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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2023-KMSRAJ51 की कलम से

प्यारी हिंदी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Pyari Hindi | प्यारी हिंदी।

Hindi Day is celebrated in India to commemorate the date 14 September 1949 on which a compromise was reached—during the drafting of the Constitution of India—on the languages that were to have official status in the Republic of India.

भारतवासियों के जुबान की मिठास है ये।
अपनेपन में एक प्यारा सा अहसास है ये।

हमारी सभ्यता की एक परिचायक है।
यही तो हमारी संस्कृति की संवाहक है।

ये तो देती, हर रिश्ते को इतना मान है।
फिर क्यूँ हो रहा, हर जगह अपमान है।

ये हिंदी तो दिलों को, बहुत प्यारी होती थी।
अपने लोगों की बोली ही, न्यारी होती थी।

पता ही नही लग पाया कि, कब हमसे ये जुदा हो गयी।
आओं, खुद में झांके, कि क्यूँ ये हमसे खफा हो गयी?

हमने किस भाषा के मोहपाश में खुद को बांध लिया।
क्यूँ, इस का प्रिय स्थान किसी और को दे ही दिया।

हिंदी-भाषी लोगों को वंदन करने का, समय आ गया।
फिर हमसब में धीरे-धीरे, हिंदी का मोह समा गया।

ये भाषा तो इतनी सहज, सरल होती,
अपना कर इसको जीवन जाता फूल सा खिल।
अपनी हिंदी जैसा इस जहां में और कोई नहीं काबिल।

हमारी हिंदी अपनी है, हमको बहुत ही प्यारी है।
जिसने अपनाया इसको, इसने उसकी ही तकदीर सँवारी है।

सदैव ममत्व लुटाने वाली, हम तो रहेंगे सदैव तेरे ही आभारी।
तू ही थी, तू ही है, बस जन्नत हमारी।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में कवयित्री हिंदी भाषा की महत्ता और महत्व को बयां कर रही हैं। वे कह रही हैं कि हिंदी भाषा भारतवासियों की जुबान की मिठास है और इसमें एक प्यारा सा अहसास होता है। हिंदी भाषा हमारी सभ्यता की पहचान है और हमारी संस्कृति का संरक्षक है। इसके बावजूद, कवयित्री यह सोचती हैं कि हिंदी का अपमान क्यों हो रहा है और इसे छोड़ने के लिए हमने किसी और भाषा के मोहपाश में अपने को बांध लिया है। कवयित्री का संदेश है कि हमें अपनी हिंदी को महत्व देना चाहिए और इसे अपने जीवन में सजीव रूप से अपनाना चाहिए। इसके माध्यम से हम अपनी भाषा का सम्मान करेंगे और उसे अपनी तकदीर सँवारेंगे। क्योंकि हिंदी हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

—————

यह कविता (प्यारी हिंदी।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: hindi diwas par kavita, Hindi-Diwas, sushila devi, sushila devi poems, प्यारी हिंदी, प्यारी हिंदी - सुशीला देवी, सुशीला देवी, सुशीला देवी की कविताएं, हिंदी दिवस पर कविता, हिंदी पर छोटी सी कविता

कृष्ण लीला।

Kmsraj51 की कलम से…..

Krishna Leela | कृष्ण लीला।

कैसे – कैसे लीला रचाता है,
नटखट कान्हा देखो कैसे मुस्कुराता है।
पैरों में घुंघरू बांध देखो कैसे इतराता है,
गोपियों को देखो कैसे,
प्यारी – प्यारी मुरली सुनाता है।

मुरली की धुन पर देखो,
गोपियों को कैसे-कैसे नचाता है।
सिर पर देखो कैसे,
प्यारा सा मोर पंख लगाता है।
दूध दही का इतना दीवाना,
देखो कैसे-कैसे मटकी फोड़ने आता है।

वृंदावन की गलियां देखो,
कैसे – कैसे अपने भक्तों का मन बहलाता है।
अपने मैया से करता है इतना प्यार,
उसकी डांट खाने से देखो,
बिल्कुल भी नहीं घबराता है।
नटखट कान्हा देखो,
कैसे – कैसे अपनी लीला रचाता है।

गोवर्धन पर्वत को देखो कैसे,
अपनी उंगली पर उठाता है।
अपनी बाल लीला से देखो,
कैसे पूतना को हराता है।
देखो इस संसार में कैसे
अपनी लीला रचाता है।

कंस मामा का वध करके,
देखो सारे लोगों को कैसे,
उसके अत्याचारों से बचाता है।
अर्जुन का सारथी बन के,
देखो कैसे महाभारत के,
युद्ध में कौरवों को हराता है।

कैसे-कैसे देखो दुनिया को,
गीता का उपदेश पढाता है।
कृष्ण कन्हैया देखो,
कैसे-कैसे अपनी लीला रचाता है।
आज सारा जग देखो कैसे,
जन्माष्टमी धूमधाम से मानता है।

♦ लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी  – बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में कान्हा (श्रीकृष्ण) की बाल लीलाओं के वर्णन के साथ, उनके भक्ति और लोगों के प्रति उनकी अनुराग भावना को प्रकट करते हुए लिखा गया है। कान्हा के अद्भुत और मनमोहक व्यवहार का चित्रण किया गया है, जो उनके भक्तों को खुशी और प्रेम में लिपटा देता है। काव्य में उनकी आलोकिक शक्तियों और लीलाओं का अद्वितीय चित्रण किया गया है, जिससे उनका दिव्य और भगवान के रूप में अवतरण का महत्व प्रकट होता है। इसके अलावा, काव्य में भक्ति, प्रेम, और धार्मिक संदेश को भी दर्शाया गया है, जिससे यह कविता भगवान के जन्म दिन (जन्माष्टमी) के उपलक्ष्य में धूमधाम से मनाने की भावना को प्रकट करती है।

—————

यह कविता (कृष्ण लीला।) “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, लघु कथा, सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल है। साहित्यिक नाम — डॉ• जय अनजान है। माता का नाम — श्रीमती कमला देवी महलवाल और पिता का नाम — श्री सुंदर राम महलवाल है। शिक्षा — पी• एच• डी•(गणित), एम• फिल•, बी• एड•। व्यवसाय — सहायक प्रोफेसर। धर्म पत्नी — श्रीमती संतोष महलवाल और संतान – शानवी एवम् रिशित।

  • रुचियां — लेखक, समीक्षक, आलोचक, लघुकथा, फीचर डेस्क, भ्रमण, कथाकार, व्यंग्यात्मक लेख।
  • लेखन भाषाएं — हिंदी, पहाड़ी (कहलूरी, कांगड़ी, मंडयाली) अंग्रेजी।
  • लिखित रचनाएं — हिंदी(50), पहाड़ी(50), अंग्रेजी(10)।
  • प्रेरणा स्त्रोत — माता एवम हालात।
  • पदभार निर्वहन — कार्यकारिणी सदस्य कल्याण कला मंच बिलासपुर, लेखक संघ बिलासपुर, सह सचिव राष्ट्रीय कवि संगम बिलासपुर इकाई, ज्वाइंट फाइनेंस सेक्रेटरी हिमाचल मलखंभ एसोसिएशन, सदस्य मंजूषा सहायता केंद्र।
  • सम्मान प्राप्त — श्रेष्ठ रचनाकार(देवभूमि हिम साहित्य मंच) — 2022
  • कल्याण शरद शिरोमणि सम्मान(कल्याण कला मंच) — 2022
  • काले बाबा उत्कृष्ट लेखक सम्मान — 2022
  • व्यास गौरव सम्मान — 2022
  • रक्त सेवा सम्मान (नेहा मानव सोसायटी)।
  • शारदा साहित्य संगम सम्मान — 2022
  • विशेष — 17 बार रक्तदान।
  • देश, प्रदेश के अग्रणी समाचार पत्रों एवम पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

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हे मुरलीधर!

