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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी साहित्य

बारिश और किसान।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rain and Farmer | बारिश और किसान।

बारिश और किसान का बहुत गहरा संबंध है। बारिश के बिना किसान की फसल तैयार नहीं होती है, किसान मिट्टी से सोना उत्पन्न करने की तपस्या करता रहता है। तपती धूप कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश में भी अपने खेती और अपनी फसल को सुरक्षित रखता है, भारत की आत्मा किसान है।

जो गांव में निवास करती है, किसान हमें खाद्य पदार्थ देने के अलावा भारतीय संस्कृति और सभ्यता को भी सहेज रखे हुए हैं, देशभर को अन्न, फल, साग – सब्जी किसान ही देता है। बारिश और किसान एक दूसरे के पूरक है जब बारिश होगी तभी खेत की मिट्टी गीली होगी और उसमें बीच डाले जाएंगे फिर फसल तैयार होती है।

किसान खेती करके अपना, परिवार का पेट पालता है अगर बारिश नहीं होती तो, यह किसान लिए चिंताजनक विषय बन जाता है। पर्यावरण की रक्षा करने के लिए भी बारिश का होना बहुत आवश्यक है। आजकल बहुत ज्यादा प्रदूषण के कारण जल चक्र सटीक रूप से निष्क्रिय नहीं हो पाता है जिसकी वजह से समय पर बारिश नहीं हो पाती है। बारिश कभी-कभी उचित जगह पर ना होकर अलग – अलग हो जाती है, फिर कभी – कभी अत्यधिक बारिश भी फसल को नष्ट कर देती है।

ऐसे में किसान अपनी फसल की बर्बादी को देख कर बहुत दुखी होता है, भारत देश में बहुत केमिकल कारखाने हैं। जिससे निकलते हुए धूल प्रदूषण और वायु प्रदूषण से जो पानी नदी में बह रहा है वह भी प्रदूषित होता है, जिसकी वजह से फसल सही से नहीं हो पाती है। जल चक्र में जल दूषित होकर रहेगा तो दूषित वर्षा भी होती है, इसी कारण किसानों पर इसका भारी प्रभाव पड़ता है। गरीब किसान अपने जीवन की सारी जमा पूंजी अपनी खेती पर लगाकर ही फसल से अपनी आमदनी करते हैं, जिससे वह अपने परिवार का पेट पालता है।

पर बारिश नहीं होती है तो किसान उदास हो जाता है, उसकी दिनचर्या रोजाना एक जैसी ही होती है। खेती की रक्षा करने के लिए वह अपने खेत पर ही ज्यादा समय रहा करता है, और अपनी खेती को अपनी मेहनत से सींचता है, वह दिन भर कठोर परिश्रम करने के बाद भी नहीं अपने घर को लौट पाता है।

जहां नदी का पानी स्वच्छ होगा, वहाँ की जलवायु भी शुद्ध होगी और शुद्ध जल से शुद्ध वर्षा भी होगी। जिससे फसल अच्छी तैयार होगी, फसल अच्छे दाम में भी बिकेगी, जिससे किसान को बहुत अधिक लाभ मिलता है, वह अपने परिवार के लिए धन एकत्रित करता है, किसान हमारे अन्नदाता है।

अगर किसान खेती न करें तो, हम लोगों अन्न कहाँ से मिलेगा? पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए हम सबको आगे कदम बढ़ाने होंगे, अगर हम वाहन आदि का प्रयोग कम कर दे, तो पर्यावरण शुद्ध होने में थोड़ी मदद मिल सकती है। कल कारखानों के अपेक्षा लघु – कुटीर उद्योग स्थापित करें तो कुछ हद तक वातावरण शुद्ध हो सकता है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “किसान ही वह इंसान है, जो सूरज की तेज गर्मी, बारिश या तेज ठण्ड की परवाह किये बिना ही वह अपने खेतों पर फसलों को अपनी मेहनत से उगाने का काम करते हैं। अपने परिश्रम से वह कई किस्म के अन्न, फल, सब्जियों इत्यादि को खेतों में उगाता हैं, और एक उचित मूल्य पर इसे बाजारों में बेचते हैं।” बारिश और किसान का बहुत गहरा संबंध है। बारिश के बिना किसान की फसल तैयार नहीं होती है, किसान मिट्टी से सोना उत्पन्न करने की तपस्या करता रहता है। तपती धूप कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश में भी अपने खेती और अपनी फसल को सुरक्षित रखता है, भारत की आत्मा किसान है। जो गांव में निवास करती है, किसान हमें खाद्य पदार्थ देने के अलावा भारतीय संस्कृति और सभ्यता को भी सहेज रखे हुए हैं, देशभर को अन्न, फल, साग – सब्जी किसान ही देता है। जहां नदी का पानी स्वच्छ होगा, वहाँ की जलवायु भी शुद्ध होगी और शुद्ध जल से शुद्ध वर्षा भी होगी। जिससे फसल अच्छी तैयार होगी। अगर किसान खेती न करें तो, हम लोगों अन्न कहाँ से मिलेगा? पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए हम सबको आगे कदम बढ़ाने होंगे, अगर हम वाहन आदि का प्रयोग कम कर दे, तो पर्यावरण शुद्ध होने में थोड़ी मदद मिल सकती है। कल कारखानों के अपेक्षा लघु – कुटीर उद्योग स्थापित करें तो कुछ हद तक वातावरण शुद्ध हो सकता है।

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यह लेख (बारिश और किसान।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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विज्ञान और ज्ञान की जंग।

Kmsraj51 की कलम से…..

