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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

पहाड़ी कबता।

Kmsraj51 की कलम से…..

Pahadi Kabata | पहाड़ी कबता।

हिमाचल मेरा देवताओं की धरती,
इंसानियत यहां के लोगों की कभी नहीं मरती।

जब लोगों ने की प्रकृति से ऐसी छेड़छाड़,
देखो आ गई हिमाचल में भी बाढ़।

उज्जड़ गए लोगों के ऐसे घर द्वार,
पड़ी प्रकृति की देखो ये कैसी मार।

अमीर गरीब का भेद हुआ खत्म,
सैलाब ने सब कुछ कर दिया भस्म।

लगे करने अब बाढ़ प्रभावितों की सेवा,
जय भी कहता है जरूर मिलेगा उनको जीवन में मेवा।

♦ लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी  – बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हिमाचल आदिकाल से ही देवताओं की धरती है, इंसानियत यहां के लोगों की कभी भी नहीं मरती है। जब-जब इंसान ने की प्रकृति से ऐसी छेड़छाड़ की है तब-तब देखो आ गई हिमाचल में भी भयानक बाढ़। उज्जड़ गए लोगों के ऐसे घर द्वार सब बेचारे बेघर हुए, पड़ी प्रकृति की देखो ये कैसी मार। इस प्राकृतिक आपदा के बाद अमीर गरीब का भेद हुआ खत्म, सैलाब ने सब कुछ कर दिया भस्म। जो भी बाढ़ प्रभावितों की सेवा करता, जय भी कहता है जरूर मिलेगा उनको जीवन में उनके कर्म का अच्छा मेवा। जय माता दी!

—————

यह कविता (पहाड़ी कबता।) “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल है। साहित्यिक नाम — डॉ• जय अनजान है। माता का नाम — श्रीमती कमला देवी महलवाल और पिता का नाम — श्री सुंदर राम महलवाल है। शिक्षा — पी• एच• डी•(गणित), एम• फिल•, बी• एड•। व्यवसाय — सहायक प्रोफेसर। धर्म पत्नी — श्रीमती संतोष महलवाल और संतान – शानवी एवम् रिशित।

  • रुचियां — लेखक, समीक्षक, आलोचक, लघुकथा, फीचर डेस्क, भ्रमण, कथाकार, व्यंग्यात्मक लेख।
  • लेखन भाषाएं — हिंदी, पहाड़ी (कहलूरी, कांगड़ी, मंडयाली) अंग्रेजी।
  • लिखित रचनाएं — हिंदी(50), पहाड़ी(50), अंग्रेजी(10)।
  • प्रेरणा स्त्रोत — माता एवम हालात।
  • पदभार निर्वहन — कार्यकारिणी सदस्य कल्याण कला मंच बिलासपुर, लेखक संघ बिलासपुर, सह सचिव राष्ट्रीय कवि संगम बिलासपुर इकाई, ज्वाइंट फाइनेंस सेक्रेटरी हिमाचल मलखंभ एसोसिएशन, सदस्य मंजूषा सहायता केंद्र।
  • सम्मान प्राप्त — श्रेष्ठ रचनाकार(देवभूमि हिम साहित्य मंच) — 2022
  • कल्याण शरद शिरोमणि सम्मान(कल्याण कला मंच) — 2022
  • काले बाबा उत्कृष्ट लेखक सम्मान — 2022
  • व्यास गौरव सम्मान — 2022
  • रक्त सेवा सम्मान (नेहा मानव सोसायटी)।
  • शारदा साहित्य संगम सम्मान — 2022
  • विशेष — 17 बार रक्तदान।
  • देश, प्रदेश के अग्रणी समाचार पत्रों एवम पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बारिश।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rain | बारिश।

बारिश की बौछार जब धरा पर पड़ती है,
गर्मी की तपन से सबको राहत मिलती है।

सूखी हुई फसल को अमृत सा मिल जाता है,
यह देखकर कृषक गदगद हो जाता है।

मुरझायी हरियाली को जैसे सिंगार मिल जाता है,
बारिश की बौछार से मन प्रसन्न हो जाता है।