Kmsraj51 की कलम से…..

Hey Murlidhar | हे मुरलीधर!

हे मुरलीधर! तेरे आगमन की पावन बेला आई।
सज गया ये जगत, खुशियों की बौछार छाई॥

तेरी अतिप्रिय मुरली की धुन में होकर मगन।
तेरे नाम के दीवानों को लागी लगन॥

तेरे मुकुट के मयूर-पंख को ही निहारेंगे, आज सब।
हे लीलाधर! तुम अपनी लीला दिखाने आ जाओ अब॥

तेरे इस जन्माष्टमी पर्व पर……..

छोटे ~ छोटे प्यारे बच्चों का रूप बहुत सलोना।
छोटी ~ छोटी राधा, छोटे-छोटे कान्हा मनमोहना॥

देखो! आज इन्होने क्या सुंदर रूप बनाया।
इनकी छवि ने मन को बहुत लुभाया॥

बालमन अनोखी, अदभुत छवि ले मुस्काय।
नज़र उतारे इनकी कहीं नजर न लग जाय॥

हे मुरलीधर, जन्माष्टमी पर सब रूप ही तुम्हारे भाये।
लगे आज यूँ हर बाल रूप में तुम्हीं समाये॥

आज काली रात्रि का अंधकार भी, तेरे जन्म के उजाले से भर जाएगा।
तेरा जन्म, इस भारत-भू पर परमानंद ले आएगा॥

अपनी श्रद्धा, आस्था के सब पुष्प ही, तुझको कर दूँ अर्पण।
तेरे भक्तों को तेरी ही छवि दिखेगी, ऐसा बना मन-दर्पण॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में कवयित्री हे मुरलीधर के सागर प्रेम और श्रद्धा की भावना को व्यक्त करती हैं, और वो भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के पावन अवसर की उपलक्ष्य में बोल रहे हैं। कविता में व्यक्त की जाने वाली भक्ति और उम्मीद की भावना के साथ ही बच्चों के छवि का सुंदर वर्णन भी होता है, जो भगवान के जन्म के अवसर पर दिखाया जाता है। इसके अलावा, कविता में भगवान के जन्म के पावन अवसर का महत्व और उसके प्रभाव के बारे में भी बताया गया है।

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यह कविता (हे मुरलीधर!) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
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  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
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  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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शिल्प-धर्म।

Kmsraj51 की कलम से…..

Shilp-Dharm | शिल्प-धर्म।

अनुकर्ष निर्जन वन पूनम,
पृथुल भूधर प्रदेश विशाल थे।
स्निग्ध हरीरी अमृता भूषित-पथ,
आरण्य सारंग-अमंद बिखरे थे।

लपेट दिव्य भूषण कौन्तेय के,
प्रदर्श-सहस लावण्य लहर से।
मुक्त-कुंतल लहरा रही थी,
रत्नगर्भा को उतुङ्ग महाविल से।

शिल्प-धर्म पर मैं जाता था,
निःसंग वन-वाटिका तमस् में।
यकायक दृष्टिगत हुई अभ्र को,
मराल कंधर संक्षिप्त कपाल में।

कामदग्धा अपूर्व सुंदरी,
उस पर मुरली लिये कर कमल में।
चीर रही थी नितांत निर्जन वन को,
भर रही सरगम के मधुर-स्वर में।

किल्लोल रही तरंगें रश्मियों से,
ढुलक रहे घनरस कमलिनी में।
अगुरु युवता थिरक रही थी,
निहार-कणों-सा सुर पवन में।

पुकार कहा मैनें; कौन? बंसी बजा रहा,
कहा प्रकृति ने सौंदर्य चिर हमी-से।
घनेरी स्वयं दमक-भास मैं करती,
प्रकाशित अधिलोक मैं तुम्हीं-से।

अनखिली यौवन का मधु मैं,
मदहोश रसीली नई-नवेली।
सरस तरुणी का नयन-मद,
दृष्टि लेखन की अलबेली।

कोमल मंजरी किसलय कली हूँ मैं,
मैं फुनगियों पर पड़ी मिहिका रज।
सुमन-सारंग पर थिरकती फिरती हूँ,
प्रेममय भृंगी-पतंगा बन समज।

प्रणय-वेदना के सिवा न दुःख,
यहाँ पुरातन क्षेम की लालिमा है।
इस वापिका में नित राजहंस के,
आसङ्ग टहलती आनंदित हँसनी है।

जोड़ पंख अभिलाषा अभिराम,
आई इस आनन्द भुवन माया में।
पी लो आज अधर-रस जी-भर,
कल दहन होगी तेरी पिण्ड-काया में।

युवता तश्नगी आकर्षण प्रेम,
सत्यतः नवयौवना मधुमय है।
इन चक्षुओं में विवुध-मधु भरा,
रसीले रदों में मद – संचय है।

देखा है मैनें इन दिनों में,
मादकता भरी है हिमकणों में।
सारंगों की मुस्कान प्रगट थी,
निर्मल शून्य सुनहला पुष्करणों में।

आनंदित हिलोर लेती कनक किरणें,
झिलमिल-झिलमिल झलक रही सर में।
शिल्प-धर्म पर मैं जाता था,
निःसंग वन-वाटिका तमस् में।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (शिल्प-धर्म।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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गुरु की महिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Guru Ki Mahima | गुरु की महिमा।

गुरु ही ले जाये, अंधकार से प्रकाश की ओर।
गुरु की महिमा का न पाया, किसी ने छोर।

प्रथम गुरु जन्मदाता मात-पिता को नमन।
खिलाया जिन्होंने संसार में जीवन का चमन।

द्वितीय स्थान गुरु का, जीवन मे शिक्षक ही पाता।
जो सुप्त भाग्य जगा दे, जीवन निर्मल दे जाता।

गुरु ही बोयें, शिष्यों में संस्कारों के बीज।
नैतिकता, समाजिकता और सिखाएं तहजीब।

आध्यात्मिक गुरु ने ईश्वर से भी उच्च दर्जा पाया।
गुणगान इसकी महिमा का, शास्त्रों ने भी सुनाया।

प्रशस्त करता सन्मार्ग, गुरु ही इस जीवन में।
शिष्य को ये लाकर खड़ा कर दे, खुशियों के उपवन में।

