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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

श्रीगन्ध बयार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्रीगन्ध बयार। ♦

देखो आई श्रीगन्ध बयार रे,
किस दूरागत अनजान दिश से,
अलीयों की बहीर रे,
देखो आई श्रीगन्ध बयार रे।

असन्नद्ध आरस स्मित जोबन सिन,
मदिर शैया पर आसक्त बेजान।
कंपित कुसुमरेणु सा अवसन्न,
पसर गई विभावती चिकुरों की,
मंजरी भरी लर रे।

सार बूंदों का कोमल परस ले,
तिमिरारपु दग्ध फुलवा मुकुलों के,
बिखरा सौरभ का आलोक रे,
पल्लवन अबोध खड़ी सपनों की,
अमल वहती के कूल रे।

वनदेवी के नूतन वनांचल के अनुहार,
हिल रहा धरुण धवल शून्य तिमिर।
खुला धाराधर काल मिहिर-मयंक अनुहार,
कांत-निसर्ग प्राण बन कितने लुढ़क रहे।
क्षीर-वीर्य रे, देखो आई श्रीगन्ध बयार रे।

अर्थ: श्रीगन्ध = चंदन, अलीयों = भौंरा, बहीर = भीड़, कुसुमरेणु = केसर,
चिकुर = बाल(केश), वहती = नदी, धरुण = आग,
क्षीर-वीर्य = आत्मबल, परस = स्पर्श, स्मित = अधखिला पुष्प

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती है हरी-भरी प्रकृति के कारण ही हमारा जीवन इतना अच्छा सरल सुन्दर है। बहती नदी के पानी का कलकल की आवाज मन को सुकून देता है। प्रकति के बीच रहने पर चंदन सा सुगन्धित जीवन व आत्मबल भी तेज होता है। सदैव रंग बदलती यह प्रकृति हर पल मन को भाए, नभ में कभी बादल तो कभी नीला आसमां हो जाए, जो मन को भाये, रूप तेरा (प्रकृति) देख कर हर किसी का मन मोहित हो जाए। प्रकृति हमें सब से प्रेम करना सिखाए। सुन्दर पक्षियों की मधुर आवाज मन को सदैव ही प्रफुल्लित कर जाये।

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यह कविता (श्रीगन्ध बयार।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बहारों के दिन आ गये।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बहारों के दिन आ गये। ♦

देखो रे! बहारों के दिन आ गये,
कलिका बालाओं के रदों पर मधुकर गीत छाये।

अबोध वल्लरियों सार पनघट पर,
ले तरुणाई अंतर्घट हर्षित अंतर।

हँस रही अँखियों में अलसाई मधुल अनुराग भाये,
विपिन अमरी की रोमलताओं सी।

आनंदित हो उठी पर्ववल्ली दल इंदिरा श्री,
मीहिका कनों के धंधला कितने श्रम धूलिका लहराये।

कोरक कुंतल ने विभु लालसा से,
‘परिमल’ प्रसिद्ध प्रीति लज्जा से।

सौंदर्यांचल में मनोहर धुलि से मुक्तामणि बिखराये,
देखो रे! बहारों के दिन आ गये।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती है हरी-भरी प्रकृति के कारण ही हमारा जीवन इतना अच्छा सरल सुन्दर है। सदैव रंग बदलती यह प्रकृति हर पल मन को भाए, नभ में कभी बादल तो कभी नीला आसमां हो जाए, जो मन को भाये, रूप तेरा (प्रकृति) देख कर हर किसी का मन मोहित हो जाए। प्रकृति हमें सब से प्रेम करना सिखाए। सुन्दर पक्षियों की मधुर आवाज मन को सदैव ही प्रफुल्लित कर जाये।

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यह कविता (बहारों के दिन आ गये।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बुद्ध एक नाम नहीं भाव है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बुद्ध एक नाम नहीं भाव है। ♦

बुद्ध एक नाम नहीं भाव है,
जगत के लिए सत्य की राह है।

जिनके जीवन से सीख मिलती अपार है,
जहां धन वैभव का था भंडार।

सुख सुविधा का था बहार,
उस घर में भी लेकर जन्म।

न मिला मन की शांति,
छोड़ दिया घरबार।

ज्ञान की प्राप्ति लिए,
निकल पड़े वन की ओर।

जहां सुखाया तन,
रमाया साधना में मन।

पाया बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान,
बन गए महान।

त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति समान,
सत्य का कराया भान।

