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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2023-KMSRAJ51 की कलम से

शिव शंभू।

Kmsraj51 की कलम से…..

Shiva Shambhu | शिव शंभू।

शिव शंभू हितकारी महादेव,
जटाओं में समा गंगा गले में रख नाग।

चले विषधारी हरने कष्ट जगत के,
अनोखी छवि देखते सभी इनकी।

ना रह पाता अछूता आराधना से इनकी,
नाम भोले भंडारी पल में जाते मान।

सावन में बजते ढोल बजाते शंख,
पूजन करते शिवलिंग पर नर – नार।

ओंकारेश्वर कष्टनिवारक विषधारी हरते कष्ट,
देख ना पाते तड़प लालायित रहते करने मदद।

देखो जरा, लगा भस्म बाबा नंगे पांव,
आए हरने कष्ट भक्तों के, संग पार्वती मैया।

विष अपना, रख सर्प, लगा भस्म,
उठा डमरू, ले त्रिशूल निकल पड़े नागेश्वर।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — महाशिवरात्र‍ि भगवान भोलेनाथ की आराधना का ही पर्व है, जब धर्मप्रेमी लोग महादेव का विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चन करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दिन शिव मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जो शिव के दर्शन-पूजन कर खुद को सौभाग्यशाली मानते है। भक्तों के सब संकट हरते शिव ही महाकाल है। शिव ही संहार करते शिव शक्ति का रूप है। कोटि कोटि वंदन करूँ शिव ही तारणहार है।

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यह कविता (शिव शंभू।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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महाशिवरात्रि।

Kmsraj51 की कलम से…..

Mahashivratri | महाशिवरात्रि।

शिवजी की जटाओं में गंगा विराजती है,
भोले के त्रिशूल से पापों का नाश होता है।

चंदन, रोली, माला, दूध, बेलपत्र को,
शिव पर अर्पण करते है।
भांग, धतूरा, चढ़े शिवरात्रि पर,
दूध से अभिषेक होता है।

जब डमरू बजता महादेव,
सब नृत्य करने लगते है।
गले में सर्पो की माला,
तन पर मृग छाला है।

शिव अंग भभुति लगी,
सिर पर गंगा विराजी है।
शिव ही अनंत शिव ही अविनाशी है,
शिव ही दाता शिव ही कैलाशी है।

भक्तों के सब संकट हरते,
शिव ही महाकाल है।
शिव ही संहार करते,
शिव शक्ति का रूप है।
कोटि कोटि वंदन करूँ,
शिव ही तारणहार है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — महाशिवरात्र‍ि भगवान भोलेनाथ की आराधना का ही पर्व है, जब धर्मप्रेमी लोग महादेव का विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चन करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दिन शिव मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जो शिव के दर्शन-पूजन कर खुद को सौभाग्यशाली मानते है। भक्तों के सब संकट हरते शिव ही महाकाल है। शिव ही संहार करते शिव शक्ति का रूप है। कोटि कोटि वंदन करूँ शिव ही तारणहार है।

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यह कविता (महाशिवरात्रि।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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खोता जा रहा बचपन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Khota Ja Raha Bachpan | खोता जा रहा बचपन।

बच्चों की जिंदगी में अब आराम कहाँ,
बस्ता लादे फिरते दिखते जब देखो जहाँ।

हम एक बात पर सहज करते है विचार,
क्यों डाल रहे बच्चों पर पढ़ाई की मार।

तीन वर्ष की आयु में स्कूल क्या कम था,
अब तो चेहरे पर ट्यूशन का भी गम था।

जो उम्र थी उनके खिलखिलाने की,
छोटी ~ छोटी बातों पर मचल जाने की।

वो तो गिरवी रख दिया हमने उनका बचपन,
फिर कहां से आएगा उसमें वो अपनापन।

मासूम बच्चों को क्यों इसकी है जरूरत,
मां~बाप को बदलना होगा अपना मत।

बच्चों की झुंझलाहट साफ देती है दिखाई,
जब उनकी आँखें आंसुओं से होती नहाई।

चलो स्कूल जाने तक तो ठीक थी बात,
स्कूल में दिन बीता ट्यूशन में बीती रात।

इन मासूम बच्चों का खिलौनों से कोई सरोकार नही,
माता~पिता को क्या खुद पर ऐतबार नही।

इन नन्हें बच्चों के कंधो से ट्यूशन का बोझ उतारे,
खुद भी हम इनका कुछ तो भविष्य संवारे।

माता~पिता से बड़ा कभी कोई बना महान नही,
नन्हें बालकों को ट्यूशन भेजे कोई शान नही।

