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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

एक हमसफ़र ऐसा भी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक हमसफ़र ऐसा भी। ♦

(सच्चा प्यार)

क्या हुआ मुझे दिया नहीं कभी लाखों का हार,
पर जीवन के हर पल को माला में संजोया है।

क्या हुआ मुझे कभी दिया नहीं कीमती उपहार,
पर अपने जीवन के कीमती पल मेरे नाम किए हैं।

क्या हुआ कभी मुझे महंगी साड़ी गिफ्ट नहीं की,
पर हमारे रिश्तों को एक-एक धागे में पिरोए रखा है।

क्या हुआ ऊंचे महलों में नहीं बिठाया कभी हमें,
पर छोटे से घर की एक-एक ईंट में प्यार भर दिया है।

क्या हुआ कभी हम गए नहीं विदेश घूमने तो,
स्वदेश के हर सुनहरे संगीत से रूबरू करवाया है।

कभी किया नहीं झूठा वादा कि ताज महल बनवा दूंगा,
पर घर के एक कोने में सुंदर सा कमरा हमारे नाम किया है।

क्या हुआ कभी हम धन-दौलत से भरा नहीं हमारा घर,
प्यार भरपूर देकर हमें रहीश बना दिया है।

दुनिया से अलग है मेरे हमसफर झूठे वादे करते नहीं,
मुझे हमेशा खुश रखते हैं हमारे लिए वही काफी है।

देख दुनिया जिन से सीख ले दुनिया ऐसा हमसफर मेरा है,
तभी तो खुदा से सातों जन्म मांगती तुझको हूं।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — क्या केवल धन से ही कोई अमीर होता है? हर इंसान के जीवन में एक समय ऐसा आता है जब उसे एहसास होता है की दिल से जो अमीर होता है, वही सच्चा अमीर है। अगर सच्चे दिलसे कोई आपको प्यार करे और आपका सदैव साथ दे तो उससे अच्छा कोई भी नहीं। मन से व दिलसे जो अमीर है वही सुखी है। जो सच्चा है वो आपको सदैव सहयोग करेगा, और जो दिखावा करता है उसके पास अपार धन होते हुए भी छोटी-छोटी बातों से दुःखी होता हैं।

—————

यह कविता (एक हमसफ़र ऐसा भी।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बेरोजगार युवाओं का दर्द।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बेरोजगार युवाओं का दर्द। ♦

इन नौजवानों को देख लो जरा,
समझ जाओ ना इनकी तकलीफ।

रहते हरदम परेशान बेचारे,
समझो ना इनकी बेचैनी तुम।

गहराई में छुपे अश्रुओं को देखो तुम,
खाम का ही बोलते हो दर्द नहीं होता इन्हें।

उतर जाओ नैनों में इनके एक बार,
दुख की परछाई को झांक लो जरा तुम।

इनकी हंसी के पीछे छुपे गम जानो,
तड़पते मन को मरहम लगा दो पूछकर।

जिम्मेदारियों का वजन इन पर बहुत,
कभी तो उठा लो तुम भार इनका।

संभले, सुलझे लगे भले ही तुम्हें ये,
गहराई में जा इनकी उलझ न जाना तुम।

वक्त से पहले हो जवां उठा लेते जिम्मेदारियां,
बेरोजगारी छीन लेती बचपन की हठखेलियां।

खंडूस बोल दे ताने ना वार करो तुम,
समझो गहराई, नरमी, मासूमियत इनकी।

बना लो पहचान संग इनके तुम,
समझ पीड़ा देख दर्द मिटा दो ना।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बेरोजगार युवाओं का दर्द कोई तो समझे, उनके आंतरिक दर्द को कोई तो महसूस करें। वह अपना दर्द कभी जल्दी किसी से बया नहीं करते, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है की उन्हें दर्द नहीं होता। बेरोजगारी समाज के लिए एक अभिशाप है। इससे न केवल व्यक्तियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है बल्कि बेरोजगारी पूरे समाज को भी प्रभावित करती है। कई कारक हैं जो बेरोजगारी का कारण बनते हैं। बेरोजगार व्यक्ति को अपने ही समाज अपने ही रिश्तेदार परिवार और दोस्तों का नजरिया बदल जाता है वह बेरोजगार व्यक्ति को इस नजरिए से देखते हैं कि कहीं वह हमसे पैसा ना मांगे।

