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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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सतीश शेखर श्रीवास्तव - परिमल

बहारों के दिन आ गये।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बहारों के दिन आ गये। ♦

देखो रे! बहारों के दिन आ गये,
कलिका बालाओं के रदों पर मधुकर गीत छाये।

अबोध वल्लरियों सार पनघट पर,
ले तरुणाई अंतर्घट हर्षित अंतर।

हँस रही अँखियों में अलसाई मधुल अनुराग भाये,
विपिन अमरी की रोमलताओं सी।

आनंदित हो उठी पर्ववल्ली दल इंदिरा श्री,
मीहिका कनों के धंधला कितने श्रम धूलिका लहराये।

कोरक कुंतल ने विभु लालसा से,
‘परिमल’ प्रसिद्ध प्रीति लज्जा से।

सौंदर्यांचल में मनोहर धुलि से मुक्तामणि बिखराये,
देखो रे! बहारों के दिन आ गये।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती है हरी-भरी प्रकृति के कारण ही हमारा जीवन इतना अच्छा सरल सुन्दर है। सदैव रंग बदलती यह प्रकृति हर पल मन को भाए, नभ में कभी बादल तो कभी नीला आसमां हो जाए, जो मन को भाये, रूप तेरा (प्रकृति) देख कर हर किसी का मन मोहित हो जाए। प्रकृति हमें सब से प्रेम करना सिखाए। सुन्दर पक्षियों की मधुर आवाज मन को सदैव ही प्रफुल्लित कर जाये।

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यह कविता (बहारों के दिन आ गये।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कामना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कामना। ♦

पिपासा (प्रथम)

कब के चल पड़े, दो हृदय पंथगामी हो अविरत,
मिलने के लिये यहाँ, गाहते थे जो हो उन्मत्त।
इक आश्रय नाथ दूजा था, पाहुन अतीत विकार,
यदि इक प्रश्न था, तो दूजा उत्तर उदार।

इक उमर सिंधु समर था, तो वह अर्ण ह्रस्व विकल,
इक नूतन विहान तो, वह हिरण्य रश्मि निर्मोल।
इक था मेघद्वार पावस, का अश्रुपूर्ण प्रगल्भ,
दूजा अनुरागी मयूख से, पिंगल अधिगत वृषदर्भ।

स्रोतस्विनी कूल के दिगन्त में, नव्य तलधर दिनांत,
खेलता इठलाता जैसे, दो दामनियों से माधुर्य भ्रांत।
जूझ रहे प्रतिक्षण यमल रहे, जीवात्मा के पास,
इक – दूसरे से कोई, न कर सकता फाँस।

अभ्यर्पण में गाहन का था, एक गर्भित मनोभाव,
अभ्युदय पर हठ करती थी, था आसङ्ग उलझाव।
रहा था चल निभृत – अध्व, पर रुचिर प्राण खेल
दो अनचीन्हों से भावी, अब अपेक्षित था मेल।

अनुदिन अगूढ़ हो रहे, रहा तब भी कुछ शेष,
अध्वस्त अंतस् का छुपा, रहता राज विशेष।
जैसे दूर घनेरे विपिन, पन्थ मरण का आलोक,
अनवरत होता जा रहा, हो दृग अमनि को रोक।

आगे…

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — प्रेम मतलब दो हृदय का मिलन, ना की दो जिस्म का मिलन। कहते है प्रेम में यदि इक प्रश्न था, तो दूजा उत्तर उदार। इक उमर सिंधु समर था, तो वह अर्ण ह्रस्व विकल, इक नूतन विहान तो, वह हिरण्य रश्मि निर्मोल। जैसे आत्मा व जीवात्मा, आत्मा जीवात्मा से अलग हो तो कुछ भी अनुभव नहीं, व जीवात्मा का आत्मा के बगैर कोई कीमत नहीं। आत्मा व जीवात्मा एक दूजे के पूरक हैं। अभ्यर्पण में गाहन का था, एक गर्भित मनोभाव, अभ्युदय पर हठ करती थी, था आसङ्ग उलझाव। रहा था चल निभृत – अध्व, पर रुचिर प्राण खेल दो अनचीन्हों से भावी, अब अपेक्षित था मेल।