भविष्य तो तभी सुंदर होगा गौर करेगे जब वर्तमान पर,
बचपन थिरेकेगा जब परिवार के संस्कारों की तान पर।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — 2/5 वर्ष से 3 वर्ष के बच्चों के कंधे पर पढ़ाई का बैग लादकर स्कूल भेजना फिर उन्हें टूशन भेजना इस चक्कर में बेचारे बच्चे ऐसा चक्कर खा जाते है की बचपन क्या होता है वो समझ ही नहीं पाते। जो पढ़ाई के लिए होड़ मची है, इस होड़ की चक्की में बच्चे पीसकर रह गए है। बच्चों को बचपन का पूर्ण आनंद देने के लिए माता-पिता और टीचर्स को भी अपने पढ़ाने पर ध्यान देना होगा, जब टीचर्स स्कूल में अच्छे से पढ़ाएंगे तो बच्चों को अलग से टूशन की जरुरत ही नहीं होगी। टीचर्स को अपनी जिम्मेवारी ईमानदारी पूर्वक निभानी चाहिए, और इस कार्य में माता-पिता का सहयोग भी होना चाहिए। एक बात याद रखें – “ये बच्चे ही भविष्य के निर्माणकर्ता बनेगे, ये मन से जितने शांत व मज़बूत होंगे, उतना ही शांति पूर्वक अच्छे से कार्य करेंगे।” अगर ये बच्चे बचपन से ही अशांत व तनाव से भरे होंगे तो अपने अशांत व चिड़चिड़े मन से कोई भी अच्छा कार्य नहीं करेंगे, अपने व समाज के लिए हानिकारक साबित होंगे।

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यह कविता (खोता जा रहा बचपन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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यह अकेला है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Yah Akela Hai | यह अकेला है।

हमने जाड़े की सर्दी है झेली,
हर गर्मी का मौसम है झेला।
वसन्त ऋतु की बहारें हैं देखी,
देखा वर्षा ऋतु का क्रुद्ध खेला।

स्मृति के विलासित गहवार में,
हैं उभरती धंसती कई यादें।
हसरतें जो कुछ थी पूरी हुई,
रह गए अधूरे ही थे कई वादे।

इस जिन्दगी के अधूरे सफर में,
खूब है देखा यह जग का मेला।
किसी के धन की अम्बर है देखी,
किसी के नसीब में न देखा धेला।

अजूबों से भरी इस दुनियां में,
मैंने सपने सबके अधूरे देखे।
राजा रंक सब परेशान हैं देखे,
किसी के ख़्वाब नहीं पूरे देखे।

किसी को अहम से इठलाते देखा,
तो किसी को शर्म से शर्मिंदा देखा।
अमीर – गरीब सबको मरते हैं देखा,
किसी को सदा न यहां जिन्दा देखा।

पर होड़ाहोड़ी और आपाधापी में,
निरन्तर छटपटाते हैं सबको देखा।
लक्ष्मण रेखा को लांघते जो संघर्ष में,
उनको समाज द्वारा नकारते हैं देखा।

अजीब करिश्मा है इस जीवन का,
इस भीड़ भड़ाक में यह अकेला है।
इस जीवन ने अपने पूरे सफर में,
हर वफा व छल प्रपंच को झेला है।

यह जीवन इस जग के लगभग,
हर सम्भव सुख दुख से खेला है।
हसरतें तो थी आकाश में उड़ने की,
पर जीवन की हद ने इसे नकेला है।

अनुभव में जो आया है अब तक मेरे,
कि यह जीवन तो निरन्तर अकेला है।
आया इस दुनियां में यह अकेला ही था,
जाता भी इस दुनियां से यह अकेला है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — किसी भी मनुष्य के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आते है, लेकिन एक बात सदैव ही कॉमन होती है, कोई भी मनुष्य आता भी अकेला है और सदैव जाता भी अकेला ही है, कुछ साथ भी लेकर नही जाता है, तो सोचने वाली बात है की फिर मनुष्य अपने जीवन में अहंकार क्यों करता है, इतना गुमान किस बात का करता है। भगवान कृष्ण ने कहा है कि शरीर का निर्माण पांच तत्वों-पृथ्वी, जल, आकाश, वायु व अग्नि और तीन गुणों- सतो (सत), रजो (रज) व तमो (तम) से हुआ है। इसके बाद ब्रह्म का अंश जीव के रूप में शरीर में प्रवेश करके उसे जीवात्मा बनाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति के गुण जीव निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिस प्रकार मनुष्य बाल्यावस्था से प्रौढ़ावस्था और प्रौढ़ावस्था से वृद्धावस्था तक पारिवारिक जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हैं, उसी प्रकार परिवार भी विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हैं।

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यह कविता (यह अकेला है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आम जनता को कब मिलेगा उसका हक।

Kmsraj51 की कलम से…..

Aam Janta Ko Kab Milega Usaka Hak | आम जनता को कब मिलेगा उसका हक।

शहरातीयत की धक्कम-पेल, ठेलम-ठेल, रेलम-रेल और तिकड़मबाजी तो आज से पहले खूब देखी और सुनी थी पर हस्पताल में भी ऐसा परिदृश्य होता होगा कभी सोचा नहीं था। हर कोई बस इसी जद में लगा है कि मेरा नम्बर पहले लगना चाहिए, मेरा नम्बर पहले लगना चाहिए। सब्र रखने का शायद किसी को वक्त ही नहीं है। बहुत से लोग स्वार्थ और अमानवीयता को यहां भी नहीं छोड़ते और बहुत से ऐसे भी लोग हैं जो इंसानियत की मिसाल पेश करते हैं। बाहर रेहड़ी – फहड़ी तथा रेस्टोरेंट जैसी श्रेणी का खाना बनाने वाले ढाबे व सरकारी कैंटीन आदि वाले खाने-पीने के सामान में जहां मोल भाव करते हैं, वहीं कई लोग गरीबों और मरीजों तथा उनके परिजनों को निशुल्क भंडारा भी तो लगाते हैं।

