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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2022-KMSRAJ51 की कलम से

शिक्षक दिवस दोहे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षक दिवस दोहे। ♦

अमर शक्ति के पुत्र सभी, अभिमानी मतिमंद।
विष्णु दत्त से गुरु मिले, मिला ज्ञान मकरंद॥

उत्तम गुरु सानिध्य से, जड़मति बने सुजान।
पंचतंत्र सी कृति मिली, हुआ जगत कल्याण॥

शिक्षक पुष्प पलाश सम, औषध से अनुबंध।
जिसकी जितनी ग्राह्यता, उतनी भरे सुगंध॥

अनुचित शिक्षण दे रहा, मानवता पर घाव।
गुरुकुल पद्धत का पुनः, हो अब प्रादुर्भाव॥

नीति वचन गायब हुए, शिक्षण हुआ अशुद्ध।
बालक अब कैसे बनें, अब्दुल नानक बुद्ध॥

ज्ञान क्षितिज पर छा रहा अमावस‌ सा अंधियार ।
लागू हों नव नीतियां, लौटे फिर उजियार॥

जीवन भंवर अज्ञान का, पग-पग पर हैं शूल।
सर गुरुवर का हाथ है, शूल बनेंगे फूल॥

बीच भंवर में नाव है, गुरु चरणों में माथ।
उतरेंगे उस पार हम, गुरु नाविक सम साथ॥

♦ वेदस्मृति ‘कृती‘ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती‘ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इन दोहों में ज्ञान और शिक्षक के महत्व को बखूबी समझाने की कोशिश की है — एक शिक्षक ही होते है जो हमे अच्छी और बुरी आदतों का पहचान करवाते है और वो हमारी बुरी आदतों को छोड़वाने का दिल से पूर्ण प्रयास भी करते हैं। हमें अच्छी आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित करते है, सदैव ही आगे बढ़ने का सही ज्ञान देते है। वो शिक्षक ही होते है जो हमें ईर्ष्या, हिंसा, अधर्म, चोरी जैसी बुरी आदतों से दूर रखते है। शिक्षक ही, सही आचरण, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है, कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस अर्थात 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्म दिवस पर शिक्षक दिवस मनाने की इच्छा जताई थी। पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

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यह दोहे (शिक्षक दिवस दोहे।) ” वेदस्मृति ‘कृती‘ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई• आई• टी• शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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तुझे वंदन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तुझे वंदन। ♦

एक शिक्षक तो होता है, पुंज-प्रकाश का।
जो खुद तप कर, जग में रोशनी फैलाता है।

ये आसमाँ का वो बादल, जो गुणों की बारिश बरसाता है।
अपने ज्ञान की रोशनी से, शिष्य-पथ को चमकाता है।

ये गर हाथ पकड़ ले, तो मंजिल पाना आसान हो जाये।
न घबराना तू फिर, जब तुझें तेरा गुरु राह दिखाये।

गुणों की माला में हरेक मोती, अपने विश्वास के धागे में पिरो जाए।
जब ये खुशबू देने पर आए, हर फूल को महकाये।

सत्य-पथ में गुरु तो, मिलते अनेक है।
शिष्य के व्यक्तित्व में निखार लाना, सबका ध्येय एक है।

तपते इस जीवन में, ठंडक पहुँचाये संस्कारों की।
जो चमके आसमाँ में, ख्वाइश बन जाये उन तारों की।

इनके हुनर को दिल में, समाहित करते है जो।
जिंदगी के हर दुख को, सहजता से हरते है वो।

ये अपने आदर्शों से,गागर में सागर भर जाए।
कोटि-कोटि वंदन गुरु को,बस इससे आगे कलम कुछ लिख न पाए।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक शिक्षक ही होते है जो हमे अच्छी और बुरी आदतों का पहचान करवाते है और वो हमारी बुरी आदतों को छोड़वाने का दिल से पूर्ण प्रयास भी करते हैं। हमें अच्छी आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित करते है, सदैव ही आगे बढ़ने का सही ज्ञान देते है। वो शिक्षक ही होते है जो हमें ईर्ष्या, हिंसा, अधर्म, चोरी जैसी बुरी आदतों से दूर रखते है। शिक्षक ही, सही आचरण, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है, कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस अर्थात 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्म दिवस पर शिक्षक दिवस मनाने की इच्छा जताई थी। पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

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यह कविता (तुझे वंदन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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शिक्षक और समाज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षक और समाज। ♦

विधा: शिक्षक दिवस।

कच्ची मिट्टी को अपने हाथों से सोना बनाते हो आप,
बुद्धि विवेक से सींच कर हमको आसमानों की ऊंचाईयों पर पहुंचाते हो आप।

करते नहीं हो किसी से भेदभाव सबको ज्ञान का पाठ पढ़ाते हो आप,
जाति-धर्म पर लड़े न कोई सबको एकता का पाठ पढ़ाते हो आप।

आदर्शों की मिसाल बनकर बाल जीवन को निखारते हो आप,
सदाबहार के फूल खिलाकर प्रेरक आयामों से भव्य संसार बनाते हो आप।

संचित ज्ञान का धन देकर हमें खुशियां खूब मनाते हो आप,
डूबती कश्तियों के नाविक बन कच्ची ईंटों से चांद पर ताज बनाते हो आप।