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यह कविता (कामना – पिपासा {प्रथम}) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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वरदान – प्राणवान वसुंधरा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वरदान – प्राणवान वसुंधरा। ♦

केंद्रीय तत्व अस्तित्व विधान का,
सकार जीवन अग्नि यज्ञ समान।

हुताशन अजस्त्र प्रेरणा है,
शिक्षा समृद्धि प्रतिभा और विज्ञान।

आत्मसात करती दिव्य प्रबल प्रभाव संधान,
कौटुंबिकता सहृदयता शब्द और उदान।

नभमंडल का करता शुद्ध सद्गुण दैवी समान,
अनुगमन करता इहलोक का ज्ञान।

सामूहिक उत्कर्ष की सशक्त साधन पहचान,
यज्ञाग्नि की आहुति से सद्भावों का होता आविर्भाव।

अग्नि की दीपशिखा पर होता विषम दबाव,
प्रसस्त ऊर्ध्व उद्वेग से उत्ताल अग्निशिखा समान।

नाश कर भय प्रलोभन विषम का ताप,
संकल्प जिजीविषा मनोबल का करे उत्थान।

पांचजन्य उष्णता ऊर्जा और प्रकाश,
सदृश पावक पवित्र दाहक समान।

वायु रूप बनकर जड़-चेतन को करें प्रकाशवान,
गुप्त शत्रु का भेदने, करे धूमल मरुत समान।

श्लोकों की ध्वनि के गुंजन का ही विधान,
स्वाहा प्रचंड प्रभाव है स्वधा उसका संहार।

यज्ञाग्नि से लोक – परलोक सुधरे,
प्राणवान वसुंधरा के लिये है वरदान।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हम सभी जानते है की भगवान ने अपने अंश से पंचतत्व यानि पृथ्वी, आकाश, वायु, अग्नि और जल का समावेश कर मानव देह की रचना की और उसे सम्पूर्ण योग्यताएं व शक्तियां भी देकर इस संसार में स्वच्छतापूर्वक जीवन बिताने के लिए भेजा है। पृथ्वी तत्त्व यानि जड़ तत्त्व, यह तत्व अनंत सहनशीलता को दर्शाता है व इस तत्त्व से मनुष्य अन्न, धन, धान्य से सम्पूर्ण होता है। इसमें विकार जब उत्पन्न होता है तब इंसान स्वार्थी हो जाता हैं। जल तत्व यानि शीतलता प्रदान करने वाला तत्व। इसमें मिलावट होने पर इसकी सौम्यता कम हो जाती है। अग्नि तत्व, विचार शक्ति में निर्णय करने में सहायक होता है विचारों के भेद अंतर को परखने वाली शक्ति को सरल सुचारु रूप प्रदान करता है। जब इसमें विकार आता है तब इंसान की सोचने समझने की शक्ति का ह्रास होने लगता है, और इंसान गुस्से वाला होकर अपना ही सर्वनाश करता है। वायु तत्व, मानसिक ऊर्जा तथा स्मृति शक्ति की क्षमता को पोषण प्रदान करता है। अगर इसमें विकार आ जाए तो इंसान की स्मरण शक्ति कम होने लगती है। आकाश तत्व, शरीर में आवश्यकतानुसार संतुलन को बनाए रखने का कार्य करता है। जब इसमें विकार आता है तब इंसान शारीरिक संतुलन खोने लगता है। जप, कीर्तन, भजन, यज्ञ-हवन, ध्यान साधना से मनुष्य का इस लोक के साथ-साथ परलोक भी सुधर जाता हैं।

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यह कविता (वरदान – प्राणवान वसुंधरा।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बेचैन उर – व्यथा वसुंधरा की।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बेचैन उर – व्यथा वसुंधरा की। ♦

लिख डाला वृत्तांत धरा की, पर न आस न छूटी,
अंधियारी मिटाने को, तेरे द्वार आकर खड़ी।