आज ही के दिन किया महापरिनिर्वाण,
बुद्ध पूर्णिमा है जिसका नाम।

बुद्ध एक नाम नहीं भाव है,
जिसे अपनाकर मिलता शांति बेहिसाब है।

“बुद्धं शरणं गच्छामि”
“धम्मं शरणं गच्छामि”
“संघं शरणं गच्छामि”

बुद्ध एक नाम नहीं भाव है।
जो जगत को दिखाता मार्ग तमाम है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बुद्ध अर्थात प्रेम, करुणा, शील, त्याग की ज्योति, जिन्होंने हर इंसान को आत्मा के सत्य गुणों व शक्तियों से अवगत कराया सरल शब्दों में। सच्चे सुख का अनुभव करवाया सभी को। धन व संपत्ति में सच्चा सुख नही है, सच्चा सुख क्या है इससे भी अवगत कराया सभी को। इस संसार के सुख से भी ऊपर भी ऊपर सच्चा आनंद क्या है इसकी भी अनुभूति गहराई से करवाया। बुद्ध जैसे अवतार का आगमन इस धरा पर 2000 से 3000 वर्षों एकाध ही होते हैं। आओ हम सभी मिलकर महात्मा बुद्ध द्वारा बताये गए मार्ग पर चलकर अपना व इस संसार का उद्धार करें।

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यह कविता (बुद्ध एक नाम नहीं भाव है।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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माँ की जय हो।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ की जय हो। ♦

तूने अपना नूर गवाया,
तब जा के हमें सृजाया।
पीड़ा सह कर हमें उत्पाया,
अपना दर्द सब अंदर छुपाया।
तेरी जय हो मां!

मल – मूत्र से हमें बचाया,
अपने मुंह का हमें खिलाया।
उंगली पकड़ कर चलना सिखाया,
तोतली जुबां को बतियाना बताया,
अपना दर्द सब अंदर छुपाया।
तेरी जय हो मां!

पाला – पोसा बड़ा बनाया,
सर्दी में गर्मी दी, धूप में छाया।
लकड़ी सी सूखा दी अपनी काया,
अरमान कुचल निज हमें पढ़ाया।
हमारी गलती पर भी हमें न सताया,
अपना दर्द सब अंदर छुपाया।
तेरी जय हो मां!

हांफते – कांपते तुझे वृद्धा -आश्रम पहुंचाया,
हमने जोरू संग गुलछर्रे उड़ाया।
बलिदान तेरा कभी याद न आया,
कितना कर खाती वह बूढ़ी काया?
तुझमें तो है करूणा सिंधु समाया,
सब के बाबजूद भी कुछ न बताया,
अपना दर्द सब अंदर छुपाया।
तेरी जय हो मां!

हम ढीठ है, एहसान फरामोश,
हमें रही न बचपन की होश।
तूने कैसे बड़ा किया था, हमें पाल-पोष,
कोई हमें गड़ाता निगाहें था तो,
दिखाती थी तू कैसा जोश?
जोरू की तिरेरी से ही डर गए हम,
है बड़ा ही यह अफसोस।
तू है कि अपने दर्द को,
रही है अंदर ही अंदर मां मसोस।
तेरी जय हो मां!

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य यही है इस संसार में माँ की जगह कोई और नहीं ले सकता हैं। माँ जब से गर्भवती होती हैं तभी से अपने बच्चे का ख्याल रखती है। जब जन्म होता है तभी से उसके लिए दिन रात एक कर उसका पूरा ख्याल रखती है, उसे पाल-पोष बड़ा करती हैं। कोई भी दुःख आये वह अपने बच्चे तक उस दुःख को पहुंचने भी नहीं देती हैं। माँ तो माँ होती है, एहसान फरामोश आज की पीढ़ी अपने माँ बाप का ख्याल ही नहीं रखती है। आजकल के युवा अपने जोरू का गुलाम इस कदर हो गए है की उसके कहने पर माँ बाप को वृद्धाआश्रम छोड़ आते है, वो ये भूल जाते है की माँ ने ही हमे जन्म दिया है और पाल-पोष कर बड़ा किया हैं। माँ की स्नेह भरी ममता को भूल जाते है।