खिले-खिले वन उपवन महकने लगते है,
छोटी-छोटी कपोलों से फूल खिलने लगते है।

बादल गरजते मोर भी नृत्य करने लगता है,
झम-झम नाचते सभी जंगल में रौनक लगती है।

गर्मी से सुकून भरा राहत मिलती है सभी को,
मिट्टी से आती सोधी खुशुबू से मन खिल जाता है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भारत में वर्षा ऋतु जुलाई महीने में शुरु हो जाती है और सितंबर के आखिर तक रहता है। ये असहनीय गर्मी के बाद सभी के जीवन में उम्मीद और राहत की फुहार लेकर आता है। हमारे देश में वर्षा ऋतु बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है इसका महत्व इसलिए अधिक बढ़ जाता है क्योंकि हमारे देश में अधिकतर किसान निवास करते हैं जिनका जीवन खेत और खेती पर निर्भर करती है। किसी को बरसात के मौसम में घूमना पसंद होता है, तो किसी को बरसात में भीगना अच्छा लगता है। वर्षा ऋतु के मौसम में पेड़-पौधों पर हरियाली की सुंदरता भी और बढ़ जाती है। बादल गरजते और मोर भी नृत्य करने लगता है, झम-झम नाचते सभी जंगल में रौनक लगती है।

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यह कविता (बारिश।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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निर्जीव से मोह।

Kmsraj51 की कलम से…..

Nirjeev Se Moh | निर्जीव से मोह।

समय की जरूरतों के हिसाब से,
एक निर्जीव चीज ने हर घर में,
प्रवेश ले लिया।

कुछ न होते हुए भी वो,
वो सब कुछ बन गया वो,
ऐसा मोहपाश दे दिया।

खा गया जो लोगों की भूख – प्यास,
अपनों से मिलने का प्यारा अहसास,
खुद से रिश्ता खास दे गया।

अखबार की उस खबर ने खो दिया होश,
जिसमें प्यारी बहना को भाई ने भर कर जोश,
मौत का ग्रास दे गया।

ये यंत्र जो आजकल की दुनिया पर हुआ भारी,
हर व्यक्ति को लगी इसकी भयानक बीमारी,
अपना नाम हर श्वास पर दे गया।

माना कि आधुनिकता की दौड़ में,
जरुरत इसकी जिंदगी के हर मोड़ पे,
ऐसा ये जोकर का ताश दे गया।

हम सजीवों पर क्यों हो रहा है इसका पहरा,
क्यों ज्यादा वक्त दिल निर्जीव मोबाइल पर ही ठहरा,
ये तन~मन का नाश दे गया।

निर्जीव को निर्जीव ही रहने दे हम,
प्यार सजीव रिश्तों से होने न पाए कम,
सजीवो से प्रेम ही जीने की आस दे गया।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जो जिवंत (सजीव) है प्यार उससे कभी भी कम ना हो ऐसा आदत होना चाहिए सदैव ही हम सबका। निर्जीव से मोह ठीक नही है, निर्जीव का उपयोग मात्र जरूरत तक ही सीमित रखें, निर्जीव के गुलाम ना बन जाये। आधुनिक युग में किसी भी टेक्नोलॉजी का उपयोग केवल अच्छे कार्य को करने के लिए करे। उसका कभी भी शैतानो की तरह दुरुपयोग ना करो। याद रखें – हर निर्जीव वस्तु के फायदे है तो उनसे नुकसान भी है, आप केवल फायदे के लिए सही तरीके से उपयोग करें, उसके गुलाम बनकर शैतान की तरह काम मत करो। इन निर्जीव वस्तुओं की वजह से आपसी प्रेम कम ना हो।

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यह कविता (निर्जीव से मोह।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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अपनी बला से।

Kmsraj51 की कलम से…..

Apni Bla Se | अपनी बला से।

सत्ता होती है बेकाबू तब तक,
जब तक जनता मदहोशी में सोती है।
इतिहास गवाह है धनवानों को कितनी,
पीड़ा गरीब और मजलूमों की होती है?

