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हिंदी कविता

होली का त्यौहार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Holi Festival | होली का त्यौहार।

फाल्गुन का महीना आया होली का उत्सव आया है,
फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।
हिरण्यकश्यप ने स्वयं को भगवान बताया था,
पुत्र का ही शत्रु बन बैठा बहन होलिका को बुलाया था।

भक्त प्रहलाद विष्णु की पूजा करता था,
इसी बात से क्रोधित होकर प्रहलाद को बहन की गोद में बिठाया।
होलिका की गोद में बैठा प्रहलाद जल नहीं पाया था,
हुई कृपा प्रहलाद पर विष्णु की होलिका का दहन हुआ था।

नरसिंह का रूप रख विष्णु धरती पर आया था,
हिरण्यकश्यप का वध किया सारा जग हर्षाया था।
जब से होली का पर्व मनाया जाता है,
होली रंगों और खुशियों का त्यौहार है।

रंग बरसे लाल, गुलाबी, पीले रंगों से सब होली खेलते है,
भर – भर पिचकारी चलाये एक दूसरे रंग को रंग बरसाते है।
ढोलक की थाप पर नाचते सब नर – नारी है,
बनते घर – घर पकवान और व्यजंन है।

आयी – आयी देखो होली मस्तानों की टोली आयी है,
मिटाकर सारे गले – शिकवे एक दूसरे के गले मिलते है।
प्रेम, एकता की भावना का यह पर्व यही संदेश देता है,
न किसी से बैर करो, न ही किसी के दिल को दुखाना है,
मिलकर सबको होली का पर्व मानना है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आत्मिक प्रेम, निस्वार्थ स्नेह, करुणा व मानवता का पवित्र महापर्व होली हैं। अपने सम्पूर्ण विकारों को अग्नि को समर्पित कर एक अच्छे व सच्चे योगी जैसे पवित्र जीवन के नियमों के अनुसार जीवन जीना ही सच्ची होली हैं। याद रहे मलिन मन क्या जाने इस होली का उत्सव? पावनता तो जरूरी है। तन के रंगने से नहीं, मन के रंगे बिन, होली सबकी अधूरी है। मौसम के बदलाव की, नव फसलों के उगाव की, यह धुरी है। संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की, होली की क्रीड़ा पूरी है। बहन, भाई, मां, बेटी, पत्नी, पिता को, होली के रंग ही लहदे हैं। प्रेम है सब में, पर रूप अनेक है, यही तो रिश्तों के ओहदे हैं। अहंकार का नाश कर, सद्गुणों को धारण करने का महापर्व है होली। भक्त प्रह्लाद विष्णु के भक्त थे। हिरण्यकश्यप के वध के बाद वे ही असुरों के सम्राज्य के राजा बने थे। प्रहलाद के महान पुत्र विरोचन हुए और विरोचन से महान राजा बलि का जन्म हुआ जो महाबलीपुरम के राजा बने। इन बलि से ही श्री विष्णु ने वामन बनकर तीन पग धरती मांग ली थी।

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यह कविता (होली का त्यौहार।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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आया फाल्गुन का महीना।

Kmsraj51 की कलम से…..

Aaya Phagun Ka Mahina | आया फाल्गुन का महीना।

आया फाल्गुन का महीना,
लेके ढेर सारी सौगात।
प्रकृति को मानें या धर्म को,
अपने आप में है धार्मिक मास।

भारतवासियों के लिए बड़ा सुंदर महीना,
पंचांग में होता साल का आखरी मास।
ये महीना लाता दो बड़े त्योहार,
पहली महाशिवरात्रि, दूसरी होली का त्योहार।

सूरज की बढ़ती गर्मी की होती शुरुआत,
मौसम होती बड़ी सुहानी,
धरती पर आती वसंत की बहार।
ढोल, नगाड़े, झाल बजाते,
सभी गाते होली के गीत।

भेद भाव को भुलाकर, गले लगाते,
मुख पे लगाते रंग, गुलाल, अबीर,
भारतीय संस्कृति में हो जाते सब लीन।
हर घर से निकले, लेके रंग, अबीर,
रंगों में रंगा सबका चेहरा,
धन्य है हिंदुस्तान की जमीन।