—————

यह कविता (माँ की जय हो।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता, हेमराज ठाकुर जी की कविताएं। Tagged With: kavi hemraj thakur poems, motivational poem in hindi, poem on mother in hindi, poet hemraj thakur, प्रेरणादायक हिन्दी कविताएँ, माँ की ममता पर गजल, माँ की ममता पर शायरी, माँ की ममता स्टेटस, माँ की महिमा पर कविता, माँ पर कविता, माँ पर कविता और शायरी, माँ पर कुछ लाइन्स, माँ पर दो लाइन कविता, मोटिवेशनल कविता हिंदी में, हिंदी कविता संग्रह, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर की कविताएं

अन्तर ज्वाला धधक रही है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अन्तर ज्वाला धधक रही है। ♦

शल्थ हो चुकी है बाहर की लपटें,
फिर भी अन्तर ज्वाला धधक रही है।
हर गांव – गांव और शहर – शहर में,
नफरत की आग आज भभक रही है।

बहता विकार आज दरिया की मानिंद,
प्यार बरसाती नालों सा है सिकुड़ गया।
उड़ा रही है सब ईर्ष्या – द्वेष की आंधी,
रहा शेष कहां अब रहमो कर्म और दया?

भीगे चूनर से लालसा है नाचती,
ममता का घूंघट ही फाड़ दिया।
परहित का वर्चस्व है खत्म किया,
आज झण्डा स्वार्थ का गाड़ दिया।

मानव से छीन ली मानवता है सारी,
है शैतानियत का उसने शृंगार किया।
मदहोशी का है यूं आलम कुछ ऐसा,
मानो सबने है मादक मय पान किया।

कलकल बहती नदियों की भांति,
आज वितृप्त वासनाएं बहती है।
तृप्ति के भाव – प्रेम के सोते सूखे,
पतन की गाथा मानवता कहती है।

विकार की आंधी, वासनाओं की ब्यार से,
हर हृदय में अन्तर ज्वालाएं धधक रही है।
निरन्तर बरसते आधुनिक ज्ञान के मेघ पर,
कामनाओं की आग तब भी भभक रही है।

मालूम नहीं यह युग का प्रभाव है या,
है मानव की अक्ल पर पत्थर पड़े।
महफूज नहीं है आबरू बहु बेटी की,
पग पग पर है बहरूपिये लूटेरे खड़े।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — आज हर तरफ नफरत की आग आज भभक रही है, गांव – गांव और शहर – शहर में। विकार थो आज के समय में इस तरह से बढ़ गया है जैसे समुद्र हो, और सच्चा प्यार बरसाती के नालों सा है सिकुड़ गया। आज सभी एक दूसरे से ईर्ष्या – द्वेष कर रहे है, शील प्रेम और दया थो अब किसी के अंदर बचा ही नहीं। अब तो वह ममता का घूंघट भी नहीं रहा, आज सभी स्वार्थ के वशीभूत हो गए है। अब इंसान के अंदर मानवता बची कहा उसने तो शैतानियत का शृंगार जो कर लिया है। इस मदहोशी का आलम कुछ ऐसा, मानो सबने है नशीली शराब का पान किया हो। अब तो इस भयानक विकार की आंधी व वासनाओं की ब्यार से हर हृदय में अन्तर ज्वालाएं धधक रही है। आधुनिक ज्ञान के नाम पर ये कैसा बनता जा रहा है आज का इंसान, इनके कामनाओं की आग शांत ही नहीं हो रही है। हे मानव अब भी समय है सम्भल जा वर्ना कुछ भी नहीं बचेगा। हे मानव पुनः अपने प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता के अनुसार जीवन यापन कर।

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यह कविता (अन्तर ज्वाला धधक रही है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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माँ मेरी प्यारी माँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ मेरी प्यारी माँ। ♦

मेरी प्यारी माँ भगवान की अनमोल कृति है,
मेरी प्यारी माँ प्यार और त्याग की मूर्ति है।

सृष्टि का आधार मेरी प्यारी माँ है।
प्रकृति का अनुपम तोहफा माँ होती है।

माँ की आँचल छाया में हम सकूँन पाते है,
माँ शक्ति का अवतार और रूप है।

ममता और प्यार की अनवरत धारा,
मेरी प्यारी माँ है स्नेह और कोमल स्पर्श से थपकी।

देती मेरी प्यारी माँ है,
माँ ही हमें संघर्षों से लड़ना सिखाती है।

माँ हम आपके ऋणी है आपने हमें जन्म दिया है,
पाल पोसकर पढ़ाया, लिखाया, संस्कार दिए है।

माँ तुम रूप हो भगवान का जिसने ह्दय में स्थान दिया,
मेरी प्यारी माँ मातृत्व की अनमोल धरोहर है।

