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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

होली से होलिका।

Kmsraj51 की कलम से…..

Holi to Holika | होली से होलिका।

होली रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।

आओ मिलकर रंगोत्सव मनाते हैं,
खोई हुई संस्कृति को वापस लाते हैं।

फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष, प्रतिपदा तिथि आई है,
पुरातन समय की बातें यादें साथ लाई है,
कृष्ण राधा की वो बरसाने वाली होली मन में समाई है।

होलिका दहन की परंपरा की कथा मन में समाई है,
भगत प्रहलाद(प्रह्लाद) की निष्ठा भक्ति सबके मन में समाई है।
कृष्ण राधा की वो……

हिरण्यकश्यप ने तप करके खुद को भगवान कहता भाई है,
भगत प्रहलाद की भक्ति भी बाधित करवाता भाई है।
कृष्ण राधा की वो……

बुआ होलिका के हाथों प्रहलाद को मरवाने की करता ढिठाई है,
भगत प्रहलाद को गोद में ले होलिका अग्नि बीच समाई है।
कृष्ण राधा की वो……

भगत प्रहलाद ने अग्नि के बीच भी विष्णु भगवान की माला जपाई है,
भगवान विष्णु की लीला से होलिका की चुनरी प्रहलाद के तन पर आई है।
कृष्ण राधा की वो……

भगत प्रहलाद बच गए होलिका अग्नि में समाई हैं,
उस दिन से आज तक हम होलिका दहन की परंपरा निभाते भाई है।
कृष्ण राधा की वो……

इतिहास से जुड़ी ये कहानी फिर से दोहराई है,
भगत प्रहलाद जैसी भक्ति किसी ने नहीं पाई है,
कृष्ण राधा की वो बरसाने वाली होली मन में समाई है।

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

—————

  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए; इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — हिरण्यकश्यप का सबसे बड़ा पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का उपासक था और यातना एवं प्रताड़ना के बावजूद वह विष्णु की पूजा करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाय क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। भगत प्रहलाद बच गए होलिका अग्नि में समाई हैं, उस दिन से आज तक हम होलिका दहन की परंपरा निभाते भाई है। भक्त प्रह्लाद विष्णु के भक्त थे। हिरण्यकश्यप के वध के बाद वे ही असुरों के सम्राज्य के राजा बने थे। प्रहलाद के महान पुत्र विरोचन हुए और विरोचन से महान राजा बलि का जन्म हुआ जो महाबलीपुरम के राजा बने। इन बलि से ही श्री विष्णु ने वामन बनकर तीन पग धरती मांग ली थी।

—————

यह कविता (होली से होलिका।) “विजयलक्ष्मी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कुछ पता नहीं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kuch Pata Nahin | कुछ पता नहीं।

कुछ पता नहीं,
आई कब-कब तेरी याद।
दिन बहुत बीत गये,
पर आई न तेरे चेहरे की सौगात,
कुछ पता नहीं…?

क्षीण होती यादों में,
उभरती कई रेखाएं।
माथे पर पड़ती,
सिकन की लकीरें।
सुधों वाली वह काली रात,
इतनी शान्त थी।
की पत्ता भी हिले,
तो शोर मचाती वह काली रात।
अचानक तंद्रा को भेदकर,
अंतस् तक को झकझोरती सी,
कुछ पता नहीं…?

ऐसा लगा मानों कानों में,
कोई सरगोशी कर रहा।
छाती के द्वार पर चोट कर रहा,
दबे पाँव चुपके-चुपके।
दिल में उतर रहा,
अपनी यादों को।
मेरे जेहन में नाखूनों से,
कुरेद कुरेद कर उभार रहा,
कुछ पता नहीं…?

अँधेरें में उठ-उठकर,
उसके आने की आहट,
सुनता रहा।
न आने की चुभन हिय में लिये,
सूनी अँखियों से,
झरोखे से निहारता रहा।
कहीं से; यादों से उतर कर,
सामने आ जाये।
जिसकी यादों को,
आँखों में बसाये हुए।
चलते आ रहे हैं,
हम वीराने भरे जीवन में,
कुछ पता नहीं…?

ये इंतजार कब खतम होगा,
कभी लगता है मुझे,
वो यादों में रहकर,
करता होगा इंतजार।
मेरे मरने का,
कफ़न तो पहना है हमने।
बस उनकी यादों का,
सूनी अँखियों के पैमानों का,
कुछ पता नहीं…?

