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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

घोर कलयुग है आ गया क्या?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ घोर कलयुग है आ गया क्या? ♦

नेता है लेते लुत्फ सत्ता का, अधिकारी बने सहयोगी है।
भ्रष्टाचार और महंगाई हर राज में, जनता ने ही भोगी है।

यह पैट्रोल बढ़ा यह डीजल बढ़ा, यह तो बात पुरानी है।
सरकारी तन्त्र में भ्रष्टाचार की, सबको मालूम कहानी है।

बदसलूकों की महफिल में, शराफत की बात बेईमानी है।
नीचे से ऊपर ये सारे मिले हैं, किससे आवाज उठानी है?

खरीद तंत्र घोटाला, भर्ती घोटाला, सिर से ऊपर पानी है।
सब्सिडी लेती जनता भी देखो, हो गई कितनी शाणी है?

दुर्दशा देश की होती है तो होए, सबको अपनी चिन्ता है।
महा स्वार्थ के इस दौर में, हर मानव में कितनी हीनता है?

पंचायत से घोटाले संसद तक, जांच एजेंसियां भी डूबी है।
न्यायालयों के दरवाजों के आगे, विलम्ब की झाड़ उगी है।

गरीब जाए तो किधर को जाए? चारों ही ओर तो अंधेरा है।
वोट की चोट से हर राज है बदला, सबमें लुटेरों का डेरा है।

हम सब जानते सचाई पर जाने, कैसे इस आग में जिंदा है?
इसी में ढलना मजबूरी है सबकी, इस बात से मैं शर्मिंदा है।

घोर कलयुग है आ गया क्या? हर ओर जो आपाधापी है।
ऐसा है लगता, देखता हूं, इन्साफ की चौखट में बेइंसाफी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — नेता बड़े मजे से सत्ता का आनंद ले रहे है, उनको जनता की फिक्र ही नहीं है। पंचायत से लेकर संसद तक सब तरफ घोटाला ही घोटाला हो रहा है, क्या नेता क्या अधिकारी सबके सब मिले हुए है। खरीद तंत्र घोटाला, भर्ती घोटाला, सिर से ऊपर पानी है। सब्सिडी लेती जनता भी देखो, हो गई कितनी शाणी है? किसी को भी देश की चिंता नहीं है, दुर्दशा देश की होती है तो होए, सबको अपनी चिन्ता है। महा स्वार्थ के इस दौर में, हर मानव में कितनी हीनता भर गई है? पंचायत से घोटाले संसद तक, जांच एजेंसियां भी इनमें डूबी है। न्यायालयों के दरवाजों के आगे खड़े बेचारे, विलम्ब की झाड़ उगी है।

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यह कविता (घोर कलयुग है आ गया क्या?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नववर्ष का आगाज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नववर्ष का आगाज। ♦

आओ! करें नमन नववर्ष का,
भूल पुरानी यादों के समंदर को।
मना ले नवल का त्यौहार,
मिलजुल झूमे गीत गाए।

भूले दुःख-दर्द बीते वर्ष के,
माफ करे दिए कष्ट जिन्होंने।
इस नववर्ष की बेला पर,
बना लेते हैं शत्रु को भी मित्र।

चलेंगे संग में पुराने सखा,
भुला देंगे दुःख भरी यादों को।
अपनों का आशीर्वाद साथ में,
नववर्ष को लगा लो गले।

शीत-ऋतु की ठंड में करें आगाज,
मन के मतवाले बन छा जा जग में।
एक-दूजे का साथ निभा ले दोस्ती,
आलस त्याग संघर्ष को लगाओ गले।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — नया साल नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य और नए आइडियाज की उम्मीद देता है, इसलिए सभी लोग खुशी से इसका स्वागत करते है। ऐसा माना जाता है कि साल का पहला दिन अगर उत्साह और खुशी के साथ मनाया जाए, तो पूरा साल इसी उत्साह और खुशियों के साथ बीतेगा। हालांकि हिन्दू पंचांग के अनुसार नया साल 1 जनवरी से शुरू नहीं होता।

