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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2023-KMSRAJ51 की कलम से

यह क्या हो रहा है?

Kmsraj51 की कलम से…..

Yah Kya Ho Raha Hai? | यह क्या हो रहा है?

बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यह आज समाज में हो क्या रहा है? मुद्दा आज सता पक्ष और विपक्ष की तू – तू मैं – मैं का नहीं है। मुद्दा है तो वह है देश की बहू बेटियों की असमत का।

वह चाहे मां – पत्नी हो या बहु हो या फिर बेटी,
दुख यह है कि क्यों की जा रही है उसकी अनदेखी?

साथियों यह भयानक मंजर हमने मीडिया में बड़े स्तर पर निर्भया मामले के समय देखा था। पूरा देश उस आक्रोश में उबल गया था। विपक्ष ने हवा को तूल दिया और सत्ता पक्ष ने कड़े कानून बनाने और दोषी को तुरन्त कड़ी सजा दिलाने का आश्वासन दिया। हम सब जानते हैं कि निर्भया मामले में दोषियों को सजा दिलाने तक का सफर कैसा रहा और कितना लम्बा रहा? ऐसा नहीं है कि इससे पूर्व बहू बेटियों के साथ कोई बलात्कार नहीं हुए थे। पर यह मामला पहली बार मीडिया में राष्ट्रव्यापी स्तर पर इस तरह से भटका था कि पूरे देश की आत्मा ही जैसे जाग उठी थी।

पर सवाल यह है कि क्या फिर ऐसी वारदातें होना बंद हो गई? यूपी के हाथरस की घटना हम कहां भूले हैं? रात के अंधेरे में ही दाह संस्कार हमे याद है। क्या पश्चिम बंगाल में हुई हिंसात्मक घटनाएं देश को शर्मसार नहीं करती? हाल ही में राजस्थान के अलवर में नाबालिग लड़की के साथ शादी और उसके साथ उसके ससुर, नंदोई और जेठ द्वारा पति की सहमति से सामूहिक बलातकार तब तक करना, जब तक वह बेहोश नहीं हो जाती। अब मणिपुर में महिलाओं के साथ एक घिनौना कुकृत्य दिन दहाड़े समाज द्वारा पुलिस की मौजूदगी में किया जाना। इधर हिमाचल में समाज के ही सामने युवतियों के साथ छेड़छाड़ और मार पीट।

मित्रों शर्मिंदगी राजनैतिक पार्टियों की कारगुजारी और बयानबाजी पर नहीं बल्कि समाज की कुत्सित सोच पर होती है। आखिर क्यों समाज इस कदर खुदगर्ज और मूक दर्शक तथा भीरू होता जा रहा है कि हकीकत को अपनी आंखों से देख कर भी वह अपना मुंह मोड़ कर वहां से इस कदर से निकल जाता है कि जैसे उसने कुछ होते हुए ही नहीं देखा?

सवाल सत्ताधीशों से भी है कि वे भी अपनी शक्ति का दुरुपयोग आखिर क्यों करते हैं? शायद यह हमारी कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली की कमजोरी को भी दर्शाता है।कानून में कई हथकंडे और लम्बे दौर तक चलती न्यायिक प्रक्रिया तथा कई मामलों में राजनैतिक संरक्षण अपराधियों के हौसलों को बुलन्द करता रहता है कि क्या होगा। जो भी होगा देखी जाएगी। कोर्ट में निपट लेंगे।

सबसे बड़ी चिन्ता तो समाज की पढ़ी-लिखी स्त्रियों के समुदाय की होती है कि वे अपने साथ हो रहे अन्याय में स्वयं ही एक जुट नहीं है। वे खेमों में और राजनैतिक दलों में विभाजित हो कर कई बार पक्ष-विपक्ष में वाद – विवाद प्रतियोगिता करती हुई नजर आती है। मेरा निवेदन उन सभी माताओं बहनों से है कि ऐसे मुद्दों में न ही तो हमे राजनैतिक दलदल में वोटों के नफे नुकसान में पड़ना चाहिए और न ही समाज को बांटने वाली विचारधारा का समर्थन करना चाहिए। ऐसे मुद्दों पर राजनीति, जाति, धर्म, सम्प्रदाय इत्यादि समाजगत कुत्सित भावबोधों से ऊपर उठ कर राष्ट्र की मानव समाज वाली भावना से काम करना चाहिए।

  • बेटी या औरत कोई भी हो और किसी भी जाति धर्म सम्प्रदाय इत्यादि की हो, वह हमारे देश की मातृ शक्ति है। उसके शील की रक्षा करना हमारा सामूहिक दायित्व है। यह माना कि कई मुद्दों पर महिलाएं भी गलत हो सकती है। पर जो ये घटनाएं ऊपर मैने गिनाई है। ये सब महिलाओं के साथ हुए घोर अन्याय और समाज की कुत्सित मानसिकता की उदाहरण है।
  • बंधुओ और भगनियों यह बात याद रखना कि दूसरों के घरों में लगी आग को बुझाने में जो लोग मदद नहीं करते बल्कि उससे अपनी रोटियां सेंकने का काम करते हैं। उन्हे यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे घर भी यहीं नजदीक है। कहीं यह आग भड़क कर हमारे घर को भी न लील जाए।
  • आज किसी दूसरे की बहू बेटी के साथ किसी दूसरे के उन्मत बेटों ने गलत किया है और कल को यही घटना हमारी बहु – बेटियों या मां – पत्नियों के साथ भी हो सकती है और हमारे बेटे भी उन्मत हो कर ऐसी घटनाओं को मिलकर अंजाम दे सकते हैं।

