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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी

तब हिंदी ने ही जगाया हमे…..

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-Kmsraj51

तब हिंदी ने ही जगाया हमे…

[आप सब को 14 सितंबर यानी हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं…]

जब हम गुलाम थे,
विश्व में गुम नाम थे,
मिट गयी थी हमारी पहचान,
तब हिंदी ने ही  जगाया हमे…

हम कौन थे?
कैसा था अदीत हमारा?
हम क्यों गुलाम हुए,
ये हिंदी ने ही  बताया हमे…

कहीं मंदिर मस्जिद का झगड़ा था,
कोई मांग रहे थे  खालीस्तान,
पानी पर  भी विवाद था,
हिंदी ने ही  एक बनाया हमे…

जिन से हमने आजादी पाई,
भाषा उनकी ही अपनाई,
सोचो  कैसे आजाद हैं हम?
ये अब तक समझ न आया हमे…

Post share by- कुलदीप ठाकुर

Kuldeep Thakur

http://www.kuldeepkikavita.blogspot.in/

 मैं कुलदीप ठाकुर जी का बहुत आभारी हूँ , हिंदी दिवस Quotes share करने के लिये॥

Note::-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है: kmsraj51@yahoo.in. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

Also mail me ID: cymtkmsraj51@hotmail.com (Fast reply)

CYMT-Beautiful Flower-kmsraj51

_____ all @rights reserve under Kmsraj51-2013-2014 ______

Filed Under: 2014 - KMSRAJ51 KI PEN SE ....., हिंदी Tagged With: 14 September 2014 Hindi Diwas Speech / Short Essay In Hindi, BIOGRAPHY, Hindi Diwas - India's Celebrations and Festivals, hindi diwas date, hindi diwas essay in hindi, hindi diwas in hindi, hindi diwas in hindi hindi diwas essay in hindi hindi diwas wiki hindi diwas poems hindi diwas par lekh hindi diwas date hindi diwas quotes hindi diwas slogans, hindi diwas par lekh, hindi diwas poems, hindi diwas quotes, hindi diwas slogans, hindi diwas wiki, Hindi-Hindu-Hindushathan, Kids Poetry in Hindi, Kmsraj51, Photos, Quotes in Hindi !!, Videos and Wallpapers. hindi diwas

मन की उड़ानः दूसरों के पंखों से कब तक उड़ोगे।

Kmsraj51 की कलम से…..

cymt-kmsraj51-1

मन की उड़ान ⇒ दूसरों के पंखों से कब तक उड़ोगे।

मन की उड़ान।

sapana
मन की उड़ान।

⇒ जीवन एक सुंदर फूल की तरह है।

⇒ तू ना हो निराश कभी मन से।

⇒ समय एक महान गुरु की तरह है।

⇒ हमेशा सकारात्मक सोच रखना मन में।

⇒ मैं एक पेन का उपयोग कर रहा हूँ, मानव जीवन परिवर्तन के लिए।

प्रकृति ने मानव को एक विकसित दिमाग दिया है। इसके सही इस्तेमाल से मनुष्य अपने जीवन में सार्थक बदलाव ला सकता है। जहां तक लक्ष्य की बात है, इसकी प्राप्ति बिना बलिदान के संभव नहीं है। अगर मन में निष्ठा और नि:स्वार्थता हो तो लक्ष्य तक पहुंचने में काफी मदद मिलती है।

⇒ कभी न बैठें भाग्य के भरोसे।

भाग्य के भरोसे बैठकर अपने जीवन को नष्ट केवल कमजोर व्यक्ति करते हैं। जो कुछ कर गुजरने का हौसला रखते हैं, वे भाग्य को कोरी कल्पना मानते हैं। कामयाबी हासिल करने के लिए धैर्य, ठोस योजना, सही साधन व कठोर परिश्रम की आवश्यकता होती है।

⇒ हर किसी को नहीं मिलता गॉडफादर।

जीवन में ऐसा व्यक्ति मिलना बहुत मुश्किल है, जो हमें शिखर पर बिठा दे। ऐसे में गॉड-फादर के भरोसे बैठना उचित नहीं है। हमें अपनी जिंदगी की परिभाषा खुद लिखनी होगी। अपने लिए अवसर खुद खोजने होंगे।

⇒ लकीर का फकीर रहता है सदा नाकामयाब।

जिंदगी में लकीर का फकीर बने रहना स्वयं को असफलता की गर्त में धकेलने जैसा है। सफल वही होता है, जो वक्त के अनुसार खुद को ढालता है।

⇒ दूसरों के लिए योजनाएं ही क्यों बनाएं।

क्या यह सच नहीं है कि जीवन में हम जितनी भी योजनाएं बनाते हैं, उनमें से अधिकांश दूसरों की कामयाबी के लिए बनाते हैं। हम अपनी प्रगति, अपने विकास व अपनी योग्यता को निखारने के लिए आखिर योजनाएं क्यों नहीं बनाते? इस तथ्य पर विचार करना भी बेहद जरूरी है।

⇒ तेज दिमाग ही देखता है नए अवसर।

जिंदगी में जितने भी महान अवसर आते हैं, उन्हें हमारी आंखें नहीं देख सकतीं, लेकिन तेज दिमाग न केवल उन्हें देखता है, बल्कि उन्हें पहचानता भी है, इसलिए जो दिमाग सोचता है, उसकी कभी अवहेलना न करें।

⇒ एक ही है अमीर बनने का फार्मूला।

संसार में अमीर बनने का केवल एक ही फार्मूला है। अगर आप दूसरों के लिए काम करते हैं तो जो भी कार्य करें उसे पूर्ण निष्ठा, पूर्ण ईमानदारी से अपना कार्य समझकर करें। एक न एक दिन दौलत तुम्हारे कदम अवश्य चूमेगी।

⇒ विश्वसनीयता कभी न खोएं।

जीवन में साख या विश्वसनीयता बड़ी मुश्किल से कमाई जाती है, लेकिन इसके सहारे बड़े-बड़े काम चुटकियों में हो जाते हैं, लेकिन अगर जरा-सी भी लापरवाही बरती जाए तो साख खत्म होने में देर नहीं लगती।

⇒ शॉर्ट-कट का रास्ता कभी नहीं।

शॉर्ट-कट के रास्ते से जीवन में कभी कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती। कामयाबी का रास्ता काफी लंबा है, जिसमें कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ता है।

⇒ लेग पुलिंग तो होगी।

जब भी आप आगे बढ़ेंगे, आपकी टांग खींचने का प्रयास जरूर किया जाएगा। सफलता तभी मिलेगी, जब आप टांग खींचने वालों से जरा भी नहीं उलझेंगे।

⇒ आलोचना के पीछे छिपी सद्भावना को दें सम्मान।

कभी-कभी ऐसा भी होता है, जब हमारे भले के लिए कोई हमारी आलोचना करता है। ऐसी आलोचना के पीछे छिपी सद्भावना को अवश्य सम्मान दें।

⇒ खुद बनिए अपने बॉस।

अगर कामयाबी की डगर पर चलना है तो हमें अपना बॉस खुद बनना होगा। खुद जोखिम भी उठाने होंगे तथा दूसरों का मार्गदर्शन भी करना होगा।

 ⇒ बूढ़ा वही, जिसने सीखना बंद कर दिया।

बुढ़ापे का उम्र से कोई संबंध नहीं है। जो हमेशा नया सीखता है, वक्त के साथ स्वयं को बदलता है, वह हमेशा जवान रहता है।

⇒ क्षमताओं का 10 प्रतिशत भी नहीं होता इस्तेमाल।

सफलता का एक मार्ग यह भी है कि हम जितना काम करते हैं, उससे ज्यादा काम करने की आदत डालें। अपनी क्षमता को पहचानने के साथ-साथ हम उसका पूरा इस्तेमाल भी करें।

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© आप सभी का प्रिय दोस्त ®

Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor, Founder & CEO
of,,  http://kmsraj51.com/

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

 

 

 

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Filed Under: 2013-KMSRAJ51, Spiritual-kmsraj51, पवित्र 'सकारात्मक सोच', हिंदी, हिन्दी साहित्य Tagged With: Anmol Vachan, Article in Hindi, best hindi website, happiness quotes, Happiness Thoughts in Hindi, happy life mantra, Happy life tips, Hindi Article, Hindi Quotes, Hindi Quotes and Thoughts अनमोल वचन अनमोल विचार, Hindi Quotes-Thoughts, HINDI THOUGHTS, How to live happy life, http://kmsraj51.com/, Images for अनमोल वचन हिंदी में।, kms, Kmsraj51, Peacefull Quotes in Hindi, Personal development quotes, Personal Development Thoughts in Hindi, Positive Thoughts in Hindi, Quotes, Quotes in Hindi !!, Shukhi Jivan, Success Quotes, अनमोल वचन, अनमोल वचन हिंदी में।, अनमोल वचन-KMSRAJ51, आदर्श सूक्तियां और अनमोल वचन, उद्धरण हिन्दी में!!, मन की उड़ान ⇒ दूसरों के पंखों से कब तक उड़ोगे।, सबसे चर्चित अनमोल वचन, हिन्दी साहित्य-अनमोल वचन

मन की उड़ानः दूसरों के पंखों से कब तक उड़ोगे।

Kmsraj51 की कलम से…..

