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2023-KMSRAJ51 की कलम से

प्रेम अधूरा ही है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Prem Adhoora Hee Hai | प्रेम अधूरा ही है।

प्रेम अन्त अभिलाषा है जीवन की,
पर मिला वह सबको अधूरा ही है।
राम – कृष्ण की कहानी को सुन लो,
उनमें भी कौन सा वह पूरा ही है?

यह रही दास्तां यूं ही है जीवन की,
हर युग में और हर जिंदगानी में।
राधा – कृष्ण का मेल हुआ कहां?
राम – सिया भी बिछुड़े नादानी में।

हुआ मुक्कमल न स्वपन किसी का,
प्रेम की चाहें ही सबकी अधूरी रही।
भले ही प्रेयसी राधा थी या सीता थी,
अधूरेपन की पीड़ा तो है सबने सही।

मूर्तिमान हुआ प्रेम किसका कहां है?
जिसकी अभिलाषा हम सब करते हैं।
अधूरा सा मिला है जो भी हम सबको,
उसे खोने से भी सब कितना डरते हैं?

जी लेते हैं जिंदगी हम पूरी हर रिश्तों में,
पर हर रिश्ते में देखे तो प्रेम अधूरा ही है।
कई – कई विवाहों से भी कहां प्यास बुझी?
अवतारों के जीवन में भी प्रेम कहां पूरा है?

जिन्दगी जद्दोजहद है प्रेम और वासनाओं की,
लोग सकून कहां किसी को यहां लेने देते हैं?
यह संसार तो है बीहड़ घाटी नित कर्मों की,
यहां अवतारों की भी परीक्षा लोग ले लेते हैं।

यह सच है कि प्रेम जरूरत है हर जीवन की,
भाषा प्रेम की पशु – पक्षी को भी समझ आती है।
जिन्दगी के तमाम उम्र के सिलसिले में हर सम्भव,
प्रेम के अधूरेपन का दर्द हमेशा सबको सताता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सच्चा प्रेम एक गहरा और निःस्वार्थिक भावना है जो दो व्यक्तियों के बीच संबंध को बांधती है। यह एक आत्मिक और उदार बन्धन है जो अपने आप को समर्पित करता है और एक-दूसरे के हित में संयम बनाए रखता है। सच्चा प्रेम अपने आप को व्यक्त करने और स्वयं को स्वीकार करने की क्षमता वाला होता है। सच्चा प्रेम कठिनाइयों, आपत्तियों और चुनौतियों के बावजूद टिकता है। यह दूसरे व्यक्ति को निर्मल रूप से स्वीकार करता है, उनकी गलतियों और कमियों के बावजूद उन्हें सच्चा प्यार करता है। सच्चा प्रेम समर्पित, आदर्शवादी, और सहानुभूतिपूर्ण होता है। सच्चा प्रेम आपके साथी की सफलता, खुशी और प्रगति के लिए चिंतित रहता है और उनके सपनों और उच्चतम OUTPUT की प्रोत्साहना करता है। यह समर्पण, विश्वास, सम्मान, संयम और सम्पूर्ण समर्पण का एक गहरा बंधन होता है। सच्चा प्रेम आपके और आपके साथी के बीच एक संतुलित और आनंदमय संबंध स्थापित करता है। यह सच है कि प्रेम जरूरत है हर जीवन की, भाषा प्रेम की पशु – पक्षी को भी समझ आती है। जिन्दगी के तमाम उम्र के सिलसिले में हर सम्भव, प्रेम के अधूरेपन का दर्द हमेशा सबको सताता है। जब भी करो प्रेम तो सच्चा प्रेम ही करो, वरना दिखावे के प्रेम करने का कोई फायदा नहीं है।

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यह कविता (प्रेम अधूरा ही है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कैसे संभव है देश का विकास?

Kmsraj51 की कलम से…..

Kaise Sambhav Hai Desh Ka Vikas | कैसे संभव है देश का विकास?

⇒ चिन्तित और उद्विग्न मानस ने…

सामाजिक विषमताओं और विकृतियों को लेकर चिन्तित और उद्विग्न मानस ने जब मुझे रात्रि के तीसरे पहर कचोटा तो मुझसे रहा नहीं गया। एकाएक आंखें खुली और मैं जाग उठा। बुद्धि के दर्पण में मानस की विकल शक्ल को झांका तो एक अजीब सी छटपटाहट और बेचैनी सी देखी। अंतःकरण में अनायास ही कई सारे प्रश्न एक साथ आसमानी बिजली की तरह कौंधे, जिन्हे व्यवस्थित करना मेरे लिए किसी जंग जीतने से कम नहीं था। फिर भी बिस्तर पर लेटे – लेटे हर एक उमड़ते हुए विचार से मानसिक युद्ध करता रहा और जैसा भी हुआ वैसा व्यवस्थापन अपने विचारों का करता रहा। अब इस मानसिक युद्ध में कौन जीता? मैं या मेरे अन्दर उमड़ी बदलते समाज की मान्यताएं? मेरे लिए कहना बहुत ही मुश्किल है पर जैसा भी हुआ, वह तुरन्त एक लेख लिख कर अपने आंतरिक द्वंद्व से मुक्ति पाने के लिए प्रयास करना ही मेरे पास एकमात्र उपाय था।

