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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

योग भगाए रोग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ योग भगाए रोग। ♦

व्यस्त दिनचर्या से आज जूझ रहा इंसान,
धन की लालच में न रहा, स्वास्थ्य का है भान।
न दिन को चैन है, न रात को मिलता रैन,
दिन भर चल रही रस्साकस्सी से,
बिगड़ा शरीर का हुलिया, छूटा उसका मैल।

तनाव भरे जीवन से मिला, रोग का है साथ,
डायबिटीज, बीपी, गैस का मुफ्त में मिला ईनाम।
पैसे की खातिर जिस शरीर को, करता है बर्बाद,
उसी पैसे से फिर लगता करने, उसे है आबाद,
अपने शरीर के लिए वक्त भी न निकाल पाता।

जब समय आता कमाई का अंश भी काम न आता,
न माया मिलती है न मिलता है राम।
इस अजीब विडंबना की क्या की जाए बात,
जिसे खोजा गली गली, मिला वो अपने पास,
स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का होता है वास।

स्वस्थ रहना ही असल पूंजी है, यही रहता पास,
21 जून योग दिवस मनाते, आता सबको रास।
वर्ष का लंबा दिन होता, दीर्घायु का देता आभास,
योग प्राचीन परंपरा का, अमूल्य उपहार है खास,
इससे मिलती स्फूर्ति, रक्त का होता खूब प्रवाह।

तनाव से मुक्त कर, करता आलस्य का है नाश,
नित्य करो तुम योग, दूर भागेगी रोग।
अनूलोम विलोम प्राणायाम का, जीवन में करो वास,
शरीर होगा निरोग, पास न फटकेगी रोग।
आओ मिलकर संकल्प करें, योग दिवस पर आज,
नित्य तीस मिनट हमसब करें व्यायाम।

जीवन से मिटाए बीमारी का नामो निशान।
योग दिवस पर संदेश देंगे खुलेआम॥
रोग भगाए योग रे भईया।
रोग भगाए योग………॥
धन्यवाद॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — योग आकाश के नीचे लगभग किसी भी बीमारी को ठीक कर सकता है। वास्तव में यह कहना उचित होगा कि यदि आप प्रतिदिन योग का अभ्यास करते हैं तो आप सभी रोगों से मुक्त रह सकते हैं। योग एक कला है जो हमारे शरीर, मन और आत्मा को एक साथ जोड़ता है और हमें मजबूत और शांतिपूर्ण बनाता है। योग आवश्यक है क्योंकि यह हमें फिट रखता है, तनाव को कम करने में मदद करता है और समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखता है और एक स्वस्थ मन ही अच्छी तरह से ध्यान केंद्रित करने में सहायता कर सकता है। योग के अभ्यास की कला व्यक्ति के मन, शरीर और आत्मा को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। यह भौतिक और मानसिक संतुलन कर के शान्त शरीर और मन प्राप्त करवाता हैं। तनाव और चिंता का प्रबंधन करके आपको राहत देता हैं। यह शरीर में लचीलापन, मांसपेशियों को मजबूत करने और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ाने में भी मदद करता हैं।

—————

यह कविता (योग भगाए रोग।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बाबुल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बाबुल। ♦

तेरे आंगन के झूले में झूली,
तेरी दया पर पली-बढ़ी।

तूने ही दिया शिक्षा ज्ञान,
तूने ही दिया है ऐशो-आराम।

फिर क्यों बाबुल विदाई कर दी?
फिर क्यों बाबुल पराई कर दी ?

किया कैसे जान के टुकड़े को अलग,
दिल तेरा धड़का नहीं।

पसीना तुझे आया नहीं,
हर ख्वाब पूरे किए।

जूते तेरे फटे – फटे,
फिर मुझे क्यों दिए नए-नए।

मुझे हर काम सिखाया,
खुद जी तोड़ मेहनत की।

कर्ज ले दहेज दिया ढेर सारा,
मां ने बताया बाबुल मुझे।

मेरी विदाई पर छूप – छूप,
रोया बंद कमरे में तू।

मैं पगली सोचती रही,
विदा करने भी ना आया तू।

पापा की लाडली!