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यह कविता (नववर्ष का आगाज।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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वो आ गया।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वो आ गया। ♦

हर शह उसके आने की खबर सुनाए अब,
सिर्फ महसूस किया न जाने देखा कब।

बड़े जोश से होती उसके आने की तैयारी,
सबसे ज्यादा चीजों की लोग करे खरीददारी।

हल्की-हल्की मीठी ठंड से होता आगाज,
धीरे~धीरे धूप और छाया का सजे साज।

छोटे~छोटे पैरों से चलता हुआ आता ये अब,
क्यों इसे देख घरों में छुपने लगे है सब।

गली से शहर तक के नुक्कड़ हुए है खाली,
इसने चादर ओढ़ी एक श्वेत परत वाली।

बचपन से निकलकर यौवन इस पर आया,
इस पर कोहरा~धुंध का खुमार भी छाया।

बड़े~बूढ़े सबके हाथ~पैर कर दिए इसने सुन्न,
जब बजाए ये शीत लहर की बर्फीली धुन।

अरे! हां मैंने तो लिखी है सर्दी के मौसम की बात,
जिसको केवल सूर्य की गर्मी ही दे सकती मात।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — उत्तर भारत में सर्दी से मुख ऐसा मोड़ा सुनहरी धूप ने की अब ठंडक में ढल गया है पूरा दिन और रात सिर्फ एक ही रूप में महसूस हो रहा। अभी बस कुछ ही दिन से ही ठंडक ने अपना अहसास कराया व आसमां से लेकर धरा तक सफेद धुंध की चादर को फैलाया है। किट-किट करके बजते दांत सर्दी में जम जाते हाथ; ऊनी स्वेटर भाये तन को गरम चाय … सर्दी आई, सर्दी आई, ठिठुरन अपने संग लाई, तापमान गिरता झर-झर, ठंडी हवाएं चलती सर-सर, … इस ठिठुरन से केवल सूर्य की गर्मी ही कम कर सकती है। शरद ऋतु के दौरान सभी जगहों पर बहुत अधिक ठंड लगती है। शरद ऋतु के चरम सीमा के महीनों में वातावरण का तापमान बहुत कम हो जाता है। पहाड़ी क्षेत्र (घरों, पेड़ों, और घासों सहित) बर्फ की सफेद मोटी चादर से ढक जाते हैं और बहुत ही सुन्दर लगते हैं। इस मौसम में, पहाड़ी क्षेत्र बहुत ही सुन्दर दृश्य की तरह लगते हैं। शीत ऋतु का महत्व​​ सर्दी के मौसम स्वास्थ्य का निर्माण करने का मौसम होता है हालाँकि पेड़-पौधों के लिए बुरा होता है, क्योंकि वे बढना छोड़ देते हैं।

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यह कविता (वो आ गया।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जरूरत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जरूरत। ♦

मेरे दोस्त, तुम्हारी नजरें गर पाक है,
तो कसम खुदा की, पर्दे की जरूरत नहीं।
काले – काले बादल को गर बरसना है,
तो उसे गरजने की जरूरत नहीं।

बेइंतहां मुहब्बत करते हो अगर,
तो इज़हार क्यूं नहीं करते।
मेरे दोस्त मुहब्बत छुपाए नहीं छुपती,
इसे छुपाने की जरूरत क्या है।

चाहे रहो भौंरा या गिद्ध बन जाओ,
गर तेरे खून में फितरत है शिकार करने की,
तो इस सैयाद को डरने की जरूरत क्या है।
तुम्हारी आंखें ही काफी हैं रमजा के लिए,
बोलने की जरूरत क्या है।

