सकता है। निरंतरता में त्रुटियों के बावजूद काशी की शिक्षा पद्धति ने समाज को एक नई दिशा प्रदान की। आज विश्वविद्यायल, काशी, कश्मीर, धारा, कनौज, उपहित्न पातन, कांची, नालंदा, विक्रमशीला, बल्लभी एवं त्रावस्ती जैसे शिक्षा केंद्रों द्वारा समाज को नई दिशा प्रदान करने का क्रम जारी है। काशी में छोटी-बड़ी वेदशालाओं में दर्जनों भर शिष्य वेद परम्पराओं का निर्वहन कर रहे हैं। ऋग्वेद की शाकल शाखा कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा शुक्लर यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखापूर्ण रूप से काशी में विद्यमान है। सामवेद की रमणीय शाखा में आंशिक गान करने वाले भी कुछ गुरू-शिष्य परम्परा काशी में दृष्टिगत होती है।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — वैदिक काल का जीवन दर्शन, निष्ठा, आस्था एवं अनुराग था। उक्त काल में कर्मठता, एकनिष्ठा, के आधार पर समन्वय अनुशासन अनुकरण करते रहे। वेदों के सूक्त, सरल, सुबोध, सुविधाजनक तथा देवताओं को प्रसन्न करने हेतु है। अथर्ववेद में वरुणा नदी का उल्लेख से कुछ विद्वान वाराणसी नाम की प्राचीनता का अनुमान करते हैं, तो भी यह नगर काशी की तुलना में जाती रही, परंतु मुख्य रूप से संस्कृत विद्या पर विशेष वद दिया जाता था। ऋग्वेद कालीन समाज में भौतिक की अपेक्षा बौद्धिक ज्ञान के महत्व का लोगों के ऊँचे विचार ज्ञान की महिमा आध्यात्मिक चिंतन और भौतिक आकर्षण के प्रति विरक्त मनुष्य की जीवन के मूल्य थे।

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यह लेख (गुरु – शिष्य परम्परा की शुरुआत कब और कैसे ?) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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77वां स्वतंत्रता दिवस!

Kmsraj51 की कलम से…..

77th Independence Day | 77वां स्वतंत्रता दिवस!

KMSRAJ51.COM »  के…

सभी पाठकों को तहे दिल से 77वां स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं!

राष्ट्र प्रेम हमें अपने देश के प्रति अपनाए गए गहरे स्नेह और समर्पण की महत्वपूर्णता को समझाता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमें अपने देश के उच्चतम हित को सर्वोपरि रखना चाहिए और समृद्धि और सामर्थ्य के साथ उसके विकास में योगदान करना चाहिए। राष्ट्र प्रेम और स्वतंत्रता दिवस हमें एक मजबूत, एकता में बँधने वाले और स्वतंत्र भारत की दिशा में प्रतिबद्ध रहने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। यह दिन देशभक्ति और राष्ट्रीय गर्व की भावना को महसूस कराता है और लोग विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों ने कितनी संघर्षशीलता और बलिदान के बाद हमें आजादी दिलाई थी। राष्ट्र प्रेम और स्वतंत्रता दिवस भारतीय जनता के लिए महत्वपूर्ण और गर्व की बात है।

भारतीय स्वतंत्रता दिवस का महत्वपूर्ण अंश उन समर्पित वीरों की याद को समर्पित है जिन्होंने अपने जीवन की आहुति देकर देश को स्वतंत्र कराया। इस दिन को गौरवपूर्ण और श्रद्धांजलि भरे भावनाओं के साथ मनाना चाहिए, ताकि हम अपने इतिहास के महान परिप्रेक्ष्य में गर्व महसूस कर सकें और स्वतंत्रता के महत्व को समझ सकें।

भारत माता की जय! — वन्दे मातरम्!

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काशी कहां चली।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kashi Kahan Chali | काशी कहां चली।

काशी संसार सागर से पार उतारने वाली भक्ति भावन नगरी है। काशी समीचीन यथार्थ सुदृढ़ शोत्रसम्मत् सर्वसिद्धि तपोभूमि है। काशी में जहां मरणोपरांत भक्ति मुक्ति मिलती है वही काशी में किये पुण्य अथवा पाप कर्म भी अक्षुण्ण होते हैं। मानव यूं तो बुद्धिजीवी है, फिर काशी की गरिमा पर कहीं प्रश्नचिन्ह न लगे, आंच न आवे ऐसे कार्यो से भावुक हो लोग तमाम अनैतिक कार्यों में लिप्त नजर जाने क्यों लोग दिखते हैं। इससे साफ जाहिर है जन – जन में वैभव, पराक्रम मनस्विता और जीवट, ओजस् तेजस् की कमी कहीं न कहीं हमारे अंदर अवश्य ही प्रभावित कर रही है। फाल्गुन मास में बरसाने वृंदावन – मथुरा होली के माहौल में जब रंग विरंगे रंगों से सरावोर रहती है वहीं काशी, काशी में बाबा भोले भी इस सुअवसर से अछूते क्यों रह जायेंगे।

आमल एकादशी 

आमल एकादशी को भोले भी भाव विह्वल हो स्नान करते हैं, सप्रेम भरी होली-रंगभरी के रंग से सराबोर होते हैं साथ ही अतिविशिष्ट शृंगार भी कराते हैं। इन्हीं दिनों सिद्धि चक विधानानुसार धर्म के अष्ट चिन्ह के पूजा विधान में भी लिखा गया है—

कार्तिक फाल्गुन अषाढ़ के अंत अठ दिन माहि।
नन्दीश्वर श्वर जात है, हम पूजे इह ठाहिं॥

अर्थात् — जैन श्रावक उक्त मास के अंतम आठ दिन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक काल्पनिक रूप में इन्द्र इन्द्राणी देवता का विधानपूर्वक पूजन, भजन भी होता है। जब काशी का वर्णन हम कर रहे हों, वहां शिवलिंग का वर्णन न हो तो काशी का वर्णन संभवतः अधूरा प्रतीत होता है। वैगे तो मनुष्यों द्वारा कुछ भी पूर्ण कर पाना समीचीन नहीं हैं।

निराकार पार ब्रह्म परमेश्वर

पूर्ण तो मात्र ब्रह्म है जो निराकार पार ब्रह्म है जो निराकार पार ब्रह्मपरमेश्वर ही है। हम जिस ज्योतिर्लिंग का वर्णन यहां करने जा रहे हैं वह वही है जो आपकी आत्मा का स्वरूप है। जब बच्चा मां के गर्भ में आता है तो वही अंडाकार रूप धारण करता है जिस आकार में शिवलिंग होता है। मरणोपरांत अग्नि दहन के समय भी शनैः शनैः पुनः उन्हीं स्वरूप में ही, यह मानवीय रूपाकाया पंच भूतात्मा पंचतत्व में विलीन हो जाता है। शिव आनन्ददाता हैं। जिस दिन आप शिव में लीन होंगे और गंगा के पावन जल से परिपूर्ण हो जायेंगे उस दिन से कुछ शेष नहीं बचा। द्वंद नहीं निर्द्वद हो जायेंगे। विलक्षणता की अनुभूति होनी स्वभावतः हो जायेगी।

काशी में स्त्रैण और नगरी पुरुष को खोजते फिरते रहते हैं शायद उन्हें ज्ञात नहीं शिव अर्धनारीश्वर है। बांवले से सड़कों गलियों ऐसे में देखते ही होगें। आप में भी द्वंद्व होना स्वाभाविक है ही, क्योकि यह जगत ही द्वंद्व से निर्मित है। तो आप भी दो होंगे ही। इतना तो अवश्य ही है। द्वैत से अद्वैत में पहुंचने के मार्ग की आकांक्षा में आपको उस शिवलिंग की अपने घर में उपासना करनी होगी। जिसके द्वारा आप निर्द्वद्व हो जाय। वह तभी संभव होगी जब मेक्सिमम ६ अंगुल की ही मूर्ति विधान सहित स्थापित करने परांत आप के अन्दर ध्यान योग प्राणायाम अथवा अन्यान्य विधाओं से विह्वल विकल अति आतुरता आनन्द हो, जिस समय उस अलौकिक बोध गुदगुदाहट आलिंगन सा परम आनंद मिल जाये आप अनुभूति करें, काशी की एक रेखा तक पहुंच रहा हूँ।