जनता जब जागेगी तो तभी सवेरा,
सत्ता भी तो तब काबू में आएगी।
यह गुड़ में जहर की शाजिस सत्ता,
जनता पर सदा – सदा ही आजमाएगी।

खामोश रह कर तो कोई बात न बनेगी,
मुद्दा तो जनता को अपना उठाना होगा।
लोकतन्त्र है भाई यह आजाद भारत का,
जनता को मत का बल तो दिखाना होगा।

हम करने चले हैं हुड़दंग ही बस नीरा,
मुद्दे की बात ही कहां कोई करता है?
जन सरोकारों की है चिन्ता ही किसको?
हर कोई निज स्वार्थ के खातिर लड़ता है।

देश डूबे तो वह अपनी बला से,
देश की किसको यहां चिन्ता है?
पक्ष – विपक्ष और जनता सबमें,
निज घोर स्वार्थ की ही हीनता है।

लाखों की लेते पगारें हैं अधिकारी,
फिर भी घूंस लेते भिखारी से फिरते हैं।
ठेकेदार को भी तो अपनी ही पड़ी है,
तभी तो पुल बनाते ही कई गिरते हैं।

जागो जनता गर जाग सको तो,
स्वार्थ की नींद को भगाना होगा।
वरना भ्रष्टाचार में डूबता देश है,
इसे मिलकर आज बचाना होगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भटकी हुई नव पीढ़ी को फिर से राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ाना होगा, हर भारत वासी को अपने मत की शक्ति को समझना होगा। अपने निज स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र के हित में कदम उठाना होगा, ये आज़ाद भारत है भाई तुम्हें सही मांग के लिए आवाज उठाना होगा। जो गलत है उसको सबक सिखाने के लिए हम सबको आवाज तो उठाना होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सभी को मिलकर आवाज उठाना होगा। जागो जनता गर जाग सको तो, और स्वार्थ की नींद को भगा कर राष्ट्र हिट में अपने मत की शक्ति का सही प्रयोग करो तुम। मुफ्त के चक्कर में बिकना नही तुम वर्ना तुम्हारा अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा, अब भी समय है जग जाओ, नहीं तो पछतावोगे।

—————

यह कविता (अपनी बला से।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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पुनः सनातन लाना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Punah Sanatan Lana Hoga | पुनः सनातन लाना होगा।

आओ मिलकर बीजते हैं बीज,
इस धरती पर सनातन का।
भटकी हुई नव पीढ़ी को फिर से,
पढ़ाते हैं पाठ पुरातन का।

जहां थी मान मर्यादाएं घनी,
अभाव में भी संतोषी आत्म था।
इस मानव समाज के बच्चे-बच्चे में,
कूट – कूट के अध्यात्म था।

सम दृष्टि थी हर मानव की,
दिखता हर घट में परमात्म था।
तन – बदन में शालीन वस्त्र थे,
सामाजिक नियम पुरातन था।

न जाति थी, न धर्म थे कोई,
न ही नर-नारी में कोई लड़ाई थी।
पूरी धरती शान्ति से,
वसुधैव कुटुंबकम के भाव में समाई थी।

दुरात्म भाव ने आ के धरा पर,
मानव से मानव लड़ाया था।
सुख – शान्ति, चैन और भाईचारा,
हम सबसे दूर भगाया था।

दुरात्म भाव को दूर भगाओ,
पाठ यह सबको पढ़ाना होगा।
अंध आधुनिकता को कर के पीछे,
पुनः सनातन लाना होगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भटकी हुई नव पीढ़ी को फिर से पढ़ाते हैं पाठ पुरातन सनातन संस्कृति का जिससे सभी मानव जन्म को सार्थक बना सके। सनातन में न जाति थी, न धर्म थे कोई, न ही नर-नारी में कोई लड़ाई थी। पूरी धरती शान्ति से वसुधैव कुटुंबकम के भाव में समाई थी। पुनः सनातन लाना होगा। इस मानव समाज के बच्चे-बच्चे में कूट – कूट के अध्यात्म था। सनातन की उत्पति – सनातन किसी एक लेखक या दार्शनिक या किसी ऋषि के विचारों की बस उपज नहीं है, यह तो अनादि काल से प्रवाहमान और विकासमान रहा। विश्व के सभी धर्मों से सबसे पुराना सनातन धर्म है। मान्यता है कि वैदिक धर्म जिसमें परमात्मा को साकार और निराकार दोनों रुपों में पूजा जाता है । ये वेदों पर आधारित धर्म है।

—————

यह कविता (पुनः सनातन लाना होगा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद।

Kmsraj51 की कलम से…..