War of Science and Knowledge | विज्ञान और ज्ञान की जंग।

विज्ञान और ज्ञान की जंग मानव समाज में बहुत पुरानी है। भारतीय पौराणिक कथाओं को पढ़े तो सुरों – असुरों या देव – दानवों की मुख्य लड़ाई ही शायद विज्ञान और ज्ञान की थी। सुर या देव जहां ज्ञान आधारित जीवन पद्धति के समर्थक थे तो असुर या दानव विज्ञान आधारित जीवन पद्धति के समर्थक थे शायद। ज्ञानाधारित जीवन पद्धति यदि मर्यादाओं, शालिंताओं, आस्थाओं और विश्वासों पर टिकी थी तो उसका मनोबल और नैतिक चरित्र भी उतना ही दृढ़ और उन्नत था।

उदाहरणार्थ — ऋषि मुनियों का जीवन देखा जा सकता है। वहीं आसुरी सिद्धांत की परम्परा इसके विपरित थी। वे स्व को महत्व देते थे तथा पुरुषार्थ को ही सब कुछ मानते थे। ज्ञानाधारित शिक्षा पद्धति परमार्थ प्रधान थी तो विज्ञानाधारित शिक्षा पद्धति स्वार्थ प्रधान थी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आसुरी सिद्धांत “वीर भोग्य वसुन्धरा” की सूक्ति पर चलता था।

असुर चमत्कार को प्रणाम करते थे तो देव और मानव भगवान को। तब सुरा, सुन्दरी, मांस, मदिरा का सेवन आसुरी प्रवृति का द्योतक था तो आज इनके सेवन से रहित प्राणी को गवार समझा जा रहा है। आज समाज की दशा और दिशा अलग होती जा रही है। आज पश्चिम की विज्ञानधारित शिक्षा पद्धति ने भारतीय समाज को पूरी तरह से जकड़ लिया है। जिसके चलते आज का मानव चालाक तो बहुत हो गया है पर मानसिक रूप से कमजोर और मलिन बहुत हो गया है। अब तो जबरन कहना पड़ता है:-

अपने ही देश में, अपनी ही सभ्यता संस्कृति बेगानी हो गई।
बस इसी के ही चलते, पश्चिम को घुसने में आसानी हो गई।

यह बात भी झुठलाई नहीं जा सकती कि संस्कारों, व्यवहारों तथा प्रतिकारों की जद्दोजहद नई और पुरानी पीढ़ी में हमेशा से चलती आई है और यह चलती रहनी चाहिए। क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और परिवर्तन संघर्ष धर्मी प्रक्रिया है।

सकारात्मक परिवर्तन सामाजिक विकास के लिए जरूरी है फिर भले ही पुरानी पीढ़ी चाहे उसका प्रतिकार ही क्यों न करती रहे। हां नकारात्मक परिवर्तन का प्रतिकार नई पीढ़ी को भी स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि हम मानव प्राणी है और मानव प्राणी होने के कारण हमे मानव समाज के हित के लिए प्रतिस्थापित नीति और नियमों को सहेज कर रखना चाहिए।

फिर भले ही वे नियम अवैज्ञानिक या अप्राकृतिक ही क्यों न हो। यदि ऐसा न किया गया तो सदियों से संस्कृति और सभ्यता की मर्यादाओं में बंधा मानव समाज पढ़ा लिखा पशु समाज बन जाएगा; जिसमें न ही तो दया शेष रहेगी और न ही लाज शर्म।

वह जंगली जीवन की तरह कामुक और शक्ति आधारित हो जाएगा। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। वह एक मनमुखी समाज को जन्म देगा, जो मानव समाज के लिए सुखद अनुभव नहीं होगा।

हमारी शिक्षा पद्धति भक्ति प्रधान थी तो आज हम पर संचालित मैकाले माडल की पश्चिमी शिक्षा आसक्ति और शक्ति आधारित हो गए है। यही कारण है कि आज समाज मानसिक रूप से तो अपवित्र होता जा रहा है पर शारीरिक तौर पर पवित्र और सुन्दर बनने की कोशिश कर रहा है। फिर वह बाह्य पवित्रता चाहे कासमैटिक फुहड़ता आधारित ही क्यों न हो।

आज सचमुच मानवीय मूल्यों का निरन्तर पतन होता जा रहा है। यह सब काम विज्ञान आधारित शिक्षा ने खराब किया है। हमारी ज्ञान आधारित शिक्षा बहुत उन्नत थी, है और रहेगी। हमारे यहां योग को महत्व दिया जाता है और उनके पश्चिम में प्रयोग को महत्व दिया जाता है। हमारे यहां प्यार को महत्व दिया जाता है तो उनके वहां विकार को महत्व दिया जाता है। हमारे यहां सम्भोग को दर्शन की दृष्टि से देखा जाता है तो उनके वहां सम्भोग को प्रदर्शन की दृष्टि से देखा जाता है शायद। यदि ऐसा नहीं है तो वर्तमान समाज में युवा पीढ़ी में फिल्मी जगत से प्रभावित हो कर अंग प्रदर्शन और अल्प वस्त्रीकरण की अवधारणा क्यों कर उत्पन हुई? क्या यह पछुआ का प्रभाव है या फिर कुछ और?

विज्ञान के मतानुसार संतानोत्पत्ति के लिए एक स्त्री और एक पुरुष चाहिए। वे आपस में रति क्रीड़ा करके दैहिक आनंद भी ले सकते हैं और संतान भी पैदा कर सकते हैं। उनके अनुसार यही प्राकृतिक नियम है। इसलिए मानव जाति को अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भौतिक, रासायनिक और जैविक जरूरतों को पूरा करना कोई अपराध नहीं है।

जैसे पशु समाज में नर – मादा संयोग ही उत्पत्ति का आधार होता है। फिर वे नर – मादा सगे भाई – बहन हो या फिर मां – बेटा या पिता – पुत्री। पूरी तरह से ऐसी तो नहीं पर कुछ ऐसी ही आजादी आज की युवा पीढ़ी चाहती है शायद। यदि उन्हे उनके मन माफिक आजादी मिली तो वह दिन भी दूर नहीं है, जिस दिन मानव और पशु समाज के संतानोत्पत्ति के क्रिया व्यापार एक जैसे हो जाएंगे। कोई नाता रिश्ता नहीं रहेगा। वे रति क्रीड़ा, व्यसनीय क्रीड़ा और सौंदर्य प्रदर्शन में, अंग प्रदर्शन की पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं। इस प्रणाली में अमर्यादा में जीना ही मानव जीवन का उद्देश्य समझा जाता है शायद। यहां चरित्र नाम की कोई चीज नहीं होनी चाहिए, ऐसी अवधारणा है।

जबकि हमारी संकृति ज्ञानाधारित शिक्षा की समर्थक है। यहां संतानोत्पत्ति के लिए एक पति और एक पत्नी मानव समाज में होना जरूरी है। यहां नातों रिश्तों की मानवीय सामाजिक नियमावली का बड़ा महत्व है। जो मानव समाज में बहुत ही जरूरी है। यहां पड़ोस की लड़की को भी लड़का बहन कहता है और लड़की उसे दिल से भाई कहती है। पर हां पछुआ रीत जब से आई है अब यह रिवायत बदलती जा रही है। बहन का स्थान मैडम और भाई का स्थान सर ने ले लिया है।