ना कोइ हिन्दू, ना कोइ मुस्लिम,
ना कोइ सिक्ख, ईसाई, सबका चेहरा एक जैसा।
लगते हैं सब सगे भाई भाई,
ना कोइ ऊंचा, ना कोइ नीचा, होली है महान।
सारी नफरतें जल गई होलिका में,
यही है अनेकता में एकता, मेरा भारत है महान।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आत्मिक प्रेम, निस्वार्थ स्नेह, करुणा व मानवता का पवित्र महापर्व होली हैं। अपने सम्पूर्ण विकारों को अग्नि को समर्पित कर एक अच्छे व सच्चे योगी जैसे पवित्र जीवन के नियमों के अनुसार जीवन जीना ही सच्ची होली हैं। याद रहे मलिन मन क्या जाने इस होली का उत्सव? पावनता तो जरूरी है। तन के रंगने से नहीं, मन के रंगे बिन, होली सबकी अधूरी है। मौसम के बदलाव की, नव फसलों के उगाव की, यह धुरी है। संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की, होली की क्रीड़ा पूरी है। बहन, भाई, मां, बेटी, पत्नी, पिता को, होली के रंग ही लहदे हैं। प्रेम है सब में, पर रूप अनेक है, यही तो रिश्तों के ओहदे हैं। अहंकार का नाश कर, सद्गुणों को धारण करने का महापर्व है होली।

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यह कविता (आया फाल्गुन का महीना।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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प्रीत की रीत – होली।

Kmsraj51 की कलम से…..

Preet Ki Reet – Holi | प्रीत की रीत – होली।

प्रीत की झंकार है होली,
संधि की टंकार है होली।
केवल रंगो का खेल नहीं,
संस्कारों का त्यौहार है होली।

नेह का अंबार है होली,
स्नेह का शृंगार है होली।
भेदभाव का खेल नहीं,
आदर, सत्कार है होली।

अहंकार का संघार है होली,
विजय की हुंकार है होली।
होली पर्व अंह पर जय का,
धर्म – कर्म का संचार है होली।

है राधा की प्रीत में होली,
है मीरा के संगीत में होली।
होली के रंग रंगीन प्रेम से,
बुरे पर‌ भले की जीत है होली।

♦ नंदिता माजी शर्मा – मुंबई, महाराष्ट्र ♦

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  • “नंदिता माजी शर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — आत्मिक प्रेम, निस्वार्थ स्नेह, करुणा व मानवता का पवित्र महापर्व होली हैं। अपने सम्पूर्ण विकारों को अग्नि को समर्पित कर एक अच्छे व सच्चे योगी जैसे पवित्र जीवन के नियमों के अनुसार जीवन जीना ही सच्ची होली हैं। याद रहे मलिन मन क्या जाने इस होली का उत्सव? पावनता तो जरूरी है। तन के रंगने से नहीं, मन के रंगे बिन, होली सबकी अधूरी है। मौसम के बदलाव की, नव फसलों के उगाव की, यह धुरी है। संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की, होली की क्रीड़ा पूरी है। बहन, भाई, मां, बेटी, पत्नी, पिता को, होली के रंग ही लहदे हैं। प्रेम है सब में, पर रूप अनेक है, यही तो रिश्तों के ओहदे हैं। अहंकार का नाश कर, सद्गुणों को धारण करने का महापर्व है होली।

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यह कविता (प्रीत की रीत – होली।) “नंदिता माजी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख/आलेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

नाम – नंदिता माजी शर्मा

साहित्यिक नाम : नंदिता “आनंदिता”
लेखिका/डिजीटल अलंकरणकर्ता/कवियत्री/समाज सेविका 
संस्थापक/अध्यक्ष — कर्मा फाऊंडेशन
राष्ट्रीय सह-अध्यक्ष — साहित्य संगम संस्थान (पंजीकृत साहित्यिक संस्था)
अलंकरण प्रमुख — साहित्योदय(पंजीकृत साहित्यिक संस्था)
अलंकरण अधिकारी — अंतरराष्ट्रीय शब्द सृजन
प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष — साहित्य संगम संस्थान, (महाराष्ट्र इकाई)
जिला प्रभारी — एन.जी.टी.ओ
मीडिया प्रभारी — महाराष्ट्र शब्दाक्षर
मुख्य संपादक — दोहा संगम ( मासिक ई पत्रिका )
प्रधान संपादक — वंदिता ( मासिक ई पत्रिका )
मुख्य संपादक — महाराष्ट्र मल्हार ( मासिक ई पत्रिका )
प्रधान संपादक — आह्लाद मासिक ई-पत्रिका
प्रधान संपादक — अविचल प्रभा मासिक ई-पत्रिका

