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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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सुखमंगल सिंह

मनुस्मृति में कानून।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मनुस्मृति में कानून।  ♦

भारतवर्ष में राजा न्याय का मूल होता था।
राजा के साथ एक विद्वान और न्याय करता बैठता था।
सभा में राजा विद्वान ब्राह्मण और अनुभवी मंत्री को साथ रखता था।
राजा के साथ तीन ब्राह्मण और एक विद्वान न्याय करता बैठता था।

न्यायिक सभा में दीवानी और फौजदारी का केस चलता था।
सभा में सत्य बोलने के लिए सभी को आज्ञा दी जाती थी।

सत्य बोलने वाले को न्यायालय में जाना नहीं चाहिए।
अगर न्यायालय वह जाता है तो सत्य ही बोलना चाहिए।
झूठ बोलने वाला मनुष्य को पापी कहा जाता था।
न्यायालय में बादी और प्रतिवादी के सामने गवाही लिया जाता था।

दोनों पक्ष के गवाहों को न्याय करता एकत्रित करवाता था।
इस प्रकार वह न्यायालय में समझा-बुझाकर परीक्षा लेता था।

न्याय करता गवाहों से पूछता जो वृतांत तुम लोगों ने बातें किया,
उन बातों को तुम लोग सत्य सत्य कहो क्योंकि इस अभियोग में तुम साक्षी हो।
अपनी गवाही में जो सत्य बोलता है वह मृत्यु के बाद उत्तम स्वर्ग प्राप्त करता है।
इस लोक में अद्वितीय यस पाता और स्वयं ब्रह्मा उसका साक्षात्कार करता है।

जो मनुष्य झूठी गवाही देता है वह वरुण के बंधन में बनता है।
वह मनुष्य 100 जन्मों तक दुख पाता है।

इसलिए मनुष्य को सत्य साक्षी गवाही देनी चाहिए।
सत्यता से गवाही देने वाला पवित्र होता है।
सत्यता से उसका यश वृद्धि होती है।
सभा में उपस्थित गवाही देनी पढ़ती है।

साक्षी देने वाले को सत्य बोलना चाहिए।
जीव का साक्षी स्वयं जीव है, जीव के शरण में स्वयं जीव है।
जीव मनुष्य का परम साक्षी है, उसका निरादर नहीं करना चाहिए।

जबकि पापी अपने मन में विचार करता है कि हमें कोई नहीं देखता।
लेकिन देवता उसको और उसके ह्रदय के भाव को स्पष्ट देखते हैं।
देहधारी मनुष्यों के कर्मों को यह लोग स्वयं देखते हैं-
आकाश पृथ्वी जल हृदय चंद्रमा सूर्य अधिनियम बायो-
रात्रि और दोनों को धूल और न्याय।

न्याय किया जाए इसके लिए सभा में आगे और समझाया जाता था।
जो पापी मनुष्य न्याय करता के इस प्रश्न का भी झूठ उत्तर देता है,
वह सीधे नर्क के पूर्व अंधकार में ठोकर खाता है।

पहले गवाहों को सभा मध्य समझाया जाता था।
फिर भी गवाह झूठी गवाही देता तो उसे देश निकाला जाता था।
राजा वेद पढ़ने वाले विद्यार्थी व शिल्पकार और भांड साक्षी देने से बरी रहते थे।
राज नियम कठोर और स्पष्ट हुआ करते थे।

उपद्रव चोरी बेबी चार्ट बदनामी करने,
मारपीट और अव्यवस्था में फौजदारी के,
अभियोग में साक्षी की योग्यता के नियम कठोर होते थे।

सभा में नियम का पालन करने के लिए आदेश दिए जाते थे।
मनुस्मृति में कितनी है, कानूनों को 18 भागों में बांटा गया है।
सभी कानूनों का पालन कठोरता से कराया जाता था।

मारपीट, बदनामी करना, चोरी – डाका और उपद्रो अथवा हो व्यभिचार।
जुआ खेलना और बाजी लगाना, फौजदारी कानून में इसे लिया जाता।