है दीप्त मन भी, उतावला फिर मन भी,
कैसे पूर्ण करें हम, कोई राज नहीं है।

क्षिति की गोद में, बिलख रहें सब,
दूर खड़ा नभ भी, आँसू बहा रहा तब।

तृष्णा से तड़पता दिल, विह्वल सा दिख रहा है,
छटपटाहट जिगर की, सबको दिखला रहा है।

असिताङ्ग खड़ी है, अँधेरों ने आज घेरा है,
तिमिर मिटाने को, रोहिताश्व से लड़ा है।

प्रदीप अंतस् का, जलाने चला हूं,
उल्लास अपनी सब में, छितराने चला हूं।

कथा-कहानी सुनाने को, बेचैन बहुत हूं मगर,
हर घड़ी आतुर हो, कटिबद्ध खड़ा हूं।

जब साथ सकारे मिल जायें, गगन को झुका लूँगा,
कोई साथ दे दे तो मुझे, जलधि को सुखा लूँगा।

लगी दाढ़ा उर में मेरे, उसे और धधका लूंगा,
इस विश्व का गरल, कंठ में अपने समां लूंगा।

सांध्य – सवेरे मैं, वीणा के तान लगा कर,
आलाप अगर अधूरा होगा, तो राग विरह के गा लूंगा।

ऋतु की अगुवाई में, धरती का श्रृगांर कर जाऊं,
व्यथा-कथा वसुधा की, तालिस पत्र पर लिख जाऊं।

ऋषियों की तरह अडिग हो, चंद श्लोक लिख जाऊं,
व्याकुल वसुंधरा की व्यथा, कागज पर उकेर जाऊं।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अंटार्कटिक में बर्फ बहुत तेजी से पिघल रही है और वहां फिर इतनी बर्फ नहीं जम पाएगी। इस प्रक्रिया की गति को धीमा करने के लिए वातावरण से कार्बन निकालने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। ऑस्ट्रेलिया की एक जलवायु वैज्ञानिक और न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय में रिसर्च फेलो जोई थॉमस ने कहा, “हम पश्चिमी अंटार्कटिक में जो बर्फ की चादर देख रहे हैं कि उसके पिघलने की शुरुआत हो चुकी है। एक बार हम एक विशेष सीमा रेखा तक पहुंच गए तो फिर हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद इसे पिघलने से नहीं रोका जा सकता।” अगर अब भी मानव जाति नहीं सुधरी तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। कम से कम अब तो समझों पेड़ लगाना और उसकी देखभाल करना जरूरी हैं, नहीं तो इस पृथ्वी पर कोई भी जीव नहीं बचेगा। आओ हम सब मिलकर एक संकल्प ले की प्रत्येक वर्ष एक पेड़ जरूर लगाएंगे, और उसका अच्छे से देखभाल भी करेंगे।

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यह कविता (बेचैन उर – व्यथा वसुंधरा की।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिन्दू नववर्ष – आयो रे नवरात्रि।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दू नववर्ष – आयो रे नवरात्रि। ♦

शुभ मंगल गीत गाओ गुञ्जार करो भू-गगन को,
मैया की अगुवानी को आतुर नैना।
पर्ण-पलास पुष्पो से उसको सजाओ,
नववर्ष के नव दिन रहेगी मैया।
झूम-झूमकर गीत गाओ,
शुभ दिन आया है नवरात्रि का,
मंगलचारी गीत गाओ झूमों नाचो गाओ॥

शुभ आगमन है माँ का शुभ आगमन है,
मंजरित है आम की बगिया।
बाग – बहार रंगीली कलियों की निखार बनके,
रंगो – अबीरों से सज के सिंह पे सवार होके,
आई माता रानी, आजा मेरी मैया आजा।
शुभ आगमन है, माँ तेरा शुभ आगमन है,
मंगलचारी गीत गाओ झूमों नाचो गाओ॥

नवरात्री में आई नवदुर्गा नव रूप धरे,
हर रूप की महिमा अपनी।
जो शब्दों से बखान न हो सके,
कलश पर विराजे लक्ष्मी मैया।
संग-संग विराजे गणपति राजे,
पहली शैलपुत्री हिमराज सुता कहलाती।
दूसरी ब्रह्मचारिणी दुखियों की दुखहारिणी हो तुम॥

तीसरा रूप मैया का चंद्रघंटा कहलाये,
खल – अधम प्रकम्पित होते सारे।
चौथा रूप मैया का कुष्मांडा कहलाये,
पुलकित करती हर्ष – उल्लास जगाये।
पांचवी शक्ति स्कन्दन माता कहलाये,
शिव पुत्र कार्तिकेय के संग पूजी जाये।
छठवीं शक्ति मैया कात्यायनी हो तुम॥