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (कुछ पता नहीं।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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दोहे – अंदाजे बयां — पार्ट-2

Kmsraj51 की कलम से…..

Dohe – Andaze Bayan Part-2 | दोहे – अंदाजे बयां — पार्ट-2

बेटियाँ सुखी ससुराल में, होंगे दु:ख भी चंद,
बिकी नहीं पर हो गयी, चूड़ी कंगन बाजूबंद।

आगर बैठे बेचते, शिखी सारंग और दीप,
अपना रोजगार खोज ले, हर मोती और सीप।

भारी बोझ चट्टान सा, तनिक हल्का हो जाय,
मेरी चिंता जब बढ़े, सपने में जब माँ आय।

‘परिमल’ किस्मत बात की, उसका कौन उपाय,
सपने में सोना मिले, तड़ से नयन खुल जाय।

गज भर के कान है, विस्वा भर के हाथ,
हर दिन उसकी नवरात्रि है, दीपशिखा हर रात।

बसंतजा में क्यों नहीं, और ऋतुओं की बात,
सावन मन-भावन नहीं, बिन जल की बरसात।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह दोहे (दोहे – अंदाजे बयां — पार्ट – 2) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हम बेवफा नहीं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Ham Bewafa Nahin | हम बेवफा नहीं।

त्याग देते तुझे, भाग जाते हम भी,
पर दिल जो तुम्हारे पास हमारा है।

बन फरेबी, लेक सारा झूठ का,
महान बनते, पर कसम तुम्हारी जो खाई।

रूसवा हम भी कर देते गलियारों में,
पर हर सांचे पर लिखा नाम तुम्हारा है।

बदल तो हम भी लेते तुम्हें औरों से,
उसे पर चित में बैठा, निकालते नहीं।

जुबां, निगाहें, तन दे दिया तुम्हें,
भल्ला पराई चीजें बांटता कौन है?

लेकर चंद पैसे लगा देते मोल हम भी,
मेरे लिए अनमोल रिश्ता जो तुम्हारा है।

लग जाते हमें भी हसीन शहर में कई,
पर नैन देखना ही नहीं चाहते औरों को।

पीछे से आवाज हमें भी मारी थी किसी ने,
पर कमबख्त कर्ण सिर्फ सुनते तुम्हारी आवाज है।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — त्याग देते तुझे, भाग जाते हम भी कहीं पर दिल जो तुम्हारे पास हमारा है। बन फरेबी यूँ, लेक सारा झूठ का, महान बनते, पर कसम तुम्हारी जो खाई हैं हमने। रूसवा हम भी कर देते गलियारों में,पर हर सांचे पर लिखा नाम तुम्हारा जो लिखा है। बदल तो हम भी लेते तुम्हें औरों से, उसे पर चित में बैठा, निकालते नहीं, ये हमारे संस्कार नहीं। सब कुछ तो दिया तुम्हे, जुबां, निगाहें, तन दे दिया तुम्हें, भल्ला पराई चीजें बांटता कौन है? जरा सोचो – लेकर चंद पैसे लगा देते मोल हम भी, मगर मेरे लिए अनमोल रिश्ता जो तुम्हारा है। लग जाते हमें भी हसीन शहर में कई, पर मेरे नैन कभी देखना ही नहीं चाहते औरों को। पीछे से आवाज हमें भी मारी थी किसी ने, पर कमबख्त कर्ण सिर्फ सुनते तुम्हारी ही आवाज है।

—————

यह कविता (हम बेवफा नहीं।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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राज बताते नहीं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Raaj Bataate Nahin | राज बताते नहीं।

प्रेम पत्र सभी को दिखाते नहीं,
हाथों से लिखी भावनाएं मिटाते नहीं।

भेजा था चित्र सभी को दिखाते नहीं,
खोलते चूमा जिसे बटुए से हटाते नहीं।

मन की बेचैनी को यूं जताते नहीं,
ओ राज था राज को बताते नहीं।

महीने गुजारे इंतजार में सबको दिखाते नहीं,
रात भर बातें की थी तन्हाई को दिखाते नहीं।

पेड़, झरने, पानी, बर्फ छोड़ कागज निहारते नहीं,
वादियों के बीच में महबूबा-महबूबा चिल्लाते नहीं।