Novel Samrat Munshi Premchand | उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद।

हिंदी और उर्दू के महानतम,
भारतीय लेखकों में, जिसने,
हिंदी साहित्य का प्रकाश फैलाया।
नमन मुंशी प्रेमचंद जी को,
जिनका नाम इस लेखनी में,
उच्च शिखर पर आया।

लेखनी में अपनी जिसने,
एक आम आदमी के,
हर वर्ग के दुखों को समेटा।
हर दृष्टि से पारिवारिक, सामाजिक,
राजनैतिक पहलुओं को साहित्य में लपेटा।

लेखक प्रेमचंद अपनी कथाओं,
कहानियों में खुद ही पात्र बनाए।
तभी आज भी वो अपनी कथा,
कहानियों में जीवंत नजर आए।

दलित, किसानों, गरीबों का,
लेखक मसीहा बनकर आए।
कल्पना नहीं कोई, सीधे ही,
दिल की भावनाओं से जुड़ जाये।

साहित्य में मुंशी प्रेमचंद ने,
हिंदी और उर्दू की पताका है लहराई।
लोकनाट्य व नौटंकी को दोबारा,
स्थापित करने में अहम भूमिका है निभाई।

वो तो आधुनिक हिंदी,
कहानी के पितामह कहलाये।
अपनी लेखनी से, उपन्यास सम्राट,
की उपाधि से सज आये।

साहित्य के मील का पत्थर भी,
महान सम्राट प्रेमचंद जी कहलाये।
उनको शत-शत नमन करके,
आओं, हम उनके साहित्य मील का,
एक सूक्ष्म कंकड़ ही बन जाये।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्रेमचंद का जन्म वाराणसी के निकट, लमही नाम के गांव में 31 जुलाई, 1880 को हुआ था। प्रेमचंद के पिताजी मुंशी अजायब लाल और माता आनन्दी देवी थी। मुंशी प्रेमचंद जी का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। इन्होंने अपने प्रिय मित्र मुंशी दयानारायण निगम के सुझाव पर अपना नाम धनपतराय की जगह प्रेमचंद रखा और इसी नाम से कहानियों और उपन्यासों के रूप में अपने विचारों और भावों को अभिव्यक्ति दी। उन्होंने सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास तथा कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनमें से अधिकांश हिन्दी तथा उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुईं। प्रेमचंद को मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जाता है जो कि एक सचेत नागरिक, संवेदनशील लेखक और सकुशल प्रवक्ता थे।

—————

यह कविता (उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बदरा को आमंत्रण।

Kmsraj51 की कलम से…..

Invitation To Clouds | बदरा को आमंत्रण।

दे दी हमने झुके विकल नैनों से,
आमंत्रण घनेरे जल भरे बदरा को।
बढ़े कदमों को रोकने लगे,
धूमिल अर्दित विगत जीवन दर्पण में।

साँझवाती से अँगना में,
सुहागन बनी रात घनेरी।
प्राण – प्रिये को सम्मुख पाकर,
छलक पड़ी निर्मोही आँखों में।

नम पलकों पर आकर बिखर गई,
न जाने कितनी झूठी कसमें।
सिमट गई शर्वरी के पहरों से,
मीलों लम्बी दूरी जुग सहमों में।

पल भर को भूल गईं साँसें भी,
पैरों में बँधी इस मजबूरी को।
बहका जीवन लगा सिसकने,
सहसा आकर गुम यादों में।

मौन समर्पण की ज्वाला में,
द्रवित हुई कामनाशक्ति हमारे।
उद्बोधित उर के भाव बावरे,
पी लूँ पहले अपने अश्रु हमारे।