माँ जैसा अटूट रिश्ता संसार मे कोई नहीं है,
माँ के चरणों मे हम वंदन और अर्चन करते है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — माता शब्द में ‘मा’ का अर्थ है ममतामयी तथा ‘ता’ का अर्थ है तारक अर्थात तारनेवाली। माँ इस संसार रूपी भंवर से रक्षा करनेवाली होती है। माँ के स्मरण मात्र से ही एक भावभीनी सुगंध से मन का हर कोना-कोना महक उठता है, सुवासित हो उठता है। माँ के समान कोई भी प्रिय नहीं होता। माँ के कई रूप हैं – वह जननी है मातृ शक्ति है, अम्मा, माई भी है तो आई भी हैं। माँ का महत्व जीवन में क्या हैं उनसे पूछो जिनकी माँ नही हैं।

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यह कविता (माँ मेरी प्यारी माँ।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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उसका आशियाना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ उसका आशियाना। ♦

आज उसके जमीन पर पांव नही वो खुशी से बहक रही थी।
अपने बच्चों की आवाज़ से खुशबू जैसी महक रही थी॥

खुश भी क्यों न हो कुछ समय पहले मातृत्व का सुख उसने पाया।
उसको लगे ऐसे जैसे सारा संसार उसका हो आया॥

सारा दिन दोनो अपने बच्चों का पेट भरने के लिए भटकते।
दिन भर मेहनत की चक्की में वो पिसते॥

तब कही जाकर वो अपने नन्हें – मुन्नों का पेट भरते।
फिर मुँह में निवाला दे अपने बच्चों के संग प्रेम करते॥

पर ये सच ही कहा गया है कि …..

इस जमाने से दूसरों की खुशियाँ बर्दाश्त नही होती।
फूलों को कुचल कर क्यूँ राह में शूल बोती॥

एक दिन किसी जालिम ने अपने लिए उनका घर उजाड़ा था।
बेघर किया उनको उन नन्हें मासूमों ने किसका क्या बिगाड़ा था॥

जिन बच्चों का पेट भरने के लिए सामान वो लाये थे।
वो तो अब इस दुनिया को छोड़ कर हो गए पराये थे॥

उनके बड़े होने पर न जाने कितने अरमान सजाये थे।
पर उन्हीं आँखों में अथाह सागर जितने आँसू भर आये थे॥

चीत्कार कर उठा ह्रदय देख कर दृश्य ऐसा।
मातम फैल गया था उनके परिवार में एक ऐसा॥

अब वो फिर गिनती में चार से हो गए दो।
आँसू भी सूख गए थक गए उनके नैन रो॥

एक शून्य भाव से दोनों ही एक दूसरे को धीरज बंधा रहे थे।
फिर ऐसा लगे जैसे आसमान फिर पानी लेने जा रहे थे॥

उस घोसलें के तिनके उनके बच्चों की तरह ही इधर – उधर बिखरे थे।
पेड़ की सभी टहनियां और पत्ते अपनी बदहाली की कहानी कह रहे थे॥

क्योंकि किसी ने पेड़ों की कटाई कर बनाना अपना आशियाना।
पर पूछे उनसे क्यूँ – उजाड़ दिया तुमने हमारा घराना॥

तुम ही हमें बताओं कि हम परिन्दें कहाँ पर जाए।
अपना दुखड़ा हम किसको जाकर इस कदर सुनाए॥

हमने कब रोका तुम्हें, तुम अपना घर शौक से बनाओ।
पर हम बेजुबान के, आशियाने कहीं पर तो दे जाओ॥

हमारी इस दुखभरी पीड़ा को समझ लेना तुम सब।
हमारा सुंदर कलरव होगा तभी तुम्हारे बच्चों की खुशियाँ होगी सब॥

आओं हम इंसान समझे इन बेजुबान पक्षियों की पीड़ को।
जहाँ कहीं पर जगह मिले बनाये इनके नीड़ को॥

एक प्रेम अपने ह्रदय में इन परिंदों के प्रति भी जगाये।
दाना, पानी, घोंसला देकर इन्हें भी जीवन-दान दे पाए॥