ढूंढ कर मजहब किताबों में गीता और कुरान पढ़ाते हो आप,
अपनी मेहनत की कलम से आने वाले कल को आज बनाते हो आप।

कलम हाथ में लिए विजयलक्ष्मी शिक्षक की भूमिका सोचती हैं आज,
एक शिक्षक को शिक्षक की भूमिका से हटाकर सर्व भू-पर सर्वे सर्वा बना दिया है आज।

जिन अधिकारियों को गरिमामयी पद पर पहुंचाया आपने,
वो भूलाकर गुरुजनों का सम्मान नित नए सरकारी कार्यों के फरमान पहुंचाते हैं आप।

आइए आज हम सभी मिलकर अपने गुरुजनों को शीश नवाएं,
जो खोती जा रही है गुरु की महिमा उसको वापस लाए आज।
जय हिन्द! जय भारत!

शिक्षक दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं!
शिक्षक करता देश का उद्धार है,
पैदा करता ये हर तरह के कलाकार हैं।

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

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  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए; इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — एक शिक्षक ही होते है जो हमे अच्छी और बुरी आदतों का पहचान करवाते है और वो हमारी बुरी आदतों को छोड़वाने का दिल से पूर्ण प्रयास भी करते हैं। हमें अच्छी आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित करते है, सदैव ही आगे बढ़ने का सही ज्ञान देते है। वो शिक्षक ही होते है जो हमें ईर्ष्या, हिंसा, अधर्म, चोरी जैसी बुरी आदतों से दूर रखते है। शिक्षक ही, सही आचरण, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है, कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस अर्थात 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्म दिवस पर शिक्षक दिवस मनाने की इच्छा जताई थी। पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

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यह कविता (शिक्षक और समाज।) “विजयलक्ष्मी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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शिक्षक दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षक दिवस। ♦

प्रथम माँ होती शिक्षक जो हमें सिखाती संस्कार है,
पिता और गुरु से मिलता बालक को विद्या अपार है।

शिक्षक जीवन का आधार अंधकार में दीपक का प्रकाश है,
मावन जीवन का मानसिक विकास का होता गुरु आधार है।

ऋषि, मुनि ने भी शिक्षक की महिमा का गुणगान किया है,
उच्च शिक्षक का जीवन में होना, ईश्वर का वरदान है।

गुरु विद्या और गुणों का सागर, करते जीवन प्रकाशवान है,
व्यक्तित्व को निखारें संस्कारित जीवन का शिक्षक आधार है।

आचरण, सही, गलत, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है,
कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है।

अंतर्मन का तम हरने को ज्ञान का दीप जलाते है,
भले बुरे का भेद बताकर सबका मार्ग प्रशस्त करते है।

संस्कृति, इतिहास विग्रह साहित्य का देते सबको ज्ञान है,
सत्य, धर्म, सदाचार का पाठ पढ़ाते सच्चाई की राह पर चलना सिखाते है।

जीवन में सफलता हासिल होती देते ऐसे मूल मंत्र है,
देशभक्ति की भावना का करते विकास, जिससे बनता राष्ट्र खुशहाल है।

शिक्षक का जीवन में विशेष महत्व देते वो सभी को ज्ञान है,
शिक्षक की महिमा का हम गुणगान करते है।

शिक्षक ही मजबूत नींव की आधारशिला है,
शिक्षक के चरणों में करते नमन बारम्बार है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक शिक्षक ही होते है जो हमे अच्छी और बुरी आदतों का पहचान करवाते है और वो हमारी बुरी आदतों को छोड़वाने का दिल से पूर्ण प्रयास भी करते हैं। हमें अच्छी आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित करते है, सदैव ही आगे बढ़ने का सही ज्ञान देते है। वो शिक्षक ही होते है जो हमें ईर्ष्या, हिंसा, अधर्म, चोरी जैसी बुरी आदतों से दूर रखते है। शिक्षक ही, सही आचरण, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है, कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस अर्थात 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्म दिवस पर शिक्षक दिवस मनाने की इच्छा जताई थी। पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

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यह कविता (शिक्षक दिवस।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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अब डटकर लड़ना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अब डटकर लड़ना होगा। ♦

गदा तीर तलवार उठा लो,
अब डटकर लड़ना होगा।
बहुत पढ़े हम पाठ प्रेम का,
अब प्रतिशोध पढ़ना होगा।

बहन बेटियों की आबरू,
कब तक हम गंवाएंगे।
हाथ सिरहाने रख कर यूं ही,
कब तक सोते जाएंगे।

उठो चलो संग्राम करो,
अब प्रहार करना होगा।
गदा तीर तलवार उठा लो,
अब डटकर लड़ना होगा।

नीच निराधम असुरों की,
ऐसे मन बढ़ते जाएगी।
कभी बेटियां तेरी तो,
बहनें बली चढ़ती जाएगी।

कर दो नाश निशाचर का,
दूजा न कोई पैदा होगा।
गदा तीर तलवार उठा लो,
अब डटकर लड़ना होगा।

दरबार यहां अंधों का है,
क्या? रक्त हमारा देखेगा!
प्रलय ला दो प्रचंड बनकर,
कि रोष वक्त भी देखेगा।

