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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी साहित्य

शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई? ♦

अब हम सनातनी हिन्दू खुद शिवलिंग को शिव् भगवान का गुप्तांग समझने लगे है और दूसरे हिन्दुओं को भी ये गलत जानकारी देने लगे हैं।

⇒ शिवलिंग :—

प्रकृति से शिवलिंग का क्या संबंध है ..?
जाने शिवलिंग का वास्तविक अर्थ क्या है और कैसे इसका गलत अर्थ निकालकर हिन्दुओं को भ्रमित किया…??

कुछ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते हैं..…।
छोटे-छोटे बच्चों को बताते हैं कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते हैं। मूर्खों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है..…और अपने छोटे-छोटे बच्चों को हिन्दुओं के प्रति नफ़रत पैदा करके उनको आतंकी बना देते हैं। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसे देववाणी भी कहा जाता है।

⇒ लिंग :—

लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, प्रतीक होता है…।
जबकी जनर्नेद्रीय को संस्कृत मे शिश्न कहा जाता है।

⇒ शिवलिंग :—

शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक….
पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक। अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य की जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..…तो वे बताये “स्त्री लिंग” के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए।

⇒ शिवलिंग क्या है? :—

  • शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत।
  • शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनी नहीं होता। ..दरअसल यह गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और मलेच्छों यवनों के द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने पर तथा बाद में षडयंत्रकारी अंग्रेजों के द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं।

उदाहरण के लिए — यदि हम हिंदी के एक शब्द “सूत्र” को ही ले लें तो – सूत्र का मतलब डोरी/धागा गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है। जैसे कि नासदीय सूत्र ब्रह्म सूत्र इत्यादि। उसी प्रकार “अर्थ” शब्द का भावार्थ : सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी।

  • ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। तथा कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है। जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam).
  • ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे हैं: ऊर्जा और पदार्थ। हमारा शरीर पदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है।
  • इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं।
    ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है।

The universe is a sign of Shiva Lingam.

शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है, तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी है। अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान हैं।

आज भी बहुतायत हिन्दू इस शिवलिंग के दिव्य ज्ञान से अनभिज्ञ है।
हिन्दू सनातन धर्म व उसके त्यौहार विज्ञान पर आधारित है। जोकि हमारे पूर्वजों, संतों, ऋषियों-मुनियों तपस्वीयों की देन है। आज विज्ञान भी हमारी हिन्दू संस्कृति की अदभुत हिन्दू संस्कृति व इसके रहस्यों को सराहनीय दृष्टि से देखता है व उसके ऊपर रिसर्च कर रहा है।

⇒ अब बात करते है योनि शब्द पर :—

मनुष्ययोनि “पशुयोनी” पेड़-पौधों की योनी, जीव-जंतु योनि।
योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव, प्रकटीकरण अर्थ होता है….जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। किन्तु कुछ धर्मों में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है नासमझ बेचारे। इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते हैं। जबकी हिंदू धर्म मे 84 लाख योनि बताई जाती है। यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं। अब तो वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि धरती में 84 लाख प्रकार के जीव (पेड़, कीट, जानवर, मनुष्य आदि) है।

⇒ मनुष्य योनि :—

पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है। अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है। तो कुल मिलकर अर्थ यह है:-

लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक।
दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई, बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं। हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया। ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके। लेकिन कुछ लोगों ने इस में गुप्तांगो की कल्पना कर ली और झूठी कुत्सित कहानियां बना ली और इसके पीछे के रहस्य की जानकारी न होने के कारण अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं को भ्रमित किया गया। परंतु सत्य आपके सामने है।

हर हर महादेव…….हर हर महादेव

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत। लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है, शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक। दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई, बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं। हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया। ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके।

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यह लेख (शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई?) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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दीक्षा बिना अधूरी शिक्षा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दीक्षा बिना अधूरी शिक्षा। ♦

जिस तरह जीवन के लिए जल, वायु एंव भोजन आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार सुखमय एंव तृप्त जीवन हेतु शिक्षा, दीक्षा एंव संस्कार का संबंध अटूट है, अकल्पनीय है। प्राचीन समय से शिक्षित, ज्ञानी, परमात्मा को जानने वाले, कलम एंव बुद्धि के धनी, समाज को सत्य के मार्ग पर अग्रसर करने वाले, रक्षा करने वाले, अंधकार से प्रकाश में लाने वाले गुरु शिक्षा एंव दीक्षा पर समान बल देते हुए मनुष्य को ज्ञान देकर शिक्षा के माध्यम से परमात्मा से जुड़ने का मार्ग बताया, बिना गुरु ज्ञान कहाँ-जहाँ गुरु हर धाम वहाँ।

शिक्षा का अर्थ सिखना है। प्राचीनकाल में जब विनीत भाव से गुरु चरणों में बैठकर ज्ञान ग्रहण किया जाता था उसे ही दीक्षा कहा जाता था। राम- कृष्ण जिन्हें भगवान मानते हैं वे भी गुरु से शिक्षा एंव दीक्षा लिए, गोत्र गुरु की पहचान हैः

गुरु गृह गए पढ़न रघुराई।
अल्पकाल विद्या सब पाई॥

गुरु वशिष्ठ एवं गुरु शांडिल्य — राम और कृष्ण के गुरु थे समय के साथ दीक्षा की परम्परा ही लुप्त हो गई। वर्तमान परिवेश में गुरु की परिभाषा ही बदल गई। किसी भी व्यक्ति के जीवन को बनाने में, चरित्र निर्माण में गुरु का अहम योगदान होता है लेकिन आज गुरु का महत्व ही खत्म हो गया। अब तो दीक्षांत समारोह में डिग्री प्रदान की जाती है अगर उच्च शिक्षा, उज्ज्वल भविष्य की जननी है तो दीक्षा जीवन मूल्यों का आधार प्रदान करती है।

रावण प्रकांड पंडित जरुर था अंहकार और गुरुर चरम सीमा पर था क्योंकि दीक्षा मनुष्य को आत्मसंयमी, त्यागी एंव अंहकार रहित बना देता है। रावण के विनाश का कारण दीक्षा का अभाव होना ही था। जब से दीक्षा की परम्परा लुप्त हुई, मनुष्य का जीवन कष्टों से घिर गया। खुशी – शांति लुप्त हो गई आज मनुष्य के भीतर संवेदना, प्रेम, भाईचारे की कमी देखी जाती है अमानवीय कार्य करने में थोड़ी भी झिझक नहीं। चश्मे से वही देख सकता है जिसके ऑंख में क्षमता है – कोई ऐसी चश्मा नहीं है जिससे अंधो को दिखाई दे।

अंधा भी देख सकता है अगर प्रभु कृपा से षष्टी इंद्रिय जागृत हो जाए – यह वगैर गुरु – दीक्षा संभव नहीं है अगर नरेंद्र दत्त श्री रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में नहीं आते तो वह स्वामी विवेकानंद नहीं बनते। स्वामी विवेकानंद ने गुरु के बताए रास्ते पर चलकर जो उन्होंने मान – सम्मान, नाम – शोहरत दिया, वह एक सच्चा शिक्षित एंव दीक्षा प्राप्त शिष्य ही कर सकता है।

श्री केशवचन्द सेन बहुत बड़े विद्वान थे लेकिन आज उनको कितने लोग जानते है। उन्हें गुरु का आशीर्वाद प्राप्त नहीं था। श्री रामकृष्ण परमहंस ने पहले ही कह दिया था तुम बहुत बड़े विद्वान हो लेकिन स्वामी विवेकानंद की जगह तुम कभी नहीं ले सकते। दीक्षा इंसान को अंहकार मुक्त, जाति के बंधन से मुक्त कर देता है।

मनुष्य जन्म लेते ही स्वतः जाति एंव धर्म से जुड़ जाता है। लेकिन दीक्षा प्राप्त करने के बाद मनुष्य हर बंधन से मुक्त होकर पूरे विश्व एंव मानव समाज के कल्याण हेतु अपने को समर्पित कर देता है। जब स्वामी विवेकानंद से उनकी जाति पूछी गई तो उन्होने बड़ा ही हदय स्पर्शी जबाव दिया “मेरा तन जन्म से कायस्थ है लेकिन यह तो नश्वर है, दिल – दिमाग दीक्षा लेने के बाद गुरु कृपा से पूरे ब्रह्मांड की धरोहर है।”

मानव कल्याण ही मेरे जीवन का उद्देश्य है, दीक्षा ने उन्हें अमर बना दिया। एक ऐसी ज्योति जो कभी नहीं बुझेगी। इस धरती पर बहुत सारे गुरु हैं, जब योग्य एंव कुलीन गुरु – योग्य शिष्य को दीक्षा देता है तभी फलीभूत होता है। कोई किसी गुरु का अनुयायी हो, उनके बताए मार्ग पर चलने से परमात्मा की प्राति होगी – दिखावा करना स्वंय को ठगना है और गुरु का अनादर है।

आज श्री ठाकुर अनुकूलचन्द्र जी (देवघर), श्री महर्षि मेंही (भागलपुर) श्री रामचन्द्र जी महाराज (शाहजहॉंपुर), श्री लाला चतुर्मुज सहाय (टूण्डला), महर्षि महेश योगी, श्री अरविन्दधोष, श्री परमहंस योगानन्द जी, के लाखों शिष्य हैं – श्री रामकृष्ण मिशन की शाखाऍं पूरे विश्व में है – केवल स्वामी विवेकानंद जैसे शिष्य के कारण – गुरु के आशीर्वाद के कारण, दीक्षा में जितने शब्द हैं उसे तो जान लें …….

