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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

बहू या बेटी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बहू या बेटी। ♦

बहू को बेटी समझा जाये,
तो क्या इसमें गलत है।
जब माँ पिता के घर से आई,
वह एक अंजान घर में।

आकर वों नये लोंगो के,
बीच आकर जीवन की,
नयी शुरुआत करती है।
सारे परिवार की पसंद,
नापसंद का ख्याल रखती है।

किसको कब किस चीज,
की जरूरत या तकलीफ है।
सबके लिए वो त्याग करती है,
फिर हम उसको बहू मानते है।

बहू को अगर बेटी मान ले,
तो उसको कभी अपने घर,
की कभी याद नहीं आएगी।
और उसका मान भी बढ़ेगा।

उसको भी अहसास होगा,
वो भी गर्व से कह सकती है,
मैं घर की बहू नहीं बेटी हूँ।
बहू को बेटी समझा जाये,
यह रीति भी नयी होंगी।

तुम पराये घर से आयीं हो,
क्या समझोगी हमारा दुख।
यह कहकर चुप कराया जाता है।
बहु को बेटी समझ कर देखो,
वो भी किसी की बेटी है।

हम उसको माँ सा प्रेम देगें,
वो भी आपको माँ मानेगी।
आपका कहना भी सुनेंगी,
बहु से बेटी बनने में देर न लगेगी।

आपके मान सम्मान को रखेगी,
बहु को भी बेटी सा प्रेम मिले।
फिर क्यो पीहर की याद करें,
जो भी परेशानी हो उसको,
सासू माँ को ही बताएगी।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बहू को बेटी समझा जाये, तो क्या इसमें गलत है। विवाह के बाद जब माँ पिता के घर से आई, वह एक अंजान घर में। सभी नये लोंगो के बीच आकर जीवन की नयी शुरुआत करती है वह, परिवार के सभी सदस्यों के पसंद – नापसंद का सदैव ही ख्याल रखती है वह। सभी के सुख के लिए तकलीफ सहती त्याग करती वह। बहू को जब हम बेटी मान ले, तो उसको कभी भी अपने घर की याद नहीं आएगी, और उसका मन भी लगा रहेगा। उसको भी अच्छा लगेगा, वो भी गर्व से कह सकती है, मैं इस घर की बहू नहीं बेटी हूँ। जब हम उसको माँ सा प्रेम देगें, वो भी आपको माँ मानेगी। आपका कहना भी सुनेंगी, बहु से बेटी बनने में देर न लगेगी। सदैव ही आपके मान सम्मान का ख्याल रखेगी, बहु को भी बेटी सा प्रेम जब मिले, फिर क्यो पीहर की याद करें। जो भी परेशानी हो उसको, सासू माँ को ही बताएगी।

—————

यह कविता (बहू या बेटी।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, पूनम गुप्ता जी की कविताएं।, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: bahu ya beti, poems of poonam gupta, poet poonam gupta, poonam gupta poems, ईश्वर, पूनम गुप्ता की कविताएं, प्रभु पर कविता, बहू या बेटी, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता, हिन्दी-कविता-हिन्दी साहित्य

भगत सिंह।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भगत सिंह। ♦

भरी जवानी, हुई सगाई, देश प्रेम के खातिर ठुकराई थी।
एसेंबली हाल में जाने खातिर, धर्म छोड़ दाढ़ी बनवाई थी।
जान हथेली में लेकर जिसने, स्वतंत्रता की कसम खाई थी।
उस शहीद भगत की लोगों ने, हल्की सी कहानी सुनाई थी।

उस स्वतन्त्रता के महा कुम्भ में, तब बलिदानी रूहें नहाई थी।
छोटी बड़ी हर शहादत ने, मां भारती को आजादी दिलाई थी।
फांसी के फंदे पर हंसते – हंसते, काय जिसने लटकाई थी।
उस शहीद भगत की लोगों ने, हल्की सी कहानी सुनाई थी।

शोक हुआ जब इतिहास के पन्नों में, गाथा इनकी छुपाई थी।
जिनकी पीठ पर भारत मां ने, जीती आजादी की लड़ाई थी।
जंग – ए – आजादी के दरिया में कूद, जिसने प्यास बुझाई थी।
उस शहीद भगत की लोगों ने, हल्की सी कहानी सुनाई थी।