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मन की उड़ान ⇒ दूसरों के पंखों से कब तक उड़ोगे।

मन की उड़ान।

sapana
मन की उड़ान।

⇒ जीवन एक सुंदर फूल की तरह है।

⇒ तू ना हो निराश कभी मन से।

⇒ समय एक महान गुरु की तरह है।

⇒ हमेशा सकारात्मक सोच रखना मन में।

⇒ मैं एक पेन का उपयोग कर रहा हूँ, मानव जीवन परिवर्तन के लिए।

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भाग्य के भरोसे बैठकर अपने जीवन को नष्ट केवल कमजोर व्यक्ति करते हैं। जो कुछ कर गुजरने का हौसला रखते हैं, वे भाग्य को कोरी कल्पना मानते हैं। कामयाबी हासिल करने के लिए धैर्य, ठोस योजना, सही साधन व कठोर परिश्रम की आवश्यकता होती है।

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जीवन में ऐसा व्यक्ति मिलना बहुत मुश्किल है, जो हमें शिखर पर बिठा दे। ऐसे में गॉड-फादर के भरोसे बैठना उचित नहीं है। हमें अपनी जिंदगी की परिभाषा खुद लिखनी होगी। अपने लिए अवसर खुद खोजने होंगे।

⇒ लकीर का फकीर रहता है सदा नाकामयाब।

जिंदगी में लकीर का फकीर बने रहना स्वयं को असफलता की गर्त में धकेलने जैसा है। सफल वही होता है, जो वक्त के अनुसार खुद को ढालता है।

⇒ दूसरों के लिए योजनाएं ही क्यों बनाएं।

क्या यह सच नहीं है कि जीवन में हम जितनी भी योजनाएं बनाते हैं, उनमें से अधिकांश दूसरों की कामयाबी के लिए बनाते हैं। हम अपनी प्रगति, अपने विकास व अपनी योग्यता को निखारने के लिए आखिर योजनाएं क्यों नहीं बनाते? इस तथ्य पर विचार करना भी बेहद जरूरी है।

⇒ तेज दिमाग ही देखता है नए अवसर।

जिंदगी में जितने भी महान अवसर आते हैं, उन्हें हमारी आंखें नहीं देख सकतीं, लेकिन तेज दिमाग न केवल उन्हें देखता है, बल्कि उन्हें पहचानता भी है, इसलिए जो दिमाग सोचता है, उसकी कभी अवहेलना न करें।

⇒ एक ही है अमीर बनने का फार्मूला।

संसार में अमीर बनने का केवल एक ही फार्मूला है। अगर आप दूसरों के लिए काम करते हैं तो जो भी कार्य करें उसे पूर्ण निष्ठा, पूर्ण ईमानदारी से अपना कार्य समझकर करें। एक न एक दिन दौलत तुम्हारे कदम अवश्य चूमेगी।

⇒ विश्वसनीयता कभी न खोएं।

जीवन में साख या विश्वसनीयता बड़ी मुश्किल से कमाई जाती है, लेकिन इसके सहारे बड़े-बड़े काम चुटकियों में हो जाते हैं, लेकिन अगर जरा-सी भी लापरवाही बरती जाए तो साख खत्म होने में देर नहीं लगती।

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⇒ क्षमताओं का 10 प्रतिशत भी नहीं होता इस्तेमाल।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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बेनाम रिश्ता।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♣♥ बेनाम रिश्ता। ♣♥

-मृदुला सिन्हा।

चित्राजी निमंत्रण-पत्र के साथ हाथ से लिखे मनुहार पत्र के हर अक्षर को अपनी नजरों से आँकती उनमें अंतर्निहित भावों को सहलाने लगीं। कई बार पढ़े पत्र। सोचा विवाह में इकट्ठे लोग पूछेंगे—मैं कौन हूँ? क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से मेरा? क्या जवाब दूँगी मैं? क्या जवाब देंगे शालिग्रामजी? दोनों के बीच बने संबंध को मैंने कभी मानस पर उतारा भी नहीं। नाम देना तो दूर की बात थी। बार-बार फटकारने के बाद भी वह अनजान, अबोल और बेनाम रिश्ता चित्राजी को जाना-पहचाना और बेहद आत्मीय लगने लगा था। कभी-कभी उसके बड़े भोलेपन से भयभीत अवश्य हो जाती थीं और तब उस रिश्ते के नामकरण के लिए मानो अपने शब्द भंडार में इकट्ठे हजारों शब्दों को खँगाल जातीं। नहीं मिला था नाम। और जब नाम ही नहीं मिला तो पुकारें कैसे?

इसलिए सच तो यही था कि उन्होंने कभी उस रिश्ते को आवाज नहीं दी। रिश्ते के जन्म और अपनी जिंदगी के रुक जाने के समय पर भी नहीं। जिंदगी के पुनःचालित होकर उसकी भाग-दौड़ में भी नहीं। शालिग्रामजी को कभी स्मरण नहीं किया। शालिग्रामजी ने ही बेनाम रिश्ते को याद रखने की पहल की थी।

बहुत सोच-विचार करने के बाद चित्राजी ने भोपाल जाना तय कर लिया। बहुत दूर जाना था। बस, और फिर ट्रेन की यात्रा। वह भी गरमी में। शालिग्रामजी ने दूरभाष पर ही विश्वास दिलाया था—‘आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। मेहमानों को ठहराने की व्यवस्था करते समय भी हमने मौसम का ध्यान रखा है। मैं समझता हूँ, हमारे मेहमानों को कोई कष्ट नहीं होगा। और आप तो खास मेहमान हैं।’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने जब जाने का निश्चय ही कर लिया था तो कष्ट और आराम का क्या? शिमला बस स्टैंड पर वॉल्वो बस में बैठ गई थीं। मोबाइल की घंटी बजी। शालिग्रामजी का फोन था। उन्होंने कहा, ‘‘आपकी बस के दिल्ली बस अड्डे पर रुकते ही हमारा एक आदमी मिलेगा। उसका नाम राकेश है। उसके पास आपकी रेल टिकट होगी।’’

चित्राजी ने कुछ नहीं कहा। इतना भी नहीं कि मैंने टिकट ले रखी है। और वैसा ही हुआ। उनकी बस के रुकते ही एक व्यक्ति अंदर घुसा। उसकी खोजी नजर ने चित्राजी को पहचान लिया। उनकी अटैची नीचे उतारकर बोला, ‘‘आपके पास यदि कोई टिकट है तो मुझे दे दीजिए। मैं उसे कैंसिल करवा दूँ। ए.सी. द्वितीय श्रेणी की यह टिकट रख लीजिए। ट्रेन शाम को निजामुद्दीन स्टेशन से जाती है। मैं आपको लेने आ जाऊँगा। मैं भी आपके साथ चल रहा हूँ।’’

चित्राजी ने उस व्यक्ति को स्लीपर क्लास की टिकट निकालकर दे दी। वे थ्री-व्हीलर में बैठकर गोल मार्केट स्थित अपनी एक सहेली के क्वार्टर में चली गईं। शाम को सबकुछ वैसे ही घटा जैसा राकेश ने बताया था।

सुबह-सुबह गाड़ी के भोपाल जंक्शन पर रुकते ही एक नौजवान उनकी सीट तक आ गया। उनके पैर छूकर बोला, ‘‘मैं दीपक हूँ। मेरे पिता का नाम शालिग्राम कश्यप है।’’

चित्राजी ने ‘खुश रहने’ का आशीष दिया और उसके पीछे चल पड़ीं। गाड़ी आगे बढ़ रही थी। रोड पर भीड़ के कारण कभी-कभी उसका हॉर्न बजता। अंदर पूरी शांति बनी रही। कोई कुछ नहीं बोला। चित्राजी उस नौजवान से बातें करना चाहती थीं, पर शुरुआत कैसे करें।
उस घर की चौहद्दी, आबादी, संस्कार और स्थितियाँ, कुछ भी तो नहीं जानती थीं। भोपाल शहर के बारे में पूछने ही जा रही थीं कि दीपक बोल पड़ा—‘‘मैं आपको आंटी कहूँ ?’’

