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हेमराज ठाकुर

सुगंध भी सुलभ न होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सुगंध भी सुलभ न होगा। ♦

अगर न जागे आज दोस्तो,
कल को फिर से अंधेरा होगा।
पराधीनी में था किसने धकेला?
सवाल यह मेरा – तेरा होगा।

अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद,
फिर सुगंध भी सुलभ न होगा।
कहीं आ न जाए फिर दौर वही,
जो सैंतालीस से पहले था भोगा।

यह पछुआ बयार कहीं ले ही न डूबे,
फिर से भारत के गौरव को।
आओ मिलकर पलवित पुष्पित करते हैं,
अपनी संस्कृति सभ्यता के सौरभ को।

उदासीनता भली नहीं है राष्ट्र धर्म में,
अपनी रीत तो अपनी ही होती है।
परिणाम कभी न अच्छा है होता,
जब देश की जनता सोती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अब भी समय है संभल जाओ, वर्ना अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद फिर सुगंध भी सुलभ न होगा। कहीं आ न जाए फिर दौर वही, जो सैंतालीस से पहले था भोगा सभी ने। यह पछुआ बयार कहीं ले ही न डूबे, फिर से भारत के गौरव को। आओ मिलकर पलवित पुष्पित करते हैं, अपनी प्राचीन सभ्य संस्कृति सभ्यता के सौरभ को।

—————

यह कविता (सुगंध भी सुलभ न होगा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हिन्दू और हिंदुत्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hindu and Hindutva – हिन्दू और हिंदुत्व।

हिन्दू और हिंदुत्व – एक समीक्षा।

हिंदुस्तान में हिन्दू और हिन्दुत्व की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। आज पूरी दुनियां में भारत एक ऐसा देश है, जिसमें हिन्दू और हिन्दुत्व के ऊपर एक जंग सी छिड़ गई है। सोशल मीडिया हो या प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या सामान्य जन वार्ता। राजनैतिक दल हो या फिर सामाजिक – धार्मिक संगठन। सभी की टिप्पणियां और मुहिमें हिन्दू और हिन्दुत्व के पक्ष और विपक्ष में निरन्तर चलती रहती है।

ऐसा नहीं है कि हिन्दू और हिन्दुत्व के विपक्ष में मात्र गैर हिन्दू समुदाय ही खड़े नजर आते हैं। बल्कि खुद को कट्टर हिन्दू कहने वाले लोग भी हिन्दू और हिन्दुत्व के खिलाफ मुक्त स्वर में बोलते हुए नजर आते हैं। खैर विचारधारा अपनी – अपनी।

पर यहां कई सवाल खड़े होते हैं कि जो ये लोग हिन्दू और हिन्दुत्व के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और जो ये हिन्दू और हिन्दुत्व के पक्ष में आंदोलित लोग नजर आ रहे हैं; ये सभी असल में हिन्दू और हिन्दुत्व के अर्थ को जानते भी है या नहीं। या फिर मात्र पक्ष के लिए पक्ष और विरोध के लिए विरोध करते रहते हैं। कहीं ये राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक संगठनात्मक विचारधारा से बंध कर तो यह सब करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं? कहीं ये सामाजिक सरोकारों को ठोकर मारकर अपने संगठनात्मक सरोकारों को साधने की कोशिश करते हुए तो ऐसी हरकत करने की जरूरत नहीं कर रहे हैं, जो समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।

• हिन्दू शब्द का अर्थ •

उससे पूर्व की हम आगे की बात करें। हिन्दू शब्द के अर्थ को समझना जरूरी है। यूं तो भारत में हिन्दू कहलाने वाले लोग स्वयं को सनातनी कहते हैं, जो सनातन धर्म की “वसुधैव कुटुंबकम्” की अवधारणा के धरातल पर खड़ी एक मानवीय सरोकारों की इमारत है। पर फिर भी हिन्दू शब्द के अर्थ को समझना जरूरी है। मेरे मत के अनुसार यदि हिन्दू शब्द को भाषिक संरचना के आधार पर परिभाषित किया जाए तो हिन्दू शब्द “हिं + दू” के मेल से बना है। इसमें “हिं” का अर्थ हिंसा और “दू” का अर्थ दूर होता है। अर्थात ऐसा व्यक्ति/समुदाय/समाज जो हिंसा से दूर रहता हो, वह हिन्दू है।

हिंसा मानसिक, तानसिक या फिर कोई भी हो सकती है। इसी प्रकार अहिंसात्मक भावना से ओतप्रोत मानस ही हिन्दुत्व है। इस सन्दर्भ में यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है, वह चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय का क्यों न हो। वह हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख हो या इसाई या फिर पारसी। जो सत्य और अहिंसा परमो धर्म का मार्ग नहीं अपनाता, वह हिन्दू धर्म का होकर भी हिन्दू नहीं है। यदि मैं गलत हूं तो फिर हिन्दू धर्म की पवित्र पुस्तकों के प्रमाण भी गलत है। महर्षि वाल्मिकी और तुलसी कृत रामायण में महा पण्डित रावण को राक्षस और कविलाई समाज के नायक गुह को तथा पशु समुदाय यानी वानर तथा रिक्ष समुदाय के हनुमान, सुग्रीव, अंगद तथा जामवंत आदि को साधु व सज्जन सिद्ध करना इसी हिंदूवादी सोच का उदाहरण है।

शबरी जैसी निम्न जाति की वृद्ध औरत के जूठे बेर प्रभु राम द्वारा खाना तथा केवट जैसे सामान्य जन के गले लगना आदि सभी प्रमाण हिंदूवादी सोच को पुष्ट करते हैं। और भी न जाने कितने-कितने प्रमाण कई शास्त्रों में भरे पड़े हैं। पर नहीं आज ये बाते किसी को न ही तो सुननी है और न ही समझनी है।

आज तो बस एक ही भूत सबके सिर पर सवार है कि मैं हिन्दू माता-पिता की संतान हूं तो मैं हिन्दू हूं। अधिकांश भाई बहन ऐसे हैं जिन्हें हिन्दू धर्म का क ख ग तक मालूम नहीं है पर है हम हिन्दू। मेरी बात झूठ है तो करें सर्वे। पूछिए जरा हिन्दू कहलाने वाले लोगों से कि वेद कितने हैं? पुराण कितने हैं? क्रमबद्ध उनकी सूची बनाने को कहे।इतनी सी बात से ही सारी हेकड़ी निकल जाएगी। उन ग्रंथों में लिखा ज्ञान तो दूर की कौड़ी है।

मेरा मक़सद किसी को जलील करना और किसी की पैरवी करना नहीं है। सोशल मीडिया में कई मुस्लिम भाई भी राम को अपना पूर्वज बताते हुए नजर आते हैं और वे ये मानते हैं कि हमारे पूर्वज हिन्दू थे। उनकी कवरगाहों में उर्फ कर के उनके हिन्दू होने का प्रमाण लिखा हुआ मिलता है। खैर मैं इस बात की पुष्टि नहीं कर रहा हूं। पर उन्हे बोलते मैने जरूर सुना है।

मेरा मतलब है कि फिर इस हिन्दू और हिन्दुत्व के मुद्दे पर इतनी जुमानी जंग क्यों? विशेष तौर पर इस मुद्दे पर भाजपा और आर एस एस से समर्थित लोगों को निशाने पर गैर भाजपाई और गैर आर एस एस संगठनों के हिन्दू कहलाने वाले लोग ही रखते हैं।खैर गैर हिंदूवादी संगठनों और समुदाय की बात तो अलग है। इस सन्दर्भ में मुझे तो इतना सा ही कहना है कि वह चाहे किसी भी दल या विचारधारा से जुड़ा हुआ व्यक्ति क्यों न हो। यदि वह किसी जीव की बलि चढ़ाता है, मांस खाता है, मदिरा पीता है, नशा करता है, अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे के मन को ठेस पहुंचाता है, भ्रष्टाचार, अनाचार, दुर्व्यवहार, बलात्कार और कोई अन्य असामाजिक कृत्य करता है तो वह हिन्दू हो ही नहीं सकता। शायद इस बात से बहुतों को बुरा भी लगे, क्योंकि आज का अधिकांश हिन्दू समाज इन्ही बुराइयों से बुरी तरह से घिरा हुआ है। “पर हित सरिस धर्म न भाई” की लोक मंगल भावना बहुतायत गायब सी हो रही है।

• संपूर्ण हिंदुत्व को प्रतिस्थापित करना? •

आज हिन्दू समाज को जाति प्रथा, बलि प्रथा, धर्मवाद और आरक्षण व्यवस्था जैसी मुसीबतों से दो-दो हाथ होना बहुत जरूरी है। जातिवाद के नाम पर हिन्दू धर्म को मानने वाले वर्गों में ही संघर्ष है। इस लड़ाई में कई राजनैतिक दल भी आमने सामने है। भीम आर्मी के लोग जहां जाति प्रथा को मनु स्मृति का फैलाया भ्रम समझते हैं तो वहीं अपने आपको उच्च वर्ग समझने वाला हिंदू समाज इस बात को मानने को कतई राजी नहीं है। उच्च वर्गीय कहलाने वाले हिंदू समाज का मानना है कि मनुस्मृति में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि शुद्र का बेटा शूद्र और ब्राह्मण का बेटा ब्राम्हण ही कहलाएगा। अर्थात वहां कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था का नियम प्रतिपादित किया गया है न कि जातिगत दासता का। उनके अनुसार यह वंशानुगत जातिगत परंपरा हमारे भारतीय संविधान की देन है, जिसमें ब्राह्मण का बेटा ब्राम्हण और शूद्र का बेटा शूद्र कहलाने की संवैधानिक मंजूरी प्रदान करके रखी है। इस सन्दर्भ में वे आरक्षण का भी हवाला देते हैं। इधर जातिगत आधार पर आरक्षण पाने वाले समुदायों के लोग अपना आरक्षण छोड़ने को किसी भी हद तक मंजूर नहीं है। ऐसे में भारतीय समाज से जातिगत भावना को दूर किए बिना संपूर्ण हिंदुत्व को प्रतिस्थापित करना कहीं से भी संभव होता हुआ नजर नहीं आता।