खाल खींच ले क़ातिल का,
ये बल सब में भरना होगा।
गदा तीर तलवार उठा लो,
अब डटकर लड़ना होगा।

नोट: झारखण्ड, दुमका की बेटी अंकिता सिंह हत्याकांड पर अमित प्रेमशंकर की एक कविता।

♦ अमित प्रेमशंकर जी — एदला-सिमरिया, जिला–चतरा, झारखण्ड ♦

—————

Conclusion

  • “अमित प्रेमशंकर“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्राचीन काल से ही नारी बहुत शक्तिशाली है, नारी हर एक विद्या में माहिर होती थी, अपनी रक्षा स्वयं करने में पूर्ण सक्षम थी। फिर आज की नारी अपने आपको इतना लाचार क्यों समझती है? अब नारी को अपनी शक्ति को पहचान कर अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी। ब्रह्माण्ड के निर्माण के समय से ही नारी के अंदर सहनशीलता, प्रेम, धैर्य, स्नेह, करुणा व ममता और मधुर वाणी जैसे बहुत से गुण विद्यमान है जो कि नारी की असली शक्ति है। यदि कोई नारी कुछ भी करने का निश्चय कर ले (दिल से ठान ले) तो वह उस कार्य को करे बिना पीछे नहीं हटती है और वह बहुत से क्षेत्रों में पुरूषों से बेहतरीन कर अपनी शक्ति का परिचय देती भी है।

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यह कविता (अब डटकर लड़ना होगा।) “अमित प्रेमशंकर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। आपकी ज्यादातर कविताएं युवा पीढ़ी को जागृत करने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

नाम: अमित प्रेमशंकर
पिता: श्री द्वारिका प्रजापति

माता: श्रीमती रेखा देवी
पत्नी: श्रीमती संजू प्रेमशंकर

जन्मतिथि: १० मार्च १९९३
पता: ग्राम+पोस्ट – एदला
प्रखण्ड: सिमरिया
जिला: चतरा (झारखण्ड)
पिन: ८२५१०३

शिक्षा: स्नातक (हिंदी) विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग
सम्प्रति: कवि, गीतकार व ढोलक वादक।

प्रकाशित पुस्तकें: मन की धारा(एकल),आत्म सृजन, काव्य श्री, एक नई मधुशाला १, एक नई मधुशाला २, भावों के मोती, हमारी शान तिरंगा है व अक्षर पुरूष
प्रकाशित रचनाएं: देश के अलग-अलग पत्र पत्रिकाओं में लगभग दो सौ रचनाएं प्रकाशित व समय समय पर सामाचार पत्रों के माध्यम से पत्राचार।
विशेष: कविता “सीता माता सी कोई नहीं” तथा “आज राम जी आएंगे” महाराष्ट्र के वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओ. सी. पटले द्वारा पोवारी भाषा में अनुवाद व दर्जनों हिन्दी, भोजपुरी गीत यूट्यूब पर मौजूद हैं जिसे अलग अलग गायक और गायिकाओं ने अपने स्वर से सजाया है।

प्राप्त सम्मान: काव्य श्री साहित्य सम्मान, आत्म सृजन साहित्य सम्मान, भावोन्नती साहित्य सम्मान, सरदार भगतसिंह काव्य लेखन सम्मान, सुमित्रानंदन पंत स्मृति सम्मान, साहित्य कर्नल सम्मान दो बार, रैदास साहित्य सम्मान,द फेस ऑफ इंडिया साहित्य सम्मान, राष्ट्र प्रेमी साहित्य सम्मान तथा दिल्ली साहित्य रत्न सहित अनेकों आनलाईन काव्य पाठ द्वारा ई-सम्मान पत्र शामिल है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पर्वत है कहता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पर्वत है कहता। ♦

मैं क्यों न ढहूँ? मुझे बताओ, सब कुछ कुरेदा मुझसे तुमने।
अंधा विकास कर चले हो तुम, सुरंग भी छेदा मुझसे तुमने।

मैं रोया या हंसा, तुम्हे क्या?, तुम्हे तो विकास करवाना था।
मैं कमजोर होऊं, तुम्हे क्या?, तुम्हे तो मुझे बस कटवाना था।

बड़ी बड़ी मशीनें, प्रोजेक्ट व सड़के, काट के मुझे बनवाए हैं।
दोहन करके मेरा ही तुमने, ये ईंट- गैरों के महल बनवाए हैं।

आज मैं ढहा हूं, बादल फट बहा हूं, यह मेरी भी मजबूरी है।
प्रहार बरसात का झेलने खातिर, मुझमें मजबूती जरुरी है।

मुझसे तुमने, बहुत कुछ लुटा, मेरे लिए कुछ किया है क्या?
मैंने तुमको सदियों से दिया, मुझे तुमने कुछ दिया है क्या?