‘‘हुँ’’
‘‘तो आंटी! बारात आज शाम को आ रही है, लोकल बारात है, इसलिए समय से ही आ जाएगी। मैंने सुना कि आप कल ही लौट रही हैं। आपके पास समय बहुत कम है। पिताजी ने कहा है कि आप भोपाल शहर पहली बार आ रही हैं। इसलिए भोपाल भी तो देखना चाहेंगी। बड़ा सुंदर शहर है हमारा। आप जल्दी से तैयार हो जाएँ। आपको मेरा मौसेरा भाई घुमाने ले जाएगा।’’

‘‘ठीक है।’’ इतना ही बोल पाईं चित्राजी। मन तो उस व्यक्ति के प्रति आभार प्रकट करने को बन आया था। उनकी इतनी चिंता करनेवाले नौजवान को शाबासी भी दी जा सकती थी। पर वे कुछ नहीं बोलीं। दीपक बोला, ‘‘मेरे पिताजी आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं। कहते हैं, आप साक्षात् देवी की अवतार हैं। पर पता नहीं क्यों, न आप कभी भोपाल आईं, न हमें शिमला बुलाया। कुछ देर पहले ही आपके बारे में बताया। आपसे मिलने की चाहत पनप आई। इसलिए कई काम छोड़कर स्वयं स्टेशन आ गया।’’

चित्राजी कुछ बोलने के लिए जिह्वा पर शब्द सजाने लगीं कि ड्राइवर ने गाड़ी में ब्रेक लगा दिया था। गाड़ी किसी गेस्ट हाउस के सामने रुकी। गाड़ी से उनका सामान निकालकर दीपक आगे बढ़ा। वे पीछे-पीछे। उन्हें अंदर तक पहुँचाकर बोला, ‘‘आंटी! आप यहाँ नहा-धो लें। नाश्ता घर पर ही करना है। फिर आप भोपाल दर्शन के लिए निकलेंगी। दोपहर का भोजन भी घर पर ही है। भोजन के बाद फिर यहाँ आराम करिएगा। शाम को तो शादी ही है।’’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। दीपक के कमरे से निकलने पर अवश्य उसके पीछे गईं। आँखों की पहुँच से उसकी काया ओझल हो जाने पर पीछे लौट कमरे की सिटकिनी बंद कर बिस्तर पर बैठ गईं। सोचने लगीं—दीपक कितना लायक लड़का है। उन्नीस-बीस वर्ष का होगा। इतना जिम्मेदार और पितृभक्त! समाज नाहक परेशान है कि युवा पीढ़ी बिगड़ गई। मेरे साथ थोड़ी देर गुजारकर इस युवा ने मेरे मन में जगह बना ली। पर श्रेय तो इसके पिता को ही जाता है, शालिग्रामजी को। उनका ध्यान आते ही चित्राजी उठ बैठीं। अपना ध्यान बँटाने के लिए तैयार होने लगीं। चित्राजी के नहा-धोकर तैयार होते ही नरेश आ गया था। उन्हें नाश्ते के लिए ले जाते हुए पूछा, ‘‘आप दीपक की बुआजी हैं? उसकी दो बुआओं से मिल चुका हूँ। आपसे पहली बार मिला। दीपक का मैं मित्र हूँ।’’

शालिग्रामजी शीघ्रता से गेट पर पहुँचे। उन्होंने चित्राजी का अभिवादन किया। नरेश ने कहा, ‘‘घुमा लाया आंटी को भोपाल। इन्हें तीनों ताल अच्छे लगे।’’

नरेश इतना नहीं कहता तो शायद चित्राजी सामने खड़े व्यक्ति को पहचान भी नहीं पातीं। कुछ दरक गया था चित्राजी के अंदर। उन्होंने अपने को सँभाला। हाथ जोड़कर उनके अभिवादन का उत्तर देते हुए चेहरे पर भी मुसकान थी। नाश्ते का इंतजाम फ्लैट के बाहरवाले हिस्से में ही किया गया था। कुछ लोग नाश्ता समाप्त कर चुके थे, कुछ का जारी था, कुछ आनेवाले थे। शालिग्रामजी को चित्राजी को लेकर नाश्ते के स्थान पर पहुँचने में दो मिनट भी नहीं लगे होंगे, पर वहाँ उपस्थित नाश्ता कर रहे मेहमानों के प्लेट में पडें स्वादिष्ट व्यंजनों में मानो एक विशेष व्यंजन आ टपका।

‘‘ये कौन हैं?’’ प्रश्न पसरा।
‘‘इन्हें तो पहले कभी नहीं देखा।’’ स्वाद लेने लगे लोग।
आपस में प्रश्नों का आदान-प्रदान हो रहा था। उत्तर किसी के पास नहीं था। शालिग्रामजी की पत्नी माला भी आ गईं। रिश्तेदारों से नाश्ता का स्वाद पूछतीं, कुछ और लेने का आग्रह करतीं, आगे बढ़ रही थीं। किसी ने पूछ ही लिया—‘‘वे कौन हैं? कोटा की साड़ी में वे सुंदर सी महिला?’’
माला ने इधर-उधर आँखें दौड़ाईं। दूसरी ने स्वर दाबकर ही कहा, ‘‘वही, जो शालिग्रामजी के साथ हैं। उन्हें शालिग्रामजी ने स्वयं अपने हाथों से प्लेट लगाकर दी है। देखिए!’’ ठीक ही तो कहा था सबने। माला ने भी यही देखा। चाय का प्याला लिये खड़े थे शालिग्रामजी। सौम्य आकृति, लगभग उसकी ही हम-उम्र, बड़े सलीके से नाश्ता कर रही, कौन है यह महिला? शालिग्रामजी ने तो कभी इसका जिक्र नहीं किया। आमंत्रण भेजनेवाली सूची भी माला ने पढ़ी थी। किसी अनजान महिला का नाम नहीं था। फिर कौन है यह?

प्रश्न तो अनेक थे। पर वह अवसर नहीं था पति से प्रश्न पूछने का। जबकि अधिकांश मेहमानों के बीच यही प्रश्न बॉल की भाँति दिन भर उछलता उसकी पाली में भी आता रहा। रीति-रिवाज और रस्म अदाएगी में सब एक-दूसरे से पूछते रहे। दोपहर के लंच के समय भी चित्राजी आ गईं थीं।
शालिग्रामजी की एक साली उनके पास गई। पूछा, ‘‘आप कहाँ से आई हैं?’’

