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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2023-KMSRAJ51 की कलम से

गीतों का हार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Geeton Ka Haar | गीतों का हार।

सप्त रंगों से सजी धरती के,
कण-कण में गीतों का हार।
सात सुरों के तानों में बजता,
विहंगिणी विक्षोभ का तार।

सप्त दिवसों की सजी चौक पर,
चंद्र रजनी का सुंदर गात।
साँझ सकारी सज कर खोली,
स्वप्न सुनहली गुलाबों की प्रात।

चरण-पाद धरने को पथ पर,
फैला दिये हैं पुष्प-किरण के हार।
विहान की सिंदूरी लालिमा ने,
बिछा दिये हैं मेघ अपार।

कंठों की कोकिल में सजी,
सुर लहरी की मधुर तान।
धवल जूही की पहन चादर,
मृदुल चाँदनी आई सान।

दुर्वा की तूलिका में बसी,
नील गगन की घनसार।
दो शरासर आँक लूंगा,
भू-धरा पर हैं कितने गद्दार।

सुनने की शक्ति दो मुझको,
देखूँ कितने पीत-कुसुम सुकुमार।
पंखुड़ियों के दो वलय वृन्त मुझे,
खोजूँ कितने श्वेत कलिका के हार।

स्वर्ण शिखा के माथे पर दो,
तिलक कुंकुम चंदन के डाल।
अरुण सारथी से पूँछ लूंगा,
शंभुभूषण मामा के भाल।

छाई अँखियन में घटा काली,
उर में प्रणय की प्यास।
श्वांसों में भर दूंगा मलय समीर,
अधरों पर पूर्ण उच्छवास।

चंद्र पर अब लहरायेगा झंडा,
हृदय पर नागिन डोलेंगे।
जो कहते थे पिछड़ा हमको
छाती पीट-पीटकर रोयेंगे।

बंकिम धन्वा पर चढ़ा दूँगा,
कर कुसुम से तीर खींचूंगा।
मदहोश यौवन की नागों पर,
सुंदरता की जंजीर पहना दूँगा।

करुँगा सृजित कल्पित जग को,
उसे बनाऊँगा तुम्हारा आवास।
थोड़ी-सी धरती होगी,
पूरा – पूरा होगा उसमें आकाश।

विचरता मन छानता रहता,
स्वप्न निखिल संसार।
कुछ-कुछ नया लाते,
जिससे कर सकूँ तेरा श्रृंगार।

कुश के अंकुर कभी,
बौरे सिंधुकेशर के फूल।
कमल के पराग कभी,
थोड़े-थोड़े केतकी के धूल।

उतरते सूरज की वधु,
लाली लाज उपनाम।
सिमटी चंद्रिका के अंकों में,
सखी निशा को मान।

निहारती अपलक अपरिचित को,
उर्वशी वल्लभ की ओर।
दिव्य अप्सरा की अँखियों में,
मादकता निहारे चक्षु कोर।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (गीतों का हार।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मोहिनी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Mohini | मोहिनी।

क्षम्य हो मेरा अपराध,
देख तुम्हारी अँखियों का सार।
मन को मोहने वाली हिरणी,
मोहित तो है तुमसे सारा संसार।

हार गया मैं तुमसे,
सुनकर बातें बेगानी थारी।
शब्दों के बाण चला-चला कर तुमने,
घायल कर दिया इस मन हारी।

दूर तक जहाँ नहीं कोई,
जीवन के इस निर्जन पानी।
कहां से आकर तुमने,
छेड़ी ये राग अनजानी।

शान्त शिखण्डी का मैं मारा,
ये नयन रण मेरे लिये असमान।
अकेला लड़ा इस आशय से,
जीत सकूँ मैं सारा जीवन विहान।

अगर पराजित हुआ तुमसे मैं,
तो जीत लूँगा सारा आसमान।
मैं तुमसे जो कर रहा तर्क-वितर्क,
इसमें है मेरी वाणी का समाधान।

तुम ही थी हृदय की पीड़ा,
अंतस् की गुंजन थी तुम बाला।
पढ़ा होगा मेरी आँखों में तुम,
एकाकी जीवन की मेरी हाला।

अपनी कृति देकर इन अँखियों को,
खो न जाना इस निदारुण वन में।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (मोहिनी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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रक्षाबंधन का संकल्प।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rakshabandhan Ka Sankalp | रक्षाबंधन का संकल्प।