⇒ शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए … ‘या’ … आज की शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन…

प्रश्न समाज के बदलते विचारों और नवीन भावबोधों को लेकर खड़े हुए थे और खत्म एक लेख का रूप ले कर हुए। अचानक रात्रि के तृतीय पहर में निद्रा में विचार कौंधा कि आज समाज क्यों इतना खुदगर्ज और असंस्कृत होता जा रहा है? एक शिक्षक हूं तो जाहिर सी बात है कि पहले पहल तो सोच शिक्षा और शिक्षक के इर्द गिर्द ही इस मामले को ले कर दौड़ेगी। इसी दिशा में पहला विचार आया कि हमारे यहां तो शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए दी जाती थी और आज शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन बनती जा रही है। कहीं यह तो सामाजिक मान्यताओं के विकृतिकरण का कारण नहीं है?

⇒ आज स्कूलों – कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में…

आज स्कूलों कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में आ गए हैं, जो पुस्तकों को पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। जो थोड़े बहुत पढ़ते भी हैं, वे भी मात्र परीक्षा पास करने के लिए और अच्छे अंक लेने के लिए या फिर सरकारी नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं।

बाकी पुस्तकों को विद्या अध्ययन के लिए पढ़ने का चलन आज पूर्ण रूप से खत्म ही हो गया है। खैर विद्यार्थियों की छोड़िए। वे तो नादान होते हैं। उन्हें तो अभी शिक्षा, विद्या, अविद्या, पारा विद्या, महा विद्या और साक्षरता आदि शब्दों का शब्दार्थ भी ठीक से ज्ञात नहीं है शायद। पर बड़े – बड़े स्कूलों और कॉलेजों में तैनात अध्यापकों और प्रवक्ताओं तथा प्राध्यापकों का भी इस सन्दर्भ में मिजाज कुछ अच्छा नहीं है। इनमें से अधिकांश कभी कृपटो करेंसी तो कभी ऑन लाइन आई पी एल मैच में अपनी टीम लगा कर पैसों के पीछे स्कूलों – कालेजों के कर्तव्य काल में भी भागे हैं तो बाकी शेष बचे सुबह – शाम के समय में अपनी मस्ती में आमादा है।

अब बताइए कि वह भी पुस्तकालयों की बड़ी – बड़ी अलमारियों में पड़ी और धूल फांक रही अच्छे से अच्छी पुस्तकों को कब पढ़ेगा? जिनमें सामाजिक व्यवस्थापन के अनेकानेक मानवीय पहलू लिखे पड़े हैं। उनमें लिखा पड़ा है मानवीय मूल्यों का विवरण, जो मानव को पशु पक्षी – जगत से अलग प्राणी बने रहने की सीख देता है। उनमें लिखा पड़ा है हर विषय का बारीक से बारीक ज्ञान, जो हर अध्यापक को उसके अध्यापन के लिए और मजबूत और तर्कसंगत करता है। पर नहीं, आज के अध्यापकों और छात्रों ने कसम खा रखी है कि पुस्तकालय का दरवाजा तक नहीं देखेंगे। उन्होंने बुद्धि के विलास के लिए गूगल को गुरु जरूर बनाया है पर बुद्धि के विकास के सारे दरवाजे बन्द करने पर तुले हैं। हम सब जानते हैं कि इंटरनेट में आजकल क्या – क्या चलता है और उसके परिणाम क्या हो रहे हैं? बच्चे भी सच्चे हैं।

⇒ गुड में जहर से कम नहीं …

जब गुरु जी हर बात गूगल से देखते हैं तो बच्चे क्यों न देखें? बच्चे तो अध्यापकों को ही अपना आदर्श मानते हैं। और तो और परीक्षा तथा परिणाम के समय में देखे तो ये गुरु चेले अब्बल करते हुए पाए जाते हैं। सौ में से नब्बे किसी के छियानवे फ़ीसदी अंक आते हैं। पूछे तो ज्ञान धेला भी नहीं। गुरु जी को रिजल्ट देना होता है। वह ऑप्शनल प्रश्न गूगल से देख कर परीक्षा में बच्चों को करवा देता है और बच्चे बिन पढ़े ही गुरु जी की कृपा से अच्छे अंकों से पास हो जाते हैं। वे भी गुरु जी के कायल हो जाते हैं। वाह! क्या अच्छे गुरु जी या मैडम जी है हमारे?

बेचारे नादान ये नहीं समझते हैं कि यह सब गुड में जहर से कम नहीं है। गुरु जी काम चोरी के चलते या रिजल्ट देने के चलते और छात्र अच्छे अंक प्राप्त करने के चलते साल के अन्त में इन्ही हथकंडों को अपनाते हैं। अपनाए भी कैसे न? जब साल भर दोनों ने मस्ती ही मारी है और बौद्धिक विलास ही किया है तो फिर समाज में दोनों को अच्छा भी तो अपने को दिखाना है।