दूसरा प्रश्न पूछने ही वाली थी—‘‘आप मेरे जीजाजी को कैसे जानती हैं?’’
इस बीच स्वयं जीजाजी उपस्थित हो गए थे। उन्होंने अपनी साली को किसी और विशेष मेहमान की खातिरदारी में लगा दिया था।
गेस्ट हाउस में आराम करते हुए चित्राजी का मन कई मसलों में उलझ गया था। बहुत दिनों बाद पच्चीस वर्ष पूर्व घटी घटना का संपूर्ण दृश्य नजरों के सामने रूढ़ हो गया। शिमला से गाड़ी में पति-पत्नी और दोनों बच्चे का कुल्लु-मनाली के लिए प्रस्थान। थोड़ी दूरी पर जाते ही गाड़ी का खड्डे में गिरना। पति के सिर में चोट आना। उनका होश नहीं लौटना। डॉक्टर से बातचीत। बेहाल-बेहोश चित्राजी के सामने डॉक्टर की एक माँग। माँग पर शीघ्रता से विचार करने का आग्रह। अकेली खड़ी चित्राजी। दो नन्हे बच्चे माँ से चिपके। अपना-पराया कोई साथ न था। निर्णय लेना था चित्राजी को। सबकुछ चला गया था। जो बचा था, उसकी माँग थी। चित्राजी ने वह वस्तु देना स्वीकार कर लिया, जो उनकी थी। डॉक्टर का सुझाव। और फिर मृत्यु के करीब गया व्यक्ति जीवित हो गया।

स्मृतियों में जीवित था सब दृश्य। कभी-कभी जीवंत हो जाता। पर चित्राजी ने दृढ़ निश्चय कर उन यादों को नजर के सामने से हटा दिया था। शुभ-शुभ का अवसर था। ‘जो बीत गई, वह बात गई’ कविता वे क्लास में पढ़ाती आई हैं। जिस लड़की का विवाह है, उसके लिए शुभ सोचना है। अवसर और समय की वही माँग थी।

बारात दरवाजे लगी। स्वागत में खड़े स्त्री-पुरुष तिरछी नजरों से चित्राजी की ओर अवश्य देखते रहे। प्रश्न वही—‘‘कौन है यह?’’, ‘‘क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से?’’

शालिग्रामजी ने द्वार पर ही अपने समधी से चित्राजी का परिचय कराया था। उनकी दो सालियाँ अपने पतियों के साथ वहीं खड़ी थीं। उनका परिचय नहीं करवाया। और यह खबर उस भीड़ भरे स्थल पर भी आसानी से यात्रा कर गई। सबको मिल आई।

बराती और घराती के भोजनापरांत विवाह के रस्म पूरे किए जाने लगे। शालिग्रामजी को पंडितजी द्वारा मंडप पर कन्यादान के लिए बुलाया गया। मंडप पर बैठने के पूर्व उन्होंने चारों ओर निगाहें घुमाईं। उनकी दृष्टि के सम्मुख वह चेहरा नहीं आया, जिसकी उन्हें खोज थी। उनके आस-पास मंडप पर बैठी उनकी बहनों और सालियों ने भाँप लिया था। दो-तीन एक साथ बोल पड़ीं—‘‘वहाँ हैं आपकी मेहमान।’’

देखा माला ने भी। मानो खीझकर बोली, ‘‘अब बैठ जाइए। मनचित्त लगाकर कन्यादान करिए। इसी काम के लिए मेहमान और सारा इंतजाम है। बैठिए!’’

शालिग्रामजी ने ऊँची आवाज में कहा, ‘‘चित्राजी! आप इधर आइए। मंडप पर बैठिए। मेरी बेटी को आपका विशेष आशीर्वाद चाहिए।’’
चित्राजी अंदर से हिल गईं। ऊपर से उपस्थित जनों की निगाहों के तीरों से बिंध गईं। वे परेशान तो थी हीं। अपने स्थान पर खड़ी होकर बोलीं, ‘‘आप लोग शुभ कार्य के लिए वहाँ उपस्थित हुए हैं। बेटी का कन्यादान करिए। मुझे यहीं बैठना है। मैं विधवा हूँ। मेरा सुहाग नहीं है। समाज ऐसी महिला को किसी सौभाग्याकांक्षिणी को सुहाग देने की मनाही करता है। मैं दिल से आपकी बेटी का शुभ चाहती हूँ। इसलिए दूर बैठी हूँ। आप अपना पुनीत काम पूरा करें। मेरी चिंता छोड़ दें।’’ वे बैठ गईं।

‘‘मैं नहीं मानता ऐसे समाज के विधान को। मेरे परिवार के लिए, मेरी बेटी के लिए आपसे बढ़कर कोई शुभ नहीं हो सकता। आपकी कृपा के बिना तो न मैं होता न मेरी बेटी। आइए! आप मेरी प्रार्थना मानकर मेरी बेटी का कन्यादान करिए।’’ फिर तो पंडितजी भी परेशान हो गए। बोले, ‘‘शालिग्रामजी! आपकी मेहमान महिला ठीक कह रही हैं। आप कन्यादान करिए। अपनी पत्नी को साथ बैठाइए। मंडप पर बैठी सभी महिलाएँ सुहागन ही हैं।’’

शालिग्रामजी बिफर पड़े—‘‘आप सब आज सुबह से चित्राजी का परिचय जानने के लिए परेशान हैं। आपके बीच तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। कार्य व्यस्तता में भी मैं आपके प्रश्नों के बाणों से बिंधता रहा। जब तक मैं उनका परिचय न दे दूँ, आप सबों का ध्यान भी विवाह के रस्म-रिवाजों पर केंद्रित नहीं होगा। तो सुनिए!’’ और जो कुछ शालिग्रामजी ने सुनाया, सुनकर वहाँ बैठे उपस्थित लोगों के प्रश्न तो चुके ही, वे सब चित्राजी के प्रति नतमस्तक हो गए। वे अवाक् रह गए। ‘‘पच्चीस वर्ष पूर्व एक दुर्घटना में चित्राजी के पति घायल हो गए। उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था। जिस अस्पताल में उन्हें लाया गया, उसी के एक कमरे में मैं ऑपरेशन बेड पर लेटा था। मेरे दिल ने काम करना बंद कर दिया था। चिकित्सकों ने निर्णय लिया था—किसी का धड़कता दिल मिलने पर प्रत्यारोपण हो सकता है। आँख दान, किडनी दान जैसे अंग दान की बात तो सुनी गई थी। देहदान भी होने लगा था। पर हृदय दान तो तभी हो जब वह धड़कता हो, और जब तक दिल धड़कता है, आदमी जिंदा है। भला जीवित का हृदय कोई क्यों दान करे।

चित्राजी के पति का दिल धड़क रहा था। मस्तिष्क ने कार्य करना बंद कर दिया था। डॉक्टर शर्मा ने इनसे अनुरोध किया—‘‘आपके पति को अब हम नहीं बचा सकते। पर आपकी सहमति हो तो इनका दिल किसी और के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। वह जिंदा हो सकता है।

‘‘सुझाव सुनकर चित्राजी पर क्या बीती, मुझे नहीं मालूम। और किसी ने जानने की कोशिश भी की कि नहीं, मालूम नहीं। चित्राजी ने अनुमति दे दी थी। मेरा दिल पिछले पच्चीस वर्षों से धड़क रहा है, यह मेरा नहीं, इनके पति का दिल है। पर पिछले पच्चीस वर्षों में इन्होंने एक बार भी एहसान नहीं जताया। इन्होंने तो मुझे तब भी नहीं जाना, न देखा था। मैंने भी नहीं। इन्होंने कभी मुझे ढूँढ़ने की कोशिश भी नहीं की। पर मैं बहुत बेचैन था। जीवन देनेवाली के प्रति आभार भी नहीं प्रगट कर सका। दो वर्ष पूर्व इनके शहर में गया। डॉ. शर्मा मिल गए। मेरा दुर्भाग्य कि इनसे तब भी भेंट नहीं हो सकी। डॉ. शर्मा से इनका मोबाइल नंबर मिल गया। फोन पर ही मैंने इन्हें अपना परिचय दिया। मनुहार पत्र भेजा। फिर निमंत्रण। बहुत आग्रह करने पर ये मेरी बेटी के विवाह पर आईं हैं। मैंने भी इनको आज सुबह ही पहली बार देखा। अब आप ही सोचिए पंडितजी! हमारे परिवार के लिए इनसे बढ़कर शुभ और कौन होगा। मेरे विवाह और मेरे बच्चे होने के पीछे भी यही तो हैं। मैं हूँ, तभी तो सब है।’’

कन्यादान के रस्म के समय तो सबकी आँखें भरती हैं। शालिग्रामजी ने तो कन्यादान के पूर्व ही उपस्थित सभी आँखों में पानी भर दिया।
माला मंडप पर से उठी। सीधे चित्राजी के पास पहुँची। पैर छूकर आशीष लिये और हाथ पकड़कर मंडप पर ले आई। महिलाओं के झुंड ने आँसू पोंछकर गाना प्रारंभ किया —‘शुभ हो शुभ, आज मंगल का दिन है, शुभ होे शुुभ। शुभ बोलू अम्मा, शुभ बोलू पापा, शुभ नगरी के लोग सब, शुभ हो शुभ!’’