अधिक से अधिक पौधों को इस धरा के गर्भ में रोप दे।
बचाये इस प्रकृति की सुंदरता को प्राकृतिक आपदाओं के प्रकोप से॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इंसान आधुनिकता और अपने ऐशो आराम के लिए इस कदर अंधा हो गया की उसने पक्षियों के लिए उनका आशियाना पेड़ तक को नहीं छोड़ा। अपने ऐशो आराम के लिए पक्षियों का घर उजाड़ता गया, एक बार भी उसने नहीं सोचा की इन बेजुबानों का भी इस प्रकृति व पृथ्वी पर पूरा हक़ हैं । ये प्रकृति व पृथ्वी केवल इंसानो का नहीं है, इन पक्षियों का भी हैं। अब भी समय हैं संभल जाओ और जितना ज्यादा हो सके प्रत्येक वर्ष पेड़ लगावो और उस पेड़ की तब तक देखभाल करो जब तक वह पेड़ अपना ख़ुराक पृथ्वी से खुद न लेने लगे। जब पेड़ होंगे तब पक्षियों उनका आशियाना मिल सकेगा और वो अपना घोसला बना सकेंगे पुनः, तब कही जाकर इन पक्षियों के मधुर आवाज फिर से सुनाने को मिलेंगे हम सभी को। आवो हम सब मिलकर ये संकल्प ले कि प्रत्येक वर्ष जरूर पेड़ लगाएंगे।

—————

यह कविता (उसका आशियाना।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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गर्मी की छुट्टी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गर्मी की छुट्टी। ♦

गर्मी की छुट्टियों का सबको इंतजार रहता था,
शाम को खेलना कूदना याद आता है।

खेलते थे दोस्तों के साथ मस्ती करते थे,
उन छुट्टियों जैसी ख़ुशी कहीं नहीं मिलती थी।

सब भाई बहन इकट्ठा होकर खूब मस्ती करते थे,
नानी के घर जाकर दूध मलाई खाते थे।

दोपहर में सब कैरम, लूडो, साँप सीढ़ी खेला करते थे,
शाम को सब लोग आइसक्रीम खाने जाते थे।

लस्सी, बेल का शरबत, छाछ बड़े मजे से पीते थे,
रात को नानी, दादी से कहानी सुना करते थे।

आज सब बड़े, बच्चे मोबाइल पर समय बिताते है,
पहले के समय में, आज बहुत बदलाव आया।

अब बच्चे मोबाइल और वीडयो पर गर्मी की छुट्टी बिताते है,
सब खेल बदल गए बच्चो के टीवी पर समय पास करते है।

सब कुछ बदला अब नये युग का जन्म हुआ,
गर्मी की छुट्टी के वो दिन कभी वापिस नहीं आएंगे।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — ये लंबी छुट्टीयां, स्कूल और अध्ययन से राहत दिलाती है। आराम करने, खेल का आनंद लेने और कुछ मजेदार और रचनात्मक गतिविधियों का अभ्यास करने का यह सबसे अच्छा समय होता है अपने दोस्तों और भाई बहनों के साथ। गर्मी की छुट्टी आनंद लेने, मस्ती औऱ आराम करने जैसे पर्याप्त मनोरंजक अवसरों को अपने साथ लाता है। लेकिन अब के समय में पहले जैसा वह खेलकूद और मस्ती भरी शरारतें कहाँ रही। अब तो सभी अपने-अपने मोबाइल में ही गेम भी खेलते है और मोबाइल पर ही समय बिताते हैं।

—————

यह कविता (गर्मी की छुट्टी।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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सुन ले पुकार चलो शिक्षा के द्वार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सुन ले पुकार चलो शिक्षा के द्वार। ♦

जीवन है अनमोल, नहीं है इसका कोई तोल,
बिन शिक्षा जीवन का, नहीं है कोई मोल।
शिक्षा से ही मिलता है जग में, मान और सम्मान,
इसी से मिलता है हमें, जीवन का हर ज्ञान।
शिक्षा बिन अधूरा, हम सब का जीवन,
अगर जीवन को बनाना है धारदार,
सुन लें पुकार चलो शिक्षा के द्वार॥

सारे काम छोड़कर, चलना है स्कूल,
गांठ ये बांध लो, होकर के कूल।
जीवन है अपना, जीना है सपना,
उन सपनों की भरने उड़ान।
शिक्षा ही है बस एक गहना, बात मेरी मान,
अगर जीवन को बनाना है धारदार,
सुन ले पुकार चलो शिक्षा के द्वार॥

ओ मछली पकड़ने वालों, ओ बिन मतलब,
भटकने वालों, बात अब ये मान लो।
शिक्षा के महत्व को पहचान लो,
जीवन संवर जायेगा, इससे नाता जोड़ लो।
शिक्षा का अधिकार मिला है, बात ये जान लो,
अगर जीवन को बनाना है धारदार,
सुन लें पुकार चलो शिक्षा के द्वार॥