किसे मालूम था भारत भगत को, यूं चन्द वर्षों में भुलाएगा?
आजादी के नायकों की जगह, आक्रांताओं को पढ़ाएगा।
फिरंगी फितरत में डूब जमाना, भाई से भाई को लड़ाएगा।
सच को झूठ और झूठ को सच, कहकर सत्य को छुपाएगा।

जैसी पढ़ाई, वैसी ही आजमाई, जमाना भी तो आजमाएगा।
क्या सीखेगा जग जब स्कूलों में, छल-छद्म ही पढ़ आएगा?
जब मानव मानव का बैरी बन, स्वार्थ पर स्वार्थ अपनाएगा।
सच को झूठ और झूठ को सच, कहकर सत्य को छुपाएगा।

भारत मां के इस वीर सपूत का, इतिहास जो सामने लाएगा।
मां भारती के श्री चरणों में वह, निज श्रद्धा सुमन चढ़ाएगा।
सभ्यता – संस्कृति और बलिदान छुपाकर, भारत पछताएगा।
सच को झूठ और झूठ को सच, कहकर सत्य को छुपाएगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — क्या आप जानते है, जिसकी भरी जवानी में हुई सगाई, देश प्रेम के खातिर ठुकराई थी, ओ कौन थे जिन्होंने एसेंबली हाल में जाने खातिर, धर्म छोड़ दाढ़ी बनवाई थी। जान हथेली में लेकर जिसने, स्वतंत्रता की कसम खाई थी। उस अमर शहीद भगत सिंह जी की लोगों ने, हल्की सी कहानी क्यों सुनाई थी। उस स्वतन्त्रता के महा कुम्भ में, तब सभी बलिदानी रूहें नहाई थी, छोटी बड़ी हर शहादत ने, मां भारती को तब आजादी दिलाई थी। फांसी के फंदे पर हंसते – हंसते, काय जिसने लटकाई थी, आखिर उस शहीद भगत की लोगों ने, हल्की सी कहानी क्यों सुनाई थी। क्या आपने कभी ये जानने की कोशिश की? शोक हुआ जब इतिहास के पन्नों में, क्यों गाथा इनकी छुपाई थी। जिनकी पीठ पर भारत मां ने, जीती आजादी की लड़ाई थी। जंग – ए – आजादी के दरिया में कूद, जिसने प्यास बुझाई थी। आखिर क्यों उस शहीद भगत की लोगों ने, हल्की सी ही कहानी सुनाई थी।

—————

यह लेख (भगत सिंह।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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अम्बे शुभ प्रभात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अम्बे शुभ प्रभात। ♦

शुभ प्रभात, माँ ब्रह्मचारिणी,
पूजन जननी श्वेताम्बरा का।
युग प्रेरणा माँ तपस्विनी,
स्वयंप्रभा प्रिय स्वरूप इक।
हाथ जपत माल, बाम धरें॥

कमंडल, करें ज्ञान-विज्ञान,
साहित्य संवर्धन सतत।
नवदृष्टि जागृत करें,
तप: जल से मात।
प्रक्षालित करें, नव-मानव,
हृदय को……॥

तत्वज्ञान नि:स्वार्थ सेवा,
का दें भाव आज मात।
फल आराधन का, तप,
त्याग, वैराग्य, सदाचार।
संयम दें, लें अर्घ्य में,
स्वार्थ, मोह हर भारत,
समूह का……॥

नाम जिनका अपर्णा,
अशन करें धरा।
स्पर्शी बेलपत्र, निज
दुष्कर तप का।
लघु अंश दान करें,
माँ, युवा वर्ग चेतना को॥

तपबल से, अम्बे के
जीती भरत कन्याएं।
दृष्टि से अम्बे दें,
आशीष, जीवन।
निर्माण का, राष्ट्र सेवा,
से हों ऊर्जा भावित,
वे आज……॥

मुझे दो कमंडल, मैं,
इक सेविका आपकी।
ले खड्ग हाथ, विनाश,
कर कामना, असंयम,
अहंकार……॥

अम्ब ब्रह्मचारिणी,
तप भाव करें, संचार दें।
विवेक, कल्याण दीक्षा मंत्र,
इस महोत्सव को, लक्ष्य,
प्रेरित रखें सदा……॥

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

—————

  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से महानवरात्रि व माँ ब्रह्मचारिणी के बारे में बताने की कोशिश की है— महानवरात्रि के दूसरे दिन पूजा माँ ब्रह्मचारिणी स्वीकार करें। हे माँ तत्वज्ञान नि:स्वार्थ सेवा का दें भाव आज मात। फल आराधना का तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार संयम दें माँ। लें अर्घ्य में, स्वार्थ, मोह हर भारत, समूह का। माँ ब्रह्मचारिणी का आओ हम सब मिलकर पूजन करें।