इस कला में प्रवीण सिख धर्म के लोगों के हुनर को भला कौन नहीं जानता। ये भंडारा लगाने वाले लोग पकड़-पकड़ कर सभी को भंडारा मुफ्त में खिलाते हैं, चाय पिलाते हैं, उनके जूठे बर्तन धोते हैं और भी सेवाएं निशुल्क प्रदान करते हैं। तब लगता है कि दुनियां में दया और धर्म खत्म कहां हुआ है। वह तो आज भी जिंदा है। पर जब दवा और शल्य चिकित्सा के सामानों के दामों को एक दूसरे दुकानदारों के साथ तुलना करके देखते हैं तो लगता है कि दुनियां में चोर बाजारी बहुत है। सच क्या है झूठ क्या है? कुछ कहते नहीं बनता।

उस रोज रात 2:00 बजे जब हम मेरे बेटे को अति संवेदनशील हालत में पी जी आई चंडीगढ़ में लेकर पहुंचे तो वहां के आपातकालीन विभाग का परिदृश्य कोलकाता के मछली बाजार से कम नहीं था। कोई आ रहा था तो कोई जा रहा था। कोई सांस ले रहा था तो कोई साथ छोड़ रहा था। कुछ लोग तो प्राण छोड़ कर के ही इस संसार को हमारी आंखों के सामने अलविदा कह गए थे। खैर, जन्म और मरण तो इस संसार के सनातन सत्य है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में यूं ही उपदेश नहीं दिया कि अर्जुन इस संसार में जो आया है वह एक दिन जाएगा जरूर। पर राहत प्रदान करने वाली जगह भी किसी के दिल को इतना आहत करेगी, कभी सोचा भी नहीं था।

मेरे बेटे को मैंनेनजाइंटिस नामक दिमागी बीमारी ने अचानक बुरी तरह से जकड़ रखा था। मेरे जिले के स्थानीय अस्पताल में उस बीमारी का इलाज संभव ना होने के कारण चिकित्सक लोगों के द्वारा हमें पी जी आई चंडीगढ़ रेफर किया गया। रास्ते में जब हम एंबुलेंस में आ रहे थे तो सांसे गले में आकर अटकती जा रही थी कि न जाने कब और क्या घटना घट जाए ? शायद मैं अपने बेटे को खो न बैठूं। बाप जो हूं, ऐसे उल जलूल ख्यालात आना कोई नई बात नहीं थी। भगवान का शुक्र है कि हम सही सलामत पी जी आई पहुंच गए। उस भीड़ भड़ाके के बीच में रात 2:00 बजे बेटे की हालत को देखकर आपातकालीन विभाग ने दाखिला दे दिया था और सुबह 6:00 बजे तक सभी प्रकार की जांचें द्रुत गति से आपातकालीन विभाग के चिकित्सकों ने करवा ली थी।

बेटे को दर्द बहुत था। सर फटा जा रहा था। क्योंकि सर में दिमागी इंफेक्शन हो गया था। इस भीड़ को देखकर जो मेरे भीतर बेटे की उस पीड़ा को लेकर के एक अजीबोगरीब पीड़ा थी वह सहसा शान्त होती जा रही थी। चारों तरफ स्ट्रेचर पर ट्रॉलियों के ऊपर हर उम्र के छोटे – बड़े और हर प्रकार के मरीज चीख – चिल्ला रहे थे। अब मुझे औरों का दुख घना और अपना हल्का लग रहा था। यह बात जरूर है कि मेरा बेटा दिमागी रूप से बहुत परेशान था। उससे कोई बात नहीं हो पा रही थी और वह अपना दिमागी संतुलन पूर्ण रूप से खो चुका था। पर फिर भी उस चीर-फाड़ भरे मंजर को देखकर, छोटे – बड़े हर रोगियों की चीख-पुकार को सुनकर तथा प्राणों के संघर्ष को हारते हुए अपनी जीवन यात्रा का सफर इस दुनिया से उस दुनिया की ओर करते हुए लोगों को देखकर मेरी आंखें नम हुए जा रही थी।

ऐसा नहीं है कि मैं पहले अस्पताल में कभी नहीं आया था। मैंने दादी मां, छोटे ताया श्री, मंझले भैया तथा दोनों चाचाओं, बड़े तय – ताई के साथ-साथ अपनी सगी बहन को अपनी आंखों के सामने संसार छोड़ते देखा था। कई बार अस्पताल आ चुका था। भीड़ भी कई बार देख चुका हूं। पर जिस तरह की भीड़ और चीख-पुकार मैंने इस बार पी जी आई की आपातकालीन सेवा में देखी थी, वह अति भयानक परिदृश्य था।