प्रेम और विश्वास का प्रतीक,
स्नेह और दुलार बड़ा ही नीक।
अदभुत अनोखा अटूट बंधन,
मस्तक पर धारित तिल चंदन।
जैसे आकाश और गगन,
वैसे भाई और बहन।
जैसे धूप और छाया,
वैसे अदृश्य प्रेम की माया।

सारे जग में सबसे सच्चा,
धागा जिसमें सबसे कच्चा।
पर कच्चा है कमजोर नहीं,
और टूट जाए वो डोर नहीं।
रक्षा के सूत्र से जिसे पिरोया,
पावन धागों में जिसे संजोया।
रक्षा का संकल्प है जिसमें,
तोड़ दे वो दम है किसमें।

सावन का अनुपम त्योहार,
होता भाई बहन का प्यार।
हर भाई का आज है कहना,
खुश रहना वो मेरी बहना।
संकल्प आज दुहराते है,
तुझे सशक्त सबल बनाएंगे।
फौलाद जैसे जीवट बनाएंगे,
ताकि पकड़ न सके कोई तेरा हाथ।

ऐसे दूंगा सदा ही तेरा साथ,
मगर विपरीत परिस्थितियों में,
जब अपनी रक्षा तू खुद करेगी,
धरा तुझपे नाज करेगी।
संकल्प पूरा होगा हमारा,
देखेगा संसार ये सारा।
बहन का आशीष भाई का प्यार,
ऐसा अनुपम है यह त्योहार।
रक्षा का जिसमें गहरा बंधन,
कहलाता है वो रक्षाबंधन।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता रक्षाबंधन के त्योहार के महत्वपूर्ण आदर्शों और भाई-बहन के प्यार को सुंदरता से प्रकट करती है। इस कविता में रक्षाबंधन को प्रेम और विश्वास का प्रतीक कहकर वर्णित किया गया है, जो भाई-बहन के बीच एक सजीव और मजबूत बंधन को दर्शाता है। इसके साथ ही, यह उनके स्नेह और दुलार की महत्वपूर्णता को भी व्यक्त करता है। कविता में बड़े ही अद्भुत और अनोखे बंधन के बारे में बताया गया है, जिसका तिलक चंदन के तिल की तरह मस्तक पर है। इसके साथ ही, आकाश और गगन, धूप और छाया की तरह, भाई-बहन का रिश्ता भी अत्यधिक महत्वपूर्ण और अदृश्य होता है। कविता में दिखाया गया है कि भाई-बहन के रिश्ते में सच्चाई और विश्वास सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, जिसे किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं होने दिया जा सकता है। रक्षाबंधन के सूत्र ने उन्हें मजबूत बनाया है और यह सुनिश्चित करता है कि उनका बंधन कभी नहीं टूटेगा। कविता आगामी वर्षों में भी भाई-बहन के प्यार के महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य में उनकी आपसी समर्थन और आशीर्वाद की महत्वपूर्णता को दर्शाती है। कविता के अंत में, भाई का सदैव उसके साथ रहने का आश्वासन देते हुए, बहन को उसकी स्वयं रक्षा करने की साहस दी जाती है, जिससे धरती भी गर्वित होती है। कुल मिलाकर, यह कविता रक्षाबंधन के त्योहार के माध्यम से भाई-बहन के अदृश्य और अटूट प्रेम का संदेश देती है, जिसका रंग और महत्व हमारे संबंधों को बढ़ावा देने में आता है।

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यह कविता (रक्षाबंधन का संकल्प।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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पूर्व जन्मों के पुण्य का फल है काशी दर्शन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kashi Darshan | पूर्व जन्मों के पुण्य का फल है काशी दर्शन।

Kashi Darshan is The Result of Virtues of Previous Births

काशी की सरजमीं निराली है, काशी का हर कंकर शंकर है, प्रत्येक घर गर्भगृह है, हर एक चौराहा किसी न किसी देवी देवता का चौराहा है। संस्कृत शिक्षा का एक प्रधान केन्द्र रहा है। विविध रीति-रिवाज, धर्म एवं विविध भाषाओं के जानने वाले वेष-भूषा को धारण करने वाले वाराणसी में रहते हैं, आते जाते रहते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि काशी वैदिक काल से पूर्व की नगरी है।

यहाँ शिवोपासना को पूर्व वैदिककालीन माना जाता है। यद्यपि हरिवंशपुराण में राजा ‘काश’ का नाम काशी को बसाने में आया है जो भरतवंशी रहे। यह मुक्त तथा मुक्तिधाम है। यहाँ गुप्त काल के पूर्व यक्ष पूजा, नागपूजा के साथ-साथ शिवपूजा अवश्य होती थी। गुप्तकाल से शिव उपासना में काफी वृद्धि हुई, जो उत्तरोत्तर बढ़ती गई। बनारस महादेव का महानगर है। यह एक नगर ही नहीं एक संस्कृति है।