• जातिगत भेदभाव और छुआछूत •

आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारे भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत उतने ही मजबूत और दृढ़ है जितने कि वे स्वतंत्रता से पहले थे। इसमें भी अगर गौर से देखें उच्च वर्गीय कहलाने वाले समाज में इस प्रथा में कुछ सुधार जरूर हुए हैं। यहां ब्राह्मण, राजपूत, ठाकुर, राणा, कनैत, राठी, कुम्हार, तरखान आदि जातियों का आपस में एक साथ उठना बैठना और एक दूसरे के साथ मिलकर के खाना-पीना तथा आपस में अपने बेटे – बेटियों के रिश्ते तय करना लगभग शुरू हो चुका है; जो सामाजिक उत्थान की दिशा में एक अच्छा कदम है।

परंतु दूसरी ओर आरक्षण का लाभ लेने वाले निम्न वर्गीय कहलाने वाली जातियों के लोग आपस में यह क्रिया करते हुए नजर नहीं आते। लोहार और कोली, चर्मकार तथा अन्य निम्न जाति के लोग आपस में न ही तो सामाजिक तौर पर इकट्ठे बैठकर के खाना खाते हैं और न ही सामाजिक रिश्तो को निभाने में आपस में रिश्तेदारी करते हैं। सबसे पहले हिंदू और हिंदूवादी संगठनों को भारत से इस जातिवाद के भूत को बाहर फेंकना होगा। उसके साथ – साथ दूसरी सबसे बड़ी चुनौती भारतीय देवी-देवताओं को खुश करने के लिए निरीह पशु – पक्षियों की बलि चढ़ाने की प्रथा को समाप्त करने की है।

क्या यह हिंसात्मक घटनाएं नहीं है? सब जानते हैं कि ये कुप्रथाएं हैं और ये बंद होनी चाहिए। पर बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन? हिंदू धर्म के गैर भाजपाई और गैर स्वयं सेवक संगठन के लोग इन विचारधाराओं से जुड़े हुए हिंदुत्व का पक्षधर बनने वाले लोगों को साफ नसीहत देते हुए नजर आते हैं कि खुद ये लोग सभी प्रकार की हिंसाएं करते हैं और दूसरों को हिंदू बनने की नसीहत देते हैं। आखिरकार इस दोहरे चरित्र से ये लोग कब बाहर आएंगे, जिससे इनकी कथनी और करनी में एकरूपता नजर आए और हिन्दू समाज इनकी विचारधारा पर विश्वाश कर सके ? सवाल यह भी जायज है। यह तो नहीं चलेगा कि औरों को उपदेश और खुद को गोहटे।

⇒ भारत में हिंदुत्व कायम करना है तो…

हिंदूवादी संगठनों को यदि सचमुच भारत में हिंदुत्व कायम करना है तो उन्हें अपनी विचारधारा के साथ-साथ अपने सामाजिक व्यवहार को भी हिंदुत्व के आधार पर ही ढालना होगा। रही बात धर्मवाद की; उसमें तो भारत में असंख्य चुनौतियां हैं। यह ठीक है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है परंतु फिर भी हिंदुत्व की भावना सभी धर्मों से ऊपर उठकर धर्मनिरपेक्ष ही है। यह सच है कि सिख धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म आदि कई धर्म हिंदू धर्म के ही घटक है परंतु यहां भारतीय धार्मिक परंपरा के अनुसार मुस्लिम धर्म को हिंदू धर्म का कट्टर विरोधी धर्म भी माना जाता है। इसके समकक्ष ईसाई धर्म का प्रारूप भी खड़ा कर दिया जाता है। परंतु मैं इस बारे में अपनी राय ऊपर ही स्पष्ट कर चुका हूं कि अहिंसा की भावना से ओतप्रोत हर व्यक्ति मेरी नजर में हिंदू है।

उपरोक्त सभी कारण इस बात की पुष्टि करते हैं कि कुछ लोग मात्र विरोध के लिए विरोध और मात्र पक्ष के लिए पक्ष करते हुए नजर आते हैं, जबकि उन्हें हिंदू और हिंदुत्व की सही-सही समझ है ही नहीं। हालात यहां तक हो गए है कि हिंदू धर्म के ही मानने वाले कुछ राजनैतिक दलों के उच्च पदस्थ नेता हिंदू समाज के ही बीच में शहर ए आम हिंदुत्व को हराने की बात तक कह डालते हैं। आज भारत के लिए सचमुच एक बहुत बड़ी विडंबना है कि जिन पूर्वजों ने हिंदुत्व की भावना को पुष्ट करने के लिए अपनी अस्थियां तक गला दी, उनको आज यह कहकर श्रद्धांजलि दी जा रही है कि हमने हिंदुस्तान में हिंदू बहुल क्षेत्र में हिंदुत्व को परास्त कर दिया है।

• मानव धर्म •

शारीरिक संरचना के आधार पर देखें तो समूचे विश्व के लोग एक जैसी संरचना के आधार पर बने हुए हैं। उनके रंग जरूर अलग-अलग हो सकते हैं परंतु शरीर की बनावट एक जैसी है। उनके जन्मने और मरने का तरीका एक जैसा है। भले ही अंत्येष्टि की क्रिया अलग-अलग हो। उनके रक्त का रंग सबका एक जैसा है, भले ही उनके ग्रुप अलग – अलग हो। इस आधार पर अगर धर्म को परिभाषित करने की कोशिश करें तो कहना न होगा कि कुदरत ने मनुष्य जाति के लिए धरती पर एक ही धर्म प्रतिस्थापित किया है जिसका नाम है मानव धर्म।

• हिंदुत्व का मूल मंत्र •

संरचनात्मक ढांचे के अनुसार कुदरत ने जातियां भी दो ही बनाई हैं, जिनका नाम है नर और नारी। फिर ये बाकी के विवाद क्यों और किस लिए? संसार को सुंदर बनाने के लिए और अधिक सुखदाई बनाने के लिए हमें अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे की सुख – शांति में कभी बाधा नहीं पहुंचानी चाहिए। यही हिंदुत्व का मूल मंत्र है।

• चन्द पैसों के लालच में अपना जमीर नहीं बेचना •

पर न जाने आज समाज के हर बुद्धिजीवी वर्ग को और समाज के हर प्रतिष्ठित व्यक्ति को कौन सा नशा लग गया है कि वे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दे रहे हैं और जनमानस के एक बड़े भाग की भावना को अपनी आर्थिक समृद्धि या सांस्कृतिक उठापटक के चलते आहत कर रहे हैं। उन्हे यह ध्यान रखना चाहिए कि वे समाज के आदर्श होते हैं। वे यदि समाज में फुहड़ता परोसेंगे तो समाज उनकी नकल करके फुहड़ता का शिकार बनता जाएगा। वे यदि शालीनता पेश करेंगे तो समाज भी शालीन होगा। इसलिए उन्हें बड़ी जिम्मेवारियों के साथ हर भूमिका अदा करनी चाहिए। चन्द पैसों के लालच में अपना जमीर नहीं बेचना चाहिए।

हर नेता – अभिनेता को बड़ी जिम्मेवारी के साथ अपना बयान देना चाहिए। हिंदुस्तान में हिंदुत्व की भावना को हराने की बात करना अपने आप में बहुत बड़ी विडंबना है। इसका सीधा सा अर्थ है हिंदुस्तान में अहिंसात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देना और असामाजिक व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना। आज प्रत्येक भारतीय को जाति, धर्म और सम्प्रदाय के झगड़ों से ऊपर उठ कर पूर्ण हिंदुत्व को समझना होगा तथा उपनिवेशवाद की विकृत मानसिकता से बाहर आना होगा। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जिस दिन हम पूरे भारत को मानसिक रूप से विदेशी संस्कृति और सभ्यता का गुलाम बना देंगे।

• शारीरिक गुलामी से कहीं ज्यादा खतरनाक मानसिक गुलामी •

यह विषय भी विचारणीय है कि शारीरिक गुलामी से कहीं ज्यादा खतरनाक मानसिक गुलामी होती है। इस बात के प्रमाण इतिहास में भरे पड़े हैं कि संस्कृति और सभ्यताएं कई बार विकृत मानसिकता की शिकार हो चुकी है। उदाहरण के लिए पारसी धर्म है, जो आज लगभग अपने ही जन्म स्थल देश में समाप्त सा हो चुका है। हां भारत ही एक ऐसा देश है, जहां उसके भी कुछ अंश शेष है। यही है हिंदुत्व के समर्थक हिन्दुस्तान का हिन्दू जनमानस। जो सब धर्मों का सम्मान करता है पर शर्त यह है कि वे दूसरे धर्मों के मतावलंबी भी किसी दूसरे धर्म के भाव बोध को जाने – अनजाने में ठेस पहुंचाने की कोशिश न करें।

जबकि आज के दौर में यही सब जान बूझ कर हो रहा है। भारत में दक्षिण और वाम पंथ की लड़ाई अधिकतर इन्ही वैचारिक संघर्षों के धरातल पर निरन्तर जारी है। आज लोग अपनी मानवीय संवेदनाओं को खोते जा रहे हैं। हमे निर्भया हत्या काण्ड के दौरान हुए राष्ट्रव्यापी आंदोलनों का दृश्य और भाव भी याद है तथा आज श्रद्धा और उसके जैसी कई और निर्मम हत्याओं के मामले भी याद है। पर यह साफ – साफ देखा जा सकता है कि धीरे – धीरे देश के लोगों की मानसिक भावनाएं व संवेदनाएं निरन्तर पतन की ओर जा रही है।

निर्भया के दौर का जन भाव आज श्रद्धा के मामले तक फीका पड़ गया। ऐसा नहीं है कि सब कुछ खत्म ही हो गया है। पर यह सत्य है कि लोग व्यवस्था की चक्की में पिस कर ज्यादा चिकने हो गए हैं। या शायद उन्हे यह ज्ञान हो गया हो कि व्यवस्था का विरोध करने से कुछ नहीं होगा क्योंकि यहां सुनता ही कोई नहीं है। यहां तो हकीकत यह हो गई है कि जिसकी चलती है तो उसकी क्या गलती है?