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यह कविता (बेरोजगार युवाओं का दर्द।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

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तुलसी पूजन और क्रिसमस डे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तुलसी पूजन और क्रिसमस डे। ♦

यहां तुलसी पूजन, वहां क्रिसमस डे,
दिन एक पर धारणाएं लहदी – लहदी है।
यह जाड़े का शुष्क पतझड़ का मौसम,
तुलसी तो इस मौसम की परमौषधि है।

बनावट का हर सजोसामान कहां देगा?
राहत सर्दी – गर्मी और आधी व्याधि से।
चन्द लोगों के पर्व मानना कोई दोष नहीं,
वे हमारे न मनाए, है धोखा घनी आबादी से।

क्यों लगाए बैठे हैं आस कि पौधा,
प्लास्टिक का ऑक्सीजन छोड़ेगा।
वह तो तुलसी में ही क्षमता है साहेब,
जो रोग, शोक, दुख संताप को तोड़ेगा।

अपनी संस्कृति और सभ्यता तो यारो,
आखिर अपनी है और अपनी ही होती है।
क्रिसमस के फेर में भूल के पूजा तुलसी की,
यह भारत की सनातनी सभ्यता कहां खोती है?

अब हो गया दौर बहुतेरा भूलभुल्या का,
अपनी रीत पर फिर से लौट के आना होगा।
जो जागे हैं आज, वे तो जागते ही रहना,
पर जो सोए हैं, उन्हे भी जागना होगा।

हो गई दरिया दिली बहुतेरी है आज तक,
अब संस्कृति सभ्यता का गुण गाना होगा।
धर्म निर्पेक्षता के सुन्दर लिवास में हमको,
अपने धर्म की हर रसम को निभाना होगा।

कहीं भूल न जाए हमारी औलादें सब कुछ,
इतना भी पछुआ अंधानुकरण भला नहीं है।
बस सुरक्षित रहे हमारा भी सनातन जग में,
बाकी हमे किसी का कुछ भी खला नहीं है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज यानी 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। सनातन धर्म में तुलसी पूजा का अत्यधिक महत्व होता है। तुलसी की पूजा करने से घर में सुख-शांति का वास होता है। सनातन धर्म में तुलसी के पौधे को पवित्र माना गया है। इसलिए तुलसी पूजा का विशेष महत्व है। लेकिन आजकल लोग अपने प्राचीन संस्कृति को भूलकर क्रिसमस डे मना रहे है आखिर क्यों? अब भी समय है अपने अद्भुत गरिमामयी संस्कृति के अनुसार चले और सारे कार्य करें।

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यह कविता (तुलसी पूजन और क्रिसमस डे।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मैं तो बस इक बूँद हूँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मैं तो बस इक बूँद हूँ। ♦

छलके हृदय में अमृत कलश,
अंत: करण में बहता गरल है।
मैं तो बस इक बूँद हूँ जग में,
क्षुद्र बस इस भव समुद्र का।

देखता मुख धवल पूरणमासी का,
उल्लासित हो उठी उमंगें।
उछली आतुर हो नीलगगन तक,
मधुर मिलन को तरल तरंगें।
जन्मों – जन्म की पिपासा लिये हूँ,
तृष्णा जीवन भर का।

अश्रुकण – सा मेरा जीवन सारा,
भरा खारापन इसमें इसलिये है।
पीकर मैंने कई अग्नि-शिखायें,
भू – धात्री पर जीवन दिये हैं।
अखिल सृष्टि को द्रवित पाशों से,
दिये अनुपम मणि सौंदर्य का।

जीवन लहरों में भरा कोलाहल है,
तलहटी पर मंडलाकार भँवर चलते।
डूबते उतराते रहते हैं इसमें,
हृदय में अनगिनत सपने पलते रहते।
हमनें व्यथा व्यक्त की हर पल,
गर्जन – तर्जन कर भूमण्डल का।

युग – युगान्तों के नवीन संवेदनायें,
चुभते रहे कंटक आँचल में।
अनन्त्य महाविल के इस छाया में,
सजीले रेखाओं के आलेख्य सिमटने में।
सौंदर्यता तो नश्वर है, रहा है कौन अनश्वर सृष्टि का।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (मैं तो बस इक बूँद हूँ।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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सुगंध भी सुलभ न होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सुगंध भी सुलभ न होगा। ♦