इसलिए समाज को अपने दायित्व को समझना होगा। सोशल मीडिया और फिल्मी दुनियां के ऐसे अपराधिक दृश्यों का बहिष्कार करना चाहिए, जो युवा पीढ़ी को गलत करने के आइडिया देते हो।

जातिवाद, धर्मवाद और संप्रदायवाद के नाम पर समाज में नफरत फ़ैलाने वाले हर जाति – धर्म और सम्प्रदाय के व्यक्तियों को कड़े से कड़े कानून बनाकर कड़ी सजा का प्रावधान करने की मांग करनी चाहिए। फिर वह आग चाहे वोट के लिए भड़काई जाए या फिर किसी अन्य कारण से। एक व्यक्ति भड़काए या फिर कोई पूरा समुदाय।सामूहिक सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए। यह भीड़ तन्त्र तो फिर समाज की कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाता ही रहेगा, यदि इस व्यवस्था पर अंकुश न लगाया गया तो।

हमे समझना होगा कि समाज में मात्र एक ही धर्म कुदरत ने बनाया है, जो है मानव धर्म। दो ही जातियां हैं एक स्त्री और दूसरी पुरुष। उनमें किसी को कोई छूत भी नहीं लगती और न ही कोई अन्य बाधा है। दोनो जातियों को एक दूसरे की कुदरती नितान्त आवश्यकता है और उन्हें कुदरत के नियम का पालन कर के अपने – अपने जाति धर्म का ईमानदारी और सामाजिक मर्यादाओं से पालन करना चाहिए। न ही कोई लड़ाई होगी और न ही तो कोई झगड़ा दंगा – फसाद।

बाकी समाज बुद्धिजीवी है। ये अन्य जाति धर्म और सम्प्रदाय आज पढ़े – लिखे समाज में हमे मिल बैठकर अपने कई निजी स्वार्थों को छोड़ कर राष्ट्र हित में छोड़ देने चाहिए और कुदरत के सनातन नियम की जाति धर्म व्यवस्था को राष्ट्र हित के लिए स्वीकार करना चाहिए। माताओं को अपने साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हो कर सामने आना होगा और पुरुष समाज को भी इसमें महिलाओं का साथ देना चाहिए। क्योंकि नारी किसी भी समाज या राष्ट्र का सम्मान होती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — माताओं को अपने साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हो कर सामने आना होगा और पुरुष समाज को भी इसमें महिलाओं का साथ देना चाहिए। क्योंकि नारी किसी भी समाज या राष्ट्र का सम्मान होती है। हमे समझना होगा कि समाज में मात्र एक ही धर्म कुदरत ने बनाया है, जो है मानव धर्म। दो ही जातियां हैं एक स्त्री और दूसरी पुरुष। उनमें किसी को कोई छूत भी नहीं लगती और न ही कोई अन्य बाधा है। दोनो जातियों को एक दूसरे की कुदरती नितान्त आवश्यकता है और उन्हें कुदरत के नियम का पालन कर के अपने – अपने जाति धर्म का ईमानदारी और सामाजिक मर्यादाओं से पालन करना चाहिए। न ही कोई लड़ाई होगी और न ही तो कोई झगड़ा दंगा – फसाद।

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यह लेख (यह क्या हो रहा है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

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काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

Coordinating Nature Of Kashi | काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

काशी विश्व की प्राचीन नगरी है। बुद्ध की उपदेश स्थली, जैन तीर्थंकर महावीर की धर्म देशना स्थली तथा सुपार्श्वनाथ और जैन पार्श्वनाथ तीर्थंकरो की जन्मस्थली होने के साथ ही काशी रामानन्द, आदि शंकराचार्य, कबीर, रैदास, तुलसीदास विवेकानन्द जैसे महान धर्माचार्यों एवं चिंतकों की कर्म भूमि भी रही है।

विभिन्न पुराणों से विदित होता है कि काशी पहले विष्णुतीर्थ था जो बाद में शिवतीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह प्रधानतः शिव की नगरी रही है। यहाँ के 17वीं से 20वीं शताब्दी ई० के लगभग सभी मंदिर भोलेनाथ शिव को समर्पित हैं। इन मंदिरों में गर्भगृह में शिवलिंग और चारो ओर की भित्तियों पर शक्ति, विष्णु, सूर्य एवं गणेश मूर्तियाँ हैं जो समन्वयात्मक धार्मिक आस्था की साक्षात साक्षी है। इतना ही नहीं काशी में लोक धर्म से सम्बन्धित पक्ष, नाग, वृक्षपूजन की परम्परा रही है। इसे न केवल शिव वरन् काशी में जन्में सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ के मस्तकों पर दिखाये जाने वाले सर्वफलों के रूप में भी देखे जा सकते हैं।