—————

यह कविता (अम्बे शुभ प्रभात।) “प्रो• मीरा भारती जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम मीरा भारती (मीरा मिश्रा/भारती) है। मैंने BRABU Muzaffarpur, Bihar, R.S College में प्राध्यापिका के रूप में 1979 से 2020 तक सक्रिय चिंतन और मनन, अध्यापन कार्य किया, आनलाइन शिक्षण कार्यक्रम से वर्तमान में भी जुड़ी हूं, मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे लेखनी का सुंदर उपयोग किया करते हैं। मैंने लगभग 130 कविताएं लिखी है, जिसमें अधिक प्रकाशित हैं, कई आलेख भी, लिखे हैं। दृढ़ संकल्प है, कि लेखन और अध्यापन से, अध्ययन के सामूहिक विस्तारण से समाज कल्याण – कार्य के कर्तृत्व बोध में वृद्धि हो सकती है। अधिक सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

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माँ शैलपुत्री का पूजन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ शैलपुत्री का पूजन। ♦

महानवरात्रि की प्रथम पूजा,
माँ, स्वीकार करें, समुदाय,
की अर्पित लाल चुनरी,
झिलमिल, दिव्य, ज्ञान-दीप्त।

ग्रहण करें, दायित्व सर्व के,
आत्म – साधन का, चरणों में,
समेटें, जो सदा तप: पूत..
दुःख नाशिनी, माया – हारिणी,
पवित्र गंगाजल, सुवासित।

भावना के अभिदान से,
शीतल करें माँ जन मन को।
तव, प्रेम – तत्व, करें,
विह्वल, जन – आस्था को।

दें बन्धन, समरसता का न,
लक्ष्य हो, हमारा धन – यश व,
लौकिक संस्कार…

तव ज्ञान रुप स्पर्शी हवा,
करे अस्त बुराई का।
उदय हो प्रति ह्रदय प्रेम का,
सद्गुण, सम् – भाव का।

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

—————

  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से महानवरात्रि व माँ शैलपुत्री के बारे में बताने की कोशिश की है — महानवरात्रि की प्रथम पूजा माँ शैलपुत्री स्वीकार करें। समुदाय की अर्पित लाल चुनरी, झिलमिल, दिव्य, ज्ञान-दीप्त ग्रहण करें। दायित्व सर्व के आत्म-साधन का, चरणों में समेटें। जो सदा तप: पूत.. दुःख नाशिनी, माया – हारिणी, पवित्र गंगाजल, सुवासित माँ शैलपुत्री का आओ हम सब मिलकर पूजन करें।

—————

यह कविता (माँ शैलपुत्री का पूजन।) “प्रो• मीरा भारती जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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आत्मिक ऊर्जा से सृजन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आत्मिक ऊर्जा से सृजन। ♦

आत्मिक ऊर्जा से सृजन,
ब्रह्मांड – ऊर्जा, देती।
निश्चयी संदेश,
एक सकारात्मक…
ऊर्जा, करती व्यक्त।

एक तड़पन, एक,
मूक, निराश संघर्ष।
अस्तित्व हेतु…
रचनाकार वह, जो,
चलाता, निज लेखनी।

कथ्य उसका है।
स्वविचार – तत्व, चेतना,
जो उसका समर है।
वह, केवल लेखक,
लिंग – भेद नहीं।

आत्मस्थ शब्द – ब्रह्म में,
भुवन को करता जो,
भव्य, उन्नत विचारों,
से वह, मात्र, लेखक,
न स्त्री, न पुरुष।

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

—————

  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से — एक सच्चा लेखक सदैव ही अपने आत्मिक ऊर्जा से लेखन का सृजन करता है। आत्मस्थ शब्द – ब्रह्म में, भुवन को करता जो, भव्य, उन्नत विचारों, से वह, मात्र, लेखक, न स्त्री, न पुरुष।