कई विधाओं में लेखन।

अनेक ई-पत्रिकाओं का सफल संपादन।
विभिन्न साहित्यिक मंचो और गोष्ठियों से ‘श्रेष्ठ रचनाकार’ ‘सर्वश्रेष्ठ रचनाकार’ इत्यादि अनेक सम्मान प्राप्त।
हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में स्वतंत्र लेखन।
०६ साझा – संग्रह ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज।
अनावृत संचालन हेतु लन्दन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
०१ साझा – संग्रह इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज।
०१ दिव्याक्षर ब्रेल साझा – संग्रह वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज।
हिंदी अकादमी, मुंबई द्वारा साहित्य भूषण सम्मान २०२३ से सम्मानित।

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आई है होली।

Kmsraj51 की कलम से…..

Aaee Hai Holi | आई है होली।

होली रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।

आई है होली चौहूं ओर लोग झूमे हैं नाचे, रंगों की बौछार है।
किसी के दिल में वासनाएं हैं घनी, किसी के प्यार ही प्यार है।

आई है होली हरदम हृदय को, छेड़-छेड़ कर ये आती है।
फाल्गुन मास की यह क्रीड़ा, किसके मन को न भाती है?

कुदरत करती है वसंती श्रृंगार, तो हवा भी होती मदमाती है।
फूलों से सजते वन उपवन हैं, चौहूँ ओर से खुशबू आती है।

होलिका दहन से उपजी यह क्रीड़ा, ऐसे ही बस चलती है।
बुराई का दहन अच्छाई का वहन, परम्परा यूं ही फलती है।

बरसाणे की होली, कृपाण व गोली, रक्तिम रंग से खेली है।
वे प्रेम के रंग से खेले, इन्होंने प्रणाहुतियों की पीड़ा झेली है।

मलिन मन क्या जाने होली का उत्सव? पावनता जरूरी है।
तन के रंगने से नहीं मन के रंगे बिन, होली सबकी अधूरी है।

मौसम के बदलाव की, नव फसलों के उगाव की, यह धुरी है।
संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की, होली की क्रीड़ा पूरी है।

उछलते कूदते, नाचते गाते, खलियानों में युवक युवती है।
बाल वृद्ध सबको निज पाश में, बांधने की इसमें युक्ति है।

वीर शहीदों ने फिरंगी संघ, होली खेल के यातनाएं भुक्ति है।
प्रेम गुलाल से जो खेलेगा होली, उसी के लिए यह मुक्ति है।

नदी मानिद बहती परंपराएं, विकार आए हो कहां रुकती है?
भारत की अनूठी पर्व यात्रा, किसी के टोके कहां टूटती है?

बहन, भाई, मां, बेटी, पत्नी, पिता को, होली के रंग ही लहदे हैं।
प्रेम है सब में, पर रूप अनेक है, यही तो रिश्तों के ओहदे हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आत्मिक प्रेम, निस्वार्थ स्नेह, करुणा व मानवता का पवित्र महापर्व होली हैं। अपने सम्पूर्ण विकारों को अग्नि को समर्पित कर एक अच्छे व सच्चे योगी जैसे पवित्र जीवन के नियमों के अनुसार जीना ही सच्ची होली हैं। याद रहे मलिन मन क्या जाने इस होली का उत्सव? पावनता तो जरूरी है। तन के रंगने से नहीं मन के रंगे बिन, होली सबकी अधूरी है। मौसम के बदलाव की, नव फसलों के उगाव की, यह धुरी है। संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की, होली की क्रीड़ा पूरी है। बहन, भाई, मां, बेटी, पत्नी, पिता को, होली के रंग ही लहदे हैं। प्रेम है सब में, पर रूप अनेक है, यही तो रिश्तों के ओहदे हैं। भक्त प्रह्लाद विष्णु के भक्त थे। हिरण्यकश्यप के वध के बाद वे ही असुरों के सम्राज्य के राजा बने थे। प्रहलाद के महान पुत्र विरोचन हुए और विरोचन से महान राजा बलि का जन्म हुआ जो महाबलीपुरम के राजा बने। इन बलि से ही श्री विष्णु ने वामन बनकर तीन पग धरती मांग ली थी।

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यह कविता (आई है होली।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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होली से होलिका।

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Holi to Holika | होली से होलिका।

