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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

तपन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तपन। ♦

उसकी मुस्कान में तपन थी कितनी प्यारी सी,
भीड़ भरे जहां में लगने लगी फरिश्ता सी।

इक नई कशमकश से हम गुजरते रहे,
खिल गए फूल चमन में उनके प्यार की तपन से।

प्यार भरी बयार बहने लगी महक उठी फूलवारी तपन में,
उनके मधुर स्वरों से बह उठी सद्भावों की धाराएं सी।

तपन की अग्न लगे तो रोशन हो जाए संसार सारा,
लगने लगे माधव बंशी वाला प्यारा जब लग्न हो मीरा सी।

हर समस्या का हल निकलता है बुजुर्गो के अनुभवों से,
आचरणों को बल मिलता है संस्कारों की तपन से।

सोना जब कुंदन बन बाहर आता है आग की तपन से,
रत्न जड़ित आभूषणों में चार चांद लग जाते हैं तपन से।

भावों का उड़ता पंछी महके तपन में स्नेह की वर्षा से,
भारत धरा का कण-कण महके त्याग तपस्या के भावों से।

थोड़ा सा दुलार स्नेह उसे दो जिसका दुनिया में कोई नहीं,
जीवन औरों का भी संवार दो तुम स्नेह भरी तपन से।

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

—————

  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए; इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — भगवान महावीर स्वामी त्याग तपस्या और उनके गुणों के कारण आज भी हमारे बीच मौजूद हैं, या और भी जितने महापुरुषों को समझे तो सभी ने त्याग व तपस्या से जीवन में सफलता को बताया है। माया की चकाचौंध में हम प्रभु को भूल जाते हैं मनुष्य का मन बेलगाम है इसलिए मन पर संयम रखना बहुत जरूरी है। महापुरुषों में सबसे महत्वपूर्ण गुण मन पर नियंत्रण ही है। सच्चे मन से किये गए कार्य में जब त्याग व तपस्या का बल हो तो जीवन में सफलता जरूर मिलती हैं।

—————

यह कविता (तपन।) “विजयलक्ष्मी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नर्स।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नर्स। ♦

त्याग की है मूर्ति,
समर्पण का श्रृंगार है।
श्वेत वस्त्र में मानो,
‘नर्स’ देवी का अवतार है।

विपदा की विकट समस्या थी,
देश कितना परेशान था।
कोई बचालो कोई सम्भालो,
जग का ऐसा आह्वान था।

सेवा धर्म की रक्षा में उसने,
न जाने कितने बलिदान दिए।
अपनी चिंता को भूल कर,
कइयों को जीवन दान दिए।

रखा अडिग विश्वास स्वयं पर,
सबको हिम्मत से बांधा है।
मातृत्व भरा हृदय है कोमल,
पर कितना दृढ़ उसका कंधा है।

लिया संकल्प की डटी रहूंगी,
चाहे जान भी बारुंगी।
जब तक सीने में श्वास प्रबल है,
मैं हिम्मत नहीं हारूँगी।

दुबके थे सब अपने घरों में,
कैसा संक्रमण का प्रहार था।
योद्धा बन कर युद्ध भी जीती,
सेवा सुश्रुषा ही तलवार था।

करुणा मन में रख कर उसने,
सबका ही देखभाल किया।
ढाल बन कर डटी रही,
जब जब कोरोना विकराल हुआ।

अथक परिश्रम के बल पर,
जब किसी का जीवन बचाया है।
आत्मसंतोष की भाव ने,
उसका सुंदर मुख सजाया है।

देते है सभी बधाई डॉक्टरों को,
आप ईश्वर के रूप को।
कैसे भूल जाये नर्स जी आपको,
आप देवी का स्वरूप हो।

शब्दो का सुमन अर्पित,
कहो कैसे गुणगान करू!
अंतःकरण है द्रवित हमारा,
मैं तेरा सम्मान करू!