उदाहरण के लिए हाल ही में विवादों में घिरी पठान फिल्म के गाने को ही ले लो। एक पक्ष उसे ठीक ठहरा रहा है और दूसरा गलत। जबकि दोनों पक्षों में वाद विवाद करने वाले अधिकतर हिन्दू ही है। जबकि असलियत तो यह है कि इस तरह के अश्लील चलचित्रों को स्क्रीन पर प्रदर्शित करने से रोकने के लिए तो सभी धर्मों के लोगों को एक जुट होकर सामने आना चाहिए। इस प्रकार की अर्धनग्नता भरी सभ्यता समाज में परोसना नीरी पाश्विकता परोसना है। यह पाश्विकता न ही तो हिन्दू धर्म वालों की सामाजिकता के लिए ठीक है और न ही तो मुस्लिम धर्म के लोगों की सामाजिकता के लिए।

इतना ही नहीं किसी भी धर्म की सामाजिकता के लिए ऐसी पाश्विकता बिल्कुल भी सुसभ्य नहीं है। ऐसी घटनाएं चाहे जान बूझ कर कोई करे चाहे अनजाने में। उसका सार्वजनिक विरोध होना चाहिए। फिर वह किसी भी धर्म का हो या फिर किसी भी समुदाय का। यह फूहड़ मानसिकता समाज के लिए किसी भी सूरत में ठीक नहीं है। ऐसे उचाटन भरे फिल्मी दृश्य तथा नशीले पदार्थों के सेवन समाज को मानसिक तौर पर अपाहिज बना कर छोड़ेंगे।

शायद इससे बड़ी कोई और हिंसा, मानसिक हानि हो ही नहीं सकती। फिर भी किसी को अपनी ही बात को सही ठहराना हो तथा अपनी रोजी के चक्कर में समाज के पतन को नजरंदाज करना हो, तो उसका कोई इलाज नहीं है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मेरे मत के अनुसार यदि हिन्दू शब्द को भाषिक संरचना के आधार पर परिभाषित किया जाए तो हिन्दू शब्द “हिं + दू” के मेल से बना है। इसमें “हिं” का अर्थ हिंसा और “दू” का अर्थ दूर होता है। अर्थात ऐसा व्यक्ति/समुदाय/समाज जो हिंसा से दूर रहता हो, वह हिन्दू है। अगर धर्म को परिभाषित करने की कोशिश करें तो कहना न होगा कि कुदरत ने मनुष्य जाति के लिए धरती पर एक ही धर्म प्रतिस्थापित किया है जिसका नाम है मानव धर्म। संरचनात्मक ढांचे के अनुसार कुदरत ने जातियां भी दो ही बनाई हैं, जिनका नाम है नर और नारी। फिर ये बाकी के विवाद क्यों और किस लिए? संसार को सुंदर बनाने के लिए और अधिक सुखदाई बनाने के लिए हमें अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे की सुख – शांति में कभी बाधा नहीं पहुंचानी चाहिए। यही हिंदुत्व का मूल मंत्र है। अश्लील चलचित्रों को स्क्रीन पर प्रदर्शित करने से रोकने के लिए तो सभी धर्मों के लोगों को एक जुट होकर सामने आना चाहिए। इस प्रकार की अर्धनग्नता भरी सभ्यता समाज में परोसना नीरी पाश्विकता परोसना है। यह पाश्विकता न ही तो हिन्दू धर्म वालों की सामाजिकता के लिए ठीक है और न ही तो मुस्लिम धर्म के लोगों की सामाजिकता के लिए।

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यह लेख (हिन्दू और हिंदुत्व – एक समीक्षा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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वीरों की सदा से जाया है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वीरों की सदा से जाया है। ♦

यह धरा नहीं है अधीरों की,
यह वीरों की सदा से जाया है।
टीका नहीं है कोई इस धरा पर सदा,
हमने संघर्षों से सबको हटाया है।

आए कई और गए कई है,
सदियों से यहां आतताई हैं।
हम लड़े – भिड़े छल छद्म हटाया,
आज भी पछुआ से हमारी लड़ाई है।

दया धर्म को हटाने चले जो,
हमने उनको सबक सिखाना है।
जो इठला रहे हैं फूहड़ कामयाबी पर अपनी,
उन्हे औंधे मुंह गिराना है।

आओ मिलकर प्रयत्न करे हम,
संस्कृति विभंजकों को सबक सिखाना है।
पछुआ जीत का परचम फहराने वालों को,
हर हाल में धूल चटाना है।

भारत के खोए गौरव को फिर से,
विश्व पटल पर स्थापित करवाना है।
अभिभूत होकर के सब कह उठे कि,
चलो, भारत दर्शन को हमने जाना है।

कोई खून खराबा नहीं चाहते हैं हम,
बस कागज पर कलम चलाना है।
पछुआ ज्ञान को हटा कर भारत का,
मूल ज्ञान सबके सामने लाना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह भारतभूमि सदा से ही वीरों की भूमि रही है भारत मां के वीर सपूतों ने इतिहास में स्वर्णिम अध्याय रचा है ये सभी अपनी मातृभूमि को स्वर्ग से भी अधिक महान और पवित्र मानने वाले देश के ऐसे सपूत हैं जिन पर पूरा देश सदैव ही गर्व करता है। वर्तमान में भी वीरता की इस परंपरा को बरकरार रखते हुए हमारे बहादुर सैनिक बॉर्डर पर अपना फर्ज बखूबी निभाते हैं।

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यह कविता (वीरों की सदा से जाया है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पुरुष बेचारा बिसारा गया।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पुरुष बेचारा बिसारा गया। ♦

औरत की पीड़ा तो सबने लिखी पर,
जाने क्यों, पुरुष बेचारा बिसारा गया?
औरत पर दया कर लेते हैं सब कोई,
गृहस्थी में पुरुष बेचारा मारा गया।

जोरू की सुने तो मां है कहती,
‘है बेटा ही हाथ से निकल गया।’
मां की सुने तो जोरू है रुसती,
करेगा, कौन बेचारे पर है जी दया?

घर वालों की सुने तो ससुराल है रुस्ता,
ससुराल की सुनने पर रूठतें हैं घर वाले।
शादी के बाद होती हैं ज्यों काली रातें,
मुश्किल ही होते हैं जीवन में उजाले।

बजुर्गों का दायित्व और बच्चों की चिन्ता,
किस बात को कैसे और कब तक निभाएं?
चेहरे पर मुस्कान और दिल में है हर पीड़ा ,
किसको बताएं और किस किससे छुपाएं?

चाहता है बताना कभी चाह कर किसी से,
उससे पहले ही, सुनने वाले अपनी सुनाएं।
इस नर पुराण में हैं नर की कई दुविधाएं,
नारी को यह सब कोई क्यों कर समझाएं?