क्यों कोस रहे हैं सरकारों को? बादल फटने और बाढ़ों को?
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, सुधारों अपने व्यवहारों को।

पर्वत है कहता, “मैं कुदरत का बेटा’, मेरी किसने मानी है?
नुकसान पहुंचा कर मुझको पगलो, तुम्हारी ही तो हानि है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्राचीन काल से ही पर्वत का हम सभी के जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है, पर्वत ताज़ा पानी, स्वच्छ ऊर्जा, भोजन और मनोरंजन के साधन मुहैया कराते हैं। दुनिया भर में पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले समुदायों की युवा आबादी का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए शिक्षा के प्रसार, प्रशिक्षण, रोज़गार और आधुनिकतम तकनीक मुहैया कराने से बड़ी मदद मिल सकती है। पहाड़ कैसे उपयोगी होते हैं? इस बात को बारीकी से समझने की जरूरत है हम सभी को, पर्वत जल के भण्डार हैं । पहाड़ों के पानी का उपयोग सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के लिए भी किया जाता है। नदी घाटियाँ और पर्वत छतें फसलों की खेती के लिए आदर्श हैं। पहाड़ों में वनस्पतियों और जीवों की एक समृद्ध विविधता है। इनके साथ खिलवाड़ करना, इंसान को प्राकृतिक आपदा के रूप में झेलना पड़ता हैं। अब भी समय है संभल जायें और इनका अंधाधुन गलत तरीके से दोहन करना छोड़ दे, वर्ना परिणाम और भी भयानक होगा।

—————

यह कविता (पर्वत है कहता।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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शिक्षक की महिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षक की महिमा। ♦

कांटों में उलझा हुआ है,
मेरे दिल का ख्वाब।
बच्चा है हर आंगन का,
खिलता हुआ गुलाब।

कभी न भूलो अपना काम,
जग में तुझे करना है नाम।
जब भी आए संकट तुझको,
लेना तुम प्रभु का नाम।

मैं रोता हुआ गया,
विद्यालय के प्रांगण में।
बहुत बच्चे बिलख रहे थे,
मैंडम, सर दौड़े आए,
लेलिया अपने आलिंगन में।

घुटनों से रेंगते-रेंगते,
कब पैरों पर खड़ा हुआ।
शिक्षक-शिक्षिका के,
ममता की छांव में,
न जाने कब बड़ा हुआ।

कोई अभियन्ता, कोई नेता,
कोई बना अधिकारी।
कोई डाक्टर कोई सैनिक,
तो कोई बना कर्मचारी।

जो लोहे को कनक बनाया,
वो सम्मान कभी न पाया।
जिसकी दानिशमंदी ने,
सबको अब्बल बना दिया।

आज विवश हो कर सर झुकाता है,
जिसकी शिक्षा ने सबको मानव बना दिया।
बार-बार नमन है गुरु चरणों में,
मुझे काबिल बनाने के लिए।

मैं तो राह में पड़ा कंकड़ था,
कोटी-कोटी नमन,
मुझको हीरा बनाने के लिए।
मैं सीधा-साधा “भोला” – भाला,
सबकी नजरों में अच्छा हूँ।

चाहे मैं कुछ भी बन जाऊँ,
मैं आज भी आपका बच्चा हूँ।
गुरु – शिष्य का नाता देखो,
पिता – पुत्र से कहीं महान।

कली को आपने फूल बनाया,
महक उठा सारा हिन्दुस्तान।
गुरु बिन ज्ञान कोई न पाया,
अनुभव की आप हो खान।

शिष्य देखता प्यासी नजरों से,
गुरु होते अमृत की खान।
माँ शारदा, भगवान चित्रगुप्त से,
पहले वंदन, करता हूँ गुरु चरणों में।

कैसे लिखूं महिमा उनकी,
अभिलाषा है मेरी,
हाथ हो गुरु का,
जब शीश हो गुरु चरणों में।

कलम में वो ताकत है,
जो तलवार में नहीं होती।
कई सिकन्दर डूब गये,
वक्त के चक्कर में।
झोपड़ी जैसी रौनक,
दरबार में नहीं होती।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान। तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान॥” भावार्थ:- “गुरु के समान कोई दाता नहीं और शिष्य के सदृश याचक नहीं। त्रिलोक की सम्पत्ति से भी बढ़कर ज्ञान-दान गुरु ने दे दिया।” गुरु और पारस – पत्थर में अन्तर है, यह सब सन्त जानते हैं। पारस तो लोहे को सोना बनाता है, परन्तु गुरु शिष्य को अपने समान महान बना लेता है। गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है। गुरु ही हैं जो भीतर से हाथ का सहारा देकर, बाहर से चोट मार-मारकर और गढ़-गढ़ कर शिष्य की बुराई को निकालते हैं।

—————

यह कविता (शिक्षक की महिमा।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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दोहरी मानसिकता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दोहरी मानसिकता। ♦

आज के युग में एक ऐसी दोहरी मानसिकता ने बहुत इंसानों के दिल में इस प्रकार से घर कर लिया है ऐसा लगता है मानों ये इसी प्रकार से इस धरती पर जन्में हो, और ये प्रवृति इंसान समय मिलते ही दिखाने लगते हैं। इसका जीता जागता उदाहरण हमें अपने बच्चों के मुख से भी सुनने को मिल जाता है जब वो बोलते है कि मेरा भाई प्राइवेट स्कूल में है और हम बहनें सरकारी स्कूल में।