♦ अमित पाठक `शाकद्वीपी` जी – जिला – बोकारो, झारखण्ड ♦

—————

• Conclusion •

  • “अमित पाठक `शाकद्वीपी` जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सदा अपने अधरों पर लिए, मधुर मुस्कान, वो तरुणाई। सदा सेवा में तत्पर रहती, जो किसी ने आवाज लगाई, सिस्टर कहा किसी ने, तो किसी ने नर्स, कोई कहता नर्स बाई, वात्सल्य, सेवा, त्याग की, मूरत, सदा करती हैं सबकी भलाई। कोरोना काल में रखा अडिग विश्वास स्वयं पर, सबको हिम्मत से बांधा है। मातृत्व भरा हृदय है कोमल, पर कितना दृढ़ उसका कंधा है। उसने दिल से लिया संकल्प की डटी रहूंगी, चाहे जान भी बारुंगी। जब तक सीने में श्वास प्रबल है, मैं हिम्मत नहीं हारूँगी।

—————

यह कविता (नर्स।) “अमित पाठक `शाकद्वीपी` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं अमित पाठक ‘शाकद्वीपी’; मूलतः गया, बिहार का निवासी हूँ, वर्तमान में बोकारो झारखण्ड में रहता हूँ। यहाँ एक शिक्षक के रूप में कार्य करता हूँ। लिखना मेरी पहली अभिरुचि है। मेरी कुछ रचनाओं को विविध संकलनों में तथा समाचार पत्रों में स्थान मिला है। सोशल मीडिया मंचों पर सक्रिय रूप से लिख रहा हूँ। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हाय — वो मंजर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हाय — वो मंजर। ♦

पक्की सड़क के दोनों तरफ वो लहलहाते हरे-भरे खेत।
बीच-बीच में कहीं ईंटे बिछी तो कहीं उड़ती रेत॥

आँखें आनंद से देख रही थी प्रकृति का सुंदर नजारा।
वो लहलहाती फसल वो खुशी से झूमता पेड़ प्यारा॥

खेतों की मेड़ के छोटे-बड़े पेड़ सभी मदमस्त हो मस्ता रहे।
पर वो दो पेड़ कुछ विचित्र ही कहानी दर्शा रहें थे॥

पर एक जगह का दृश्य देख आँखों में आँसू आए।
दिल को झकझोर देने वाला क्यूँ मानवता खो जाए॥

दिखाते है तुम सबको वो चित्रण जिसे देख ऐसा हुआ आभास।
खेत की आग ने हरे-भरे पेड़ो की छीन ली थी जीने की आस॥

पेड़ की विशाल शाखाएँ हरी पर उसका तना बुरी तरह गया जल।
ऐसे लगे जैसे पूछ रही उसकी टहनियां क्या ये मंजर नही जाता टल॥

मानों वो पेड़ कह रहा कि सुनो कभी मेरे दिल की करुण पुकार।
तुम्हें जीवन देने वाले तुम्हीं से लगाये एक रूदन भरी गुहार॥

रोपण ही काफी नही हमें बचाने के लिए कोई तो उठाओ कदम।
जीवनदान देने वालों की ही आज स्वार्थ ने कर दी आँखें इतनी नम॥

मन में उठे सवाल पूछें क्यूँ हमारे काम मानवता को करते शर्मसार।
आधुनिकता के नाम पर हर वर्ष लाखों पेड़ चढ़ते बलि बारम्बार॥

सुंदर जीवन के लिए खूब पेड़ लगाओ पर इनकी सुरक्षा में न पीछे रहो।
जिसके लिए ह्रदय तड़पे उस बात को सबसे बेबाक होकर कहो॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कब तक अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहोगे इंसान। अगर अब भी न सुधरे तुम तो पृथ्वी का वातावरण बिलकुल ही गर्म हो जाएगा, तुम्हारे जीने के लाले पड़ जायेंगे; फिर रोते रहना। प्रत्येक वर्ष बहुत सारे पेड़ आग लगने से जल जाते है, और इंसान कम थोड़े ही है ये भी अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहते है। अभी जब गर्मी पड़ रही है तो इन्हें पेड़ की कमी खल रही हैं। जब हरे भरे पेड़ और पौधे होते है तो कितना खूबसूरत मौसम व वातावरण होता है, सभी ऋतुएँ अपने चक्र के अनुसार चलती है, और सभी फसल समय पर होते हैं। अब भी समय हैं सुधर जा तू इंसान। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की प्रत्येक वर्ष दो पेड़ जरूर लगाएंगे, और उनका अच्छे से देख रेख करेंगे तब तक; जब तक वो पेड़ अपना खुराक खुद न लेने लगे पृथ्वी से।