होली रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।

आओ मिलकर रंगोत्सव मनाते हैं,
खोई हुई संस्कृति को वापस लाते हैं।

फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष, प्रतिपदा तिथि आई है,
पुरातन समय की बातें यादें साथ लाई है,
कृष्ण राधा की वो बरसाने वाली होली मन में समाई है।

होलिका दहन की परंपरा की कथा मन में समाई है,
भगत प्रहलाद(प्रह्लाद) की निष्ठा भक्ति सबके मन में समाई है।
कृष्ण राधा की वो……

हिरण्यकश्यप ने तप करके खुद को भगवान कहता भाई है,
भगत प्रहलाद की भक्ति भी बाधित करवाता भाई है।
कृष्ण राधा की वो……

बुआ होलिका के हाथों प्रहलाद को मरवाने की करता ढिठाई है,
भगत प्रहलाद को गोद में ले होलिका अग्नि बीच समाई है।
कृष्ण राधा की वो……

भगत प्रहलाद ने अग्नि के बीच भी विष्णु भगवान की माला जपाई है,
भगवान विष्णु की लीला से होलिका की चुनरी प्रहलाद के तन पर आई है।
कृष्ण राधा की वो……

भगत प्रहलाद बच गए होलिका अग्नि में समाई हैं,
उस दिन से आज तक हम होलिका दहन की परंपरा निभाते भाई है।
कृष्ण राधा की वो……

इतिहास से जुड़ी ये कहानी फिर से दोहराई है,
भगत प्रहलाद जैसी भक्ति किसी ने नहीं पाई है,
कृष्ण राधा की वो बरसाने वाली होली मन में समाई है।

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

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  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए; इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — हिरण्यकश्यप का सबसे बड़ा पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का उपासक था और यातना एवं प्रताड़ना के बावजूद वह विष्णु की पूजा करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाय क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। भगत प्रहलाद बच गए होलिका अग्नि में समाई हैं, उस दिन से आज तक हम होलिका दहन की परंपरा निभाते भाई है। भक्त प्रह्लाद विष्णु के भक्त थे। हिरण्यकश्यप के वध के बाद वे ही असुरों के सम्राज्य के राजा बने थे। प्रहलाद के महान पुत्र विरोचन हुए और विरोचन से महान राजा बलि का जन्म हुआ जो महाबलीपुरम के राजा बने। इन बलि से ही श्री विष्णु ने वामन बनकर तीन पग धरती मांग ली थी।

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यह कविता (होली से होलिका।) “विजयलक्ष्मी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कुछ पता नहीं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kuch Pata Nahin | कुछ पता नहीं।

कुछ पता नहीं,
आई कब-कब तेरी याद।
दिन बहुत बीत गये,
पर आई न तेरे चेहरे की सौगात,
कुछ पता नहीं…?

क्षीण होती यादों में,
उभरती कई रेखाएं।
माथे पर पड़ती,
सिकन की लकीरें।
सुधों वाली वह काली रात,
इतनी शान्त थी।
की पत्ता भी हिले,
तो शोर मचाती वह काली रात।
अचानक तंद्रा को भेदकर,
अंतस् तक को झकझोरती सी,
कुछ पता नहीं…?

ऐसा लगा मानों कानों में,
कोई सरगोशी कर रहा।
छाती के द्वार पर चोट कर रहा,
दबे पाँव चुपके-चुपके।
दिल में उतर रहा,
अपनी यादों को।
मेरे जेहन में नाखूनों से,
कुरेद कुरेद कर उभार रहा,
कुछ पता नहीं…?

अँधेरें में उठ-उठकर,
उसके आने की आहट,
सुनता रहा।
न आने की चुभन हिय में लिये,
सूनी अँखियों से,
झरोखे से निहारता रहा।
कहीं से; यादों से उतर कर,
सामने आ जाये।
जिसकी यादों को,
आँखों में बसाये हुए।
चलते आ रहे हैं,
हम वीराने भरे जीवन में,
कुछ पता नहीं…?

ये इंतजार कब खतम होगा,
कभी लगता है मुझे,
वो यादों में रहकर,
करता होगा इंतजार।
मेरे मरने का,
कफ़न तो पहना है हमने।
बस उनकी यादों का,
सूनी अँखियों के पैमानों का,
कुछ पता नहीं…?