ऋण, धरोहर, किसी की संपत्ति के स्वामी हुए बिना उसे बेचना,
दान का फेर लेना, वेतन ना देना, प्रतिज्ञा का पालन न करना,
बिक्री और खरीद की हुई वस्तु का लौटाना।
स्वामी और सेवक में झगड़ा होना।
सीमा के संबंध में झगड़ा होना।

पति और पत्नी के कर्तव्य, उत्तराधिकार पाना।
यार सब दीवाने के मुकदमे दर्ज होते थे।

प्राचीन काल में बनाए गए नियम और कानून आज के नियम और कानून में कुछ समानता के साथ आज का नियम बहुत व्यापक हो गया है फर्क केवल इतना है कि प्राचीन काल में जो नियम बनाए जाते थे, उनका कड़ाई से पालन किया जाता था।

आज जो नियम है उनमें पारदर्शिता तो है परंतु कुछ लोग न्याय पाने के लिए अपना पूरा जीवन खो देते हैं और उनकी अगली पीढ़ी भी न्याय के लिए न्यायालय के दरवाजे खटखटा रहता है।

न्यायपालिका पर जनता का पूरा विश्वास होता है। न्यायपालिका के आदेशों का पालन शासन और प्रशासन करता कराता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, लेख के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस लेख में कवि ने मनुस्मृति में जो कानून था उसे विस्तार से बताया है। प्राचीन काल में बनाए गए नियम और कानून आज के नियम और कानून में कुछ समानता के साथ आज का नियम बहुत व्यापक हो गया है फर्क केवल इतना है कि प्राचीन काल में जो नियम बनाए जाते थे, उनका कड़ाई से पालन किया जाता था। ” आज जो नियम है उनमें पारदर्शिता तो है परंतु कुछ लोग न्याय पाने के लिए अपना पूरा जीवन खो देते हैं और उनकी अगली पीढ़ी भी न्याय के लिए न्यायालय के दरवाजे खटखटा रहता है। “

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यह लेख (मनुस्मृति में कानून।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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Filed Under: 2021-KMSRAJ51 की कलम से, सुखमंगल सिंह जी की कविताये।, सुखमंगल सिंह जी की रचनाएँ, हिंदी कविता, हिन्दी साहित्य, हिन्दी-कविता Tagged With: kavi sukhmangal singh article, law in manusmriti, manusmriti mein kanoon, Sukhmangal Singh, न्याय व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया, प्राचीन हिन्दू विवाह के प्रकार, भारतीय राजनीतिक विचारक कौटिल्य, भारतीय राजनीतिक विचारक मनु, मनु का क़ानून और हिंदू राष्ट्र, मनु के अनुसार मंत्रियों की संख्या कितनी होनी चाहिए, मनु के अनुसार राज्य का कार्यक्षेत्र क्या है, मनु के अनुसार राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, मनु के राज्य सिद्धांत को विस्तार से समझाइए, मनु के सप्तांग सिद्धांत का वर्णन, मनुवाद क्या है, मनुस्मृति - न्याय व्यवस्था का शास्त्र, मनुस्मृति क्या है, मनुस्मृति मानव समाज का प्रथम संविधान, मनुस्मृति में कानून, मनुस्मृति में क्या क्या लिखा है?, मनुस्मृति में क्या लिखा है, मनुस्मृति में महिलाओं की स्थिति, मनुस्मृति में विवाह, राजा मनु कौन थे?, वैदिक काल में विवाह के प्रकार, सुखमंगल सिंह, सुखमंगल सिंह जी की रचनाएँ, हिन्दू विवाह विधि

धर्म की उन्नति कैसे होगी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ धर्म की उन्नति कैसे होगी। ♦

लिखी बहुत रचनाएं ‘मंगल,’
बहुत लिखा है तभी बिहार।
लिखने को तो बहुत कुछ पर,
लिखो लोक में जय जय कार।

सोचा कि मनुष्य धर्म में उन्नत करें,
पर इच्छानुसार वह करता नहीं।
फिर उसको सत्य पथ पर कैसे लाऊं,
धर्म पथ का उपदेश कहां जा सुनाउं।

लोगों के लिए धर्मों पदेश छपवाया,
नियम संयम का बड़ा पाठ पढ़ाया।
दूर-दूर तक धर्मों का प्रचार कराया,
प्रचार से भलाई का मार्ग दिखाया।