आम अस्पतालों में चिकित्सकों को बार-बार हिदायत देते हुए सुना है कि ऐसे खुले वातावरण में ऑपरेशन किए हुए रोगी को या गंभीर हालत के रोगी को कभी नहीं रखना चाहिए। इंफेक्शन का डर रहता है। पर यह क्या? यहां तो हर कोई मरीज बिना बेड के बाहर स्ट्रेचर पर ही लेटे – लेटे अपना पूरा इलाज कर लेता है और यहीं से घर चला जाता है। जिन्हे जीना हो, वे तो जी जाते हैं पर जिन्हें संसार छोड़ना है वे भी यहीं पर अपने प्राण त्याग देते हैं।

हस्पताल की आलीशान पथरीली दीवारों से अपना हाड – मांस का माथा बार – बार टकराता हूं और भगवान से प्रार्थना करता हूं कि हे प्रभु! सबका भला करना। सबका पहले और मेरा पीछे। दिल की पीड़ा जितनी अपने बेटे के लिए सता रही थी, उससे कहीं ज्यादा आस – पास शल्य चिकित्सा से चीर – फाड किए हुए सरों वाले छोटे छोटे बच्चों को देखकर हो रही थी। सोचता हूं कि इन बच्चों ने इस छोटी सी उम्र में ऐसा क्या कर लिया कि ये इतनी गम्भीर दिमागी बीमारी के मरीज हो गए। खैर यह दुनियां है।फिर हस्पताल की दुनियां। जहां एक ओर बच्चों को जनने वालों की खुशी झलकती है तो दूसरी ओर से देह त्यागने वालों के परिजनों की पीड़ा दिखती है। सचमुच किसी ने ठीक ही कहा है कि यह संसार बड़ा रंगीन है।

फिर भीतर ही भीतर व्यवस्था और सत्ता के प्रति गहरी रोष उमड़ती है कि आजादी के 75 साल बीत गए पर हमारे हुक्मरान और अफसरान अभी तक आम और सर्वहारा वर्ग को स्वास्थ्य, शिक्षा और न्याय जैसी मूलभूत सुविधाओं को निशुल्क और अच्छी व्यवस्था के साथ क्यों नहीं मुहैया करवा पाए? देश के पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई जी की उस बात का ख्याल मस्तिष्क में पुनः गूंजता है “देश की जनता को कुछ भी मुफ़्त नहीं देना चाहिए। इससे जनता की आदत बिगड़ती है और देश कभी प्रगति नहीं करता। मुफ़्त यदि कुछ मिलना चाहिए तो वह है, स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और न्याय व्यवस्था।” कोई कुछ भी कहे बात सोलह आने सही है। आज के दौर में यदि जेब में पैसा न हो तो उपरोक्त तीनों मूलभूत सुविधाओं से आदमी को हाथ धोने पढ़ सकते हैं।

यूं तो कहते हैं कि आदमी के आगे पैसा कुछ भी नहीं है। कुछ हद तक यह सत्य भी है। आदमी ही जिंदा नहीं रहेगा तो पैसों का क्या अचार डालोगे? पर जब इस तरह की गंभीर बीमारी के चक्कर में निम्न मध्य वर्ग और उच्च मध्यवर्ग के साथ-साथ गरीब व्यक्ति फंसता है तो यही पैसे बहुत काम आते हैं। खैर जैसे ही मेरे बेटे की बीमारी की खबर मेरे इष्ट मित्रों और रिश्तेदारों में पहुंची। वैसे ही सभी ने उनके लिए ईश्वर से दुआ की। कहते हैं दवा से बड़ी दुआ होती है। शायद यह असर उन सबकी दुआओं का ही था कि आज मेरा बेटा उस भयानक बीमारी के जीवन नाशक खतरे से लगभग बाहर है। सबकी दुआ में असर होता है और भगवान उस सामूहिक पुकार को सुनता है।शायद परमात्मा ने सबकी सुनी और मानी।

हैरत इस बात की है कि देश को सबसे अधिक कर देने वाली और सबसे अधिक परिश्रम देकर उन्नत करने वाली इतनी बड़ी जमात को सरकार इस तरह से गैलरियों और बरामदों में जीने – मरने के लिए क्यों छोड़ देती है? पी जी आई की आपातकालीन सेवाओं की हर वार्ड में भीड़ इतनी है कि वार्डों में तो जगह ही नहीं होती पर गैलरियों में भी भीड़ इस तरह से लबालब भरी मिलती है मानो कोलकाता का मछली बाजार लग गया हो। बेड के नाम पर नाममात्र की सुविधा। अधिकतर रोगियों को ट्रालियों पर ही लेटे-लेटे अपना इलाज संपन्न करना पड़ता है। बेड तो बहुत ही मुश्किल से किसी भाग्यवान के हिस्से आता है। वह भाग्यवान भी वही व्यक्ति होता है जो जिंदगी और मौत की जंग से बिल्कुल समीप से लड़ रहा होता है। बाकी सब ट्रालियों पर ही होता है। ये ट्रालिया भी अलग-अलग धार्मिक संगठनों और सामाजिक संगठनों की भेंट की हुई है शायद।