—

  • द – का अर्थ दमन अर्थात इंद्रिय, निग्रह
  • ई – का अर्थ ईश्वर की उपासना
  • क्ष – का अर्थ वासनाओं का क्षय
  • आ – का अर्थ आनन्द

दीक्षा का मतलब अपने अंदर परमात्मा का दर्शन कर लेना। जैसे दिव्य चेतना का प्रकाश उभरता है, ब्रह्म के साथ तारतम्य स्थापित होने लगता है। बिना दीक्षा, संस्कार सम्भव नहीं है गुरु नानक देव महाराज, भगवान महावीर, स्वामी दयानन्द सरस्वती मनुष्यों के लिए प्रेरणा के श्रोत हैं। दीक्षा की शुरुआत ही इंद्रिय निग्रह से है। मन को मारना नहीं है अपितु लगाम लगाना जरुरी है, नहीं तो मन भटकता रहेगा।

जब शिष्य गुरु के साथ मन के तार जोड़कर गुरु के बताए रास्ते पर शुद्ध मन से चलता है, विघा ग्रहण करता है तो स्वतः संस्कार एंव आस्था का उदय होने लगता है। खारे जल से कभी प्यास नहीं बुझती। गुरुओं ने बड़े ही सरल तरीके से अपने शिष्यों को दीक्षा, जप, तप एंव इष्टवृति (दान) का महत्व समझा दिया है। बिना जप, तप एंव दान का दीक्षा पूर्ण नहीं हो सकता।

जप तीन प्रकार से होता है जिह्वा से, होठ से और कंठ से। सबसे उत्तम कंठ से माना गया है। गुरु मंत्र का जप हमेशा कंठ से ही करना चाहिए। शरीर के सारे तंत्र (स्नायु) सक्रिय हो जाते है जो आध्यात्मिक उर्जा पैदा करते हैं, तप का मतलब इच्छाओं, भावनाओं, द्वेष, जलन, ईर्ष्या को समाप्त कर, अहंकार मुक्त होकर ध्यान करना ही तप है।

जब तक मन केन्द्रित नहीं होगा तब तक कुछ की सम्भव नहीं है। इष्टवृति (दान) के बिना दीक्षा अधूरी है। दान का मतलब – गुप्त दान, दान अहंकार की जननी है। किसने दान किया, किसको दिया, कितना दिया – यह किसी को पता नहीं होना चाहिए।

पुस्तकालय में बैठने से कोई ज्ञानी नहीं हो सकता, जब तक की वह किताबों का अध्ययन न करे। ठीक उसी तरह किसी गुरु का शिष्य बनने से कुछ नहीं होगा, जब तक पूरी आस्था के साथ, समर्पण के साथ उनके बताए मार्ग पर न चले। जप, तप, ध्यान, दान (ईष्टवृति) को पूर्णतः अपने जीवन में उतारने, नियमानुसार अनुकरण करने के बाद ही – गुरु कृपा की बरसात होगी।

पहले “कृ” यानी कर्म तब “पा”। संत्संग से जुड़ जाना, स्वामी विवेकानंद, महर्षि महेश योगी, श्री परमंहस योगानन्द जी महाराज, श्री अरविन्द घोष, श्री ठाकुर अनुकूल चन्द्र जैसे गुरु की छत्रछाया में नए जीवन की शुरुआत ही मुक्ति का मार्ग है। माया मोह, अहंकार, लोभ स्वतः गायब हो जाएगा। गुरु वंदना में एक छोटी सी मेरी कविताः …….

गुरु – शिष्य का नाता देखो।
पिता – पुत्र से कहीं महान।
कली से जब फूल बनोगे।
महक उठेगा हिन्दुस्तान॥

गुरु का आदर करना सीखो।
ग़र बनना है तुझे महान।
इक दिन शीश झुकाएगा।
तुझपे सारा हिन्दुस्तान॥

घोषणा: ये मेरी अप्रकाशित रचना है।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — शिक्षा अर्थात इस संसार का व सभी सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं, जीवों का ज्ञान, जबकि दीक्षा का मतलब है संस्कार, क्योकि संस्कार के बिना ज्ञान अधूरा हैं, संस्कार विहीन ज्ञान सदैव ही विनाश का कारण बनता है। इसी कारण दीक्षा बिना अधूरी होती हैं शिक्षा। आजकल ना ही पहले जैसा गुरु शिष्य का रिश्ता है और ना ही वैसी शिक्षा – दीक्षा है, जिस कारण आजकल के बच्चें संस्कार विहीन हैं और अपना विनाश खुद ही कर रहे हैं।

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यह लेख (दीक्षा बिना अधूरी शिक्षा।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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क्या निजीकरण का विरोध जायज है?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ क्या निजीकरण का विरोध जायज है? ♦

आजकल जिस तरह से सरकारी कर्मचारी की हालत हुई है। उस लिहाज से निजीकरण बहुत जरूरी है। काम करने को कहे तो लाख बहाने और कानून बताते हैं। जब तनखाओं की बात आती है तो उस के लिए तो सड़कों में उतरते हैं। एफसीलाखों की तनख्वाह चाहिए पर काम करना ही नहीं चाहते हैं। मुफ्त में चाहिए। जब कोई ऐसा कहे कि काम करो भाई तुम्हे इसकी तनख्वाह मिलती है। तो कहते हैं इसके लिए हमने दिन रात कड़ी मेहनत की है और ऊंची पढ़ाई की है। तब जाकर इस पद पर पहुंचे है। यूं ही नहीं मिली है नौकरी। जैसे उन्हे नौकरी लगने की प्रतियोगिता को पास करने के ईनाम के रूप में जिंदगी भर मोटी तनख्वाह देने का अनुबंध सरकार ने हस्ताक्षरित किया हो। जैसे टेस्ट पास कर के उन्होंने जनता पर बड़ा एसान किया हो। इतनी पढ़ी लिखी जनता बेरोजगारी से जूझ रही है और परेशान हैं। उसका शोषण हो रहा है। वह किसी को नहीं दिखता।

बस निजीकरण न हो। ठेकेदारी न हो। क्यों? जब लोग कुली के काम में भी ईमानदारी से काम करना ही नहीं चाहते हैं तो फिर तो ठेका जरूरी है। वहां प्रोग्रेस भी मिलती है और काम भी हो जाता है। रही गुणवाता की गड़बड़ी की बात तो उसके लिए फिर से सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ही दोषी हैं। जो घूंस खाकर ठेकेदारों के कामों को पास करते हैं। यदि ठेकेदार घूस न दे तो वे बिल ही पास नहीं करते। ऐसे में ठेकेदारों को भी गुणवत्ता में गड़बड़ करनी पड़ती है। यानी सरकारी सेक्टर में जो भी लगा समझो की पावर और कानूनों का दूर-उपयोग करना उसका निजी अधिकार बन जाता है।

जनता अपने-अपने काम को निकालने के चक्कर में और किसी से बुरा न बनने के चक्कर में घूस देने को विवश हो जाती है और अब धीरे-धीरे जनता को भी भ्रष्टाचार की लत लग गई है। सिखाई किसने? सरकारी अधिकारी और कर्मचारी वर्ग ने। छोटे से छोटा बाबू भी बिना घूस के फाइल नहीं सरकाता। चपरासी तक भ्रष्ट हैं, और तो और मनरेगा के मजदूरों से भी जबाव मिलता है कि जब सब खा रहे हैं तो हमारे लिए प्रोग्रेस क्यों? हम भी सारा दिन अपनी मर्जी का काम करेंगे और 203 रुपए पूरा दिन लेंगे। यदि वह तकनीकी लोगों ने कम आंका तो पंचायत प्रतिनिधि की खाल उधेड़ देते हैं। या तो प्रोग्रेस के बदले में दुगना तिगुना दिन मांगते हैं। अब वहां एडजस्टमेंट करनी पड़ेगी।

उस एडजस्टमेंट को कानूनी रूप से तकनीकी लोग या ओहदेदार लोग कानूनन गलत ठहराते हैं। ऐसे में पंचायत प्रतिनिधियों को ही नुकसान झेलना पड़ता है और हर तरफ से समझौता करना पड़ता है। लोगों को प्रोग्रेस के चक्कर में दुगना तिगुना दिन देना पड़ता है और तकनीकी तथा ओहदेदार लोगों को घूस खिलानी पड़ती है। ऐसे में कार्य की गुणवत्ता यदि लानी हो तो घाटा होगा नहीं तो गुणवत्ता से भी समझौता करना पड़ता है। अब दोषी कौन?

लोगों की नजरों में ठेकेदार या पंचायत प्रतिनिधि खा गए आदि-आदि, का भाव होता है और खाने वालों की एक लम्बी कतार होती है। यह सचाई सब जानते हैं पर मुंह कोई नहीं खोलना चाहते। अन्ना आंदोलन ने आवाज उठाई जरूर थी परन्तु वह भी समय और व्यवस्था की गर्त में दब गई। फिर ठेकेदारी प्रथा से नफरत क्यों? जब लोग ही मिलकर इसका विरोध नहीं करना चाहते तो सरकार का क्या कसूर?