रिश्ते को नामकरण की आवश्यकता नहीं पड़ी। अनेक रिश्तों से भरा था प्रांगण। पर सबसे ऊँचा हो गया था शालिग्रामजी और चित्राजी का रिश्ता। बेनाम था तो क्या?

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मेरू की मंजिल।

Kmsraj51 की कलम से…..

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◊ मेरू की मंजिल। ◊

मेरू को बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था। उधर उसका छोटा भाई चीनू बिल्कुल उससे उलट। बिल्कुल न पढ़ना और खेलकूद में मस्त रहना। मेरू चीनू से उम्र में तीन साल बड़ी थी और नौवीं क्लास में पढ़ती थी। चीनू छठवीं क्लास में था। मेरू अपनी क्लास में हमेशा अव्वल आती थी। उसके मम्मी-पापा को उस पर बहुत गर्व था, लेकिन चीनू की तरफ से वे परेशान रहते थे। जब भी वे पेरेंट्स मीटिंग में जाते तो चीनू के न पढ़ने और शैतानी करने की ज्यादा शिकायतें मिलतीं। लेकिन चीनू में एक खास बात थी कि स्कूल में वह फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी था। मेरू से क्लास के सभी टीचर खुश रहते थे, क्योंकि वह मेहनत से पढ़ाई करने के साथ-साथ स्कूल में समय-समय पर होने वाली गतिविधियों में भी खूब हिस्सा लेती थी।

एक बार एक अन्य स्कूल में एक साइंस क्विज का आयोजन हुआ, जिसमें हिस्सा लेने के लिए स्कूल से सिर्फ मेरू का ही नाम चुना गया। उस स्कूल में क्विज में हिस्सा लेने के लिए बहुत सारे स्कूलों से मेधावी बच्चे आये। शुरू में तो मेरू को डर लगा कि पता नहीं कैसे-कैसे प्रश्न पूछे जाएंगे। लेकिन जब क्विज शुरू हुआ तो उसका सब डर दूर हो गया और उसने सभी प्रश्नों के उत्तर बड़ी कुशलता व निर्भीकता के साथ दिये। अंत में उसे क्विज का विजेता घोषित किया गया। जब स्कूल प्रिंसिपल को पता चला कि मेरू ने क्विज प्रतियोगिता जीत ली है तो वह बहुत खुश हुईं। उन्होंने अपने स्कूल का नाम रोशन करने के लिए उसे सम्मानित किया।

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मेरू को साइंस विषय बहुत अच्छा लगता था। जब तक उसे साइंस का कोई टॉपिक समझ में नहीं आ जाता था, तब तक उसका वह पीछा नहीं छोड़ती थी। यही वजह थी कि उसे ही सभी जगह साइंस की होने वाली प्रतियोगिताओं में भेजा जाता। एक बार किसी प्रतियोगिता में उसे पूछा गया कि तुम बड़ा होकर क्या बनोगी, तो उसका जवाब था – साइंटिस्ट। उसने दसवीं क्लास में टॉप किया था। जब 11वीं में आई तो उसने साइंस स्ट्रीम ही चुनी। फिजिक्स व कैमिस्ट्री विषयों के होने वाले प्रयोगों में उसे बड़ा मजा आता था। जब क्लास के बच्चों को कोई बात समझ नहीं आती थी तो वह टीचर की अनुपस्थिति में खुद ही टीचर बन जाती थी।

एक बार स्कूल में एक नाटक का आयोजन किया गया। वह नाटक साइंस विषय पर ही आधारित था, जिसमें स्कूल के बच्चों को अभिनय करना था। उसमें एक साइंस टीचर का भी रोल था। उस रोल को निभाने की बात आई तो इसके लिए मेरू को चुना गया। मेरू प्रतिभाशाली तो थी ही और क्लास में अपने टीचर की अनुपस्थिति में टीचर बन जाती थी तो उसे यह रोल करना बड़ा आसान लगा। उसने यह रोल बखूबी निभाया। उस नाटक को देखने के लिए बड़े-बड़े अधिकारी व गण्यमान्य लोग आये थे। उनमें कुछ फिल्म व टेलीविजन के लोग भी शामिल थे। एक टीवी सीरियल के डायरेक्टर को मेरू साइंस की टीचर के रोल में बहुत पसंद आई।

वह दूसरे दिन प्रिंसिपल से मिले और मेरू के बारे में जानना चाहा। प्रिंसिपल ने मेरू को उनसे मिलाया तो वह उससे बहुत प्रभावित हुए। वह बहुत दिन से ऐसी ही एक बाल कलाकार की खोज में थे, जो उन्हें मेरू के रूप में दिखाई दे गयी थी। उन्होंने उसी समय उसे अपने एक नये टीवी सीरियल में अभिनय करने का ऑफर दे दिया। प्रिंसिपल ने भी अपनी सहमति जताई। यह सुनकर मेरू को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उसे टीवी सीरियल में काम करने का ऑफर मिल सकता है। पर दूसरी तरफ उसका मन तो साइंस पढ़ने और एक बड़ी साइंटिस्ट बनने का था। उसने सोचा कि अगर वह टीवी सीरियल में काम करने लगेगी तो उसकी पढ़ाई का क्या होगा। और उस सपने का क्या होगा, जिसे उसे साकार करना है, क्योंकि सीरियल करने पर वह अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाएगी।

जब पढ़ेगी ही नहीं तो आगे कैसे बढ़ेगी? यह सोच उसने सीरियल के डायरेक्टर को यह कहकर मना कर दिया कि उसका सबसे पहला उद्देश्य पढ़ाई करके साइंटिस्ट बनना है। यह बात सुनकर प्रिंसिपल बहुत खुश हुईं, पर सीरियल के डायरेक्टर के ज्यादा आग्रह करने पर और कुछ अपनी मम्मी-पापा के कहने पर मेरू ने हां तो कर दी, पर एक शर्त रखी कि अगर उसकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए तो वह सीरियल में एक्टिंग के लिए तैयार है। सीरियल डायरेक्टर ने कहा कि वह पढ़ाई के लिए उसे पूरा समय देंगे और उन्होंने प्रिंसिपल से भी आग्रह किया कि वह मेरू को पूरा सहयोग करें। चार महीने में सीरियल की शूटिंग पूरी हुई। लेकिन इस बीच मेरू की पढ़ाई का रुटीन कुछ गड़बड़ा गया। वह पढ़ाई में पिछड़ गई थी, क्योंकि जो समय वह सीरियल करने से पहले पढ़ाई में देती थी वह समय देना सीरियल करने पर मुमकिन नहीं था। उसने अच्छे से शूटिंग पूरी कर ली थी। लेकिन अब उसे अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी, जिसके लिए उसके सभी टीचरों ने उसे पूरा सहयोग किया।

मेरू को 11वीं में बहुत मेहनत करनी पड़ी। उसका हौसला बुलंद था। उसके अच्छे मार्क्स आए। जब 12वीं में आई तो स्कूल की ओर से उसे अमेरिका जाने का मौका मिला। वहां उसने एक साइंस प्रोग्राम में हिस्सा लिया। वह अब ऐसी सीढियों पर चढ़ गई थी, जो उसे साइंटिस्ट बनने की मंजिल पर ले जा रही थीं।

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बात का घाव।

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Baat Ka Ghaav | बात का घाव।

After cutting the wood, the woodcutter took the lion to his home in the evening. Seeing the lion with the woodcutter, the woodcutter's wife and children got scared.बहुत पुरानी बात है। एक लकड़हारे और शेर में दोस्ती थी। दोनों का मन एक दूसरे के बिना नहीं लगता था। शेर जंगल में रहता था और लकड़हारा गांव में। लकड़हारा लकडिया काटकर और उन्हें बेचकर अपना घर चला रहा था। सारे दिन वह जंगल में लकडिम्यां काटता था और शेर उसके पास बैठकर उससे बातें किया करता था।