अगर न जागे आज दोस्तो,
कल को फिर से अंधेरा होगा।
पराधीनी में था किसने धकेला?
सवाल यह मेरा – तेरा होगा।

अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद,
फिर सुगंध भी सुलभ न होगा।
कहीं आ न जाए फिर दौर वही,
जो सैंतालीस से पहले था भोगा।

यह पछुआ बयार कहीं ले ही न डूबे,
फिर से भारत के गौरव को।
आओ मिलकर पलवित पुष्पित करते हैं,
अपनी संस्कृति सभ्यता के सौरभ को।

उदासीनता भली नहीं है राष्ट्र धर्म में,
अपनी रीत तो अपनी ही होती है।
परिणाम कभी न अच्छा है होता,
जब देश की जनता सोती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अब भी समय है संभल जाओ, वर्ना अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद फिर सुगंध भी सुलभ न होगा। कहीं आ न जाए फिर दौर वही, जो सैंतालीस से पहले था भोगा सभी ने। यह पछुआ बयार कहीं ले ही न डूबे, फिर से भारत के गौरव को। आओ मिलकर पलवित पुष्पित करते हैं, अपनी प्राचीन सभ्य संस्कृति सभ्यता के सौरभ को।

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नया सवेरा होने वाला।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नया सवेरा होने वाला। ♦

पहल दिवा से पहले घनघोर अँधेरे घेरे,
शीतल किरणें ले आँखें अपनी खोले।
दूर क्षितिज की धुँधलाहट में,
अब कालरात्रि जाने वाली है।
नयन खोलो कलरव गान पंछियों के,
तालों से नया सवेरा होने वाला है।

इक – इक कर बुझते जाते दीपक,
झिलमिल – झिलमिल करते तारे।
अंतिम साँस लेने लगे हैं अँधियारे,
कोलाहल करते पंख – पखेरू सारे।
ज्योति जुगनुओं की जंगल में,
सम्भवत: अब सोने वाली है।

तपे मरुस्थल जितना दिनभर,
उतनी ही शीतल करे यामा निर्मल।
गझिन कालिमा के आँचल में,
उझाँकती अरुणा उज्जवल।
विपुला – वृजन और अर्णव को,
स्वर्णिम किरण धोने वाली है।

दुर्गम औंड़ा सघन सिंधु लहरों में,
उतर गहराई में मिलते मोती।
घने श्यामा के आलिंगन में,
कहीं छुपी रहती जीवन ज्योति।
घनघोर अमा की काली-काली रात,
दीप्ति – प्रकाश देने वाली है।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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रंग बदलता इंसान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रंग बदलता इंसान। ♦

समय देख न जाने कितने रंग बदले इंसान,
फिर इस जहान में गिरगिट ही क्यों बदनाम।

कभी इश्क कभी विरह कभी प्रेम कभी नफरत में डूब जाए,
कुछ भी नजर न आए जब अहम के रंग में ये रंग जाए।

कभी साहिल बनता तो कभी खुद ही किश्ती को डुबोए,
अपनी खुशी की खातिर किसी को आसुओं के सैलाब में भिगोए।

एक उंगली के सहारे से देता कभी किसी का साथ,
जब मंजिल करीब हो तो छिटक देता अपनों का हाथ।

पर्दे के पीछे के उन कलाकारों को क्यूं भूल जाए,
जिनकी मेहनत से वो मंच पर सिर ऊंचा उठाए।

इंसान कदम-कदम पर इस कदर बदले रंग हजार,
कुदरत के रंग बदलना भी कर देता बिल्कुल पार।

भांति-भांति के रंग चढ़ा कर असली रंग की खो दी पहचान,
मस्तक ऊंचा कर बैठा इतना भर लिया अभिमान।

इस जमीं से जुड़े रहने को ही सार्थक रहने दे इंसान,
गुणों को ही समाहित कर केवल रख इंसानियत का मान।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब आप किसी से नाराज हो जाते हैं तो उसे कोसते हुए बोलते है कि ये गिरगिट की तरह रंग बदलता है। आखिर आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है। अचानक से गिरगिट हरा रंग से लाल और पीला से सफेद हो जाता है। लेकिन आजकल का इंसान गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलता है, स्वार्थी हो गया है आज का इंसान, हर कर्म उसका स्वार्थ से भरा है। अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी हानि पहुंचने से हिचकिचाता नहीं आज का इंसान। अपने सनातन भारतीय संस्कृति, संस्कार और सभ्यता को क्यों भूलता जा रहा है इंसान?