प्राचीनकाल से ही संस्कृत का केन्द्र है — काशी

बनारस ईंट-पत्थरों का नगर ही नहीं अपितु इतिहास है जो ऐतिहासिक नगर के रूप में जाना जाता है। यह संसार प्रसिद्ध विद्वानों का गढ़ है। प्राचीनकाल से ही आर्य धर्म और संस्कृत का केन्द्र है। यहाँ की संस्कृति और धर्म प्राचीन काल से ही विद्वानों के कारण सुरक्षित संजमित है। काशी भारत का एक अंग है। भारत आध्यात्मिक संस्कृति की उदय भूमि है।

मनुष्य के अंदर अपनी जाति के प्रति जब से मोह उत्पन्न हुआ तभी से वह पूर्ण जानकारी हासिल करने का प्रयत्न करना चाहा और चेतन अचेतन मन से जाने-अनजाने अनगिनत क्रियाएँ जानकारी करने के लिए करता आ रहा है। वह वैदिक काल से ही इस कार्य में तत्परता पूर्वक लगा हुआ है।

मानवशास्त्र, इतिहास, समाजशास्त्र, पुराण एवं साहित्य को टटोलने से लगता है कि वह ठीक ही कर रहा है, कारण समाज और सामाजिक गतिविधियों का यह भी दर्पण है। इसी के बल पर भविष्य की पीढ़ी भविष्य का सांस्कृतिक और सामाजिक निर्माण करेगी। प्रांतीयता के भेद-भाव से रहित काशी प्रत्येक व्यक्ति को संस्कृत भाषा का अध्ययन अध्यापन कराता है।

भाषा विज्ञान के आचार्यों की माने तो हिंदी साहित्य का मूल स्थान काशी ही है। पुराणादि जातकों द्वारा गंगा के तट की बस्ती प्राचीन प्रमाणित है आज तो पड़ाव क्षेत्र से सामने घाट काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक बस्ती अगाध रूप से बढ़कर बसी है परन्तु डॉ. मोतीचंद ने लिखा है कि 500-600 वर्ष पहले गंगा के किनारे आज के समान निवास स्थान नहीं थे।

किनारे के भवनों में सबसे प्राचीन मानमंदिर, बूँदी के महल तथा कुमार स्वामी के मठ आते हैं। इसकी पुष्टि जेन्स प्रिसप नामक अंग्रेज के लेखों के आधार पर की गई है। आठवीं शताब्दी में अस्सी घाट पर शंकराचार्य द्वारा ‘दक्षिणामुखी’ शंकरमूर्ति तथा देवस्थान थे। यहाँ यात्रियों के रहने का प्रमाण मिलते हैं।

कुछ अभिलेखों में काशी की गलियों ‘वाररामाभिरामा’ बताया गया है। गंगा का सामीप्य और धर्म साधना में शांति थी। मुगलों के समय आक्रमणों से बचने हेतु हिंदू वन एवं पानी का सहारा पाकर गंगा के किनारे बसते थे। भारतीय मनीषियों ने माना कि धर्म ही मानव जाति को पशु से ऊपर उठाने में, सक्षम सिद्ध होता है यथा —

धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः

धर्मपालन का तात्पर्य सत्य, अहिंसा, परोपकार, क्षमा और अमूल्य मूल्यों का जीवन में पालन करना है। मिथ्या भाषण, हिंसा, लोलुपता, आलस्य का शिकार न होना। सही अर्थों में पुरुषार्थ (पुरुष वा स्त्री) मोक्ष है। भारतीय मानव की मेधा शक्ति दोलायमान नहीं रही वह निर्धारित लक्ष्य की तरफ अविचल अविरल निष्ठापूर्वक अग्रसर होती रही है। जीवन को टुकड़ों में बाँटने के बजाय चारों तरफ से घेरना ही भारतीय संस्कृति रही है। काशी की गणना अंगुत्तर निकाय में 16 महाजनपदों में की गई है। भारती की प्राचीनतम् सांस्कृतिक राजधानी का गौरव आज भी काशी को ही प्राप्त है। शंकराचार्य ने काशी में अनुभव किया कि ‘अन्नमयदेह शूद्र है चैतन्य आत्मा ब्रह्मभाव है।