90 दिन में हर एक दिन यूं काटते नहीं,
बचे बस दिन कुछ, यह आश लगाते नहीं।

छुट्टी की खुशी में भागे-भागे यू आते नहीं,
बचा हर पल को यूं खुद को परेशान करते नहीं।

आ कर जाने की तिथि बताते नहीं,
खुशी में यूं जाना है रोज बताते नहीं।

जाते वक्त मुरझाया चेहरा दिखाते नहीं,
पी आंसू नकली हंसी इन्द्रा हंसते नहीं।

हर बार छोड़ सीमा को यूं जाते नहीं,
जिम्मेदारियों का बहाना हर बार बनाते नहीं।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आपसी दिल से लिखा हुआ प्रेम पत्र सभी को दिखाते नहीं, हाथों से लिखी भावनाएं कभी मिटाते नहीं। भेजा था चित्र सभी को दिखाते नहीं, खोलते चूमा जिसे बटुए से कभी हटाते नहीं। ओ मन की बेचैनी को यूं जताते नहीं, ओ राज था राज को बताते नहीं। किस क़दर महीने गुजारे इंतजार में सबको दिखाते नहीं, यूँ रात भर बातें की थी तन्हाई को कभी भी दिखाते नहीं। खूबसूरत वादियों के बीच में यूँ महबूबा-महबूबा चिल्लाते नहीं। कभी भी आ कर जाने की तिथि बताते नहीं, खुशी में यूं जाना है हर रोज बताते नहीं। जाते वक्त अपना मुरझाया चेहरा दिखाते नहीं, पी आंसू नकली हंसी इन्द्रा हंसते नहीं। हर बार छोड़ सीमा को यूं जाते नहीं, जिम्मेदारियों का बहाना हर बार बनाते नहीं।

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यह कविता (राज बताते नहीं।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

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माघ का सूरज।

Kmsraj51 की कलम से…..

Magh’s Sun | माघ का सूरज।

माघ का सूरज क्यूं इतना इतराता है,
आश लगाए बैठा हूं,
कभी आता है कभी जाता है।
सर्द हवाओं का झोंका लेकर,
क्यूं इतना इठलाता है,
तेरी गर्मी कहां गई,
क्यूं इतना तड़पाता है।

आने दे जेष्ठ का महीना,
तू खुद पछताएगा,
लोग बैठेंगे छांव में,
तेरा मोल क्या रह जाएगा,
तेरी आंखों का पानी मरा,
मरी शर्म और लाज।

तू कैसा मालिक जगत का,
कैसा तेरा राज,
बच्चे, बूढ़े बिलख़ रहे,
कहां तेरा दया, धरम, ईमान।
सर्द हवाओं ने ले ली
अब तक हज़ारों जान,
पूछता हूं, कहां है भगवान,
ए पत्थर दिल इंसान।

मैं पूजता रहा पत्थर में
छुपे भगवान को,
देख लो लगाता हूं
हर रोज छप्पन भोग।
क्यूं मर जाते फूटपाथ पर,
नंगे, कांपते, भूखे लोग,
पाखण्ड ही पाखंड है,
अंधकार है हर ओर।

दिखावा करता इंसान,
मचा – मचा कर शोर,
कड़ाके की सर्दी है,
थोड़ी सी भी धूप नहीं।
तन पर कपड़ा नहीं,
बिन चादर बैठी बूढ़ी माई,
मानवता हुई शर्मसार,
देखो अबला कैसे कांप रही।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — माघ का सूरज क्यूं तू इतना इतराता है, आश लगाए बैठा हूं, कभी आता है तो कभी जाता है। सर्द हवाओं का झोंका लेकर, क्यूं इतना इठलाता है, तेरी गर्मी कहां गई, क्यूं इतना तड़पाता है।भूल ना जाओ, आने दे जेष्ठ का महीना, तू खुद पछताएगा, लोग बैठेंगे छांव में, तेरा मोल क्या रह जाएगा, तेरी आंखों का पानी मरा, मरी शर्म और लाज। सच्ची सेवा तो मानव सेवा है कब समझेगा आज का इंसान। इंसान होकर भी यदि जरूरतमंद की मदद ना कर पाए तो भला ऐसे जन्म का क्या फायदा? कोशिश सदैव यही करो की मानव सेवा को अपना परम धर्म बनाओ।