सड़क किनारे नए ग्रोथ के वृक्ष लगाया,
पशुपालन की बड़ी योजना लाया।
शहर नगर सड़कों का जाल बिछाया,
धर्म स्थलों का पुनरुद्धार कराया।

सन्यासी और गृहस्थ को यत्न बताया,
भिन्न-भिन्न पथ के हित का ध्यान किया।
गरीब प्रजा को उसका सम्मान दिया,
गांव गरीब तक विद्युत प्रबंध कराया।

धर्म धारण करने की पूर्ण कला जानू ,
दया दान सत्य और पवित्रता को मानू।
उपकार और भलाई से उन्नति होती,
निंदा लालच पर धन संग्रह अवनति देती।

मनुष्य में धर्म की उन्नत दो तरह से होती,
स्थिर नियम उत्तेजित धर्म विचार करा दी।
दोनों भागों में कठोर नियम ठीक नहीं होता,
हृदय को उत्तेजित करना प्रभावित होता।

पशुओं के बध निषेध का नियम बना लूंगा,
सूर्य चंद्रमा जब तक हैं पालन करवा लूंगा।
इस पथ पर चलने वाले लोक परलोक में सुख पाते हैं,
दया दान सत्य पवित्रता धर्म की उन्नति कराते हैं।

सुख मंगल देश में सुख शांति रहे ऐसा गीत सुनाते हैं,
देश के कोने-कोने से लोगों को आपस में मिलाते हैं।
सतरंगी किरण की आभा जंगल – जंगल फैलाते हैं,
विश्व बंधुत्व के नारे से विश्व चलेगा यही बताते हैं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है की कितनी बड़ी विडम्बना है की इंसान भौतिक उन्नति तो खूब कर रहा है लेकिन धर्म की प्रगति कैसे होगी, इस बारे में कोई क्यों नहीं बोलता? धर्म की उन्नति न करने के कारण इंसान संस्कार, संस्कृति, आदर, सत्कार में पिछड़ जाता है। उसके अंदर दया, करुणा, प्रेम, श्रद्धा दूर – दूर तक नहीं होता। हम सभी को धर्म की उन्नति कैसे हो? इस बारे में सोचना है, और हम सभी को मिलकर धर्म की उन्नति करना हैं।

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यह कविता (धर्म की उन्नति कैसे होगी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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शरीर से परम तत्व प्राप्त।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शरीर से परम तत्व प्राप्त। ♦

है शरीर यह एक वृक्ष,
जीवन रूपी पक्षी जिसमें,
घोंसला बनाकर रहता।

कट जाता जब वृक्ष,
उसे छोड़ पक्षी उड़ जाता।

शरीर की दिन-रात आयु
क्षण – क्षण क्षीण है करता।

वह गूढ़ रहस्य जो जानता
परम तत्व का ज्ञान पाता।

शुभ फलों का मानव शरीर
मूल प्राप्ति आधार होता।

साधु भक्त स्वयं धैर्यवान
सत्कर्म – सदविचार करता।

अनुकूलता स्मरण की होने पर
लक्ष्य की दिशा में वह बढ़ता।

कर्म- ज्ञान और भक्ति योग,
से मन परमात्म चिंतन करता।

नियंत्रण नियम अपनाकर,
अपराधी प्रवृत्ति से बचता।

प्रकृति शरीर और सृष्टि का,
क्रमवार चिंतन जो करता।

सृष्टि चिंतन में लय भरता,
दुख बुद्धि रूपी पदार्थ छोड़।

शांति में मन जा कर रमता,
परमात्मतत्व प्राप्त करता।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है की यह शरीर एक वृक्ष की तरह है, जैसे वृक्ष का जड़ जब काट दिया जाता है तब वृक्ष मुरझाकर सुख जाता हैं। वैसे ही परम तत्त्व आत्मा इस शरीर से बाहर निकल जाता है जब यह शरीर किसी काम का नहीं रहता हैं। यह शरीर मिला है, अपने आपको पहचान कर, सत्य मार्ग पर चलकर, उस महान परम तत्त्व परमात्मा से मिलन के लिए।

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यह कविता (शरीर से परम तत्व प्राप्त।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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अयोध्या में गंधर्व गान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अयोध्या में गंधर्व गान। ♦