गरीबों के काम तो कतई नहीं होते। इतनी तनख्वाह लेने के बाबजूद भी हर काम के लिए रिश्वत मांगते हैं। हद हो गई है अब तो। हां सेना के मामले में, पुलिस के मामले में ठेका सही नहीं है। बाकी देश के विकास के लिए सब जायज है। अध्यापक तनख्वाह लेने के बाबजूद भी क्लास को नहीं जाना चाहते और जाता है तो गाइडों से पढ़ाना शुरू करता है। कौन पढ़ता है आज किताबें? कौन जाता है आज लाइब्रेरी? जो काम करते हैं उन्हे उल्टा क्रश किया जाता है। उन्हे पफोन्नत नहीं मिलती पर वरिष्टता के हिसाब से पदोन्नति मिलती है।

सभी विभागों के कर्मचारी रिश्वत बिना काम नहीं करना चाहते। फिर क्या गलत है? सरकारी सेक्टर की तरह निजी में नहीं होता। वहां प्रोग्रेस के पैसे मिलते हैं न कि ओहदे और डिग्री के बल पर पास किए टेस्ट के। वहां पदोन्नति भी काम के हिसाब से होती है न कि सिनियोर्टी के आधार पर। तब इस क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाना कहां से गलत है? या तो लोग अपनी मानसिकता को सुधारे या फिर निजीकरण को स्वीकारें।

निजीकरण के सकारात्मक प्रभाव :

  1. सरकारी ऋण में कमी : निजीकरण के मुख्य आशावादी प्रभावों में से एक यह है कि इसने संघीय सरकार के पैसे को कम कर दिया है।
  2. बेहतर सेवाएं।
  3. नए-नए तरह के उत्पाद।
  4. कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं।
  5. प्रतियोगी दरें।

घोषणा :- यह मेरी मौलिक और स्वरचित रचना (विचार) है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — गरीबों के काम तो कतई नहीं होते। इतनी तनख्वाह लेने के बाबजूद भी हर काम के लिए रिश्वत मांगते हैं। हद हो गई है अब तो। हां सेना के मामले में, पुलिस के मामले में ठेका सही नहीं है। बाकी देश के विकास के लिए सब जायज है। अध्यापक तनख्वाह लेने के बाबजूद भी क्लास को नहीं जाना चाहते और जाता है तो गाइडों से पढ़ाना शुरू करता है। सभी विभागों के कर्मचारी रिश्वत बिना काम नहीं करना चाहते। फिर क्या गलत है? सरकारी सेक्टर की तरह निजी में नहीं होता। वहां प्रोग्रेस के पैसे मिलते हैं न कि ओहदे और डिग्री के बल पर पास किए टेस्ट के। वहां पदोन्नति भी काम के हिसाब से होती है न कि सिनियोर्टी के आधार पर। तब इस क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाना कहां से गलत है? या तो लोग अपनी मानसिकता को सुधारे या फिर निजीकरण को स्वीकारें।

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यह कहानी (क्या निजीकरण का विरोध जायज है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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किताब।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ किताब। ♦

बचपन में ही किताबों से,
मुलाक़ात हो जाती है।
सबसे प्यारा और अच्छा,
उपहार होती है किताबें।

घर के अलमारी के
कोने में रहती है किताबें।
कुछ न लेती ज्ञान का,
पाठ पढ़ाती है किताबें।

किताबों में संसार और
अल्फाजों का प्यार है।
धर्म, वेदों ,सभ्यता,
संस्कृति का भंडार है।

देश, समाज, परिवार के
भविष्य का सर्जनहार है।
सब तरह ज्ञान का पाठ,
पढ़ाती है ये किताबें।

विद्या और अध्यापक की,
साथी होती है किताबें।
अकेलेपन की अच्छी,
दोस्त होती है किताबें।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — किताब इंसान की सच्ची मित्र होती है, बिना कुछ लिए किताबें सदैव ही हमारी सहायता करती रहती हैं। 100 दोस्तों से अच्छा एक अच्छी किताब होती है। ज्ञान सदैव ही इंसान का साथ देती है, चाहे वह समय कैसा भी हो। ज्ञान ज़िन्दगी के हर मोड़ पर आपका साथ निभाएगा चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। किताबों को अपनी ज़िन्दगी का जरूरी हिस्सा बना लो, तुम्हारी ज़िन्दगी निखार जाएगी।

—————

यह कविता (किताब।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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काशी में देव विग्रह का वीडियोग्राफी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ काशी में देव विग्रह का वीडियोग्राफी। ♦

न्यायालय के आदेश पर,
ज्ञानवापी परिसर का सर्वे।
सीनियर डिवीजन सिविल,
जज रवि कुमार दिवाकर।

वीडियो ग्राफी के आदेश में,
कमीशन कार्रवाई सीमा तक।
अदालत ने कहा कमीशन,
कार्रवाई आदेश हमने दिया है।

श्रृंगार गौरी और देव विग्रह से,
सबूत सुरक्षित रखा जाएगा।
काशी के ज्ञानवापी मस्जिद में,
देवताओं के साक्ष संकलित होंगे।

अंजुमन इंतजा मियां का कहना,
मस्जिद! गैर मुस्लिम घुसने न देंगे।
अधिवक्ता आयुक्त कमीशन,
10 मई को रिपोर्ट दाखिल करें।

6 मई 2022 को दोनों पक्षों को,
कमीशन कार्रवाई सूचित किया।
अधिवक्ता आयुक्त साक्ष को,
सुरक्षित स्थान पर उसे रखेंगे।

मिश्रित आबादी वाले क्षेत्र में,
फोर्स मौके पर एलर्ट जारी है।
भीड़ – भाड़ रोकने के लिए,
पूरा इंतजाम यहां किया गया।

कानून व्यवस्था को प्रभावित,
करने वालों पर सख्ती होगी।
जनता से शांति बनाने के लिए,
पुलिस अपील कर रही दिखी।

सुप्रीम कोर्ट आदेश पालन में,
माइक रिपोर्ट हाईकोर्ट रद्द किया।
विश्व में बढे प्रदूषण नियंत्रण –
न्यायालय ने निज आदेश दे दिया।

प्राचीन विश्वनाथ के अवशेषों को,
एकत्रित सबकुछ किया जाएगा।
मंदिर के उत्तर पश्चिम दिशा में,
दूर-दूर तक जबकि बने बंकर है।

दक्षिण दिशा में भी मंदिर के,
सड़क पार वर्ग विशेष के बंकर है।
पुलिस आयुक्त के निगाह ने,
जुड़ा नहीं सुरक्षा के अंदर है।

अधिकांश लोगों से बात करने पर,
उनको कोई आपत्ति नहीं बताया।
धर्म के ठेकेदारों ने ही केवल,
इस आदेश का विरोध जताया है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — 6 मई 2022 को दोनों पक्षों को कमीशन कार्रवाई सूचित किया। अधिवक्ता आयुक्त साक्ष को सुरक्षित स्थान पर उसे रखेंगे। प्रश्न हमारा यह है मुस्लिम संप्रदाय से की अगर काशी के ज्ञानवापी मस्जिद में कुछ भी गलत नहीं है तो फिर ये आपत्ति क्यों? आखिर क्या छिपाने की कोशिश कर रहे है ये? इनको तो खुश होना चाहिए, की सत्य बाहर आ रहा हैं। जो सत्य है उसे तो बाहर आना ही चाहिए। वह डर रहे है की प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं होती हैं। उनके डर का मुख्य कारण यही हैं। सत्य तो बाहर आएगा ही चाहे ये लाख कोशिश कर ले, विरोध करने की या रोकने की। सभी को शांतिपूर्ण तरीके से कोर्ट की कारवाही को होने देना चाहिए।

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यह कविता (काशी में देव विग्रह का वीडियोग्राफी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हनुमान जयंती।

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♦ हनुमान जयंती। ♦

भगवान हनुमान जी को तीन लोको में सबसे अधिक शक्तिशाली भगवान माना जाता है। भगवान हनुमान जी का जन्मदिवस चैत्र पूर्णिमा को मनाया जाता है हिन्दुओं का यह प्रमुख पर्व है। इसको हनुमान जयंती भी कहते है हनुमान जी की माता का नाम अंजनी और पिता का केसरी था उन्होंने माता पिता के साथ – साथ अपने धर्म गुरु पवन से भी विद्या ली, शबरी के गुरु ऋषि मतंग से विद्या प्राप्त की। भगवान सूर्य ने उनको सब तरह की विद्या दी हनुमान जी को बजरंगबली, केसरी नंदन, पवनकुमार, मारुति, पवनपुत्र, संकटमोचन आदि के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान हनुमान जी अपने कौशल और बुद्धि के लिए भी जाने जाते है उन्होंने अकेले ही पूरी लंका की जला दिया रावण महाशक्तिशाली था वो भी उसे रोक नहीं पाए। हिन्दू धार्मिक ग्रंथों और “हनुमान चालीसा” और “रामायण” में विशेष रूप से वर्णन किया गया है हनुमान जी भक्तों को साहस, शौर्य, बल से जीवन शक्ति प्रदान करते है।