मैं तेरी ख़ामोशी समझता हूं, मेरे दोस्त,
कुछ भी बोलने की जरूरत क्या है।
सच बोलना और लिखना मेरी फितरत है बुरी,
अंजाम से डरता नहीं, कभी विचार करता नहीं।

नाज़ है तुझपे, तेरे जैसा होशियार तो नहीं,
रहता हूं जमीन पर, पर जमींदार नहीं।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सच्चा प्यार एक-दूसरे के लिए एक मजबूत, गहरा और स्थायी स्नेह है। यह किसी के लिए गर्मजोशी और देखभाल की भावना है, और उन्हें खुश करने की इच्छा है। सच्चे प्यार में आपसी सम्मान, विश्वास और निस्वार्थता की भावना के साथ-साथ एक-दूसरे के लिए त्याग करने की इच्छा शामिल है। यह एक ऐसा प्यार है जो बिना शर्त है, जिसका अर्थ है कि यह एक-दूसरे के कार्यों या भावनाओं पर निर्भर नहीं है, बल्कि स्वतंत्र रूप से और बिना शर्त के दिया जाता है। सच्चा प्यार एक दुर्लभ और खास चीज है, और यह उन लोगों के लिए बहुत खुशी और खुशी ला सकता है जो इसका अनुभव दिलसे करते हैं।

—————

यह कविता (जरूरत।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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मिले न मुझको सच्चे मोती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मिले न मुझको सच्चे मोती। ♦

वन शहर गाँवों में ढूँढ़ा मैनें,
खोजा सागर – तल की गहराई में।
बहुत मिले जन लोग – लुगाई,
पर मिले न मुझको सच्चे मोती।

सिंधु शहर में कोलाहल था,
थलचर जलथल में उछल रहे थे।
इक – दूसरे को निगल रहे,
सगे-संबंधी जीवन से खेल रहे थे।
निज स्वारथ के मनन का,
गठरी दिखी चिंतायें ढोती।

उलझे – उलझे जीव जनावर थे,
चिकनी – चिकनी संवादों में।
भागम – भाग दौड़ लगाती थी,
समर सिंधु के रहने वालों में।
खुद अपने में ही खोई थी,
हर प्राणी की जीवन – ज्योति।

खोज रहा था मैं भव-सुदामन से,
सुनहली चमकीली नग निकाली।
परन्तु सभी पाहन छलिया थी,
रूप – रंग से छलने वाली।
उद्विग्न – घायल आस रह गई,
मन सँजोती सपन धीरज खोती।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (मिले न मुझको सच्चे मोती।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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शोर मचाती जब-तब।

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♦ शोर मचाती जब-तब। ♦

गा रहे पल हरदम,
गुनगुनाती सी शाम है।
उजाले में कशमशा कर,
मचाती शोर जब-तब।

दूर किसी झरोखे से झाँक,
देख रही सदा ये जिंदगी।
कानों में आ-आकर,
कहती कथा कोई पुरागी।

रहती ओट में सदा,
लुक-छिपकर कोलाहल करती है।

अंत:करण की मूक आवाजें,
कलरव करती साँसों में।
थम-थम सी जाती धमनियों को,
चेता जाती आती-जाती आहों में।

खामोश रहती चुपचुप,
गुमसुम-सी चंचल रहती है।

झुरमुट की झँझरी छिदी-छिदी,
झरझर हो गई प्रत्याशा।
क्षणभंगुर-सा जीने को,
राग वेदना गाती शाशा।

सरगम के सुर-तालों में,
वेदना व्यथा बतलाती है।

नोट: शाशा – मनमुख(मन), पुरागी – दफन।
(ये शब्द मैनें कबीलाई भाषा से ली है।)

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सूना-सूना दूर गगन है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सूना-सूना दूर गगन है। ♦

प्रेम के धागे टूटे, टूटा रक्त का संबंध,
बोलते मुखड़े पर, सूना-सूना दूर गगन है।

रुनझुन गाती भोर है,
दालान की साँझ सुहानी।
कच्ची गलियाँ गाँवों की,
बन गई बिसरी कहानी।
घनी छाँव पीपल की,
ढूँढ़ता श्रापित मन है।