प्रथम पूज्य देवाधिदेव – भोले के सुपुत्र गौरी के लाल गणेश जी

हमें काशी का वर्णन करते समय प्रथम पूज्य देवाधिदेव भोले के सुपुत्र गौरी के लाल गणेश जी को नहीं भूलना होगा जिसकी प्रतिमूर्ति बड़ा गणेश में प्रतिष्ठापित है। बड़ा गणेश जी को भी हमें हर शुभ कार्य में प्रथम सादर याद करना चाहिए। यहां गणेश चतुर्थी के दिन सैलानियों की भीड़ स्वाभाविक हर्षानुभूति कराता है। गणेश जी के लिए यह भी कहना अतिशयोक्ति न होगी—

सुख समृद्धि का जब आयेगा नया दौर।
गणपति गजबदना को पूजेंगे लोग॥

यहीं; मंगल ने कहा है—

  • मांगो न और काहू से याचक बन काशी में चातुर्मास बिताय रहतु ना एकै द्वार लेत न हाय वहां सव तीरथराज देवगण चरवन लेत चबाय चहु और महिमा काशी में।
  • पंचाक्षरी मंत्र पढ़ महिमा तन की काशी त्रिलोचन लोचन कर्णघंटा घंटा बजत गिरजानन्दन शिवयाचक वनि हो काशी में।

आज हम अध्यात्म, नैतिकता, संस्कृति पश्चिम से लेते जा रहे हैं। हमें याद करना होगा स्वामी विवेकानन्द जी के मुख, मुखार परमार्थ तप, सेवा को भी, हमें याद करना होगा, स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के उपदेशों को, कबीरदास के कर्मयोग, राजर्षि विश्वामित्र के ‘तप’ को, मीरा का प्रेम, राजा मान्धाता के ‘त्याग’ और राजा हरिश्चंद्र का ‘सत्य’, लक्ष्मीबाई के शौर्य को भी हमें नहीं भूलना होगा। आज काशी में ही क्या सारी पृथ्वी बोझ से दबी जा रही है। हमें मिटाना है काशी के साथ सारी धरती के क्लेश को?

गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है—

सद्भावना पूर्ण वातावरण का हम सब जन मिल निर्माण करें। काशी के हाथीघाट, शिवाला घाट वह स्थान है जहां राजा विजयानगरम् का हाथी आता था। इस घाट की बनावट ऐसी थी कि जो लोग तैरना नहीं जानते थे वे इस घाट पर कमर भर पानी में नहा सकते थे परंतु आज यहां कीचड़ का अम्बार रहता है इसलिए नहीं कि गंगा का बालू एकत्र हो गया है। बलात गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। चूंकि अंग्रेजों के समय में कस्साई बाड़ा के जो जानवरों का खून पहले गंगा जी में नहीं आता था आज खून शाम होते ही रंग बिरंगे रंगों में कभी लाल, कभी हरा, कभी बैगनी, कभी काला एवं मटमैले कलर की धार बन कर सम्वत् २०४६ से गंगा में अनवरत आ रहा है।

यही नहीं रंगाई के कारखानों का रंग एवं हजारों लीटर केमिकल तथा लगभग सौ लीटर खून डायरेक्ट गंगा में प्रतिदिन अनवरत बहाया जाता है। प्रतिदिन लोहता भिटारी के बीच बने नाले से भी केमिकल निरर्थक वरुणा नाले से होकर अनवरत वरुणा नदी में बहाया जा रहा है। वरुणा नदी भी उसे बेहिचक गंगा को अर्पित कर देती है। आज गंगा जी के दंडी घाट से गुलेरी घाट तक मनुष्य क्या बन्दर व गाय भी पानी पीने से दूर नहा सकने में भी हिचकिचाहट कर रहे हैं। इन घाटों को भैंसा घाट कहा जाय तो भी अतिशयोक्ति न होगी।

इस प्रकार वाराणसी के छः घाट उक्त प्रदूषण से जहां प्रभावित हैं वही राजेंद्र प्रसाद घाट, मर्णिकर्णिका घाट भी प्रदूषण से क्यों अछूता रह जाय। अस्सी घाट का पूछना ही क्या है। नाला द्वारा हजारों लीटर गन्दा पानी गंगा में बहाने से नगर निगम आखिर क्यों नहीं बाज आता। इससे साफ जाहिर होता है कि केंद्र अथवा राज्य द्वारा चलाई गई सफाई निर्मलीकरण योजना सफेद हाथी का सा रूप धारण कर रखा है। मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र घाट से आज भी अधजले शव गंगा में बहाकर ही नहीं अपितु पशुओं के शव को गंगा में प्रवाह कर गंगा में हम सड़ान्ध क्यों पैदा कर रहे हैं? पुलिस प्रशासन भी मूक दर्शक आखिर क्यों बनी रहती है? ऐसे में अधिक अपराध के युग का श्रीगणेश भी इस दशक को कहने से लेखक नहीं चुकेगा। बशर्ते नाबालिग बच्चों का शव धार्मिक परम्परानुसार जल प्रवाह की अवधारणा जब तक नहीं बदलेगी। हम धार्मिक परम्परा का जिक्र कर रहे हैं तो धर्माचार्य का जो सत्य निष्ठा से आज का मानव जीव कल्यार्णाथ यज्ञ, हवन, पूजन, प्रवचन, हरिभजन, शिवअर्चन, चण्डी जाप, नाम जपन, भजन पर भी हमें जिक्र करना मुनासिब होगा। आप काशी में कम नहीं पायेंगे।

ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म तीर्थों का भी तीर्थस्थल काशी है।

ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म और सर्व प्रेम का प्रतीक यह तीर्थों का भी तीर्थ है। आध्यात्मिक, धार्मिक तथा भक्तिभाव प्रेरक धार्मिक सांस्कृतक लोक उन्नायक आयोजनों का यह तीर्थस्थल काशी है। काशी में नास्तिक विचारधारा से युक्त जो प्राणी आता है रमण भ्रमण करने, वह भी शिवमय हो रम जाता है। भोला भूदेवी, भवानी, भगवती, जगदम्बा में कारण शास्त्रों में वर्णित है।

भोला काशी परिक्षेत्र चौदह कोश में आने वाले प्राणी को रमणीय कर देते हैं। कारण स्पष्ट है। यहां प्रतिदिन गंगा में मणिकर्णिका घाट पर दो घड़ी उपरान्त दोपहर में समस्त देव गण देवलोक से स्नान करने आते ही रहते हैं। काशी में देवताओं का आना अनवरत समस्त युगों से रहा है तो क्या हिंदू/सिक्ख/इसाई अथवा मुसलमान जिनमें एक सा पंच तत्वों से बनी बुद्धि विवेक प्रभु ने दे रखी है, हम उस गंगा मां को जिसने देवलोक से हाहाकार कर हमारे पूर्वजों का तारंतार किया, कर रही है, हम पवित्र क्यों नहीं रख सकते हैं?

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — काशी जहां स्वयंभू भोलेनाथ माता पार्वती व गणपति सहित अनंत काल से विराजमान है। पतित पावनि माँ गंगा को अपनी जटाओ से धीरे-धीरे मध्यम जल धारा के रूप में मानव कल्याण के लिए छोड़ा है, लेकिन आज का मानव पतित पावनि माँ गंगा को बहुत ज्यादा प्रदूषित कर रखा है। अब भी सुधर जाओ और पतित पावनि माँ गंगा को स्वच्छ करो, इसे प्रदूषित करना बंद करो। ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म और सर्व प्रेम का प्रतीक यह तीर्थों का भी तीर्थ है। आध्यात्मिक, धार्मिक तथा भक्तिभाव प्रेरक धार्मिक सांस्कृतक लोक उन्नायक आयोजनों का यह तीर्थस्थल काशी है। काशी में नास्तिक विचारधारा से युक्त जो प्राणी आता है रमण भ्रमण करने, वह भी शिवमय हो रम जाता है। भोला भूदेवी, भवानी, भगवती, जगदम्बा में कारण शास्त्रों में वर्णित है।

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यह लेख (काशी कहां चली।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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यह क्या हो रहा है?

Kmsraj51 की कलम से…..

Yah Kya Ho Raha Hai? | यह क्या हो रहा है?

बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यह आज समाज में हो क्या रहा है? मुद्दा आज सता पक्ष और विपक्ष की तू – तू मैं – मैं का नहीं है। मुद्दा है तो वह है देश की बहू बेटियों की असमत का।

वह चाहे मां – पत्नी हो या बहु हो या फिर बेटी,
दुख यह है कि क्यों की जा रही है उसकी अनदेखी?