17वीं से 19वीं शताब्दी ई0 के बीच काशी की धार्मिक एवं सांस्कृति समन्वय की भंगिकी आदि केशव से अस्सी तक फैले हुए घाटों की अनवरत श्रृंखला में देखी जा सकती है। घाटों के मंदिरों, मठों और अन्य अवशेषों में पूरे भारतवर्ष का धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप मूर्तिमान हो उठा है।

यदि कहा जाय कि काशी में सम्पूर्ण विश्व सूक्ष्म रूप से विद्यमान है तो अतिश्योक्ति नहीं। मान्यता के अनुसार देश की सभी नदिया, पवित्र स्थल और देवता काशी में निवास करते हैं। मत्स्यपुराण में काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। इसे महाश्मसान, आनन्दकानन और मोक्षदा अर्थात् मोक्ष देने वाली सप्तपुरियों में एक माना गया है। काशी का महात्म्य कुछ ज्यादा ही है तभी तो जब कभी ग्रहण लगता है तो काशी में बहुत भीड़ उमड़ पड़ती है। यद्यपि सूर्यग्रहण में सबसे बड़ा मेला कुरुक्षेत्र का होता है पर चन्द्रग्रहण में काशी में ही यात्रीगण देश के विभिन्न भागों से आने हैं। भविष्यपुराण में लिखा है :

कुरुक्षेत्रसमा गंगा यत्र कुत्रावगाहिता।
कुरुक्षेत्राहशगुणा यत्र विन्धेन संगता॥

काशी प्रधान तीर्थं स्थान है। यह शुद्ध रूप से तपोभूमि है। देवदर्शनल, मंदिरों की रचना और यहाँ के घाटों की छटा ही मुख्य दर्शनीय हैं। यहाँ गंगास्नान की महिमा अवर्णनीय मानी गई है। सर्वत्र गंगा स्नान पूण्यजनक है। वाराणसी (काशी) में गंगा स्नान बारहो मास नेमी लोग करते हैं। काशी की उत्तरवाहिनी गंगा की महिमा काशी यात्रा में सप्तभाग उल्लिखित है। पंचगंगा और परिसर के घाटों, मर्णिकर्णिका घाट एवं दशाश्वमेघ घाट पर प्रातः 3 बजे से ही स्नानार्थी आने लगते हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी में मरने का कोई डर नहीं होता क्योंकि यहाँ तो सभी मृत्यु को अपने पाहुन (अतिथि) की तरह जोहते ही रहते हैं।

यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है।

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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यह लेख (काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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मेरी गुंजन की आवाज हो तुम।

Kmsraj51 की कलम से…..

Meri Gunjan Ki Awaaz Ho Tum | मेरी गुंजन की आवाज हो तुम।

मेरी उन्मत्त प्रीति अकिंचन,
पा लेती है तो पाने को।
मधुर प्रणय की जगी चाह को,
बहला लेती है गुंजन-रागों से।
परन्तु हिय को तृप्त करे जो,
वह अश्रु भरी गागर हो तुम,
श्वांसों की सरगम पुरातन हो तुम।

मेरी प्रीति के संदेशों को,
शांत स्वरों को देती वाणी।
यदि होता संभव तो तुम,
मनोभावों को समझती मेरी।
तेरी अँखियों की नादानी ने,
दे गई पिपासित तप्त मरुभूमि।
हृदय कमल में वासित निर्मल,
नदिया की भावित लहर थी तुम।

सोच-सोच कर थकी कामना,
वेदनाऐं पिपासित हैं।
किस तरह जी की पीड़ा दिखलाऊँ,
दर्पण मेरा टूटा है।
खंडित कर दूँ झिझकों को,
निश्शब्दों में भर दूँ मन की ज्वाला,
मेरे अलकों की परिभाषा हो तुम।

अंचल हो आगर हो निर्झर की बूंदों में,
निर्मल-निर्मल कोमल कविता हो।
दूर गई बिछड़ी मन की डाली से,
दे गई अश्रु की हिचकी मुझको।

कंठों में डाली कंपित माला,
तप्त होती माधुर्य रोम-रोम में।
व्याकुल विवश व्यथा दे डाली,
आकुल हो खोजे कस्तूरी वन-वन,
मेरी आशा की मृगनयनी हो तुम।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (मेरी गुंजन की आवाज हो तुम।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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आहट।

Kmsraj51 की कलम से…..

Aahat | आहट।

हल्की सी आहट कदमों की,
पाकर बदन थिरकने लगते।
उद्विग्न प्रत्याशा जगे नयनों में,
तन पारिजात महकने लगते।

अनिमेष ही नैनों से नैना मिलते,
चक्षु अरुणित से होने लगते।
मधुर मिलन की मादक चाहत,
प्रणय – स्वप्न में खोने लगते।

उत्कंठित अँखियों की आसक्त सी छुवन,
मृदुल-मृदुल अंग-गात दहकने लगते।
आश्वासों में मकरन्द धीरे से घुल कर,
मुखड़े पर लालिमा खिलने लगते।

प्रभात का पद्मराग गालों पर खिलता,
लालिमा बिखराती आभा मंद – मंद।
लाल मणि रुख़ पर किरण बिखराती,
रक्तिम छटा छलकती छंद – छंद।

हृदय – हृदय में सरगम बजती,
तृष्णा बंधती आलिंगन में।
श्वांसों की थापों में खो जाती,
तनु खो जाता दहकते बदन में।