पुरुष बेचारा हर गम को ले छाती में,
घुट-घुट है पिसता और मर है जाता।
कर दफ़न हर राज वह अपने ही साथ,
दिल की बात को न कभी सामने लाता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पुरुष बेचारा अपने मन की पीड़ा किससे कहे, आखिर उसकी भी तो अपनी भावनायें व स्वप्न है, आखिर उसे क्यों नहीं समझते है लोग। इस संसार में पुरुष व स्त्री एक दूसरे के पूरक है। अब महिलाएँ घर की चहारदीवारी लाँघकर प्रत्येक क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। इस बदलाव का मुख्य कारण है पुरुषों की सोच में समय के साथ बदलाव, उनकी मानसिकता में भी बदलाव। पुरुष सही मायने में प्रेम की परिभाषा को समझा और महिला को जीवन पथ पर उन्नति की तरफ़ जाने की प्रेरणा दी। वो पिता, भाई, पति, दोस्त कोई भी रूप में साथ देते रहते है। पुरुषों को भी अपने हक़ का पूरा प्यार व सम्मान मिलना चाहिए। पुरुष किसी से कह नहीं पाता है, लेकिन इसका ये मतलब बिलकुल भी नहीं की उनकी भावनावों को सम्मान ना दिया जाये। उन्हें भी समझे और उनका ख्याल रखें।

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यह कविता (पुरुष बेचारा बिसारा गया।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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आज न होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज न होगा। ♦

आज न होगा कोई मंगल गान प्रिये,
विपदा में व्यथित जो समूची धरती है।
नफरत के शोलों से विदीर्ण हर वक्ष आज है,
मानवता तिल – तिल कर आज यहां मरती है।

दर्द का दरिया बह रहा है दिल में,
हृदय की जमीन हो गई अब परती है।
मानस कल्पना की लहरों से भी अब तो,
आक्रोश – कटाक्ष की आग ही झड़ती है।

अतृप्त लालसाओं ने जग को है घेरा,
स्वार्थ बेड़ियों ने रूह ही मानो जकड़ी है।
अब उठती ही कहां है कोमल भावनाएं मन में?
हृदय भाव की गति भौतिकता ने जो जकड़ी है।

होता न आदर आज गांव के गलियारों में,
शहरों में तो पहले से ही रही आपाधापी है।
आज न नातों – रिश्तों की कद्र है कहीं पर,
मानव रूप में पाश्विक सभ्यता देखो आती है।

गांव की गुड्डी को गभरू बहन यहां कहते थे,
आज नव जवान देहाती भी खुराफाती है।
महफूज कहां रही अब अस्मत बहू – बेटी की?
वह अपनों के ही हाथों आज लूटी जाती है।

पढ़े-लिखे आदिमानव हो चले हैं हम क्या?
अर्धनग्न घूमते हैं और मद्य – मांस ही खाते हैं।
पशु सी करते हैं करतूतें सब उन्मादी में,
फिर खुद को सभ्य – सुसंस्कृत मानव बताते हैं।

हाय – हाय री! फैशन लाचारी और मानव दुर्दशे,
सच में आज विद्रूपता है जीती और हम है हारे।
शहर – शहर और गांव – गांव में देखो आज तुम,
हर कोई फिरते हैं फैशन के पीछे मारे – मारे।

आज न होगा कोई मंगल गान प्रिये,
इन सब घटनाओं से भीतर भारी पीड़ा है।
मानव समाज में विकृतियों आते देख को,
सोचता हूं, यह विधि की कैसी क्रीड़ा है?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — समस्त संसार का एक ही मूलमंत्र होना चाहिए, वो है जीवमात्र पर दया करना। यह दया भाव मनुष्य का मनुष्य के प्रति या मनुष्य का अन्य जीवों के प्रति होती है। जीवमात्र पर दया करना ही मानवता है। पृथ्वी पर मनुष्य सबसे उत्तम और सर्वश्रेष्ठ प्रजाति है। पर आजकल हो क्या रहा है? इसके बिलकुल उलट – सबकुछ हो रहा है आज का मानव शैतान व राक्षस हो गया है, शराब पीना, मांस खाना, बलात्कार करना, काम वासना व नशे में चूर होकर बड़े से बड़ा विकर्म करने से भी जरा भी नही डरता, क्यों ? पूर्ण रूप से शैतान व राक्षस बन गया है आज का मानव पढ़-लिखकर भी ऐसे कुकर्म करने से पहले एक बार भी नहीं सोचता की आने वाली पीढ़ी के लिए हम क्या सीख दे रहे हैं, हद हैं तेरी रे मानव क्या से क्या हो गया तू !

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यह कविता (आज न होगा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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दो बातें।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दो बातें। ♦

आंखे प्यासी है आज भी प्रिये,
तेरे उस सादे सहज दीदार की।
जमाना बीत गया है किए हुए,
दो बातें तुमसे शालीन प्यार की।

किससे कहूं और क्या कहूं, कि सब कुछ?
नहीं होता है प्यार में किसी को पा जाना?
प्रेम अन्त है, वासनाएं अतृप्त है, चाहत है,
नाम बस एक दूसरे की याद में खो जाना।

जाती हैं दूर तलक वो यादें और वादे,
मुश्किल होता है जिन्हे करके निभाना।
छुप – छुप कर मिलना और फिर बिछुड़ना,
सदियों से प्यार का दुश्मन रहा है जमाना।

वे अन्दर ही अन्दर कई बातों को छुपाना,
बड़ा मुश्किल होता था उन्हे जुबां पर लाना।
वे आंखों ही आंखों की बेबाक सी बातें,
मुश्किल होता था जिन्हे इशारों में समझना।

आज भी हसरत है सीने में, है वही मुहब्बत,
मुश्किल होता है इश्क मुश्क को दफनाना।
जाने क्या रखा है लिव इन रिलेशनशिप में?
क्यों नहीं समझाता है आज इन्हे यह जमाना?

हमने किया नहीं इजहार – ए – इश्क कभी भी था,
रह गया होकर भी प्यार भीतर ही भीतर बेगाना।
तुम हो गए थे उनके पल भर में देखते ही देखते,
हमने सहर्ष देखा था सब, तनिक भी बुरा न माना।

होता कुछ इस कदर का नई पीढ़ी के साथ तो शायद,
खैर ! छोड़िए, सब्र करें, हो गया प्रेम प्रलाप है बहुतेरा,
हो न सका किस्मत से गर दैहिक मिलन तो क्या हुआ?
बस होता रहे रूहों से रूहों का मिलन यूं ही तेरा मेरा।

जालिम जमाने की भीड़ में मुश्किल है जी ढूंढ पाना,
एक दूसरे को, यहां छाया है जी बस अंधेरा ही अंधेरा।
यहां होती नहीं है कभी भी सुबह रात गुजर जाने पर,
यहां का दस्तूर है कि जब जाग जाए तो समझो सवेरा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सच्चा प्रेम क्या है? क्या जिस्मानी भूख ही सच्चा प्रेम है? सच्चा प्रेम – सच्चे प्रेम में जिस्म की भूख नहीं होती है। सच्चे प्रेम में दो दिलों का आत्मिक प्रेम होता है यह प्रेम ज़िस्म के प्रेम से बिलकुल ही अलग होता है। जहां पर जिस्मानी भूख हो वह प्रेम कभी भी नहीं हो सकता, उसे प्रेम की संज्ञा नहीं दे सकते। क्योंकि हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था इतनी मजबूत और पवित्र है कि उसमें दम्पति से ले कर बच्चे और बूढ़े तक सुरक्षित है। यदि लिव इन रिलेशनशिप का कानून भारत में स्थान प्राप्त करता है तो भारतीय समाज हवस का शिकार हो जाएगा। न ही तो रिश्तों नातों की अहमियत रहेगी और न ही नारी जाति का सम्मान रहेगा।भविष्य की नई पीढ़ी और वृद्ध लोग असहज और असुरक्षित होंगे। आखिर क्या जरूरत है बिना शादी के लड़का – लड़की को सांसारिक व्यवहार में रहने की? हमारी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था के मुताबिक 25 वर्ष तक का समय पढ़ने – लिखने का है और उस बीच दो लड़का – लड़की में प्रेम भी हो जाता है तो कोई गुनाह नहीं है। शर्त यह है कि वह प्रेमी जोड़ा विवाह पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित न करें। हमारी संस्कृति के नौजवान अधिकांश भले ही सामाजिक लाज लपेट के चलते ही सही; इस नियम का पालन भी करते आए हैं। उसके पश्चात विवाह घर वालों की सहमति से करते हैं और सांसारिक जीवन का आनंद लेते हैं।

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समाज की युवा पीढ़ी यह जरूर पढ़े: —

प्रिय मित्रो हिंदुस्तान के माथे पर आज एक और कलंक आफताब और श्रद्धा की लिव इन रिलेशनशिप की कहानी के दर्दनाक अन्त से लगा है। साथियों आज के इस अंध आधुनिकता के दौर में हमारी युवा पीढ़ी पश्चिम की अति स्वतंत्रय प्रिय सभ्यता को अपनाने में उतारू है और उसी पागलपन के नशे में हमारे बच्चे विपरीत लैंगिक होते हुए भी लीव इन रिलेशनशिप के नाम पर बिना विवाह किए ही पति – पत्नी की तरह इकट्ठा रहने लगे हैं। एक तो यह परम्परा भारतीय परिवारवाद और समाजवाद की दृष्टि में पहले ही भद्दा एवम भुंडा कर्म है। ऐसी वृति को हमारे यहां पशु वृति की संज्ञा शास्त्रों में दी गई है।

उसके बावजूद भी यदि पश्चिमी सभ्यता के अंधा अनुकरण में नई पीढ़ी इस व्यवस्था में दैहिक विपासा के कारण रहना ही चाहती है और यह पीढ़ी इस व्यवहार को कोई पाश्विकता नहीं मानती बल्कि पश्चिमी देशों के कानून की तर्ज पर इसे अपना कानूनी अधिकार समझती है तो इसमें समाज उनकी दुर्दशा के लिए कहां तक जिम्मेदार है? खैर यह घटना आज जिरह की नहीं है बल्कि दिल को दहला देने वाली है। इस पर हर किसी को आफताब की करतूत पर गुस्सा आ रहा है और आना भी चाहिए। यह श्रद्धा की विकट मौत का ही वाक्य नहीं है बल्कि हिंदुस्तान की हर जाति, धर्म और सम्प्रदाय की नौजवान बहु – बेटियों की सुरक्षा का सवाल है।