साथियों यह भयानक मंजर हमने मीडिया में बड़े स्तर पर निर्भया मामले के समय देखा था। पूरा देश उस आक्रोश में उबल गया था। विपक्ष ने हवा को तूल दिया और सत्ता पक्ष ने कड़े कानून बनाने और दोषी को तुरन्त कड़ी सजा दिलाने का आश्वासन दिया। हम सब जानते हैं कि निर्भया मामले में दोषियों को सजा दिलाने तक का सफर कैसा रहा और कितना लम्बा रहा? ऐसा नहीं है कि इससे पूर्व बहू बेटियों के साथ कोई बलात्कार नहीं हुए थे। पर यह मामला पहली बार मीडिया में राष्ट्रव्यापी स्तर पर इस तरह से भटका था कि पूरे देश की आत्मा ही जैसे जाग उठी थी।

पर सवाल यह है कि क्या फिर ऐसी वारदातें होना बंद हो गई? यूपी के हाथरस की घटना हम कहां भूले हैं? रात के अंधेरे में ही दाह संस्कार हमे याद है। क्या पश्चिम बंगाल में हुई हिंसात्मक घटनाएं देश को शर्मसार नहीं करती? हाल ही में राजस्थान के अलवर में नाबालिग लड़की के साथ शादी और उसके साथ उसके ससुर, नंदोई और जेठ द्वारा पति की सहमति से सामूहिक बलातकार तब तक करना, जब तक वह बेहोश नहीं हो जाती। अब मणिपुर में महिलाओं के साथ एक घिनौना कुकृत्य दिन दहाड़े समाज द्वारा पुलिस की मौजूदगी में किया जाना। इधर हिमाचल में समाज के ही सामने युवतियों के साथ छेड़छाड़ और मार पीट।

मित्रों शर्मिंदगी राजनैतिक पार्टियों की कारगुजारी और बयानबाजी पर नहीं बल्कि समाज की कुत्सित सोच पर होती है। आखिर क्यों समाज इस कदर खुदगर्ज और मूक दर्शक तथा भीरू होता जा रहा है कि हकीकत को अपनी आंखों से देख कर भी वह अपना मुंह मोड़ कर वहां से इस कदर से निकल जाता है कि जैसे उसने कुछ होते हुए ही नहीं देखा?

सवाल सत्ताधीशों से भी है कि वे भी अपनी शक्ति का दुरुपयोग आखिर क्यों करते हैं? शायद यह हमारी कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली की कमजोरी को भी दर्शाता है।कानून में कई हथकंडे और लम्बे दौर तक चलती न्यायिक प्रक्रिया तथा कई मामलों में राजनैतिक संरक्षण अपराधियों के हौसलों को बुलन्द करता रहता है कि क्या होगा। जो भी होगा देखी जाएगी। कोर्ट में निपट लेंगे।

सबसे बड़ी चिन्ता तो समाज की पढ़ी-लिखी स्त्रियों के समुदाय की होती है कि वे अपने साथ हो रहे अन्याय में स्वयं ही एक जुट नहीं है। वे खेमों में और राजनैतिक दलों में विभाजित हो कर कई बार पक्ष-विपक्ष में वाद – विवाद प्रतियोगिता करती हुई नजर आती है। मेरा निवेदन उन सभी माताओं बहनों से है कि ऐसे मुद्दों में न ही तो हमे राजनैतिक दलदल में वोटों के नफे नुकसान में पड़ना चाहिए और न ही समाज को बांटने वाली विचारधारा का समर्थन करना चाहिए। ऐसे मुद्दों पर राजनीति, जाति, धर्म, सम्प्रदाय इत्यादि समाजगत कुत्सित भावबोधों से ऊपर उठ कर राष्ट्र की मानव समाज वाली भावना से काम करना चाहिए।

  • बेटी या औरत कोई भी हो और किसी भी जाति धर्म सम्प्रदाय इत्यादि की हो, वह हमारे देश की मातृ शक्ति है। उसके शील की रक्षा करना हमारा सामूहिक दायित्व है। यह माना कि कई मुद्दों पर महिलाएं भी गलत हो सकती है। पर जो ये घटनाएं ऊपर मैने गिनाई है। ये सब महिलाओं के साथ हुए घोर अन्याय और समाज की कुत्सित मानसिकता की उदाहरण है।
  • बंधुओ और भगनियों यह बात याद रखना कि दूसरों के घरों में लगी आग को बुझाने में जो लोग मदद नहीं करते बल्कि उससे अपनी रोटियां सेंकने का काम करते हैं। उन्हे यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे घर भी यहीं नजदीक है। कहीं यह आग भड़क कर हमारे घर को भी न लील जाए।
  • आज किसी दूसरे की बहू बेटी के साथ किसी दूसरे के उन्मत बेटों ने गलत किया है और कल को यही घटना हमारी बहु – बेटियों या मां – पत्नियों के साथ भी हो सकती है और हमारे बेटे भी उन्मत हो कर ऐसी घटनाओं को मिलकर अंजाम दे सकते हैं।

इसलिए समाज को अपने दायित्व को समझना होगा। सोशल मीडिया और फिल्मी दुनियां के ऐसे अपराधिक दृश्यों का बहिष्कार करना चाहिए, जो युवा पीढ़ी को गलत करने के आइडिया देते हो।

जातिवाद, धर्मवाद और संप्रदायवाद के नाम पर समाज में नफरत फ़ैलाने वाले हर जाति – धर्म और सम्प्रदाय के व्यक्तियों को कड़े से कड़े कानून बनाकर कड़ी सजा का प्रावधान करने की मांग करनी चाहिए। फिर वह आग चाहे वोट के लिए भड़काई जाए या फिर किसी अन्य कारण से। एक व्यक्ति भड़काए या फिर कोई पूरा समुदाय।सामूहिक सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए। यह भीड़ तन्त्र तो फिर समाज की कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाता ही रहेगा, यदि इस व्यवस्था पर अंकुश न लगाया गया तो।

हमे समझना होगा कि समाज में मात्र एक ही धर्म कुदरत ने बनाया है, जो है मानव धर्म। दो ही जातियां हैं एक स्त्री और दूसरी पुरुष। उनमें किसी को कोई छूत भी नहीं लगती और न ही कोई अन्य बाधा है। दोनो जातियों को एक दूसरे की कुदरती नितान्त आवश्यकता है और उन्हें कुदरत के नियम का पालन कर के अपने – अपने जाति धर्म का ईमानदारी और सामाजिक मर्यादाओं से पालन करना चाहिए। न ही कोई लड़ाई होगी और न ही तो कोई झगड़ा दंगा – फसाद।

बाकी समाज बुद्धिजीवी है। ये अन्य जाति धर्म और सम्प्रदाय आज पढ़े – लिखे समाज में हमे मिल बैठकर अपने कई निजी स्वार्थों को छोड़ कर राष्ट्र हित में छोड़ देने चाहिए और कुदरत के सनातन नियम की जाति धर्म व्यवस्था को राष्ट्र हित के लिए स्वीकार करना चाहिए। माताओं को अपने साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हो कर सामने आना होगा और पुरुष समाज को भी इसमें महिलाओं का साथ देना चाहिए। क्योंकि नारी किसी भी समाज या राष्ट्र का सम्मान होती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — माताओं को अपने साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हो कर सामने आना होगा और पुरुष समाज को भी इसमें महिलाओं का साथ देना चाहिए। क्योंकि नारी किसी भी समाज या राष्ट्र का सम्मान होती है। हमे समझना होगा कि समाज में मात्र एक ही धर्म कुदरत ने बनाया है, जो है मानव धर्म। दो ही जातियां हैं एक स्त्री और दूसरी पुरुष। उनमें किसी को कोई छूत भी नहीं लगती और न ही कोई अन्य बाधा है। दोनो जातियों को एक दूसरे की कुदरती नितान्त आवश्यकता है और उन्हें कुदरत के नियम का पालन कर के अपने – अपने जाति धर्म का ईमानदारी और सामाजिक मर्यादाओं से पालन करना चाहिए। न ही कोई लड़ाई होगी और न ही तो कोई झगड़ा दंगा – फसाद।

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यह लेख (यह क्या हो रहा है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

Coordinating Nature Of Kashi | काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

काशी विश्व की प्राचीन नगरी है। बुद्ध की उपदेश स्थली, जैन तीर्थंकर महावीर की धर्म देशना स्थली तथा सुपार्श्वनाथ और जैन पार्श्वनाथ तीर्थंकरो की जन्मस्थली होने के साथ ही काशी रामानन्द, आदि शंकराचार्य, कबीर, रैदास, तुलसीदास विवेकानन्द जैसे महान धर्माचार्यों एवं चिंतकों की कर्म भूमि भी रही है।