अच्छे अंक जब आते हैं तो मां – बाप भी बच्चे से खुश हो जाते हैं तथा गुरु जी के भी कायल हो जाते हैं। वाह! क्या कमाल का पढ़ाते हैं गुरु जी? मेरे बच्चे ने सौ में से छियानवे फ़ीसदी अंक प्राप्त किए हैं। बच्चे की प्रशंसा करते – करते भी नहीं थकते। हमारा बेटा – बेटी भी तो पढ़ाई में तेज है जी। आधी – आधी रात तक नेट में तैयारी कर रहा होता है। अब वह क्या दिखता है ? इसका किसी को कोई खबर नहीं। बस इसी बिगाड़ के चलते बच्चों को और प्रोत्साहन मिलता है। वह अपनी एक दो जिद्दें मां – बाप से और पूरी करवाता है।

फिर एक दिन जब वह बच्चा स्कूल – कालेजों से बाहर आता है तो वह संस्कार हीन और दिशाहीन हो कर समाज में आता है। यदि कहीं जुगाड़बाजी से वह सरकारी सेवा में फिट हो भी जाता है तो समझ लो कि वह किस स्तर की सरकारी सेवा देगा? अब जब प्राप्तांको के आधार पर ही सरकारी नौकरियां दी जाएगी तो नौकरी तो मिल ही जाएगी। फिर बोलो कि भ्रष्टाचार की जड़ कहां है? मैं इन्टरनेट का विरोधी नहीं हूं। विरोधी हूं उसके गलत इस्तेमाल का। यदि सच में शिक्षा के लिए अध्यापकों और बच्चों द्वारा उसका प्रयोग किया जाए तो वह शिक्षा की दशा और दिशा ही बदल देगा।

इधर सरकारें और सरकारों के नीतिकार हैं कि बच्चों को प्रताड़ित करने के अधिकार से अध्यापकों को वंचित करने पर तुले हैं। इससे जो थोड़े बहुत अध्यापक संस्कार और व्यवहार की शिक्षा के पक्षधर है भी, उनके हाथ – पांव भी बंधे पड़े हैं। वे भी देखा देखी में खुद को कुढ़ा हुआ महसूस करते हैं और व्यवस्था का हिस्सा बना लेते हैं। बस अब तो अध्यापक ने अपना मक़सद स्कूल जाना, हाजरी लगाना तथा अपने विषय का पीरियड लगाना ही तय किया है। खाली पीरियड में वह भी नेट में या तो गेम खेलता हुआ मिलेगा या फिर कुछ और देखता हुआ मस्त रहता है।

⇒ पुस्तकालयों का सदुपयोग नहीं हो रहा है…

पुस्तकालयों की स्थापना स्कूलों में यूं ही जाया जा रही है। न अध्यापक पढ़ता है और न छात्र। विषय विशेषज्ञ होने के बावजूद भी कई ऐसे मद होते हैं, जो पुस्तकों को पढ़ने और सामूहिक चर्चा – परिचर्चा से और स्पष्ट होते हैं। पर आज ऐसी बात करना ही मूर्खता की निशानी हो गई है। किताबे यदि पढ़ी जाती है तो मात्र नौकरी लगने के लिए।बस एक बार नौकरी मिल गई तो फिर तो हर व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। नौकरी सरकारी हो या निजी। हर व्यक्ति आज वेतन तो पूरा चाहता है पर काम करना ही नहीं चाहता है। इस नकारात्मकता का कारण आखिर क्या है?

तभी तो कहता हूं कि — “शिक्षा योग का विषय है भोग का नहीं।”
“शिक्षा बौद्धिक विकास का विषय है बौद्धिक विलास का नहीं।”
“शिक्षा आत्मरंजन का साधन है मनोरंजन का नहीं।”
“शिक्षा नैतिकता और चरित्र निर्माण का साधन है विकृतता का नहीं।”
“शिक्षा अनुशासन का विषय है शासन – प्रशासन का नहीं।”
यह बात समूचे विश्व को समझनी चाहिए।

मेरा मानना है कि स्कूल वह निर्माण संस्थान है, जहां भविष्य के समाज के निर्माण के लिए शिक्षार्थी रूपी सामग्री तैयार की जाती है। यदि उस सामग्री के निर्माण में ही गड़बड़ हो जाएगी, तो समाज रूपी इमारत की मजबूती का भी प्रश्न ही पैदा नहीं होता है। यानी सामग्री निर्माता गुरु का नैतिक और चारित्रिक रूप से उन्नत होना और अत्यधिक भौतिकता से दूर रहना जरूरी है।

⇒ शिक्षा व्यवस्था में संस्कार जरूरी है…

“शिक्षा व्यवस्था में संस्कार शिक्षा का जोड़ना जरूरी है। शिक्षकों को छात्रों को रोकने – टोकने के अधिकार देना जरूरी है। अभिभावकों को अंकों के आंकड़ों से बाहर ला कर विद्या और शिक्षा के साथ – साथ राष्ट्रीयता और सामाजिकता का बोध कराना जरूरी है।” “वरना भविष्य का समाज पशु समाज से भी भयानक होगा।” रिश्तों की अहमियत नहीं होगी। पिता – पुत्र में, मां – बेटी में, भाई – बहन में, पति -पत्नी में और पड़ोसी – पड़ोसी में आत्मीयता नहीं रहेगी। सभी अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए और अपनी भौतिक चाह को पूरा करने के लिए कभी भी कुछ भी करने को आमादा रहेगें। कोई मरने मारने से नहीं डरेगा।

इसलिए देश की शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने की आवश्यकता वर्तमान में बहुत ज्यादा हो गई है। इसके चलते सरकारों को भी स्कूलों कालेजों में राजनीति से नहीं बल्कि समाज नीति से मनोयोग पूर्ण तरीके से काम करना चाहिए। शिक्षा के स्तर को शिक्षक ही उन्नत करेगा। बस सरकारों को यह तय करना है कि शिक्षकों को बिना डराए धमकाए एक उचित व्यवस्था दे कर सामाजिक और राजनीतिक मान – सम्मान दे कर कैसे शिक्षा का उत्थान करने के लिए स्वतन्त्र दायित्व देना है?