अब स्त्री – पुरुष एक दूसरे को भाई – बहन कहने से कतराते हैं। यहां पर स्त्री को बुरी नजर से देखना और पर पुरुष को बुरी नजर से देखना घोर अपराध समझा जाता हैं।यहां मर्यादा का पालन करना मानव जीवन का उद्देश्य समझा जाता है। यहां चारित्रिक पवित्रता की प्रधानता को महत्व दिया जाता है।

वहां पश्चिम में सब विपरीत है। हमारे गर्ल फ्रेंड या बॉय फ्रेंड की अवधारणा ही नहीं है और आज यह चलन भारतीय समाज में आम हो गया है। प्रेमी – प्रेमिका का रिश्ता हमारे यहां मुखर था और वह कुछ यूं था कि वे एक दूसरे के लिए मर मिटने वाले होते थे। प्रेमी के मृत्यु को प्राप्त होने पर प्रेमिका कई बार जौहर तक कर लेती थी। यह उनका पवित्र प्रेम और समर्पण था।

पर वहां पश्चिमी रिवायत में इसे तर्क की कसौटी पर कसा जाता है और इसे कोरी मूर्खता और नारी का शोषण कहते हैं। ठीक है कि यह नारी के ही साथ क्यों होता था।पत्नी की मृत्यु पर फिर पुरुषों को भी जौहर करना चाहिए था। पर यह भी झुठलाया नहीं जा सकता है कि जो माताएं बहनें जौहर करती थी, वे मानसिक रूप से कितनी दृढ़ और समर्पित रही होगी?

यही वे कारण थे जिनसे विदेशी उपनिवेशकों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करने की विचारणा जागी। उन्हे लगा कि यदि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के शैक्षिक ढर्रे को पश्चिमी रीत में नहीं बदला गया तो इनका मनोबल तोड़ना बहुत ही मुश्किल होगा। जो उनके उपनिवेशवाद की राह में निरन्तर रोड़ा बनता जा रहा था।

हमारे भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति थी। जिसमें अर्थोपार्जन की शिक्षा बाद में दी जाती थी, पहले सामर्थ्य उपार्जन और जनोपार्जन की शिक्षा दी जाती थी। हमारे यहां शिक्षार्थी को सरकारी सेवाओं में तैनात होने की शिक्षा बाद में दी जाती थी। पहले उसे मानव बनने की शिक्षा दी जाती थी। ऐसा नहीं है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में विज्ञान नहीं था। ऐसा विज्ञान था कि सुन कर सब दंग रह जाए। हमारे यहां शरीर छोड़ कर आत्मा को आकाश में भ्रमण कराने की विद्या आती थी।

पढ़े योग वशिष्ठ, जिसमें महर्षि वशिष्ठ भगवान राम को उस विद्या से परिचित करवाते हैं। भगवान शिव को मनुष्य का सिर काटकर पर जीवो का शीश स्थापित करने की विद्या भी आती थी। उदाहरण श्री गणेश जी और प्रजापति दक्ष के सिरों का पुनर्स्थापन है। पर यह विद्या अपात्र अर्थात स्वार्थी लोगों को नहीं दी जाती थी। यदि यह अपात्र को दी भी गई होती तो अनर्थ हो गया होता।

आज भले ही वे परम गोपनीय विज्ञानाधारित रहस्य हमारे पुरखों के साथ दफ़न हो गए हो। पर वह अपने आप में एक परम विज्ञान था। यदि ऐसी कला आज के वैज्ञानिक युग में हमे आ जाती तो हम तो अपने आप को ही हिरण्याक्षिपु की तरह भगवान कहलवाने लगते। अपनी ही संतानों के दुश्मन बन बैठते। छुटपुट उदाहरण तो फिर भी ऐसे देखने को आज भी मिल ही जाते हैं।

भारत में आज भी ऐसे वैद्य विद्यमान हैं, जो नाड़ी पकड़ कर आदमी का सारा एम आर आई, सी टी स्कैन तथा एक्स रे कर दे। मानो वे चलती फिरती सजीव पारदर्शी मशीनें हैं। पर उस सामर्थ्य उपार्जन वाली कड़ी साधना वाली विद्या को कोई क्यों सीखे और उसे कोई विज्ञान क्यों कहे? क्योंकि वह विद्या अनुशासन प्रधान है और आज आदमी अनुशासन चाहता ही नहीं है।

यह परम सत्य है कि 84 लाख योनियों से भटकता – भटकता मुश्किल से जीव अन्त में कहीं मनुष्य योनि में जन्म लेता है। बाकी सारी योनियां पशु योनियां या जड़ योनियां हैं। ऐसे में पाश्विकता का मनुष्य में रहना स्वभाविक है। पर वह पाश्विकता हमारे व्यवहार में दिखे, इसका मानव समाज में प्रतिकार अनादि काल से होता आ रहा है और होना भी चाहिए।

सभी जानते हैं कि विवाह करने के पश्चात पति – पत्नी क्या करते हैं? यहां तक कि मां – बाप, बहन – भाई सबको नव युग्म के पारस्परिक पति – पत्नी व्यवहार का पूरा पता होता है पर इसका यह मतलब तो कतई नहीं होता कि वे दोनों पति – पत्नी व्यवहार खुले आम पशुवत करे।

मानव समाज में हर कार्य की एक मर्यादा होती है, जो रहनी भी चाहिए। वरना मानव और पशु समाज में कोई खास अन्तर भविष्य में नजर नहीं आएगा। भविष्य पुराण और सूक्ष्म वेद की भविष्यवाणी क्यों इतनी पहले ही सिद्ध होती जा रही है कि घोर कलियुग में न ही तो सेवा, साधना रहेगी और न ही तो प्यार – प्रेम। हर नर – नारी चरित्रहीन होंगे और अल्पायु होंगे। नातों रिश्तों की कोई कद्र ही नहीं होगी।