हठ करती हृदय की धड़कन,
इन्द्रियजय तोड़ बहकने लगते।
तमस तरंगों के आँचल में,
सुलगते तन पिघलने लगते।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (आहट।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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ये तो नाइंसाफी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

This is Unfair | ये तो नाइंसाफी है।

बेतरतीब भभकती एक आग को देखा,
उसमें सुलगते नफरत के अंगारे देखे।
हिन्दू – मुस्लिम की उसमें ज्वालाएं देखी,
फिर भी लोगों में आपसी भाईचारे देखे।

कुछ लोग लगे हैं बस सत्ता के लोभ में,
सियासी घी डालकर लपटें भड़काने में।
विविधता में एकता का है मुल्क हमारा,
एक वर्ग लगा है सबको यह समझाने में।

कोई जाति – धर्म के तूफान है उड़ाता,
नफ़रत की लपटें और तेजी से भड़के।
फिर भी खड़ा मजबूती से भारत कैसे?
दुश्मनों के सोच में जैसे प्राण ही लटके।

कई लगे हैं समता की बरसात बरसाने,
वे चले हैं नफरतों की आग बुझाने को।
एक कुनबा भीतर ही भीतर ऐसा भी है,
जो लगा है राष्ट्र हित के मुद्दे दबाने को।

सत्ता समर में गुनहगारों को है मिलती,
हमेशा हम सबने देखी यारो माफ़ी है।
बेगुनाहों को सियासी चाल में फंसाना,
आजाद भारत में ये तो नाइंसाफी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आजकल के कुछ सियासी लोग अपनी जेब भरने के लिए दिखावटी फिक्रमंद बनकर जनता के बीच नफरत फैला रहे है, और आपस में सभी को लड़ा रहे है। हम भारत वासी है, अनेकता में एकता ही हमारी पहचान है। जिस भी भारतीय के अंदर देश प्रेम नहीं वह भारत देश के लिए नासूर के समान है, ऐसे ही लोग आगे चलकर सियासी पद पर पहुंचकर बाहर के देशो में जाकर अपने भारत देश की बुराई करते हैं। हमे ऐसे लोगों को पहचान कर इनके कहे में बिलकुल भी नहीं आना है, क्योकि ऐसे लोग हमे आपस में लड़ाकर अपनी ज़ेब भरते है, हमे ऐसे लोगों से सदैव ही सावधान रहना चाहिए। हम सभी को आपस में मिलजुलकर अपने भारत देश की उन्नति में हमेशा योगदान देना चाहिए, तभी अपना देश तेज गति से आगे बढ़ेगा। जय हिन्द!

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यह कविता (ये तो नाइंसाफी है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Satya Sanjivani Kashi of Truths | सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

काशी, गंगा और महादेव संपूर्ण भू भाग पर यदि कहीं अवस्थित हैं तो वह मात्र काशी पुण्य परिक्षेत्र में ही, अन्यत्र अविज्ञात है। काशीपुरी में धर्म-अधर्म अक्षुण्ण होता है। यह आनंदकानन अविमुक्त महाक्षेत्र है। काशी का माहात्म्य वैदिक एवं स्मार्त है। अतएव काशी में —

अब पुनि पुनि कलम उठायेंगे।
काशी ! रहि रहि गुन गायेंगे॥
लाख लताड़त शिव आयेंगे।
काशी करवटऽ सुनायेंगे॥

  • हिमालय पुत्री मां गंगा काशी में उत्तराभिमुख अविरल बहती है, जिसे ‘मुदिता’ कहा गया है। गंगा पितृ मुख होने से मुदित रहती है और शिव (पति) का सान्निध्य पाकर आह्लादित होती है शायद यही कारण है कि शिव ब्रह्म को काशी बड़ी प्रिय लगती है। शास्त्रों में वर्णन है कि नारायण की आराधना से प्रसन्न होकर परम शिव द्रवीभूत हो गये। वह ब्रह्माद्रव्य युक्तिकाशी भू पर स्थित होकर भी भू से पृथक है। जहाँ शंकरपूजन और शिव के मधुर गान से शिव ब्रह्म प्रसन्न होकर इच्छित वर प्रदान करते हैं, वहीं शैलपुत्री देवी सौभाग्य सुख प्रदान करती हैं।
  • काशी में भक्तों की मनोरथदात्री भवानी ही स्थिर वास करने देती है और भवानी ही काशीवासियों का सदा योगक्षेम करती हैं। भिक्षुक को काशी में मोक्षा काशी भिक्षा प्रदान करने वाली विश्वेश्वर की कुटुम्बिनी काशीवासियों को मोक्ष की भिक्षा प्रदान करती हैं, ओंकार का उच्चारण कराती है। ऊं शांतिः शान्तिः शान्तिः हृदयस्थ कराती है। अतएव इनकी सेवा करनी चाहिए, सेवा से प्रभु मुदित होते हैं। काशीवासियों को यदि कभी कुछ भी दुर्लभ हो तो पूजा पाठ करने से ही भवानी उसे सुलभ करा देती हैं। मानव को चैत्र की अष्टमी में रात्रिजागरण, गंगा स्नान और भव पूजन वांछित फल प्रदान करता है।

काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

जल, जीवन का प्रमुख रसायन तत्व है। काशी में गंगाजल का स्पर्श होते ही महापातुकावली का तुरंत क्षय हो जाता है। यही नहीं यहां वास करने वाले को पद-पद पर, धर्म की ढेर, मिलती है जिसे करोड़ों यत्न करने से भी वैसी धनराशि एकत्र नहीं की जा सकती, सो काशी की गलियों में घूमने (भ्रमण) से पद पर आपसे आप प्राप्त हो जाती है। धर्मपरायण मनुष्य! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पाने की अभिलाषा जनित त्रैलोक्य पावनी अविमुक्त क्षेत्र काशीपुरी की पदयात्रा करें। भारतीय धार्मिक संप्रदाय चाहे वैदिक हो या स्मार्त उन सबों का आदर विद्वानों महापुरुषों ने किया है।

वृहस्पति देव ने “काशी को मुक्तिपुरी कहा है। इन्द्र से तो यहां तक कह दिया कि काशी सदृश तुम्हारी देवपुरी भी नहीं है। वहीं जाकर मुक्ति हेतु तुम भी विश्वाराध्य विश्वेश्वर की आराधना करो। ऐसे में भला मुक्तिपुरी का दर्शन-वर्णन मेरे जैसे अल्पज्ञ क्यों नहीं करेगा।” यथा—

गंगा में खूब नहायेंगे,
भव भावन गीत सुनायेंगे।
भर भाँग धतूरा खायेंगे,
मेवा संग मिश्री मिलायेंगे।

और आगे का दृश्य-

भाँग धतूरा पीवत साथी,
पथिक पहलुआ पंडित पापी।
अबे तबे अरु चोखा – बाटी,
डंड बैठकी खुला सपाटी।

सौम्य तप जप को समय सीमा में न बांधकर बुद्धिमानजन काशी स्त्रोत की महिमा का वर्णन करता है। गाता-गुनगुनाता है। उसे हृदयस्थ करता है। स्तोता ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ‘काशी’ मंत्र के जप – तप की युक्ति करता है। जप – तप की सामर्थ्य जिस महापुरुष में है, वह मुनि रूप पृथ्वी पर क्रोधी भी हो सकता है अन्यथा असमर्थ पुरुष, प्राणी क्षीणवृत्ति की तरह क्या कर सकता है। जो उद्गीथ है यानी गाने योग्य है वही प्रणव या ऊँकार है। ॐ की उपासना से ही देवता अमृत प्राप्त किये और मृत्यु को जीतकर अमरत्व पाए।

इतना याद रखें — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है।

काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है।

ज्ञान का महान प्रताप कोई विरल ही जानता है। जब आत्मा स्व स्वरूप में स्थित होती है तब उच्चारण करने वाला अन्य कोई नहीं होता अर्थात् वक्ता श्रोता का द्वैत मिट जाता है। मनुष्य में ईश्वरीय प्रेरणा से अचानक ब्रह्म चैतन्य का स्फुरण होता है और वह जिज्ञासु की नई स्थिति में आ जाता है। परंतु संसारी जीव में जिज्ञासा का उदय भी परमात्मा की कृपा से होता है। जब तक मनुष्य में माया से विरक्ति, ईश्वर से अनुरक्ति और सद्गुरु की कृपा नहीं होती, जीव में जिज्ञासा का उदय नहीं होता, गूढ़तत्व चैतन्य शक्ति का उदय नहीं होता। परम सत्य की उपलब्धि के बिना अज्ञान का नशा बार – बार मनुष्य पर छा जाता है।

जो मनुष्य इंद्रियों से विषय वासनाओं का त्याग करके तिमिराच्छन्न रजनी में जागृत अवस्था को प्राप्त कर लेता है काशी में भगवान भोले उसे तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं। तारकेश्वर मंदिर कोलकाता में है। काशी में विश्वनाथ मंदिर के पास स्थापित है। काशी में वर्तमान तारकेश्वर महादेव का जीर्णोद्धार हो रहा है। जिस प्रकार योग में प्रवेश पाने के लिए सद्गुरु कृपा प्रसाद ही सहायक होता है, कर्म से क्षत्रिय विप्र हो जाता है और गीता का सार त्याग है, ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है, उसी प्रकार काशी-काशी जपते-जपते रहने से प्रत्यक्ष मोक्ष है। काशी में मुक्तिमण्डप में मात्र बैठकर भव स्मरण यथा शक्ति धनदान एवं पवित्र कथाओं का श्रवण करने से करोड़ों गोदान का पुण्य प्राप्त होता है।

यहाँ मुनियों ने असंख्य शिवलिंग अनादिकाल से स्थापित किये हैं। जहां पर एक भी शिवलिंग की स्थापना करने से अखिल ब्रह्मांड की प्रतिष्ठा करने का फल प्राप्त होता है, भला उस पुण्य क्षेत्र काशी को कौन मानव जीव छोड़ सकता है। जबकि शास्त्र में कहा गया है काशी की प्राप्ति में पग-पग पर विघ्न आ पड़ते हैं। काशी में वास उन्हीं को मिलता है जो कठोर तपस्या बड़े से बड़े व्रत एवं महादानों के करने वाले होते हैं। काशी गुरु श्रेष्ठ है।