प्रश्न यह भी है कि यह दायित्व नकारात्मक, आलसी और लोलुप लोगों के हाथों में भी नहीं जाना चाहिए। “अर्थात — शिक्षा धनार्जन का विषय न बने बल्कि ज्ञानार्जन और संस्कृति तथा सभ्यता की सम्बाहक बनकर सामने आए।” जिस व्यवस्था में रोजगार प्राप्ति की राह के साथ – साथ व्यक्ति विद्या तथा परा ज्ञान की प्राप्ति भी करे। ताकि कल जब वह विद्यार्थी समाज में जाएगा तो एक नेक और संस्कारवान व्यक्ति की भूमिका में जाए।

खैर मैं जानता हूं इस बात को कोई नहीं मानेगा। सभी यही कहेंगे कि हम अपना शत प्रतिशत देते हैं। जो शिक्षा व्यवस्था बनी है वह बिलकुल ठीक है। मुझे ही फटकारेंगे। पर अंदर से सभी यह जानते हैं कि असलियत क्या है? सरकारी नौकरी का वर्तमान में यह हाल हो गया है कि एक बार मिलनी चाहिए बस। फिर तो वह व्यक्ति काम करने को राजी नहीं है। निजी क्षेत्रों में भी डर के चलते काम करते हैं वरना हाल वहां भी कुछ खास अच्छे नहीं है। नैतिकता से काम करने को कोई राजी नहीं है।

होना तो यह चाहिए कि नैतिकता के चलते व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करे, जिसकी उसे तनख्वाह मिलती है। तभी वह शिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य है। पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। आजकल सभ्यता और संस्कृति तथा शिक्षा की पहचान सुख-सुविधाएं, रसूख और पैसा हो गया है। शालीनता, विनम्रता, तथा नैतिकता नहीं। समाज की यह बदलती सोच बहुत बड़ी विडम्बना है। यहां पैसों के लिए अपना चरित्र तक बेचने को लोग तैयार है पर मेहनत करने को राजी नहीं है। ऐसे में कैसे संभव है देश का विकास? यह एक चिंतनीय प्रश्न है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हआज समाज क्यों इतना खुदगर्ज और असंस्कृत होता जा रहा है? एक शिक्षक हूं तो जाहिर सी बात है कि पहले पहल तो सोच शिक्षा और शिक्षक के इर्द गिर्द ही इस मामले को ले कर दौड़ेगी। इसी दिशा में पहला विचार आया कि हमारे यहां तो शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए दी जाती थी और आज शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन बनती जा रही है। कहीं यह तो सामाजिक मान्यताओं के विकृतिकरण का कारण नहीं है? आज स्कूलों कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में आ गए हैं, जो पुस्तकों को पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। जो थोड़े बहुत पढ़ते भी हैं, वे भी मात्र परीक्षा पास करने के लिए और अच्छे अंक लेने के लिए या फिर सरकारी नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं। बाकी पुस्तकों को विद्या अध्ययन के लिए पढ़ने का चलन आज पूर्ण रूप से खत्म ही हो गया है। नैतिकता के चलते व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करे, जिसकी उसे तनख्वाह मिलती है। तभी वह शिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य है। पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। आजकल सभ्यता और संस्कृति तथा शिक्षा की पहचान सुख-सुविधाएं, रसूख और पैसा हो गया है। शालीनता, विनम्रता, तथा नैतिकता नहीं। समाज की यह बदलती सोच बहुत बड़ी विडम्बना है। यहां पैसों के लिए अपना चरित्र तक बेचने को लोग तैयार है पर मेहनत करने को राजी नहीं है। ऐसे में कैसे संभव है देश का विकास? यह एक चिंतनीय प्रश्न है। “शिक्षा धनार्जन का विषय न बने बल्कि ज्ञानार्जन और संस्कृति तथा सभ्यता की सम्बाहक बनकर सामने आए।”

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यह लेख (कैसे संभव है देश का विकास?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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क्रोध।

Kmsraj51 की कलम से…..