एक दिन लकड़हारे ने सोचा कि वह अपने दोस्त शेर को दावत पर बुलाए। अगले दिन उसने शेर के सामने दावत का प्रस्ताव रखा। शेर ने दावत का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। लकडियां काटने के बाद शाम को लकड़हारा शेर को अपने घर ले गया। शेर को लकड़हारे के साथ देखकर लकड़हारे की पत्नी और बच्चे डर गए।

उन्हें डरा हुआ देखकर लकड़हारे ने उनका डर दूर करते हुए बताया कि शेर उसका दोस्त है और आज हमारा मेहमान है। लकड़हारे ने शेर की खूब आवभगत की। रात को सोने का वक्त होने पर लकड़हारे ने शेर को अपने साथ घर में सुलाना चाहा, पर उसकी पत्नी ने शेर को घर में सुलाने का विरोध करते हुए कहा कि वह शेर को किसी कीमत पर घर में नहीं सोने देगी, क्योंकि शेर जैसे खूंखार जीव का कोई भरोसा नहीं होता। ऐसा जीव कभी भी नुकसान पहुंचा सकता है। पत्नी के विरोध करने पर लकड़हारे ने पत्नी को समझाया, ‘यह शेर और शेरों की तरह नहीं है।

यह साथ सोने पर किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाएगा।’ लेकिन उसकी पत्नी शेर को घर में सुलाने को तैयार नहीं हुई। आखिर थककर लकड़हारे को अपनी पत्नी की बात माननी पड़ी। लकड़हारे की पत्नी ने लकड़हारे से शेर के गले में रस्सी बांधकर घर के बाहर खड़े पेड़ से बांधने को कहा। पत्नी की बात मानकर लकड़हारे ने ऐसा ही किया।

उस रात मौसम बहुत खराब हो गया, लकड़हारा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ घर में आराम से सोता रहा, किंतु शेर बेचारा सारी रात पेड़ के नीचे बंधा बारिश और तेज हवा के थपेड़े सहता रहा। सुबह को लकड़हारा सोकर उठा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ कि उसकी वजह से उसका मित्र सारी रात बारिश में भीगता रहा। यह सोचकर लकड़हारे को बहुत दुख हुआ, उसने शेर से माफी मांगी। शेर ने मुस्कराते हुए कहा, ‘इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है दोस्त, यह खराब मौसम की मेहरबानी है।’

शेर की बात सुनकर लकड़हारे को खुशी हुई कि उसका मित्र उससे नाराज नहीं है। लकड़हारा लकडिया काटने जंगल गया तो शेर को अपने घर पर रोकना चाहता था, पर शेर नहीं रुका। कई दिन गुजर गए। एक दिन लकड़हारा लकडियां काटने के बाद घर जाने की तैयारी में था तो शेर उसके पास आया और बोला, ‘दोस्त, अपनी कुल्हाड़ी मेरी पीठ पर मारो।’

शेर की बात सुनकर लकड़हारा चौंक गया। उसने सोचा, शायद शेर उससे मजाक कर रहा है। शेर ने दोबारा कुल्हाड़ी मारने को कहा तो लकड़हारा हैरानी से बोला, ‘तुम क्या कह रहे हो? मैं भला तुम्हें कुल्हाड़ी कैसे मार सकता हूं?’

लकड़हारे के इनकार करने पर शेर ने दहाड़ते हुए कहा, ‘अगर तुमने मेरा कहा नहीं माना तो मैं तुम्हें खा जाऊंगा।’

शेर का बदला रूप देखकर लकड़हारा डर गया। उसकी समझ में नहीं आया कि उसका मित्र उससे कुल्हाड़ी मारने को क्यों कह रहा है। उसने इस बारे में शेर से पूछा, लेकिन शेर ने कुछ नहीं बताया। शेर ने तीसरी बार चेतावनी देते हुए कुल्हाड़ी मारने के लिए कहा। मरता क्या न करता, लकड़हारे ने अपनी जान बचाने के लिए शेर की पीठ पर कुल्हाड़ी दे मारी। कुल्हाड़ी लगते ही शेर की पीठ पर गहरा जख्म हो गया, जिससे खून बहने लगा। शेर अपनी गुफा की ओर बढ़ गया।

अगले दिन लकड़हारा डरते-डरते जंगल में लकडियां काटने गया कि पता नहीं आज उसके प्रति शेर का कैसा व्यवहार होगा। शेर ने लकड़हारे के साथ और दिन की तरह व्यवहार किया तो लकड़हारे के दिल को तसल्ली हुई। शेर की पीठ का जख्म वक्त के साथ-साथ भरता गया।

एक दिन शेर ने लकड़हारे से अपने जख्म के बारे में पूछा तो लकड़हारे ने खुश होकर बताया, ‘मित्र, तुम्हारा जख्म अब पूरी तरह भर गया है।’

लकड़हारे के बताने पर शेर गंभीर होते हुए बोला, ‘जानना चाहते हो मित्र, मैंने तुमसे अपनी पीठ पर कुल्हाड़ी क्यों लगवाई थी?’ शेर के कहने पर लकड़हारे ने हामी भर दी। वह भी यह बात जानने को उत्सुक था। शेर उसे बताने लगा, ‘घर आया मेहमान भगवान के समान होता है दोस्त और मेहमान का आदर बड़े प्रेम से किया जाता है। मैं भी तुम्हारा मेहमान था, लेकिन तुमने मुझे घर से बाहर पेड़ से बांध दिया, जहां मैं सारी रात बारिश में भीगता रहा। उस दिन की बात का जख्म मेरे दिल पर आज भी ताजा है। मैंने तुमसे अपनी पीठ पर कुल्हाड़ी इसीलिए लगवाई थी ताकि मैं तुम्हें दिखा सकूं कि चोट का जख्म तो भर जाता है, किंतु बात का जख्म कभी नहीं भरता। एक बात कान खोलकर सुन लो, तुम्हारी और मेरी मित्रता केवल आज तक थी। आज के बाद न मैं तुम्हारा मित्र हूं और न ही तुम मेरे मित्र हो और अगर आज के बाद तुम मुझे इस जंगल में दिखाई दे गए तो मैं तुम्हें अपना भोजन बना लूंगा।’ शेर अपनी बात पूरी करने के बाद चला गया।

लकड़हारा शेर को जाते हुए देखता रहा। अपनी पत्नी के गलत व्यवहार की वजह से आज उसने अपना पुराना मित्र खो दिया था। उसे बहुत पछतावा हुआ, किंतु अब पछताने से क्या फायदा था। लकड़हारा दुखी मन से गांव की तरफ चल दिया।

क्या सीख सकते हो: किसी को भी बुरा मत बोलो। दोस्त को मजाक में भी अपशब्द न कहो। अगर तुम्हे किसी की कोई बात बुरी भी लगती है तो उसे बता दो कि तुम्हें इस तरह से बात करना पसंद नहीं है। हमेशा घर आए मेहमान का खूब आदर-सम्मान करो।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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मन की उड़ानः दूसरों के पंखों से कब तक उड़ोगे।

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मन की उड़ान ⇒ दूसरों के पंखों से कब तक उड़ोगे।

मन की उड़ान।

sapana
मन की उड़ान।

⇒ जीवन एक सुंदर फूल की तरह है।

⇒ तू ना हो निराश कभी मन से।

⇒ समय एक महान गुरु की तरह है।

⇒ हमेशा सकारात्मक सोच रखना मन में।

⇒ मैं एक पेन का उपयोग कर रहा हूँ, मानव जीवन परिवर्तन के लिए।

प्रकृति ने मानव को एक विकसित दिमाग दिया है। इसके सही इस्तेमाल से मनुष्य अपने जीवन में सार्थक बदलाव ला सकता है। जहां तक लक्ष्य की बात है, इसकी प्राप्ति बिना बलिदान के संभव नहीं है। अगर मन में निष्ठा और नि:स्वार्थता हो तो लक्ष्य तक पहुंचने में काफी मदद मिलती है।