—————

यह कविता (माघ का सूरज।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पिता की सीख ही सच्ची थी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Pita Ki Seekh Hi Sacchi Thi | पिता की सीख ही सच्ची थी।

“कहलाना तो है मानव हमको,
पर पशु सा हमे सब करने दो।
पिता हो तुम तो फिर क्या हुआ?
हमे मर्जी से ही सब करने दो।”

“जन्म दिया और पाला – पोसा,
पढ़ाया – लिखाया, बड़ा किया।”
“कौन सा तीर मारा है तुमने?
फर्ज मां – बाप का अदा किया।”

“धन्य लला तुम जो जान खपा कर,
आज तुमसे ये शब्द उपहार मिला।
नेकी कर दरिया में डाल का उम्दा,
पितृ कर्म का उत्तम उपकार मिला।

निवाला अपने मुंह का छीन कर,
तेरे मुंह में, इसी लिए ही डाला था?
नूर गंवाया, तेरी मां ने तुझे जनाया,
क्या इसी लिए ही तुझे पाला था?”

सुन भारी-भरकम बोझिल शब्द पिता के,
हुए अनुगुंजित अधिभारित अनुशासित थे।
हुए अंकुशित बुद्धि के घोड़े डर बेदखली के,
पर मनोभाव तो अभी भी त्यों विलासित थे।

होते ही जायदाद नाम अपने पिता की,
हुआ बेटा फिर से आपे से ही बेकाबू था।
उद्भासित पिता के अनुभव को भुला कर,
किया दूर प्रयोग से विवेक का तराजू था।

कुछ यारों ने लुटा, कुछ विकारों ने लुटा,
शेष कुछ लूट गई बेवफा महबूबा थी।
पिता की कमाई तो जाती रही हाथ से,
खुद के लिए तो कमाई उसे अजूबा थी।

पिता की पीठ में बजे नगाड़े की धुन,
समझा, कितनी मीठी, कितनी खट्टी थी।
मालामाल था, कंगाल हो लिया था जब,
तब समझा, पिता की सीख ही सच्ची थी।

गर्म खून था ठंडने लगा जब उसका,
लगा तोलने हर सौदा विवेक तराजू से।
संभलती दुकान फिर से जिंदगानी की,
तब तक जा चुकी थी ताकत ही बाजू से।

पछतावा तो था पर किस काम का ?
चिड़िया ने चुग लिए खेत अब सारे थे।
स्मृति पटल में अनुगुंजित शब्द पिता के,
अब समझा कि उनमें कौन से इशारे थे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पिताजी मुझे हार न मानने और हमेशा आगे बढ़ने की सीख देते हुए मेरा हौसला बढ़ाते हैं। पिता से अच्छा मार्गदर्शक कोई हो ही नहीं सकता। हर बच्चा अपने पिता से ही सारे गुण सीखता है जो उसे जीवन भर परिस्थितियों के अनुसार ढलने के काम आते हैं। उनके पास सदैव हमें देने के लिए ज्ञान का अमूल्य भंडार होता है, जो कभी खत्म नहीं होता। आमतौर पर एक बच्चे का जुड़ाव सबसे अधिक उसके माता-पिता से होता है क्योंकि उन्हीं को वो सबसे पहले देखता और जानता है। माँ-बाप को बच्चे का पहला स्कूल भी कहा जाता है। लेकिन आजकल के बच्चों को हो क्या गया है ओ यह क्यों भूल जाते है की जैसा ओ अपने माता-पिता के साथ करेंगे वैसा ही उनके बच्चे भी उनके साथ करेंगे। एक बात याद रखें – पिता सदैव ही अपने अनुभव से आपको अच्छी सीख देते है, उनका कभी भी अनादर न करे, माता-पिता का यदि आप अनादर करेंगे तो सबकुछ मिल तो जायेगा लेकिन वह जल्द ही ख़त्म भी हो जायेगा। उनकी दुआओ व सीख से ही आप जीवन में आगे बढ़ेंगे।

—————

यह कविता (पिता की सीख ही सच्ची थी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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शिव शंभू और नंदी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Shiva Shambhu and Nandi | शिव शंभू और नंदी।

विद्या : चित्रलेखा।

जय जय भोले भंडारी,
जय जय भोले भंडारी,
करते हो सदा नंदी पे सवारी,
जय जय भोले भंडारी,
जय जय भोले भंडारी॥