खैर यह कहना भी गलत होगा कि विज्ञान पूरी तरह से खराब है। पर कई ऐसे पहलू हैं, जहां विज्ञान का सहारा लेना कतई ठीक नहीं है। मानवीय मूल्यों के क्षेत्र में विज्ञान को ठूंसेंगे तो स्त्री-पुरुषों में झगड़ा हो जाएगा। सामाजिक मान्यताओं में उथलपुथल मच जाएगी। निरन्तर होते जा रहे मानवीय मूल्यों के पतन के चलते देश की शासनिक और प्रशासनिक ताकतों को नैतिक मूल्यों के प्रतिस्थापन के लिए स्कूली शिक्षा प्रणाली में आज पुरातन योग और संस्कार शिक्षा को भी जोड़ना होगा। तभी मनुष्यों का और मानव समाज का उत्थान सम्भव है।

हमे आज पुनः अपनी विकार के दमन की शिक्षा प्रणाली को पाठ्यक्रम में जोड़ना होगा। यदि यूं ही विकार को जागृत करने वाली प्रणाली हावी रही तो हमारी आगामी पीढ़ियां भीरू और अपंग पैदा होगी। क्योंकि अति किसी भी चीज की ठीक नहीं होती।जब आदमी अति विकारी या अति संस्कारी हो जाता है तो वह मानव समाज के संतुलन में नहीं बैठता। इसलिए सृष्टि के संचालन के लिए न ही तो अति विकार भला है और न ही तो अति संस्कार। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन समत्व को ही योग कहते है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हमे आज पुनः अपनी विकार के दमन की शिक्षा प्रणाली को पाठ्यक्रम में जोड़ना होगा। यदि यूं ही विकार को जागृत करने वाली प्रणाली हावी रही तो हमारी आगामी पीढ़ियां भीरू और अपंग पैदा होगी। क्योंकि अति किसी भी चीज की ठीक नहीं होती।जब आदमी अति विकारी या अति संस्कारी हो जाता है तो वह मानव समाज के संतुलन में नहीं बैठता। इसलिए सृष्टि के संचालन के लिए न ही तो अति विकार भला है और न ही तो अति संस्कार। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन समत्व को ही योग कहते है। सभी जानते हैं कि विवाह करने के पश्चात पति – पत्नी क्या करते हैं? यहां तक कि मां – बाप, बहन – भाई सबको नव युग्म के पारस्परिक पति – पत्नी व्यवहार का पूरा पता होता है पर इसका यह मतलब तो कतई नहीं होता कि वे दोनों पति – पत्नी व्यवहार खुले आम पशुवत करे। मानव समाज में हर कार्य की एक मर्यादा होती है, जो रहनी भी चाहिए। वरना मानव और पशु समाज में कोई खास अन्तर भविष्य में नजर नहीं आएगा। भविष्य पुराण और सूक्ष्म वेद की भविष्यवाणी क्यों इतनी पहले ही सिद्ध होती जा रही है कि घोर कलियुग में न ही तो सेवा, साधना रहेगी और न ही तो प्यार – प्रेम। हर नर – नारी चरित्रहीन होंगे और अल्पायु होंगे। नातों रिश्तों की कोई कद्र ही नहीं होगी।

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यह लेख (विज्ञान और ज्ञान की जंग।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आखिर हँसी लौट ही आई!

Kmsraj51 की कलम से…..

Aakhir Hansi Laut Hee Aai | आखिर हँसी लौट ही आई!

हर समय चेहरे पर मुस्कान लिए वो सभी को खुशी बांटती फिरती।
पर ये क्या? आज उसकी हँसी पर किसने ग्रहण लगाया?

वो काम तो सब कर रही थी पर उसकी आवाज़ की खनक कुछ ऐसे गायब थी जैसे किसी ने पायल से घुंघरुओं की छम-छम छीन ली हो। घर में किसी सदस्य से भी उसकी अनबन हुई क्या? पर नही ऐसा नही लगता क्योंकि सभी सदस्यों के सामने तो वो प्यार व अपनेपन से पेश आ रही थी। लेकिन उसकी निगाहें हर वक्त किसी चीज को तलाश करती नज़र आ रही थी।जब देखो तभी वो अपने काम को निबटा कर ऐसे कुछ ढूंढती नजर आती जैसे कोई बहुत ही कीमती चीज उसकी आँखों से ओझल हो गयी हो, पर समझ नही आ रहा था क्या…..?

अब उसका हर रोज का काम हो गया था कि समय मिलते ही कभी अलमारी, कभी बेड, कभी दराज में तो कभी ड्रैसिंग को खोलकर सारा सामान बार-बार करीने से सजा रही थी। पता नही ? ऐसा क्या कीमती सामान खो गया? जो उसकी होठों की हँसी ले गया और उसकी आँखों की चमक भी।

दिन पर दिन बीते जा रहे थे और ऐसा लग रहा था कि उसकी आशा भी उसे हर बार निराशा का ही जवाब दे रही थी। अब उसकी शारीरिक हालत में बुखार ने भी सोने पर सुहागा कर दिया था। एक बात और परिवार का कोई भी सदस्य उसको कुछ नही कह रहा था बस हँसी में इतनी बात जरूर कह देते याद करो कहाँ पर रखा था? तुमने उस वस्तु को। और इस प्रकार की बात भी उसके सीने में तीर की तरह लगती…… वह सोचने पर विवश हो जाती कि अब उसकी याददाश्त (स्मरण-शक्ति) धीरे-धीरे मध्यम हो गयी क्या? और हो भी क्यूँ ना, सबकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसने खुद को काम की रेल जो बनाया था!