ऋषिराज कात्यान की सुता बन आई,
सातंवा रुप है तेरा मैया कालरात्रि का।
दुर्जनों की विनाशक बन आई,
आठवां रूप महागौरी कहलाये।
अमोघ फलदायिनी तमाम कल्मष धोती मैया,
नौवीं मैया सिद्धिदात्री कहलाती।
सुख समृद्धि और मोक्ष की माता बन आई,
आई नवरात्रि हिन्दू नववर्ष ले आई।
मंगलचारी गीत गाओ झूमों नाचो गाओ॥

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — Hindu Calendar Vikram Samvat 2079, 2 अप्रैल, शनिवार से चैत्र नवरात्रि शुरू होने जा रहे हैं और इसी के साथ नया हिंदू वर्ष नवसंवत्सर 2079 भी आरंभ हो जाएगा। हर वर्ष चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष को हिंदू नववर्ष प्रारंभ होता है। चैत्र का महीना हिंदू नववर्ष का पहला महीना होता है। इसका प्रारंभ सम्राट विक्रमादित्य ने किया था, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरु होता है। इस बार 02 अप्रैल को हिंदू नववर्ष 2079 या विक्रम संवत 2079 का प्रारंभ होगा। हिंदू नववर्ष को विक्रम संवत, नव संवत्सर, गुड़ी पड़वा, उगाड़ी आदि नामों से भी जाना जाता है। विक्रम संवत के प्रथम दिन से ही बसंत नवरात्रि का प्रारंभ होता है, जो चैत्र नवरात्रि के नाम से लो​कप्रिय है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरुपों मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कूष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना करते हैं और मां दुर्गा का आह्वान करते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों का व्रत रखा जाता है। पारण के साथ इसका समापन करते हैं। हालांकि जो लोग पूरे 9 दिन व्रत नहीं रहते हैं, वे प्रथम दिन और दुर्गाष्टमी के दिन व्रत रखते हैं।

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यह कविता (हिन्दू नववर्ष – आयो रे नवरात्रि।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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युद्ध की तबाही।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ युद्ध की तबाही। ♦

तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर आ खड़ा भव,
इस बारुदी फसलों में अब बम-बारूद उगायेंगे।
खून ही बोयेगें और लाशें ही उगायेंगे,
इस बसी-बसाई दुनिया को वीरान बनायेंगे।

हँसते-मुस्कुराते चमन के गुलाबों को,
बारूदी काले जादू से कलियों को।
अपनी उन्मुक्तता में झूमते बालियों को,
इठलाती बलखाती शोख फूलों के क्यारियों को।

नदियों समन्दरों की लहरों पहरा होगा,
कल-कल करते झरनों के स्वर पर पहरा होगा।
खग-वृंद के नटखट कलरव गुंजन पर,
मोर मैना भौंरो भृंगों के गुंजार पर पहरा होगा।

सब ओर धुंध-धुंआ बारूद बन छा जायेंगें,
कोयल का कुंजन रुदन बन चिल्लायेंगे।
पपीहे की प्रीत भी डर के साये में खो जायेंगें,
लुक-छुप कर गाने वाले मौत की नींद सो जायेंगे।

दामिनियों की कड़-कड़ भी इनके सामने अदने से,
चिंगारियां उठाती भकजोगनियां भी छिप जायेंगी।
झींगुरों-सियारों का रुदन ही हम सुन पायेंगे,
सब ओर सिमटकर खामोशी से तबाही के गीत गायेंगे।

गोलियों की बौछारों से सावन भी शरमायेंगे,
विनाश की अमराई घर गली चौराहों पर आयेंगें।
हर उपवन डाली पर बारूद अंगार बरसायेंगे,
नफरत घृणा लालच आगे-आगे डंका बजायेंगे।

आज तड़प रहा संस्कृति-संस्कारों का देश,
ऋषि-मुनियों और वेद पुराणों पर बना देश।
कहां गये कुरान की वो आयत जिसमें कहा था,
गये कहां यीशू-पैगम्बर शान्ति जो बतलाते थे।