विभिन्न पुराणों से विदित होता है कि काशी पहले विष्णुतीर्थ था जो बाद में शिवतीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह प्रधानतः शिव की नगरी रही है। यहाँ के 17वीं से 20वीं शताब्दी ई० के लगभग सभी मंदिर भोलेनाथ शिव को समर्पित हैं। इन मंदिरों में गर्भगृह में शिवलिंग और चारो ओर की भित्तियों पर शक्ति, विष्णु, सूर्य एवं गणेश मूर्तियाँ हैं जो समन्वयात्मक धार्मिक आस्था की साक्षात साक्षी है। इतना ही नहीं काशी में लोक धर्म से सम्बन्धित पक्ष, नाग, वृक्षपूजन की परम्परा रही है। इसे न केवल शिव वरन् काशी में जन्में सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ के मस्तकों पर दिखाये जाने वाले सर्वफलों के रूप में भी देखे जा सकते हैं।

17वीं से 19वीं शताब्दी ई0 के बीच काशी की धार्मिक एवं सांस्कृति समन्वय की भंगिकी आदि केशव से अस्सी तक फैले हुए घाटों की अनवरत श्रृंखला में देखी जा सकती है। घाटों के मंदिरों, मठों और अन्य अवशेषों में पूरे भारतवर्ष का धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप मूर्तिमान हो उठा है।

यदि कहा जाय कि काशी में सम्पूर्ण विश्व सूक्ष्म रूप से विद्यमान है तो अतिश्योक्ति नहीं। मान्यता के अनुसार देश की सभी नदिया, पवित्र स्थल और देवता काशी में निवास करते हैं। मत्स्यपुराण में काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। इसे महाश्मसान, आनन्दकानन और मोक्षदा अर्थात् मोक्ष देने वाली सप्तपुरियों में एक माना गया है। काशी का महात्म्य कुछ ज्यादा ही है तभी तो जब कभी ग्रहण लगता है तो काशी में बहुत भीड़ उमड़ पड़ती है। यद्यपि सूर्यग्रहण में सबसे बड़ा मेला कुरुक्षेत्र का होता है पर चन्द्रग्रहण में काशी में ही यात्रीगण देश के विभिन्न भागों से आने हैं। भविष्यपुराण में लिखा है :

कुरुक्षेत्रसमा गंगा यत्र कुत्रावगाहिता।
कुरुक्षेत्राहशगुणा यत्र विन्धेन संगता॥

काशी प्रधान तीर्थं स्थान है। यह शुद्ध रूप से तपोभूमि है। देवदर्शनल, मंदिरों की रचना और यहाँ के घाटों की छटा ही मुख्य दर्शनीय हैं। यहाँ गंगास्नान की महिमा अवर्णनीय मानी गई है। सर्वत्र गंगा स्नान पूण्यजनक है। वाराणसी (काशी) में गंगा स्नान बारहो मास नेमी लोग करते हैं। काशी की उत्तरवाहिनी गंगा की महिमा काशी यात्रा में सप्तभाग उल्लिखित है। पंचगंगा और परिसर के घाटों, मर्णिकर्णिका घाट एवं दशाश्वमेघ घाट पर प्रातः 3 बजे से ही स्नानार्थी आने लगते हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी में मरने का कोई डर नहीं होता क्योंकि यहाँ तो सभी मृत्यु को अपने पाहुन (अतिथि) की तरह जोहते ही रहते हैं।

यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है।

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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यह लेख (काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Satya Sanjivani Kashi of Truths | सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

काशी, गंगा और महादेव संपूर्ण भू भाग पर यदि कहीं अवस्थित हैं तो वह मात्र काशी पुण्य परिक्षेत्र में ही, अन्यत्र अविज्ञात है। काशीपुरी में धर्म-अधर्म अक्षुण्ण होता है। यह आनंदकानन अविमुक्त महाक्षेत्र है। काशी का माहात्म्य वैदिक एवं स्मार्त है। अतएव काशी में —

अब पुनि पुनि कलम उठायेंगे।
काशी ! रहि रहि गुन गायेंगे॥
लाख लताड़त शिव आयेंगे।
काशी करवटऽ सुनायेंगे॥

  • हिमालय पुत्री मां गंगा काशी में उत्तराभिमुख अविरल बहती है, जिसे ‘मुदिता’ कहा गया है। गंगा पितृ मुख होने से मुदित रहती है और शिव (पति) का सान्निध्य पाकर आह्लादित होती है शायद यही कारण है कि शिव ब्रह्म को काशी बड़ी प्रिय लगती है। शास्त्रों में वर्णन है कि नारायण की आराधना से प्रसन्न होकर परम शिव द्रवीभूत हो गये। वह ब्रह्माद्रव्य युक्तिकाशी भू पर स्थित होकर भी भू से पृथक है। जहाँ शंकरपूजन और शिव के मधुर गान से शिव ब्रह्म प्रसन्न होकर इच्छित वर प्रदान करते हैं, वहीं शैलपुत्री देवी सौभाग्य सुख प्रदान करती हैं।
  • काशी में भक्तों की मनोरथदात्री भवानी ही स्थिर वास करने देती है और भवानी ही काशीवासियों का सदा योगक्षेम करती हैं। भिक्षुक को काशी में मोक्षा काशी भिक्षा प्रदान करने वाली विश्वेश्वर की कुटुम्बिनी काशीवासियों को मोक्ष की भिक्षा प्रदान करती हैं, ओंकार का उच्चारण कराती है। ऊं शांतिः शान्तिः शान्तिः हृदयस्थ कराती है। अतएव इनकी सेवा करनी चाहिए, सेवा से प्रभु मुदित होते हैं। काशीवासियों को यदि कभी कुछ भी दुर्लभ हो तो पूजा पाठ करने से ही भवानी उसे सुलभ करा देती हैं। मानव को चैत्र की अष्टमी में रात्रिजागरण, गंगा स्नान और भव पूजन वांछित फल प्रदान करता है।

काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

जल, जीवन का प्रमुख रसायन तत्व है। काशी में गंगाजल का स्पर्श होते ही महापातुकावली का तुरंत क्षय हो जाता है। यही नहीं यहां वास करने वाले को पद-पद पर, धर्म की ढेर, मिलती है जिसे करोड़ों यत्न करने से भी वैसी धनराशि एकत्र नहीं की जा सकती, सो काशी की गलियों में घूमने (भ्रमण) से पद पर आपसे आप प्राप्त हो जाती है। धर्मपरायण मनुष्य! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पाने की अभिलाषा जनित त्रैलोक्य पावनी अविमुक्त क्षेत्र काशीपुरी की पदयात्रा करें। भारतीय धार्मिक संप्रदाय चाहे वैदिक हो या स्मार्त उन सबों का आदर विद्वानों महापुरुषों ने किया है।

वृहस्पति देव ने “काशी को मुक्तिपुरी कहा है। इन्द्र से तो यहां तक कह दिया कि काशी सदृश तुम्हारी देवपुरी भी नहीं है। वहीं जाकर मुक्ति हेतु तुम भी विश्वाराध्य विश्वेश्वर की आराधना करो। ऐसे में भला मुक्तिपुरी का दर्शन-वर्णन मेरे जैसे अल्पज्ञ क्यों नहीं करेगा।” यथा—

गंगा में खूब नहायेंगे,
भव भावन गीत सुनायेंगे।
भर भाँग धतूरा खायेंगे,
मेवा संग मिश्री मिलायेंगे।

और आगे का दृश्य-

भाँग धतूरा पीवत साथी,
पथिक पहलुआ पंडित पापी।
अबे तबे अरु चोखा – बाटी,
डंड बैठकी खुला सपाटी।

सौम्य तप जप को समय सीमा में न बांधकर बुद्धिमानजन काशी स्त्रोत की महिमा का वर्णन करता है। गाता-गुनगुनाता है। उसे हृदयस्थ करता है। स्तोता ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ‘काशी’ मंत्र के जप – तप की युक्ति करता है। जप – तप की सामर्थ्य जिस महापुरुष में है, वह मुनि रूप पृथ्वी पर क्रोधी भी हो सकता है अन्यथा असमर्थ पुरुष, प्राणी क्षीणवृत्ति की तरह क्या कर सकता है। जो उद्गीथ है यानी गाने योग्य है वही प्रणव या ऊँकार है। ॐ की उपासना से ही देवता अमृत प्राप्त किये और मृत्यु को जीतकर अमरत्व पाए।