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यह कविता (हाय — वो मंजर।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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श्यामता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्यामता। ♦

काव्य  : विदेह

मैं बसंत बहार की कादंबरी उदास,
फैले हुए कंचन की नृप वल्लभा हूँ।
मैं हरियाली की तुहिन गिर तीर की,
भूली हुई सपन कथा आभा हूँ।

माँ की मैं अपनी बाँयी भौंह,
मर्यादा की हूँ धोमय साया।
मैं आकुल गोधुलि राग करुण,
मैं म्लान आभा की माया।

मैं शीर्णभास मैं वधित-प्रभा,
इस समय भिखारन अलमस्ता।
भग्नावशेष में शोध रही खुद को,
अवासित सौभाग्य की हूँ अरुनता।

मैं निषक्त-भूमिल की धर्म-अम्बा,
मेरे अंगज का विराट ज्ञान।
मेरी महिजा ने दिया लोक की,
जो ललिता को व्याख्या दान।

मैं वैशाली के सन्निकट,
बैठी नित्य अर्म में अनजान।
श्रवण करती सजल नयन अपने,
निच्छवि योद्धाओं के सुयश गान।

अघोष शर्वरी में चक्रकीनद प्रांजल,
देती कर मेरे प्राण विभोर।
मै ठढ़ी मंजुल पर सुनती हूँ,
कविवर की कविता के गान मधुर।

इंद्रनील-मेघ घोष गर्जना कर बरसे,
झिम-झिम झिम-झिम कर बहुत से।
हिलोरें गुनगुन करती राग बिहाग,
क्यूं रूठ गये मोहन कौन सी चूक भई मोसे।

कौमुदी मध्य वैभव भूमि में,
हरी-भरी बन झूमती हूँ।
कुछ-कुछ आती याद बावरी दौड़ी,
मैं तौलिहवा को जाती हूँ।

अस्त-व्यस्त केश अश्रुजल छलक रहे,
मैं बिचरती हूँ मारी – मारी।
कतरा-कतरा में शोध रही अपनी,
खोई अपार निधान सारी।

मैं वीरान वाटिका की मालिनी,
उठती मेरे उर में विषम वेदन।
शारदी नहीं इस निकुञ्ज अभ्यांतर में,
रुक-रुककर बीती-स्मृति करती कूजन।

मैं बसंत बहार की कादंबरी उदास,
फैले हुए कंचन की नृप वल्लभा हूँ।
मैं हरियाली की तुहिन गिर तीर की,
भूली हुई सपन कथा आभा हूँ।

अर्थ: श्यामता = उदासी, शीर्णभास = कमजोर रौशनी, वधित = हत्या,
अरुनता = लालिमा, निषक्त = बाप, महिजा = देवपुत्री,
शर्वरी = रात, शारदी = कोयल, अर्म = टूटा फूटा मकान (खंडहर)

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती है हरी-भरी प्रकृति के कारण ही हमारा जीवन इतना अच्छा सरल सुन्दर है। मन की मन: स्तिथि खुद ही उलझती सुलझती रहती है, जो रख दी बातें सामने अपनों के मन का बोझ कर हल्का वो स्वछंद फिरा करती है। जो बातें रह गई दबी मन में, मन को व्याकुल कर सदा वो तनाव पैदा करती है। उलझनें हो लाख चाहे, दिख रही हो राह कोई सामने उस वक्त ही तो मन पर कस के लगाम लगानी पड़ती है। जो पा लिया काबू उस दौर पे, सुलझ जाएगी उलझनें सारी गर्त से बाहर आयेगा बस संयम की ज्योति जगानी पड़ती है।