भुलाने को आये हैं ये सारे,
धर नये रूप चितवन के उसने।
आते – जाते हर इक मोड़ पर,
निज चित्त विश्वास को खोए हमने।

राहों पे लगते हैं इसलिए,
अपने भी साये पराये से।
और जलता है मेरा तन-मन,
पाकर आमंत्रण नयनों से।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (बदरा को आमंत्रण।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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अहंकार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Ego | अहंकार।

मतभेद तो होगा मेरे भाई,
पर संवाद होना चाहिए।
न तेरी जुबान बंद रहे न मेरी,
हर हाल में वार्तालाप होना चाहिए।

त्याग कर अहंकार, खटखटाते रहो,
खोल दो बंद दिल के दरवाजे।
कुछ हो या ना हो, सोचों मत,
आत्मीयता का एहसास होना चाहिए।

न तेरी जुबान बंद हो, ना मेरी,
हर हाल में वार्तालाप होना चाहिए।
चुप रहने की आदत छोड़ दो,
मन की बात कहना अनिवार्य होना चाहिए।

न तेरी जुबान बंद रहे, ना मेरी,
हर हाल में वार्तालाप होना चाहिए।
अहम है जहर, दिलों के बीच में न आ जाए,
रिश्ते बड़े नाजुक हैं।

बचाने का प्रयास होना चाहिए,
न तेरी जुबान बंद रहे, ना मेरी।
हर हाल में वार्तालाप होना चाहिए,
आ रही दिवाली एवं चित्रगुप्त पूजा।

गले मिलकर, त्यौहार मनाने का,
दिल से विचार होना चाहिए।
न तेरी जुबान बंद रहे, ना मेरी,
हर हाल में वार्तालाप होना चाहिए।

मुझसे कोई भाई रूठ ना जाए,
अपनों का साथ छुट ना जाए।
मनाने का रिवाज होना चाहिए,
न तेरी जुबान बंद रहे, ना मेरी,
हर हाल में वार्तालाप होना चाहिए।

दिल की तमन्ना तुम क्या जानो,
हर भाई के चेहरे पर मुस्कान होना चाहिए,
हर हाल में वार्तालाप होना चाहिए।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अहंकार को त्यागकर आपसी प्रेम सद्भाव बना रहे, सभी मिलजुलकर एक दूसरे की मदद करें। याद रखें — अहंकार की वजह से जीवन की ऊर्जा एक निश्चित स्तर पर ठहर जाती है। अहंकार न उर्जा को घटने देता है न बढ़ने देता है। क्योंकि, ऊर्जा के घटने या बढ़ने में उसे अपना नाश नजर आता है। अहंकार तन, मन, बुद्धि और भावना, सब जगह जकड़न पैदा करता है।

—————

यह कविता (अहंकार।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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तुम क्या हिन्द बनाएंगे।

Kmsraj51 की कलम से…..

Tum Kya Hind Banaenge | तुम क्या हिन्द बनाएंगे।

अंग्रेजी को बढ़ावा देने वालो, तुम क्या हिन्द बनाएंगे?
तुम्हारी रग-रग से वाकिफ हम, पछुआ रीत बढ़ाएंगे॥

हिन्दुस्तान में रह कर जो भी, हिन्दी की बात चलाएंगे।
राष्ट्र हित के रथ को असल में, वही ही सही चलाएंगे॥

अब जाग चुका है हर भारतवासी, कितना बुद्धू बनाएंगे?
हिन्दी में कर भाषण अपना, अंग्रेजी का जाल बिछाएंगे॥

वे चले गए हैं सैंतालीस के, जिनकी भाषा तुमको प्यारी है।
पचहत्तर सालों में न भूले उनको, वाह! जी कैसी यारी है?