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यह कविता (रंग बदलता इंसान।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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नव वर्ष समारोह 2023

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नव वर्ष समारोह – 2023 ♦

हम गरीबों के लिए क्या नया साल साहब,
दो वक्त की रोटी के लिए हो गई सुबह से शाम साहब।
मेरे होठों की मुस्कान सबको दिखती है,
मगर दिल का जख्म किसी को दिखती नहीं।

मेरी आंखों से निकले आंसू सबको दिखती है,
मेरी आंसूओं में छिपा दर्द किसी को दिखती नहीं।
इंसान मैं भी हूं, मेरे दिल में है एक अरमान,
नए साल के जश्न में देखूं , सबके चेहरे पे मुस्कान।

तोहफा देने के काबिल नहीं,
पैसा हो जेब में दुनिया सुहानी लगती है।
दौलत में है इतनी ताकत, मिट जाती है दूरियां,
सारी दुनिया अपनी लगती है।

इल्तज़ा है खुदा से, मिटा दो सारी दूरियां,
ना कोई अमीर ना कोई गरीब, ना हो कोई मजबूरियां।
धरती ही जन्नत बन जाए,
शफ़त पे हो तबस्सुम, उल्फत के तराने।

गले से गले मिलें, जो भी आएं नया साल मनाने,
गया दिसंबर, जनवरी आई, नए साल की सबको बधाई।
हैं बख्ताबर, भारत देश की माटी पाई,
सभी देश वासियों को मेरी तरफ से नए साल की हार्दिक बधाई।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — क्या नया साल 2023 सभी के लिए खुशियाँ लेकर आएगा? या फिर गरीबों के लिए नए साल का कोई मतलब नहीं। नया साल केवल अमीरों के चोचले है। क्या केवल तारिक बदलेगा या फिर ये नया साल सभी के लिए खुशियों का सौगात लेकर आएगा? आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले इस नए साल 2023 में खूब मेहनत करेंगे और नए भारत के ग्रोथ में सहयोग करेंगे, जरूरतमंदों की मदद करेंगे। सभी देशवासियों को मेरी तरफ से नए साल की हार्दिक बधाई।

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यह कविता (नव वर्ष समारोह – 2023) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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बेबस हारी कामनायें।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बेबस हारी कामनायें। ♦

रात निगाहों में लगी ताकने,
बेबस हारी कामनायें।
आसमानों तक उड़ने वाले,
पंख-पंछियों के कट जायें।

गडमड केश सुलझाने में,
बीत गये बहारों के मौसम।
आतप उतरती रही प्राणों में,
भुलाते रहे प्रारब्ध निर्मम।
शिशिर के पीले पातों से,
जीर्ण – शीर्ण बदन कुम्हलायें।

दूर – दूर तक राहों में छितराये,
उष्णित दोपहर के सन्नाटे।
सुकोमल बिछावन पर चुभते,
क्लांतित उर में पैने काँटे।
सूखे रेगिस्तान के आँचल में,
कभी न उमड़ती गझिन घटायें।

आसक्त अभाषित अभिलाषा,
वीरानी आँखों से रो लेती है।
यामिका के निर्जन प्रहरों में,
बंद पलकों को भिगो लेती है।
धौल आलोक के चापों में,
नमित अँखियों को हम छुपायें।

वैरागन बन गई ज्योत्स्ना,
रह गई स्वप्निल आस प्यासी।
अबोल शब्दों में बातें करती,
दुर्दुम निशि से द्रवित उदासी।
धूमिल सिंधु भरी जल से,
इसमें डूब मरी सारी तृष्णायें।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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माँ पीताम्बरा स्तुति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ पीताम्बरा स्तुति। ♦

नमो नमो महाविद्या वरदानी, नमो नमो पीताम्बरा दयाला,
क्षण में स्तम्भन करे मैया, सुमिरन करे अरिकुल काला।