पर उसको तो पता था कि उम्मीद पर दुनिया कायम है, इसलिए हर रोज वो घर के मंदिर में दिल की खुशी के लिए नतमस्तक होती। कई दिनों के बाद एक बार फिर उसने आशा का दामन थामे अपनी अर्जी अपने इष्टदेव को लगा ही दी। पर अब उसको लगाए हुए भी तीन दिन बीत ही गए थे। घर में तो सब सामान्य व्यवहार था क्योंकि वो तो अपना हर फर्ज लग्न से निभा रही थी।

चौथे दिन इसी उधेड़बुन में उसने फिर एक बार अपनी अलमारी को टटोलना शुरू किया तब सामान को इधर-उधर करते हुए अचानक ही उसकी आवाज़ से घर में वो खुशी की खनक पैदा हुई जो कितने दिनों से खो गयी थी, क्योंकि उसको वो अपने सोने के कंगनों का बॉक्स मिल चुका था, जिसने उसकी रात की नींद और दिन का चैन गायब कर दिया था। वो खुशी का बॉक्स जिसे अलमारी ने चुपके से अपने कोने में छिपाकर उसका हरपल इम्तिहान लिया था और ऐसा लग रहा था जैसे आज उसने ही उसको पास कर दिया हो।

कितने कीमती होते हैं एक औरत के लिए उसके आभूषण बिल्कुल उसके गुणों की ही तरह। आज वो अपने परिवार के सदस्यों के साथ इतनी ही प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी जितना कि उन आभूषणों के घर आने पर थी।

उसकी आध्यात्मिकता ने एकदम से उसका सिर भगवान के सजदे में झुका दिया। ऐसा लग रहा था जैसे आँखों में वही चमक लिए उसकी आवाज की खनक से घर का हर कोना-कोना खुशी से भर गया हो।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लघुकथा के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — क्योंकि उसको वो अपने सोने के कंगनों का बॉक्स मिल चुका था, जिसने उसकी रात की नींद और दिन का चैन गायब कर दिया था। कितने कीमती होते हैं एक औरत के लिए उसके आभूषण बिल्कुल उसके गुणों की ही तरह। आज वो अपने परिवार के सदस्यों के साथ इतनी ही प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी जितना कि उन आभूषणों के घर आने पर थी। उसकी आध्यात्मिकता ने एकदम से उसका सिर भगवान के सजदे में झुका दिया। ऐसा लग रहा था जैसे आँखों में वही चमक लिए उसकी आवाज की खनक से घर का हर कोना-कोना खुशी से भर गया हो।

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यह लघुकथा (आखिर हँसी लौट ही आई!) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लघुकथा सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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परीक्षा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Exam | परीक्षा।

परीक्षा के नाम से ही बच्चों को भय व्याप्त हो जाता है। परीक्षा को वह एक डर के रूप में भी देखते हैं जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए शिक्षा का होना भी जरूरी है। यह भी निश्चित है कि सफलता किसी व्यक्ति को मिलती है जो पूरी मेहनत और लगन के साथ पढ़ाई करता है, और परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करके पास, अपने मानदंड को निर्धारित करता है।

“परीक्षा के लिए बच्चों में ऐसी लगन होनी चाहिए जिससे बच्चे का ध्यान लक्ष्य से कभी भी डगमगाए नहीं।” हमें बच्चों को यह समझाना चाहिए कि पढ़ाई में मेहनत करने से ही अच्छा फल मिलता है जब तक हम पढ़ाई नहीं करेंगे तो परीक्षा में हमारे नंबर अच्छे नहीं आएंगे। और इसी अंकों के कारण ही हम आगे अपने भविष्य को तय कर सकते हैं।

इस तरह बच्चों को प्रेरित करने के लिए कड़ी मेहनत से वह अपनी सफलता की राह पर आगे बढ़ सकता है। इसलिए बच्चों पर कोई दबाब नहीं होना चाहिए। “बच्चों को अपने मनपसंद विषय के साथ ही पढ़ाई करवानी चाहिए।” अगर हम उनके साथ कोई अनुचित व्यवहार करते हैं या उनके ऊपर कोई अनुचित दबाव बनाते हैं तो बच्चों पर इसका नकरात्मक प्रभाव पड़ता है…

“परीक्षाएँ छात्रों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता को प्रेरित करती हैं। वे अच्छे अंक पाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। परीक्षाएँ छात्रों को अपने पाठ्यक्रम को सुव्यवस्थित करने में मदद करती हैं। परीक्षण के तीन सामान्य प्रकार हैं: लिखित परीक्षा, मौखिक परीक्षण और शारीरिक कौशल परीक्षण।”

…और वह हीन भावना के शिकार हो जाते हैं, कई बार हम दूसरे बच्चों को देख कर बोलते हैं कि यह बच्चा इतना होशियार है इससे भी बच्चों के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वह पढ़ाई के प्रति उदासीन रवैया अपनाते है। हमें बच्चों की अनुचित माँग को भी नहीं मानना चाहिए हमें उनकी समस्याओं को समझना होगा। और उनका समाधान भी करना होगा। बच्चों के साथ दोस्ताना और प्यार भरा व्यवहार करना चाहिए।

परीक्षा की तैयारी के वक्त सभी छात्रों को कुछ विशेष बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। कई बच्चे बिना टाइम-टेबल के ही परीक्षा की तैयारी करते है तो कई टाइम-टेबल बनाकर। पर सभी बच्चों को हर विषय को पढ़ने के लिए एक टाइम-टेबल अवश्य बनाना चाहिए और उसे फॉलो भी करना चाहिए। इसके साथ ही समयानुसार उन्हें अंतराल भी लेना बहुत आवश्यक है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — परीक्षा के लिए बच्चों में ऐसी लगन होनी चाहिए जिससे बच्चे का ध्यान लक्ष्य से कभी भी डगमगाए नहीं। हमें बच्चों को यह समझाना चाहिए कि पढ़ाई में मेहनत करने से ही अच्छा फल मिलता है जब तक हम पढ़ाई नहीं करेंगे तो परीक्षा में हमारे नंबर अच्छे नहीं आएंगे। और इसी अंकों के कारण ही हम आगे अपने भविष्य को तय कर सकते हैं। अपनी किताबों, नोट्स और निबंधों का संक्षिप्त नोट तैयार कर लें। यदि आप किसी विषय को पसंद नहीं करते हैं या मुश्किल लगता है तो उन्हें आसान बनाएं। हेडिंग और सब-हेडिंग जोड़ें, या हाइलाइटिंग पेन और रिवीजन कार्ड, कुंजी शब्द या चार्ट का उपयोग करें – जो भी आपके लिए काम करता है। माता-पिता, खान पान पर दें ध्यान​​ परीक्षा के दिनों में बच्चे की मेहनत बहुत बढ़ जाती है। ऐसे में उसकी डाइट को लेकर समझौता न करें। परीक्षा का भय कई कारणों से होता है। पढ़ने में कठिनाई, कुछ विषयों का डर, माता-पिता और शिक्षकों की अपेक्षाएँ, आत्मविश्वास की कमी और ध्यान केंद्रित करने में असमर्थता , ये सभी छात्रों में चिंता और अवसाद की घटनाओं को बढ़ाते हैं। हमें बच्चों की अनुचित माँग को भी नहीं मानना चाहिए हमें उनकी समस्याओं को समझना होगा। और उनका समाधान भी करना होगा। बच्चों के साथ दोस्ताना और प्यार भरा व्यवहार करना चाहिए।