गुरु की महिमा से गुंजायमान है, ये ब्रह्मांड।
शीश झुका करें हम, प्रणाम साष्टांग।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका को महत्वपूर्णता के साथ दर्शाया गया है। गुरु जी को त्रिविध रूपों में प्रस्तुत किया गया है: प्रथम गुरु (मात-पिता), द्वितीय गुरु (शिक्षक), और आध्यात्मिक गुरु (आध्यात्मिक गुरु)। कविता में यह बताया गया है कि गुरु के बिना हमारा जीवन अधूरा होता है और गुरु के माध्यम से हमें नैतिकता, समाजिकता, और ज्ञान प्राप्त होता है। गुरु की महिमा को सराहा गया है और उनके प्रति प्रणाम और श्रद्धा की भावना व्यक्त की गई है।

—————

यह कविता (गुरु की महिमा।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हां मैं शिक्षक हूं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Haan Main Shikshak Hoon | हां मैं शिक्षक हूं।

हां मैं ही वह शिक्षक हूं, जिसने,
चपरासी से राष्ट्रपति तक को है ज्ञान दिया।
करता रहता हूं अपना काम सदा,
किसी ने अधिमान दिया या अपमान किया।

इन्होंने सब कुछ सीख के मुझसे,
मुझे ही भला बुरा कह कर है परेशान किया।
मैने नजर अंदाज कर के फिर से,
नई पीढ़ी को उसी तन्मयता से ज्ञान दिया।

तू उभरे ओ शिष्य मेरे! मैने हर छात्र को,
इसी ही भाव से है वरदान दिया।
वह छात्र पढ़ लिख कर बड़े ओहदे पर,
बैठा तो, उसने मुझे बदनाम किया।

तू लांघ ले भले ही सारी हदें,
मुझे गर्व है कि मैंने तुझे बनाने का काम किया।
मैं खुश हूं तेरी तारकी से पगले,
तूने चाहे मेरी फजीहत की या फिर नाम किया।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता एक शिक्षक के दृष्टिकोण से लिखी गई है जो अपने काम में पूरी ईमानदारी से लगे रहते हैं। वह शिक्षक हमेशा अपने छात्रों को ज्ञान और सिखाने का काम करते हैं, चाहे वो किसी भी स्तर के हों। इस कविता में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका को महत्वपूर्णता के साथ दर्शाया गया है, और वे छात्रों के जीवन में गहरा प्रभाव डालते हैं। शिक्षक यहाँ पर अपमान और प्रशंसा के बावजूद अपने काम पर पूरी तरह समर्पित हैं और छात्रों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

—————

यह कविता (हां मैं शिक्षक हूं।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

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शिक्षक को सम्मान चाहिए।

Kmsraj51 की कलम से…..

Teacher Needs Respect | शिक्षक को सम्मान चाहिए।

राही को जो राह दिखाए,
गिरते को ऊपर उठाए।
कच्ची मिट्टी से घड़े बनाए,
धार उनकी कुंद बनाए।
अपनी बिना परवाह किए,
छात्रों का भविष्य बनाए।

मुसीबत आने पर भी,
डिगते नही पथ से कभी।
पथ प्रदर्शक, ज्ञान के दाता,
परखुशी इन्हें खूब है भाता।
सच्चाई की राह दिखाते,
घुलमिल वो सभी से जाते।

त्याग और बलिदान की मूरत,
इनका है राष्ट्र को जरूरत।
देते सेवा हरपल हरदम,
फिर भी जोश न होता कम।
अपने सारे दुख दर्द सहते,
मुंह से कभी उफ न करते।

इतने सारे जतन है करते,
फिर क्यूं इन्हें अपमान है मिलते।
दिल में छुपी एक कसक है,
शिक्षक दिवस पर बयां करते है।
जब गुरु होते है राष्ट्र निर्माता,
प्रताड़ित क्यूं इन्हें किया जाता।

छात्र हित हेतु सर्वस्व करते कुर्बान,
इनपे होना चाहिए राष्ट्र को अभिमान।
स्वाभिमान का इन्हें दान चाहिए,
शिक्षक को सम्मान चाहिए।
शिक्षक को सम्मान चाहिए।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में गुरु या शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका को बड़ी उच्चता और सम्मान के साथ दर्शाया गया है। यह कविता गुरु या शिक्षक के योगदान को गर्व और सम्मान से देखती है और उनके शिक्षा देने के कार्य की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करती है। इसके अलावा, छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करने का महत्व भी बताया गया है और उन्हें सच्चाई की ओर मोड़ने के लिए उत्साहित किया गया है। इसके साथ ही, शिक्षकों को पूर्ण सम्मान और आदर देने की आवश्यकता की भी अपील की गई है।

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यह कविता (शिक्षक को सम्मान चाहिए।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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शिक्षक दिवस एवं गुरु वंदना।

Kmsraj51 की कलम से…..

Teacher’s Day and Guru Vandana | शिक्षक दिवस एवं गुरु वंदना।

गुरुवर जैसा नहीं कोई पुज्य,
नहीं है कोई दूजा महान।
गोविंद से पहले करता हूं,
शिक्षक का गुणगान।
गुरु की नजरों में होता है,
कृष्ण – सुदामा एक समान।

आप सा ना कोई इस धरती पर,
आपके पास है ज्ञान का खान।
देकर गुरुवर प्रकाश आपने,
अंधकार से बचा लिया।
धन्य हो गया जीवन,
स्वागत करने का जो मौका दे दिया।

शिक्षक दिवस का दिन है बड़ा महान,
आपके आशीष से, उज्जवल हुआ सारा जहान।
गुरु की चरणों में है चारो धाम,
आपकी चरणों में ” भोला ” का कोटि कोटि प्रणाम।
गुरु-शिष्य का नाता देखो, पिता-पुत्र से कहीं महान,
गुरु ही देते सबको अनुपम वो सकल ज्ञान।

गुरु ही पथ प्रदर्शक,
गुरु से है सबका स्वाभिमान।
अभियंता, नायक, अधिकारी,
डाक्टर हो या हो फिर कर्मचारी।
शिक्षक हैं सबका निर्माता,
ये कैसी बिडम्बना है,
सबके आगे शिक्षक अपना सिर झुकाता।

गुरु कृपा से विकसित हुआ संसार,
राम- कृष्ण भी गए शरण में,
वो भी समझे, गुरु बिना जीवन न संसार।
माँ सरस्वती, भगवान चित्रगुप्त से पहले,
नमन करता हूँ गुरु चरणों में।
मैं अज्ञानी कुछ न मांगू, कुछ न जानूँ,
हाथ रख दो गुरुवर अपना,
जब शीश झुकाएं तेरी चरणों में।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में गुरु के महत्व को महत्वपूर्ण रूप से प्रकट किया गया है। गुरु को ज्ञान का स्रोत और जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। यह कविता गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस के अवसर पर गुरुजी के प्रति श्रद्धाभाव और आभार व्यक्त करने का प्रयास है। गुरु-शिष्य के रिश्ते को पिता-पुत्र के समान महत्वपूर्ण माना गया है और शिक्षक को समाज के निर्माता के रूप में दर्शाया गया है। कविता के अंत में कवि अपने गुरु के चरणों में अपना सिर झुकाते हुए गुरुजी के प्रति अपनी आभार व्यक्त करते हैं।

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यह कविता (शिक्षक दिवस एवं गुरु वंदना।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त – 2023

Kmsraj51 की कलम से…..