—————

यह कविता (श्यामता।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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काफिया – रदीफ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ काफिया – रदीफ। ♦

जिसे रदीफ से पहले ही,
प्रयोग में लाया जाता।
जाने के लिए तैयार जो,
गजल के संदर्भ में शब्द,
इसको पाया जाता है।

शेर में समतुकात्मकता,
बदलता हुआ दिख जाता।
समझ लो काफिया में कि,
टोना होना महकना आता।

वहीं रदीफ के शब्दों में,
पिघलना जलना निकालना।
जैसे शब्द प्रयोग में,
लाए जाते रहते हैं।

काफिया रदीफ की जरूरत,
गाना शायरी तुकांत कविता।
ये प्रयोग के साथ में ही,
गजल में अपनायी जाती।

काफिया और रदीफ बिना,
गाना शायरी गजल आदि।
नहीं लिखी जा सकती है,
इसे हिंदी के विधाओं में,
भी प्रयोग की जाती है।

काफिया! उर्दू कविता के रूप में,
सदा जाना जाता है।
यह अंग्रेजी से अनुवादित,
एक सामग्री के रूप में है।

काफिया शब्द का गायन,
राडिया से पहले हो।
काफिया अरबी शब्द है,
उत्पत्ति! कफु धातु से मानी जाती।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — काफ़िया ग़ज़ल के किसी शेर की लाइन के तुकांत को कहते हैैं। मतलब किसी शेर के आखिर में अगर ‘आता है’ लिखा है तो उसके अगले लाइन में ‘जाता है’, ‘पाता है’, ‘लाता है’ जैसे शब्द ही इस्तेमाल होंगे जो पहली लाइन के आखिरी शब्दों से मेल खाते हो, इसे ही काफ़िया कहा जाता है। काफ़िया के तुक (अन्त्यानुप्रास) और उसके बाद आने वाले शब्द या शब्दों को रदीफ़ कहते है। काफ़िया बदलता है किन्तु रदीफ़ नहीं बदलती है। उसका रूप जस का तस रहता है। इस मतले में ‘सारे’ और ‘प्यारे’ काफ़िया है और ‘मुँह से निकाल डालो’ रदीफ़ है।

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (काफिया – रदीफ।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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खाली समय।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ खाली समय। ♦

जब भी बैठिए खाली,
बजाइए जरूर ताली।
शरीर की करती रखवाली,
जैसे हो बाहर वाली।

जब मिले फुर्सत के क्षण,
ईश्वर का कर लो भजन।
मिलेगी मन को शांति,
ना रहेगा कोई भ्रांति।

जब मिले खाली के दो पल,
ऐसा कर जो सोचा हो बिता कल।
खुद से करें बात,
करें कुछ नया करामात।

आंखों को घुमाएं गोल गोल,
जैसे सूरज और चंदा गोल मटोल।
कोयल की निकाले बोली,
जैसे दे रहा हो कोई गाली।

हरकतें करें ऐसी,
दिल खुश हो जाए वैसी।
कभी उठक, कभी बैठक,
साथ में दीजिए आंखों को थोड़ी ठंडक।

आंखों में लगाइए काली,
जैसे हो सुरमा भोपाली।
एक मिनट के लिए हो जाओ मौन,
मिल जायेगा कुछ चैन।

चाय की चुस्की प्याली में,
नयन मटकाईये खाली में।
सिर खुजलाईए बाल खींचिए,
दाएं देखिए, बाएं देखिए।