काशी का ऐतिहासिक व्यक्तित्व विराट

यहाँ की मिट्टी में गौतम बुद्ध का राम से विराग मिलेगा तो वहीं शंकर का वेदांत निनाद, कबीर का अलमस्त फक्कड़पन तो तुलसीदास जी का सगुणी रामधुन प्रसाद और मुंशी प्रेमचन्द की साहित्यिक आराधना का संसार तो भारतेंदु की साहित्य सर्जना का विपुल विश्व। काशी में ठुमरी, ध्रुपद, धमार और खयाल अलौकिक आलाप और दूसरी तरफ सितार, सरोद, शहनाई, तबला, पखावज और सारंगी, बासुरी का स्वर संतुलन भी, नर्तन लहरियाँ बनारस के परंपरा में परिवकर्तन भी यहाँ देखे जा सकते हैं। काशी का ऐतिहासिक व्यक्तित्व विराट है।

यह लौकिक और पारलौकिक भी है, भौतिक और आध्यात्मिक भी है, शृंगारी, श्मशानी, पतितपावनी, पतित पालिनी भोगी, परमयोगी, अनुरागी और विरागी है। भूमि का प्रभाव मस्तिष्क पर वैज्ञानिक मान्यता है। यहाँ का औसतन तापमान 65 डिग्री से 75 डिग्री फारेनहाइट। 85 से 95 डिग्री फा० जनवरी से मई तक रहता है। हिंदू मध्ययुग की सभ्यता आज भी यहाँ विद्यमान दिखती है। लकड़ी के खिलौने, पत्थरों पर नक्काशी के मकान, मंदिर तोरण द्वार, पीतल के बर्तन, सोने व चाँदी के विविध आकार-प्रकार के गहने, रेशमी वस्त्र, कीम खाना आदि प्रमुख हैं।

धरना प्रथा — गृहकर के विरोध में धरने

बनारस में 1781 में अदालत कायम हुई इसके पूर्व में धरना प्रथा चरम पर थी। ब्राह्मण छूरा व विष लेकर किसी के भी दरवाजे पर बैठ जाते थे। हिंदुओं का उस समय तक पूर्ण विश्वास था कि ब्रह्महत्या से बढ़कर कोई पाप न था। यद्यपि आज भी मान्यता है फिर भी हत्याएँ हो रही हैं जो खेद का विषय बना हुआ है। एक बार तीन लाख लोग मुँह लटकाकर गृहकर के विरोध में धरने पर बैठ गये। खेती का कार्य प्रभावित होने, दुर्भिक्ष पड़ने के डर से बरसात की कमी से मुसीबत आ गई अंत में गृहकर नहीं लगा, प्रशासन को अपने आदेश से पीछे हटना पड़ा था। यह घटना 1810 की है जब अंग्रेज शासन का उस वक्त गवर्नर जनरल कलकत्ते में बैठता था। काशी की 20-30 हजार जनता सामानों से सजकर कलकत्ता जाने लगी, बीच में ही गृहकर खत्म होने से वापस आ गई थी।

भक्ति साहित्य का सूत्रपात

भक्ति साहित्य का सूत्रपात काशी से ही हुआ स्वामी रामानन्द के शिष्य कबीर, रैदास (निर्गुण) तता तुलसीदास जी (सगुण) साहित्य यही से पूर्ण किए। मानस की रचना सं. 1631 में अयोध्या से प्रारम्भ हो काशी में पूर्ण हुई। तुलसी की चरण पादुका तुलसी कंठी तुलसी मंदिर काशी में प्रमाण स्वरूप है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में काशी पृथ्वी के सब अंशों से अलग है अतएव काशी तीनों लोकों से न्यारी नगरी है।

गुप्तकाल में यहाँ पाठशाला थी, इस पाठशाला के कुछ अध्यापक वैष्णव थे। यहाँ तीनों वेद पढ़ाये जाने का प्रबंध था। यहाँ धातुओं के चमचमाते चमकते कलश विविध प्रकार की ध्वजा पताका ऊँचे-ऊँचे गुंबदों पर गरिमा को बढ़ाते रहते हैं। काशी कैलाश शिखर का स्वरूप है। काशी के विद्वानों के सहयोग से विविध अवसर पर पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ जो अपने आप में अद्वितीय है।

पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन

1867 ई. में शुभारंभ ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका का जिसे साहित्यिक पत्रकारिता युग के रूप में माना गया। 15 अक्टूबर 1873 ई. को हरिश्चंद मैंगजीन मासिक पत्रिका प्रकाशित हुई जो डा. इ.जे. लाजरस के मेडिकल हाल प्रेस में छापी जाती थी। 1875 में काशी पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका काशी के रईस शिक्षक बाबू बालेश्वर प्रसाद द्वारा संपादित की जाती थी। 3 मार्च 1884 ई. को ‘भ्रत जीवन’ नामक समाचार पत्र काशी से प्रकाशित हुआ जो पहले साप्ताहिक पुनः दैनिक कर दिया गया। काशी में आज, संसार, सन्मार्ग, गाण्डीव, रणभेरी आदि का प्रकाशन किया गया था। जो आजादी के आसपास के पत्र-पत्रिकाओं में से आजादी की गाथा बयां करते रहे हैं।

1893 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना के बाद 1896 ई. में नागरी प्रचारिणी पत्रिका प्रारंभ हुई। यह पहले मासिक बाद में त्रैमासिक हो गई। 1916 ई. तक सरस्वती का संपादन द्विवेदी जी ने किया। 1909 में इंदु का काशी से प्रकाशन हुआ यह सरस्वती पत्रिका के शब्दा नुशासन से अलग हटकर छायावादी कवियों के विकास हेतु प्रकाशित हुआ।

11 फरवरी 1932 में बाबू शिवपूजन सहाय ने पाक्षिक पत्रिका जागरण का प्रारम्भ किया, इसके संपादक साहित्यकार विनोद शंकर व्यास के छोटे भाई प्रमोद शंकर व्यास रहे। यह छः मास तक चली पुनः प्रेमचंद ने ले ली और साप्ताहिक प्रकाशन होने लगा।

1930 में ‘हंस’ नामक कहानी पत्रिका से प्रारम्भ होकर प्रेमचंद ने मासिक बनाया अंत में धनाभाव के कारण प्रख्यात कथाकार के. एस. मुंशी 1935 में संयुक्त रूप से प्रकाशन प्रारंभ किया। उपरोक्त प्रमुख पत्रिका काशी से प्रकाशित होती रही है। बाद में विविध पत्रिकाओं का प्रकाशन काशी से होने लगा है।

काशी अनेकता में एकता का संसार है। कृत पुरुषों विद्वानों का जन्मदाता है, साहित्यिक मनीषियों से भरापूरा भूभाग है। आपत्तिकाल में उग्र क्रांति की लहर का संवाहक है। यहाँ के पूर्व में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं को युगबोध की कसौटी पर कसने पर पूर्णतया खरा उतरते हैं।

नव साहित्य का जन्मदाता संस्कृति का संवाहक है। विविध रंगमंच का प्रणयन कर सामाजिक उद्देश्यों को मान्यता प्रदान करता है। परिणाम स्वरूप अभिनय योग्य नाटक लिखे गये। काशी दर्शन महान दर्शन है। काशी में चरण, पुण्य के पूर्वजन्म के प्रताप से ही पड़ते हैं। आइये एक बार काशी का दर्शन करें।

मुक्ति जन्म महिं जानि।
ज्ञान खानि अघ हानि करि॥
जहँ बसि शंभु भवानी।
सो काशी सेइय कस न॥

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यहाँ शिवोपासना को पूर्व वैदिककालीन माना जाता है। यद्यपि हरिवंशपुराण में राजा ‘काश’ का नाम काशी को बसाने में आया है जो भरतवंशी रहे। यह मुक्त तथा मुक्तिधाम है। यहाँ गुप्त काल के पूर्व यक्ष पूजा, नागपूजा के साथ-साथ शिवपूजा अवश्य होती थी। गुप्तकाल से शिव उपासना में काफी वृद्धि हुई, जो उत्तरोत्तर बढ़ती गई। बनारस महादेव का महानगर है। यह एक नगर ही नहीं एक संस्कृति है।

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यह लेख (पूर्व जन्मों के पुण्य का फल है काशी दर्शन।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सारंग – सुमन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Sarang – Suman | सारंग – सुमन।

हे अचले! तेरे तारक सारंग,
ये सृष्टि के धवल मुक्ताहार।
दीप बागों के उज्जवल धवल,
जिससे है वन जुगनू सुकुमार।

मेरी कोमल कल्पना के तार,
तरंगित उत्साहित उद्भ्रांत।
हृदय में हिल्लोर करते रहते,
भावों के कोमल-कोमल कान्त।

नालों-नालों की ज्योति,
जगमग उर्मि पसार।
ज्योतित कर रहे आज,
किसलिए कालिमा का संसार।

ये परियों का सुंदर-सा देश,
मृदुहासों का मृदुलमय स्थान।
दिव्य ज्योत्स्ना में घुल-घुलकर,
दिखता जैसे हो अम्लान।