Literary trip from Varanasi to Chandigarh August – 2023 | वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त – 2023

यात्रा वृत्तांत के क्रम में अनेक साहित्यकारों ने समय-समय पर यात्रा की। यात्रा होती है। दो भौगोलिक स्थान के रह रहे लोग आपस में एक दूसरे की बोली- भाषा, संस्कृति- सभ्यता का आदान – प्रदान किया करते हैं। यात्रा विविध वाहन से की जाती है। जैसे – विमान, बस, नाव, जलयान, और पैदल भी यात्रा होती है।

अनहद कृति से बुलावा आया – अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका की साहित्य आश्रय स्ट्रीट 2023, हेतु बुलावा 2 जुलाई 2023 को मेरे मेल पर आया मैं किताब की बात, पुस्तक प्रदर्शनी, “परिवार के सदस्यों के लिए हिंदी शब्द यज्ञ का अनूठा अवसर साहित्य शेयर, एक बार पुनः दस्तक दे रहा है लिखा।”

अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के इस कार्यक्रम को ढाई दिन के लिए विविध सांस्कृतिक साहित्यिक गतिविधियों और आगे बढ़कर मिलन बर्तन आपस में होगा। दो दिन का पुस्तक प्रदर्शनी में, आप कर पाएंगे अपनी किताब की बात। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए साहित्य आश्रय 2023 में पंजीकरण कर के अपने बारे में जानकारी देनी थी।

अपनी प्रतिक्रिया एवं प्रश्न काम के जीमेल पर भेजने को आदेशित हुआ था। अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक ई. पत्रिका का दिनांक 2 जुलाई 2023 का मेल आया। जिसमें हमने पंजीकरण कर लिया था। मन मस्तिष्क पर उसके बारे में चिंतन भी चल रहा था। मन में आया कि भारत शांति का संदेश देने वाला देश है तो एक चार लाइन की रचना प्रस्तुत करते हैं –

शांति का संदेश लेकर चल दिया,
सद्भाव और प्रेम परोसते चल दिया।
संस्कृति संस्कारों में पला यह देश,
बंधुत्व की कामना लिए चल दिया।
ॐ शांति: शांति:

सरयू का पावन किनारा, सरयू में गोता लगाने की ललक, धर्मशास्त्र के अनुसार ‘सरयू में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं, साथ ही मनुष्य को मुक्ति भी मिलती है।’ सरजू तट से तीन किलोमीटर पहले स्थित मेरा आदर्श गांव, ग्राम महिरौली रानी मऊ, जनपद अम्बेडकर नगर मुझे जाना था। गांव में कुछ मकान का कार्य करना था तीन कमरों की दीवार प्लास्टर होनी बाकी थी। स पत्नी उर्मिला सिंह के साथ मैं गांव पर पहुंच गया आवश्यकता है कारीगर, मजदूर की। पड़ोसी प्रताप सिंह की मदद से मजदूर और मिस्त्री भी मिल गये। काम शुरू हो गया। प्लास्टर का काम पूरा हो गया होता सीमेंट कम थी पैसे भी चूक गये। काम बंद करना है। उसके बाद हमने अपने मित्र जो बालीपुर में रहते हैं उनका कुछ सामान जिसे लाया था, जैसे- बेलचा, रसियां, लोहे की कढ़ाई, लोहे का सब्बल आदि को लेकर अपनी अल्टो गाड़ी से पहुंचने गया था। समान पहुंचा कर जब वापस आ रहा था कि तभी ग्राम अहिरौली रानी मऊ जनपद अंबेडकर नगर के दक्षिणी छोर पर हरिजन बस्ती के पास अपनी गाड़ी को रोकना पड़ा, और बात होने लगी, विभा चसवाल जी से, आपने बताया कि- 4,5,6 अगस्त को अनहद कृति का साहित्याश्रय रिट्रीट 2023 होगा, में आपको बुलावा है। हम दोनों में लगभग आधा घंटा की बात चलीं, विभा जी ने दो रचनाएं और भेजने के लिए मुझे कहा। दूसरे दिन हमें बनारस जाना था इसलिए मैंने कहा ठीक है कल रचना भेज दी जाएगी। रात्रि से ही दूसरे दिन भोर से तैयारियां जोर- शोर से होने लगी।

यात्राएं क्यों आवश्यक है —

यात्रा की महत्व बताती हुई नोबेल पुरस्कार प्राप्त ब्राजील की कवियित्री मार्था मेरिडोस की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूं —

रचना का शीर्षक रचना पढ़ने से लगा, यात्रा क्यों आवश्यक है? —

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
करते नहीं कोई यात्रा।
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की दुनियां,
करते नहीं किसी की तारीफ।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप:
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान।
नहीं करने देते मदद अपनी और,
ना ही करते हैं दूसरों की।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, और अगर आप:
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के।

चलते हैं रोज उन्हीं रोज वाले रास्तों पे,
नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार।
नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग या,
आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं अगर आप:,
नहीं बदल सकते हो अपनी जिंदगी को जब,
हों, आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से।

अगर आप अ निश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हो निश्चित को,
अगर आप नहीं करते हो पीछा किसी स्वप्न का।
अगर आप नहीं देते हों इजाजत खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार किसी,
समझदार सलाह से दूर भाग जाने की,
तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

(इसी रचना पर नोबेल पुरस्कार मिला)

सनातन धर्म मंदिर जो इंदिरा गांधी हालीडे होम के पास ही था दर्शन पूजन करने के उपरांत कैंटीन में आकर चाय – पानी करके अपने रूम में चला गया जो हालीडे होम में मिला था कि आकर आराम कर रहा था तभी हाल के सामने समोसा जलेबी और काफी का काउंटर लग चुका था। बावरा जी से मैं बोला कि चलिए सभा स्थल! वहां पहुंचा तो देखा कि हालीडे होम सेक्टर 24 का सजा हुआ था। नजारा देखने में बहुत बढ़िया सजावट। दोनों लोग साथ में हाल के पास पहुंचे थे। हाल के गेट पर काउंटर लगे थे पर ताजी सजी हुई जलेबी, समोसा, चाय, चाय की चाह, पीने की इच्छा अंदर से जाहिर हुई। समय भी दिन में 12:00 बज चुके थे। समोसा को जैसे ही तोड़ा उसमें हरी मटर भिगोकर डाली गई थी बहुत आनंद आया खाने के बाद वह बहुत ही लाजवाब लगा। पहले जलेबी खाई फिर समोसे और अंत में कॉफी पी।