अजब वाक्या याद कर,
मुस्कान बिखेरिए खुलकर।
खाली समय में भी काफी काम है,
नसीब में कहां लिखा आराम है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब हो फुरसत का समय प्रभु का भजन भी कर लिया करो। खाली समय में दोस्तों और परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर चाय पीते हुए कुछ फुरसत के पल बिता भी लिया करो, ना जाने कब ये शरीर साथ छोड़ दे, इसलिए प्रेम से दो शब्द बोल लिया करो सभी से। जब भी मिलो किसी से मुस्कुराते हुए मिलो और समय-समय पर ख़ुशी होने पर ताली भी बजा लिया करो मेरे यार। चार दिन की ज़िन्दगी है सभी से हँस बोलकर प्रेम से बिताया करो मेरे यार।

—————

यह कविता (खाली समय।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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शहीद नहीं हूं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शहीद नहीं हूं। ♦

दे दिए जिसने,
प्राण मातृभूमि को,
रक्षा करते – करते,
समा गया जो धरा में,
ना कहलाया शहीद।

अर्ध सैनिक बल का जवान,
कैसी विडंबना, कैसी पीड़ा।
ना समझे इसे कुर्सी वाले,
चारों दिशाओं में फैला सन्नाटा।

फिर दे दिए प्राण धरा को एक लाल ने,
पर ना कहलाया शहीद।
नादान हो तुम जो कहते,
सभी फौजियों को शहीद हो,
जरा पढ़ लो कागज।

ऐसे भी शूरवीर मिट गए, भू के लिए,
पर ना कहलाए शहीद।
अर्धसैनिक बल के जवान,
ये तो रक्षक है भू के,
करते-रहते जीवन पर्यंत।

रक्षा देश की,
रहते गोलियों में हरदम।
लग जाती गोली सीने में,
पर ना दिया जाता,
दर्जा शहीद का।
नासमझ हो तुम,
जो कह देते हर फौजी को शहीद।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सच्च में शहीद वह है जिन्होंने दे दिए प्राण धरा को, नादान हो तुम जो कहते, सभी फौजियों को शहीद हो, जरा पढ़ लो कागज।। इस भारत भूमि पर ऐसे भी शूरवीर मिट गए, भू के लिए,पर ना कहलाए वह शहीद कभी। अर्धसैनिक बल के जवान, ये तो रक्षक है भू के, करते-रहते जीवन पर्यंत भारत भूमि की रक्षा। पहचानो सच्चे शहीद को तुम, और उन्हें पूर्ण मान सम्मान दो जिसके वह हकदार हैं।

—————

यह कविता (शहीद नहीं हूं।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मेरी मां का प्यार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरी मां का प्यार। ♦

प्रेम वात्सल्य की मिशाल,
मेरी मां है सबसे कमाल।
मुझे गर्व है कि मैं हूं उनका लाल,
ममता की प्रतिमूर्ति है वो बेमिशाल।

करुणा बरसाती, अपने ही लाल,
नाजों से पाला, सीने से लगाकर।
सारे गम सहती, रखती दर्द संभाल,
कभी गुस्साती, कभी प्यार की मेहर बरसाती।

धूप छांव से हमें बचाती,
सूरत देखकर सब समझ जाती।
आज तक ये बात मुझे समझ न आती,
खुद भूखे रह, बड़े चाव से मुझे खिलाती।

मैं पूछता मां, तुमने किया है भोजन,
बड़े प्यार से मुझे समझाती जैसे करती भजन।
मेरे हल्के जख्म पर, आंसू छलकाती,
उसपर अपने प्यार का मरहम लगाती।

लगा सीने से मर्म बताती,
सजगता का पाठ पढ़ाती।
अपना सर्वस्व मुझ पर लुटाती,
ऐसी मां का करता हूं चरण वंदन,
मेरी मां का प्यार, सबसे कुंदन।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — किसी भी बच्चे को माँ की गोद में जो सुख मिलता है – वो संसार में कही और नहीं मिल सकता, तथा जो निडरता और ज्ञान पिता से मिलता है वो किसी भी विश्वविद्यालय से नही मिल सकता। घुटनों से रेंगते-रेंगते, कब पैरों पर खड़ा हुआ, तेरी ममता की छाँव में, जाने कब बड़ा हुआ.. काला टीका दूध मलाई आज भी सब कुछ वैसा है, मैं ही मैं हूँ हर जगह, माँ प्यार ये तेरा कैसा है? सीधा-साधा, भोला-भाला, मैं ही सबसे अच्छा हूँ, कितना भी हो जाऊ बड़ा, “माँ!” मैं आज भी तेरा बच्चा हूँ। काँटो भरी इस मुश्किल राह पर चलना सिखाता कौन… माँ अगर तुम न होती तो मुझे लोरी सुनाता कौन… खुद जागकर सारी रात चैन की नींद सुलाता कौन… माँ अगर तुम न होती तो मुझे चलना सिखलाता कौन..?