पर बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि आखिर क्या जरूरत है बिना शादी के लड़का – लड़की को सांसारिक व्यवहार में रहने की? हमारी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था के मुताबिक 25 वर्ष तक का समय पढ़ने – लिखने का है और उस बीच दो लड़का – लड़की में प्रेम भी हो जाता है तो कोई गुनाह नहीं है। शर्त यह है कि वह प्रेमी जोड़ा विवाह पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित न करें। हमारी संस्कृति के नौजवान अधिकांश भले ही सामाजिक लाज लपेट के चलते ही सही; इस नियम का पालन भी करते आए हैं। उसके पश्चात विवाह घर वालों की सहमति से करते हैं और सांसारिक जीवन का आनंद लेते हैं।

हमारी संस्कृति में बेटी जब एक बार ससुराल जाती थी तो उसे शिक्षा दी जाती थी कि कभी ससुराल को छोड़ कर वापिस पीहर मत आना। वह बेटी भी उसी शिक्षा का पालन करती थी। युग बदला परिस्थितियां बदली। अंग्रेज भारत में आए, उन्होंने भारतीय सामाजिक और वैवाहिक जीवन के ढर्रे को बदलने में अहम भूमिका निभाई। लोग दैहिक सुख को व्यक्तिक अधिकार समझने लगे। बड़े – बड़े घरानों के लोग इस बात को कोई बेगैरत नहीं बल्कि रईसी रसूख समझने लगे।

हमारी माताएं बहनें औरत/देवी से मैडम के पद पर पदच्युत हुई। उसी बीच बेदवा यानी डाइवर्स ने भी भारत में प्रवेश किया। हां तलाख तो मुगल काल में ही आ गया था पर भारत में डाइवर्स अंग्रेजों की देन हैं। क्योंकि यह पश्चिम की रीत थी। “वहां अत्यधिक स्वातंत्र्य के चलते शादी ज्यादा दिनों तक टिकती ही नहीं थी। यदि किसी की साल भर टिक गई तो सालगिरह मनाई जाती थी और 25 साल टिकी तो सिलवर जुबली मनाई जाती थी। यूं ही गोल्डन जुबली आदि। पर यह मौका पश्चिम में बहुत कम लोगों को मिलता था। भारत में ये कोई भी प्रक्रम मौजूद नहीं थे। यहां शादी का नाम एक वचन था, जिसे एक पवित्र रिश्ता एवम जीवन यज्ञ समझा जाता था। हम इसे जीवनपर्यंत हर हाल में निभाते थे। बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण ने हमारी संस्कृति और समाज का तरीका बदला। हम पश्चिम का अनुकरण करने लगे और आज तलाक, डाइवर्स, सालगिरह आदि रस्मे हमारे समाज में आम प्रक्रियाएं हो गई है।”

खैर यह एक चर्चा का विषय था। पर मेन मुद्दा श्रद्धा की लाश को 35 टुकड़ों में काट कर अलग – अलग स्थलों में ले जा कर सबूतों को जड़ से मिटाने का तथा उस नव युवती की बेरहमी से की गई हत्या का है। प्रिय मित्रो आज भले ही हमारे देश के कई विद्वान और व्यक्तिक स्वातंत्र्य के प्रेमी लिव इन रिलेशनशिप के मुद्दे पर कड़ा कानून बनाने की बात कर रहे हो। पर मेरे विचार से लिव इन रिलेशनशिप जैसे कानून को भारत में कोई जगह नहीं दी जानी चाहिए।

क्योंकि हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था इतनी मजबूत और पवित्र है कि उसमें दम्पति से ले कर बच्चे और बूढ़े तक सुरक्षित है। यदि लिव इन रिलेशनशिप का कानून भारत में स्थान प्राप्त करता है तो भारतीय समाज हवस का शिकार हो जाएगा। न ही तो रिश्तों नातों की अहमियत रहेगी और न ही नारी जाति का सम्मान रहेगा।भविष्य की नई पीढ़ी और वृद्ध लोग असहज और असुरक्षित होंगे तथा इस प्रकार की श्रद्धा की कहानी जैसी कई घटनाएं सामने आएगी। इसमें मात्र लड़कियां ही घटना की शिकार नहीं होगी बल्कि लड़के भी इस लिव इन रिलेशनशिप के चंगुल में फंस कर शिकार होंगे।

यह हम सभी जानते हैं कि एक वक्त के बाद अक्सर हम स्त्री – पुरुष, पति- पत्नी व्यवहार में रह कर एक दूसरे से ऊब ही जाते हैं। वह तो हम लोक लाज और बच्चों की वजह से ताउम्र पति – पत्नी हो कर जिन्दगी भर साथ रह लेते हैं और रहना भी चाहिए। यदि लिव इन रिलेशनशिप हमारे समाज पर हावी हुआ तो महिलाओं का और बच्चों का घणा शोषण होगा। वह कैसे और क्यों? इसका जबाव समाज स्वयं जानता है। अधिकतर लोग विवाह से पूर्व ही दैहिक भोग को भोग कर एक दूसरे से ऊब कर किनारा कर लेंगे और यह सिलसिला समाज में आम हो जाएगा। नए – नए साथी के साथ रहने का शौक स्त्री पुरुष दोनों में जन्मेगा और सामाजिक ढांचा विकृत हो जाएगा। चरित्र नाम की बात बेईमानी हो जाएगी। बाकी सभी की अपनी – अपनी सोच है।

अब सवाल उठाते हैं कि :—

  1. क्या भारत में संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की शिक्षा स्कूलों में शुरू नहीं करनी चाहिए?
  2. क्या यह भारत की अति सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता का परिणाम है?
  3. क्या यह घटना लव जिहाद का मामला है?
  4. क्या भारत में डेटिंग एप जैसे समाज विरोधी सोशल मीडिया पर बैन लगाना चाहिए?
  5. क्या यह घटना हिन्दू – मुस्लिम भाईचारे और प्यार पर कलंक नहीं है?
  6. क्या लव जेहाद और धर्म परिवर्तन भारतीय समाज में राष्ट्र द्रोह के समक्ष जुर्म नहीं है?
  7. क्या एक देश एक विधान जरूरी नहीं है?
  8. क्या स्कूली पाठ्यक्रम में धार्मिक और सांस्कृतिक विषयवस्तु के साथ – साथ सभी धर्मों के सार तत्व मानवीय मूल्यों की शिक्षण सामग्री डलवाना जरूरी नहीं है?
  9. क्या इस्लामिक शिक्षा पद्धति के संस्थानों “मदरसों” को औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर करके उन सभी मुस्लिम बच्चों को भी सामान्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था के आम संस्थानों यानी सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए? आखिर मदरसों की क्या जरूरत है?
  10. क्या निजी शिक्षण संस्थानों को बन्द करके सरकारी शिक्षण संस्थानों को और उन्नत कर के, उनमें संस्कारवान अध्यापक, अध्यापिकाओं की भर्ती कर एक देश एक शिक्षा व्यवस्था और एक ही पाठ्यक्रम की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
  11. क्या अध्यापक भर्ती का पैरामीटर लिखित, मौखिक परीक्षाओं से हट कर उसकी जगह चारित्रिक आंकलन पर आधारित नहीं होना चाहिए? अध्यापक बनने वाले प्रार्थी का खानपान, रहन सहन, पहनावा, बातचीत, सेवा, सत्कार, संयम, साधना,
    त्याग, समाज और राष्ट्र के प्रति सोच और निस्वर्थता, ईमानदारी, शालीनता, गुरुत्व व गंभीरतव आदि पहलू चैक नहीं होने चाहिए क्या? मात्र सैलरी के लिए शिक्षक का कार्य करने वाला शिक्षक शिक्षिका क्या उचित शिक्षक हो सकते हैं क्या?
  12. स्कूली बच्चों को स्कूलों में अध्यापक द्वारा संस्कार स्थापित करने के लिए आंशिक डांट – फटकार और सजा देने का कानूनन प्रावधान नहीं होना चाहिए क्या?
  13. अत्यधिक स्वातंत्र्य शिक्षार्थी जीवन में ठीक है क्या?
  14. माता – पिता और अभिभावकों को भी कमाई से ज्यादा फिक्र अपने बच्चों के संस्कारों की नहीं करनी चाहिए क्या? जो हम उन्हे आवारा छोड़ देते हैं और सारा ठीकरा अध्यापक के सिर पर फोड़ते है, वह ठीक है क्या?
  15. क्या एक अध्यापक को भी अपने छात्र और छात्राओं के प्रति उतने ही चिन्तित और संवेदनशील नहीं होना चाहिए, जितना कि वह अपने बच्चों के प्रति होता है?
  16. क्या महिलाओं की निर्मम हत्या सिर्फ मुस्लिम समुदाय के पुरुष ही करते हैं या बाकी धर्मों ( हिन्दू धर्म, सिख धर्म और ईसाई आदि) के पुरुष भी करते हैं? और भी बहुत कुछ। पर कितना लिखे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “वहां अत्यधिक स्वातंत्र्य के चलते शादी ज्यादा दिनों तक टिकती ही नहीं थी। यदि किसी की साल भर टिक गई तो सालगिरह मनाई जाती थी और 25 साल टिकी तो सिलवर जुबली मनाई जाती थी। यूं ही गोल्डन जुबली आदि। पर यह मौका पश्चिम में बहुत कम लोगों को मिलता था। भारत में ये कोई भी प्रक्रम मौजूद नहीं थे। यहां शादी का नाम एक वचन था, जिसे एक पवित्र रिश्ता एवम जीवन यज्ञ समझा जाता था। हम इसे जीवनपर्यंत हर हाल में निभाते थे। बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण ने हमारी संस्कृति और समाज का तरीका बदला। हम पश्चिम का अनुकरण करने लगे और आज तलाक, डाइवर्स, सालगिरह आदि रस्मे हमारे समाज में आम प्रक्रियाएं हो गई है।”