सूबे सह राष्ट्र के सभी अभिभावकगण से,
आरजू विनती विवेक की है आज से।
जब शिक्षा ही घरद्वार तो फिर कैसी तकरार,
सारे काम छोड़कर, ज्ञान के मंदिर में बच्चों को खुद पहुंचाए जरूर।
हर हाल में बच्चों को भेजिए स्कूल, बिलकुल टेंशन भूल,
अगर बच्चे के जीवन को बनाना है धारदार,
सुन लें पुकार चलो शिक्षा के द्वार॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — शिक्षा मनुष्य के अंदर अच्छे विचारों को भरती है और अंदर में प्रविष्ठ बुरे विचारों को निकाल बाहर करती है। शिक्षा मनुष्य के जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है। यह मनुष्य को समाज में प्रतिष्ठित करने का कार्य करती है। इससे मनुष्य के अंदर मनुष्यता आती है। शिक्षा हमें विभिन्न प्रकार का ज्ञान और प्रैक्टिकल कौशल को प्रदान करती है। यह सीखने की एक निरंतर, धीमी और सुरक्षित प्रक्रिया है, जो हमें ज्ञान प्राप्त करने में मदद करती है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो हमारे जन्म के साथ ही शुरु हो जाती है और हमारे जीवन के साथ ही खत्म होती है। ज्ञान धन सदैव ही हमारी मदद करती है, चाहे परिस्थिति, काल व जगह कैसी भी हो। शिक्षा लोगों के मस्तिष्क को बड़े स्तर पर विकसित करने का कार्य करती है।

—————

यह कविता (सुन ले पुकार चलो शिक्षा के द्वार।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आओ मिलकर चलें स्कूल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आओ मिलकर चलें स्कूल। ♦

नन्हें नन्हें कदमों से,
चहलकदमी करते हुए।
प्रकृति की अनुपम बेला में,
भरकर चेहरे पर मुस्कान।
सपनों का संग करके ध्यान,
साथियों संग एक होकर।
सब कुछ जाओ तुम भूल,
आओ मिलकर चलें स्कूल॥

घर से निकले,
आशा संग उमंग लिए।
चारों तरफ बजती शिक्षा की धुन,
यही है इसका सबसे बड़ा गुण।
कुछ बनने की अब चली पवन,
साथियों संग एक होकर।
सब कुछ जाओ तुम भूल,
आओ मिलकर चलें स्कूल॥

चलो ज्ञान का दीप जलाएं,
मिलकर हमसब हाथ बढ़ाएं।
कदम से कदम मिलाएं,
एक एक कर संग हो जाएं।
शिक्षा का अलख जगाएं,
साथियों संग एक होकर।
सब कुछ जाओ तुम भूल,
आओ मिलकर चलें स्कूल॥

हेमा आओ, रानी आओ,
पुन्नू आओ, साक्षी आओ।
हम भी आएं तुम भी आओ,
संग मिलकर अब एक हो जाओ।
मीना मंच और बाल संसद संग,
सब मिलकर गाएं एक ही धुन।
स्कूल चले स्कूल चले स्कूल चले हम,
आओ मिलकर चलें स्कूल॥

जज्बा और विश्वास लिए,
कंधे पर बस्ते का बोझ लिए।
निकल पड़े होकर निडर,
पाने की चाहत ने आखिर।
दिया शिक्षा का अनुपम वरदान,
साथियों संग एक होकर।
सब कुछ जाओ तुम भूल,
आओ मिलकर चलें स्कूल॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — बचपन स्कूल और हम बच्चे व हमारा बचपन। बचपन का उमंग व जोश – उत्साह के साथ सबकुछ भूलकर नन्हें नन्हें कदमों से चहलकदमी करते हुए, प्रकृति की अनुपम बेला में भरकर चेहरे पर मुस्कान, सपनों का संग करके ध्यान, साथियों संग एक होकर, आओ मिलकर हमसब चलें स्कूल। कदम से कदम मिलाकर सत्यता का पाठ पढ़ने-पढ़ाने हम बच्चे मन के सच्चे अपने नन्हें नन्हें कदमों से चहलकदमी करते हुए आओ मिलकर हमसब चलें स्कूल।

—————

यह कविता (आओ मिलकर चलें स्कूल।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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