—————

यह कविता (आत्मिक ऊर्जा से सृजन।) “प्रो• मीरा भारती जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम मीरा भारती (मीरा मिश्रा/भारती) है। मैंने BRABU Muzaffarpur, Bihar, R.S College में प्राध्यापिका के रूप में 1979 से 2020 तक सक्रिय चिंतन और मनन, अध्यापन कार्य किया, आनलाइन शिक्षण कार्यक्रम से वर्तमान में भी जुड़ी हूं, मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे लेखनी का सुंदर उपयोग किया करते हैं। मैंने लगभग 130 कविताएं लिखी है, जिसमें अधिक प्रकाशित हैं, कई आलेख भी, लिखे हैं। दृढ़ संकल्प है, कि लेखन और अध्यापन से, अध्ययन के सामूहिक विस्तारण से समाज कल्याण – कार्य के कर्तृत्व बोध में वृद्धि हो सकती है। अधिक सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

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मौसम बुलाने की कोशिश।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मौसम बुलाने की कोशिश। ♦

मौसम इशारों से बुलाने की सोचिए,
रुठा वह तो उसे मनाने की सोचिए।
जमाने में कोई दिवाना नहीं है तेरा,
गर मचले, सीने से लगाने की सोचिए।

ख़त लिख दी, एक प्यार की बातें,
तनहाई रंगीन बनाने की सोचिए।
जाग रहे मुझे अच्छा नहीं लगता,
अंधेरे की नींद चुराने की सोचिए।

मौसम मिजाज बढ़ चढ़ दिखाएं,
उमड़े ख्वाब दिखाने की कीजिए।
दिल को खुद समझाने की सोचिए,
पूर्वजों की थाती सजाने की सोचिए।

नदियां – झरना बचाने की सोचिए,
धरा पर पौधा लगाने की सोचिए।
कूड़ा – करकट हटाने की सोचिए,
मौसम धीरे से बुलाने की सोचिए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — मनुष्य के द्वारा प्राकृतिक संसाधन के असंतुलित दोहन प्रकृति का संतुलन बिगाड़ रहा हैं। अगर चाहते हैं की आने वाली पीढ़िया सुखमय जीवन जिए तो – आओ हम सब मिलकर ये संकल्प ले की सभी को प्रत्येक वर्ष कम से कम 1 पेड़ जरूर लगाना है, और उसका देखभाल भी करना है, तब तक जब तक वो पेड़ अच्छे से अपना बचाव और बढ़ाव खुद न करने लगे। जब ज्यादा पेड़ होंगे वर्षा भी अच्छी होगी जिससे नदियां – झरना सब जल से भरपूर होंगे, चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी। हमें साफ – सफाई का भी ध्यान रखना है कहीं भी यूँ ही कूड़ा – करकट नही करना हैं।

—————

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यह कविता (मौसम बुलाने की कोशिश।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

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राम : द्वारा दुष्टों का संहार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राम : द्वारा दुष्टों का संहार। ♦

राजा दशरथ के सत्य वचन की रक्षा में,
श्रीराम राज पाठ छोड़ कर वन में निकले।
वन में वे चलते चलते जब थक जाते,
हनुमान और लखन उनका पांव दबाते॥

सहन नहीं कर पाते कुमारी से पांव दबवाना,
जनक नंदिनी सुकुमारी जानकी जी को सबने माना।
श्रीराम के वक्ष: स्थल में जिसे सम्मान मिला,
उन्हें लक्ष्मी – सीता जी का ही नाम मिला है॥

लक्ष्मण द्वारा रावण की बहन सूर्पनखा का,
नाक कान काटने से,
अपनी प्रियतमा का वियोग उन्हें सहना पड़ा।
वियोग के कारण उनकी क्रोध में तनी भौहों से,
भारी समुद्र को भी भयभीत होना पड़ा॥

लंका जाने के लिए एक पुल बाधा गया,
समुद्र ऊपर पुल से सेना लंका कूंच किया।
पहले ही वीर हनुमान ने लंका को जैसे जला दिया।
जस जंगल की दावाग्नि जले वैसे ही मिटा दिया॥

सीता स्वयंबर में शिव का धनुष जिसको,
बड़ा – बड़ा वीर योद्धा भी हिला नहीं पाया।
गुरु का आदेश मिलते ही बात – बात में राम ने,
डोरी चढ़ा खींच कर दो टुकड़ा उसका कर दिया॥

पिता वचन शिरोधार्य कर स्वजन छोड़ जंगल  पयान,
योगी जैसे काया छोड़ चलता है अपने धाम।
खर दूषण, तृषिरा जैसे राक्षसों का संहार किया,
महा धनुष बाण चला कर दुष्टों पर वार किया॥