—————

यह कविता (मेरी मां का प्यार।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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हालात ए दौर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हालात ए दौर। ♦

लोग लगे हैं छीनने, आजकल एक दूसरे का निवाला।
फिर कर रहे हैं उम्मीद कि, हो जाए अंधेरे में उज्जला॥

इंसाफियों के नाम पर, कर रहे हैं हम ही बेइंसाफियां।
फिर मांग रहे हैं खुदा के द्वार पर, जाकर के माफियां॥

देखादेखी में सीखा है ये, चादर से बाहर पांव पसारना।
बाल की खाल उधड़ जाए, पर मंजूर नहीं है जी हारना॥

छोटी सी इस जिन्दगी में तो, उलझने ही बेशुमार है।
मुसीबत में आता न काम कोई, यूं तो दोस्त हजार है॥

काबिलियत की है कदर कहां, सब पहुंच का कमाल है।
असलियत की है कदर कहां, मिलावट की तो धमाल है॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — आजकल तो एक दूसरे का निवाला लोग लगे हैं छीनने, उनको कोई फर्क नही पड़ता की आपको उस वजह से क्या तकलीफ होगा। आजकल स्वार्थ से भरी हुई दुनियादारी हो गई है, इंसानियत के नाते कोई किसी का कार्य नही कर रहा हैं, हर कार्य में उसका स्वार्थ निहित हैं। स्वार्थ पूरा ना होने पर आग बबूला हो जाता, भयानक बावरा रूप धारण कर अपना और दूसरों का भी नुकसान करता है।

—————

यह कविता (हालात ए दौर।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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परिवर्तन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ परिवर्तन। ♦

संसार में बच्चों से लेकर बूढों तक सब बदलाव चाहे।
परिवर्तन प्रकृति का मूल जो जीव-जगत सबको भाये॥

एक ही कार्य करते रहने से नीरसता आती।
मन चंचल है इसको सरसता ही भाती॥

तभी हमारी संस्कृति भी विविधता लिए होती।
मौसम परिवर्तन में त्यौहारों की रंगत होती॥

पतझड़ के बाद का बसंत जीवन-राग सुनाए।
बेजान हुई प्रकृति को वो सजीव कर जाए॥

अब तो कोयल ने भी ये परिवर्तन सहर्ष लिया अपना।
कोयल को अब आम का बाग दिखता एक सपना॥

किसी भी पेड़ की टहनी पर कोयल बैठकर कुहू-कुहू गाये।
लगने लगा उसको ऐसा कि हर पेड़ ही संग गुनगुनाये॥

गर्मी की रुत में रेत भरा आँधी-तूफान सबको डराए।
फिर तेज बारिश की बौछारें दिल हर्षित कर जाए॥

समय-परिवर्तन के संग खेतों में अलग-अलग फसल लहलहाए।
ये परिवर्तन ही इंसान को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता जाए॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जो परिवर्तन को और अनित्यता को समझता है, वस्तुत: वही ज्ञानी है। जीव, जगत और ब्रह्म को सही तरीके से परिभाषित करने की क्षमता भी ज्ञानी-ध्यानी, ऋषि-मुनियों में ही होती है। इस संसार में कुछ भी अपरिवर्तनशील नहीं है। जीव जंतुओं से लेकर मानव जाति तक सभी का परिवर्तन होता रहता है।

—————

यह कविता (परिवर्तन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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