इस युद्ध विभीषिका में नित नये अध्याय जुड़ रहे,
अपनी महत्वाकांक्षा के चलते इक सभ्यता निगल रहा।
हथियारों पर दंभ रखने वालों आगाह है तुमको,
नाको चने चबवाने को अदने भी अड़कर खड़े हैं।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — युद्ध से कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं होता। कहने को तो आज मानव अपने आपको बहुत बड़ा ज्ञानी कहता है, लेकिन उसके सोच व कर्म विकर्मी होते जा रहे हैं। पृथ्वी एक बार पुनः विनाश कि तरफ बढ़ रहा है, आज मानव ही मानव के खून का प्यासा हो गया हैं। कोई भी किसी कि कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं है, सभी अपनी-अपनी ही जोत रहे हैं, सभी एक दूसरे को मारने के लिए तैयार हैं। जरा सोचे क्या इसी दिन के लिए मानव सभ्यता का इतना विकास हुआ? क्या विकास का यह परिणाम होता हैं? अगर ऐसे ही मानव विकास होता है तो, इससे अच्छा तो प्राचीन सभ्यता ही अच्छा है आज से ५५०० वर्ष पूर्व का। अभी भी समय है समझदारी सभी अपना दिखाए और सभी मिलजुलकर रहे, नहीं तो मानव सभ्यता पूर्ण रूप से नष्ट हो जाएगा।

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यह कविता (युद्ध की तबाही।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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जीतना ही जीवन है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जीतना ही जीवन है। ♦

हर प्राण का अस्तित्व में आना,
तन के साथ कर्म कर्तव्य का भी जन्म।
संघर्ष दायित्वों का निर्वहन बस,
आधार धरा का धरणी का जन्म।

प्रबल वेग से प्राण का बनना,
प्रचंड प्रकृति के कामों को।
भाव मान प्रतिष्ठा मानक का बनना,
सिद्धी प्रसिद्धि बुद्ध प्रबुद्ध को।

सृष्टि चिर-काल से निर्धारित करती,
मनु के जीवन की लड़ाई।
संघर्ष मन-तन से सदैव करती,
आत्मविश्वास की अडिग लड़ाई।

आक्रान्त हो नहीं जीत सका कोई,
जीवन और व्यक्तित्व के युद्ध को।
शान्त शील दुर्धर समय की कोई,
सीमा परिशिष्ट काल के बुद्ध की।

जीतना है जीवन को तो संघर्ष करो,
आत्मबल सामर्थ्य को कर प्रबल।
बढ़कर सामना करो समय के दुर्दिन का,
विश्वास न घटने दो अंतस्-तल।

एकाग्रचित्त होकर प्रचंड प्रयास करो,
भंग न होने दो अन्तर को।
निभृत तन रखकर केंद्र का विस्तार करो,
दंभ अपने उद्योग के पुर को।

संघर्ष मुझे जीना सिखा दो,
लड़ना और जीतना बता दो।
लड़ूं मैं… अपने वजूद से निरंतर,
संघर्ष तुम मुझे जीतना सिखा दो।

इस मृत्युलोक में आया हूं,
तन मानव का पाकर जीने को।
बुद्धि और विवेक मुझे दे दो,
जीत सकूं इस संघर्ष भरे जीवन को।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — मनुष्य जीवन में उतार – चढ़ाव तो आते रहते है, असफलता सदैव ही कुछ सीखा कर जाती है। आजकल के मनुष्य का मानना है की जीवन के किसी भी क्षेत्र में जीतना ही जीवन है। मनुष्य चाहता है की वह जो भी कार्य करें, उसमे उसकी विजय हो, लेकिन हमेशा ऐसा ही हो ये जरूरी तो नहीं। मेरी एक बात सदैव ही याद रखे – की कोई भी बुरा या अच्छा समय लम्बे समय के नहीं आता। बुरा या अच्छा समय निर्भर करता है हमारे अच्छे कर्म, व्यवहार व नज़रिये पर। इसलिए मन से कभी भी हताश निराश होकर जीवन में बैठ न जाये, सदैव ही अच्छे कर्म करते रहे। जब आपके कर्म अच्छे होंगे तो देर से ही सही आपको जीत जरूर मिलेगी।

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यह कविता (जीतना ही जीवन है।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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सभ्यता और संस्कृति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सभ्यता और संस्कृति। ♦