इतना याद रखें — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है।

काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है।

ज्ञान का महान प्रताप कोई विरल ही जानता है। जब आत्मा स्व स्वरूप में स्थित होती है तब उच्चारण करने वाला अन्य कोई नहीं होता अर्थात् वक्ता श्रोता का द्वैत मिट जाता है। मनुष्य में ईश्वरीय प्रेरणा से अचानक ब्रह्म चैतन्य का स्फुरण होता है और वह जिज्ञासु की नई स्थिति में आ जाता है। परंतु संसारी जीव में जिज्ञासा का उदय भी परमात्मा की कृपा से होता है। जब तक मनुष्य में माया से विरक्ति, ईश्वर से अनुरक्ति और सद्गुरु की कृपा नहीं होती, जीव में जिज्ञासा का उदय नहीं होता, गूढ़तत्व चैतन्य शक्ति का उदय नहीं होता। परम सत्य की उपलब्धि के बिना अज्ञान का नशा बार – बार मनुष्य पर छा जाता है।

जो मनुष्य इंद्रियों से विषय वासनाओं का त्याग करके तिमिराच्छन्न रजनी में जागृत अवस्था को प्राप्त कर लेता है काशी में भगवान भोले उसे तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं। तारकेश्वर मंदिर कोलकाता में है। काशी में विश्वनाथ मंदिर के पास स्थापित है। काशी में वर्तमान तारकेश्वर महादेव का जीर्णोद्धार हो रहा है। जिस प्रकार योग में प्रवेश पाने के लिए सद्गुरु कृपा प्रसाद ही सहायक होता है, कर्म से क्षत्रिय विप्र हो जाता है और गीता का सार त्याग है, ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है, उसी प्रकार काशी-काशी जपते-जपते रहने से प्रत्यक्ष मोक्ष है। काशी में मुक्तिमण्डप में मात्र बैठकर भव स्मरण यथा शक्ति धनदान एवं पवित्र कथाओं का श्रवण करने से करोड़ों गोदान का पुण्य प्राप्त होता है।

यहाँ मुनियों ने असंख्य शिवलिंग अनादिकाल से स्थापित किये हैं। जहां पर एक भी शिवलिंग की स्थापना करने से अखिल ब्रह्मांड की प्रतिष्ठा करने का फल प्राप्त होता है, भला उस पुण्य क्षेत्र काशी को कौन मानव जीव छोड़ सकता है। जबकि शास्त्र में कहा गया है काशी की प्राप्ति में पग-पग पर विघ्न आ पड़ते हैं। काशी में वास उन्हीं को मिलता है जो कठोर तपस्या बड़े से बड़े व्रत एवं महादानों के करने वाले होते हैं। काशी गुरु श्रेष्ठ है।

धर्मेश्वर ने मंदराचल पर जगदम्बा से कहा था — काशी की निर्वाण की भूमि है। लोमेश और व्यास जी का भी यही मत रहा। याज्ञवल्क्य मुनिराज ने तो कहा कि — काशी में मरण से परम पद प्राप्त होता है। त्रयमयी काशी समस्त विधाओं की आश्रयस्थली है, महालक्ष्मी की परालय एवं मुक्ति क्षेत्र है। ब्रह्माजी ने कहा — काशी में मरने वालों को मुक्ति मिलती है, यही कारण है कि यहाँ विविध धर्मशाला परिसर मुक्ति क्षेत्र में ठहरने हेतु आज कलिकाल में भी उपलब्ध है काशी ? काशन प्रकाशन करने वाली आत्मज्ञानवती बुद्धि का नाम काशी है।

आठवीं सदी में शंकराचार्य जी को भी बनारस (काशी) आकर अपने मत की विद्वानों द्वारा पुष्टि करानी पड़ी और संभवतः ब्रह्मसूत्र की रचना बनारस में गंगातट पर ही की थी। भागवत में – नदियों में गंगाजी, देवताओं में विष्णु भगवान, वैष्णवों में शंकरजी सर्वश्रेष्ठ है, पुराणों में- श्रीमद्भागवत, ऋषियों में शौनकादि उसी प्रकार श्रेष्ठ हैं जैसे- तीर्थों में काशी सर्वश्रेष्ठ है। इस लोक में बुद्धिमान सज्जनों की ही वह बुद्धि सब कुछ निश्चय करती है जिस नगरी में पुण्यजला स्वयं स्वर्गतरंगिणी गंगा बह रही हैं। वे ही चरण इस भू लोक पर विचरण करना जानते हैं यानी धन्य हैं जिन पुण्य प्राणियों के चरण विश्वनाथ जी के नगर ‘काशी’ में भूमि पर विचरण करते हैं। यद्यपि माघ – मास में सभी तीर्थ, तीर्थराज प्रयाग चले जाते हैं परन्तु अविमुक्त क्षेत्र के तीर्थ काशी में ही रहते हैं। लेखक की कलम से —

कैसा चरित रच्यों मेरो भाई।
बूझत अनबुझ मन जन खिसियाई॥
हलाहल गंगाजल अमरित साँईं।
अगणित कला को मंगल री गाई॥

पुण्य क्षेत्र में संन्यास लेकर रहने, भ्रमण करने वालों की जीवमुक्त और रुद्र स्वरूप मानना चाहिए। इस पुण्य अक्षुण्ण क्षेत्र में यदि प्राण संकट में पड़ा हो तो भी असत्य (मिथ्या) भाषण नहीं करना चाहिए। हां, किसी जीव के प्राण रक्षार्थ झूठ मजबूरी में बोला जा सकता है। काशी शिव को अति प्रिय है। शिव जी के मुख से- मैं ममता रहित हूँ। योगिनियाँ ब्रह्मा और रुद्रगण इसी कारण यहां बसे, काशी के ही हो गये। वे सब वाराणसी के प्रति शिव का प्रेम जानते थे।

जहां जय द्वारा ज्ञानी बटुक ब्रह्मवाद का निनाद करते हों, गुरुचरण विश्वनाथ साक्षात् विराजमान वर्तमानरूप से हों, महर्षि व्यास सदृश पुण्यात्मा वास करते हों, वैद्यराज, दान, ध्यान, तप, ज्ञान कलिकाल में भी हों साथ ही सर्वधर्म की मर्यादा मर्यादित पूर्वक अधिधार्मिक लोगों द्वारा पालन किया जा रहा हो उस मुक्तिदायिनी धर्मपरायण, विराटरूपा काशी को सत् सत् नमन, धरती पर कौन नहीं करेगा।

मुक्ति जन्म महि जानि, ज्ञान खानि, अध हानिकरि।
जहँ बसिं शंभु भवानि, सो काशी, सेइय कस न॥

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है। काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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यह लेख (सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सनातन, मीडिया और धीरेंद्र शास्त्री पर बवाल।

Kmsraj51 की कलम से…..

Ruckus on Sanatan media and Dhirendra Shastri | सनातन, मीडिया और धीरेंद्र शास्त्री पर बवाल।

यह कितनी विडम्बना है कि आज हर क्षेत्र में घपलाबाजी हो रही है। हद हो गई। नेता और अधिकारी मिलकर देश लूट रहे हैं। छोटे सरकारी कर्मचारी काम न कर के मात्र बैठ कर तनख्वाह ले कर देश लूट रहे हैं। या फिर घूंस ले कर लूट रहे हैं। देश के न्यायालयों में न्याय बिक रहा है। पत्रकार पैसों की लालच में सच को झूठ और झूठ को सच कहने पर तुले हैं। बड़ी विडम्बना है कि एक मात्र धर्म परेशान लोगों का सहारा बन कर रह गया था। वहां भी अब ढोंग पाखंड और नाटक होना शुरू हो चुका है। यही धर्म नेता यदि चमत्कार करता है तो सन्देह के घेरे में और यदि वह कुछ नहीं करता तो फिर वह निक्कमा है।

जनता को यदि सभी मामलों में परेशान कोई करता है तो वह है देश का जागरूक पत्रकार और प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया। बेचारी जनता जाए तो जाए पर कहां जाए।

  • दिक्कत हमे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्मों और इन धर्मों के लोगों से नहीं है। यदि इन धर्मों के लोग सच में अपने धर्म को ईमानदारी से मानते हैं और उसका दिल से पालन करते हैं तो वे किसी दूसरे धर्म को भी परेशान नहीं करते हैं।
  • पर यह जो धर्म के नाम पर धर्म परिवर्तन, लव जेहाद या अन्य कई प्रकार की घटनाएं घट रही है। बहु – बेटियों को अर्धनग्न फिल्मे दिखा कर अंग प्रदर्शन की सीख दी जा रही है। बच्चों को, युवा पीढ़ी को नशे की लत लगाई जा रही है। क्या ये सारी बातें ठीक है?
  • यूं हम कहने को तो सब खुद को सनातनी कहते हैं पर हम अपनी सनातनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति कितने समर्पित है? क्या कदम उठाते हैं उनके संरक्षण के लिए हम?
  • कुछ नहीं न। बस अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं हम। ये जो लीव इन रिलेशनशिप की बीमारी हमारे देश में आ रही है, क्या यह सनातन धर्म के अनुसार सही है?
  • क्या समलैंगिक विवाह ठीक है? पशु बनाने पर तुले है मानव को आज। क्यों और किस लिए और कौन?