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पापा का प्यार निराला है, पापा के साथ रिश्ता न्यारा है, इस रिश्ते जैसा कोई और नहीं यही रिश्ता दुनिया में सबसे प्यारा है। मेरे होठों की हँसी मेरे पापा की बदौलत है, मेरी आँखों में खुशी मेरे पापा की बदौलत है, पापा किसी भगवान से कम नही क्योकि मेरी ज़िन्दगी की सारी खुशी पापा की बदौलत है। ये बाप तुझे अपना सब कुछ दे जाएगा, और तेरे कंधे पर दुनिया से चला जाएगा। पिता हैं तो हमेशा बच्चो का दिल शेर होता हैं। वो इस छोटी सी दुनिया में मेरा अनंत संसार है। एक पापा की बदौलत ही मेरा जीवन खुबसूरत बन पाया।

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यह कविता (बाबुल।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मेरे पापा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरे पापा। ♦

मेरे पापा,
मेरे है पालकदाता।
अंदर से कोमल,
मेरी खुशी के लिए कुछ भी कर जाते।
सबसे प्यारे, सबसे न्यारे,
ऐसे है पापा हमारे।

अंगुली पकड़ चलना सिखाया,
कंधे पर बिठा प्यार जताया।
हर स्थिति से लडने का हुनर सिखाया,
सीने से लगाकर प्यार जताया।

मेरे सभी नाज नखरे, वो हंसकर उठाते,
वृक्ष की भांति संरक्षण देते।
त्याग समर्पण की वो पराकाष्ठा,
मेरे संवारने हेतु उनकी निष्ठा,
जीवन भर न भूल पाऊंगा।

उनका कर्ज न कभी उतार पाऊंगा,
मगर बुढ़ापे की लाठी बन,
अपना फर्ज जरूर निभाऊंगा।
उनके आशीष को दिल से लगाकर,
चरणों में उनके मस्तक सदा नमाऊंगा,
उनके सपनों को सच करके दिखलाऊंगा।

सबसे प्यारे, सबसे न्यारे,
मेरे पापा, मेरे भगवान हमारे।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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भारत संस्कृति में पिता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारत संस्कृति में पिता। ♦

पंचतत्व आलेख हैं, पिता ईश आशीष।
संतति में सद्गुण रचें, जैसे पुष्प शिरीष।

शिल्प से माटी सजती, करती आतप-स्नान।
पुत्र चरित गुण गान में, देखें पितु अवदान।

पुत्र हित पुरुषार्थ करें, बनें ज्ञान साकार।
सिद्धि संतति लाभ मिले, पिता करें आचार।

अद्भुत मानव मूर्ति है, विधना का वरदान।
पितु चरणों की वंदना, करते धर्म महान।

पित्तृ-आत्म की ज्योति से, होता मनु कल्याण।
सूक्ष्म रूप निर्देश दें, कहते वेद पुराण।

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

—————

  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से बताने की कोशिश की है — मेरे जीवन के अमूल्य व्यक्ति मेरे पिताजी ने हमेशा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनकी दी हुई शिक्षा हर कठिन घड़ी में मेरा मार्ग प्रशस्त करती है। आज पितृ दिवस के शुभ अवसर पर मैं उनके चरणों में प्रणाम करती हूं।

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यह कविता (भारत संस्कृति में पिता।) “प्रो• मीरा भारती जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम मीरा भारती (मीरा मिश्रा/भारती) है। मैंने BRABU Muzaffarpur, Bihar, R.S College में प्राध्यापिका के रूप में 1979 से 2020 तक सक्रिय चिंतन और मनन, अध्यापन कार्य किया, आनलाइन शिक्षण कार्यक्रम से वर्तमान में भी जुड़ी हूं, मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे लेखनी का सुंदर उपयोग किया करते हैं। मैंने लगभग 130 कविताएं लिखी है, जिसमें अधिक प्रकाशित हैं, कई आलेख भी, लिखे हैं। दृढ़ संकल्प है, कि लेखन और अध्यापन से, अध्ययन के सामूहिक विस्तारण से समाज कल्याण – कार्य के कर्तृत्व बोध में वृद्धि हो सकती है। अधिक सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