नमो नमो बगला भवानी, नमो नमो पीताम्बरा कल्याणी,
भक्त वत्सला शत्रु नाशनी, नमो नमो महाविद्या वरदानी॥१॥

अमृत सुधा बीच तुम्हारा, मणि मंडित रतन आसन प्यारा,
कनक सिंहासन पर आसीना, पीताम्बरा अति दिव्य नवीना।

स्वर्णाभूषण सुंदर धारे, चंद्र मुकुट सिर पर सिंगारे,
त्रयी नेत्र द्विज भुजा मृणाला, मुद्गर पाश धरे कराला॥२॥

सदा करे भैरव सेवकाई, सिद्ध कार्य सब विघ्न नसाई,
तुम निराश की सदा सहाई, तुम अकिंचन अरिकुल धारा।

तुम काली तारा भुवनेश्वरी, भैरवी त्रिपुर सुन्दरी वेशी,
छिन्नमस्ता धूमा मातंगी, महा गायत्री तुम बगुला रंगी॥३॥

सकल शक्तियाँ तुममें साजे, ह्लीं बीज के मध्य बिराजे,
दुष्ट स्तम्भन अरिकुल कीलन, मारण वशीकरण आकर्षण सम्मोहन।

दुष्टोच्चातन की कारक माता, अरि जिह्वा कीलय संघाता,
साधक की विपत्ति की त्राता, नमो नमो महामाया प्रख्याता॥४॥

मुद्गर लिये अति भारी, प्रेतासन पर किये सवारी,
तीनो: लोक दस दिश भवानी, तह तुम बिचरहु हित कल्याणी।

सोचे जो अरि अरिष्ट जन को, बुद्धि नशावय कीलय तन को,
हाथ पाँव बाँधैव तुम ताके, हनहु जिह्वा बीच मुद्गर बाके॥५॥

जब संकट चोरों पर आवे, रण में रिपुओं से घिर जावे,
अनल अनिल विप्लव घहरावे, वाद-विवाद न निर्णय पावे।

मूठ अभिचारण संकट आदि, आपत्ति राजभीति सन्निकट,
ध्यान करत सब कष्ट नसावे, ग्रह भूत – प्रेम न बाधा आवे॥६॥

सुमिरन करत राजद्वार बंध जावे, सभा बीच स्तम्भन छावे,
नाग सर्प वृश्चिक आदि भयंकर, खल विहंग भागहि सब तत्पर।

सर्व रोग की नाशन हारी, अरिकुल मूलोच्चाटन कारी,
स्त्री – पुरुष राज सम्मोहक, नमो नमो पीताम्बर सोहक॥७॥

सदा तुमको कुबेर मनावे, श्री समृद्धि सुयस गुण गावे,
शक्ति – शौर्य की तुमहि विधाता, दु:ख-दारिद्र विनाशक माता।

यश ऐश्वर्य की ऋद्धि-सिद्धि दाता, शत्रु नाशिनी विजय प्रदाता
बगुलामुखी नमो कल्याणी, नमो नमो पीता महारानी॥८॥

तुमको जो सुमिरै चित्त लाई, योग क्षेम से तुम करो सहाई,
विपत्ति जन की तुरत निवारो, अयाधि-व्याधि संकट सब टारो।

पूजा जप विधि नहि जानत तोरी, अर्थ न आखर करहुँ निहोरी,
हाथ जोड़ शरणागत मैं आया, करहुँ दया तुम माता पीताम्बरा॥९॥

तुम्हीं जग में केवल मोर सहारा, हरहुँ संकट करहुँ निवारा,
नमो नमो बगुलामुखी माता, नमो नमो पीताम्बरा सुखदाता।

सौम्य रूप धर बनती माता, सुख सम्पत्ति सुयश की दाता,
रौद्र रूप धर शत्रु संहारो, अरिकुल जिह्वा में मुद्गर मारो॥१०॥

नमो नमो महाविद्या आगारा, आदि सुंदरी शक्ति अपारा,
अरिकुल भंजक विपत्ति की त्राता, दया करो पीताम्बरी माता।

ऋद्धि-सिद्धि की दाता महारानी, अरिकुल समूल की तुम काल
मेरी सब बाधा हरो माँ, पीताम्बरे बगले माँ तत्काल॥११॥

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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