जब अभिभावक-अध्यापक मीटिंग में उनसे इस बारें में कोई चर्चा होती है तो वो हँसते हुए इस बात को कहते है कि जी एक लड़का है इसलिए वहाँ पर पढ़ा रहें हैं और जब हम पूछते है कि आपकी बेटियों की पढ़ाई यहाँ पर कैसी है तब वो कहते हैं कि बहुत अच्छी पढ़ाई होती है यहाँ भी। आजकल तो सरकारी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई होती है। कई बार तो वो तुलनात्मक स्थिति में ये भी कह देते है कि बेटियाँ अच्छा काम कर रही है।

फिर समझ में नही आता कि फिर भी माता-पिता का ये भेदभाव क्यूँ।

घर में एक साथ रहने वाले बेटा-बेटी के साथ ये अलगाव की स्थिति घर से ही पैदा हो जाती है। जो लड़कियों के बालमन पर कई बार ऐसी छाप छोड़ देती है जो चाह कर भी जिंदगी भर दूर नही होती। क्योंकि हमें अक्सर इस प्रकार के बच्चों के कोमल दिल से ऐसे भाव देखने सुनने को मिलते है जो हम शिक्षकों को भी दुख देने में पीछे नही रह पाते।

खासकर वो पूरा वर्ष पढ़ाई संबंधी चीजें कॉपी, पेंसिल, रबड़ व नए बैग, टिफ़िन और बोतल के लिए झूझते दिखाई देते है जैसे भाई की ही पुरानी बोतल में पूरा साल काम चलाना या कॉपी के पिछले पन्नों पर लिखा मिटाकर काम करना। इस प्रकार की बहुत सी बातें हमें अपनी कक्षाओं में देखने को मिलती है जिससे माता-पिता की दोहरी मानसिकता दिखाई दे जाती। इसका सबसे ज्यादा उदाहरण हमारे सरकारी विद्यालयों में मिलता है जो कि एक कड़वा सच है। आखिरी में दसवीं, बारहवीं तक आते-आते लड़कियाँ ही टॉप करती है हर वर्ष।

क्योंकि एक सरकारी अध्यापक के लिए तो कक्षा का हर छात्र-छात्रा एक समान है। इसलिए उनमें किसी प्रकार भेदभाव किए बिना ही उनको एक समान शिक्षा मिलती है।

अंत में वे बेटियाँ ही माता-पिता की शान बनती है जिनको सरकारी विद्यालयों में ये सोच कर दाखिला दिलवाते है कि इन पर पैसा तो खर्च करना नहीं होगा बल्कि कुछ न कुछ इनसे हासिल ही होता है। पर ये अपनी योग्यता से हर बार सिद्ध कर ही देती है कि लड़कियाँ कभी भी पीछे नही रही बल्कि उन्होंने हर जगह ही सफलता का परचम लहराया। सही तो सार्थक कथन इन बेटियों के लिये:—

हम हर हाल में अपने माता-पिता का नाम रोशन कर जाएगी।
देखोगे जिधर भी बेटियाँ ही सफलता का परचम लहराएगी।।
एक शिक्षिका की कलम से…
(श्रीमती सुशीला देवी – जे.बी.टी.अध्यापिका करनाल हरियाणा)

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आखिर कब तक समाज में ये दोहरी मानसिकता चलता रहेगा लड़कियों के लिए। आखिर क्यों लड़कियों को लड़को के बराबर सबकुछ नहीं दिया जा रहा है, क्यों उनको दोयम दर्जे का प्यार और सबकुछ दिया जा रहा है आज भी समाज में, क्या यही मानसिक विकास है? प्राचीन समय में भारत के हर स्थान की नारी स्वतंत्र थी, महिलाओं पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं था। महिलाएं यज्ञों और अनुष्ठानों में भी भाग लेती थी। मध्य युग में धीरे-धीरे समय बदलने के साथ पुरुष ने अपने अहम भाव के कारण नारी को निम्न स्थान दिया। आज फिर से नारी समाज में प्रतिष्ठित और सम्मानित हो रही है अपने अद्भुद समझ व अच्छे ज्ञान व प्रतिभा के प्रदर्शन के दम पर। अक्सर यह देखा गया है— अंत में वे बेटियाँ ही माता-पिता की शान बनती है जिनको सरकारी विद्यालयों में ये सोच कर दाखिला दिलवाते है कि इन पर पैसा तो खर्च करना नहीं होगा बल्कि कुछ न कुछ इनसे हासिल ही होता है। पर ये अपनी योग्यता से हर बार सिद्ध कर ही देती है कि लड़कियाँ कभी भी पीछे नही रही बल्कि उन्होंने हर जगह ही सफलता का परचम लहराया।

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यह लेख (दोहरी मानसिकता।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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नायक – नायिका।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नायक – नायिका। ♦

भारत में युगों से महिलाओं का गौरव गान किया जाता है।

“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।”

अर्थात:— जहां नारी का पूजन और सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं।

महा राष्ट्रीय में कहा गया है कि —

‘नारी जनमांची पुण्याई ‘!