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वाणी वंदना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वाणी वंदना। ♦

शारदा मां, हंसासिनी,
मन वाणी शुभ कर्म।
अवसर सेवा देना,
मां सत्य ज्योति देना।

देवांगना सुहासिनी,
ध्वनि रस मनोभाव।
कला का विन्यास देना,
त्याग सत वृत्ति देना।

ध्यायिनी वीणा वादिनी,
अर्थ रमणीयता में।
दृश्य का विधान देना,
प्रीति सुकाज देना।

सत्यज्ञानी सुभाषिनी,
देश सेवा मंत्र देना।
भाव कला शब्द शैली,
नीति संगति देना।

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

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  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से बताने की कोशिश की है — शारदा मां के गुणों और शक्तियों का वर्णन किया है। मां से प्रार्थना कर रही है मन, वाणी व सुबह कर्म करने की शक्ति देना, मन में हो सदैव सेवा भाव, सत्य की ज्योति सदैव ही जलती रहे मन में मां। वाणी में मधुरता देना व कला का गन विन्यास देना, त्याग सत वृत्ति देना मां मुझे। मेरी आँखे हमेशा कल्याणकारी शुभ ही देखे ऐसी शक्ति देना मां। मेरे मन के अंदर सदैव ही अपनी जननी मातृभूमि की सेवा का भाव देना मां। मेरी संगती अच्छी हो, नियमित व संयमित जीवन हो मेरा ऐसा आशीर्वाद देना मां।

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यह कविता (वाणी वंदना।) “प्रो• मीरा भारती जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम मीरा भारती (मीरा मिश्रा/भारती) है। मैंने BRABU Muzaffarpur, Bihar, R.S College में प्राध्यापिका के रूप में 1979 से 2020 तक सक्रिय चिंतन और मनन, अध्यापन कार्य किया, आनलाइन शिक्षण कार्यक्रम से वर्तमान में भी जुड़ी हूं, मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे लेखनी का सुंदर उपयोग किया करते हैं। मैंने लगभग 130 कविताएं लिखी है, जिसमें अधिक प्रकाशित हैं, कई आलेख भी, लिखे हैं। दृढ़ संकल्प है, कि लेखन और अध्यापन से, अध्ययन के सामूहिक विस्तारण से समाज कल्याण – कार्य के कर्तृत्व बोध में वृद्धि हो सकती है। अधिक सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

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मैं कौन हूँ?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मैं कौन हूँ? ♦