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यह कविता (क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बलिदानी क्या सोचेंगे?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बलिदानी क्या सोचेंगे? ♦

ओ पदवी के सब चाहवानों! अब तो पदवी का मोह छोड़ो।
अपनी गलती का ठीकरा प्यारो, दूसरों के सर पर न फोड़ों।

देश हमारा, हम सब हैं इसके, ध्रुवीकरण से इसे मत तोड़ो।
खैर जो चाहते हैं गर अपनी तो, जर्रा – जर्रा देश का जोड़ो।

रोप के पौधा आजादी का, पल्वित पुष्पित कर जो चले गए।
क्या बीतेगी दिल पर उनके? देखे सपने जो उनके छले गए।

जाति धर्म की बाट कहां जोही? समता ही जिनका स्वप्न रहा।
विषमता विश्व से मिटाने के खातिर, निरंतर कड़ा संघर्ष सहा।

वे बलिदानी क्या सोचेंगे? जब हमको लड़ता भिड़ता देखेंगे।
“बेकार हुई सब मेहनत हमारी,” हम पर तो लानत ही फेंकेंगे।

राष्ट्र बड़ा है स्वार्थ से पगलो, कभी कुछ तो खुद पे शर्म करो।
सत्ता के महल की नीव में यारो, ईमान – धर्म की कंक्रीट भरो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — ओ पदवी के सब चाहने वालो, अब तो अपने पदवी का मोह छोड़ो और अपनी गलती का ठीकरा प्यारो, दूसरों के सर पर न फोड़ों। ये देश हमारा व हम सब हैं इसके, ध्रुवीकरण से इसे मत तोड़ो, अपनी सलामत अगर चाहते हैं तो, जर्रा – जर्रा देश का जोड़ो। रोप के पौधा आजादी का, पल्वित पुष्पित करके जो महानायक देशभक्त चले गए, जरा सोचों क्या बीतेगी दिल पर उनके? देखे सपने जो उनके छले गए तुम्हारे अपने निजी स्वार्थ के कारण। जाति धर्म से ऊपर उठकर सदैव समता ही जिनका स्वप्न रहा। नफ़रत को विश्व से मिटाने व आज़ादी के खातिर, निरंतर कड़ा संघर्ष सहा। कभी सोचा है की वे बलिदानी क्या सोचेंगे? जब हमको लड़ता भिड़ता देखेंगे। “बेकार हुई सब मेहनत हमारी,” हम पर तो लानत ही फेंकेंगे। एक बात याद रखना राष्ट्र बड़ा है स्वार्थ से पगलो, कभी कुछ तो खुद पे शर्म करो। अब तो सत्ता के महल की नीव में यारो, ईमान – धर्म की कंक्रीट भरो।

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यह कविता (बलिदानी क्या सोचेंगे।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी। ♦

गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा।

भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

अब वे व्यापारी से यहां के सरकारी हुक्काम बन बैठे। जब भारत के रियासती शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता को भी अंग्रेजी चाल का पता चला कि ये तो हमे उकसाने का और लड़ाने का काम कर रहे हैं और अपना सम्राज्य स्थापित कर रहे हैं, तो तब अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए भारतीय शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता के जागरूक तबके ने भी आजादी की जंग मिलकर अंग्रेजी शासन व्यवस्था के खिलाफ छेड़ दी।

फिर वह चाहे 1857के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बात हो या फिर असेंबली हाल के बम्ब विस्फोट की घटना। चाहे फिर आजाद हिन्द फौज की स्थापना की बात हो या फिर भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम। इन सभी प्रक्रियाओं में एक लम्बा वक्त जरूर लगा पर यह भी सत्य है कि यही वे घटनाक्रम थे, जिनकी बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं और “आजादी का अमृत महोत्सव” उत्सव मना रहे हैं।

यह भी सच है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इस महा अभियान में गर्म दल और नर्म दल दोनों ने अपनी – अपनी भूमिकाएं अपने – अपने तरीके से निभाई। पर न जाने आज “आजादी के 75साल” बीत जाने के बाद हम क्यों उन तमाम वीर शहीद बहादुरों को भूल से जा रहे हैं, जिन्होंने हमे यह आजादी की सौगात दिलाने में अंग्रेजी हुकूमत की कड़ी यातनाओं के साथ – साथ अपने प्राणों की आहुति भी खुशी – खुशी दी। यदि आज हम औपचारिकता के तौर पर विशेष अवसरों के मौकों पर चन्द स्वतंत्रता सेनानियों को और आजादी के प्रमुख नेताओं को याद करते भी हैं तो उसमें भी एक अधूरा सा पन मुझे नजर आता है।

मैं सोचता हूं कि क्या मात्र इन चन्द कद्दावर नेताओं या स्वतंत्रता सेनानियों ने ही भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई? यदि ऐसा ही था तो फिर भारत इतने लम्बे दौर तक गुलाम क्यों रहा? क्यों फिर रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान ही भारत आजाद नहीं हुआ? ऐसे अनगिनत सवाल बुद्धि के विवेक कक्ष में उठते हैं और दौड़ते रहते हैं।

यह सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़(पहाड़) नहीं फोड़ता। पर फिर भी पूरी मुहिम का अधिकाश श्रेय उस मुहिम के मुख्य पत्र को जाता है और जाना भी चाहिए, क्योंकि उसने उस मुहिम को शुरू किया होता है तथा बाकियों को चेतना दे कर उस मुहिम में शामिल किया होता है। परन्तु मेरे मन में फिर से एक प्रश्न कौंधता है कि ठीक है, मुख्य पत्र को श्रेय दो। परन्तु उस मुहिम को सफल बनाने में अपना योगदान देने वाले अनेकों साथियों को भी तो उस सन्दर्भ में याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने उस मुहिम को कामयाब बनाया होता है। पर नहीं, यह एक परिपाटी सी बन गई है और निरन्तर चली आ रही है कि मुख्य पात्र को ही याद किया जाता है और बाकियों को समय के गहवर में बिसार दिया जाता है।

कुछ ऐसा ही आजादी के आंदोलन की घटना में भी देखने को मिलता है। जो लोग इस मुहिम के नायक थे या यूं कहो कि रसूखदार व्यक्तित्व थे, उन्हे तो आज भी हम याद करते हैं और उनके नाम के कसीदे गढ़ते हैं। पर जिन्होंने जमीनी स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम को गति दी और अंजाम दिया, उन्हे इतिहास के पन्नों में स्थान तक नहीं दिया गया।

यह बात ठीक है कि प्रभावशाली व्यक्तित्वों का जिक्र विशेष रूप से होना चाहिए।परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फिर बाकियों को बिल्कुल भूल ही जाएं।यह तो उनके साथ न्याय नहीं है और इसके साथ – साथ यह रवैया नई पीढ़ी में भी नकारात्मकता भरता है कि “करता कोई और है और वाहवाही किसी और को ही मिलती है।” मेरा मानना है कि जिसका जो मान – सम्मान बनता है, वह उसे मिलना चाहिए। तभी किसी कार्य या बात का उत्कर्ष बना रहता है। वरना नकारात्मकता स्वभाविक है।

आज आजादी के अमृत महोत्सव के सुअवसर पर यह बात मैं इसलिए कर रहा हूं कि हम सब मिलकर इस बात का मन्थन करे कि इस आजादी को दिलाने में अपना योगदान और बलिदान देने वाले ऐसे कितने स्वतंत्रता सेनानी थे, जो हमारे क्षेत्र या जिले के थे पर इतिहास के पन्नों में उनका नाम न होने के कारण आज समाज उन्हें और उनके बलिदानों को थोड़ा सा भी नहीं जानता। यदि थोड़ा बहुत कुछ कोई जानता भी है तो वह भी गौण है।

मेरे जिला मण्डी हिमाचल प्रदेश से ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में अपना योगदान तो दिया पर उन्हें इतिहास में या लोक साहित्य में वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था। हां कृष्ण कुमार नूतन और डा गंगा राम राजी ने अपने साहित्य में कुछ – कुछ जिक्र इन स्वतंत्रता सेनानियों का जरूर किया है पर उससे शायद इन्हें वह सम्मान मिला हो, जिसके ये हकदार हैं। इन स्वतंत्रता सेनानियों में कुछ की जानकारी जो मैं जुटा पाया हूं, कुछ यूं है :—

• रानी खैरागढ़ी उर्फ रानी ललिता कुमारी •

रानी खैरागढ़ी का नाम जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रगण्य है। असल में इनका नाम रानी ललिता कुमारी था। परन्तु इनका पैतृक घर खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में था, जहां से इनका विवाह जिला मण्डी के प्रथम पढ़े लिखे राजा भवानी सेन से हुआ था। शायद तत्कालीन पहाड़ी रिवायत के चलते मण्डी जनपद के लोगों ने रानी का नाम उनके मायके के नाम के आधार पर खैरीगढ़ी रख दिया हो। क्योंकि पहाड़ों में उस दौर औरतों को उनके असली नाम से हट कर उनके पैतृक गांव के आधार पर रखे नाम से ही पुकारा जाता था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि रानी के राष्ट्र प्रेम से प्रभावित होकर जनता उन्हे प्यार से रानी खैरीगढी कहते और यही नाम मशूहर हो गया। जबकि रानी के पिता के गांव का नाम खैरागढ़ था तो उस आधार से नाम तो खैरागढी बनता था। पर जनता ने खैरीगढ़ी रख दिया तो वही प्रसिद्ध हुआ।