श्री हरि चरित्रामृत सागर, में आधारानंद स्वामी लिखते हैं कि सत्संग में महिलाएं भी बहुत उच्च स्तर की थीं।

स्वामीनारायण संप्रदाय में भक्ति धर्म बैरागी एवं ज्ञान से युक्त बहुत सी ऐसी स्त्री – भक्त थीं, जिनकी तुलना पौराणिक युग की स्त्री भक्तों से किया जा सकता है। अत्यंत ही प्रेम पूर्वक मानसी – पूजा करतीं और मार्ग में चलते समय किसी पुरुष के सामने दृष्टि नहीं करी थीं। (भक्त रत्न महिलाएं पृ १३ भाग ४)!

महिला शब्द का प्रयोग वयस्क स्त्रियों के लिए किया जाता है।

वेदों – पुराणों में कहा गया है कि —

“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफला क्रिया।।”

जिस कुल में स्त्री की पूजा होती है उस कुल पर देवता प्रसन्न रहते हैं और जहां स्त्रियों की पूजा, वस्त्र भूषण, तथा मधुर वचन आदि से सत्कार नहीं किया जाता उस कुल का सभी कर्म विफल हो जाता है।

पुरुषों में आठ गुण ख्याति बढ़ाते हैं —

बुद्धि, कुशलता, इंद्रिय निग्रह, शास्त्र ज्ञान, पराक्रम, आधिक नहीं बोलना, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता।

‘अष्टौ गुणा: पुरुषं दीपयन्ति,
प्रज्ञा च कौल्यं च दम: श्रुतं च।
पराक्रम श्चाबहुभाषिता च,
दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।।(विदुर नीति पृ २८)

वेद काल में नारी — वेद काल में नारियों की सभी कार्यों में भूमिका, पत्नी को सम्मान मिलता था। समान अधिकार प्राप्त था नारियों को।

ऋग्वेद काल में नारियों की दशा — ऋग्वेद काल में स्त्रियों को सर्वोच्च शिक्षा दी जाती थी। नारियां शास्त्र और कला के क्षेत्र में निपुणता की परिचायक होती थी।

प्रकांड विद्वान स्त्रियां — वैदिक काल में भारतीय नारियों में विदुषी लोप मुद्रा – जो अगस्त की पत्नी थीं।

विदुषी प्रीति येयी — जो महर्षि दाधीच की धर्मपत्नी थीं।

विदुषी सुलभा — यह जनक राज की विदुषी थीं। जिसने जनक को ही शास्त्रार्थ में हरा दिया था।

ब्रह्मवाहिनी रोमशा — बृहस्पति की पुत्री और भाव भव्य की धर्मपत्नी थीं। इन्होंने ज्ञान का व्यापक प्रचार किया।

ब्रह्म वादिनीं गार्गी — इन्होंने महान विद्वान ज्ञागबल्क को शास्त्रार्थ में हरा दिया।

ब्रह्म वादिनी वाक् — अमृण ऋषि कन्या थी जिन्होंने अंत में अनुसंधान किया और समाज को खेती करने के लिए अन्न दिया।

विदुषी तपती — आदित्य की पुत्री और सावित्री की छोटी बहन थीं। यह अति सुंदरी और प्रकांड विद्वान थी। इनका अयोध्या में संवरण जी से विवाह हुआ था।

शत रुपा, सांगली, मैं ना, स्वाहा, संज्ञा, अपाला आज महिलाओं के साथ-साथ अनुसुइया, सावित्री, तारामती, द्रोपदी जैसी सती जी के गुणों से आज भी विश्व जगत में प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं।

तुलसीदास जी ने लिखा है कि —

‘मूढ तो हिं अतिशय अभिमाना,
नारि सिखावन करसि काना।

तुलसीदास जी का इस दोहे में कहने का तात्पर्य है कि यदि कोई आपके फायदे की बात करें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

कबीर दास की दृष्टि में नारी — इन्होंने नारियों को दो प्रकार का बताया है।

  1. एक प्रकार की नारी साधना में बाधा नहीं पहुंचाती हैं और पतिव्रता होती हैं।
  2. दूसरी तरह की नारी साधना में अवरोध पैदा करती हैं ऐसी नारियों का कबीर ने विरोध नहीं किया है परंतु उनका तिरस्कार कर दिया है।

सूरदास की दृष्टि में नारी — यमन ऋषि की कथा राम बिलावल में, नवम स्कन्द में…

‘सुखदेव कह्यो, सुनौ हो राव!
नारी नागिन एक स्वभाव।
नागिन के कांटै विष होई,
नारी चितवन नर रहै भोई।
नारी सो नर प्रीति लगावै,
पै नारी तिहिं मन नहिं ल्यावै।
नारी संग प्रीति जो करै,
नारी ताहि तुरंत पंरिहरै॥

चाणक्य ने नारी के लिए कहा —

नारी में दया और विनम्रता होती है।
नारी धैर्य का पालन करती है।
समाज के निर्माण में नारी की विशेष भूमिका है।
नारी समाज की निर्माणकर्ता होती हैं।
नारी शरीर से दुर्बल होते हुए भी,
प्राण से वह पुरुष से भी अधिक शक्तिशाली होती है।

‘ जिनी सुंतत्र भए बिगरहिं ‘

जिस समय विरहणी स्वतंत्र हो जाती है। फिर उसके अलग-अलग रूप और कर्म देखे जाते हैं।

नायक कहता है कि —

गोरो गाल तिल तापे काला,
मोहन ‘मंगल’ कैसो जादू डाला।
वदन चंद्र सम मृगनयनी गोरी।
नैना चंचल दिखे चकोरी॥