Anger | क्रोध।

क्रोध को दिल में,
थोड़ी जगह क्या दे दी,
उसने पूरा हक जमा लिया।
पहले बहुत खुश था,
अपनी छोटी कुटिया में।
उसने धक्का मार कर,
बाहर निकाल दिया।

आज पता चला उसने,
मेरा ज्ञान मुझसे छीना है।
जल रहा है दिल मेरा,
क्यूँ दर्द कर रहा सीना है।

जब से क्रोध ने पनाह ली,
बहुत दुखी – दुखी सा रहता हूं।
अब मैं सब का बुरा चाहता,
सबको अपशब्द कहता रहता हूं।

ईर्ष्या की अग्नि में,
खुद जलने वाला हूं।
मानसिक संतुलन खो बैठा,
मानों मैं बिना चाबी का ताला हूँ।
मुझे चांद का पता नहीं,
पर जुगनुओं की तलाश है।

समंदर घर के सामने,
प्यास बुझती नहीं।
दिल मेरा उदास है,
समंदर से मुझे क्या?
अधर सूखे हैं,
दिल में प्यास ही प्यास है।

अज्ञान भरा था,
मुझमें कूट कूट के।
क्रोध के कारण,
छलक रहा अभिमान था।
विवेकहीन बना दिया मुझे,
बस अपनी मूर्खता का ज्ञान था।

क्रोध, ईर्ष्या बर्बादी का,
मार्ग दिखाती हैं।
ए वो टुकड़ा है शीशे का,
जिसमें सारी दुनिया दिख जाती है।

तौबा कर ले दोनों से,
गर बनना है तुझे महान,
एक दिन शीश झुकाये गा,
तुझपे सारा हिन्दुस्तान।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब हम गुस्से में होते हैं, तो हम होश खो देते हैं। पहला स्तर यह महसूस करना है कि क्रोध कभी भी कमियों को दूर नहीं कर सकता है। क्रोध की उग्र चेष्टाओं का लक्ष्य हानि या पीड़ा पहुँचाने के पहले आलंबन में भय का संचार करना होता है। जिस पर क्रोध प्रकट किया जाता है वह यदि डर जाता है और नम्र होकर पश्चात्ताप करता है तो उसे माफ़ कर देना चाहिए। क्रोध मानव के लिए हानिकारक है। क्रोध कायरता का चिह्न है। सनकी आदमी को अधिक क्रोध आता है। हम जब गुस्सा करते है, इससे हमारी ही सेहत खराब होती है। हमारे दिमाग की सोचने-समझने की शक्ति ख़त्म हो जाती है और शरीर में रक्त का बहाव भी तीव्र हो जाता है, इसलिए जब भी गुस्सा आये तो बिलकुल शांत हो जाये 5 मिनट्स तक, जिससे आपको और सामने वाले को कोई नुकसान नही होगा। कहते हैं कि क्रोध में आया व्यक्ति दूसरे का बाद में पहले खुद का नुकसान करता है। अल्बर्ट आइंस्टीन के अनुसार क्रोध या फिर कहें गुस्सा केवल मूर्खों के ब्रह्मांड में रहता है।क्रोध वह आंधी है, जिसके आने पर बुद्धि का दीपक बुझ जाता है। यदि क्रोध पर नियंत्रण न किया जाए तो वह जिस कारण उत्पन्न होता है, व्यक्ति को उससे कहीं ज्यादा हानि पहुंचा सकता है। किसी व्यक्ति को क्रोध आने पर चिल्लाने के लिए भले ही ताकत की जरूरत न पड़े लेकिन क्रोध आने पर चुप रहने के लिए बहुत ताकत की आवश्यकता होती है। किसी भी व्यक्ति का क्रोध तभी सही है, जब वह स्वयं पर कर रहा हो क्योंकि ऐसे क्रोध से स्वयं को बदलने की भावना पैदा होती है, परन्तु ऐसा क्रोध लोगों को कम ही आता है। जीवन में क्रोध से व्यक्ति के भीतर भ्रम पैदा होता है और भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है, जब बुद्धि व्यग्र होती है तब व्यक्ति का तर्क शक्ति नष्ट हो जाता है और जब तर्क शक्ति के नष्ट होते ही व्यक्ति का पतन होता है। कभी किसी व्यक्ति को क्रोध में उत्तर नहीं देना चाहिए, क्योंकि क्रोध व्यक्ति के विवेक को पूर्ण रूप से खा जाता है, जिसके बाद उसके भीतर अच्छे-बुरे को सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है। प्यारे दोस्तों – क्रोध को त्याग कर सभी के साथ स्नेह भरा व्यवहार करें।

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यह कविता (क्रोध।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हाल सुनाता परिभाषा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Haal Sunata Paribhasha | हाल सुनाता परिभाषा।

तुमको अपनी व्यथा सुनाता हूं आज,
बगैर मेरे समाज के पूर्ण होवे न कोई काज।

व्यथा सुनाने के लिए जरूरी नही कोई शब्द, न ही भाषा की,
देखो मेरा हाल बखान करता मेरी परिभाषा ही।

मेरे बच्चों की मुस्कान दिल को नित्य उत्साह से भरती,
उनकी खुशी को ढूंढने को जिंदगी हरसंभव प्रयास करती।

मेरे फटेहाल कपड़े और काली हुई त्वचा धूप से,
मेरे बच्चों की मुस्कान का मेल न मेरे रूप से।

हर दिन मालिकों की डांट में भी सदा मुस्कराता,
अपने जख्मों को हर समय मरहम लगाता।

न धूप की, बारिश की और तूफान की परवाह,
गरीबी की हर ओर बस दिखाई देती आह।

बस अपने कर्म में दिल लगाए मैं तो मजदूर हूँ,
बस परिवार के भरण पोषण में चूर हूँ।

मैं बेबस नहीं, मजबूर नहीं हूँ लाचार,
हमने ही तो लगाए सब ऐशो-आराम के तार।

समय मिले तो कभी….