हिंद हिमालय की गोद से,
ऋषि – मुनि करते हैं ध्यान।
सभी के श्री मुख से निकला,
जय जय जय श्री सीताराम।

वेद श्री, श्रीमद् भागवत महाभारत,
रामायण, गीता, औ उपनिषद,
सर्वदा प्रासंगिक रहने वाले।
अपडेट करने के खोलें ताले।

बलशाली अभिमानी सानी रावण,
घमंड मर्दक उत्तम – नरोत्तम।
आतताई नाशक है सर्वोत्तम।
मान् करते गुरुजन का पुरुषोत्तम।

ढ़क नहीं पाए अंधविश्वास उमंग।
वृहद बिचार शीलता नेक ढंग।
घर संस्कृत की परंपरा हो ध्यान।
मानव जीवन संस्कार करे कल्याण।

विशाखा अनुपमा अयोध्या धाम,
कला और संचिका होता सम्मान।
प्रथम महापुरुषों का जन्म स्थान,
चारु दिशाओं को मिलता ज्ञान।

धरा धरातल होता यज्ञ ज्ञान स्थान।
अटके भटके मिलता बिरसा ज्ञान।
सहज समान भावना को सम्मान।
फैला तीनों लोक में संगीत गान।

शहंशाह बच पर रहते विद्वान,
कोई नहीं होता अज्ञान वान।
सदा से रही अजेय अयोध्या धाम,
वही मलिन का भी करती कल्याण।

रामायण महाभारत करें उत्थान,
सत्य पर चलने वाले का कल्याण।
जीवन जीने वालों कला निधान,
गीता औ उपनिषदों में वह ज्ञान।

दशो दिशाओं पर अवध का ध्यान,
आकर देवता करते गुणगान।
तल तलातल से होता प्रभु मान,
ऋषि – गंधर्व गावत अविरल गान।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने अयोध्या की पावन भूमि के गुणों और विशेषताओं का वर्णन किया है। महापुरुषों की पावन भूमि का मनोरम वर्णन किया है, यह पावन भूमि सदैव से ही आध्यात्मिकता का स्रोत रहा है, जो आज भी निष्काम उपासकों की पुण्य गाथा से कण – कण सुशोभित करता है।

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यह कविता (अयोध्या में गंधर्व गान।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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शनि की साढ़ेसाती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शनि की साढ़ेसाती। ♦

साढ़ेसाती जब भी आती है।
शारीरिक कष्ट बढ़ाती है।
जीवन में कई बार यह आती है।
आर्थिक कष्ट दे जाती है।
अवसाद जीवन में ले आती है।
दुर्घटना देकर जाती है।

मानसिक संताप इसने दिखाती है।
हिम्मत दिल से दूर भगाती है।
कल क्लेश बढ़ा मनुष्य भरमाती है।
घर – घर का खर्च बढ़ाती है।
व्यक्ति को दूर बेसन ले जाती है।
तबाही परिवार में आती है।

आपस मैं ही कलह – कलह कराती है।
पराया अपने को बनाती है।
मन बुद्धि को भ्रमित करने आती है।
घबराहट मन में जगा जाती है।
ढाई – ढाई बरस का तीन चरण होता है।
इसका मकसद इस तरह होता है।

प्रथम ढाई वर्ष में यह सीख सिखाती।
मानसिक परेशानी जीवन में आती।
दूसरे भाग में आर्थिक क्षति पहुंचाती।
शारीरिक कष्ट देने आती।
विश्वास को भी भ्रमित करते जाती।
सारे डगर में अगर फैलाती।

आखरी ढाई वर्ष में भरपाई करती।
अंत समय व्यक्ति को ज्ञान कराती।
शनि सत्य का मर्यादा कहलाता।
सत्कर्म की मर्यादा बतलाता है।
राहत के लिए ‘मंगल’ उपाय बताता।
सनी इससे प्रसन्ना हो जाता।

पीपल वृक्ष की पूजा से लाभ मिलता।
पीपल में देवताओं का वास होता है।
मानव के मन और बुद्धि को शांत देता।
ऑक्सीजन यहां पर्याप्त होता है।
पीपल के वृक्ष की पूजा सार्थक होती।
व्यक्ति को भी राहत पहुंचाती है।