भारत के सभी राज्यों में हनुमान जयंती मनाई जाती है “हनुमान चालीसा” भगवान हनुमान जी का प्रिय ग्रंथ है वह हमेशा बहुत पढा जाता है। भगवान हनुमान जी के जयंती के दिन हनुमान जी को नए वस्त्र और फूलों से सजाया जाता है। हनुमान जी की मूर्ति को सिंदूर से सजाया जाता है फल और मिठाई का भोग लगाते है। हनुमान जयंती वाले दिन मंदिरो में हनुमान चालीसा और सुंदर कांड, धार्मिक उत्साह के साथ भक्तगण पढ़ते है भगवान हनुमान जी को भगवान श्री राम का परम भक्त माना जाता है। वह अपने प्रचंड भुजबल के साथ – साथ सौम्य, शांत स्वभाव के लिए जाने जाते है भक्तों को साहस, शक्ति, बलशाली होने का आशीर्वाद देते है रामायण में उनका महत्वपूर्ण स्थान है हिंदूओ के देवता विष्णु के रूप में (अवतार) थे।

हनुमान जी शक्ति और भक्ति के प्रतीक है हनुमान जी के जीवन से हमको यह सीख मिलती है विनम्र बने और संघर्ष से न डरते है अपने लक्ष्य की और बढ़ते रहे, हनुमान जी की पूजा करने से भक्ति को आध्यात्मिक शक्ति मिलती है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — चैत्र शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के दिन चित्रा नक्षत्र में भगवान हनुमान जी का जन्म हुआ है। उनका जन्म माता अंजना एवं पिता वानर राज केसरी के यहां हुआ है। हनुमानजी को शिवजी के एकादश रूद्र के रूप में भी जाना जाता है। क्या आप जानते है जयंती व जन्मोत्सव में क्या अंतर है? जयंती उन लोगों की मनाई जाती है जिनका कभी जन्म हुआ किंतु अब वे परमधाम में वास करते हैं । इसके उलट जन्मोत्सव या जन्मदिवस उन लोगो का मनाया जाता है जो जन्म से अब तक हमारे बिच जीवित हैं एवं पृथ्वीलोक पर ही निवास करते हैं। हनुमान जयन्ती को लोग हनुमान मन्दिर में दर्शन हेतु जाते है। कुछ लोग व्रत भी धारण कर बड़ी उत्सुकता और जोश के साथ समर्पित होकर इनकी पूजा करते है। चूँकि यह कहा जाता है कि ये बाल ब्रह्मचारी थे इसलिए इन्हे जनेऊ भी पहनाई जाती है। हनुमानजी की मूर्तियों पर सिन्दूर और चाँदी का वर्क चढ़ाने की परम्परा है।

—————

यह लेख (हनुमान जयंती।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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शहीद दिवस।

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♦ शहीद दिवस। ♦

भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव भारत के सच्चे क्रांतिकारी थे देश प्रेम की खातिर हँसते – हँसते अपने प्राण दे दिए। 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। शहीद भगत सिंह जी का जन्म 28 सितंबर 1907 में भारत के गाँव बंगा जिला लायलपुर में हुआ था।

देशप्रेम की भावना बचपन से ही थी चंद्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर के “नाैजवान भारत सभा” का गठन किया भारत की स्वतंत्रता के लिए अभूतपूर्व साहस के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया, लाहौर में बनी सेंडर्स की हत्या। उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय संसद में बम विस्फोट करके आंदोलन को आगे बढ़ाया उन्होंने असेम्बली में बम फेंक कर भागने से मना कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप अंग्रेज सरकार ने 23 मार्च 1931 को अन्य साथियों के साथ फाँसी पर लटका दिया भगत सिंह को एक सच्चे क्रांतिकारी के रूप में याद किया जाता है।

सुखदेव जी का जन्म 15 मई 1907 को भारत के लुधियाना के एक गाँव में हुआ। इनका पूरा नाम सुखदेव थापर था देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। अंग्रेजों के अत्याचारों से आहत देशवासियों के लिए कुछ करने का जज्बे की भावना से सुखदेव ने अंग्रेजों को मिलने के लिए मजबूर कर दिया और भारत को अंग्रेजों के चुंगल से मुक्त करने का प्रण लिया।

सुखदेव ने प्रसिद्ध क्रांतिकारीयो के साथ मिलकर “नाैजवान भारत सभा” का गठन किया कई गतिविधि जैसे 1929 में जेल की भूख हड़ताल में सक्रिय भूमिका निभाई। सब साथियों ने मिलकर 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली में बम विस्फोट के कारण सुखदेव और उनके सहयोगियों को गिरफ़्तार कर अपराधो का दोषी ठहराकर फैसले के रूप में मौत की सजा सुनाई।

क्रांतिकारी राजगुरू का जन्म 24 अगस्त 1908 में भारत के महाराष्ट्र राज्य पुणे जिले में खेड़े गाँव मे हुआ। इनका पूरा नाम शिवराम हरिराजगुरु था। चंद्रशेखर आजाद से इतने प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गए। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज थे। 19 दिसम्बर 1928 को अपने साथियों के साथ मिलकर अंग्रेज पुलिस ऑफिसर जे.पी सांडर्स की हत्या की थी। इसके बाद 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली में सेंट्रल असेम्बली में हमला करने में राजगुरु का बड़ा का हाथ था। उनको पकड़ने के लिये पुणे जाते समय इनको गिरफ्तार किया गया; इन्हें भी भगतसिंह, सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फाँसी पर लटका दिया गया।

भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव भारत के सच्चे देशभक्त थे। जिन्होंने अपनी देशभक्ति को अपने प्राणों से भी अधिक महत्व दिया। 23 मार्च 1931 को हँसते – हँसते न्यौछावर करने वाले सभी क्रांतिकारयो को शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है। यह दिवस देश के प्रति सम्मान और भारतीय होने का गौरव का अनुभव कराता है यह दिवस श्रद्धांजलि का दिवस है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भारत के तीन महान स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने के लिए पूरे देश में हर वर्ष 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग स्वतंत्रता सेनानियों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को श्रद्धांजलि देते हैं, जिन्होंने भारत की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह दिवस देश के प्रति सम्मान और भारतीय होने का गौरव का अनुभव कराता है यह दिवस श्रद्धांजलि का दिवस है।

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यह लेख (शहीद दिवस।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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व्यक्तित्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ व्यक्तित्व। ♦

व्यक्तित्व का आशय व्यवहार के सभी गुणों नाम ही व्यक्तित्व है। प्रत्येक मनुष्य में कुछ विशेष गुण होते है; अच्छे व्यक्तित्व का जीवन में बहूत महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वो अन्य लोगों से अलग ही पहचाने जाने जाते है। व्यक्ति की सम्पूर्ण छवि का नाम ही व्यक्तित्व है। रंग रूप कैसा भी हो सीरत अच्छी होनी चाहिए सुंदर लोग भी अपनी पहचान बनाने में पीछे रहते है; और साधारण दिखने वाले लोग अपनी गुणों और अच्छे विचार अच्छे आचरण से लोंगो को प्रभावित कर जाते है उनके व्यक्तित्व में वो बात होती है।

जो दूसरों में नहीं। यदि आपकी छवि सकारात्मक है तो आप दूसरों की नजर में तारीफ के काबिल है। अगर नकारात्मक छवि है तो आप अपमान का कारण बन सकते है। सहनशील कर्तव्यपरायण और रहन-सहन मधुरवाणी शालीनता से सबको अपनी ओर आकर्षित करते है, वो अच्छे व्यक्तित्व वाले लोग होते है। जो शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं वो लोग देश और समाज की सेवा करने
के लिए तत्पर रहते है।

ये उनको अपने घर के लोंगो से मिलते है जहाँ वो अपने अच्छे व्यक्तित्व का विकास करने में सहायक सिद्ध होते है। व्यक्ति का व्यक्तित्व के अनेक रूपों गुणों और तत्त्वों के योग पर बल दिया जाता है।

भारतीय दर्शन में व्यक्तित्व के तीन प्रकार बतलाये हैं…

  • सतोगुणी
  • रजोगुणी
  • तमोगुणी

इनमें सतोगुणी व्यक्तित्व सर्वोत्तम होता है। सतोगुणी व्यक्तित्व सत् (अच्छे) गुणों युक्त, उच्च आदर्शों, नैतिक मूल्यों तथा चरित्रवान् होता है। सतोगुणी व्यक्तित्व वाला इंसान का खानपान भी पूर्ण रूप से शुद्ध शाकाहारी होता हैं। इसके विपरीत तमोगुणी व्यक्ति कामी, क्रोधी, आलसी तथा अमानवीय गुणों से युक्त होता है। तमोगुणी व्यक्ति का खानपान भी पूर्ण रूप से मांसाहार होता हैं। रजोगुणी व्यक्ति में इन दोनों के मध्य की स्थिति होती है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्रत्येक व्यक्ति में कुछ विशेष गुण या विशेषताएं होती है। जो दूसरे व्यक्ति में नहीं होतीं। इन्हीं गुणों एवं विशेषताओं के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे से भिन्न होता है। व्यक्ति के इन गुणों का समुच्चय ही व्यक्ति का व्यक्तित्व कहलाता है। ये बिलकुल सत्य हैं की – सहनशील कर्तव्यपरायण और रहन-सहन मधुरवाणी शालीनता से सबको अपनी ओर आकर्षित करते है, वो अच्छे व्यक्तित्व वाले लोग होते है। जो शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं वो लोग देश और समाज की सेवा करने के लिए तत्पर रहते है।

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यह लेख (व्यक्तित्व।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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रिश्तों का बोझ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रिश्तों का बोझ। ♦