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (कुछ पता नहीं।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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दोहे – अंदाजे बयां — पार्ट-2

Kmsraj51 की कलम से…..

Dohe – Andaze Bayan Part-2 | दोहे – अंदाजे बयां — पार्ट-2

बेटियाँ सुखी ससुराल में, होंगे दु:ख भी चंद,
बिकी नहीं पर हो गयी, चूड़ी कंगन बाजूबंद।

आगर बैठे बेचते, शिखी सारंग और दीप,
अपना रोजगार खोज ले, हर मोती और सीप।

भारी बोझ चट्टान सा, तनिक हल्का हो जाय,
मेरी चिंता जब बढ़े, सपने में जब माँ आय।

‘परिमल’ किस्मत बात की, उसका कौन उपाय,
सपने में सोना मिले, तड़ से नयन खुल जाय।

गज भर के कान है, विस्वा भर के हाथ,
हर दिन उसकी नवरात्रि है, दीपशिखा हर रात।

बसंतजा में क्यों नहीं, और ऋतुओं की बात,
सावन मन-भावन नहीं, बिन जल की बरसात।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह दोहे (दोहे – अंदाजे बयां — पार्ट – 2) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हम बेवफा नहीं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Ham Bewafa Nahin | हम बेवफा नहीं।

त्याग देते तुझे, भाग जाते हम भी,
पर दिल जो तुम्हारे पास हमारा है।

बन फरेबी, लेक सारा झूठ का,
महान बनते, पर कसम तुम्हारी जो खाई।

रूसवा हम भी कर देते गलियारों में,
पर हर सांचे पर लिखा नाम तुम्हारा है।

बदल तो हम भी लेते तुम्हें औरों से,
उसे पर चित में बैठा, निकालते नहीं।

जुबां, निगाहें, तन दे दिया तुम्हें,
भल्ला पराई चीजें बांटता कौन है?

लेकर चंद पैसे लगा देते मोल हम भी,
मेरे लिए अनमोल रिश्ता जो तुम्हारा है।

लग जाते हमें भी हसीन शहर में कई,
पर नैन देखना ही नहीं चाहते औरों को।

पीछे से आवाज हमें भी मारी थी किसी ने,
पर कमबख्त कर्ण सिर्फ सुनते तुम्हारी आवाज है।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — त्याग देते तुझे, भाग जाते हम भी कहीं पर दिल जो तुम्हारे पास हमारा है। बन फरेबी यूँ, लेक सारा झूठ का, महान बनते, पर कसम तुम्हारी जो खाई हैं हमने। रूसवा हम भी कर देते गलियारों में,पर हर सांचे पर लिखा नाम तुम्हारा जो लिखा है। बदल तो हम भी लेते तुम्हें औरों से, उसे पर चित में बैठा, निकालते नहीं, ये हमारे संस्कार नहीं। सब कुछ तो दिया तुम्हे, जुबां, निगाहें, तन दे दिया तुम्हें, भल्ला पराई चीजें बांटता कौन है? जरा सोचो – लेकर चंद पैसे लगा देते मोल हम भी, मगर मेरे लिए अनमोल रिश्ता जो तुम्हारा है। लग जाते हमें भी हसीन शहर में कई, पर मेरे नैन कभी देखना ही नहीं चाहते औरों को। पीछे से आवाज हमें भी मारी थी किसी ने, पर कमबख्त कर्ण सिर्फ सुनते तुम्हारी ही आवाज है।

—————

यह कविता (हम बेवफा नहीं।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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राज बताते नहीं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Raaj Bataate Nahin | राज बताते नहीं।

प्रेम पत्र सभी को दिखाते नहीं,
हाथों से लिखी भावनाएं मिटाते नहीं।

भेजा था चित्र सभी को दिखाते नहीं,
खोलते चूमा जिसे बटुए से हटाते नहीं।

मन की बेचैनी को यूं जताते नहीं,
ओ राज था राज को बताते नहीं।

महीने गुजारे इंतजार में सबको दिखाते नहीं,
रात भर बातें की थी तन्हाई को दिखाते नहीं।

पेड़, झरने, पानी, बर्फ छोड़ कागज निहारते नहीं,
वादियों के बीच में महबूबा-महबूबा चिल्लाते नहीं।

90 दिन में हर एक दिन यूं काटते नहीं,
बचे बस दिन कुछ, यह आश लगाते नहीं।

छुट्टी की खुशी में भागे-भागे यू आते नहीं,
बचा हर पल को यूं खुद को परेशान करते नहीं।