हाल में सभा स्थल पर लोग बैठना शुरू हो चुके थे हम दोनों लोग भी वहां जाकर उपस्थित हुए साहित्यकारों का परिचय होने लगा जगह-जगह से आए हुए थे साहित्यकार अपना – 2 नाम पता संपूर्ण विवरण के साथ बता रहे थे। एक दूसरे के विचारों का आदान-प्रदान हो रहा था। जब साहित्यकारों के परिचय का कार्यक्रम समाप्त हुआ उसके बगल में ही भोजन का काउंटर लगा हुआ था जब वहां पहुंचा, पहुंचने पर देखा की विविध तरह के व्यंजन काउंटर पर लगाए गए हैं उसमें पापड़, छोले, पुरी, बेसन और मैदे की रोटी, चावल ,दाल, सलाद, रायता, मीठा और काफी का स्टाल लगा था। साहित्याश्रय रिट्रीट का यह कार्यक्रम ढाई दिनों तक चला जिसमें अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह का भोजन परोसा जाता था। कभी-कभी फल का भी काउंटर लगा हुआ मिला। मनभावन व्यंजनों को देखकर ऐसा लगता था कि मानों शादी का कोई बड़ा फंक्शन हो।

लोग छक कर भोजन खाते,
कार्यक्रम में खो जाते।
ऐसा कार्यक्रम फिर हो,
सब लोग मानते रहते।
चंडीगढ़ की पावन धरा पे,
चंडी का गुणगान सुनाते।
अनहद कृति की शुभ बेला,
यादों को अपने घर ले जाते।

भोजन करने के उपरांत दूसरी मीटिंग में शामिल रचनाकारों की रचनाएं सुनीं गयी जिसको रचनाकार स्वयं अपनी भागीदारी सुनिश्चित किया करते थे। अपनी-2 रचना वाईफाई लगे हुए अनहद कृति के पोर्टल पर लोग पढ़ते थे। अच्छी रचनाओं पर तालियों की गड़गड़ाहट से सभा स्थल गूंज उठा करता था सभा में शामिल लोग आनंदित हो जाते थे।

सुबह सवेरा होता, लोग नृत्य क्रिया से निवृत होकर एक-एक करके बाहर निकलते कि इस समय विभा चसवाल जी बाहर निकलीं और मैं भी बाहर निकल आया, बात चली चौपाल की, कुर्सियां लान में लगाया जाय, कुर्सियां हम लोग रखने लगे लान में लाइन में। एक कमरे के सामने चाय बिस्कुट रखा हुआ था। लोग बारी-बारी से बिस्कुट खाते चाय पीते। तभी वहां पर राजेंद्र प्रसाद गुप्त बावरा जो चंदौली जनपद से थे डेड पैकेट नमकीन लाकर रख वहां रख दिया उसे भी लोग चखे, नमकीन बड़ा चटपटा था। लोगों को बहुत अच्छा लगा।

रचनाओं का दौरा चला उपस्थित रचनाकारों की अध्यक्षता संपादक द्वय आदरणीय पुष्पराज चसवाल, डॉ प्रेमलता चसवाल ‘पुष्प’ ने की। संचालन का काम अमेरिका से पधारी प्रवासी भारतीय मूल की डॉक्टर विभा चसवाल ने किया। इस कार्यक्रम में रिकॉर्डिंग भी की गई साथ ही साथ यू एस ए से भारतीय मूल की ललिता बत्रा ने ड्रोन से भी फोटोग्राफी की।

दिन में सभा स्थल पर कार्यक्रम चलाया गया चलता रहा यहां संगीत भी प्रस्तुत हुई सरस्वती पूजा अर्चना, पुष्प अर्पित किए सरस्वती जी को। शाम 5:00 बजे टूर पर जाने का कार्यक्रम था लोग बस में सवार हुए और पहुंच गए सुखना झील पर। झील का सैर बहुत अच्छा था।

यात्रा के दौरान आवश्यकता —

काम हो जाने पर लौट आने की नियत। तीन जोड़ी कपड़े। मंजन, तौलिया, साबुन, चंदन, पूजा की सामग्री। जाने और घर आने की तारीख। जिसके पास जाना है उसका नाम पूरा पता शहर का नाम मोबाइल नंबर शहर का पिन कोड आदि। थोड़ा पैसा, आधार कार्ड, पैन कार्ड व डेबिट कार्ड। जहां जाना है उस जगह की जानकारी शहर के किस हिस्से में है, जाना पहचाना लैंड मार्क, व्हाट्सएप पर लोकेशन व्यस्त है, यात्रा की अनुमति पत्र (टिकट), कागज पर छपा हुआ, अथवा यस एम यस प्रारूप में।

यात्रा में क्या न ले जाएं —

  • अरे हो जाएगा वाली आस।
  • उसने बुलाया है तो जा रे वाली सोच।
  • देख लेंगे वाला दृष्टिकोण!
  • अकड़।

पुस्तक को भेंट स्वरुप एक दूसरे रचनाकार को दे दी —

साहित्यकारों में अलग-अलग तरह से, शहरों से जुड़े हुए लोगों में, आदान-प्रदान करना शुरु कर दिया। अनेक साहित्यकारों ने अपनी पुस्तक को भेंट स्वरुप एक दूसरे रचनाकार को दे दी।

प्रभात शर्मा, हिमाचल प्रदेश सेवानिवृत्त सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड धर्मशाला जनपद कांगणा, की अपनी पुस्तक ‘शीशम का पेड़’ मुझे दिये। पुस्तक में सद् भाव, संस्कृति, संस्कार, आदर सत्कार, वृद्धों के संग व्यवहार, पारिवारिक एकाकीपन जीवन जीना, सुदूर नौकरी करने से लाभ-हानि, जमीन-जायदाद के झगड़े का निपटारा करने का सुझाव, शर्मा जी ने सादो उर्फ शुभ राम शरण भारद्वाज को केंद्र में रखकर पुस्तक ‘शीशम का पेड़’ प्रकाशित किया, जो पढ़ने योग्य है और ज्ञान बढाने वाली है।

भारतीय कवियों को प्रकृति की गोंद में क्रीड़ा करने का सौभाग्य प्राप्त है। यह हरे-भरे उपवनों में, सुन्दर जलाशय के तट पर, नदियों के किनारे, पहाड़ों की वादियों में, विचरण करते और प्रकृति के नाना प्रकार के मनोंहारी रुपों से परिचित होकर सजीव चित्रण करने में सफलता हासिल करते हैं। भारतीय कवियों का प्रकृति वर्णन सौंदर्य ज्ञान उच्च कोटि का होता है। कवि बुद्धि बाद के चक्कर में पड़ कर व्यक्त प्रकृति के नाना रूपों में एक अव्यक्ति किंतु सजीव सत्ता का साक्षात्कार करता है। उन छवियों से भावमग्न होते हैं।

सामूहिक पुस्तक विमोचन —

अनहद कृत के सामूहिक पुस्तक विमोचन में जो 6 अगस्त को सभागार में आयोजित कार्यक्रम चंडीगढ़ में संपन्न हुआ था। इस कार्यक्रम में स्नेही चौबे कवियित्री व सीनियर साफ्टवेयर इंजीनियर, बंगलोर कर्नाटका की, मेरी अविरल अभिव्यक्ति जिसका आमुख-अविरल अभिव्यक्ति के विविध आयामों में डॉ प्रेमलता चसवाल ‘पुष्प’ ने किया है। आप अनहद कृत ई. पत्रिका की संपादक हैं। फिर मेरे जैसी अदना रचनाकार को क्या लिखना शेष है। राजेंद्र प्रसाद गुप्ता बावरा की पुस्तक ‘चित्र-रेखा’ आप उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद से सोगाई गांव से हैं जहां कर्म नासा नदी की धार कल-कल करती अविरल बहती है।