एक शहर में रवि अपने बेटे अमित और बहू रीमा के साथ रहते थे। अमित का बेटा रितिक अपने दादाजी के बहुत करीब था। अमित की माँ 5 साल पहले गुजर गई थी।

एक दिन रीमा बोली “बाबूजी आप बाजार से सब्जी ले आओ”…
रवि सब्जी लेने जाते है तो वहाँ उनके दोस्त मिल जाते है वो पैसो को लेकर परेशान थे रवि उनको वो पैसे दे आते है जो रीमा ने सब्जी के लिए दिए थे। घर आकर बहु को सब बता देते है। रात को जब अमित घर आता है तो रीमा उसको सब बता देती है। सब खाना खाने बैठते है खाने में सब्जी नहीं होती है अमित कहता है रीमा तुमने सब्जी नहीं बनाई वो बोली बाबूजी लेकर नहीं आये, और सारे पैसे दोस्त को देकर आ गए यह सुनकर अमित गुस्से से बिना खाना खाएं चला जाता है।

दूसरे दिन अमित रितिक से बोलता है “मैं तुम्हे स्कूल छोड़ देता हूँ” रीमा बोली “बाबूजी छोड़ देंगे वैसे पूरे दिन करते क्या है?” वो बाबूजी को आवाज लगाकर बोलती है; “आप इसको स्कूल छोड़ आयो” बाबूजी बोले “पहले मुझे एक कप चाय दे दो” बाबूजी चाय आकर पी लेना “वो स्कूल छोड़कर आते है चाय बनाकर पीते है।” बाबूजी आप घर की साफ सफाई भी कर लिया करो दिन भर आराम ही करते हो, बेचारे बाबू जी से रीमा इस तरह सब काम करवाने लगती है।

कुछ दिन बाद रीमा की सहेली मीना घर आती है बोलती है “कैसी हो रीमा” मैं ठीक हूँ अमित के साथ घूमने जा रही हूँ। तुम अपने ससुर को अकेले छोड़ कर कैसे चली जाती हो हमारे यहाँ तो ससुर की ही चलती है वो जैसा कहते है वही होता है। “रीमा बोली” तुम्हारे ससुर पैसे वाले है हमारे बाबू जी पर पैसे नहीं वो तो हम पर बोझ है। यह बात रवि सुन लेता है, और रोने लगता है। रात को अमित से बोले “बेटा कल मुझे मेरे दोस्त के यहाँ छोड़ आना वो अकेला रहता है, मैं उसके साथ ही रह लूँगा तुम लोगो को मेरी वजह से परेशानी होती है।

“अमित बोला” बाबूजी अगर आपका मन है तो मै सुबह छोड़ दूँगा।” सुबह रवि अपने दोस्त के घर पहुँच जाते है रवि अंदर चला जाता है; तो उनके दोस्त अमित से कहते है “तुम ये बहुत गलत कर रहे हों। मैं तुम्हें आज एक बात बताता हूँ एक बार मैं और रवि बाजार जा रहे थे; एक छोटा बच्चा भीख मांग रहा था रवि उसको अपने घर ले आया उसको पाला, पढ़ाया – लिखाया, अच्छे संस्कार दिए वो बच्चा कोई और नहीं वो तुम थे।

अमित तुम उनकी संतान नहीं हो फिर भी तुम्हें संतान से ज्यादा प्रेम दिया “यह सुनकर अमित के पैरों से जमीन खिसक गयीं वो रोने लगा। “बाबूजी मुझे माफ़ कर दीजिए” बाबूजी ने उसको माफ नहीं किया। घर आकर रीमा को सब बात बताई तो वह रोने लगी। “मैने बाबूजी पर बहुत अत्याचार किये है; मेरी ही वजह से घर छोडकर गए। मैं ही उनको लेकर आऊँगी। “रीमा और अमित दोनों बाबूजी से माफी मांगते है रवि उनको माफ कर देता है, और सब खुशी – खुशी रहने लगते है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कहानी के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस दुनिया में रिश्तों से बढ़कर कुछ भी नहीं है। अगर रिश्तों में प्यार, सम्मान, विश्वास न हो तो ऐसे रिश्ते बहुत ही दुःख देने वाले होते। दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज अगर कुछ है तो वह प्यार है। प्यार वह एहसास है जो हमें ना सिर्फ जीना, बल्कि सदैव ही मुस्कुराना भी सिखाती है। इस दुनिया में हर कोई किसी ना किसी से जरूर प्यार करता है। क्योंकि बिना प्यार के यह दुनिया चल ही नहीं सकती हैं। रिश्तों में प्यार का होना बहुत जरूरी है, चाहे वो रिश्ता कोई भी हो। जहां रिश्तों में प्यार नहीं होता है वहां अक्सर तकरार होता ही रहता हैं। इसलिए रिश्तों में प्यार, सम्मान और विश्वास को बनाये रखें, सुखमय जीवन जीने के लिए।

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यह कहानी (रिश्तों का बोझ।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें/कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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दास्तान ए जात पात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दास्तान ए जात पात। ♦

अपनी अरुणिमा को बिखेरते हुए सूर्य देव हिमालय की पावन वादियों में पहाड़ियों के बीचो बीच बसे इस छोटे से सुंदर एवं सुरम्य गांव को ऐसे नहला रहे थे, कि मानो आद्या सुंदरी परा शक्ति प्रकृति का चाकर बन कर अपनी सेवाएं नियमित दे रहे हो।घाटी के इस छोटे से गांव में कितनी आत्मीयता थी और कितना प्रेम और भाईचारा? कहते नहीं बनता। न कोई लड़ाई न कोई झगड़ा। न ही तो शहरों जैसी आपाधापी और लूट – खसोट। चारों ओर थी तो सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता और असीम सकून।

नित्य प्राकट्य की तरह आज भी आदित्य देव अपनी सेवाएं देने धीमे – धीमे तप और विशाल प्रकाश के साथ पहाड़ी की चोटी पर निकल आया था। गांव की जानकी चाची की आवाजे हर रोज की तरह कानों में गूंज उठी।

” राधा, शालू, कमला, मनु उठो भाई उठो। देखो तो सूरज चढ़ आया है। सारा संसार उजाला हो गया है और तुम ……….।” यह बोलते बोलते जानकी चाची उस कमरे में घुंस गई, जहां राधा सोई थी।

“अरे ओ मेरी भोली सी, प्यारी सी, अच्छी सी दादी। क्यों हर रोज सुबह – सुबह अपनी कोयल सी मधुर आवाज़ का प्रचार – प्रसार करती फिरती हो ? आस – पड़ोस को भी अलार्म का काम करती हो।” बिस्तर पर ऊंघते हुए से पलथी मार कर जानकी चाची के झुर्रियों से लबरेज चेहरे को चूमते हुए राधा बोली।

“तुझे अब सुबह इतनी देर तक सोए रहना शोभा नहीं देता राधा। शादी की उम्र हो गई है। मां का हाथ बंटाया कर। कुछ सीख भी जाएगी और मां की मदद भी हो जाएगी।”

जानकी चाची बूढ़ी आंखो की कोरों में पानी भरते हुए से बोली।
“बस भी कर मेरी प्यारी दादी। जब देखो तो तब उपदेश। और हां जो ये बात – बात पर इन झील सी आंखो में लहरे उठाती रहती हो ना, ये मत किया करो जी।” राधा जानकी चाची की झुर्रियों से लबरेज पोपलों को दोनों ओर से पकड़ते हुए और पुचकारते हुए से बोली।

“कैसे चुप रहूं बच्चा? दादी जो हूं तेरी।” जानकी चाची कोरो का पानी पोंछते हुए और राधा का सिर सहलाते हुए बोली।

“उमा। ओ उमा।” बाहर से मोहन भैया ने आवाज लगाई।
“जी आई।” अंदर से रोटियों को बेलते हुए उमा भाभी बोली।

“अरे मैं काम पर जा रहा हूं। देर हो रहा हूं। बाहर कुछ सामान रखा है। देखना उठा लेना। राधा को बोल दे चाहे।” जाते हुए से मोहन भैया बोले।

“जी उठा लूंगी। आपकी लाड़ली तो अभी खरांटे मार रही होगी। बिगाड़ रखा है बुढ़िया ने।” अंदर से उमा भाभी बोली।

“ठीक है। उठा लेना। बाहर गाय भी चुग रही है। कहीं खा न ले सामान।” मोहन भैया सड़क से बोले।

“जी उठा लूंगी। शाम को जल्दी अना।” अंदर से उमा भाभी बोली। पर शायद ये सब मोहन भैया ने नहीं सुना हो। वे निकल पड़े थे।

गाय को हट्टका करते हुए सामानों के थैले लिए हुए राधा और जानकी चाची रसोई में आई।

“क्यों री बुढ़िया की बच्ची? क्या कह रही थी ? बुढ़िया ने बिगाड़ रखा है!” जानकी चाची ने उमा भाभी के कान प्यार से पकड़ते हुए पुचकारते हुए से कहा।

“सॉरी – सॉरी अम्मा जी! अब नहीं बोलूंगी।” अपने कान पकड़ते हुए माफीनामे की तहजीब में उमा भाभी बोली।

“खबरदार जो आगे से किसी ने मेरी लाड़ली पोती को कुछ कहा तो।” फिर से आंखों की कोरें नम करते हुए से जानकी चाची बोली।