सबके रखवाले हो शिवा,
डमरू वाले हो शिवा,
कैलाश पर है डेरा,
जय जय भोले भंडारी,
जय जय भोले भंडारी॥

सर पे तेरे बहती है गंगा,
काम सभी का करते हो चंगा,
हाथों में त्रिशूल विराजे,
सिर पर अर्ध चंद्रमा साजे,
जय जय भोले भंडारी,
जय जय भोले भंडारी॥

भूत पिसाच निकट नहीं आते,
जब आप अघोरी रुप में हो आते,
योगी आदि हो कहलाते,
श्मशान में हो धूणी रमाते,
जय जय भोले भंडारी,
जय जय भोले भंडारी॥

नंदी संग में रहते हैं,
मां पार्वती के बेटे हैं,
जब शिव डमरू बजाते हैं,
नंदी भी नाच दिखाते हैं,
जय जय भोले भंडारी,
जय जय भोले भंडारी,
करते हैं नंदी की सवारी॥

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

—————

  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए; इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — महाशिवरात्र‍ि भगवान भोलेनाथ की आराधना का ही पर्व है, जब धर्मप्रेमी लोग महादेव का विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चन करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दिन शिव मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जो शिव के दर्शन-पूजन कर खुद को सौभाग्यशाली मानते है। भक्तों के सब संकट हरते शिव ही महाकाल है। शिव ही संहार करते शिव शक्ति का रूप है। कोटि कोटि वंदन करूँ शिव ही तारणहार है। नंदी संग में रहते हैं, मां पार्वती के बेटे हैं, जब शिव डमरू बजाते हैं, नंदी भी नाच दिखाते हैं, जय जय भोले भंडारी, जय जय भोले भंडारी, करते हैं नंदी की सवारी।

—————

यह कविता (शिव शंभू और नंदी।) “विजयलक्ष्मी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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शिव शंभू।

Kmsraj51 की कलम से…..

Shiva Shambhu | शिव शंभू।

शिव शंभू हितकारी महादेव,
जटाओं में समा गंगा गले में रख नाग।

चले विषधारी हरने कष्ट जगत के,
अनोखी छवि देखते सभी इनकी।

ना रह पाता अछूता आराधना से इनकी,
नाम भोले भंडारी पल में जाते मान।

सावन में बजते ढोल बजाते शंख,
पूजन करते शिवलिंग पर नर – नार।

ओंकारेश्वर कष्टनिवारक विषधारी हरते कष्ट,
देख ना पाते तड़प लालायित रहते करने मदद।

देखो जरा, लगा भस्म बाबा नंगे पांव,
आए हरने कष्ट भक्तों के, संग पार्वती मैया।

विष अपना, रख सर्प, लगा भस्म,
उठा डमरू, ले त्रिशूल निकल पड़े नागेश्वर।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — महाशिवरात्र‍ि भगवान भोलेनाथ की आराधना का ही पर्व है, जब धर्मप्रेमी लोग महादेव का विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चन करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दिन शिव मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जो शिव के दर्शन-पूजन कर खुद को सौभाग्यशाली मानते है। भक्तों के सब संकट हरते शिव ही महाकाल है। शिव ही संहार करते शिव शक्ति का रूप है। कोटि कोटि वंदन करूँ शिव ही तारणहार है।

—————

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आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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महाशिवरात्रि।

Kmsraj51 की कलम से…..

Mahashivratri | महाशिवरात्रि।

शिवजी की जटाओं में गंगा विराजती है,
भोले के त्रिशूल से पापों का नाश होता है।

चंदन, रोली, माला, दूध, बेलपत्र को,
शिव पर अर्पण करते है।
भांग, धतूरा, चढ़े शिवरात्रि पर,
दूध से अभिषेक होता है।

जब डमरू बजता महादेव,
सब नृत्य करने लगते है।
गले में सर्पो की माला,
तन पर मृग छाला है।

शिव अंग भभुति लगी,
सिर पर गंगा विराजी है।
शिव ही अनंत शिव ही अविनाशी है,
शिव ही दाता शिव ही कैलाशी है।

भक्तों के सब संकट हरते,
शिव ही महाकाल है।
शिव ही संहार करते,
शिव शक्ति का रूप है।
कोटि कोटि वंदन करूँ,
शिव ही तारणहार है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (महाशिवरात्रि।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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