यह पुस्तक पौराणिक कथा पर आधारित है खंड काव्य इसे कहा जा सकता है। इस पुस्तक की एक रचना प्रस्तुत है—

प्रज्ज्वलित ज्योति भू पर अगर,
प्रसरित है कण-कण धवल धार।
ऊषा ले आई रश्मि-हार,
त्रृण – त्रृण पर छाई मुक्तावलि,
उस छवि – धर का नतमस्तक वंदन।

—♦—

वसा कर बस्ती एक विचित्र,
चित्रपट पर अंकित कर रूप।
जला देना न स्वर्ग – संसार,
कि, हो मर्माहत मेरा रूप।

चित्र – रेखा गूढ़ रहस्यों से भरी शोणित पुर नरेश वाणासुर की पुत्री, वाणासुर का मंत्री, कुम्भाट की पुत्री, द्वारिका पुर नरेश, श्री कृष्ण के पुत्र, प्रदुम्न के पुत्र, देवाधिदेव की अर्धांगिनी, ऊषा की शिक्षिका को आधार मानकर अपनी रचनाओं को स्वरूप प्रदान किया।

दो संस्कृति का मिलन के अंतिम बंद प्रस्तुत में —

कैसी सुंदर घटा छटा का,
ऊंच अटा पर छायी।
मानो उभय बिंदु पर रजनई,
ऊंचा ली अंग ड़ायी।

उक्त रचना से इस चित्रलेखा का राजेंद्र प्रसाद गुप्त बावरा ने समापन किया।

रमेश चंद्र ‘मस्ताना’ की पुस्तक कागज के फूलों में…’

मस्ताना जी के ऊपर सरस्वती की अनुपम कृपा झलकती है आपने इस पुस्तक में लोक संस्कृति, संस्कार आदि पर आधारित छप्पन रचनाओं को संकलित करने का उत्तम प्रयास किया है।

मस्ताना जी की रचना –
भोर की पहली किरण
दूर पहाड़ों की ओट से
स्वर्ण मुकुट पहन
धरती की ओर सरकती
पूछती है मेरी घर आंगन तक!

—♦—

मेरे हिस्से की धूप
मुझे हर पल नई ताजगी
नई उमंग,
नया जोश दे जाती है- २

और नारी संसार नामक शीर्षक से नारी जगत की विशेषताओं को अपनी रचना मेरा है। जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है।

यात्रा प्रायः विविध चरण में होती है। यात्रा में जगह-जगह ठहराव होता है। कुछ यात्रा एक दिशा में होती है। एक दिशा में होने वाली यात्रा की मूल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाना और वहां सम्पन्न होने वाले कार्यक्रम में भाग लेना होता है इसके बाद यात्रा जिस जगह से शुरू होती है वहीं आकर यात्रा स्थगित हो जाती है। यात्रा में अनुसंधान, मनोविनोद, तीर्थ दर्शन व विचारों का आदान-प्रदान होता है।

किसी बड़ी संस्था में प्रकाशित रचना को फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप इंस्टाग्राम ब्लॉग पर पोस्ट कर देते हैं हम तो उन रचनाओं को कॉपी करके अखिल भारतीय सद्भावना संगठन, आलो पोयट्री, अभी पोस्ट कर देते हैं। साहित्य काव्य संकलन पर मेरी 145 रचनाएं प्रकाशित है। शब्द इन, वेबली काम, हिंदी साहित्य शिल्पी आदि।

चंडीगढ़ की यात्रा करने के लिए उसे मेल में हमें यह रचना लिखने को मजबूर किया—

आपने पुकार दिया,
मेरे विचार को,
आपका आशीर्वाद हो,
मेरी मनोबल को
शुभ आशीर्वाद देकर
चिंतन को
निखार दिया।

मौका दिया मौका,
लेकर विचार किया।
सर्जन के सुख को
मोतियों में ढाल लिया।

ट्राई के फैसले से फेसबुक के सीईओ “मार्क जुकरबर्ग जी” को जब निराशा हुई तो हमने वेब दुनिया पर लिखा की “जुकरबर्ग जी को अपने उद्देश्यों पर कायम रहकर कार्य रूप देने में धीरज पूर्वक कार्य करने होंगे।” धन्यवाद!

तेरे दामन में जितने सितारे हैं,
होंगे ए फलक।
मुझको अपनी मां की,
मैली ओढ़नी अच्छी लगी।

साहित्य आश्रम रिट्रीट समारोह का समापन 6 अगस्त 2023 को दोपहर में हो गया। सभा स्थल से राजेंद्र प्रसाद गुप्त बावरा और मैं अपना – अपना बैग आदि लेकर सनातन धर्म मंदिर चंडीगढ़ आ कर टेंपो का इंतजार कर रहे थे, परंतु कोई ना मिलने से थोड़ा आगे बढ़े वहां से बीस-बीस रुपए में चंडीगढ़ बस स्टेशन पहुंचे। पहुंचे ही एयर कंडीशन बस मिल गई। ₹440 / प्रति, व्यक्ति चंडीगढ से दिल्ली का किराया लगा। बस आगे बढ़ी आ गया करनाल, बस रूकी। वहां चाय पीना चाहा तो देखा ₹50 की एक काफी दुकानदार दे रहा था। सह चर बावरा जी के मना करने के बाद हम दोनों वापस बस में सवार हो गये।

हमारी बस दिल्ली के काफी करीब आ गई थी।
सूर्य ढलने लगे, अंधेरा होने लगा।
विद्युत प्रकाश फैलने लगा, बड़ी – बड़ी बिल्डिंग दिखने लगीं।
अगल – बगल मंदिर, सड़क पूरी जाम।

बस अब रेंगने लगी, उतर गया कश्मीरी गेट पे। इधर-उधर देखा, किसी-किसी से पूछा। पहुंच गया बाथरूम के, गेट पर बैग रखा। बारी-बारी, दोनों ने बाथरूम किया। फिर पूछना शुरू किया, ही ई एल सेक्टर 15 अशोकनगर। स्टेशन से बाहर निकला, चाय की चुस्की ली। टेंपो वालों से बात की, एक तैयार हुआ।

रुपया लिया उसने, 200 दोनों का। टैंपू आगे बढ़ा, लाल किला गीता कॉलोनी।
होते यमुना ब्रिज, दाहिनी तरफ अक्षर-धाम। ललिता पार्क बाय तरफ, और फिर आई टी ओ। मयूर विहार फेस वन, के बाद औवर ब्रिज से दाहिने। चिल्ला गांव बायें और त्रिलोकपुरी बायें। स्टोक रेडी हॉस्पिटल, अगले चौराहा पर जिज्ञासु जी। जिन्हें देखकर हम लोग आये थे, फिर उसी टेंपो में सवार हो, पहुंच गए सी ई एल गेट। रात में विश्राम किया, भोजन ले आराम मिला।