⇒ कभी न बैठें भाग्य के भरोसे।

भाग्य के भरोसे बैठकर अपने जीवन को नष्ट केवल कमजोर व्यक्ति करते हैं। जो कुछ कर गुजरने का हौसला रखते हैं, वे भाग्य को कोरी कल्पना मानते हैं। कामयाबी हासिल करने के लिए धैर्य, ठोस योजना, सही साधन व कठोर परिश्रम की आवश्यकता होती है।

⇒ हर किसी को नहीं मिलता गॉडफादर।

जीवन में ऐसा व्यक्ति मिलना बहुत मुश्किल है, जो हमें शिखर पर बिठा दे। ऐसे में गॉड-फादर के भरोसे बैठना उचित नहीं है। हमें अपनी जिंदगी की परिभाषा खुद लिखनी होगी। अपने लिए अवसर खुद खोजने होंगे।

⇒ लकीर का फकीर रहता है सदा नाकामयाब।

जिंदगी में लकीर का फकीर बने रहना स्वयं को असफलता की गर्त में धकेलने जैसा है। सफल वही होता है, जो वक्त के अनुसार खुद को ढालता है।

⇒ दूसरों के लिए योजनाएं ही क्यों बनाएं।

क्या यह सच नहीं है कि जीवन में हम जितनी भी योजनाएं बनाते हैं, उनमें से अधिकांश दूसरों की कामयाबी के लिए बनाते हैं। हम अपनी प्रगति, अपने विकास व अपनी योग्यता को निखारने के लिए आखिर योजनाएं क्यों नहीं बनाते? इस तथ्य पर विचार करना भी बेहद जरूरी है।

⇒ तेज दिमाग ही देखता है नए अवसर।

जिंदगी में जितने भी महान अवसर आते हैं, उन्हें हमारी आंखें नहीं देख सकतीं, लेकिन तेज दिमाग न केवल उन्हें देखता है, बल्कि उन्हें पहचानता भी है, इसलिए जो दिमाग सोचता है, उसकी कभी अवहेलना न करें।

⇒ एक ही है अमीर बनने का फार्मूला।

संसार में अमीर बनने का केवल एक ही फार्मूला है। अगर आप दूसरों के लिए काम करते हैं तो जो भी कार्य करें उसे पूर्ण निष्ठा, पूर्ण ईमानदारी से अपना कार्य समझकर करें। एक न एक दिन दौलत तुम्हारे कदम अवश्य चूमेगी।

⇒ विश्वसनीयता कभी न खोएं।

जीवन में साख या विश्वसनीयता बड़ी मुश्किल से कमाई जाती है, लेकिन इसके सहारे बड़े-बड़े काम चुटकियों में हो जाते हैं, लेकिन अगर जरा-सी भी लापरवाही बरती जाए तो साख खत्म होने में देर नहीं लगती।

⇒ शॉर्ट-कट का रास्ता कभी नहीं।

शॉर्ट-कट के रास्ते से जीवन में कभी कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती। कामयाबी का रास्ता काफी लंबा है, जिसमें कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ता है।

⇒ लेग पुलिंग तो होगी।

जब भी आप आगे बढ़ेंगे, आपकी टांग खींचने का प्रयास जरूर किया जाएगा। सफलता तभी मिलेगी, जब आप टांग खींचने वालों से जरा भी नहीं उलझेंगे।

⇒ आलोचना के पीछे छिपी सद्भावना को दें सम्मान।

कभी-कभी ऐसा भी होता है, जब हमारे भले के लिए कोई हमारी आलोचना करता है। ऐसी आलोचना के पीछे छिपी सद्भावना को अवश्य सम्मान दें।

⇒ खुद बनिए अपने बॉस।

अगर कामयाबी की डगर पर चलना है तो हमें अपना बॉस खुद बनना होगा। खुद जोखिम भी उठाने होंगे तथा दूसरों का मार्गदर्शन भी करना होगा।

 ⇒ बूढ़ा वही, जिसने सीखना बंद कर दिया।

बुढ़ापे का उम्र से कोई संबंध नहीं है। जो हमेशा नया सीखता है, वक्त के साथ स्वयं को बदलता है, वह हमेशा जवान रहता है।

⇒ क्षमताओं का 10 प्रतिशत भी नहीं होता इस्तेमाल।

सफलता का एक मार्ग यह भी है कि हम जितना काम करते हैं, उससे ज्यादा काम करने की आदत डालें। अपनी क्षमता को पहचानने के साथ-साथ हम उसका पूरा इस्तेमाल भी करें।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

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 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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शांति पर महान व्यक्तियों के विचार।

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शांति पर महान व्यक्तियों के विचार।

Quote 1: A people free to choose will always choose peace.

In Hindi: जो लोग चुनाव करने के लिए स्वतंत्र हैं वो हमेशा शांति का चुनाव करेंगे।

Ronald Reagan रोनाल्ड रीगन 

Quote 2: An eye for an eye only ends up making the whole world blind.

In Hindi: आँख के बदले में आँख पूरे विश्व को अँधा बना देगी।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 3: Even peace may be purchased at too high a price.

In Hindi: शायद शांति को भी बहुत ऊँची कीमत पर खरीदा जा सकता है।

Benjamin Franklin बेंजामिन फ्रैंकलिन

Quote 4: I believe in the religion of Islam. I believe in Allah and peace.

In Hindi: मैं इस्लाम में यकीन रखता हूँ। मैं अल्लाह और अमन में यकीन करता हूँ।

Muhammad Ali मुहम्मद अली 

Quote 5: I dream of an Africa which is in peace with itself.

In Hindi: मैं एक ऐसे अफ्रीका का स्वप्न देखता हूँ, जो स्वयम में शांत हो।

Nelson Mandela नेल्सन मंडेला 

Quote 6: If we have no peace, it is because we have forgotten that we belong to each other.

In Hindi: अगर कहीं शांति नहीं है, तो इसकी वजह ये है कि हम भूल चुके हैं कि हम एक-दूसरे के हैं।

Mother Teresa मदर टेरेसा 

Quote 7: If you want to make peace with your enemy, you have to work with your enemy. Then he becomes your partner.

In Hindi: यदि आप अपने दुश्मन के साथ शांति चाहते हैं, तो आपको उसके साथ काम करना होगा। तब वो आपका साथी बन जाएगा।

Nelson Mandela नेल्सन मंडेला 

Quote 8: It is an unfortunate fact that we can secure peace only by preparing for war.

In Hindi: यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है, कि हम शांति को केवल युद्ध के लिए तैयार रह कर सुरक्षित कर सकते हैं।

John F. Kennedy जॉन ऍफ़. केनेडी 

Quote 9: It is madness for sheep to talk peace with a wolf.

In Hindi: एक भेड़िये के साथ शांति की बात करना भेंड के लिए पागलपन है।

Thomas Fuller थोमस फूलर 

Quote 10: Let there be work, bread, water and salt for all.

In Hindi: सभी के लिए काम, रोटी, पानी और नमक हो।

Nelson Mandela नेल्सन मंडेला 

Quote 11: Nobody can bring you peace but yourself.

In Hindi: सिवाय आपके कोई भी आपको चैन नहीं दे सकता।

Ralph Waldo Emerson राल्फ वाल्डो एमर्सन 

Quote 12: Peace and justice are two sides of the same coin.

In Hindi: शांति और न्याय एक ही सिक्के के दो पहलू  हैं।

Dwight D. Eisenhower ड्वाईट डी. आइजेन्होवर 

Quote 13: Peace begins with a smile.

In Hindi: शांति की शुरआत मुस्कराहट के साथ होती है।

Mother Teresa मदर टेरेसा 

Quote 14: Peace cannot be achieved through violence, it can only be attained through understanding.

In Hindi: हिंसा से शांति नहीं प्राप्त की जा सकती है, यह सिर्फ समझ के माध्यम से मिल सकती है।

Ralph Waldo Emerson राल्फ वाल्डो एमर्सन 

Quote 15: Peace is a journey of a thousand miles and it must be taken one step at a time.

In Hindi: शांति हज़ार मील का सफ़र है, और इसे एक बार में एक कदम बढ़कर तय किया जाना चाहिए।

Lyndon B. Johnson लिंडन बी.जोंसन

Quote 16: People always make war when they say they love peace.