धर्मेश्वर ने मंदराचल पर जगदम्बा से कहा था — काशी की निर्वाण की भूमि है। लोमेश और व्यास जी का भी यही मत रहा। याज्ञवल्क्य मुनिराज ने तो कहा कि — काशी में मरण से परम पद प्राप्त होता है। त्रयमयी काशी समस्त विधाओं की आश्रयस्थली है, महालक्ष्मी की परालय एवं मुक्ति क्षेत्र है। ब्रह्माजी ने कहा — काशी में मरने वालों को मुक्ति मिलती है, यही कारण है कि यहाँ विविध धर्मशाला परिसर मुक्ति क्षेत्र में ठहरने हेतु आज कलिकाल में भी उपलब्ध है काशी ? काशन प्रकाशन करने वाली आत्मज्ञानवती बुद्धि का नाम काशी है।

आठवीं सदी में शंकराचार्य जी को भी बनारस (काशी) आकर अपने मत की विद्वानों द्वारा पुष्टि करानी पड़ी और संभवतः ब्रह्मसूत्र की रचना बनारस में गंगातट पर ही की थी। भागवत में – नदियों में गंगाजी, देवताओं में विष्णु भगवान, वैष्णवों में शंकरजी सर्वश्रेष्ठ है, पुराणों में- श्रीमद्भागवत, ऋषियों में शौनकादि उसी प्रकार श्रेष्ठ हैं जैसे- तीर्थों में काशी सर्वश्रेष्ठ है। इस लोक में बुद्धिमान सज्जनों की ही वह बुद्धि सब कुछ निश्चय करती है जिस नगरी में पुण्यजला स्वयं स्वर्गतरंगिणी गंगा बह रही हैं। वे ही चरण इस भू लोक पर विचरण करना जानते हैं यानी धन्य हैं जिन पुण्य प्राणियों के चरण विश्वनाथ जी के नगर ‘काशी’ में भूमि पर विचरण करते हैं। यद्यपि माघ – मास में सभी तीर्थ, तीर्थराज प्रयाग चले जाते हैं परन्तु अविमुक्त क्षेत्र के तीर्थ काशी में ही रहते हैं। लेखक की कलम से —

कैसा चरित रच्यों मेरो भाई।
बूझत अनबुझ मन जन खिसियाई॥
हलाहल गंगाजल अमरित साँईं।
अगणित कला को मंगल री गाई॥

पुण्य क्षेत्र में संन्यास लेकर रहने, भ्रमण करने वालों की जीवमुक्त और रुद्र स्वरूप मानना चाहिए। इस पुण्य अक्षुण्ण क्षेत्र में यदि प्राण संकट में पड़ा हो तो भी असत्य (मिथ्या) भाषण नहीं करना चाहिए। हां, किसी जीव के प्राण रक्षार्थ झूठ मजबूरी में बोला जा सकता है। काशी शिव को अति प्रिय है। शिव जी के मुख से- मैं ममता रहित हूँ। योगिनियाँ ब्रह्मा और रुद्रगण इसी कारण यहां बसे, काशी के ही हो गये। वे सब वाराणसी के प्रति शिव का प्रेम जानते थे।

जहां जय द्वारा ज्ञानी बटुक ब्रह्मवाद का निनाद करते हों, गुरुचरण विश्वनाथ साक्षात् विराजमान वर्तमानरूप से हों, महर्षि व्यास सदृश पुण्यात्मा वास करते हों, वैद्यराज, दान, ध्यान, तप, ज्ञान कलिकाल में भी हों साथ ही सर्वधर्म की मर्यादा मर्यादित पूर्वक अधिधार्मिक लोगों द्वारा पालन किया जा रहा हो उस मुक्तिदायिनी धर्मपरायण, विराटरूपा काशी को सत् सत् नमन, धरती पर कौन नहीं करेगा।

मुक्ति जन्म महि जानि, ज्ञान खानि, अध हानिकरि।
जहँ बसिं शंभु भवानि, सो काशी, सेइय कस न॥

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है। काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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यह लेख (सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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मेरा गाँव।

Kmsraj51 की कलम से…..

My Village | मेरा गाँव।

रहता हूं बहुत दूर नोएडा में,
पर मेरा गाँव याद आता है।
लहलहाते खेत की पगडण्डियाँ,
उस पर फिसलता पाँव बहुत याद आता है,
मेरा गाँव मुझे बहुत याद आता है।

भूलना मुश्किल है, एक दूसरे से सबका मिलना,
दोपहर तक दोस्तों के साथ खेलना।
माँ का ढूंढते आना, हाथ में छड़ी, आंखें लाल,
पर उसके आँचल का छांव याद आता है,
मुझे मेरा गाँव बहुत याद आता है।

तपती दोपहर के बाद,
सुहानी शाम का आना याद आता है।
ज़ुदा हो के जो न ज़ुदा हो सका,
उसका मुस्कुराना याद आता है,
मुझे मेरा गाँव बहुत याद आता है।

सुबह शाम मिलती थी खुली हवाएँ,
शुद्ध पानी, भोजन और दुआएँ।
वक़्त बहुत बदल गया,
शहरी जिन्दगी में खाता हूं ढेर सारी अँग्रेजी दवाएं।
गाँव की खुली हवा के सामने,
फेल थे सारे हकीम और उनकी दवाएं।