यह चर्चा भी की किसी पत्रकार ने ईमानदारी से? बस लोक आस्थाओं और विश्वासों पर विज्ञान का सहारा लेकर तर्क देना ही मीडिया का काम रह गया है। हम आज समाज को मानव समाज नहीं बल्कि पढ़ा लिखा आदि मानव समाज बनाने पर तुले हैं।

फर्क ये हैं कि आदिमानव कच्चा मांस खाता था और हम पक्का। वे पेड़ – पौधे की छाल से निज गुप्तांगों को ढकते थे और हम बिकनी और ब्रा से ढक रहे हैं। वे अपने लिए जंगलों में पूर्ण स्वतंत्र हो कर मनमाफिक तरीके से अपनी – अपनी शक्ति के बल पर जीते थे और हम आज मानव समाज में कुछ इन्ही गुणों के सहारे जीना चाह रहे हैं। रोक – टोक, नियम – धर्म कुछ चाहते ही नहीं है बस। पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं।

  • क्या ऐसे मुद्दों पर और शालीनता, सदाचार, मानवता तथा सभ्य व्यवहार पर भी किसी पत्रकार ने बनाया कभी वीडियो? नहीं न? फिर काहे कि सच्ची पत्रकारिता?
  • सब अपने – अपने नम्बर बनाने वाली बात है। राजनैतिक पार्टियां तो वोट के लिए नौटंकी करती ही थी पर अब देश के नामी गिरामी पत्रकार भी यूं ही खेमों में बांट कर रह गए हैं।
  • एक खेमा भाजपा का गुण गाता है तो दूसरा भाजपा विरोधी दलों का। मैं यह नहीं कहूंगा कि मीडिया के संचालक या पत्रकार इनके हाथों बिक गए हैं। बल्कि मैं यह कहूंगा कि यह बदलते दौर की विडम्बना है जो हर इन्सान खुद को और अपनी बात को ही ठीक समझने लगे हैं।

समाज के पुराने नीति – नियमों को कोरा पाखण्ड और कोरी कल्पना सिद्ध करने पर उतारू है। मैं धीरेंद्र शास्त्री का न पक्षधर हूं और न ही किसी और धर्म नेता के पक्ष में और खिलाफ में हूं।

  • आज हिन्दी की क्या दुर्दशा है आजाद भारत में? क्या हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा नहीं होनी चाहिए? कौन पत्रकार इस मुद्दे को उठाता है? कौन इस बात पर वीडियो बनाता है?
  • समाचार की भारत में अधिकतर भाषा हिन्दी। नेताओं की वोट मांगने की भारत में सर्वाधिक नहीं बल्कि 100 प्रतिशत भाषा हिन्दी या उसकी उप भाषाएं (जब चुनाव जीत लिए तो फिर तो लग गए अंग्रेजी बोलने)।
  • फिल्मों की अधिकतर भाषा हिन्दी या हिन्दी की उप भाषाएं। फिर हिन्दी हिंदुस्तान की राष्ट्र भाषा क्यों नहीं?
  • क्यों अंग्रेजी को सर्वाधिक महत्व हर कार्यालय, न्यायालय या सरकारी संप्रेषण और उच्च शिक्षा भाषा माध्यम में दिया जा रहा है? क्यों हम अंग्रेजी को भारत की अघोषित राष्ट्र भाषा बनाने पर तुले हैं?
  • हमारी मत मारी गई है शायद। अंग्रेज भारत से कब के चले गए हैं पर हम आज भी बोलचाल, खान पान और रहन सहन की दृष्टि से उनकी गुलामी मानसिक रूप से कर रहे हैं।
  • मानना पड़ेगा कि मैकाले की बुद्धि सच में ही चालाक और तेज थी। यूं तो सभी राजनैतिक दल कहते हैं कि हमने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। पर किस लिए?
  • उन्ही के पदचिन्हों पर तो तुम सभी दल दशकों से राज कर रहे हैं। कौन सा परिवर्तन लाया है तुमने? वही जाति धर्म के नाम पर फूट डालो और शासन करो की भ्रष्ट राजनीति।
  • असली पत्रकार वही है जो अपने राष्ट्र, संस्कृति और सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए समाज को और युवा पीढ़ी को सचेत करेगा।

जनता के सामने सरकारों, अधिकारियों, व्यापारियों, भ्रष्टाचारियों और धर्म नेताओं तथा संस्कृति और सभ्यता के साथ छेड़खानी करने वालों का सच लाने का काम करने वाला पत्रकार सही मायने में सच्चा पत्रकार है। खैर छोड़िए। शायद मैं गलत हूं। क्योंकि मैंने कहा कि आज सभी को यह लगता है कि मैं जो कह रहा हूं या जो सोच रहा हूं, वही ठीक है। यह सिद्धांत मुझ पर भी तो लागू होता है।

पर यह सार्भौमिक सत्य है कि किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति की सुरक्षा करना उस राष्ट्र के शासकों – प्रशासकों से कहीं ज्यादा उस राष्ट्र के बुद्धिजीवियों का काम होता है। क्योंकि बड़े यानी बुद्धिजीवी और जन आदर्श लोग जो व्यवहार करते हैं राष्ट्र के सामान्य जन उसी का आचरण करते हैं। इस बात की पुष्टि श्री कृष्ण जी भी गीता में कर चुके है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हम आज समाज को मानव समाज नहीं बल्कि पढ़ा लिखा आदि मानव समाज बनाने पर तुले हैं। फर्क ये हैं कि आदिमानव कच्चा मांस खाता था और हम पक्का। वे पेड़ – पौधे की छाल से निज गुप्तांगों को ढकते थे और हम बिकनी और ब्रा से ढक रहे हैं। वे अपने लिए जंगलों में पूर्ण स्वतंत्र हो कर मनमाफिक तरीके से अपनी – अपनी शक्ति के बल पर जीते थे और हम आज मानव समाज में कुछ इन्ही गुणों के सहारे जीना चाह रहे हैं। रोक – टोक, नियम – धर्म कुछ चाहते ही नहीं है बस। पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं।

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यह लेख (सनातन, मीडिया और धीरेंद्र शास्त्री पर बवाल।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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योग पर दोहे।

Kmsraj51 की कलम से…..

Yog Par Dohe | योग पर दोहे।

भोर सवेरे कीजिए, शुद्ध वायु में योग।
मन प्रांगण भी शांत हो, लगें न तन को रोग॥1॥

सीखें आसन हम सभी, जो तन के अनुकूल।
नियमित योगाभ्यास से, मिटें रोग के शूल॥2॥

आसन मुद्रा भिन्न सब, भिन्न सभी का हेतु।
योग साधना से मिटें, व्याधि के राहु केतु॥3॥

प्राण वायु में नित्य ही, हो ऊर्जा संचार।
भक्ति काल में जो करें, योगासन से प्यार॥4॥

श्वास – श्वास पावन बने, मानस हो अभिराम।
सूर्य नमन नित तुम करो, कर लो प्राणायाम॥5॥

अष्ट चक्र को खोल कर, अन्तर्मन पहचान।
योगासन से भी मिले, हमें ध्यान का ज्ञान॥6॥

सकल विश्व को है दिया, भारत ने वरदान।
योग दिवस के रूप में, बढ़ा योग का मान॥7॥

योग धरोहर देश की, ऋषियों की सौगात।
रखे निरोग शरीर यह, दे रोगों को घात॥8॥

♦ वेदस्मृति ‘कृती‘ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती‘ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस आलेख में समझाने की कोशिश की है — भारत विश्व का सबसे अधिक समृद्धशाली, श्रेष्ठ परंपराओं, नैतिक मूल्यों और वसुधैवकुटुंबकम की परिकल्पना पर आधारित नीतियों का देश रहा है। र रोज़ सुबह के समय योग करने के फायदे अनमोल है – यह हमारी पहली सांस को पुन: चक्रित करता है। योग का अभ्यास करने से शरीर किक-स्टार्ट होता है। ह्रदय रोग से बचाव करता है योग। दिमाग सदैव ही रहता है एक्टिव। बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता। योग के द्वारा सांसों को साध कर परमानन्द की अनुभूति किया जा सकता है। तन और मन को निरोग रखने के लिए प्रतिदिन योग करे।

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यह दोहे (योग पर दोहे।) ” वेदस्मृति ‘कृती‘ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख/आलेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई• आई• टी• शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कैसे संभव है देश का विकास?