मोहक तरंगिणी ने धो-धो कर,
हिम उज्जवल कर लिया परिधान।
आओ चलें प्रकाशित वन में,
खोजे ज्योतिरिंगण वो अनजान।

मलय समीरों के मृदुल झोंकों में,
कतिपय कंपित डोल-डोल।
अंतर्मन में क्या सोच रहा,
अनबोले रह जाते मेरे बोल।

स्वयं के ‘परिमल’ से सुशोभित,
निज की अपनी ज्योति द्युतिमान।
मुग्धा-से अपनी ही छवि पर,
निहार पड़े स्रष्टा छविमान।

खुद की मंजुलता पर अचम्भित,
देखे विस्मित आँखें फाड़।
खिलखिलाते फूल-पल्लवों को देख,
आत्मीयता से नयनों को काढ़।

सृजित हो रहे स्वर्ग भूतल पर,
लुटा रहे उन्मुक्त विलास।
अग्नि की सुंदरता का सौरभ,
सुमन-सारंग का उल्लास।

कवि का स्वप्न सुनहला,
देखे नयन ये बार-बार।
हर पंक्ति-पंक्ति में रच डाली,
नयनों की देखी साभार।

अनन्त के क्षुद्र तारे तो दूर,
उपलब्धि के गहरे-गहरे पात।
देव नहीं हम मनुजों की,
प्रियतम है अवनी का प्रान्त।

बीते जीवन की वेदनाएं,
अम्बा की चिन्ता क्लेश।
वादी में सृजित किया तूने,
मंजुल मनोहर आकर्षक देश।

स्वागत करो अरुणोदय का,
स्वर्णिम शीशों पर पुष्कर विहार।
विश्राम करे धवल तमस्विनी,
आँचल में सोते हैं सुकुमार।

कितनी मादकता है बसी यहां,
कुंडा-कुंडा है छन्दों का आधार।
पुष्पों के पल्लव-पल्लव में बसा,
सुरभि सौरभ सुगंध का भार।

विश्व के अकथ आघातों से,
जीर्ण-शीर्ण हुआ मेरा आकार।
अश्रु दर्द व्यथा वेदना से,
परिपूरित है मेरा जीवन आधार।

सूख चुका है कब से,
मेरे कलियों का जीवात्म।
हृदय की वेदना कहती है,
बचा विश्व में बस पयाम।

इक-इक पंक्ति से बन गई,
मेरी कविता का संसार।
लेखनी को घिस-घिस कर,
उद्धृत किया अपना संस्कार।

आशा के संकेतों पर घूमा,
सृष्टि के कोने-कोने हाथ पसार।
पर अंजलि में दी ‘दुर्गा’ ने,
आत्म तृप्ति का उपहार।

छोटे से जीवन के इस क्षण में,
भरा अंतस् कण-कण में हाहाकार।
भरत-भूमि तेरी सुंदरता पे,
खड़ा सारंग-सुमन तेरे द्वार।

इक पल के मधुमय उत्सव में,
भूल सकूँ अपनी वेदना हार।
ऐसी हँसी दे दो दाता मुझको,
नित दे सकूँ सबको हँसी बेसुमार।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (सारंग – सुमन।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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हिन्दी हिन्द का गौरव है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hindi Hind Ka Gaurav Hai | हिन्दी हिन्द का गौरव है।

हिन्दी हैं हम हिंदुस्तानी, न कि अंग्रेजों की संताने हैं।
हिन्दी सीखो, हिन्दी लिखो, अंग्रेजी आखर बेगाने हैं।

हिन्दी हिन्द का गौरव है, हिन्दी से सबकी पहचाने हैं।
हिन्दी छोड़ के अंग्रेजी में, क्या लाल, फन्नेखा बनाने हैं?

मां की ममता, पिता की क्षमता, है हिन्दी के दरीखाने में।
फिर भी न जाने क्यों होड़ लगी है, अंग्रेजी की जमाने में?