सोचता हूं क्या मेरे देश की सरकार इतनी गरीब है कि चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू – कश्मीर तथा आंशिक रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे बड़े भू भाग के गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों का इलाज करने वाले इस हस्पताल की आपातकालीन सेवा को अभी तक वह उन्नत ही नहीं कर पाई। माना कि देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। पर इसका मतलब यह तो नहीं है कि जो ढांचा आज से वर्षों पहले खड़ा कर दिया गया था, बस उसी को ही बनाए रखें।

क्या सरकारें सिर्फ एक दूसरे पर इल्जाम ही लगाती रहेगी? आजादी के बाद आज तक सभी दलों ने केंद्र में राज किया है। क्या यह सभी दलों की सामूहिक जिम्मेवारी नहीं बनती है कि पी जी आई चंडीगढ़ के ट्रामा सेंटर और आपातकालीन सेवा के भवन को और उन्नत और विकसित किया जाए। वहां हर इमरजेंसी वार्ड में कम से कम 3 से 4 सौ बिस्तरों का आधुनिक तकनीकी सुविधाओं के साथ प्रबंध वर्तमान में सरकार को नहीं करना चाहिए ? क्या बड़े – बड़े लोग फोर्टिस और अपोलो जैसे हॉस्पिटल में अपना इलाज करते हैं, इसलिए इस गरीब और सर्वहारा तथा निम्न मध्य वर्ग के आश्रय स्थल की ओर कोई ध्यान नहीं देता?

इतना ही नहीं, गंभीर समस्याओं से जूझ रहे रोगियों के साथ इनकी देखभाल करने के लिए आए हुए तीमारदारों को भी रात में बाहर खुले में सड़क किनारे सोना पड़ता है। क्या आजादी के 75 साल बाद आजाद हिंदुस्तान में यह बात शोभा देती है? आखिर क्यों नहीं सोचती है सरकार इस दिशा में? कौन करेगा इन गरीबों की और आम जनमानस के हितों की बात? क्या इन सभी लोगों को सुविधा नहीं मिलनी चाहिए? सवाल अनगिनत है और जवाब अपेक्षित।

मैं चाहता हूं यह बात देश की संसद तक पहुंचे ताकि देश की आम जनता को न्याय मिल सके और सुविधा मिल सके। देश में कोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नहीं बनेगा तो शायद इतनी ज्यादा क्षति नहीं होगी जितनी ज्यादा क्षति इन गरीब एवं आम जनमानस के पीड़ित होने से देश को होगी। देश का मेहनतकश किसान, मजदूर सर्वहारा वर्ग जब जिंदगी और मौत की जंग से इसी प्रकार से खुले में अपने कठिन समय में लड़ता रहेगा तो वह देश की समस्याओं के साथ शायद उस ताकत से नहीं लड़ पाएगा जिससे उसे लड़ना चाहिए।

पर फिर भी देश की उन्नति और समृद्धि के लिए इस गरीब मजदूर और किसान वर्ग ने तथा निम्न मध्य वर्ग के कर्मचारी वर्ग ने अपनी एड़ी – चोटी का जोर लगा कर के भारत का नाम विश्व में रौशन किया है। इसलिए कुछ तो दायित्व देश को चलाने वाली सरकारों का भी बनता है कि और न सही तो मानवीय पहलुओं से सही, इस दृष्टि से जरूर विचार करें। सड़क नहीं बनेगी कोई बात नहीं, रेलमार्ग नहीं बनेगा तो भी चलेगा। किसी को सब्सिडी नहीं मिलेगी तो वह भी जी जाएगा। परन्तु सुविधा के अभाव में हस्पताल में किसी की जान चली जाए, यह तो बिल्कुल नहीं चलेगा।

यह हालत किसी एक हस्पताल की नहीं है। खबरों में ऐसे कई खुलासे हर राज्य से होते रहते हैं, जहां कहीं व्यवस्था के नाम पर तो कहीं प्रबंधन और प्रशासन के नाम पर बट्टा लगता रहता है। पर पी जी आई चंडीगढ़ का स्टॉफ पूरी मुस्तैदी के साथ सीमित सुविधाओं में भी लोगों को उचित सेवाएं देता है। कमी है तो वह है आपातकालीन विभाग में बिस्तर तथा भवन संबधी प्रबंधनों की। इस प्रकार की खामियां सरकारी स्कूलों और न्याय व्यवस्था में भी मौजूद है, जो आजाद देश की आजाद जनता के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ है। फिर से मन में सवाल उठता है कि आखिर देश की आम जनता को उसके हिस्से का हक कब और कैसे मिलेगा?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पुरे देश में बड़े सरकारी पी जी आई हस्पताल में सीमित सुविधाओं में लोगों का समय से उचित इलाज का ना होना। आपातकालीन विभाग में बिस्तर तथा भवन संबधी प्रबंधनों की कमी। इस प्रकार की खामियां सरकारी स्कूलों और न्याय व्यवस्था में भी मौजूद है, जो आजाद देश की आजाद जनता के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ है। फिर से मन में सवाल उठता है कि आखिर देश की आम जनता को उसके हिस्से का हक कब और कैसे मिलेगा? जय हिन्द – जय भारत।