Kmsraj51 की कलम से…..

Kaise Sambhav Hai Desh Ka Vikas | कैसे संभव है देश का विकास?

⇒ चिन्तित और उद्विग्न मानस ने…

सामाजिक विषमताओं और विकृतियों को लेकर चिन्तित और उद्विग्न मानस ने जब मुझे रात्रि के तीसरे पहर कचोटा तो मुझसे रहा नहीं गया। एकाएक आंखें खुली और मैं जाग उठा। बुद्धि के दर्पण में मानस की विकल शक्ल को झांका तो एक अजीब सी छटपटाहट और बेचैनी सी देखी। अंतःकरण में अनायास ही कई सारे प्रश्न एक साथ आसमानी बिजली की तरह कौंधे, जिन्हे व्यवस्थित करना मेरे लिए किसी जंग जीतने से कम नहीं था। फिर भी बिस्तर पर लेटे – लेटे हर एक उमड़ते हुए विचार से मानसिक युद्ध करता रहा और जैसा भी हुआ वैसा व्यवस्थापन अपने विचारों का करता रहा। अब इस मानसिक युद्ध में कौन जीता? मैं या मेरे अन्दर उमड़ी बदलते समाज की मान्यताएं? मेरे लिए कहना बहुत ही मुश्किल है पर जैसा भी हुआ, वह तुरन्त एक लेख लिख कर अपने आंतरिक द्वंद्व से मुक्ति पाने के लिए प्रयास करना ही मेरे पास एकमात्र उपाय था।

⇒ शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए … ‘या’ … आज की शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन…

प्रश्न समाज के बदलते विचारों और नवीन भावबोधों को लेकर खड़े हुए थे और खत्म एक लेख का रूप ले कर हुए। अचानक रात्रि के तृतीय पहर में निद्रा में विचार कौंधा कि आज समाज क्यों इतना खुदगर्ज और असंस्कृत होता जा रहा है? एक शिक्षक हूं तो जाहिर सी बात है कि पहले पहल तो सोच शिक्षा और शिक्षक के इर्द गिर्द ही इस मामले को ले कर दौड़ेगी। इसी दिशा में पहला विचार आया कि हमारे यहां तो शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए दी जाती थी और आज शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन बनती जा रही है। कहीं यह तो सामाजिक मान्यताओं के विकृतिकरण का कारण नहीं है?

⇒ आज स्कूलों – कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में…

आज स्कूलों कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में आ गए हैं, जो पुस्तकों को पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। जो थोड़े बहुत पढ़ते भी हैं, वे भी मात्र परीक्षा पास करने के लिए और अच्छे अंक लेने के लिए या फिर सरकारी नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं।

बाकी पुस्तकों को विद्या अध्ययन के लिए पढ़ने का चलन आज पूर्ण रूप से खत्म ही हो गया है। खैर विद्यार्थियों की छोड़िए। वे तो नादान होते हैं। उन्हें तो अभी शिक्षा, विद्या, अविद्या, पारा विद्या, महा विद्या और साक्षरता आदि शब्दों का शब्दार्थ भी ठीक से ज्ञात नहीं है शायद। पर बड़े – बड़े स्कूलों और कॉलेजों में तैनात अध्यापकों और प्रवक्ताओं तथा प्राध्यापकों का भी इस सन्दर्भ में मिजाज कुछ अच्छा नहीं है। इनमें से अधिकांश कभी कृपटो करेंसी तो कभी ऑन लाइन आई पी एल मैच में अपनी टीम लगा कर पैसों के पीछे स्कूलों – कालेजों के कर्तव्य काल में भी भागे हैं तो बाकी शेष बचे सुबह – शाम के समय में अपनी मस्ती में आमादा है।

अब बताइए कि वह भी पुस्तकालयों की बड़ी – बड़ी अलमारियों में पड़ी और धूल फांक रही अच्छे से अच्छी पुस्तकों को कब पढ़ेगा? जिनमें सामाजिक व्यवस्थापन के अनेकानेक मानवीय पहलू लिखे पड़े हैं। उनमें लिखा पड़ा है मानवीय मूल्यों का विवरण, जो मानव को पशु पक्षी – जगत से अलग प्राणी बने रहने की सीख देता है। उनमें लिखा पड़ा है हर विषय का बारीक से बारीक ज्ञान, जो हर अध्यापक को उसके अध्यापन के लिए और मजबूत और तर्कसंगत करता है। पर नहीं, आज के अध्यापकों और छात्रों ने कसम खा रखी है कि पुस्तकालय का दरवाजा तक नहीं देखेंगे। उन्होंने बुद्धि के विलास के लिए गूगल को गुरु जरूर बनाया है पर बुद्धि के विकास के सारे दरवाजे बन्द करने पर तुले हैं। हम सब जानते हैं कि इंटरनेट में आजकल क्या – क्या चलता है और उसके परिणाम क्या हो रहे हैं? बच्चे भी सच्चे हैं।

⇒ गुड में जहर से कम नहीं …

जब गुरु जी हर बात गूगल से देखते हैं तो बच्चे क्यों न देखें? बच्चे तो अध्यापकों को ही अपना आदर्श मानते हैं। और तो और परीक्षा तथा परिणाम के समय में देखे तो ये गुरु चेले अब्बल करते हुए पाए जाते हैं। सौ में से नब्बे किसी के छियानवे फ़ीसदी अंक आते हैं। पूछे तो ज्ञान धेला भी नहीं। गुरु जी को रिजल्ट देना होता है। वह ऑप्शनल प्रश्न गूगल से देख कर परीक्षा में बच्चों को करवा देता है और बच्चे बिन पढ़े ही गुरु जी की कृपा से अच्छे अंकों से पास हो जाते हैं। वे भी गुरु जी के कायल हो जाते हैं। वाह! क्या अच्छे गुरु जी या मैडम जी है हमारे?

बेचारे नादान ये नहीं समझते हैं कि यह सब गुड में जहर से कम नहीं है। गुरु जी काम चोरी के चलते या रिजल्ट देने के चलते और छात्र अच्छे अंक प्राप्त करने के चलते साल के अन्त में इन्ही हथकंडों को अपनाते हैं। अपनाए भी कैसे न? जब साल भर दोनों ने मस्ती ही मारी है और बौद्धिक विलास ही किया है तो फिर समाज में दोनों को अच्छा भी तो अपने को दिखाना है।

अच्छे अंक जब आते हैं तो मां – बाप भी बच्चे से खुश हो जाते हैं तथा गुरु जी के भी कायल हो जाते हैं। वाह! क्या कमाल का पढ़ाते हैं गुरु जी? मेरे बच्चे ने सौ में से छियानवे फ़ीसदी अंक प्राप्त किए हैं। बच्चे की प्रशंसा करते – करते भी नहीं थकते। हमारा बेटा – बेटी भी तो पढ़ाई में तेज है जी। आधी – आधी रात तक नेट में तैयारी कर रहा होता है। अब वह क्या दिखता है ? इसका किसी को कोई खबर नहीं। बस इसी बिगाड़ के चलते बच्चों को और प्रोत्साहन मिलता है। वह अपनी एक दो जिद्दें मां – बाप से और पूरी करवाता है।

फिर एक दिन जब वह बच्चा स्कूल – कालेजों से बाहर आता है तो वह संस्कार हीन और दिशाहीन हो कर समाज में आता है। यदि कहीं जुगाड़बाजी से वह सरकारी सेवा में फिट हो भी जाता है तो समझ लो कि वह किस स्तर की सरकारी सेवा देगा? अब जब प्राप्तांको के आधार पर ही सरकारी नौकरियां दी जाएगी तो नौकरी तो मिल ही जाएगी। फिर बोलो कि भ्रष्टाचार की जड़ कहां है? मैं इन्टरनेट का विरोधी नहीं हूं। विरोधी हूं उसके गलत इस्तेमाल का। यदि सच में शिक्षा के लिए अध्यापकों और बच्चों द्वारा उसका प्रयोग किया जाए तो वह शिक्षा की दशा और दिशा ही बदल देगा।