सदियों का ज्ञान छुपा है, हिन्दी की पढ़ाई – लिखाई में।
हम है कि लगे पड़े हैं, नित दिन अंग्रेजी की ही बड़ाई में।

लग जाओ अभी भी आओ, हिन्दी की पढ़ाई लिखाई में।
वरना फिर तो वक्त लगेगा, हुए नुकसान की भरपाई में।

मां के दूध से भूख न मिटे, क्या मिटेगी मौंसी के पिलाने से?
दूध का बिगड़ा फिर कहां सुधरेगा, दाल रोटी के खिलाने से।

अंग्रेजी आज की जरूरत है जी, कुछ न होगा हिले बहाने से।
घर को बिगड़ने के बाद क्या होगा, फिर रूठी बहु मनाने से?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में हिन्दी भाषा के महत्व को उजागर किया गया है। लेखक ने अंग्रेजी भाषा के प्रति लोगों के मनोबल की कमी को दिखाया है और हिन्दी के महत्व की बढ़ती हुई आवश्यकता पर चिंता व्यक्त की है। कविता में हिन्दी की महत्वपूर्ण भूमिका और उसके लोगों के जीवन में क्यों बनी रहनी चाहिए, इसे प्रकट किया गया है। व्यक्ति को हिन्दी भाषा के प्रति समर्पित रहने की आवश्यकता को उत्कृष्ट ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिससे वह आगामी भविष्य के लिए भी अपनी मातृभाषा का सम्मान कर सके।

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यह कविता (हिन्दी हिन्द का गौरव है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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चंद्र विजय।

Kmsraj51 की कलम से…..

Chandra Vijay | चंद्र विजय।

आज विक्रम चंद्रमा पर,
सुरक्षित उतर आया।
भारत का चंद्रयान मिशन 3
सफल हो पाया।

जिस मिशन को पूरा करने में,
बड़ी-बड़ी शक्तियां रही असफल।
भारतीय वैज्ञानिकों ने आज तिरंगा,
फहराकर किया सफल।

चंद्रमा के अब
भारत जान पाएगा राज।
खुशियों का माहौल
बना है पुरे भारत में आज।

♦ विनोद वर्मा जी / जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में व्यक्त किया गया है कि चंद्रमा के स्पेस मिशन के माध्यम से भारतवासियों ने अपने वैज्ञानिक और तकनीकी योगदान के साथ दुनिया के स्तर पर अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाई है। वे चार देशों को संदर्भित कर रहे हैं, जो चंद्रमा पर मानव अभियान का आयोजन कर रहे हैं। हम संसार के उस देश के गौरवशाली नागरिक हैं, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सबसे पहले पहुंचे है। कविता का समापन भारत के वैज्ञानिक प्रगति को और उनके अंतरिक्ष मिशन को संकेतित करता है, जो दुनिया भर के लोगों की नजरों में होगा।

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यह कविता (चंद्र विजय।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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धागा प्रेम का।

Kmsraj51 की कलम से…..

Dhaga Prem Ka | धागा प्रेम का।

आज वह धागा प्रेम का ओ बहना, तुम जरूर पहनाना।
हर भाई को अपने बहन होने का, एहसास जरूर कराना।

इस नफ़रत भरे मतलबी दौर में, रिश्तों की रसम निभाना।
महज रसम न रखना ओ पगली, राखी का भाव जगाना।

वासना के बाजारों से पुरुष को, प्रेम के घर को ले आना।
कामुकता की खीर ठुकरा बहना, प्रेम का लड्डू खिलाना।

अपने पति के सिवाए पगली, हर नर की बहन बन जाना।
वरना तो तृष्णा में डूब जाएगा, ओ शालीनें! यह जमाना।

बहन भाव का उपहार ही मांगना, और न कुछ ले जाना।
तू भी भाई को कुमकुम का नहीं, भ्रातृत्व तिलक कराना।

महज की रसमों ने शुरू किया है, रिश्तों को पंगुन बनाना।
यह भाई बहन का रिश्ता है पगली! कमजोर न इसे कराना।

नशों दलदल से बाहर ला कर, तू भाभी को भाई लौटाना।
भगनी आलिंगन के जल से, भाई के दिल का मैल धुलाना।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में प्रेम और भाई-बहन के आपसी संबंध की महत्वपूर्णता पर बल दिया गया है। रिश्तों की अनमोल भावना को जीवंत रखने की बात कही गई है, जहाँ राखी के पीछे छुपे भाव का महत्व बताया गया है। व्यक्ति को कामुकता के प्रति नहीं, बल्कि प्रेम के प्रति आकर्षित होना चाहिए। भाई-बहन के आपसी संबंध में मात्र रसमों से ज्यादा अपनत्व का प्रेम होता है और इसका सार कोई कमजोर नहीं कर सकता। अपने पति के आलावा, प्रत्येक पुरुष को हर औरत व लड़की को अपना भाई समझना चाहिए। भाई-बहन के प्रेम का मूल्य उपहारों से अधिक होता है और भाई को कुमकुम नहीं, बल्कि भ्रातृत्व का तिलक पहनना चाहिए।

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यह कविता (धागा प्रेम का।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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रक्षाबंधन।