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यह लेख (आम जनता को कब मिलेगा उसका हक।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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गंगा माँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

Ganga Maa | गंगा माँ।

शिवजी की जटा से निकली मैं गंगा माँ हूँ,
जन जन का कल्याण करती जीवनदायिनी मैं हूँ।
पवित्र मन और निर्मल धारा की स्वामिनी मैं हूँ,
भागीरथ की तपस्या से बह्मा के कमंडल में आई,
शिवजी ने लिया जटाओं में मुझे सबको शीतल करती आई।

शिवजी ने जटाओं में लिया धरती पर उतारा,
आगे चलकर भागीरथी के नाम से कहलाई।
धारा मेरी बहती निरतंर सबके मन हर्षाई,
सबकी पुण्यदायनी मैं भीष्म की मां कहलाई,
भगवान विष्णु के चरण छूकर विष्णुपदी भी कहलाई।

पुजारी, ऋषि, मुनिगण सब मेरे तट पर पूजा करते,
मेरी तेज प्रवाह को कोई रोक नहीं पाया पतित पावनी कहलाई।
कल – कल बहती – बहती गंगोत्री तक आयी,
मनुष्य सब स्नान करते सबकी मैं गंगा मैया कहलाई,
सब मेरे जल को भरकर ले जाते मैं गंगाजल भी कहलाई।

मेरे जल को मंदिर और शिवालय में चढ़ाया जाता,
मेरे जल को मरणासन्न जीव के मुख में डाला जाता।
मैं मोक्षदायिनी भी कहलाती हूँ,
मेरे उर में कितने जीवों के शव डाले जाते।

फिर भी मैं शुद्ध और पवित्र रहती हूं,
स्नान करके सब पापों को धोते।
सबका उद्धार करती हूं।
सब करते मेरा वंदन और पूजा, गंगा माँ कहलाती हूँ।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यदि गंगा न होती तो हमारे देश का एक महत्त्वपूर्ण भाग बंजर तथा रेगिस्तान होता। इसीलिए गंगा उत्तर भारत की सबसे पवित्र व महत्त्वपूर्ण नदी है। गंगा नदी भारतीय संस्कृति का भी अभिन्न अंग है। भारत के प्राचीन ग्रंथों; जैसे- वेद, पुराण, महाभारत इत्यादि में गंगा की पवित्रता का वर्णन है। माँ गंगा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी की जटा से होकर इस धरा पर आई जन – जन को पवित्र व निर्मल कर उद्धार करने। पुजारी, ऋषि, मुनिगण सब मेरे तट पर पूजा करते, मेरी तेज प्रवाह को कोई रोक नहीं पाया पतित पावनी कहलाई। मेरे जल को मंदिर और शिवालय में चढ़ाया जाता, मेरे जल को मरणासन्न जीव के मुख में डाला जाता। मैं मोक्षदायिनी भी कहलाती हूँ।

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यह कविता (गंगा माँ।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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पछतावा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Regret | पछतावा।

मान ले बात मात-पिता की,
आज बारी तेरी आई।

पढ़ ले, निखार ले खुद को,
वक्त को जानने की बारी आई।

उठ प्रातः कर मेहनत पूरा दिन,
समय का सदुपयोग की बारी आई।

भूल जा मस्ती, शरारतें, त्याग निंद्रा,
उज्जवल भविष्य करने की बारी आई।

कम वक्त है पास तुम्हारे,
नसीहतें मानने की बारी आई।

नहीं रहेंगे तुझे कहने वाले एक दिन,
तड़पाएगा वक्त, समझने की बारी आई।

अकेला रह जाएगा इस दुनिया में,
आज संभलने की बारी आई।

कहीं पछताता ना रह जाए सीमा,
आज वक्त को जानने की बारी आई।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस संसार में केवल माता-पिता ही अपने बच्चे को सदैव ही खुश, आगे बढ़ता व खुद हारकर भी अपने बच्चे को जीतता हुआ देखना चाहते है। इसलिए माता-पिता सदैव ही नसीहत देते रहते है हमे, जिससे हम कभी कोई गलती ना करें और अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए समय से सोये व जगे तथा अच्छे से पढ़ाई करें व खूब मेहनत कर जीवन में आगे बढ़े। भूल जाओ मस्ती व शरारतें, त्याग दो निंद्रा अपना उज्जवल भविष्य बनाने का यही समय है। यह न भूलो की कम वक्त है अब पास तुम्हारे, नसीहतें मानने की बारी आई। ये याद रखना – नहीं रहेंगे तुझे कुछ कहने वाले एक दिन, तब तड़पाएगा वक्त तुम्हें अब भी समझ लो वर्ना और अकेला रह जाओगे इस दुनिया में फिर खूब पछतावोगे।

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यह कविता (पछतावा।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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बोलता पेड़।

Kmsraj51 की कलम से…..