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यह लेख (परीक्षा।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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अंदाजे बयां — पार्ट – 4

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Andaze Bayan Part-4 | अंदाजे बयां — पार्ट – 4

खुद के ही भाव हैं, है अपनी ही अनुभूति,
निज अभिव्यक्ति में कहीं, अपने मन की बात।

भूल – चूक से हो गई, छोड़ो वो बात,
लिखा-पढ़ी रात्रि की, बीत गई उसके साथ।

छोटी – छोटी बात पर, भिड़ने को हो तैयार,
जैसा अधम आदमी, वैसी दुराशय वार।

जो उपजा रोड पर, वही उसका अधिवास,
आश्रय की आध्या वो करे, हो आलय जिसके पास।

‘परिमल’ की ऐसी परम्परा, मिलने को कतराय,
अपनों से बोले नहीं, दूसरे से बतियाय।

यथार्थ सिद्ध हो, दु:ख में भी सुख पाय,
पवित्र निर्मल बात पर, सबका मन मैला हो जाय।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह दोहे (अंदाजे बयां — पार्ट – 4) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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अंदाजे बयां — पार्ट – 3

Kmsraj51 की कलम से…..

Andaze Bayan Part-3 | अंदाजे बयां — पार्ट – 3

सबको कब सुलभ है, माध्यम एक समान,
जनता तुम्हारे साथ है, मेरे साथ भगवान।

जिंदगी खोई पा ली, ना जाने कितनी बार,
इसी जनम में ले लिए, कई जनम बारंबार।

मैं उतरा सिंधु में, तूने डाला जाल,
आ हम सब बाँट लें, आधा-आधा माल।

मुझसे तू सहमत नहीं, और कोई उपाय निकाल,
त्याग सके तो त्याग दें, मुझे और मेरे बाल-गोपाल।

क्या माँगू सुर-ताल से, गीतों की रसधार,
समय पड़े पर खो गये, मेरे सुर भये बेकार।

रिश्वत का धन किस काम का, ऐसा नाम न पाल,
मौका मिलते ही इसको, तू इसे अँधे कुएं में डाल।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह दोहे (अंदाजे बयां — पार्ट – 3) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आधुनिकता वरदान या अभिशाप।

Kmsraj51 की कलम से…..

Modernity a Blessing or a Curse | आधुनिकता वरदान या अभिशाप।

आज का युग विज्ञान का युग है आदिकाल से लेकर अब तक जितने भी प्रगति मनुष्य ने की है। वह सब विज्ञान की देन है हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि “आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है” जैसे – जैसे मनुष्य की आवश्यकता बढ़ती गई। वैसे-वैसे नया आविष्कार होते गए। विज्ञान ने वास्तव में हमें बहुत कुछ दिया है जिसके लिए हम सदा उनके ऋणी रहेंगे।

विज्ञान ने हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है जिससे कोई भी प्रभावित नहीं रह सका। यहां तक की बच्चे भी आजकल स्मार्टफोन का उपयोग कर रहे हैं जो एक तरह से उनके लिए हानिकारक भी है और फायदेमंद भी है। आधुनिकता वरदान भी है और अभिशाप भी यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसको प्रयोग कैसे करते है। आज के युग में इतनी तकनीक का विकास हो चुका है कि हम इसके प्रयोग किये बगैर कुछ करने की नहीं सोच सकते है।

हम एक ऐसे समाज और दुनिया में रहते हैं जो अपने आधुनिकता के चक्कर में अपने टेबलेट, स्मार्टफोन, लैपटॉप के जरिए इस आभासी दुनिया से लगातार संपर्क में रहते है। इसका उपयोग करने के लिए न केवल हमारे काम करने का तरीका और खेलने का तरीका भी बदला है। यह हमारे सोचने के तरीकों को नाट्य रूप से प्रभावित कर रहा है।

इंटरनेट ‘सोशल मीडिया’ कंप्यूटर के इनके इस्तेमाल से लोगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह मानव को कम सामाजिक संवाद आत्मक और निर्भर बनाता है यहां तक कि उनके व्यक्तिगत पहचान को भी प्रभावित करता है। और तकनीकी की वजह से दुनियाँ के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े हुए है हम चीजों को तुरंत कर सकते हैं। और अपने पुराने मित्रों को भी ‘सोशल मीडिया’ के जरिए संपर्क कर सकते हैं।

मोबाइल पर इंटरनेट की उपयोगिता तथा युवा वर्ग द्वारा इसके दुरुपयोग का अध्ययन किया गया है। जहां पर मोबाइल इंटरनेट ऐसी तकनीकी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उपयोग, उपयोगी साबित सिद्ध साबित हो रही है। वही युवा वर्ग अपने लालच और बुरी आदतों के शिकार भी हो रहा है। अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए इसको एक हथियार के रूप में भी इस्तेमाल कर रहा है इसे कारण सामाजिक मानसिक विकार भी विकसित हो रहे हैं।

  • अवश्य पढ़ें — सोशल मीडिया और बच्चे।

मोबाइल के अधिक प्रयोग करने के कारण, मोबाइल का अधिक उपयोग करने के कारण और इसकी आदत सी पड़ गई है। तथा मोबाइल के उपयोग के आदि हो जाने के कारण एक व्यक्ति सामाजिक, मानसिक, और शारीरिक समस्याओं से ग्रसित हो जाता है। यह इस ओर इशारा करते हैं। सूचना तकनीकी क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ, भारतीय समाज में इंटरनेट का अत्यधिक प्रयोग किया जा रहा है जिसका जिसका दुष्प्रभाव सभी लोगों पर पड़ रहा है।

आज भौतिक दूरी पर मायने नहीं रखती, इंटरनेट के द्वारा विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग कर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से ऑनलाइन कॉन्फ्रेंस या वीडियो कॉलिंग पर भी बात कर सकता है, इस कड़ी में विभिन्न सोशल मीडिया एप्स साइट का अमूल्य योगदान रहा है यह व्हाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर इंस्टाग्राम इन सभी प्लेटफार्म के माध्यम से हम किसी से भी बात कर सकते हैं, और अपने फोटो वीडियो और मैसेज को आसानी से भेज सकते हैं।