अब तो छोड़ो मोह पछुआ से, राष्ट्र की बात को आगे करो।
जाति धर्म के बिखरे मानकों में, प्रेम – एकता के धागे भरो॥

भाषा वैविध्य का लाभ उठाकर, भारत को न परेशान करो।
राम कृष्ण की जाया भूमि, इस पर कुछ तो एहसान करो॥

संस्कृति सभ्यता की लुटिया डुबाने में, न यारो सहयोग करो।
निज राष्ट्र का गौरव उन्नत कर, राष्ट्र की रीत का भोग करो॥

मौंसी के घर की ठाठ में खोकर, मां का यूं न तिरस्कार करो।
मां तो मां ही होती है जी, कुछ तो लाज शर्म स्वीकार करो॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — राष्ट्र धर्म ही हमारे लिये तो सर्वोपरि है। राष्ट्र आराधना सबसे बड़ी ईश भक्ति है।। राष्ट्र धर्म से हमारी तो सांसे चल रही है। अंग्रेजी को बढ़ावा देने वालो भला तुम सब क्या हिन्द बनाएंगे? हम सब तुम्हारी रग-रग से वाकिफ है, तुम आगे भी पछुआ रीत बढ़ाएंगे। हम सभी अब जानते है की हिन्दुस्तान में रह कर जो भी, हिन्दी की बात चलाएंगे, असल में राष्ट्र हित के रथ को वही सही चलाएंगे। अब जाग चुका है हर भारतवासी, कितना बुद्धू बनाएंगे? हम सभी को, अब हिन्दी में कर भाषण अपना, अंग्रेजी का जाल बिछाएंगे। कितनी शर्म की बात है वे तो चले गए हैं सैंतालीस के ही, जिनकी भाषा तुमको अभी तक प्यारी है। पचहत्तर सालों में न भूले उनको, वाह! जी कैसी यह यारी है? अब तो छोड़ो प्यारे मोह पछुआ से और राष्ट्र की बात को आगे कर, जाति धर्म के बिखरे मानकों में, प्रेम – एकता के धागे भरो व आगे बढ़ो। भाषा वैविध्य का लाभ उठाकर, भारत को न परेशान करो। राम कृष्ण की जाया भूमि, इस पर कुछ तो एहसान करो तुम। संस्कृति सभ्यता की लुटिया डुबाने में, न यारो सहयोग करो और निज राष्ट्र का गौरव उन्नत कर, राष्ट्र की रीत का भोग करो प्यारों।मौंसी (अंग्रेजी) के घर की ठाठ में खोकर, मां का यूं न तिरस्कार करो। मां तो मां ही होती है जी, कुछ तो लाज शर्म स्वीकार करो। जय हिन्द!

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यह कविता (तुम क्या हिन्द बनाएंगे।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बरखा बहार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Barkha Bahar | बरखा बहार।

बीत रहे पलछिन के तौर तरीके,
आने वाले आज की पहली फुलबहारें।
घटा छटा घिर-घिर आ रही,
मन की चंचलता को प्रतिपल बढ़ा रही है।
पुरवा पवन की दुहाई है,
पछवा बयार की अब विदाई है।

अंब पावस का गली-गली डंका बज रहा,
शम्पाओं का शोर है सुदामन का जोर है।
पयोजन्मा की वाहिनी आगे-आगे है,
श्वेत – श्याम और काले-काले हैं।
रिझते हैं कहीं-कहीं और कहीं निराले हैं,
कहीं क्षत्रप की तरह छा जाते।

एक टुकड़ी आती गरज-बरस कर जाती,
दूसरी वाहिनी बना छावनी गोले अंब का बरसाती।
आते जाते फिर घूम कर चले आते,
सिंगार सजा चंचला दामिनी का।
निहार-निहार विहार कर देखते सूने आँगन का,
चलती जैसे पवन की परछाँईं।

अक्षित करते पुष्कर ताल तलैईया के,
मेघराज गरज – गरज कर धरणि का।
पल-पल अपने आभा का रूप दिखला कर
बदली में फिर कहीं छुप जाते।
हँसकर मुँह चिढ़ाते तपन की,
इठलाते हर्षाते दूर क्षितिज पर।

कभी कुम्हलाते कभी खिल-खिल जाते,
ये बरखा के बादल पल भर में,
उमस गर्मी को दूर भगाते।
नवयौवना से मचल कर चलते,
अँगड़ाई ले-लेकर मन की अगन बढ़ाते।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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दो वक्त की रोटी।

उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार।

योग दिवस – 2026

निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

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