आ कर जाने की तिथि बताते नहीं,
खुशी में यूं जाना है रोज बताते नहीं।

जाते वक्त मुरझाया चेहरा दिखाते नहीं,
पी आंसू नकली हंसी इन्द्रा हंसते नहीं।

हर बार छोड़ सीमा को यूं जाते नहीं,
जिम्मेदारियों का बहाना हर बार बनाते नहीं।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आपसी दिल से लिखा हुआ प्रेम पत्र सभी को दिखाते नहीं, हाथों से लिखी भावनाएं कभी मिटाते नहीं। भेजा था चित्र सभी को दिखाते नहीं, खोलते चूमा जिसे बटुए से कभी हटाते नहीं। ओ मन की बेचैनी को यूं जताते नहीं, ओ राज था राज को बताते नहीं। किस क़दर महीने गुजारे इंतजार में सबको दिखाते नहीं, यूँ रात भर बातें की थी तन्हाई को कभी भी दिखाते नहीं। खूबसूरत वादियों के बीच में यूँ महबूबा-महबूबा चिल्लाते नहीं। कभी भी आ कर जाने की तिथि बताते नहीं, खुशी में यूं जाना है हर रोज बताते नहीं। जाते वक्त अपना मुरझाया चेहरा दिखाते नहीं, पी आंसू नकली हंसी इन्द्रा हंसते नहीं। हर बार छोड़ सीमा को यूं जाते नहीं, जिम्मेदारियों का बहाना हर बार बनाते नहीं।

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यह कविता (राज बताते नहीं।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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माघ का सूरज।

Kmsraj51 की कलम से…..

Magh’s Sun | माघ का सूरज।

माघ का सूरज क्यूं इतना इतराता है,
आश लगाए बैठा हूं,
कभी आता है कभी जाता है।
सर्द हवाओं का झोंका लेकर,
क्यूं इतना इठलाता है,
तेरी गर्मी कहां गई,
क्यूं इतना तड़पाता है।

आने दे जेष्ठ का महीना,
तू खुद पछताएगा,
लोग बैठेंगे छांव में,
तेरा मोल क्या रह जाएगा,
तेरी आंखों का पानी मरा,
मरी शर्म और लाज।

तू कैसा मालिक जगत का,
कैसा तेरा राज,
बच्चे, बूढ़े बिलख़ रहे,
कहां तेरा दया, धरम, ईमान।
सर्द हवाओं ने ले ली
अब तक हज़ारों जान,
पूछता हूं, कहां है भगवान,
ए पत्थर दिल इंसान।

मैं पूजता रहा पत्थर में
छुपे भगवान को,
देख लो लगाता हूं
हर रोज छप्पन भोग।
क्यूं मर जाते फूटपाथ पर,
नंगे, कांपते, भूखे लोग,
पाखण्ड ही पाखंड है,
अंधकार है हर ओर।

दिखावा करता इंसान,
मचा – मचा कर शोर,
कड़ाके की सर्दी है,
थोड़ी सी भी धूप नहीं।
तन पर कपड़ा नहीं,
बिन चादर बैठी बूढ़ी माई,
मानवता हुई शर्मसार,
देखो अबला कैसे कांप रही।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — माघ का सूरज क्यूं तू इतना इतराता है, आश लगाए बैठा हूं, कभी आता है तो कभी जाता है। सर्द हवाओं का झोंका लेकर, क्यूं इतना इठलाता है, तेरी गर्मी कहां गई, क्यूं इतना तड़पाता है।भूल ना जाओ, आने दे जेष्ठ का महीना, तू खुद पछताएगा, लोग बैठेंगे छांव में, तेरा मोल क्या रह जाएगा, तेरी आंखों का पानी मरा, मरी शर्म और लाज। सच्ची सेवा तो मानव सेवा है कब समझेगा आज का इंसान। इंसान होकर भी यदि जरूरतमंद की मदद ना कर पाए तो भला ऐसे जन्म का क्या फायदा? कोशिश सदैव यही करो की मानव सेवा को अपना परम धर्म बनाओ।

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यह कविता (माघ का सूरज।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: Bhola Sharan Prasad, poem on sun, भोला शरण प्रसाद, भोला शरण प्रसाद जी की कविताएं, माघ का सूरज, माघ का सूरज - भोला शरण प्रसाद, सूरज पर कविता हिंदी में

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