एक नारी पूछे खुद से ही एक सवाल।
कहो कैसा है तुम्हारे दिल का हाल॥

बाल तेरे आज क्यूँ इस कदर बिखर गए।
बाकी आस-पास वाले तो सब सँवर गए॥

सबके लिए तुम समय निकालती हो।
क्या कभी अपने को भी जानती हो॥

पहचाने तुझको न जाने वो तो कौन है।
क्यूँ झनझनाते तेरे स्वर आज मौन है॥

कौन सा दर्द-ए-जख्म छुपाया है तुमने।
इस चुप्पी में चुपके से दबाया तुमने॥

इन आँखों में ज्यादा हो गया था पानी।
तेरे लुढ़कते आँसू भी कह गए कहानी॥

अपने त्याग से तो हुई दुनिया में मशहूर।
मशहूर की कीमत तो अदा करनी जरूर॥

वैसे एक बात कहूँ तू ऐसे भी अच्छी।
बात कड़वी लगती तेरी जो कहे सच्ची॥

क्यूँ देखना तुझको जहां का हसीन नजारा।
तेरी जिम्मेदारी ही तो बस फर्ज तुम्हारा॥

क्यूँ कभी तू खिलखिलाकर इतनी हँसती।
तेरी तो मुस्कान भी है सबसे सस्ती॥

चाँद-सितारों को छूने का तुझको हक नही।
उड़ान भर सके, तुझें मिले वो पंख नही॥

चल फिर कभी बातें करेगें तुझसे चंद।
तेरा आस्तित्व हूँ मैं जो तेरे लिए फिक्रमंद॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — स्त्री ईश्वर की वह सुन्दर रचना है जिसमें त्याग, स्नेह, भावनाओं और समर्पण भरपूर होता है। स्त्री अनेक भूमिकाओं को बखूबी निभाती है। आज के समय की बात की जाये तो आधुनिक स्त्री घर-परिवार और दफ्तर को भी बखूबी संभालती है। परन्तु महिला त्याग का ही इंसानी रूप है। प्राचीन भारत में नारी और पुरुष को बराबर ही समझा जाता था और एक समान सम्मान प्रदान किया जाता था। “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।” मनुस्मृति के वचन अनुसार:- जहां स्त्री जाति का आदर सम्मान होता है उनकी आवश्यकता और अपेक्षाओं की पूर्ति होती है उस स्थान, समाज ,परिवार पर देवता गण प्रसन्न रहते हैं।

—————

यह कविता (मैं कौन हूँ?) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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काल – समय।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ काल – समय। ♦

काव्य  : भिक्षुक।

सांझ शिखी के काल में फिर से चौखट पर तुम्हारे,
निन्दित नकारा हुआ वक्ता चिर-उन्मुक्त मन मारे।

ठंडा हुआ नंदिनी अभिमानिनि स्नेह की रानी,
रुक्ष इद्ध अँखियों में पिपासाकुल मधुल-दिवस सिरानी।

युगाब्धों की जीर्ण घूघी में कितनी लेकर प्रत्याशा,
निज-दहक की गर्जन पुंगलों में लहरित पिपासा।

दिवस भर टहला देवेशी! तुम्हारे दर्प-दीघंकृत मति में,
भिक्षा दी न गई इस अगाध क्रूरता तिक्त भव में।

निभृत क्षुब्ध विकल हो भटका गेह निकेतन में,
कितने दारुण गीत सुनाये वृजिन-व्याकुल निशदिन में।

आह! कोई न पिघला मैं चित्कार उठा विह्वल दुर्वचनी,
निशादि-सी उच्छवासित पुनीत तुम देख पड़ी तन्वंगिनी।

मुझे तो तुमने ही बनाया नकारा चिर-प्रवासी,
अब मेरी तुम्हीं हरो अध्व-उद्यम-ताप पराजित उदासी।

जाग्रत हो उठी ये कैसी धाधि दहक उठा उर तापी,
सांझ शिखी के काल में चौखटे पर तड़प रहा पापी।

पौ-पुनर्णव-इंदुकर-छाया में मुझे लुका पंछी गाता,
अधरात के सन-सन स्वर-सा प्राणंत सुधा नहाता।

कस्तूरी वेणा मरिचि-प्रांगण में लावण्य-पुंज मैथुन-अर्हन,
करो जब तुम दिवसमुख में लीन प्रभात-सी पावन।

इसी एक अभव में हो जाये मेरा भी लोमहर्ष-निर्वासन,
जैसे अपनी अरुण-वेली में ज्वाला सा कांतिहीन।

अर्थ: अरुण-वेली = सूर्य किरण, वेणा = खस, प्राणंत = हवा, पुनर्णव = नाखून,
इंदुकर = चंद्रमा को रौशनी, धाधि= ज्वाला, अध्व= राह, तन्वंगिनी = कोमलांगी,
दुर्वचनी = भिक्षुक, दीघंकृत = डूबा हुआ, घूघी = झोली