रसभरी अमराईयों की,
वेदना प्राणों में जन्मती।
रह गये आँखों में अश्रु अकेले,
खोजती अँखियां नेह प्रीति।
हाय! बेचैनियाँ अधरों पर,
मोह यादों की चुभन है।

रहा मानस के जंगल में,
पहन स्वांगों के मुखौटे।
हर दिन ताजा चोट लेकर,
किंवाड़ पीछे साँझ लौटे।
कुहासों में घुली साँस है,
घावों की थकन पाँव में है।

निरर्थक सी जिंदगी को,
जी रही गुमसुम उदासी।
श्याम-शित पन्थों पर भटकती,
पी कोलाहल की आशा प्यासी।
अनुरक्ति में कसमसाता वह,
आज तक लड़कपन है।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (सूना-सूना दूर गगन है।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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शिक्षा – सुन्दरता और सम्मान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षा – सुन्दरता और सम्मान। ♦

आज आधुनिकता के दौर में शिक्षा का गुणांक अच्छे अंक प्राप्त करना, सुन्दरता का मापदंड बाह्य रंग रूप तथा सम्मान का मानक पैसा हो गया है। यही पश्चिम की सोच थी कि भारतीय लोग अपनी संस्कृति के परम भाव से बाहर निकल जाए। ताकि उनकी सुरक्षात्मक आधारभूत विश्वास और नैतिकता प्रिय शक्ति टूट जाए और वे विदेशी भीरू और बेशर्म संस्कृति के गुलाम बन जाए।

आज रटा और सटा सिस्टम की शिक्षा पद्धति भारत में हावी हो गई है। या तो छात्र रटा मार कर परीक्षा पास कर देते हैं और अच्छे नम्बर ले आते हैं, समझ भले ही उस विषय की उन्हे हो या न हो। या फिर MCQ में सटा यानी तुका लगाकर अंक प्राप्त करते हैं।फिर बड़े खुश होते हैं कि देखो क्या जजमेंट है हमारी। न जाने क्यों शिक्षाविद यह आंकड़ों की शिक्षा प्रणाली निरन्तर हावी किए जा रहे हैं? जबकि यह सबको पता है कि शिक्षा का सम्बन्ध भावात्मक और विचारत्मक धरातल में विकास करने को ले कर होता है न कि मात्र बौद्धिक तौर पर विकसित करना।

पर आज के समय में तो बौद्धिक स्तर पर भी विकास कहां हो रहा है? बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने के लिए भी समझ का होना जरूरी है। आज की शिक्षा प्रणाली नौकरी के लिए रटा और सटा वाली बनाना मजबूरी है। शर्म आती है कभी-कभी तो। घोर स्वार्थी हो रहे है आज का शिक्षित इन्सान। क्या यही शिक्षा है?

सुन्दर का अर्थ है सु+अन्दर अर्थात जो अन्दर से अच्छा हो। पर हमने बाह्य रंग रूप को सुन्दर कहना शुरू कर दिया। जबकि वह सुरूप कहलाता था। शब्दों के आज अर्थ बदल दिए हैं।

पैसा सामाजिक जरूरतों के लिए एक अनिवार्य विनिमय था। पर आज वही मान सम्मान का परिचायक हो गया है। जबकि मान सम्मान व्यक्ति के ज्ञान और ध्यान, सेवा और सत्संग तथा तप व त्याग से सम्बन्ध रखता था।