पीपल में अर्घ देने से बहुत लाभ होता।
शिव की उपासना से राहत मिलती है।
शनि की उपासना के लिए शनि स्तोत्र पढ़ें।
रूद्र अवतार हनुमान जी का जप करें।
महामृत्युंजय मंत्र से शिव का अभिषेक करें।

शनिवार को पीपल के वृक्ष में जलदान करें।
तेल, तिल तेल, काला तिल, काला कपड़ा भेंट करें।
गुड, लोहा, काला कपड़ा, गरीब को दान करें।
शनिवार को खिचड़ी का भोग लगाने से लाभ होता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – शनि की साढ़ेसाती, जब जीवन में आती है तो, क्या – क्या परेशानी होती है। इन परेशानियों को कम करने के लिए क्या करें, शनि देव को कैसे प्रसन्न करें, जिससे परेशानिया कम हो। शनि देव की उपासना कैसे करें।

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यह कविता (शनि की साढ़ेसाती।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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चपला अपने आंगन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चपला अपने आंगन। ♦

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तम मलिक अंचल में घना।
कलपना मेघा चपला चंचला।

संवेदना अभिव्यक्ति सब मौन।
बेर कदली संग निभाता कौन।

निर्वाधित अधिकार उसमें सना।
कातर स्वरों के राग से जो बना।

शिष्टता सम गामिनी मैं कौन ?
‘मंगल’ स्वर लहरी बजती मौत।

जग – क्रंदन नव वंदन।
मन नभ पुलकित आंगन।

समता सुंदर अभिनंदन।
स्मृतियां करती अंकन।

मधु समीर मलाई चंदन।
उपवन किसलय आलिंगन।

सौरभ प्रदेश में परिवर्तन।
चपला चमकी घर आंगन।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – मेघाच्छादित वर्षा, बिजली कड़कने की आवाज हो, वर्षा का पृथ्वी से आलिंगन हो। कितना खूबसूरत मनोरम दृश्य हैं। हर तरफ खुशिया ही खुशिया।

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यह कविता (चपला अपने आंगन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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खाने में शामिल न करें।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ खाने में शामिल न करें। ♦

आम खाने में लगता मजेदार।
स्वास्थ्य वर्धक और लाजवाब।
आम में अच्छे तत्व पाए जाते।
इसी लिए तरह तरह से खाते।

सबके मन भाते तथा लुभाते।
शरीर को पुष्ट निरोग बनाते।
साल भर में पेड़ पर लटकते।
चाव से इसको लोग मिल खाते।

एक बात याद आई उस कराते,
आम खाने के बाद में करेला,
को कभी भी नहीं लोग खाते।
खाने से हानि शरीर में आते।

रायता और छाछ भी बराते।
यह काया में जहर पिला देते।
भिन्डी की सब्जी लगे लाजवाब।
पौष्टिक आहारों का यह संसार।

विविध रूपों में इसका प्रयोग।
खाने में बहुत लगती है मजेदार।
भोजन में सलाद का हो साथ।
कहते होता इससे बहुत लाभ।

पर कुछ वस्तु में होता बरताव।
साथ मिलकर लेने से करें इंकार।
वरना हो जाएंगे तंग और लाचार।
शरीर को कर देगा वह बेकार।

लीबर भी हो जाएगा कमजोर।
पर नहीं चलेगा किसी का जोर।
शरीर आप में करती रहेगी शोर।
भूल नहीं पाएंगे कभी यह रोग।

करेला खाने से हो होते निरोग।
भिंडी साथ खाएंगे होगा रोग।
दोनों को अलग-अलग खाइए।
सुखमय जीवन अपना बनाइए।

बड़े कष्ट से शरीर को बताइए।
करेला भिंडी को न मिलाइए।
यद्यपि शुगर में इसे खूब खाइए।
दोनों एक साथ नहीं लीजिए।

आजकल लोग खिचड़ी पकाते,
एक में सब कुछ मिला कर लेते?
वैज्ञानिक प्रभाव नहीं समझते।
मनमर्जी पे सब कुछ वे खाते।

निरोगी काया होती रोग बुलाते।
राष्ट्र विरोधी, मिल जस गाते।
वे कभी कभी स्टोरी सुनाते।
भ्रम में डालकर गरम हो जाते।