जानकारों की माने तो राजा भवानी सेन मण्डी का पहला पढ़ा लिखा राजा हुआ। इस कारण उनके लिए एक पढ़ी लिखी रानी के रिश्ते की तलाश की गई। चारों ओर जब खोजबीन शुरू हुई तो एक उचित रिश्ता खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में जा कर रानी ललिता कुमारी का मिला। राजा की रानी से शादी हो गई। उत्तर प्रदेश में उन दिनों अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावतें चर्म पर थी। तो जाहिर है कि कुमारी ललिता भी पढ़ी लिखी सजग नारी होने के नाते उन बगावती सुरों में ताल देने में अहम किरदार रही होगी। रानी का यह चस्का विवाह के बाद भी कम नहीं हुआ। जब उसने देखा की मण्डी रियासत की जनता के साथ न्याय नहीं हो रहा है। वे अंग्रेजी शासन व्यवस्था के चंगुल में कोल्हू के बैल की तरह परेशान है और राजा तथा राजा के मंत्री भी जनता का शोषण ही कर रहे हैं।

उन्हे जनता के सुख – दुःख की चिन्ता ही नहीं है और राजा जनता से कट कर अपने ही रसूख में जी रहा है। तब रानी ने जनकल्याण और देश प्रेम की भावना राज्य की जनता में भरना शुरू की। यह खबर राजा को अंग्रेजों ने और राजा के चाटुकार मंत्रियों ने गुप्त रूप से देना शुरू कर दी थी और राजा को रानी के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया था। राजा मंत्रियों और अंग्रेजों की बातों में आ कर रानी से विमुख होता रहा। नौबत यहां तक आ गई कि रानी को राजा के प्रेम से वंचित रहना पड़ा। परन्तु रानी ने हार नहीं मानी। वह जनता की सेवा में लगी रही और उनमें राष्ट्र प्रेम की आग जलाती रही। जब रानी को लगा कि राजा उसकी बाते नहीं मानेगा तो वह स्वयं राज्य का कामकाज देखने लगी। परन्तु वहां भी मंत्रियों ने रानी के आदेशों की पालना को नकारना शुरू किया।

तब रानी को लगा कि व्यक्तिगत सुखों से कहीं ज्यादा बड़ा सुख जन सामूहिक सुख है। एक राज घराने का प्रमुख कर्तव्य भी वही होता है। रानी की यह सोच उसके अविवाहित जीवन के बगावती तेवरों को और ताव देती है तथा रानी इस पहाड़ी रियासत में आजादी के आंदोलन की प्रमुख पैरोकार बनी। अब उसे अपने जैसे कुछ और ऐसे सरफीरों की तलाश थी, जिनके भीतर भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ रानी की ही तरह बगावती आग जल रही थी। इतना ही नहीं, कुछ जानकारों का तो कहना है कि परिस्थितियां तो यहां तक बिगड़ गई थी कि रानी को इस सन्दर्भ में राजा भवानी सेन से भी दो – दो हाथ करने पड़े थे। यानी पहाड़ी रियासतों में रानी खैरागड़ी ने झांसी की रानी की भूमिका निभाई।

• भाई हिरदा राम •

इनका नाम मण्डी रियासत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुखता से लिया जाता है। इनका जन्म 28 नवम्बर 1885 को मण्डी शहर में श्री गज्जन सिंह जी के घर हुआ था। लोगों में इनको भाई के नाम से प्रसिद्धी मिली थी। स्वामी कृष्णानंद जी से प्रेरणा ले कर ये क्रांति पथ पर चल पड़े थे। सन 1914 में ये अमृतसर में रासबिहारी बोस, डा• मथरा सिंह, भाई परमानंद तथा पिंगले आदि क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए। धीरे – धीरे ये रासबिहारी बोस के विश्वास पात्र बने।

31 दिसम्बर 1914 की विरपाली धर्मशाला में हुई क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक में इन्हें बंब बनाने का काम दिया गया। यह बात भी खासी चर्चा में है कि भगत सिंह जी ने जो बंब असैम्बली हाल में फैंका था, वह भाई हिरदा राम ने बनाया था। इन्हे इस संघर्ष में अंग्रेजी सरकार द्वारा असैम्बली बंब धमाके की साजिश में पकड़े जाने पर फांसी की सजा सुनाई गई, परन्तु बाद में वह सजा आजीवन कारावास की सजा में बदली गई। आजीवन कारावास की सजा पाने के लिए इन्हें काला पानी यानी अंडोमान की जेल में भेजा गया। वहां पर वीर सावरकर और भाई हिरदा राम एक ही कोठरी में रखे गए थे।

सन 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो भाई जी को जेल से मुक्ति मिली। इस तरह अपने जीवन को राष्ट्र सेवा में समर्पित करते हुए 21अगस्त 1965 ई० को भाई जी पंच तत्त्व में विलीन हो गए। इनकी यादगार में आज मण्डी शहर के बीचो बीच बनी इन्दिरा मार्केट में एक प्रतिमा बनाई गई है, जिसका अनावरण 21अगस्त 2002 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल जी ने तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री भारत सरकार एवम पूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश श्री शांता कुमार जी के साथ मिल कर किया था। इस अवसर पर सांसद सुरेश चंदेल, महेश्वर सिंह और अनिल शर्मा जी भी मौजूद रहे।

• कृष्णा नन्द स्वामी •

स्वामी जी मण्डी शहर के निवासी थे। इनके स्वतंत्रता आन्दोलन का क्षेत्र सिंध प्रांत रहा। इनकी सारी गतिविधियां सिंध से ही चलती थी। स्वामी जी ने 35 वर्षों के अपने स्वतंत्रता संघर्ष में कई बार जेल की सजा भुगती। यही वे कारण थे, जिनके चलते सरदार पटेल ने इन्हे सिंध के गांधी की उपाधि दी थी। इन्होंने दो लाख से भी अधिक हिंदुओं को समुद्र के रास्ते सिंध से मुम्बई और अहमदाबाद पहुंचाया था।

इनकी जेल यातनाओं में 1921-22 में पिकेटिंग के लिए धारा 132 के अधीन एक वर्ष का कारावास, खुलेआम भाषण के लिए धारा 108 सी.पी. सी. के अधीन अक्टूबर 1922 से सितम्बर 1923 तक एक वर्ष का कारावास, सी. पी. सी.की धारा 177 के तहत 1930 से 1931 तक एक वर्ष का कारावास, 1932 से 1934 तक दो साल का कारावास तथा भारत छोड़ो आन्दोलन में 1942 से1945 तक तीन साल का कारावास गिना जाता है। भाई हिरदा राम जी ने भी स्वामी जी से ही क्रान्ति की प्रेरणा पाई थी।

• अर्जुन सिंह राणा •

अर्जुन सिंह राणा जी का जन्म 30 मई 1920 को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान में हुआ। राणा जी एक पढ़े – लिखे व्यक्ति थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में बढ़-चढ़कर के भाग लिया। 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी, उस फौज में राणा जी ने कैप्टन के पद पर अपनी सेवाएं दी थी। राणा जी ने एक वर्ष तक का कारावास भी भोगा। इनका संबंध हिमाचल प्रदेश स्वतंत्रता सेनानी संगठन से भी रहा।

• केशव चंद्र शर्मा •

केशव चन्द्र शर्मा जी जिला मण्डी के रिवालसर नामक स्थान में रियूर नामक ग्राम के निवासी थे। 1944 में शर्मा जी प्रजामंडल की गतिविधियों में शामिल हुए थे। इतना ही नहीं ये नौकरी करते थे परंतु आंदोलन का सहयोग करने के लिए इन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। रियासती विलय आंदोलन में शर्मा जी ने भी भरपूर संघर्ष किया था। शर्मा जी ने 4 माह 10 दिन तक मंडी जेल में सजा भी काटी थी।

• खेम चंद •

खेम चंद जी का जन्म लगभग 1904 ई० के आस पास हुआ माना जाता है। इनके पिता का नाम श्री बृज लाल था। इनका जन्म स्थान जिला मंडी के मंडी शहर में भूतनाथ नामक स्थान पर हुआ था। इन्होंने अपने पिता के साथ जलावतन रहने से देशभक्ति की भावना प्राप्त की थी। मंडी राज्य में प्रजामंडल आंदोलन में खेम चंद जी ने अपनी सक्रिय भूमिका अदा की थी। इस दौरान इन्हें मुंशी की नौकरी से भी निष्कासित कर दिया गया था। सन 1936 – 37 में खेम चंद जी ने मंडी सत्याग्रह में भी अपनी भागीदारी प्रदान करके आजादी के संघर्ष में अपना योगदान दिया था।खेम चंद जी का स्वर्गवास 3 जुलाई 1982 ई० को हुआ।

• गुलजारी राम •

गुलजारी राम जी का जन्म 10 अगस्त 1915 ई० में जिला मंडी के सरका घाट इलाके में भदरोट नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री टोडर था। आजाद हिंद फौज में इन्होंने बतौर सैनिक काम किया। गुलजारी राम जी दिसंबर 1940 से मई 1946 तक सिंगापुर, रंगून और मलाया आदि स्थानों में लंबे कारावास में भी रहे। इन्हें बिना वेतन के निष्कासित कर दिया गया था और पांच वर्ष तक युद्ध बंदी बनाकर इन्हें कठिन से भी कठिन यातनाएं दी गई थी।