आज अगर अष्टावक्र की माने तो हम चर्मकार हो गए हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज रटा और सटा सिस्टम की शिक्षा पद्धति भारत में हावी हो गई है। या तो छात्र रटा मार कर परीक्षा पास कर देते हैं और अच्छे नम्बर ले आते हैं, समझ भले ही उस विषय की उन्हे हो या न हो। या फिर MCQ में सटा यानी तुका लगाकर अंक प्राप्त करते हैं।फिर बड़े खुश होते हैं कि देखो क्या जजमेंट है हमारी। न जाने क्यों शिक्षाविद यह आंकड़ों की शिक्षा प्रणाली निरन्तर हावी किए जा रहे हैं? जबकि यह सबको पता है कि शिक्षा का सम्बन्ध भावात्मक और विचारत्मक धरातल में विकास करने को ले कर होता है न कि मात्र बौद्धिक तौर पर विकसित करना।

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यह लेख (शिक्षा – सुन्दरता और सम्मान।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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लें संकल्प पुनरावर्तन का।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ लें संकल्प पुनरावर्तन का। ♦

अंतस् का विश्वास यह स्वर्ण-चक्र रुके नहीं,
मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

प्रवाह रहे झिलमिल,
जैसे आदित्य की थाल।
वृन्तों पर अतीत के,
खिले आगम श्रीवास।
नैनों में धूप रक्तिम,
रंग उन अधरों की।
जिसके गातों तनुरूह में,
सिन्धुनंदनी की कली।

छाँव में पलकों के कलाधार कभी थके नहीं,
मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

मन-आत्मा का अटल विश्वास,
धरा में जैसे ज्वाल रहे।
नजरों की अँगड़ाईयों में,
जैसे अदृश्य मनुहार रहे।
मिट्टी की खुशबू जल में,
विटप-वृंद में बयार रहे।
विचारों की शुचीर्य की,
पैदावार बारंबार रहे।

उर-अंतस्-प्राणों के संघर्षों में वेदनायें कभी दुखे नहीं,
मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

भावी समय के पन्थ मिले,
अल्पना की कल्पना रंग भरे।
यामित रक्षित कंगूरों पर,
देश भविष्य का दीप धरे।
श्रद्धा आलंब आधार पर,
कभी न धूमिल साँझ घिरे।
आयुष्य प्रखर सुर-ताल बने,
युगों – युगों तक विश्व में,
भारत की जय गान बजे।

चरणों में अनाचार के मनु-आर्य के कभी झुके नहीं,
मानस के सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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तुम्हारे लिए।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तुम्हारे लिए। ♦

सरगम की लय ताल में अलाप जगाये,
गीतों काव्यों को मुखड़े का अंतराल बनाये।
जो धुन सजाये गाने की वो भी गाये,
बसंत बहार के मधु की उपमायें भी लाये।
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

कौतुक – विनोद सुन अश्रुधार गिरे,
दर्द – वेदना सुन कहकहे लगे।
रुदन राग जगाये हमनें सुर आलाप देकर,
अभी कण्ठों को रुलाया है हमने।
रुँधे स्वर को सुलाया है हमने,
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

तुम्हारे सङ्केत पर अभी राग सौंदर्य उठा सकता हूँ,
जिसे सुन कर नयन मद में मुँदने लगे।
जागने लगे स्वप्न मदहोशी से आने लगे,
हँसने लगे दीप सदा मेरी देखकर।
आग सुलगने लगे चित्त की बात होने लगे,
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

खामोश अधर भी जैसे मुस्कुराने लगे,
वेदना कसकती है मन के कोने में।
देखी नहीं अभी कही अनकही बातें,
तुम अगर चाहो तो कह सकता हूँ।
सुनकर जिसे बुझने लगे आग,
जलने लगे जिसे सुनकर राख।
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

इक तेरी ही नहीं और बातें हैं भी बहुत,
रह-रहकर जो मुझे उदास करती हैं।
दर्द आदमी का आदमी को मालूम नहीं,
कितनी साँसें बिन जिंदगी जिया करते हैं।
भव रहे इकतार भैरवी राग मुझे गाने दो,
जिसे सुनकर झुकने लगे चंदा भी।
बवंडर भी उठने लगे धूल बनकर,
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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