Bolta Ped | बोलता पेड़।

Talking Tree

इन अशियानों को देखने,
क्यों मैं यहाँ खड़ा रहा?
मैं भलाई करता गया,
पर आँखों में अड़ा रहा।

आशियानों के महारशय,
धीरे– 2 खीजने लगे।
पानी इसका बन्द कर दो,
जड़े सीमेन्ट से सींचने लगे।

मैं भी धुन का पक्का हूँ,
अपने आप टस से मस न हुआ।
चाहे मेरी जड़े काटते,
चाहे देते तेजाब का धूआँ।

तब मेरे तरू साथि हँसे,
ये महाज्ञानी खूब तुम्हें पालेंगे।
जड़े तुम्हारी खोखली करके,
फिर यहाँ से टालेंगे।

ऋण था मुझ पर इस धरती माँ का,
इसको फिर मैं छोड़ न पाया।
चारों तरफ आशियानें बने,
मैं बीच में बहुत छटपटाया।

अधिकार नहीं था उनको,
मुझे इस तरह कुचल जाने का।
लानत है तुम्हारी दौलत पर,
काम किसी के आ न सके।
जीवन दायी वायु देते,
उसको भी न बचा सके।

तुम्हारी यही साजिश रही,
जद मे तुम भी आएंगे।
चालाकी से मुझे नष्ट करो,
पर एक दिन बहुत पछताएंगे।

बड़े गौर से सोचता हूँ,
कितना खुदगर्ज इंसान है।
सूखा हूं बीच में इनके,
क्या इनकी यही पहचान है?

♦ लाल सिंह वर्मा जी – जिला – सिरमौर, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

• Conclusion •

  • “लाल सिंह वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज का इंसान कितना स्वार्थी हो गया है, जीवनदायी पेड़ को भी अपने स्वार्थ के लिए काटता चला जा रहा हैं। हर जगह कंक्रीट से ढक दे रहा है, पेड़ों को दबाता चला जा रहा है। इन पेड़ों से हमे शुद्ध हवा, ऑक्सीजन, लकड़ी, व इनकी पत्तिया तक मिलती है जो हमारे जीवन की बहुत सारी समस्याओं का समाधान करती है। मानव को ये पेड़ सदैव से ही कुछ न कुछ दिया ही है, फिर भी इनकी रक्षा करने की जगह पर इनका विनाश किया जा रहा है बहुत ही बेरहमी से। हे मानव ये भूल ना जाना की एक दिन तुम बहुत ज्यादा पछताओगे, जो इन पेड़ों को इसी तरह से काटते रहे। अभी भी समय है सुधर जाओ और कोशिश करो की प्रत्येक वर्ष एक नया पेड़ जरूर लगाओ और उस पेड़ का तब तक देख भाल करो जब तक वह पेड़ अपना ख़ुराक खुद ना लेने लगे।

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यह कविता (बोलता पेड़।) “लाल सिंह वर्मा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं लाल सिंह वर्मा सुपुत्र श्री भिन्दर सिंह, गांव – खाड़ी, पोस्ट ऑफिस – खड़काहँ, तहसील – शिलाई, जिला – सिरमौर, हिमाचल प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक शिक्षक हूं, शिक्षा विभाग में भाषा अध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है, हिंदी भाषा से सम्बन्धित साहित्यिक विधाओं में रचनाएं लिखना तथा विशेष रूप से सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व मानवीय मूल्यों से सम्बन्धित रचनाओं का अध्ययन करना पसंद है। इस Platform (KMSRAJ51.COM) के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

शैक्षिक योग्यता – J.B.T, BEd., MA in English and MA in Hindi, हिंदी विषय में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण की है। अध्यापक पात्रता परीक्षा L.T., J.B.T., TGT पास की है। केंद्र विश्वविद्यालय PHD• (पीएचड•) प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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लोहारी नहीं डूबा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Lohari Nahin Dooba | लोहारी नहीं डूबा।

लोहारी नहीं डूबा, डूबी हमारी यादें सारी,
बचपन में जहाँ खेले कूदे, आपस मे थी सब मे यारी।
नफरत का नामोनिशान न था, न बेईमानी न मक्कारी,
गाँव था मेरा स्वर्ग समान, जहाँ थे पचासों मकान।

भलाई, ईमानदारी के तराजू थे, न थी कोई मतलबी दुकान,
बच्चे, बूढे़ और जवान, करते एक दूजे का सम्मान।
शहरों की अन्धेरी होड़ मे, चारो तरफ है मारामारी,
लोहारी नहीं डूबा, डूबी हमारी यादें सारी।

जिस गाँव की गलियों मे, लुका छुपि का खेल खेलते,
दादा-दादी हुक्का पीते, और हुक्के के अंगारे जलते।
हुक्के की आवाज को, हम बडे़ चाव से सुनते,
कभी उनकी लाठी खींचते, कभी उनके बालों को धुनते।

हमें कभी एहसास भी न था कि ऐसा मंजर आएगा,
हम भोले ग्रामीणों का, सुख चैन ले जाएगा।
कितना रोते कितना विलखते, कोई नही था सुनने वाला,
भगवान से प्रार्थना करते, रक्षा करो हे ऊपर वाला।
जब सरकार के आकाओं ने, किया एक फरमान जारी,
अपनी यादें समेट लो, अब करो तुम जाने की तैयारी,
लोहारी नहीं डूबा है, डूबी है यादें हमारी।

हे लोकतंत्र के ठेकेदारों, हम कहा जाएगें,
अपने प्यारे गाँव को, अब कहा से लाएगे।
कितने बडे़ खरीद्दार हो? हमारी यादों को भी खरीद पाओगे,
जिन यादों में बचपन पला है, उनको कैसे लौटाओगे?