• गौरी प्रसाद •

गौरी प्रसाद जी का जन्म 18 अक्टूबर 1918 ई० को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान पर हुआ था। प्रसाद जी लाहौर से मेडिसिन में डिग्री लेकर आए थे। उन दिनों लाहौर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था इसलिए प्रसाद जी ने वहीं से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की प्रेरणा प्राप्त की थी।

इस आंदोलन में कूदकर गौरी प्रसाद जी ने अपना बढ़-चढ़कर योगदान दिया। जब वहां से लौटकर वे मंडी आए तो उन्होंने 1940 में मंडी प्रजामंडल में प्रवेश किया। 1940 से लेकर 1947 ई॰ तक प्रजामंडल के प्रधान रहे। इसी दौरान उन्हें 6 मार्च की जेल की सजा भी खानी पड़ी थी। सन 1951 में प्रसाद जी को विधानसभा का सदस्य चुना गया था। प्रसाद जी का योगदान अनेक संस्थानों एवं गतिविधियों में निरंतर रहता था।

• जे पी बागी •

बागी जी का जन्म 15 जुलाई 1908 ई० को स्कूल बाजार जिला मंडी में हुआ माना जाता है। अंग्रेजो के खिलाफ हमेशा बगावती तेवर रखने वाले जे पी बागी को यह बागी नाम इसी कारण प्राप्त हुआ था। 1928 से 1934 तक लाहौर जेल में लाहौर षड्यंत्र के जुर्म में उन्हे 6 साल तक के कारावास की सजा भी हुई थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और 1947 तक 2 वर्ष 6 माह कारावास में रहे। कुल साढ़े ग्यारह वर्ष तक जेल यात्रा में रहे। भारत सरकार ने इन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया था।

• नरेंद्र पाल जोशी •

नरेंद्र जी जिला मंडी के लूनापानी के निवासी थे। 15 मई 1892 में उनका जन्म हुआ था। इन्होंने 1912 में एक अंग्रेज की हत्या की थी। यही इनका स्वाधीनता संग्राम में प्रवेश होने का प्रथम सोपान था। इन्होंने शादी नहीं की थी। 1918 में सूरत के जंगलों में पुलिस मुठभेड़ में इन्हें गोली लगी थी। जलियावाला बाग कांड के बाद अंग्रेजों का विरोध करते हुए पकड़े गए और पांच साल तक जेल में ही रहे। 1942 में जब जेल से रिहाई हुई तो पुनः संघर्ष में जुट गए। रावलपिंडी बम विस्फोट में 3 वर्ष का कारावास हुआ। 1928 में अंग्रेजों ने इन्हे पुनः गिरफ्तार कर लिया। 1932 में हिसार में 1 वर्ष का कारावास और काटा। सन 1934 में पुनः 3 वर्ष की सजा हुई। 1936 के बाद आर्य प्रतिनिधि सभा में कार्य कियाl इसके बाद वे लूनापानी में स्थाई रूप से रहने लगे थे।

• बुद्ध भाट •

भाट जी जिला मंडी की तत्कालीन सुकेत रियासत के सुंदर नगर पुराना बाजार में रहते थे। इनकी भागीदारी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से रही। इन्होंने कई वर्षों तक कठिन सजा भी काटी। सुकेत रियासत के विरुद्ध क्रांति तथा षड्यंत्र के झूठे आरोप में अभियोग तथा लंबे समय के लिए कारावास की यातनाएं भाट जी ने सही। सुकेत रियासत की जेल तथा पंजाब जेल में ग्यारह मास, जालन्धर में छः मास, रायपुर में दस मास, मुल्तान में आठ मास, रावलपिंडी में दस मास तथा शिमला में एक मास तक कारावास काटा।

• सन्त सिंह आजाद •

सन्त सिंह जी का जन्म 1914 में कटोह नामक गांव में समराला में हुआ था। जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज खड़ी की तो सन्त सिंह आजाद जी भी नेता जी के आवाह्न पर उनकी फौज में लेफ्टिनेंट के पद पर शामिल हुए। आजाद हिन्द फौज का हिस्सा होने के नाते ही इन्होंने अपने नाम के साथ आजाद शब्द जोड़ दिया था।

सन्त सिंह आजाद ने नवम्बर 1943 में मांडला में “दिल्ली चलो” का नारा बुलन्द किया था तथा 1944 में दलेल नामक स्थान पर अंग्रेजों पर हमला किया था। इसी साल वे दीमापुर चले गए थे और वहां पर एक हमले के दौरान जख्मी हो गए थे।इसके बाद अंग्रेज सेना द्वारा गिरफ्तार किए गए।

17 अप्रैल 1946 को मण्डी पहुंच कर प्रजामंडल के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया। सन 1947 में पुनः तीन मास के लिए मण्डी की जेल में कारावास काटा। सत्याग्रह आन्दोलन में शामिल होने के कारण बिलासपुर के राजा द्वारा बन्दी बना लिए गए तथा जेल में भारी मार पीट उनके साथ की गई थी। वहां से छूटने पर पुनः सत्याग्रह आन्दोलन में सक्रियता से जुट गए। भारत सरकार ने इन्हे 1972 में ताम्रपत्र से सम्मानित किया।

• कुछ नायक ऐसे भी •

कुछ नायक ऐसे भी थे जिन्होंने अपने परिवार की कोई परवाह न करते हुए देश से अंग्रेजों को खदेड़ने के कार्य में रात दिन एक कर दिया। मण्डी एक ऐसा जिला रहा है, जहां से बहुतेरे स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं। इतना ही नहीं इन स्वतंत्रता प्रेमियों को राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता था और मण्डी का नाम राष्ट्रीय फलक पर अंकित कर राष्ट्र की आजादी में अपना अहम योगदान दिया। इसी प्रकार के अनेकों रणबांकुरों ने अपने घर परिवार की परवाह छोड़ कर देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया। परंतु उन्हें समय के प्रवाह में जमाने ने भूला दिया। वे सब उनके योगदान के अनुसार न ही तो आज याद किए जाते हैं और न ही उन्हें इतिहास के पन्नों में जगह मिली। यह दशा अपने आप में एक गम्भीर विडम्बना है। यही वे कारण है, जिनके चलते समाज में कोई भी किसी कुव्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो कर अपना बलिदान नहीं देना चाहता। क्योंकि हमें समाज की काम निकल जाने के बाद भूल जाने की आदत पता है। इसलिए हम भी अपनी सुख सुविधा का उपभोग करते हुए व्यवस्था के साथ हो जाते हैं। जबकि हम सब जानते हैं कि यहां बहुत गलत हो रहा है।

अतः आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं। गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा। भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

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यह लेख (आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिन्दी का हित चाहने वालों को।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी का हित चाहने वालों को। ♦

राष्ट्र का गौरव शोभित करने को,
फिर से हमको क्या लड़ना होगा?
राष्ट्र भाषा के सम्मानित पद पर,
शासित हिन्दी को करना होगा।

अमृत महोत्सव आजादी का भी,
मनाकर क्यों हम बस शर्मिंदा हैं?
दिला न सके जो न्याय मां को तो,
फिर हम बेटे भी काहे को जिन्दा है?

जुर्म हुए हैं और जलालत सही है,
दशकों से भारत में मां हिन्दी ने।
कभी अफगानी अंग्रेजी ने कुचला,
कभी अपमानित किया है सिंधी ने।

जापान में जापानी, चीन में चीनी,
तो भारत में हिन्दी राष्ट्र की भाषा हो।
भारत बने फिर विश्वगुरु, जो सोचा है,
हिन्दी ही पूर्ण करेगी इस आशा को।

मशाल जलाते हैं मिलकर के आओ,
हिन्दी के सम्मान, प्रचार – प्रसार की।
राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के खातिर,
आओ कुछ मदद लेते है सरकार की।

हिन्दी का हित चाहने वालों को अब,
मिलकर एक तो यारों होना ही होगा।
नहीं तो विदेशी भाषाओं का भार हमें,
सदियों तक यूं ही निरंतर ढोना होगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कवि हम सभी से पूछते हैं: राष्ट्र का गौरव शोभित करने को, फिर से हमको क्या लड़ना होगा? राष्ट्र भाषा के सम्मानित पद पर, शासित हिन्दी को करना होगा। अमृत महोत्सव आजादी का भी, मनाकर क्यों हम बस शर्मिंदा हैं? दिला न सके जो न्याय मां को तो, फिर हम बेटे भी काहे को जिन्दा है? जापान में जापानी, चीन में चीनी, तो भारत में हिन्दी राष्ट्र की भाषा हो। तब भारत बने फिर विश्वगुरु, जो सोचा है, हिन्दी ही पूर्ण करेगी इस आशा को। हिन्दी का हित चाहने वाले सभी उम्र के साथियों से आग्रह है की “मशाल जलाते हैं मिलकर के आओ, हिन्दी के सम्मान, प्रचार – प्रसार की। राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के खातिर, आओ कुछ मदद लेते है सरकार की। विशेषताओं से भरे भाषा का, प्रसार जो होना चाहिए हुआ नहीं। आओ हमसब मिलकर करें प्रचार, हिंदी का करें खूब विस्तार। तब मिलेगा इसे वाजिब हक और सम्मान, हिंदी मेरी जान, हम इस पर कुर्बान।

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यह कविता (हिन्दी का हित चाहने वालों को।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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