घर के सामने वाली पीपल की छाँव याद आता है,
मुझे और कुछ नहीं, अपना गाँव याद आता है।
मंदिर की घंटी, शंख की आवाज,
दरिया का किनारा बहुत याद आता है।
मुझे मेरा गाँव “जहांगीर पूर शाम “याद आता है।

हूं तो बहुत दूर, पर सबके दिल के करीब हैं,
सबका बुलाना, सिर झुकाना, दुआ देना।
जीते जी न भूल पाउंगा, सबका मुस्कराता चेहरा,
यहाँ बेफिक्र हैं सब देखकर, हालात मेरे दिल की।
“भोला” सब की दिलों का धड़कन था,
दिल को सब याद आता है,
मुझे मेरा गाँव बहुत याद आता है।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — गांव में बिताया हुआ बचपन की यादें कभी भूलती नहीं है। गाँव महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारे देश के लिए कृषि उत्पादन का प्राथमिक क्षेत्र है । गाँव भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह पर्यावरण के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में भी प्रमुख भूमिका निभाता है। गाँव अधिकतर पेड़-पौधों से आच्छादित होते हैं। मेरे गांव का मुख्य कार्य कृषि है यहां के अधिकतर लोग खेती का काम करते हैं और खेती में तेजी से हमारा गांव विकास कर रहा है और इसका मुख्य वजह यहां के मेहनती किसान है। गाँव का जीवन शांत और शुद्ध माना जाता है क्योंकि गाँवों में लोग प्रकृति के अधिक निकट होते हैं। हालांकि, इसकी चुनौतियां भी हैं। गाँव के इलाकों में रहने वाले लोग शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं लेकिन वे कई आधुनिक सुविधाओं से रहित होते हैं जो जीवन को आरामदायक बनाते हैं। शहर में लोग आधुनिक सुविधाओं के बीच तो रहते है लेकिन अत्यधिक प्रदुषण के कारण, ज्यादा बीमार भी होते है, और दवाइयाँ खा-खाकर जीवन बिताने को मज़बूर होते है।

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यह कविता (मेरा गाँव।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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खो जाने दो।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kho Jaane Do | खो जाने दो।

खो जाने दो हमें गुमराहियों के अंधेरे में,
वाहवाहियों की हमें कोई दरकार नहीं।
नहीं चाहिए हमें ऐसी ख्याति विख्याती,
लोक मंगल का हो जिसमें विचार नहीं।

कहां खोए रहे हर क्षण छिछले से शब्द न्यास में,
बेकार वह बात जिसमें गरिमा का अधिभार नहीं।
नफरत भली है उस दिखावटी प्रेम से भी कहीं,
जिसमें हकीकत का हो लेश मात्र भी दीदार नहीं।

सजानी नहीं है जिन्दगी की महफिलें हमें,
खुशामदी के रंग बिरंगे बनावटी फूलों से।
फिल्मी किरदारी प्रेम की है चाह ही कहां?
जिन्दगी जीना चाहते हैं प्यार के उसूलों से।

कमबख्त यह जीवन भी बदलता है रंग,
हर रोज बस मौसम के मिजाज की भांति।
सुकून से जीने ही नहीं देता है किसी को भी,
जिन्दगी की उहापोह में है ही कहां शान्ति।

रंगीनियों की तलबगार रही है हमेशा से,
छिछोले से पन की वह मदहोश वासना।
प्रेम पूजा है, जरूरत है, रहम है, इबादत है,
प्रेम तो खुद ही है उस खुदा की उपासना।

सब जानते हैं लोग, लेकिन फिर भी न जाने क्यों?
जहां में नफरतों और वासनाओं का जहर घोलते हैं।
जिधर भी देखो उधर ही एक अजीब सी मदहोशी है,
अब तो लोग प्रेम को भी रूप और दौलत से तोलते हैं।

बस एक अजीब सी घुटन है हर किसी के भीतर,
बिरले ही है कोई जो दिल का हर राज खोलते हैं।
है अधूरे प्रेम की आज भी लाखों कहानियां यहां,
पर मजाल है कि कोई किसी से कुछ बोलते हैं।

गुजर जाती हैं जिन्दगियां सच्चे प्रेम की तलाश में,
नसीब कहां? मिल जाए तो खुद को खो जाने दो।
मन मसोसकर घुट – घुट के जीने से बेहतर तो यह है,
कि खुद को खुदा की इबादत से प्रेम में रो जाने दो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — दिखावटी वाहवाहियों की हमें कोई दरकार नहीं है, नहीं चाहिए हमें ऐसी ख्याति विख्याती, लोक मंगल का हो जिसमें विचार नहीं। ये सच है की नफरत भली है उस दिखावटी प्रेम से भी कहीं, जिसमें हकीकत का हो लेश मात्र भी दीदार नहीं। सजानी नहीं है जिन्दगी की महफिलें हमें, खुशामदी के रंग बिरंगे बनावटी फूलों से। हमें फिल्मी किरदारी प्रेम की है चाह ही कहां? हम जिन्दगी जीना चाहते हैं प्यार के उसूलों से। आज का मानव दहोश वासना में है, जबकि उसे जरुरत है प्रेम, स्नेह व भक्ति-भजन की, हम सब जानते है की प्रेम ईश्वर का ही रूप है। सब जानते हैं लोग, लेकिन फिर भी न जाने क्यों? जहां में नफरतों और वासनाओं का जहर घोलते हैं। जिधर भी देखो उधर ही एक अजीब सी मदहोशी है, अब तो लोग प्रेम को भी रूप और दौलत से तोलते हैं। बस एक अजीब सी घुटन है हर किसी के भीतर, बिरले ही है कोई जो दिल का हर राज खोलते हैं। गुजर जाती हैं जिन्दगियां सच्चे प्रेम की तलाश में, नसीब कहां? मिल जाए तो खुद को खो जाने दो।

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यह कविता (खो जाने दो।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पर्यावरण और जल।

Kmsraj51 की कलम से…..