ठंडी-ठंडी मूली खाना में खाते।
अकड़ मूवी मसाला लगाये लाते।
मूली के बहुत फायदे हम बतला दे।
जड़ पत्ता पीने से अनेक फायदे।

मूली को खाने से गैस भाग जाते।
सलाद में मूली जो लोग मिला दे।
औषधीय गुण इसमें पाए जाते।
वैद्य ही लोग इसका गुण बताते।

भिंडी के साथ करेला नहीं खाते।
इसके खाने से पेट में रोग बढ़ाते।
सोच समझकर जो भोजन खाते।
निरोगी काया वे अपना बनाते।

स्वस्थ समाज वही लोग बनाते।
जो लोग निरोगी काया हैं पाते।
जो कुछ भी हम सब कभी खाते।
सोच समझकर उसे अपना बनाते।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बहुत सारे उदाहरण के माध्यम से बताया है, किसके साथ क्या खाये और किसके साथ क्या न खाये। किसके साथ क्या-क्या खाने से लाभ होता है, और क्या-क्या खाने से नुकसान भी होता है शरीर को। इसलिए जो भी खाये बहुत सोच समझकर ही खाये, किसी भी खाने के साथ कुछ भी न खाये । जिसके साथ जो उपयुक्त हो, जिसके खाने से शरीर को नुकसान न हो वही साथ-साथ खाये केवल।

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यह कविता (खाने में शामिल न करें।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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“मातृ दिवस” – ममता की माँ सूरत…।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ ममता की माँ सूरत…। ϒ

⇒ Mother Nature of Mamta.

🙂 “मातृ दिवस” – ममता की माँ सूरत…।

माँ! माँ है माँ होती।
ममता की माँ सूरत।
धरा पर माँ एक सूरज।
खुद ही है माँ पलती।
बच्चा भी है पालती॥

बच्चे को वह सुधारती।
गर्भ में धारण करती।
बच्चा संवार कर रखती।
निज रक्त मज्जा -पालती।
स्तन के दूध पिलाती॥

हल्राती -दुलराती,
है प्यार उसे दिखाती।
वह साथ में सुलाती।
रात भर जाग बिताती,
विस्तार गीले रह जाती॥

खुद भूखे रहकर भी –
बच्चे को दूध पिलाती।
सूखे बिस्तर – लिटाती।
माँ – माँ ही कहलाती
मजदूरी भले कर लाती॥

नन्हकी – नन्हका खिलाती।
देती मति – मतिमान।
मगण – मगज पिरोती।
मगन मन ही मन होती।
मखतूली – पहनाती॥

‘मंगल’ भावना भारती।
बच्चे को भाति दुलराती।
माँ! माँ है माँ होती।
ममता की माँ सूरत।
धरा पर माँ एक सूरज॥

शब्दार्थ:- मति-बुद्धि | मतिमान- बुद्धिमान | मगण – चालाकी | मगज- दिमाग | मखतूली-काले रेशम का धागा |

शुभकामनाओं के साथ।

∇ सुखमंगल सिंह – ♥
——♦——
सुखमंगल सिंह जी।
हम दिल से आभारी हैं सुखमंगल सिंह जी के प्रेरणादायक कविता (“मातृ दिवस” – ममता की माँ सूरत…।) हिन्दी में Share करने के लिए।

सुखमंगल सिंह जी के लिए मेरे विचार:

♣ “सुखमंगल सिंह जी” ने कविता के माध्यम से मां के गुणाें, त्याग और पालना का खुले मन से वर्णन किया हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविता छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविता काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

  • हिंदी कहानी – निरंतर प्रयास जरूर पढ़े।
_____

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Krishna Mohan Singh(KMS)
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought to life by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation, and encourage good solar radiation to become themselves.

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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लहरें गायेंगी…।

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ϒ लहरें गायेंगी…। ϒ

⇒ Waves Gayengi ?