“नहीं कहूंगी कुछ अम्मा। पर इसकी मां हूं। चिंता तो होती है न! 24 की हो गई है।सबको आप जैसी सास थोड़े ही न मिलती है।” उमा भाभी रूआंसा चेहरा करके बोली।

“सो तो मैं भी इसे समझाती रहती हूं बेटा। पर यह मानती कहां है?” यह बोलते – बोलते जानकी चाची की आंखे छलक आई थी।

“ओ री ओ सुंदर सास – बहू की जोड़ी। ये रोना धोना छोड़ो और कुछ नाशता – पानी कराओ। भूख लगी है। तुम्हारी राधा जिंदा है अभी। मरी नहीं है।” राधा ने दोनों को छेड़ते हुए से कहा।

“चल ! झल्ली कहीं की? पहले नहा – धोकर आ, फिर खाना कुछ।” जानकी काकी आंसू पोंच्छते हुए बोली।

अपनी अहलड मस्ती में राधा नहाने जाती है। इस बीच चाची और उमा भाभी में यह बात हो रही थी कि परसों राधा को देखने लड़के वाले आ रहे हैं। “उमा के बाबू जी बोल रहे थे कि बेटी जवान हो गई है। हाथ पीले करना हमारा फ़र्ज़ है। फिर बी ए भी इस साल इसकी पूरी हो जाएगी।” उमा भाभी चाची से बोल रही थी।

“सो तो है बच्चा। बेटियां तो है ही पराया धन। कब तक पास रखोगे?” चाची उमा भाभी से बोल रही थी।

” जब देखो तब सब बस मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। किसी न किसी तरह से मुझे जल्दी भगाने की तैयारी में चुपके – चुपके लगे हैं। मैं नहीं करूंगी अभी शादी हां। कह दिया मैंने। जब तक एम ए न कर लूं।” राधा बाल झाड़ते हुए झल्ला कर बोली।

“बस कर री ओ छमक-छलो। कब तक बाप के यहां बैठी रहेगी? 24 की हो ली फिर कब 50 की करेगी शादी क्या? कौन वरे गा तब तुझे। तेरी उम्र की थी न हम। तो दो – दो औलाद जन बैठे थे।” पास मनु को नहला रही चंपा दीदी व्यंग्य करते हुए बोली। वह यहां मायके अपने बच्चों के साथ मेहमान आई थी। शायद राधा का यह रिश्ता भी उसी की सलाह पर उमा भाभी और मोहन भैया करवा रहे थे। पर इसमें राधा को विश्वास में न लिया गया हो शायद।

“वह आप का जमाना था फूफी। अब मॉडर्न जमाना है। समझी !” राधा पुचकारते हुए से बोली।

“हां – हां तोड़ ले अपने बाप की रोटियां और! तुझे कौन समझाएं?” चंपा दीदी बोली।

“बस भी कर चंपा! तू हमेशा इसे छेड़ते हुए क्यों ताने मारती रहती है?” जानकी चाची डांटते हुए से बोली।

“हां – हां मां और चढ़ाओ इसे सर पर। तूने ही तो इसे बिगाड़ रखा है। ठीक कहती है भाभी।” चंपा दीदी बोली।

“हर चीज का एक समय होता है बच्चा। शादी की भी एक उम्र होती है। ठीक कह रहे हैं सब।” राधा की बेनी बनाते हुए चाची बोली। तीसरे दिन लोक रीत के तहत बुलाए गए मेहमान आते हैं और राधा जैसी सुंदर और पढ़ी लिखी लड़की को देख कर रिश्ता तुरंत पक्का कर लेते हैं।

दिन गुजरते गए। यहां राधा ने बुद्धि से तो यह रिश्ता कबूल लिया था पर दिल से नाखुश ही थी। एक दिन पास में एक मेला था। राधा अपनी सहेली रूपा के साथ मेला देखने चली गई। रास्ते में उन्हें पिंकू मिला, जो उन का क्लास मेट था। वह पास के गांव का रहने वाला था और एक अच्छा लड़का था। उसने गाड़ी रोकी।

“अरे राधा और रूपा कहां जा रही हो?” पिंकू ने कहा।
“ओह पिंकू! हम मेले जा रही है और तुम?” रूपा ने चौंकते हुए से कहा।
“मैं भी मेले जा रहा हूं। आओ चलो बैठो।” पिंकू ने कहा।
दोनों गाड़ी में बैठ जाती है। और तीनों बतियाते – बतियाते मेले पहुंचे। बातचीत से माहौल तो पहले ही खुशनुमा हो गया था उस पर मेला भी आ गया। मेले के पास रास्ता कुछ खराब था। सो राधा ने पिंकू को हाथ दे कर मदद करने को कहा।

पिंकू ने जैसे ही ऊपर से नीचे को राधा को ऊपर खेंचाने के लिए हाथ किया, त्यूं ही उसकी नजर राधा के वक्ष स्थल के ऊपर वाले अधखुले भाग पर पड़ी। राधा ने पिंकू को देखते हुए भांप लिया। दोनों के दिलो में एक अजीब सी हलचल हुई, जो शायद इन दोनों ने पहली बार महसूस की थी। वे एक दूसरे को संभालते – संभालते नयन मटके में उस मेले के पास वाली किचन में फिसल गए। दोनों के कपड़े खराब हो गए। रूपा को वहीं बिठा कर वे पास के नल में अपने कपड़े साफ करने गए।

“तुम्हारी सगाई सच में हो गई क्या?” कपड़ों को झाड़ता हुआ पिंकू शरमाते हुए सा बोला।

“क्यों? नहीं हुई होती तो तब क्या तू………….?” राधा ने स्त्री सुलभ मुस्कुराहट बिखेरते हुए नीची नजर कर के तिरछी चितवन निहार कर कपड़े धोते हुए कहा।

” नहीं – नहीं। बस सुना था। सो पूछ लिया।” पिंकू उसी मुद्रा में बोला।

“हां हो गई है। ठीक सुना है तुमने।” राधा ने भी उसी मुद्रा में जबाव दिया। वे दोनों बातों ही बातों में मस्त हो गए थे। बाहरी परिचय तो उनका पहले से ही था, पर आज तो उनका रूहानी परिचय भी हो गया था शायद। ऊपर से धीमे से रूपा की आवाज आई,” ओ री ओ राधा। जल्दी कर बच्ची। तेरा मंगेतर मेले में पहुंच गया है शायद।फोन कर रहा है।”

“उठा ले तू ही।” राधा ने ठिठोली करते हुए कहा।
“अरे ओ लैला! कहीं उसने तुम्हे यूं देख लिया न पानी में आग लग जाएगी आग हां।जल्दी कर।” रूपा ने चठकरी करते हुए कहा।

“अच्छा पिक्की!” हाथ हिलाते हुए राधा ने पिंकू से जाते हुए कहा।

राधा के मुख से अपने लिए पिंक्की सुन कर पिंकू के दिल की आग में घी पड़ गया। शाम को राधा अपने घर पहुंची और सीधा अपने कमरे में चली जाती है।

“राधा। ओ राधा।” जानकी चाची ने आवाज लगाई।
“जी दादी।” राधा अंदर से कपड़े बदलते हुए बोली।
“देख तो तेरा फोन आया है।” चाची बोली।

“किसका है दादी?” राधा बोली।
“किसका होगा ? तुझे नहीं मालूम क्या?” चाची ठिठोली करते हुए बोली।
चाची की बातों से राधा ने अंदाजा लगाया लिया कि उसके मंगेतर का ही होगा। उसने उतना तबजो न दिया। कपड़े बदलती रही। इतने में शालू खिखियाते हुए राधा के कमरे में फोन ले कर आया।

“सुन भी तो लो दीदी। जीजा जी नाराज हो जाएंगे नहीं तो।” वह छुटकू राधा को छेड़ते हुए से बोला।

“होने दे नाराज। पीछा छूटेगा।” राधा अपनी घर वाली कमीज़ पहनते हुए बोली और उसके हाथ से फोन झुंझला कर ले लेती है।

“हेलो ! कौन है? अब बोलो भी चुप क्यों हो। कपड़े बदल रही थी। देर लग गई। इसमें नाराज होने की क्या बात है?
बोलो भी कुछ नहीं तो मैं काट रही हूं।” राधा त्योरियों को चढ़ाते हुए बोली।

“सुन – सुन, मैं पिंक्की बोल रहा हूं। फोन मत काटना प्लीज!” फोन पर पिंकू ने धीरे से कहा।

यह सुन कर राधा घर के पिछवाड़े में फोन सुनने चली गई। घरवालों ने सोचा कि यह हमसे शर्मा कर दामाद से बात करने पिछवाड़े गई है। चाची ने राधा का फोन पहले उठाया था। उस पर किसी मर्द की आवाज सुन कर अंदाजे से दामाद का फोन होने का अनुमान लगाया था।

सब खुश थे कि बेटी को दामाद का फोन आया है। पर किसे मालूम कि राधा ने फोन पर किसी और से कल मुलाकात का प्रोग्राम फिट किया है।

हल्की – हल्की बारिश बाहर हो रही थीं। कस्बे के नुकड़ पर बने रेन शेल्टर में राधा और पिंकू दो के दो बैठे हैं। कोई उन्हें देख नहीं रहा है।

“क्या तुम अपने मंगेतर से खुश नहीं है?” पिंकू ने राधा से कहा।
“किसने कहा?” राधा ने तल्खियों में कहा।