कभी मेरी अंतर्मन की पीड़ा भी झांक कर देखना तुम,
कभी किसी कामगार पर स्वार्थ की रोटी न सेकना तुम।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मजदूर कहते हैं मैं आराम करने लगूं तो गजब हो जाएगा। मेरे लिए आराम हराम है। मैं खेतों से अन्न उपजाने का काम करता हूं। मैं आराम करने लगूं तो लाखों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हो जाएंगे। मजदूर कहते हैं — मैं मजदूर हूं। मैंने प्राचीन काल से लेकर आज तक सभ्यता की सीढ़ियां मैंने गढ़ी है। जमाना बदला लेकिन मैंने ज़मीन पर पीठ तक नहीं टिकाई। मैंने नदियों के बहाव को रोका है और उन पर विशाल पूलों का निर्माण किया है। मैंने बड़ी-बड़ी इमारतों को बनाया है । इन लंबी लंबी सड़कों को किसने बनाया? कश्मीर की क्यारियों में केसर किसने उगाई ? खेतों में फसलें किसने पैदा की ? मैंने ! केवल मजदूर ने। दिन सोता था। रात सोती थी, लेकिन मजदूर जगता था। मजदूर ने पहाड़ों को कांटा, चट्टानों को खोदा, खदानों में पहुंचा और वहां से सोना, चांदी लोहा, कोयला, हीरा सब कुछ निकाला। मजदूर कहता है… मैंने वनों को काटा, पथरीली जमीन को खोद-खोद कर नरम बनाया। मुझे अंग्रेज भारत से मारीशस, फीजी आदि अफ्रीकी घने जंगलों में ले गए। वहां सूर्योदय से सूर्यास्त तक काम किया।

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यह कविता (हाल सुनाता परिभाषा।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मजदूर दिवस का इतिहास।

Kmsraj51 की कलम से…..

History of Labor Day | मजदूर दिवस का इतिहास।

देखो मजदूर दिवस है आया,
1 मई 1886 का दिन याद है आया।
अमेरिका का मजदूर सड़कों पर उतर आया,
15-16 घंटे काम न करने का बीड़ा उठाया।

वहां की सरकार ने मजदूर पर कहर था ढाया,
पुलिस वालों की गोलियों से मजदूरों को भूनवाया।
बहुतों की जान गई 100 के करीबों को घायल पाया,
3 साल बाद इतिहास मे एक बदलाव आया।

1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन बुलाया,
8 घंटे काम करने का फैसला सम्मेलन में सुनाया।
1 मई को श्रमिक दिवस और छुट्टी का ऐलान करवाया,
फिर क्या था कई देशों ने इसे अपनाया।

भारत में इसके 34 साल बाद ये दिवस मनाया,
लेबल किसान पार्टी आफ हिंदुस्तान ने बीड़ा उठाया।
1 मई 1923 को चेन्नई में मजदूर दिवस मनाया,
ऐसा करके मजदूरों की उपलब्धियों का ज्ञान कराया।

शोषण को रोक उनके अधिकारों को बतलाया,
झोपड़ी से लेकर महलों तक मजदूरों ने है सजाया।
खुद कच्चे में रहा लोगों को महलों में बैठाया,
दुनिया के हर पहलू में मजदूर को है पाया,
क्या जीवन और क्या मृत्यु? सबमें मजदूर को पाया।

विजय, ने मजदूर दिवस पर लिखने को कलम को उठाया।
पर लिखते हुए श्रमिकों में खो गई खुदको निशब्द पाया।

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

—————

  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए; इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — मजदूरों के नाम समर्पित यह दिन 1 मई है। मजदूर दिवस को लेबर डे, श्रमिक दिवस या मई डे के नाम से भी जाना जाता है। श्रमिकों के सम्मान के साथ ही मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने के उद्देश्य से भी इस दिन को मनाते हैं, ताकि मजदूरों की स्थिति समाज में मजबूत हो सके। मजदूर किसी भी देश के विकास के लिए अहम भूमिका में होते हैं। मजदूरों के नाम समर्पित आंदोलन के तीन साल बाद 1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन की बैठक हुई। जिसमे तय हुआ कि हर मजदूर से केवल दिन के 8 घंटे ही काम लिया जाएगा। इस सम्मेलन में ही 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा गया, साथ ही हर साल 1 मई को छुट्टी देने का भी फैसला लिया गया।

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यह कविता (मजदूर दिवस का इतिहास।) “विजयलक्ष्मी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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परिंदों की प्यास बुझाए।

Kmsraj51 की कलम से…..