सुबह सवेरे नित्य क्रिया किया, आगे सेक्टर 52 के लिए चल पड़े। अशोकनगर मेट्रो स्टेशन से, तीस – तीस रुपया दे सेक्टर 52 पहुंचे। वहां से टेंपो मिला, एक मूर्ति के पास अवतार दिया। मेट्रो ट्रेन सेक्टर 52 से गुजरी, बोला दरवाजा बाय खुलेगा। जब सेक्टर सोरह से गुजरी, आवाज मिली दरवाजा बाय खुलेगा। सेक्टर 17 पर आने वाली, दरवाजा बायें खुलेगा। बाट निकल गार्डन, दरवाजा बायें खुलेगा। नोएडा सिटी सेंटर, दरवाजा बायें खुलेगा।

एक मूर्ति से मेरा छोटा लड़का आकर हमें और राजेंद्र प्रसाद को दुबारा अपने फ्लैट पर ले गया वहां भोजनालय किया। दो घंटे हाल चाल भी इसके बाद टिफिन में लंच आ गया। चल दिए फिर अशोकनगर की तरफ, और बाहर निकला। पुलिस वालों ने टैंपू किधर करवा दिया, आगे बढ़ा टेंपो मिला। वह ले जाकर कहीं और छोड़ दिया, दूसरा टेंपो मिला, गंतव्य स्थान से पहले ही छोड़ दिया। घर दृढ़ता आगे बढ़ा। जल्दी-जल्दी बैग उठाया, अशोकनगर मेट्रो स्टेशन जिज्ञासु जी ने पहुंचाया। ₹20 के टिकट पर, नई दिल्ली मेट्रो रेल ले आई। प्रयागराज एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हुआ, पहुंच गया 7 तारीख को प्रयागराज।

प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर गुप्त जी का बड़ा लड़का जो एस पी ओ है लेने आया। उसने हम दोनों को घर ले जाकर भोजन कराया। नमकीन – चाय पिलाई स्वादिस्त भोजन था। कुछ देर के बाद हम लोग राजेन्द्र गुप्त बावरा जी के समधी से मिलने गए, साथ में वह गुप्त जी का सुपुत्र – बहू भी गयी। फिर प्रयाग सिटी स्टेशन से बस से बनारस पहुंच गया।

—♦—

चंडीगढ़ यात्रा – सुखद अनुभूति, की तैयारी — व विशेष 

यात्रा में साहस की आवश्यकता होती है। यात्रा मनुष्य के बुद्धि को उन्मुक्त करती है। लेखको में वैचारिक आग्रह और दूराग्रह भी होते है, जिसे साहित्य में आपत्तिजनक माना जाता है। देखना है हम लोग विविध भाषायी एकाकार जहां करेंगे वहां का नजारा कैसा होगा।

चंडीगढ़ में पुस्तक प्रदर्शनी लगेगी! यह सुनकर मैं और राजेंद्र प्रसाद गुप्त “बावरा” उत्साहित हो उठे? बावरा ने इच्छा जाहिर किया कि मेरी प्रकाशित पुस्तक ‘चित्र-रेखा और जनतंत्र-महिमा’ पुस्तक मेले में लग सकती है क्या! हमने कहा जरुर आप अपनी पुस्तक लगाइए मैं फॉर्म भर देता हूँ पुस्तक प्रदर्शनी में स्टाल लगेंगे उसके पेपर फिलअप कर देता हूँ परन्तु याद रहे 10-10 पुस्तकें प्रदर्शनी में लगाने के लिए ले जाना है, साथ में एक स्थानीय पत्रिका भी ले जानी है।

बावरा जी यत्र-तत्र जहाँ भी उनकी पुस्तके थीं वहां से 12-12 पुस्तकों को इकठ्ठा करके बैग में रखना शुरू कर दिये। इसे सुनकर मुझे अच्छा लगा की उन्होंने अपनी पुस्तकें ले जाने वाले बैग में रख ली है।

हमनें बावरा जी को साहित्य काव्य संकलन में 19-12-2014 को प्रकाशित काव्य रचना सुनाई —

मुझे देखो मैं भी प्यार करता हूँ,
एहसास के ठाव – गाँव में ही रहता हूँ।
ज्ञान की गंगा में गोता खा रहा हूँ,
नदी बहुत गहरी उसी में नहा रहा हूँ।
कई बरसो से डूबता उतर रहा हूँ,
मुझे देखो मैं भी प्यार करता हूँ।

दिखे दिखता दिलदार दिलवर दिलेर दिखाई,
लिख-लिख-लिख लिखते लरिकन लरिकाई।
लड़ते-लड़ते लाखो लालित्य लाल लाई,
सज-सुघर सुहृद सजल साहित्य पाई।
विश्व के साहित्य प्रेम को साकार करता हूँ,
मुझे देखो मैं भी प्यार करता हूँ।

मेरा भी मन हिलोरे भरने लगा पुस्तक प्रदर्शनी में पुस्तक लगाने के लिए, फिर मैंने कंप्यूटर के जानकार, को पुस्तकों को छापने हेतु मित्र रतन को बुलाया उन्हें ढेंकानाल उड़ीसा यात्रा (तृतीय खण्ड ई बुक), ओडिशा साहित्यिक धर्मयात्रा क्रमशः 2015 और 2018 में प्रकाशित, सु पाथेय षट्दर्शन (चतुर्थ खण्ड) स्वर्ग विभा अवतरण ई-बुक सूरज की रौशनी को आने तो दो, काव्य साधना (प्रथम खण्ड ई-बुक) की प्रतियाँ प्रकाशन करने वाले को दे दी। साथ ही दिया “कवि हूँ मैं सरयू तट का” (काव्य संग्रह)।

काम लम्बा था उसने ऊपर से चार पुस्तकों को दे दी, दिन में ‘रतन’ ने तैयार कर दिया। हमने भी उन पुस्तकों को पुस्तक मेले में बावरा जी के पुस्तक के बगल में लगा दिया था। मैंने सारी पुस्तकें इंटरनेट पर काम करने वाले साहित्यकारों को आखिरी दिन भेंट कर दिया। अनहद कृत के वयोवृद्ध सम्पादक, साहित्यकार पुष्पराज चसवाल जी को स्वर्ग विभा अवतरण की एक पुस्तक भेंट की।

भारतीय साहित्य में मनुष्य को सर्वोपरि स्थान प्राप्त है और उसे साहित्य रचना देश-समाज हित में ही करनी चाहिए।

देश हित में बात जो करता नहीं,
वह धरा पर पिशाच बन रहता कही।
ज़िंदगी पाया मूल्यवान आदमी का,
माँ- ममता रखता नहीं तू ही ?
उऋण जब होगा नही इस जन्म में,
अगले जन्म में क्या बनेगा सोच ले।

—♦—

03 अगस्त 2023 के पूर्व संध्या पर रतन के किराए के रूम चौकाघाट में मैं पंहुचा। वहां उनके माता-पिता और बहन भी उपस्थित थी उनके घर चाय-पान किया, सुपाथेय षट्दर्शन की प्रतियां ली और काली मंदिर के पास बाइंडिंग करने वाले को दे दिया। कुछ घंटों में बाइंडिंग हो गई में घर से आकर उन पुस्तकों को ले लिया।