अपने पति से प्रेमातुर स्त्री दुखी होकर कहती है —

मोसों ना बात बना चातुरी,
गोर सांवरिया माटी जब खोटो!
नायिका प्रीतम से रूठ कर लंदन चली जाती है।

नायक कहता है कि —

मेरी मालन खेलन जात बलैया,
मुंह मोड़ चली लंदन मा गोरी।
कैसो बनि गयो देखो कठोरी,
मान तज्यो अरमान लियो गोरी,
राधा रिसानी मनाय लायो कोई!
रितु की मार सहन नहीं होई॥

प्रेमातुर नायिका का भाव —

प्रिय प्रेम से बावरी,
सांवरो नाच नचायो।
उठि उठि जात पहर में,
भोरहरी ना उसे दिखाय।
सांवतिया काहें को जरि जाय,
सजनवा आपनो देख मुस्कात।
हमारी ओर देखा करो सांवरो,
नाहीं तो हम पीहर जाब॥

चंद्रमा को नहीं पता होता है कि उसकी चाहत में चकोरी अपना प्राण त्याग देगी। नायिका प्रेम में इतना विहवल हो, गयो है जानने और पहचानने की आवश्यकता नायक को करना चाहिए।

नई नवेली नायिका ससुराल में कहती है कि —

कुआं पानी भरन ना जैहों,
काला जादू नजर लगी तैहों।
रंगरेजवा रची रची रच्यो,
गरबीली बनो मोरिया अंगिया?
मोती मढायो पीहर चुनरिया,
बार-बार निखत दर्पण गोरिया।

गुण गर्विता होकर गुजरिया कहती है कि —

पिया तोरा पानी हम से भरा न जाए,
वह काया यह इसलिए नहीं बनायो!

पति पर भरोसा कर नायिका कहती है कि —

अपने राजा में हमरो भरोसो,
बसे पिया आंख में आंजन भयो!
मोरा बिनु सांवरो जिया न जाय,
पास पड़ोस घूमि घरवा आवै।
प्रेम से मिल कर गले लगा ले,
निक निक बतिया से दुलरावै॥

‘जेष्ठा और स्त्री कनिष्ठा ‘—

जिसे पिया चाहे वही सुहागिन,
जाहि स्त्री अधिक चाहे सो जेष्ठा।
कम चाहे जेहि नारी वही कनिष्ठा॥
दोउ लड़ी लड़ी बात बनायो,
पिए को रहि रहि दोऊ समझावैं।
मोहिं काहे को ब्याहे है लायो,
हमरौ आंचल में आगि लगायों॥

मुग्धा भाव —

भौंरा लुभाय रह्रियों कलियन संग,
गगरी ना छलके गोरिया धीरे चलो।
सारी बहोर लहरियों तारों डगरिया,
मारो मन मारि रह्यो संग संवरिया॥

यौवन से अनजान नायिका —

सरकत जाती कहां हे मोर घाघरो,
हुलसित तन मन ओर सांवरो॥

यौवना नायिका —

सतायो जनि सैया,
भरी लेहु मोंहिं बहियां!
सवतन संग जाई रह्यो,
बोलहु नहीं मोसो सैयां।
जाए मनायो सौतन को,
बात बनायो ना हमसो॥

मध्य धीरा नायिका —

मोरा सैयां बेदर्दी,
दर्द ना ही जानै!
तीज त्योहार मा भी,
परदेसवा मां बितावै।
कहा जाता है कि मछली की तड़प का पता समुद्र को नहीं होता है।

मुग्धा नायिका —

भय और लाज से रति न चाहने वाली नायिका मुग्धा नायिका कहलाती है।

कहती –
मोरी बहिया ना पकड़ो,
श्याम गिरधारी!
गल बहिंया ने डारो रे,
ओ बेदर्दी बालमा।

मध्या नायिका —

जिस नारी के तन में मर्यादा और लाज दोनों समान होते हैं वह मध्या नारी कहीं जाती है!

नैना लजाय दिल नहीं मानै,
मोहिं त धीरे जगाए लेना।
हाउ तोहरा ओसारी रे,
जरा अखियां पानी लगा लेना।

विश्रब्धनवोड़ा मुग्धा नायिका —

वह नायिका, जो किंचित भय और लज्जा से रति नहीं चाहने वाली होती है।

मोरा छोड़ दो अचरवा,
मैं प्यार मां झूलूंगी!
आसपास में मेरे लोगवा,
हरि संग प्रीति में खेलूंगी॥

मध्या धीरा नायिका —

अपने पति से आदर युक्त व्यंग कोप जताने वाली।

आयो हमरी अंखियां,
बोलो ना हमसे पिया!
उनको
हमसे ना बोलो पिया?
रात रात निंदिया न आवै!
हरि आज ऊं घी में आवै,
निंदिया गवांय डाली,
भोर भयो आयो अंगना॥