मोबाइल और इंटरनेट के प्रयोग के द्वारा और शिक्षा पाना भी आसान हो गया है ऐसे विद्यालय महाविद्यालय शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पाती है या किसी कारण तबादला एक स्थान से दूसरे स्थान पर हो गया है, ऐसे समय विद्यार्थियों का कोई नुकसान हो इसके लिए राज सरकार और शिक्षा से जुड़ी हुई संस्थाओ एनजीओ के द्वारा वर्चुअल क्लासरूम की व्यवस्था करने का प्रयास किया जा रहा है।

वर्तमान समय में कॉम्पिटिशन एग्जाम की तैयारी हेतु कॉम्पटीशन सैंटरो ने अपने ऑनलाइन एप्स अनअकैडमी कोचिंग सेंटर ने अपने प्लेटफार्म उपलब्ध करवाए हैं, ताकि विद्यार्थी घर से बाहर गए बिना भी अपने घर में अपनी समय के अनुसार और योग्यता आधार पर घर पर ही कोचिंग क्लास ले सकता है, और अपने रोजगार को प्राप्त कर सकता है। आधुनिकता में कुछ वरदान हमको मिले है समय की बचत के साथ नयी-नयी चीजें भी सीखने को मिल रही है, लेकिन एक हद तो ठीक है इसका उपयोग अगर अपने हित के लिए कर रहे है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सोशल मीडिया और इंटरनेट अगर हम सभी सही उपयोग करें थो फायदेमंद है वर्ना इसके नुकसान भी बहुत ज्यादा है, ख़ासकर आजकल के युवक व युवती पर इसका बहुत गलत प्रभाव पड़ा है। कुल मिलकर आधुनिकता में कुछ वरदान हमको मिले है समय की बचत के साथ नयी-नयी चीजें भी सीखने को मिल रही है, लेकिन इसका सकारात्मक उपयोग करें तभी। एक हद तो ठीक है इसका उपयोग अगर अपने हित के लिए कर रहे है। कुल मिलकर यदि सोशल मीडिया का उपयोग बच्चे सही तरीके से अच्छे कार्यों के लिए करे वह भी केवल जरूरत के हिसाब से निश्चित समय के लिए तो ठीक है व फायदेमंद है। एक संरक्षक होने के नाते यह भी याद रखे की – इसकी लत छात्रों में ज्यादा लगती है यह छात्रों को सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। छात्रों की पढ़ाई, उनका जीवन सब दांव पर लग जाता है। वह पढ़ाई से मन चुराने लगते हैं। व्हाटस्एप्प, फेसबुक और इंस्टाग्राम छात्रों को सबसे ज्यादा भटकाता है। सोशल मीडिया जोखिम भी पैदा कर सकता है। आपके बच्चे के लिए, इन जोखिमों में शामिल हैं: अनुचित या परेशान करने वाली सामग्री, जैसे आक्रामक, हिंसक या यौन टिप्पणियों या छवियों के संपर्क में आना। अनुचित सामग्री अपलोड करना, जैसे शर्मनाक या उत्तेजक तस्वीरें या स्वयं या दूसरों के वीडियो।

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यह लेख (आधुनिकता वरदान या अभिशाप।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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जीवन में सफल कैसे हो?

Kmsraj51 की कलम से…..

How to be successful in life? | जीवन में सफल कैसे हो?

आप अपना कार्य बिना रुके व् बिना थके Continue जारी रखें। किसी भी कार्य को सफलता तक पहुचाने के लिए दृढ़ता से Continue कार्य जारी रखने से ही होता है। याद रखे…..

“आपको ना रूकना है, ना भागना है – बस चलते रहता है।”

मतलब अपने कार्य को बीच में छोड़ना नही है। अपने कार्य को बहुत ही धीमी गति से भी नहीं करना है और बहुत ज्यादा तेज गति से भी नहीं करना है। अपने कार्य को मध्यम गति से लगातार बिना रुके सच्चे मन से प्रतिदिन करना है। तब जाकर सफलता प्राप्त होगा।

हम अपने पैशन को प्रोफेशन तो बना लेते है लेकिन सफल क्यों नहीं हो पाते??

एक बात सदैव याद रखें – जब तक आप अपना कार्य शुरू नहीं करेंगे तब तक सफलता कैसे प्राप्त करेंगे? मतलब आपको सफलता प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम अपना कार्य शुरू करना होगा और पुरे तन – मन, धन व् संकल्प, शक्ति, समय के साथ करना होगा वो भी बिना रुके तब जाकर आप सफल होंगे।

  • सफलता उन्हें मिलती है – जो पुरे होशो-हवाश में लोगो का सहयोग लेते हुए आगे बढ़ते है। बिना रुके व बिना थके।

अगर आप वाकई में जीवन में सफल होना चाहते है तो नीचे दिए गए — लिंक पर क्लिक कर सभी आर्टिकल जरूर पढ़े और सफलता की तरफ अपना कदम बढ़ाये…….

  • अपने पैशन को प्रोफेशन में कैसे बदलें…?

  • अपनी पैशन की आग को जलाये रखें।

  • अपनी पैशन की अग्नि को जलाये रखें, पार्ट – 2

  • दृढ़ता से अपने पैशन को पूरा करें।

  • बेरोज़गारी की समस्या और समाधान।

♦ KMSRAJ51 ♦

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  • मुझे पूर्ण विश्वास है आपको सफलता तक पहुंचाने में ये आर्टिकल जरूर कारगर सिद्ध होंगी। “बेरोज़गारी की समस्या और समाधान।” वाले आर्टिकल में नीचे जिन आर्टिकल का लिंक दिया गया है उन आर्टिकल को भी जरूर पढ़े आपकी सफलता में सहयोगी बनेगी ये आर्टिकल …….

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दोहे – अंदाजे बयां।

Kmsraj51 की कलम से…..