Parindon Ki Pyas Bujhae | परिंदों की प्यास बुझाए।

हम तो है सरकारी स्कूल के प्यारे बच्चें,
जुबां से बहुत भोले, दिल के है सच्चे।

शिक्षा के संग पर्यावरण का भी रखते ध्यान,
इन बेजुबान पक्षियों की प्यास का रखे मान।

न जाने कितने परिंदे प्यास से तड़प कर मरते,
आओं सब मिलकर परिंडों में पानी रखते।

समय – समय पर जब इनका रखें हम ख्याल,
तभी इनका मधुर कलरव हमको करता निहाल।

इन पक्षियों की आवाजों ने तो मधुर स्वर-संसार सजाया,
इनके गुणों पर ही हम सबको तो प्यार आया।

तर हो जाये गला जब इन पक्षियों का पानी पीकर,
अच्छा लगे इनको भी हम इंसानों संग जीकर।

दिल में यही एक बात हमने भी ठानी है,
गर्मी आते ही पक्षियों के लिए रखना पानी है।

शिक्षा संग इन गुणों को भी हम अपनाएंगे,
नेक कर्मों से सबके दिलों में ये प्रेम जगायेंगे।

परिंडों = मिटटी वाला पानी का पात्र

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — गर्मियों में कई परिंदों व पशुओं की मौत पानी की कमी के कारण हो जाती है। लोगों का थोड़ा सा प्रयास घरों के आस पास उड़ने वाले परिंदों की प्यास बुझाकर उनकी जिंदगी बचा सकता है। सुबह आंखें खुलने के साथ ही घरों के आस-पास गौरेया, मैना व अन्य पक्षियों की चहक सभी के मन को मोह लेती है। एक बात याद रखें – प्रकृति के पांचो तत्वों पर इन बेजुबान परिंदों का भी पूरा हक़ हैं, तो इनके लिए गर्मियों में जगह – जगह पेड़ों पर, घर के छत पर व पार्क वगैरह में जरूर स्वच्छ पानी रखें।

—————

यह कविता (परिंदों की प्यास बुझाए।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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पशु बलि।

Kmsraj51 की कलम से…..

Animal sacrifice | पशु बलि।

Pashu Bli

न जाने समाज क्यों, कुछ पिशाचियत पर अड़ता है?
बे ज़ुबान निरीह पशुओं की, बलि चढ़ाने पर लड़ता है।

देवताओं के नाम पर लेता है, जान इन बे जुबानों की।
क्यों भुल जाता है फितरत तब, समाज यहां इंसानों की?

सनातन संस्कृति के भाल पर, बलि प्रथा एक कलंक है।
कर्म दण्ड तो प्रभु सबको देगा, चाहे राजा हो या रंक है।

जिद करता है देव समाज, “न बलि तो सबको देनी होगी।”
विवश करते है देवता को भी, बलि तो तुझको लेनी होगी।

कारिंदों की जिद के चलते, देवता सदियों से बलि लेता है।
दहशत फैलाई जाती है, जो न दे, उसकी जान भी लेता है।

कौन हुआ है अमर अब तक, इन पशुओं की जान चढ़ाने से?
मैं करता हूं ऐसे कई सवाल, कई बार इस बिगड़े जमाने से।

सब जानते हैं कि गलत है यह सब, पशु बलि सच खोटी है।
फिर भी अपनी जान बचाने के भ्रम से, मार काट तो होती है।

इसी से ही कई जगहों पर, हमारे देवों की बदनामी होती है।
सनातन संस्कृति की दया धर्मिता, हमारी नादानी खोती है।

पिशाच नहीं तो क्या है फिर हम, जो दया धर्म है छोड़ दिया।
वैदिक पुरखों के सनातन धर्म को, स्वाद, स्वार्थ में तोड़ दिया?

देव न लेता है जान किसी की, फिर वह काहे का देव हुआ?
बस कारिन्दों की मांसाहार की चाह, बलि लेता है देव हुआ।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सभी धर्मों में जीव-हिंसा को बहुत बड़ा पाप माना गया है। जो धर्म प्राणियों की हिंसा का आदेश देता है, वह कल्याणकारी हो सकता हैं, इसमें किसी प्रकार भी विश्वास नहीं किया जा सकता। धर्म की रचना ही संसार में शांति और सद्भाव बढ़ाने के लिये हुई है। लेकिन आज का मानव अपने स्वाद के लिए बलि के नाम पर बेजुबान निर्दोष प्राणियों की हिंसा कर अपना पेट भरने लगा। हे मानव अब भी समय है छोड़ दो “बेजुबान निर्दोष प्राणियों की हिंसा” कर अपना पेट भरना और बलि के नाम पर उनकी हत्या करना।

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यह कविता (पशु बलि।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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वैशाख की गर्मी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hot Summer of  Vaishakh | वैशाख की गर्मी।

उफ ये गर्मी है बैसाख की,
धरती जलती आग सी।
उफनती नदियाँ सूख गई,
कंठ की हाल ना पूछो।

धूप लगे शूल सी,
बच्चे हुए मजबूर।
घर लगता है सबको जेल,
खेल खेलते हैं अनेक।

पल में हंसते, पल में झगड़ा,
पल में करते मेल।
बहे पसीना, बिखर गए बाल,
हर रोज कटता तरबूज लाल।

ठंढ़ा पानी कौन पिलाए,
धूप की जलन में।
नींबु-पानी खातिर हुआ बेहाल,
नदियाँ सूखी, खेत भी सूखे।

सूख गए सब ताल – तलैया,
लस्सी, मट्ठा, गन्ने का रस।
सत्तू से मिलेगी तरावट,
बैसाख में पीयो भैया।