मध्या अधीरा नायिका —

वह नायिका जो पति से अनादर युक्त क्रोध जाने वाली हो, मध्या अधीरता होती हैं।

का हौ करते, कैसो करवावत।
पानी यों कर्यो छिप ना पावर॥

प्रौढ़ धीरा —

अपने पति को डर दिखाकर रति से उदास रहा मानवती स्त्री।

ज्यों पति कुछ बोल्यो,
ललाई बाबा नैना।
मुंह फेरि चल्यो मचल,
36 अंक सो आगे बढ़॥

परकीया नायिका —

वह नायिका जो पराई (पराय) पुरुष से प्रेम करती है।

घर बालम छोड़ी आयो,
बितायिब इहवां रसिया!
मुह हमारा यौहिं ओकरा,
ललचाई नजरों में रतिया॥

प्रौढ़ा नायिका —

वह नायिका दो अत्यंत काम रखती है परंतु कुछ कुछ लज्जा लिए।

प्यारे बलम तोहैं जाने ना दूंगी,
श्याम मोरे नैना का तारा रे !

रतिप्रीका नायिका —

विशेष रति की चाह वाली प्रौढ़ा नायिका।

मोहिं डर लागे अकेला रे,
रात पिया जागत रहियो!
प्रीतम नूपुर मोर ना उतारो,
सांग में अखिल विचार्यौ॥

प्रौढ़ा अधीरता नायिका —

पति त्याग – ताड़ना, कोप जनाने वाली नारी प्रौढ़ा अधीरा कही जाती है।

मैं नहीं जाती पास सैंया के पैंया,
मछरियां बिंदिया लै गई मोर!
मुझ पर डार गयो सारे रंग गागर।

नोट: यहां नायक और नायिका के रूप में वर्णन किया गया। इससे किसी को भी, किसी भी प्रकार का आघात पहुंचाने का कोई मकसद नहीं है। यह एक शोधकर्ता की भाति शोध है। जिसका सूत्र पुस्तकों में अलग-अलग तरह से मिल सकता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — स्त्रियां कई रूप में होती है ज्ञान व गुणों, लोक-लज्जा तथा व्यवहार के आधार पर। इस लेख में नायक व नायिका के माध्यम से लेखक ने विस्तार से बताया है की कैसे व किस-किस प्रकार की स्त्रियां इस संसार में होती है। जैसे – मुग्धा भाव वाली नायिका, यौवन से अनजान नायिका, यौवना नायिका, मध्य धीरा नायिका, मुग्धा नायिका, मध्या नायिका, विश्रब्धनवोड़ा मुग्धा नायिका, मध्या धीरा नायिका, मध्या अधीरा नायिका, प्रौढ़ धीरा, परकीया नायिका, प्रौढ़ा नायिका, रतिप्रीका नायिका, प्रौढ़ा अधीरता नायिका, इत्यादि प्रकार के नायिका के माध्यम से समझाया हैं। यह एक शोधकर्ता की भाति शोध है। इस लेख के माध्यम से किसी को भी किसी बी तरह का आघात पहुंचाने का कोई इरादा नही हैं।

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यह लेख (नायक – नायिका।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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कातिल बरसात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कातिल बरसात। ♦

सूरज डूबा फिर शाम ढली, अंधेरा छाया और हो गई थी रात।
रोजमर्रा के माफिक खाना खा कर, सो गए सारे थे उस रात।

घना अंधेरा था, कोहरा घनेरा था, घने थे बादल और बरसात।
सुबह आई थी खबर कि आठ को, लील गई कातिल बरसात।

मां से लिपटे बच्चे मिले थे, मलबे में दबे पड़े थे सब मां बाप।
चार थे बच्चे तीन बड़े थे, मेहमान ससुर भी दब गए थे साथ।

वह नव प्रधान था काशन का, थी पंचायत भी नव सौगात।
बूढ़े मां, बाप, भाई घर में न थे, खा गई कुल कातिल बरसात।

उल्टी गंगा बहती यह होती है, मां – बाप हुए हैं आज अनाथ।
छाती पीट रोते हैं बेचारे, देख आठ अर्थियां उठाती एक साथ।

दरक उठी थी पहाड़ी ही सारी, नींद में लेटे थे सारे अर्ध रात।
ढह गया था घर ही सारा तो, करता ही कौन बचाने की बात?

दबे पांव मौत ही थी आई, कर गई बरसात में हाथ थी साफ।
जिन्दा बचा एक बेटा था घर का, बस दो बचे बूढ़े मां – बाप।

वह भयानक मंजर जिसने भी देखा, रह गया था वह बेबाक।
चेहरों पर थे आंसू ही आंसू , भूल न पाएंगे वह कातिल रात।

नोट: यह कविता सत्य घटना पर आधारित है और बहुत ही दुःखद घटना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — दिल दहला देने वाली बहुत ही दुःखद घटना है ये। उन मासूम बेचारो को तो भागने का भी समय नहीं मिला। अत्यंत ही दुःखद अचानक से काल का रूप लिए ये कातिल बरसात आई और पुरे कुल को अपने में समा ले गई। बूढ़े माता-पिता और भाई को परमात्मा शक्ति दे इस विपदा की घड़ी में संभलने की और काल के गाल में गए हुए आत्मा को शांति देना प्रभु। ॐ शांति ! ॐ शांति ! ॐ शांति ! ॐ शांति ! ॐ शांति !

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यह कविता (कातिल बरसात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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