उसके बाद – पं.दीनदयाल उपाध्याय नगर, जनपद चंदौली तक जाने की थी रतन जी ने वहां तक पहुचाने का पक्का वादा कर ली, और सुबह-सुबह पांडेयपुर मेरे आवास पर पहुँच गए थे वादा का पक्का, मन के धनी, ईमानदार नेक इंसान हैं रतन जी।

इसीलिए मैं कहता हुं कि मेरा मित्र वही होता है जो वादा खिलाफी कभी नहीं करता।
हमनें अपनी पुस्तकें एक बड़े बैग में रख ली और एक अरेस्टोकेट अटेची में यात्रा से सम्बंधित आवश्यक सामानों को रख लिया और एक बोतल पानी, अपना बैग लेकर रतन के मोटरसाइकल पर बैठकर ज्यों ही घर के सामने कंडेल पुष्प के पास पंहुचा ही था की धरती माँ पुस्तकों को चूमना चाहती थीं कि बैग धरती पर आ गया।

उसे उठाकर मैंने माथे से लगाया और फिर मोटरसाइकिल के पीछे बैग और उसके उपर अटेची बाँध लिया। आगे बढे रतन ने अपने चौकाघाट रूम पर जाकर हेलमेट लिया। सुरक्षा के दृष्टिकोण से हेलमइट आवश्यक है।

आगे बढे पीली कोठी सिटी रेलवे स्टेशन के समीप पंहुचा ही था कि इन्द्र भगवान खुश होकर रिमझिम-रिमझिम बारिश करने लगे इसीलिए कहा है कि —

प्रकृति हमें जीवन जीने की कला सिखाती,
हमें प्रकृति अपने आँगन में सदा बिठाती।
अम्बर ऊपर भूतल निचे फिर जल बरसाती,
सतयुग से कलयुग तक वह सफ़र कराती।
ऋषिमुनियों से भाँति-भांति संसार बसाती,
निर्मल जल गगन बिच मयंक धरा सजाती।

राजघाट पुल पर चढने के पहले बसंत महिला कालेज के पास जोरदार बारिश होने लगी रतन तो चलते चल रहे थे, आगे बढ़ रहे थे, जहाँ-तहां पेड़ के छाँव में रुक जाते। मैं अपने जेब से रुमाल निकाल कर बेग के दोनों तरफ बारिश के पानी को बैग के ऊपर से सुखा कर उसे निचोड़ते हुए आगे बढ़ते रहते बढ़ते-बढ़ते रेलवे स्टेशन के द्वार पर पहुच गया।

रतन ने बैग व अटेची को बरामदे में रख दिया हमने कपडे बदले भीगा हुवा कपडा स्टील की बनी हुई मुसाफिर खाने के कुर्सियों पर फैला दिया, बैग को खोला तो उसमें अपनी पुस्तक सही सलामत थी।

हर हर महादेव!

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस यात्रा वृतांत में समझाने की कोशिश की है — यसाहित्यिक यात्रा के दौरान क्या-क्या तैयारी करना जरुरी होता है और क्या-क्या नहीं करना चाहिए, व किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यात्रा के समय आपका व्यवहार लोगों से कैसा होना चाहिए? जब सभी से मिले तो, एक दूसरे से बात-चित कैसे करें व सभी का सम्मान अच्छे से करे, सभी की बातों को ध्यानपूर्वक सुने और सभी का मनोबल बढ़ाये, तथा अच्छे साहित्यिक कार्य को आगे बढ़ाने में एक दूसरे की मदद करे। एक – एक करके सभी की रचनाओं को सुनकर उनका उत्साह बढ़ाये दिल से। यात्रा के दौरान अपने मन व बुद्धि को शांत व स्थिर रखें, सभी से शालीनता पूर्वक अच्छा व्यवहार करे। “आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप: करते नहीं कोई यात्रा। पढ़ते नहीं कोई किताब, सुनते नहीं जीवन की दुनियां, करते नहीं किसी की तारीफ।”

—————

यह यात्रा वृतांत (वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त – 2023) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, यात्रा - Trip, हिन्दी साहित्य Tagged With: kavi sukhmangal singh article, Literary trip from Varanasi to Chandigarh August - 2023, Sukhmangal Singh, चंडीगढ़ यात्रा - सुखद अनुभूति, यात्रा वृतांत, वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त - 2023

शब्द-माला।

Kmsraj51 की कलम से…..

String of Words | शब्द-माला।

अभिनव रस परिरंभ से,
थरथराते बाला के वेश।
कंपकंपाते अधर पुट,
उड़ते मदहोश से केश।

चूमकर अचानक अभ्र को,
भाग जाना अति दूर।
अनुपम है अणुभा का रूप,
मंजुलता मोहकता से चूर।

अविनीश के हाथों का परस,
पाकर व्याकुल कुछ-कुछ ऊब।
मृणालिनी का जल में जाना,
आकंठ तक डूब।

पुष्करिणी के तन किन्तु,
मन रात-भर शशि में लीन।
शशिकांत की आँखों में,
अलस-हीन निद्रा-विहीन।

स्वप्न का योग सारा,
प्राणों से सबको प्यार।
धन-दौलत है पास मगर,
निछावर कर दूँगा साकार।

विवस्त्र कर कुण्डल से,
देखे विस्मित चरणों का देश।
रहता जहाँ है बसा,
अगुण मानक उज्जवल वेश।

इस पावन पवित्र नीलिमा के,
धरा पर करुँगा तुझको मैं आसीन।
उपवन में भी तुम रहोगी,
अलि कटंक कुसुम विहीन।

अपने लहू के चंड से,
सुलगने न दूँगा अंग।
साथ रहोगी तुम पर,
आँच न आने दूँगा नि:संग।

शब्दों की माला में पिरोकर,
लिखता रहुँगा भाग्य अपना मान।
तुम रहोगी इस अधिलोक में,
बन सरगम की सुरीली तान।

मधुर मुरली की तान वह,
जिसके प्राणवंत विभोर।
डोलती काया तुम्हारी,
मोहक मोहनी होगी तस्वीर।

लोहित की दुर्जय क्षुधा,
दुःसह चाम की प्यास।
छा रही होगी सुर-सरगम,
घर-घर अवनी आकाश।

सुर तुम्हारे जब बजेगें,
ताल-तरंग चूमने की चाह।
आह निकलेगी फिज़ाओं से,
झूमने लगेंगे सब बाग।

करतल जब बजेगी,
चलने लगेंगे आँसुओं के तार।
बज उठेगी विश्व में जब,
निश दिन बोलों की झंकार।

जग तुम्हें घेरकर,
करेगा कलरव चहुँ ओर।
फूलों का उपहार होगा,
मनके-मनके में भरा प्यार।

कुछ दीवानगी में भर कर,
भित्ति हृदय पर उकेर लेंगे।
गीतों के भीतर घुसकर,
तुम्हारी छवि आँखों में उतार लेंगे।

कंठों में जाकर बसोगी,
बिन सरगम गुनगुना लेंगे।
प्राणों में आकर हँसोगी,
हँसकर होंठों पर छा लेंगे।

मैं मुदित हूँगा देखकर,
इन गीतों को वाक्य दूँगा।
रचित शब्द-माला में पिरोये,
अपने सृजन को आकार दूँगा।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (शब्द-माला।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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