इधर सरकारें और सरकारों के नीतिकार हैं कि बच्चों को प्रताड़ित करने के अधिकार से अध्यापकों को वंचित करने पर तुले हैं। इससे जो थोड़े बहुत अध्यापक संस्कार और व्यवहार की शिक्षा के पक्षधर है भी, उनके हाथ – पांव भी बंधे पड़े हैं। वे भी देखा देखी में खुद को कुढ़ा हुआ महसूस करते हैं और व्यवस्था का हिस्सा बना लेते हैं। बस अब तो अध्यापक ने अपना मक़सद स्कूल जाना, हाजरी लगाना तथा अपने विषय का पीरियड लगाना ही तय किया है। खाली पीरियड में वह भी नेट में या तो गेम खेलता हुआ मिलेगा या फिर कुछ और देखता हुआ मस्त रहता है।

⇒ पुस्तकालयों का सदुपयोग नहीं हो रहा है…

पुस्तकालयों की स्थापना स्कूलों में यूं ही जाया जा रही है। न अध्यापक पढ़ता है और न छात्र। विषय विशेषज्ञ होने के बावजूद भी कई ऐसे मद होते हैं, जो पुस्तकों को पढ़ने और सामूहिक चर्चा – परिचर्चा से और स्पष्ट होते हैं। पर आज ऐसी बात करना ही मूर्खता की निशानी हो गई है। किताबे यदि पढ़ी जाती है तो मात्र नौकरी लगने के लिए।बस एक बार नौकरी मिल गई तो फिर तो हर व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। नौकरी सरकारी हो या निजी। हर व्यक्ति आज वेतन तो पूरा चाहता है पर काम करना ही नहीं चाहता है। इस नकारात्मकता का कारण आखिर क्या है?

तभी तो कहता हूं कि — “शिक्षा योग का विषय है भोग का नहीं।”
“शिक्षा बौद्धिक विकास का विषय है बौद्धिक विलास का नहीं।”
“शिक्षा आत्मरंजन का साधन है मनोरंजन का नहीं।”
“शिक्षा नैतिकता और चरित्र निर्माण का साधन है विकृतता का नहीं।”
“शिक्षा अनुशासन का विषय है शासन – प्रशासन का नहीं।”
यह बात समूचे विश्व को समझनी चाहिए।

मेरा मानना है कि स्कूल वह निर्माण संस्थान है, जहां भविष्य के समाज के निर्माण के लिए शिक्षार्थी रूपी सामग्री तैयार की जाती है। यदि उस सामग्री के निर्माण में ही गड़बड़ हो जाएगी, तो समाज रूपी इमारत की मजबूती का भी प्रश्न ही पैदा नहीं होता है। यानी सामग्री निर्माता गुरु का नैतिक और चारित्रिक रूप से उन्नत होना और अत्यधिक भौतिकता से दूर रहना जरूरी है।

⇒ शिक्षा व्यवस्था में संस्कार जरूरी है…

“शिक्षा व्यवस्था में संस्कार शिक्षा का जोड़ना जरूरी है। शिक्षकों को छात्रों को रोकने – टोकने के अधिकार देना जरूरी है। अभिभावकों को अंकों के आंकड़ों से बाहर ला कर विद्या और शिक्षा के साथ – साथ राष्ट्रीयता और सामाजिकता का बोध कराना जरूरी है।” “वरना भविष्य का समाज पशु समाज से भी भयानक होगा।” रिश्तों की अहमियत नहीं होगी। पिता – पुत्र में, मां – बेटी में, भाई – बहन में, पति -पत्नी में और पड़ोसी – पड़ोसी में आत्मीयता नहीं रहेगी। सभी अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए और अपनी भौतिक चाह को पूरा करने के लिए कभी भी कुछ भी करने को आमादा रहेगें। कोई मरने मारने से नहीं डरेगा।

इसलिए देश की शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने की आवश्यकता वर्तमान में बहुत ज्यादा हो गई है। इसके चलते सरकारों को भी स्कूलों कालेजों में राजनीति से नहीं बल्कि समाज नीति से मनोयोग पूर्ण तरीके से काम करना चाहिए। शिक्षा के स्तर को शिक्षक ही उन्नत करेगा। बस सरकारों को यह तय करना है कि शिक्षकों को बिना डराए धमकाए एक उचित व्यवस्था दे कर सामाजिक और राजनीतिक मान – सम्मान दे कर कैसे शिक्षा का उत्थान करने के लिए स्वतन्त्र दायित्व देना है?

प्रश्न यह भी है कि यह दायित्व नकारात्मक, आलसी और लोलुप लोगों के हाथों में भी नहीं जाना चाहिए। “अर्थात — शिक्षा धनार्जन का विषय न बने बल्कि ज्ञानार्जन और संस्कृति तथा सभ्यता की सम्बाहक बनकर सामने आए।” जिस व्यवस्था में रोजगार प्राप्ति की राह के साथ – साथ व्यक्ति विद्या तथा परा ज्ञान की प्राप्ति भी करे। ताकि कल जब वह विद्यार्थी समाज में जाएगा तो एक नेक और संस्कारवान व्यक्ति की भूमिका में जाए।

खैर मैं जानता हूं इस बात को कोई नहीं मानेगा। सभी यही कहेंगे कि हम अपना शत प्रतिशत देते हैं। जो शिक्षा व्यवस्था बनी है वह बिलकुल ठीक है। मुझे ही फटकारेंगे। पर अंदर से सभी यह जानते हैं कि असलियत क्या है? सरकारी नौकरी का वर्तमान में यह हाल हो गया है कि एक बार मिलनी चाहिए बस। फिर तो वह व्यक्ति काम करने को राजी नहीं है। निजी क्षेत्रों में भी डर के चलते काम करते हैं वरना हाल वहां भी कुछ खास अच्छे नहीं है। नैतिकता से काम करने को कोई राजी नहीं है।

होना तो यह चाहिए कि नैतिकता के चलते व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करे, जिसकी उसे तनख्वाह मिलती है। तभी वह शिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य है। पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। आजकल सभ्यता और संस्कृति तथा शिक्षा की पहचान सुख-सुविधाएं, रसूख और पैसा हो गया है। शालीनता, विनम्रता, तथा नैतिकता नहीं। समाज की यह बदलती सोच बहुत बड़ी विडम्बना है। यहां पैसों के लिए अपना चरित्र तक बेचने को लोग तैयार है पर मेहनत करने को राजी नहीं है। ऐसे में कैसे संभव है देश का विकास? यह एक चिंतनीय प्रश्न है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हआज समाज क्यों इतना खुदगर्ज और असंस्कृत होता जा रहा है? एक शिक्षक हूं तो जाहिर सी बात है कि पहले पहल तो सोच शिक्षा और शिक्षक के इर्द गिर्द ही इस मामले को ले कर दौड़ेगी। इसी दिशा में पहला विचार आया कि हमारे यहां तो शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए दी जाती थी और आज शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन बनती जा रही है। कहीं यह तो सामाजिक मान्यताओं के विकृतिकरण का कारण नहीं है? आज स्कूलों कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में आ गए हैं, जो पुस्तकों को पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। जो थोड़े बहुत पढ़ते भी हैं, वे भी मात्र परीक्षा पास करने के लिए और अच्छे अंक लेने के लिए या फिर सरकारी नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं। बाकी पुस्तकों को विद्या अध्ययन के लिए पढ़ने का चलन आज पूर्ण रूप से खत्म ही हो गया है। नैतिकता के चलते व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करे, जिसकी उसे तनख्वाह मिलती है। तभी वह शिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य है। पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। आजकल सभ्यता और संस्कृति तथा शिक्षा की पहचान सुख-सुविधाएं, रसूख और पैसा हो गया है। शालीनता, विनम्रता, तथा नैतिकता नहीं। समाज की यह बदलती सोच बहुत बड़ी विडम्बना है। यहां पैसों के लिए अपना चरित्र तक बेचने को लोग तैयार है पर मेहनत करने को राजी नहीं है। ऐसे में कैसे संभव है देश का विकास? यह एक चिंतनीय प्रश्न है। “शिक्षा धनार्जन का विषय न बने बल्कि ज्ञानार्जन और संस्कृति तथा सभ्यता की सम्बाहक बनकर सामने आए।”

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यह लेख (कैसे संभव है देश का विकास?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur articles, आज के शिक्षक और छात्र पर निबंध हिंदी में, कैसे संभव है देश का विकास?, कैसे संभव है देश का विकास? - हेमराज ठाकुर, बच्चों के विकास में शिक्षक की भूमिका, वर्तमान समाज में शिक्षक की भूमिका, विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में शिक्षक की भूमिका, विद्यार्थी जीवन में शिक्षक का महत्व पर निबंध, व्यक्ति के विकास में शिक्षा की भूमिका, व्यक्तित्व का विकास एवं शिक्षा, शिक्षा की उपयोगिता, शिक्षा में शिक्षक का महत्व, समाज में शिक्षक की भूमिका पर निबंध, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

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