“तुम ही तो कल फोन पर कह रही थी।” पिंकू ने कहा। पिंकू ने राधा को शालू के छेड़ने पर बड़बड़ाते हुए सुन लिया था।

“हां नहीं हूं खुश। तो क्या कर लोगे तुम?” राधा बोली।

“तूने क्या यह फिल्म समझी है? कि हीरो विलन को पीट देगा।” पिंकू बोला।

“हीरो। और वो भी तू?” राधा हंसते हुए से बोली।

“हां – हां मैं। क्यों आपको कोई शक है?” पिंकू बड़े रुआब से बोला।
पिंकू की यह अदा तो राधा को और भी घायल कर गई।

“अच्छा – अच्छा एक बार फिर से करो ऐसा भला।” राधा ने अनुनय किया।
पिंकू ने क्रिया पुनः दोहराई।

उस रोज राधा के ससुराल वाले राधा की शादी की बात करने आए थे।

“देख भाई कुडमा (समधी)। अगले महीने तक जो देना ब्याह करी एबे। से मठा भी आई जाना घरा जो। फेरी कंपनी मंझा छुट्टी नी मिलदी।” राधा का ससुर मोहन भैया से बोल रहा था।
“हां बेटा ब्राह्मणा ते लग्न जोड़ी ले ओ। बाकी फेरी ब्याह रे घरा निकलें कई काम।” चाची ने हामी भरते हुए कहा।

शादी का लग्न शोध लिया गया था और तैयारियां दोनों ओर जोरों से थी। एक दिन दोनों परिवारों के लोग शहर शादी के जेवर – कपड़े खरीदने आए थे। राधा को भी पसंद का सामान खरीदने के लिए साथ लाया गया था। सभी खरीद फरोक्त कर रहे थे।

इस बीच राधा टॉयलेट गई। वहां से वह वापिस नहीं आई। थोड़ी देर बाद सब का ध्यान जब इस ओर गया तो दोनों परिवारों में खलबली मची। फोन लगाया। वह स्विच ऑफ आ रहा था। शहर का कोना – कोना छान डाला पर कोई खबर नहीं मिली। शाम होने वाली थी। तब सब ने निर्णय लिया कि पुलिस में रपट दर्ज की जाए। रपट लिखवाते ही सब अपने – अपने घरों को चले गए।

तीन दिन बाद डाकिया चिट्ठी को चाची के पास दोपहर को छोड़ गया था। चाची को पढ़ना आता नहीं था।
शाम को जब भैया और भाभी आए तो उन्हें दे दी।
“देखना मोहन तेरे नाम डाकिया चिट्ठी दे गया था।” चाची बोली।
मोहन भैया ने जब चिट्ठी पढ़ी तो आग बबूला हो उठा।

“नालायक को यह दिन दिखाने के लिए ही पाला – पोसा था हमने। नाक कटा डाली मूर्ख ने हमारी। मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा कहीं। क्या बोलेंगे समधी जी को। चलो उनसे तो ले दे के निपट भी लेंगे पर समाज को क्या कहेंगे?” मोहन भैया गुस्से से लाल हो कर बोल रहे थे।

“अरे हुआ क्या है? जरा हमें भी तो बता। बस उसे कोसता ही जा रहा है। ऐसा क्या किया है उसने?” चाची ने डांटते हुए से बोली।

“तुम तो चुप ही रहो अम्मा। तुम्हीं ने उसे अपने लाड़ प्यार से बिगाड़ा, जिसका परिणाम आज हम भुगत रहे हैं।” मोहन भैया झल्ला कर बोले।
“अरे मुझे जो भला – बुरा कहना है सो बाद में कहना। पहले बता तो सही हुआ क्या है?” चाची भी कड़की से बोली।

“होना क्या है अम्मा? यह कोर्ट की न्यायिक सूचना है। जिसमें लिखा है कि राधा ने पवन सुपुत्र बृजमोहन से शादी कर ली है और क्या?” मोहन भैया गुस्से से बोले।
उस दिन चंपा दीदी पुनः राधा के गायब होने की खबर सुन कर यहां खबर संभाल करने आई थी। वह चौंक कर बोली,” क्या? उस बृजमोहन के लड़के से, जो पड़ोस के गांव का है?”
“हां वही।” मोहन भैया ने ऊंघते हुए से बोला।

“देखा न। आखिर उसने अपनी करतूत दिखा ही ली आखिर। मैं न कहती थी कि यह लड़की तुमने कुछ ज्यादा ही सिर पर चढ़ा रखी है। बिगाड़ दी ना उसने जात। मेरी सुनता ही कौन था?” चंपा दीदी इठलाते हुए सी बोली।

“इससे तो वह मर ही गई होती तो एक ही दुख तो होता। अब तो वह जिंदगी भर खुद भी मरेगी और हमें भी मारती रहेगी।” छाती पीटते और रोते हुए उमा भाभी बोली।

“वह जिए अब अपने हाल में। मैं उसे अपने घर में घुसने नहीं दूंगा। मेरे लिए वह मर गई समझो।” मोहन भैया ने झुंझलाते हुए से कहा और अंदर चला गया।

कुछ दिन बाद राधा ने घर पर फोन किया। उमा भाभी ने उठाया। रोते – रोते बोली,” बेटा क्या कसर रखी थी हमने तुझे पालने में? तूने तो हमें कहीं का न छोड़ा! भागना भी था तो किसी अपनी जाति वाले के साथ भागती। क्या जरूरत पड़ी थी पिंकू के साथ भागने की? रिश्ता मंजूर न था तो मुझसे कहती, अपनी दादी से कहती। पर तूने तो हमारी नाक कटवा दी।,” रोते – रोते उमा भाभी ने फोन काट दिया।

राधा अभी अपनी बात कह ही नहीं पाई थी। वह कैसे बताती कि इश्क जात – पात को नहीं देखता। वह तो बस हो जाता है। और जब होता है तो सब नियम तोड़ कर अपनी मंजिल को लक्ष्य कर निशाना साधता है। पर वह जानती थी कि अभी मां का ही गुस्सा नहीं ठंडा है तो पिता जी का तो सातवें आसमान पर होगा।

कई दिन बीते पीछे बृजमोहन जी मोहन भैया के घर सुलह की बात करने आए। वह अपनी बिरादरी का गांव में ही नहीं इलाके में रसूखदार आदमी था। ऊंची जाति के लोग भी उसके ओहदे की तासीर के चलते ऊंची जुबान में उन से बात नहीं करते थे। पर वे दिल और व्यवहार के बहुत अच्छे थे। उन्होंने ही उस दिन कोर्ट में राधा और पिंकू की शादी करवाई थी। पिंकू को फोन पर जब राधा ने अपनी शादी की बात बताई थी तो उन्होंने इन दोनों की बाते सुन ली थी। सारी सेटिंग फोन पर इन्हीं की छत्र छाया में संपन्न हुई थी।

“अब क्या लेने आए हो बृजमोहन साहब? बेटी को तो ले गए हो बहला – फुसलाकर । उससे पेट नहीं भरा क्या? और क्या हमारी किरकिरी करने में अपनी ऊंची समझते हो?” मोहन भैया ने अनमने मन से कहा।

“नहीं मोहन बाबू। हम किसी को नीचा दिखाने नहीं आए हैं।बस सुलह करने आए हैं।” बृजमोहन शांति से बोले।

“काहे की सुलह ? कोई सुलह नहीं होगी। जाओ, चले जाओ यहां से। हमारे लिए वह मर गई और उसके लिए हम।” मोहन भैया झल्ला कर बोले। यहां गांव वालों ने मोहन भैया की बात की दात दी। उससे वे और शेर बन बैठे। उन्हें लगा कि अब गांव वाले मेरा आदर फिर से वैसे ही करेंगे, जैसे पहले करते थे।

“देखो मोहन बाबू! अब छोड़ो भी सारा गुस्सा। बच्चों ने प्यार किया कोई पाप नहीं किया। अब दोनों की कानूनी शादी भी हो चुकी है। अब तो उन्हें माफ कर लो और अपना लो। बच्चो को जितनी ही जरूरत हमारी है, उतनी ही आपकी भी है।” बृजमोहन पुनः शांति से बोले।

“क्या बात करते हो बृजमोहन साहब? अपने ओहदे और पैसों की धौंस मत जमाना।किस कानून की बात करते हो तुम? वही कानून तो तुम्हे जाति – पाती के प्रमाण पत्र बांटता है। फिर हम कैसे तुम्हारे साथ उठना – बैठना मंजूर करें?” मोहन भैया त्योरियां चढ़ाते हुए बोले।

“देखो मोहन भैया। इस संसार में कुदरत ने दो ही जातियां बनाई है। एक स्त्री और दूसरी पुरुष। वही सृष्टि के घटना चक्र को चलाने में सदा से कुदरत का साथ दे रही हैं। बाकी तो सब मनुष्य मन की खुरापात है। इसलिए इस जात – पात के विवाद में न पड़ कर बच्चों के बारे में सोचो।” बृजमोहन ने शांति से समझाते हुए से बोला।

“अपना यह ज्ञान कहीं और सुनाना, यहां नहीं। बड़े आए उपदेश देने। जब तुम एस. सी. का प्रमाण पत्र ले कर आरक्षण लेने के लिए अपनी जाति बड़े फखर से बताते हो, तब यह उपदेश नहीं देते? तब नहीं कहते कि हमें जाति प्रमाण पत्र नहीं चाहिए। हमें मानव होने का प्रमाण पत्र दो। अब अपनी जाति स्वीकारने में हेठी समझ रहे हो।” मोहन भैया ने अपने मन की सारी भड़ास उतार दी।