हम और हमारी नदी।

• विश्व जल दिवस के अवसर पर…

हम शैवालिनी के अन्तरीप हैं।
नहीं कहते की हम को छोड़ कर,
निर्झरणी बहती जाये हमें यह स्वरूप देती जाये।
शंकु, वीथिका, भूनासिका, उचनि, बलुआही अवारी,
इन सब को वर्तुलाकार उसने सृजन किया है।

पवित्र जल माँ है और इसी से हमारा अस्तित्व है,
मगर हम सब तो जजीरा हैं हममें नहीं प्रवाह हैं।
अटल अभ्यर्पण है हमारा इसके साथ,
चिर-काल से हम माँझा हैं पुलिनवती के,
लेकिन हम प्रवाही नहीं हैं।

चूंकि प्रवाहित होना हममें नहीं,
हम प्राण रणभूमि ही होंगे।
हम श्रवनेगें तो बचेंगें ही नहीं,
अंध्रि उन्मूलित होगी तैरना होगा।
ध्वस्त होगें, झेलना पड़ेगा और बह जायेंगे।

पुन: एक बार हम कल्क होकर भी,
किसी समय उत्पत्ति बन सकते हैं।
विशिका बन कर हम घनरस को थोड़ा
अमृष्ट ही करेंगे निर्रथक ही सब बनाएँगे,
जो हम जजीरा हैं सब।

नहीं यह है अभिशाप हम सबका है प्रारब्ध,
हम सरिता के अंगज हैं।
अध्यासीन हैं अर्णा के उछंग में,
वह दीर्घकाय भूभाग से हमको मिलती है,
इसके अलावा यह धरा अपने पुरखों की है।

हे सरिते, तुम यूं ही बहती चलो।
भू-भाग से जो दातव्य हमको मिला है,
वो हमें मिलता रहे सदा,
मलती, संस्कृति और संस्कार देती चलो।
जब ऐसा कभी हो आपका उल्लासों से या
दूसरों के किसी स्वेच्छाचार से उत्क्रमण से तुम बढ़ते रहो।

जल प्रलय तुम्हारा हिलकोर मारते उठे,
तब हे स्रोतस्विनी तुम कृतघ्नी ख्याति नाशिनी भीषण,
काल-प्रवाहिनी बन जाना।
हमें सब अंगीकार है यह भी,
उसी में रेणुका से होकर फिर बिछुड़ेंगे हम।

बसेंगें हम कहीं न कहीं फिर पैर रखेंगें,
कहीं पुन: फिर से खड़ा होगा नया अस्तित्व और स्वरूप।
हे मातु सरिते तुम उसे फिर से,
संस्कृति रीति नीति और संस्कार तुम ही देना।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हम बचपन से सुनते आ रहे है की “जल ही जीवन है” जल के बिना जीवन की कल्पना भी मुश्किल है। जल के बिना कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता ये सभी जानते है। अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो हमारे आने वाली नई पीढ़ी को जल मिलेगा ही नहीं। प्रदूषण, कल कारखानों के कारण बढ़ता ही चला जा रहा है। कल कारखानों से निकलता हुआ कचरा और विषाक्त पदार्थ नदियों और तालाबों में प्रवाहित कर दिए जाते है। जिससे पीने योग्य पानी भी विषाक्त होता जा रहा है। इंसानो ने अंधाधुन पेड़ों को काटा जिस कारण वर्षा का संतुलन बिगड़ गया पूर्ण धरा पर। अभी भी समय है संभल जाओ और सभी संकल्प करों की प्रत्येक वर्ष एक पेड़ जरूर लगाएंगे और उसका देखरेख करेंगे तब तक जब तक वह पेड़ अपना खुराक धरा से खुद न लेने लगे। जब हम सभी पेड़ लगाएंगे तो फिर से सभी नदियों में भरपूर पानी बहने लगेगा, और सभी का जीवन सुखमय होगा।

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यह कविता (सभ्यता और संस्कृति। – हम और हमारी नदी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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विश्व कविता दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ विश्व कविता दिवस। ♦

काव्य जगत।

धरणि के खंडों में विकसित अपनी-अपनी बोली,
हर साँस में बसी गंगा साहित्य काव्य की लहरी।

रंग बिरंगी आभा जिसकी मधुर-मधुर है वाणी,
प्रेम प्रीति बसी वक्ष में आकर्षित करती शैली।