क्या कसूर था भोले गाँव का? जो तुमने ये सिला दिया,
सभी लोगों की यादों को, पानी मे क्यों मिला दिया?
जो तुमने आँकलन किया यह नहीं थी अभिलाषा हमारी,
लोहारी नहीं डूबा है, डूबी है आत्मा हमारी।
लोहारी नहीं डूबा है, डूबी है तमन्नाऐं हमारी,
लोहारी नहीं डूबा है, डूबी है जन्म भूमि, मातृ भूमि हमारी।

लोहारी तथा इस प्रकार से पीड़ित ग्रामीणों को समर्पित कविता।

♦ लाल सिंह वर्मा जी – जिला – सिरमौर, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

• Conclusion •

  • “लाल सिंह वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — दो पल ठहर कर मन-मन से अब गुफ्तगू करने लगा। कितना निर्मल व पवित्र सुखमय जीवन था पहले गांव वालो का, वह जीवन आजकल के शहर के चकाचौध में कहां गुम सा हो गया हैं, आया बनावटी भूचाल, कुछ ऐसा की सब कुछ तहस-नहस कर गया। वह बचपन की यादे व सुख चैन यादों में सदैव के लिए फीड सा हो गया। जब कोरोना आया चारों तरफ अपना कोहराम मचाया सब कुछ तहस नहस करके, सभी के जीवन को प्रभावित किया। किसी को एहसास भी न था कि ऐसा मंजर आएगा, हम भोले ग्रामीणों का, सुख चैन ले जाएगा।

—————

यह कविता (लोहारी नहीं डूबा।) “लाल सिंह वर्मा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं लाल सिंह वर्मा सुपुत्र श्री भिन्दर सिंह, गांव – खाड़ी, पोस्ट ऑफिस – खड़काहँ, तहसील – शिलाई, जिला – सिरमौर, हिमाचल प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक शिक्षक हूं, शिक्षा विभाग में भाषा अध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है, हिंदी भाषा से सम्बन्धित साहित्यिक विधाओं में रचनाएं लिखना तथा विशेष रूप से सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व मानवीय मूल्यों से सम्बन्धित रचनाओं का अध्ययन करना पसंद है। इस Platform (KMSRAJ51.COM) के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

शैक्षिक योग्यता – J.B.T, BEd., MA in English and MA in Hindi, हिंदी विषय में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण की है। अध्यापक पात्रता परीक्षा L.T., J.B.T., TGT पास की है। केंद्र विश्वविद्यालय PHD• (पीएचड•) प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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दर्दे दिल।

Kmsraj51 की कलम से…..

Dard e Dil | दर्दे दिल।

कोई चूस कर खून मुफलीसी का,
गांव से शहर नहीं बसा पाया।
रोज कहता रहा मिट जायेंगे,
पर कभी खुदकुशी नहीं कर पाया।

कब से इबादत के लिए “भोला”,
सिर झुकाए बैठे हैं।
इन्तज़ार में आँखें थक गई,
बंदगी की पहर नहीं आया।

मुनफरीद हूं, दिल नासाज है,
नाशिरात और सहाब के
बाद आफ्ताब भी निकला।
रंज नहीं नशेमन खाक होने का,
जिन्हें इख्तलाज समझा,
कारनामा उन्हीं का निकला।

वादा किया था हिफाज़त करेंगे हम,
हर मां, बहन, बेटी के आबरू की।
जो हुआ उसे भूल जाओ,
आगे न होने देंगे हम।
हम चौकीदार बनकर रहेंगे,
इख्तलात के खातिर जान भी दे देंगे हम।

जर्बत मिली मुकर्रब से,
अब होगी नाजिल।
आब ए हयात,
जिगर सोज से उम्मीद कैसी।
फैसला होगा हक में,
होगी कयामत की रात।

नासीपास से न पूछो,
कहां है उसका धर्म और ईमान।
इनहराफ जिसकी फितरत है,
कभी माफ़ नहीं करेगा भगवान।

शब्द अर्थ : जर्बत = चोट, मुकर्रब = घनिष्ट मित्र, नासी पास = नमक हराम,
इख्तलाज = दिल की धड़कन, इख्तलात = घनिष्टता,
इनहराफ = विद्रो, आब ए हयात = अमृत, नाजिल = गिरना,

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज बहु, बेटी कहीं भी सुरक्षित नहीं है, उसे बचाना ही हम सबका फर्ज है लेकिन समाज में कुछ अराजक तत्वों ने उत्पात मचा रखा है। समय चाहे जितना भी खराब हो, हर अंधेरी, काली, रात के बाद सबेरा होता ही होता है, दुखी होने से कुछ नहीं होगा, मुसीबतों से लड़ना है, यह ना भूले की गलत करने वालों को भगवान कभी भी माफ़ नहीं करते।

—————

यह कविता (दर्दे दिल।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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