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Raksha Bandhan | रक्षाबंधन।

भाई-बहन का प्यार,
लेकर आया राखी का त्योहार।
राजा बलि ने रखी, रक्षा सूत्र की मान,
लक्ष्मी जी के खातिर,
विष्णु जी को विदा किया स सम्मान।

भाई के सुख के लिए,
बहन कष्ठ से लड़ जाती है।
कच्चे होते रेशम धागे,
मजबूत डोर बन जाती है।

बहन-भाई के रिश्ते जैसा,
कोई न दूजा रिश्ता होता।
कष्ठ में गर बहन हो,
सिसक-सिसक कर दुख में भाई रोता।

बहन प्यारी तू सबसे न्यारी,
कभी न आए आंसू तेरी आँखों में।
मांगू मैं यह वरदान,
मेरी बहन छुए आसमाँ।
यही है मेरे दिल का अरमान,
बाँधा है धागा, बहन ने तुझको,
वचन दो रक्षा करने का।

मुँह कराया मीठा तेरा,
रिश्तों में मिठास रखने का।
“भोला” भैया का है कहना,
राखी बांधो मेरी प्यारी बहना,
हमेशा खुश रहना मेरी बहना।

इस भाई को राखी बाँधना भूल न जाना,
भगवान सबको बहन दे।
राखी का त्योहार मनाने को,
हर बहन को भाई मिले,
रक्षा का वचन निभाने को।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में राखी के त्योहार के माध्यम से भाई-बहन के प्यार और आपसी संबंधों का महत्व दर्शाया गया है। कविता में बताया गया है कि राजा बलि ने राखी बांधकर अपने सम्मान का प्रकटीकरण किया था और विष्णु जी को स सम्मान विदा किया। कविता दर्शाती है कि भाई के सुख के लिए बहन कठिनाइयों का सामना करती है और उसका साथ देती है। राखी के माध्यम से भाई-बहन के प्यार का अद्भुत महत्व और अनमोलता प्रकट होती है और इस रिश्ते की मित्रता और समर्पण की महत्वपूर्णता पर भी ध्यान दिलाती है। कविता के अंत में यह कहा गया है कि भाई को राखी बांधने की परंपरा को भूलने नहीं चाहिए और भगवान से सभी को बहन की प्राप्ति हो।

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यह कविता (रक्षाबंधन।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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रिश्तों के मायने।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rishton Ke Mayne | रिश्तों के मायने।

न जाने कहाँ खो गए वो स्नेहमयी रिश्ते।
अच्छा -बुरा समझाने वो बड़े-बूढ़े फरिश्ते।

सँयुक्त परिवार में वो रिश्तों की अठखेलियां।
अपनापन दर्शाती वो प्रेमभरी पहेलियां।

एक शर्म एक हया का पर्दा होता था तब।
न जाने खो गया वो पर्दा कहाँ अब।

माता-पिता के आमने-सामने नहीं होते थे बच्चें।
बहुत भोले और दिल के होते थे वो बहुत ही सच्चे।

रिश्तों की बुनियाद होती तो सबमें दिखता भाईचारा।
चाचा-ताऊ के डर से न होते घर के बालक आवारा।

वो दादी, चाची, ताई का भी मिलता था प्यार।
माँ की प्रीत संग वो प्रेम बढ़ता बेशुमार।

चिंता नही होती थी न कोई थी फिक्र किसी बात की।
न लड़ाई-झगड़े की, न ही किसी दुख की रात की।

परिवार बड़े होने के साथ-साथ रिश्तों से थे भरपूर।
बुआ-फूफा का प्रेम देने में रिश्ता भी होता मशहूर।

काश! लौट आये घरों में वो प्रेम भरे रिश्ते खास पुराने।
फिर से परिवारों में खुशियों की किलकारियों के बन जाये बहाने।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में बताया गया है कि परिवार में नाजुक और स्नेहमय रिश्तों की महत्वपूर्णता को कैसे समझने की आवश्यकता है। यह कविता उन पुराने समय के सँयुक्त परिवार के रिश्तों की याद दिलाती है जिन्होंने हमारे जीवन को सजाया है और उनके अब अदूर होने पर विचार कराती है। कविता में उन परिवारिक रिश्तों की महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन होता है जो हमारे जीवन को खास बनाते हैं। कविता के अंत में एक ख्वाहिश व्यक्त की जाती है कि पुराने प्रेमपूर्ण रिश्तों को दोबारा जीवन में बसाने की जरुरत पुनः है।

—————

यह कविता (रिश्तों के मायने।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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