चारण चाक्रिक भट्ट मंख भू जग में भरे सभी,
पावन पुनीत कोमल पल्लवन से सजे सभी।

हर्षित हो लिखें सभ्यता हृदय की भावों से भरी,
मसीपथ बनी आदर्श सभी की उत्कीर्ण करे मन की।

खलक जगत में कविता की मीठी-मीठी स्वर लहरी,
सुर-सरगम से सदा रची रहे विश्व जगत की ये बोली।

साहित्य सभ्यता संदर्प यहां कथन काव्य की जननी,
चिर-काल से संघर्ष समर करे वर्णाका मसी लेखनी।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कविता दिल की एक सच्ची अनुभूति है, जो एक कवि के हृदय की गहराई से निकली हुई कृति है। भाव स्वरूप कविता तो होता है जीवन का एक प्रवाह, जो सदैव ही प्रेरित करता है कार्यशील होने के लिए। हृदय की गहराई से निकली हुई कृति में न तो होती उसमें कोई भी बनावट, होती बस दिल के उदगारों की सजावट है। याद रखें – केवल शब्दों को लयबद्ध करना ही नही काफी होता है, सार्थक अर्थ के बिना तो शब्दों के संग नाइंसाफी होता है। गहरे अर्थ लिए हुए शब्दों का इक आईना होती है कविता, जिसमें अति सुंदर भाव के साथ-साथ होता हर शब्द का मायना है। ये कविता प्रेम का गहरा समुद्र है, दरिया इश्क का भी, जिसमें करुणा, जज्बात का अहसास, मरहम होता अश्क का भी। कहते है इंसान जब भी इसमें खो जाए तो हर शह में ही कविता गुनगुनाए, फिर जज्बातों की कलम से सदैव ही ह्रदय पर भाव अंकित करता जाए।

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यह कविता (विश्व कविता दिवस। – काव्य जगत।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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रंग बिरंगी होली आई रे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रंग बिरंगी होली आई रे। ♦

चल पड़ी मतवालों की ये टोली,
सबके होंठों पर सजी इक प्यारी बोली।
लो फिर से सजेगी रंगों की टोली,
प्रीति प्रेम की राह बनेगी होली।

होली के यंत्र-करण कई है,
संग जोड़ने वाले संबंध कई है।

रंग बिरंगे गर्द गुबारों से,
फिर से गुलालों की झड़ियों वाली है।
फिर से संवरेगी रंगों की हमजोली,
प्रीति प्रेम की स्रोत बनेगी होली।

कब तक रुष्ट रहोगे तुम सबसे,
कुछ तो बोलो क्यों हो गुमसुम तुम।

तुमको रंग लगाने में जाएगी गुम,
कटुता के कारावास से निकलो,
बन जाओ अब तो हमजोली।
फिर सजधज के आई रंगों की टोली,
प्रीति प्रेम की साधन बनेगी ये होली।

अंतस् में नहीं वंचना किसी के,
उत्तङ्ग बहुत है आत्मबल सबका।
होली के रंग बिरंगे कंगना,
उर पावन ब्रम्हद्रव से सजना।

अंत:सार भी निर्मल हो पूरा,
आनन अगर है परमप्रिय बोली।
फिर श्रृंगारित होती रंगों की होली,
प्रीति प्रेम की उर्मि बनेगी होली।

निकल पड़ी अलमस्तों की ये टोली,
सबकी जिह्वा पर इक ही बोली।
फिर बन-ठन कर आई रंगों की होली,
प्रीति प्रेम की निर्झर-सी बनेगी ये होली।

मंच (KMSRAJ51.COM) से जुड़े समस्त कवि/कवित्रियों को होलिका दहन एवं होली की शुभकामनायें।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — होली रंगों का ही नहीं सामाजिक भेदभाव मिटाने एवं सामूहिकता का पर्व भी है। होली बुराई पर अच्छाई के प्रतीक का पर्व भी है। इस बार हम होलिका दहन के साथ कोरोना वायरस का भी दहन करें तो फिर पहले की तरह सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में एक-दूसरे से गले मिलते हुए होली मना सकेंगे। होली रंगों का त्योहार है और जीवन में रंग तभी तक हैं, जब तक परिवार-समाज सुरक्षित है।

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यह कविता (रंग बिरंगी होली आई रे।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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