Dohe – Andaze Bayan | दोहे – अंदाजे बयां।

नादानी की बात है, समझे न समझाये,
घर के अंदर की बात को, जन तक पहुँचाये।

ज्ञान उसे पिला तू, सच तो कड़वा घूँट,
सत्य बोलें सूली चढ़े, आंत पात सब झूठ।

तोड़ सके तो तोड़ दे, बंधन के हर तार,
कहते – कहते कह गये, जीवन है कारागार।

लूला – लंगड़ा हो गया, ‘परिमल’ इक मकान,
अँगना की भी आँख थी, किंवाड़ो के भी कान।

हुक्का भी आध पिये, चौथा रखें बुझाय,
जलते क्रोध को बेचकर, दाना-पानी खाय।

तेरा हूँ मैं खैर-ख्वाह, तू मेरा हमराज़,
बंधन का परिंदा सिखा दिया, जीने का अंदाज।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह दोहे (दोहे – अंदाजे बयां।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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रिश्तों के महत्व को समझें।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rishton Ke Mahatva Ko Samjhe | रिश्तों के महत्व को समझें।

घर की नई नवेली इकलौती बहू एक प्राइवेट बैंक में बड़े ओहदे पर थी। उसकी सास तकरीबन एक साल पहले ही गुज़र चुकी थी। घर में बुज़ुर्ग ससुर औऱ उसके पति के अलावे कोई न था। पति का अपना कारोबार था।

पिछले कुछ दिनों से बहू के साथ एक विचित्र बात होती। बहू जब जल्दी-जल्दी घर का काम निपटा कर ऑफिस के लिए निकलती ठीक उसी वक़्त ससुर उसे आवाज़ देते औऱ कहते बहू, मेरा चश्मा साफ कर मुझें देती जा। लगातार ऑफिस के लिए निकलते समय बहू के साथ यही होता। काम के दबाव औऱ देर होने के कारण क़भी कभी बहू मन ही मन झल्ला जाती लेकिन फ़िर भी अपने ससुर को कुछ बोल नहीं पाती।

जब बहू अपने ससुर के इस आदत से पूरी तरह ऊब गई तो उसने पूरे माजरे को अपने पति के साथ साझा किया। पति को भी अपने पिता के इस व्यवहार पर बड़ा ताज्जुब हुआ लेकिन उसने अपने पिता से कुछ नहीं कहा। पति ने अपनी पत्नी को सलाह दी कि तुम सुबह उठते के साथ ही पिताजी का चश्मा साफ करके उनके कमरे में रख दिया करो, फिर ये झमेला समाप्त हो जाएगा।

अगले दिन बहू ने ऐसा ही किया औऱ अपने ससुर के चश्मे को सुबह ही अच्छी तरह साफ करके उनके कमरे में रख आई। लेकिन फ़िर भी उस दिन वही घटना पुनः हुई औऱ ऑफिस के लिए निकलने से ठीक पहले ससुर ने अपनी बहू को बुलाकर उसे चश्मा साफ़ करने के लिए कहा। बहू गुस्से में लाल हो गई लेकिन उसके पास कोई चारा नहीं था। बहू के लाख उपायों के बावजूद ससुर ने उसे सुबह ऑफिस जाते समय आवाज़ देना नहीं छोड़ा।

धीरे-धीरे समय बीतता गया औऱ ऐसे ही कुछ वर्ष निकल गए। अब बहू पहले से कुछ बदल चुकी थी। धीरे धीरे उसने अपने ससुर की बातों को नजर अंदाज करना शुरू कर दिया और फ़िर ऐसा भी वक़्त चला आया जब बहू अपने ससुर को बिलकुल अनसुना करने लगी। ससुर के कुछ बोलने पर वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देती औऱ बिलकुल ख़ामोशी से अपने काम में मस्त रहती। गुज़रते वक़्त के साथ ही एक दिन बेचारे बुज़ुर्ग ससुर भी गुज़र गए।

समय का पहिया कहाँ रुकने वाला था, वो घूमता रहा घूमता रहा। छुट्टी का एक दिन था। अचानक बहू के मन में घर की साफ़ सफाई का ख़याल आया। वो अपने घर की सफ़ाई में जुट गई। तभी सफाई के दौरान मृत ससुर की डायरी उसके हाथ लग गई। बहू ने जब अपने ससुर की डायरी को पलटना शुरू किया तो उसके एक पन्ने पर लिखा था -“दिनांक 26.10.2019…. आज के इस भागदौड़ औऱ बेहद तनाव व संघर्ष भरी ज़िंदगी में, घर से निकलते समय, बच्चे अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं जबकि बुजुर्गों का यही आशीर्वाद मुश्किल समय में उनके लिए ढाल का काम करता है। बस इसीलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती थी तो मैं मन ही मन, अपना हाथ तुम्हारे सिर पर रख देता था क्योंकि मरने से पहले तुम्हारी सास ने मुझें कहा था कि बहू को अपनी बेटी की तरह प्यार से रखना औऱ उसे ये कभी भी मत महसूस होने देना कि वो अपने ससुराल में है औऱ हम उसके माँ बाप नहीं हैं। उसकी छोटी मोटी गलतियों को उसकी नादानी समझकर माफ़ कर देना। वैसे मेरा आशीष सदा तुम्हारे साथ है बेटा। डायरी पढ़कर बहू फूटफूटकर रोने लगी। आज उसके ससुर को गुजरे ठीक 2 साल से ज़्यादा समय बीत चुके हैं लेकिन फ़िर भी वो रोज़ घर से बाहर निकलते समय अपने ससुर का चश्मा साफ़ कर, उनके टेबल पर रख दिया करती है, उनके अनदेखे हाथ से मिले आशीष की लालसा में।

जीवन में हम रिश्तों का महत्व महसूस नहीं करते हैं, चाहे वो किसी से भी हो, कैसे भी हो और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं।

रिश्तों के महत्व को समझें और उनको सहेज कर रखें।

♦ संपादकीय ♦

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  • Conclusion — आज के इस भागदौड़ औऱ बेहद तनाव व संघर्ष भरी ज़िंदगी में, घर से निकलते समय, बच्चे अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं जबकि बुजुर्गों का यही आशीर्वाद मुश्किल समय में उनके लिए ढाल का काम करता है। जीवन में हम रिश्तों का महत्व महसूस नहीं करते हैं, चाहे वो किसी से भी हो, कैसे भी हो और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं। रिश्तों के महत्व को समझें और उनको सहेज कर रखें।

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