पर्ण कुटी तक स्वर्ण हिरण भेष में छुपे मरीच आया,
श्री राम ने उसको भी दौड़ा कर मार गिराया।
दक्ष प्रजापति को जैसे वीरभद्र ने मारा था,
उसी तरह श्री राम ने उसका पीछा कर संहार किया॥

सुग्रीव का बड़ा भाई बलवान और था आतताई,
बालि हरण कर सुग्रीव की पत्नी को घर लाया।
वचन देकर सुग्रीव को श्री राम ने उसको मारा,
मार उसे राम ने वचन और मित्रता का धर्म निभाया॥

राम और रावण की सेना में भीषण युद्ध हुआ,
एक एक कर क्रमश: रावण के वीरों का संहार किया।
जब श्री राम जी के सम्मुख था रावण आया,
शिरोमणि राम ने अभिमानी को फटकार लगाया॥

मेरी अनुपस्थिति में प्राण प्रिया मेरी हर कर लाया?
काल को कोई टाल नहीं सकता तेरी सामत आई!
वज्र समान वाण चलाया, खून फेंक दिया रावण वहीं,
रावण का हृदय विदीर्ण हुआ वह हुआ धरासाई॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — समय समय पर रावण से लेकर खर दूषण, तृषिरा जैसे राक्षसों का संहार किया – मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ने, बहुत ही खूबसूरत वर्णन किया है।

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यह कविता (राम: द्वारा दुष्टों का संहार।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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वर्षा ऋतु कृष्ण कोडर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वर्षा ऋतु कृष्ण कोडर। ♦

वर्षा ऋतु का जब शुभारंभ होता,
सभी प्राणियों की बढ़ती हो जाती।
आकाश क्षुब्ध – सा दिखने लगता,
नीले – घने बादल घिर जाते हैं॥

बिजली की कौंध डराती धमकाती,
बार – बार गड़गड़ाहट सुनाई पड़ती।
सूर्य चंद्रमा – तारे रह – रह ढ़क जाते,
समय – समय किरण अंध छांटता॥

प्राणी के कल्याण में बादल बरसता,
जनजीवन पाकर मानव खुश होता।
जेठ आषाढ़ गर्मी धरा सूख जाती,
वर्षाऋतु जल सिंचित करने आती॥

तप करते जस शरीर – दुर्बल हो जाता,
जल को पीने से हृष्ट पुष्ट होता दिखता।
वर्षा के सायंकाल घना अंधेरा छा जाता,
घर – बाहर निकला बालक डर जाता॥

नदियां जो सूख रही थी जेठ – आषाढ़,
उमड़ – घुमड़ घर के बाहर बहने लगती।
शरीर का छुपा कौमार्य जागने लगता,
पृथ्वी पर हरियर घास उगने लगती॥

खेतों में हरी – भरी हरियाली छाने लगी,
किसान में आनंद की लहरें उठने लगी।
आनंद के पुष्प कमल खिलने लगते,
बरसाती मेंढक टर टर करते – निकलते॥

वर्षा ऋतु में उपयोगी हवा तेज बहती,
नदियों के किनारे और वह क्षुब्ध रहती।
कामनाओं के उभार से मन भर जाता,
मूसलाधार वर्षा से पहाड़ दरकने लगता॥

इंद्र धनुष की शोभा में सगुण दिखाती,
चंद्रमा की उज्जवल चांदनी दिखती।
तब बादलों से सही समय पता चलता,
मोर – मोरनी का रोम – रोम खिल जाता॥

कुहुक से नृत्य के आनंदोत्सव मनाता,
भगवत भक्त जी आनंद मग्न हो जाता।
सारस – क्षण भर तालाब नहीं छोड़ते,
भील – भीलनियां आनंद मगन होती॥

पर्वतों के झर – झर झरने से जल बहते,
झरते जल की आवाज सुरीली लगती।
कृष्ण किसी कोडर में जाकर छिपते,
कंद मूल ग्वाला खाकर खेलते रहते॥

कभी किसी चट्टान पर जाकर सभी बैठते,
ग्वाल बाल दही भात साग खा जाते।
थोड़ी देर में गाय भर पेट घास चर लेती,
आंख मूंदकर बैठ जुगाली करती रहती॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — वर्षा ऋतु के मनभावन दृश्य, प्रकृति का सुन्दर दृश्य, इंद्र धनुष की शोभा, चंद्रमा की उज्जवल चांदनी, मोर- मोरनी का सुन्दर नृत्य, पर्वतों के झरने से झर-झर कर बहते जल, खेतों में हरी-भरी हरियाली, किसान में आनंद की लहरें, और बारिश के दौरान श्री कृष्ण का ग्वाल बालों के साथ क्रीड़ा का खूबसूरत वर्णन किया है।