“अरे भाई क्यों बात उलझा रहे हो? मैं मानता हूं कि आरक्षण होना ही नहीं चाहिए।हो भी तो जातियों के आधार पर न हो। आर्थिक आधार पर हो। यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। ऐसा अगर समय पर हो गया होता तो इन आजादी के सत्तर साल में हमारे बच्चों ने आपसी रिश्ते कायम कर जात – पात का रोग ही मिटा दिया होता।पर यह तो राजनीतिक मसला है। इसमें हम क्या कर सकते हैं? और फिर इन बच्चों का तो कोई दोष ही नहीं।” बृजमोहन ने पुनः समझाते हुए से कहा।

“अच्छा! तुम कुछ नहीं कर सकते हो या कि जानबूझ कर कुछ करना ही नहीं चाहते? बृजमोहन साहब तुम जैसे रसूखदार जब इस बुराई का विरोध करें ना, सरकारों को रातों रात सब बदलना पड़ेगा। हम तुम्हारी चालाकियों को खूब समझते हैं। उससे पहले कि गांव वाले तुम्हारे साथ कुछ बुरा कर डालें, अपने रास्ते चलते बनो।” मोहन भैया विलक्षण मुद्रा में बोले।

बृजमोहन समझ गए कि इन तिलों से तेल नहीं निकले गा।अपने छोटे को इशारा कर घर को चले गए।

वर्षों बीत गए। वहां राधा और पिंकू के एक बेटी हुई। वह चार – पांच साल की हो गई थी। अब सुंदर बहू का मोह धीरे – धीरे राधा की सास से उतर रहा था। हररोज दोनों में घर के किसी न किसी कामकाज पर नोक – झोक होती ही रहती थी। उस दिन सास ने राधा को बहुत खरी – खोटी सुनाई थी,” तेरे मां – बाप ने तुझे रखा कहां था? खाना भी बनाना नहीं सिखाया। किसी भी काम की नहीं है डायन। मेरे बेटे को डोरे डाल कर अपना उल्लू सीधा कर गई बेईमान।” और भी न जाने क्या कुछ?

राधा अपनी बच्ची को उठा कर दुखी हो कर अपने पिता के यहां चली आई। सोचा मां – बाप माफ कर लेंगे। शाम के समय में जब वह अपने मायके पहुंची तो उसके पिता आंगन में बैठे थे। उससे पहले कि वह अपना दुख कहती। मोहन भैया ने आते ही उसे डांटना शुरू किया,
” क्यों आईं है यहां अब नालायक ? रह गई है कुछ कसर क्या?”
राधा रो रही थी। उसकी नन्ही सी मुन्नी उसके आंसू पोंछ रही थी और तोतली आवाज में बोल रही थी,” तुप तरो मम्मा! तुम तियुं डो डही हो? यह तुम्हे डांट रहे हैं। ये कौन है?”

मोहन भैया की ऊंची आवाज सुन कर घर के सब बाहर आ गए। पड़ोस के लोग भी बाहर निकल आए। राधा अपराधिनी की तरह नजरे झुकाए खड़ी थी।

“चुप भी कर अब मोहन। बस बोले ही जा रहा है। देखता नहीं कि कितने दिनों बाद बेटी आईं है?” चाची ने डांटते हुए कहा। और राधा को गले से लगा कर हालचाल पूछा।

दोनों को बतियते और रोते हुए उमा भाभी की आंखे भी भर आई। लोगों को बाहर देख कर राधा को दोनों मियां बीबी ने पुनः डांटना शुरू किया। डांटते – डांटते अंदर चले गए। सब लोग बाहर दात दे रहे थे। मोहन बिल्कुल ठीक बोल रहा है। इस कुलटा ने तो सारे गांव की नाक काट ली। उधर चाची ने सब को डांटा और भगा दिया।

अंदर भैया और भाभी आपस में मशविरा कर रहे हैं कि इसे रात को रखना कहां है? लोक लाज से बचने के लिए उसे बेटी के साथ नीचे वाले कमरे में रखने का निर्णय हुआ। सोचा धीरे -धीरे लोग भूल जाते हैं, तब सब ठीक होगा।

उस रात राधा को निचले कमरे में रखा गया। सुबह जब राधा की नन्ही बच्ची ममी – ममी चिलाने लगी तो सब निचले कमरे की ओर दौड़े। देखा वहां राधा थी ही नहीं।बच्ची को पूछा गया कि ममी कहां गई? पर उसे कुछ भी मालूम नहीं था। वह तो बस रो रही थी।

शालू रोता – रोता आया,” अरे पापा, पापा दीदी वहां चटान के पास पड़ी है। उसके मुंह से खून निकल रहा है।”
सब वहां भागे – भागे जाते हैं। पर राधा अब चली गई थी।

बच्ची ममी से चपटना चाह रही थी। उसे दूर ले जाया गया। सब रो रहे हैं। मोहन भैया भी फुट – फुट कर रो रहे हैं। शायद राधा ने रात को बच्ची को सुला कर उस पास वाली चटान से कूद कर अपनी जान दे दी थी। वह कुछ सहन नहीं कर पाई थी शायद। उसकी सहन शक्ति जबाव दे गई होगी। वहां सास की खींच – खींच और यहां उसे निचले कमरे में रखा जाना शायद रास नहीं आया। वह अंदर ही अंदर कुढ़ कर अपनी जान दे देती है।

उधर शहर से राधा के पति व ससुर घर पहुंचते हैं। उनसे राधा की सास ने कहानी उल्टी बता दी थी। पोस्ट मार्टम हुआ और लाश जाला दी गई। पुलिस केस दोहरा हो गया था। राधा के घर वालो ने मोहन भैया का केस किया और मोहन भैया ने घरेलू हिंसा का केस किया। दोनों परिवारों में आग लगी है। यहां पिंकू भी बहुत दुखी है।वह तो शायद दूसरी शादी करके संभल जाएगा पर बेचारी उस नन्ही सी बेटी की मां को कौन वापिस लाएगा? वह हर रोज मायूस होकर उस रास्ते को देखती रहती है, जहां से उसकी मां को जलाने के लिए ले जाया गया था।

घोषणा :- यह मेरी मौलिक और स्वरचित कहानी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — यह एक प्रेम कहानी है। इस कहानी में हेमराज ठाकुर जी ने भारतीय समाज की जात पात की रूढ़ भावना के चंगुल में जकड़े होने के उन कारणों पर भी प्रकाश डाला है, जिन के कारण आज की युवा पढ़ी लिखी पीढ़ी भी उसी छुआ छूत के जंजाल में फंसी पड़ी है। लेखक ने यह सिद्ध करने की कोशिश भी की है शायद कि आज़ादी के 74 सालों बाद भी भारतीय समाज जात पात की निकृष्ठ विचारणा से बाहर नहीं आ पाया है। इतना ही नहीं प्रेम के पाश में बंधे जोड़ो में यदि विजातीय प्रेम विवाह बच्चों के द्वारा किया जाता है तो उच्च वर्गीय समाज के अभिभावक अपनी सन्तान से नाता ही तोड़ देते हैं पर इस सामाजिक बुराई का विरोध नहीं कर पाते। चाहे उन्हे अपनी संतानों की जान ही क्यों न खोनी पड़े। सामाजिक नियमों और प्रतिष्ठाओं का इस सम्बन्ध में इतना प्रभाव है कि देश का कानून भी इसके आगे कुछ नहीं कर पाता। लेखक ने पात्रों के माध्यम से यह भी सिद्ध करने की कोशिश की है कि इस समस्या का मुख्य कारण वर्तमान पढ़े लिखे समाज के सामने जातिगत आरक्षण भी है शायद। संविधान में तो इस भेद भाव को मिटाने की बात की गई है और निम्न समझा जाने वाला समाज संविधान की इस दलील को पूर्ण रूप से लागू करने की मांग भी समाज से करता है। परन्तु आरक्षण छोड़ने को तैयार नहीं है। जबकि संविधान में आरक्षण का प्रावधान मात्र 10 साल तक प्रभावी रखने के निर्देश संविधान निर्माताओं ने दिए थे। इधर उच्च वर्गीय समाज को इस प्रथा से बाहर आने को कहा जाता है तो वह इसी जातिगत आरक्षण की बात डंके की चोट देकर करता है। एक छोड़ने को तैयार नहीं और दूसरा मानने को तैयार नहीं। इसी कारण नई और पढ़ी लिखी पीढ़ी में भी यह भावना सब कुछ जानते और समझते हुए भी निरंत बढ़ती ही जा रही है। लेखक का मानना है कि संसार में मात्र दो ही जातियां हैं, एक स्त्री और दूसरी पुरुष। जो प्रकृति ने सृष्टि संचालन के उद्देश्य से अपना सहयोग करने के लिए बनाई है। बाकी सब मानव मस्तिष्क की खुराफत है। अतः इस कहानी से हमे यह संदेश मिलता है कि भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए हमे भारत से जात पात के भेद भाव को जड़ से मिटाना होगा। पुनः वैदिक दर्प को स्थापित करना होगा।

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यह कहानी (दास्तान ए जात पात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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