पंखे, कूलर ना दे राहत,
धरती फट गई,
हो गई बंजर जैसी।
दिल करता है खूब नहाएं,
बैसाख के महीने में,
जीवन हो गईं पतझड़ जैसी।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्रचण्ड ताप देने वाली ग्रीष्म ऋतु वैशाख, ज्येष्ठ मास में आती है। इस ऋतु में सूर्य की गति उत्तरायण की ओर होती है, जो गरम लू देता है जिससे असहनीय गर्मी पड़ती हैं। ग्रीष्म ऋतु में दिन लम्बे और रातें छोटी हो जाती हैं। सूर्य अपनी किरणों से जगत के द्रवांश पदार्थ को खींच लेता है। इस समय सूख गए सब ताल – तलैया, खूब लस्सी, मट्ठा, गन्ने का रस, सत्तू से मिलेगी तरावट, बैसाख में पीयो जमकर भैया, तभी मिलेगी वैशाख की गर्मी से राहत।

—————

यह कविता (वैशाख की गर्मी।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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जहरीली जिंदगी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Toxic Life | जहरीली जिंदगी।

कभी हसीं रुकती नहीं थी,
अब छुप छुप कर आंसू पीता हूँ,
लोग मजे लेंगे दर्द भरी दास्तान सुनकर,
किसी को कुछ कहता नहीं।

बेज़ान जिस्म लेकर ही जीता हूँ,
एक ज़माना था मम्मी पापा का,
हर जिद्द होती थी पूरी,
गुजरी यादों को बसा लिया सीने में।

याद आती है हर वो बात,
जहर जिन्दगी का यूं ही पीता हूँ।
लगता था सभी अपने हैं,
रिश्तों की अहमियत कोई क्या जाने।

लोग सभी मौसम की तरह बदलते हैं,
सपनों में रहने वाले स्वार्थी लोग।
एक दिन खुद ही सबसे रिश्ता तोड़ते हैं,
आंसूं रुकती नहीं मेरी।

अफसोस की चादर में मुँह ढक लिया हूँ,
दुनिया का रस्मों रिवाज़ देखकर।
औरों के लिए आया कफ़न, ख़ुद ओढ़ लिया है,
मुझे अंजाम की ख़बर नहीं।

फिर भी मेरी शराफत तो देखो,
झूठे लोगों के शहर में,
सच की ज़ुर्रत तो देखो।
सत्य बोलने की हिम्मत है,
“भोला” की हिमाकत तो देखो।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज का रोता हुआ इंसान यूँ ही बेज़ान सा जिस्म लेकर ही जीता हैं, वह भी एक ज़माना था मम्मी पापा का, हर जिद्द होती थी पूरी अपनी, गुजरी यादों को अब बसा लिया मैंने सीने में। याद आती है हर वो बात, जहर जिन्दगी का यूं ही पीता हूँ अब मैं। मुझे लगता था की सभी अपने हैं, रिश्तों की अहमियत कोई क्या जाने आजकल के ज़माने में। अब लोग सभी मौसम की तरह बदलते हैं, सपनों में रहने वाले स्वार्थी लोग, एक दिन खुद ही सबसे रिश्ता तोड़ते हैं, आंसूं रुकती नहीं मेरी अब। अफसोस की चादर में मुँह ढक लिया हूँ, दुनिया का रस्मों रिवाज़ देखकर। औरों के लिए आया कफ़न, ख़ुद ओढ़ लिया है, मुझे अंजाम की ख़बर नहीं।

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ये शिरोमणि सिंहासन है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Ye Shiromani Singhasan Hai | ये शिरोमणि सिंहासन है।

ये शिरोमणि सिंहासन है।

यह वीरों का आसन है,
न किसी का इस पर स्वशासन है।
रहा बहुबल नित पद्मासन है,
यह शिरोमणि सिंहासन है।

यह विशिष्ट महाराजों से,
संग्रहित हैं राज दरबारों से।
इनके चरण-रज पोंछे जाते,
नृपों के शीश मुकुटों से।

जिसकी रक्षा के लिये हुई,
समर्पित कई बलिदानी है।
राणा तू कर रक्षा इसकी,
यह शिरोमणि सिंहासन है।

खनकती उन तलवारों की,
कौतुक होती थी कटारों से।
सारंगों की धारों से देखते ही,
छिन्न-भिन्न हो जाते अंगों से।

हल्दीघाटी के अरावली पथ पर,
सनी माटी वीर मेवाड़ी सानों से।
जननी जन्मभूमि का अर्चन करते,
जीवन के उत्थान फुलझड़ियों से।

न जाने कितनी बार चढ़ी घाटी में,
भीषण भैरवी जवानी पर।
कण-कण के उर में बसा राणा तू ,
कर रक्षा यह शिरोमणि सिंहासन है।

भीलों ने अभी रण-हुंकार भरी है,
हाथों में कटे खड्ग औ शीश लिए।
उर-झंझाओं में ललकार भरी है,
भोले-भाले भील लड़ने की तैयारी में।

गिरिराज के ऊँचे शिखरों पर,
विटपों के फूल-पत्ते अन्न बने।
रक्षक शिखर-शैल बने थे,
राणा के तुंग आस्थान-मंडल बने।

तुलजा भवानी की सौगंध ले,
शीश पग कफ़न बाँध चले।
रण-बाँकुरे मैदान चले,
करने को बलिदान चले।

खमनोर के दर्रों में,
रक्ततलाई में बहते रक्तों ने…
पुकार लगाई धरती ने रक्षा कर राणा तू ,
ये शिरोमणि सिंहासन है।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (ये शिरोमणि सिंहासन है।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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