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यह कविता (वर्षा ऋतु कृष्ण कोडर।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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पाहन से मुलाकात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पाहन से मुलाकात। ♦

एक दिन एक पाहन से
हुई थी मुलाक़ात।
उसने कहीं उस दिन,
मुझसे अपने मन की बात।
पूछा उसने मुझसे…
कुछ नाराज़गी से —

“क्यों करते हो तुलना हमारी
तुम कठोर हृदय मनुज से ?”

ये अपमान है हमारा
मेरी समझ से,
क्योंकि —
हम तो संगीत के राग
से ही पिघल जाते हैं।
कोई तराश दे तो,
मूर्ति में ढल जाते हैं।

हम दिखते हैं कठोर,
किन्तु मन में नहीं चोर।
दुर्ग और भवनों में,
आलीशान इमारतों में,
मेरे पारिवारिक सदस्य
जड़ें है कई गुम्बदों में।

सुनी हैं मैंने सच्ची दास्तानें,
मनुष्य की कुटिलता की।
दौलत, सत्ता के लोभ,
अपनों के कत्ल और क्रूरता की।

पाषाण नहीं करते ऐसा,
फिर हम पर ये आरोप कैसा ?

तुम्हारे ह्रदय जितने कठोर नहीं हैं हम।
घाती, कपटी, कुटिल चोर नहीं हैं हम।
देखो, सुनो जाकर अपने टी वी पर,
कैसे मनुज की वजह से मनुज मर रहा है।
मेरा ह्रदय तोसे कहते हुए भी पिघल रहा है।

और भी बहुत कुछ कहा उसने,
एक पत्थर ने सामने मेरे …
कटु सच का पुलिन्दा रख दिया।
और किस कदर मनुष्य होने पर
मुझे शर्मिंदा कर दिया।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

—————

  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश की हैं — पत्थर का उदाहरण देकर बताया है की आजकल के पत्थर दिल मनुष्य से तो लाख गुना अच्छा पत्थर है। सुनी हैं मैंने सच्ची दास्तानें मनुष्य की कुटिलता की। दौलत, सत्ता के लोभ, अपनों के कत्ल और क्रूरता की। पाषाण नहीं करते ऐसा, फिर हम पर ये आरोप कैसा ?

—————

यह कविता(पाहन से मुलाकात।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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आज न जाने क्यों?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज न जाने क्यों? ♦

आज न जाने क्यों मेरे हर हौसले है, यूं बेबजह पस्त हुए?
इस दुनियां में हर आदमी, क्यों बेपरवाह और व्यस्त हुए?

आज है फुरसत नहीं यहां, किसी को किसी से बतियाने की।
रही तहजीब नहीं है शेष अब, किसी में किसी को मनाने की।

जो रूठ गया सो रूठ गया, फिर करता ही कोई बात नहीं।
अरे भाई सुलह भी तो रास्ता है, हर बात का हल तलाक नहीं।

नेमत है यह जिन्दगी खुदा की, यूं ही तो कोई इतेफाक नहीं।
सौदे जिन्दगी के हैं ये दोस्त, कोई सड़कों पर बिछी खाक नहीं।

बुजुर्गों की अब सुनता ही कौन है? युवा नशों में है खो गए।
चोर – उचक्के घूम रहे हैं खुले आम आज, कोतवाल है सो रहे।

ऊपर से नीचे तक है फैल गया, देखो तो आज भ्रष्टाचार यहां।
आदमी से आदमी का रिश्ता है स्वार्थ का, रहा कहां अब प्यार यहां?

खौलता है देख के खून तो अपना, यह लूटपाट होती खुले आम, में।
चाहकर भी न कर पाता हूं इच्छित कुछ, फंस जाता हूं बने विधान में।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बताया है की “आजकल के युवाओं का जीवन किस राह पर भटक रहा है, उनको खुद ही नही मालूम। उनके अनियंत्रित भटकते हुए जीवन का कोई किनारा नहीं।” ये कैसा समय चल रहा है जहां खुले आम लूटपाट होती है। चोर – उचक्के घूम रहे हैं खुले आम आजकल, कोतवाल है सो रहे।

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यह कविता (आज न जाने क्यों?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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