In Hindi: लोग हमेशा युद्ध करते हैं, जब वो कहते हैं कि उन्हें शांति प्रिय है।

David Herbert Lawrence डेविड हर्बर्ट लारेंस 

Quote 17: We make war that we may live in peace.

In Hindi: हम इसलिए युद्ध करते हैं, कि हम शांति से रह सकें।

Aristotle अरस्तु 

Quote 18: Every goal, every action, every thought, every feeling one experiences, whether it be consciously or unconsciously known, is an attempt to increase one’s level of peace of mind.

In Hindi: प्रत्येक लक्ष्य, प्रत्येक कार्य, प्रत्येक विचार, प्रत्येक भावना, चाहे वह चेतन या अवचेतन रूप में ज्ञात हो, मानसिक शांति बढाने की दिशा में एक प्रयास है।

Sydney Madwed सिडनी मैडवेड 

Quote 19: He that would live in peace and at ease must not speak all he knows or all he sees.

In Hindi: वह जो शांति और चैन से रहना चाहता है उसे हर वो चीज नहीं बोलनी चाहिए जो वो जानता या देखता है।

Benjamin Franklin बेंजामिन फ्रैंकलिन 

Quote 20: I don’t know whether war is an interlude during peace, or peace an interlude during war.

In Hindi: मैं नहीं जानता कि युद्ध शांति के बीच का अंतराल है या शांति युद्ध के बीच का।

Georges Clemenceau जोर्ज्स क्लेमेंसिऊ

Quote 21: It isn’t enough to talk about peace. One must believe in it. And it isn’t enough to believe in it. One must work at it.

In Hindi: सिर्फ शांति के बारे में बात करना पर्याप्त नहीं है। उसमे यकीन भी करना होगा। और सिर्फ यकीन करना पर्याप्त नहीं है। उसपे काम भी करना होगा।

Eleanor Roosevelt एलेनोर रूजवेल्ट

 Quote 22: Nonviolence is the first article of my faith. It is also the last article of my creed.

In Hindi: अहिंसा मेरे विश्वास की पहली वस्तु है। यह मेरे मत की आखिरी वस्तु भी है।

Mahatma Gandhi महात्मा गाँधी 

Quote 23: One cannot subdue a man by holding back his hands. Lasting peace comes not from force.

In Hindi: कोई किसी का हाथ पीछे पकड़कर वश में नहीं कर सकता. स्थाई शांति बल से नहीं आती है।

David Borenstein डेविड बोरेन्स्टीन

Quote 24: Peace is not only better than war, but infinitely more arduous.

In Hindi: शांति यद्ध से सिर्फ बेहतर नहीं है, बल्कि कहीं अधिक कठिन भी है।

George Bernard Shaw जोर्ज बर्नार्ड शा

Quote 25: Peace is rarely denied to the peaceful.

In Hindi: शांति शायद ही कभी शांतिपूर्ण व्यक्ति को नहीं दी जाती।

Friedrich Schiller फ्रेडरिक शीलर 

Quote 26: Peace is the first thing the angels sang.

In Hindi: शांति पहली चीज  है जो फरिश्तों ने गाई।

John Keble जॉन केबले 

Quote 27: Peace is when time doesn’t matter as it passes by.

In Hindi: शांति तब है जब समय के बीतने से फर्क नहीं पड़ता।

Maria Schell मारिया शेल 

Quote 28: Power to the peaceful!

In Hindi: शांतिपूर्ण को सत्ता दो।

Michael Franti मिशेल फ्रंटि 

Quote 29: The real and lasting victories are those of peace, and not of war.

In Hindi: वास्तविक और स्थाई जीत शांति की होती है, युद्ध की नहीं।

Ralph Waldo Emerson राल्फ वाल्डो एमर्सन 

Quote 30: Those who make peaceful revolution impossible will make violent revolution inevitable.

In Hindi: जो शांतिपूर्ण क्रांति को असंभव बना देते हैं वो हिंसक क्रांति को अपरिहार्य बना देंगे।

John F. Kennedy जॉन ऍफ़ केनेडी 

Quote 31: War will never cease until babies begin to come into the world with larger cerebrums and smaller adrenal glands.

In Hindi: युद्ध तब तक नही बंद होंगे जब तक इस दुनिया में बच्चे बड़े दिमाग और छोटे एड्रीनल ग्लैंड के साथ नहीं आना शुरू होंगे।

H. L. Mencken एच. एल. मेंकेन

Quote 32: You cannot find peace by avoiding life.

In Hindi: जीवन को टाल कर आप शांति नहीं पा सकते।

Virginia Woolf वर्जिनिया वूल्फ 

Quote 33: You don’t have to have fought in a war to love peace.

In Hindi: शांति से प्रेम करने के लिए आपको युद्ध में लड़ा हुआ होना ज़रूरी नहीं है।

Geraldine Ferraro गेरेल्डाइन फेर्रारो 

Quote 34: Peace is its own reward.

In Hindi: शांति  अपने आप में ईनाम है।

Mahatma Gandhi महत्मा गाँधी 

Note:- Post inspired by AKC(http://www.achhikhabar.com/), I am greatful to AKC & My dear friend Mr. Gopal Mishra. For more Quotes visit at: http://www.achhikhabar.com/

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कैसे आया जूता।

 Kmsraj51 की कलम से…..

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“कैसे आया जूता।”

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कैसे आया जूता।

एक बार की बात है एक राजा था। उसका एक बड़ा-सा राज्य था। एक दिन उसे देश घूमने का विचार आया और उसने देश भ्रमण की योजना बनाई और घूमने निकल पड़ा। जब वह यात्रा से लौट कर अपने महल आया। उसने अपने मंत्रियों से पैरों में दर्द होने की शिकायत की। राजा का कहना था कि मार्ग में जो कंकड़ पत्थर थे वे मेरे पैरों में चुभ गए और इसके लिए कुछ इंतजाम करना चाहिए।कुछ देर विचार करने के बाद उसने अपने सैनिकों व मंत्रियों को आदेश दिया कि देश की संपूर्ण सड़कें चमड़े से ढंक दी जाएं। राजा का ऐसा आदेश सुनकर सब सकते में आ गए। लेकिन किसी ने भी मना करने की हिम्मत नहीं दिखाई। यह तो निश्चित ही था कि इस काम के लिए बहुत सारे रुपए की जरूरत थी। लेकिन फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद राजा के एक बुद्घिमान मंत्री ने एक युक्ति निकाली। उसने राजा के पास जाकर डरते हुए कहा कि मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूँ।

अगर आप इतने रुपयों को अनावश्यक रूप से बर्बाद न करना चाहें तो एक अच्छी तरकीब मेरे पास है। जिससे आपका काम भी हो जाएगा और अनावश्यक रुपयों की बर्बादी भी बच जाएगी। राजा आश्चर्यचकित था क्योंकि पहली बार किसी ने उसकी आज्ञा न मानने की बात कही थी। उसने कहा बताओ क्या सुझाव है। मंत्री ने कहा कि पूरे देश की सड़कों को चमड़े से ढंकने के बजाय आप चमड़े के एक टुकड़े का उपयोग कर अपने पैरों को ही क्यों नहीं ढंक लेते। राजा ने अचरज की दृष्टि से मंत्री को देखा और उसके सुझाव को मानते हुए अपने लिए जूता बनवाने का आदेश दे दिया।

यह कहानी हमें एक महत्वपूर्ण पाठ सिखाती है कि हमेशा ऐसे हल के बारे में सोचना चाहिए जो ज्यादा उपयोगी हो। जल्दबाजी में अप्रायोगिक हल सोचना बुद्धिमानी नहीं है। दूसरों के साथ बातचीत से भी अच्छे हल निकाले जा सकते हैं।

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नन्हीं चिड़िया।

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ϒ नन्हीं चिड़िया। ϒ

नन्हीं चिड़िया नीचे आ।
नीचे आ कर गीत सुना।

बड़ी धूप है आसमान में।
थोड़ा सा तो ले सुस्ता।

पेड़ तले ठंडी छाया है।
छाया में आ दाना खा।

पंखों को थोड़ा आराम दे।
मेरी गोदी में सो जा।

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क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

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