Environment And Water | पर्यावरण और जल।

आओ हम सब मिलकर पर्यावरण बचाएं,
काट रहे जो पेड़ों को इनको इसके लाभ बताएं।
उनको इसके महत्व के बारें समझाएं,
धरा पर हम पहले जैसी खुशहाली लाएं।

पेड़ काटकर – काटकर कारखानें बनाते है,
ऊँची – ऊँची इमारत बनाकर हवा, धूप को रोकते है।
जब हरियाली नहीं होगी धरा पर कैसे जी पाओगे,
कैसे अपने लिए ऑक्सीजन को एकत्रित कर पाओगे।

धरा जब हो जाएंगी बंजर शुद्ध हवा कहाँ से लाओगे,
बिन ऑक्सीजन के कैसे जीवित रह पाओगे,
जब हरियाली चारों तरफ जीवन में सुखी रह पाओगे।

पानी को व्यर्थ न बहाओ आगे जल को तरस जाओगे।
नदी, तालाब को दूषित न करें बीमारियों को पाओगे।
कूड़ा, करकट नदी में डाले तभी जल को बचा पाओगे,
नहीं तो एक दिन जल के लिए भी तरस जाआगे।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकने और पानी की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करते हैं। पेड़ भोजन, ईंधन और अन्य महत्वपूर्ण संसाधनों का स्रोत हैं। कागज का कम इस्तेमाल कर हम पर्यावरण पर अपने प्रभाव को कम कर सकते हैं। हमारे ग्रह के लिए एक स्थायी भविष्य सुनिश्चित करने के लिए पेड़ों को बचाना आवश्यक है। धरती पर जीवन के लिये जल सबसे ज़रुरी वस्तु है। यहाँ किसी भी प्रकार के जीवन और उसके अस्तित्व को ये संभव बनाता है। जीव मंडल में पारिस्थितिकी संतुलन को ये बनाये रखता है। पीने, नहाने, ऊर्जा उत्पादन, फसलों की सिंचाई, सीवेज़ के निपटान, उत्पादन प्रक्रिया आदि बहुत उद्देश्यों को पूरा करने के लिये स्वच्छ जल बहुत ज़रुरी है।

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यह कविता (पर्यावरण और जल।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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हे भोले सुनो पुकार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hey Bhole Suno Pukaar | हे भोले सुनो पुकार।

तेरा सावन का महीना जैसे ही आया।
मेघों ने खूब जम के जल बरसाया॥

तेरे भक्त चले शिवलिंग का जल लाने।
तुझे हर्षित कर तेरे आशीष को पाने॥

माना की बंधी है गंगा जटाओं में तेरी।
पर काल ने न जाने कैसी माला है फेरी॥

चहुँ ओर हो रहा है सब कुछ जल मगन।
केवल सताए एक जीवन जीने की लगन॥

लगे ऐसा जैसे तुमने जटाओं को हो खोला।
जैसे भक्ति को कलयुग में शायद हो तोला॥

सावन में पानी ने इस कदर नहीं की थी मनमानी।
जुबां कहे न आंखों के आंसू, कहे दर्द की जुबानी॥

हे भोले भंडारी!
समा लो अपनी जटाओं में इस पानी की लीला को।
माफ कर देना इंसान के गुनाहों के हर गिला को॥

पानी के तांडव को रोक लो कोई जीवन राग गाकर।
डमरू की तान पर मोहक अपना नृत्य दिखाकर॥

अभिषेक तो तेरे शिवलिंग पर प्रकृति ने सर्वप्रथम किया।
सावन आते ही जो इतना जल, जो धरा पर बरसा दिया॥

हे महादेव!
उसी जलाभिषेक को स्वीकार सुंदर सावन दे दो माह।
खुशी में बदल जाए पानी से त्रस्त दिलों की आह॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सावन के महीने को भगवान शिव की भक्ति का भी महीना कहते हैं। यह ग्रीष्म ऋतु के बाद आता है और लोगों को गर्मी के कहर से राहत देता है। सावन के महीने में बहुत बरसात होती है जिससे मौसम सुहावना हो जाता है। सावन माह में भोले के भक्ति में डूबकर, शिवलिंग पर “जल अभिषेक” करना बड़े ही पुण्य का कर्म है। मौसम सुहावना हो तो लोग ऐसे ही वक्त पर अपने परिवार के साथ बाहर घूमते हैं और सावन के खुशनुमा मौसम का आनंद लेते हैं।

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यह कविता (हे भोले सुनो पुकार।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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