🙂 “लहरें गायेंगी”…।

लहरें गीत गायेंगी सबको सुनाएंगी,
‘मंगल’ मीत गायेंगे सभी हँसी उड़ायेंगे।
देखो दुनिया वालों मिलकर तारे रहते ‘
रहते हैं आकाश में पर सारे रहते॥

मिल जुलकर अपनों में खुशी मनाते,
देखा रहा मानव फिर भी भरम खाते।
लहरें गीत गायेंगी सबको सुनाएंगी,
‘मंगल’ मीत गायेंगे सभी हँसी उड़ायेंगे॥

जानवर भी मिलकर एक किनारे रहते,
पर इंसान झगड़ते लड़ते मरते रहते।
इंसानों को डर है लुट जाने का लेकिन,
लेकिन वे सब मस्त पड़े पहलवानों जैसे॥

यहाँ सभी धरती के अपराधी पर मानव,
दूर कहीं पर रोता मजहब बनकर दानव।
लहरें गीत गायेंगी सबको सुनाएंगी,
‘मंगल’ मीत गायेंगे सभी हँसी उड़ायेंगे॥

हवा भी दूषित और प्रदूषित हो गयी,
एक कलंकित नागिन कल ही सबको छू गयी।
जब आज की नारी पर हमला होता है,
दूर कोई मजहब कोना पकडे रोता है॥

भाई – भाई को जाने क्या हो गया है,
सारा पुराना नाता जाने क्यों खो गया है।
लहरें गीत गायेंगी सबको सुनाएंगी,
‘मंगल’ मीत गायेंगे सभी हँसी उड़ायेंगे॥

अपने देश को बोलो क्या हो गया है,
अपने-अपने मजहब मेंही सबकुछ खो गया है।
इसे भी कोई परिंदा नहीं बताने वाला है,
भाइयों में जंग नया होने वाला है॥

रोज सबेरे निकल रहा जनाजा प्यार का,
क्या होगा अब अपने इस संसार का।
लहरें गीत गायेंगी सबको सुनाएंगी,
‘मंगल’ मीत गायेंगे सभी हँसी उड़ायेंगे॥

इंसानों ने कितनों का सम्मान छीना है,
हैवानों सा बहनों पर कहर दीना है।
वह भी एक समय था भाई-भाई प्यार,
रोता है आज देखकर समय सारा संसार॥

उन इंसानों ने अपनी जान गंवाई,
लेकिन बहनों की लड़कर जान बचाई।
लहरें गीत गायेंगी सबको सुनाएंगी,
‘मंगल’ मीत गायेंगे सभी हँसी उड़ायेंगे॥

शुभकामनाओं के साथ।

∇ सुखमंगल सिंह – ♥
——♦——
सुखमंगल सिंह जी।
हम दिल से आभारी हैं सुखमंगल सिंह जी के प्रेरणादायक कविता (लहरें गायेंगी।) हिन्दी में Share करने के लिए।

सुखमंगल सिंह जी के लिए मेरे विचार:

♣ “सुखमंगल सिंह जी” ने कविता के माध्यम से वर्तमान समय में मनुष्यों के मन में हाेने वाले नाेक-झाेक का खुले मन से वर्णन किया हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविता छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविता काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

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समय की कीमत समझाते…।

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ϒ समय की कीमत समझाते…। ϒ

⇒ Explain the value of time

“जूनियरहाईस्कूल की शिक्षा”
‘मंगल ‘गुरुओं की बात बताते।

आप बीती जो सो कह जाते।
नैतिकता का गुर सिखाते।
पीने खाने की बात बताते।
पढ़ना लिखना समझाते।
समय की कीमत समझाते॥

शिक्षा-शिक्षित की चाह बढाते।
आगे बढ़ने की राह दिखाते।
खेती-बारी करना सिखाते।
समय की कीमत समझाते॥

साथ हाथ मिलना बताते।
बाएं-दायें चलना सिखाते।
पढ़ाई अच्छी पढ़ाते।
समय की कीमत को समझाते॥

साहित्य और सन्देश दे जाते।
कविता -आलेख -महत्व बताते।
धैर्य-धर्म की मर्यादा सिखाते।
समय की कीमत समझाते॥

धरम की महत्ता बताते।
कीमत कर्म की समझाते।
मानवता क पाठ पढ़ाते।
समय की कीमत समझाते॥

प्रथम गुरु ,गुरु नाम बताते।
मातु-पिता क प्यार समझाते।
गुरुओं ने ज्ञान सिखाते।
समय की कीमत समझाते॥

सार्थ -सारथि में मेल कराते।
पुस्तकीय भी पाठ रटाते।
सद्भावना का ज्ञान सुनाते।
समय की कीमत समझाते॥

व्याकरणिक ज्ञान कराते।
वीरों की गाथा थे गाते।
महिलाओं के मान बढाते।
समय की कीमत समझाते॥

पुस्तकीय प्रेम करना बताते।
समाज में रहना सिखाते।
गावं क भी महत्व बताते।
समय की कीमत समझाते॥

मालिक-मजदूर के प्रेम बताते।
त्योहारों की खुशियाँ समझाते।
दान-दक्षिणा का मान बताते।
समय की कीमत समझाते॥

प्रार्थना की महत्ता बताते।
प्रकृति सत्ता समझाते।
भेद- भाव सुदूर भगाते।
समय की कीमत समझाते॥

भाग्य कर्म से बनता बताते।
धर्म से जीवन सुखमय सिखाते।
ज्ञान से समाज निर्माण बताते।
समय की कीमत समझाते॥

सुबह -सुबह उठना बताते।
भोरहरियय निपटना कह जाते।
नहा धोकर पढ़ना समझाते।
समय की कीमत समझाते॥

जनगण मन का पाठ पढाते।
वन्देमातरम का महत्व बताते।
राष्ट्रीय पर्व पर तिरंगा लहराते।
समय की कीमत समझाते॥

प्रेयर में जो पाठ पढ़ाते।
प्रभु से विनती करना सिखाते।
ज्ञान का दान प्रभु से मंगवाते।
समय की कीमत समझाते॥

प्रभु शरणम का पाठ पढ़ाते।
ईश्वर कृपा हेतु कह जाते।
दानी -विज्ञानी सीख सिखाते।
समय की कीमत समझाते॥

ब्रह्मचर्य कत पाठ पढ़ाते।
सुशिक्षा का ज्ञान कराते।
मुंडन -उपनयन महत्व बताते।
समय की कीमत समझाते॥

पाप -पुन्य भेद समझाते।
सेना -योद्धा के पाठ पढ़ाते।
न्याय,दण्ड-विधान बताते।
समय की कीमत समझाते॥

धन-दौलत उपयोग सिखाते।
विविध व्यापार गुर बताते।
समृद्धि एश्वर्य का भान कराते।
समय की कीमत समझाते॥

सद्गुण और पुरुषार्थ समझाते।
उन्नति शान्ति का मार्ग बताते।
यदाकदा माया से दूर ले जाते।
समय की कीमत समझाते॥

दीर्घायु होने का पाठ पढ़ाते।
आयुर्वेद का ज्ञान कराते।
शक्ति -बल का मर्म बताते।
समय की कीमत समझाते॥

पशु -प्राण रक्षा ज्ञान समझाते।
जल – पृथ्वी का महत्व बताते।
कृषि विज्ञान की शक्ति समझाते।
समय की कीमत बतलाते॥

लेखन कला -सभ्यता सिखाते।
योग – तप का पाठ पढ़ाते।
जीवन- मृत्यु का कह जाते।
समय की कीमत समझाते॥

आस्तिक-नास्तिक – भेद सुनाते।
राजा – प्रजा का कर्म बताते।
युद्धकला की विधि सिखाते।
समय की कीमत समझाते॥

सूर्य – सोम का प्रभाव सुनाते।
अग्नि- वायु के महत्व बताते।
सत्य -अहिंसा का राज बताते।
समय की कीमत समझाते॥

शुभकामनाओं के साथ।

∇ सुखमंगल सिंह – ♥
——♦——
सुखमंगल सिंह जी।
हम दिल से आभारी हैं सुखमंगल सिंह जी के प्रेरणादायक कविता (समय की कीमत समझाते।) हिन्दी में Share करने के लिए।

सुखमंगल सिंह जी के लिए मेरे विचार:

♣ “सुखमंगल सिंह जी” की कविता के हर एक शब्द में समय की कीमत का अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविता छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविता काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

  • हिंदी कहानी – निरंतर प्रयास जरूर पढ़े।
_____

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought to life by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation, and encourage good solar radiation to become themselves.

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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