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — भोर में ही भिक्षुक उठकर अपने नित्य कर्म से निवृत होकर, सूर्य की पहली किरण के साथ ही अपनी झोली लेकर भिक्षा मांगने के लिए निकल पड़ता हैं। उस समय सुबह की मंद-मंद सेहतमंद हवा का आनंद लेते हुए निकल पड़ता है। जो भी प्रेम व सच्ची श्रद्धा से भिक्षा मिलता है वह लेकर वापस आ जाता है। निभृत क्षुब्ध विकल हो भटका गेह निकेतन में, कितने दारुण गीत सुनाये वृजिन-व्याकुल निशदिन में। समय चक्र से कोई भी प्राणी अछूता नही है।

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यह कविता (काल – समय।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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शुभागमन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शुभागमन। ♦

निश्छल चंचल मन,
आंखों में संजोएं, सपनों की उमंग।
फंख फैलाए भरने को गगन की उड़ान,
नव आगंतुकों हेतु सज चुका है, शिक्षा का दरबार।
आइए पधारिए हमारे भविष्य के कर्णधार,
शिक्षा की दहलीज पर है आपका वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

चली बयार,
आ गई नामांकन की बहार।
नन्हें – मुन्हें की उड़ी फुहार,
मनमोहक, मनभावन लगता जैसे त्योहार।
आमंत्रित करता सूबे सह मुजफ्फरपुर का हर विद्यालय परिवार,
शिक्षा की दहलीज पर है वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

सजेगी बगिया चमन होगा गुलजार,
नव कोंपल के आगमन से खिल उठेगा,
शिक्षा का बाग, होगा नया आगाज।
भंवरे गुनगुनाएंगे सुनकर,
प्यारी मीठी मंद मंद मुस्कान।
पधारों हे राष्ट्र के कर्णधार,
शिक्षा की दहलीज पर है वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

प्रथम अप्रैल से आपकी राह निहारे,
नामांकन की बांट जोहते।
पाठशाला ही है जिसकी शान,
जो दिलाएगा उन्हें मान और सम्मान।
तभी बढ़ेगा राष्ट्र का अभिमान,
शिक्षा की दहलीज पर है वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

सभी अभिभावकों से विवेक की विनती है हरबार,
चल रही नामांकन की बयार।
कराइए छह वर्ष के नन्हें मुन्ने का दाखिला इसबार,
खुद आइए, संग लाइए।
बगिया के फूलों का चहकता मेहमान,
शिक्षा की दहलीज पर करते वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — शिक्षा हमें विभिन्न प्रकार का ज्ञान व कौशल प्रदान करता है। यह सीखने की निरंतर, धीमी और सुरक्षित प्रक्रिया है, जो हमें ज्ञान प्राप्त करने में मदद करती है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो हमारे जन्म के साथ ही शुरु हो जाती है और हमारे जीवन के साथ ही खत्म होती है। सजेगी बगिया चमन होगा गुलजार, नव कोंपल के आगमन से खिल उठेगा, शिक्षा का बाग, होगा नया आगाज। भंवरे गुनगुनाएंगे सुनकर, प्यारी मीठी मंद मंद मुस्कान। पधारों हे राष्ट्र के कर्णधार, शिक्षा की दहलीज पर है वंदन अभिनंदन, शुभागमन, शुभागमन…।

—————

यह कविता (शुभागमन।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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एक दूजे के संग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक दूजे के संग। ♦

तेरे बिना हम नहीं रह पाएंगे।
तेरे न रहने का दर्द किसे सुनाएंगे॥

तेरे बिना ये जिंदगी है मुहाल।
तेरी जुदाई से होता बुरा हाल॥

साँसों की मध्यम हुई रफ्तार।
तेरे बिन जीवन हुआ बेकार॥

तुम तो जान हो जहान हमारा।
हमारे लिए तू स्वयं से प्यारा॥

अब नींद नहीं आती चैन की।
शांति खो गयी दिन-रैन की॥

जो जीव-जगत को खुशहाल बनाती।
बिन इनके सूनी ये जीवन-बाती॥

ये पेड़ ही तो हमारे जीवन-दाता।
जिनके बिन कुछ नही भाता॥

चाहना है इसको जान से ज्यादा।
नहीं तो जीवन हो जाएगा आधा॥

हमारी जिंदगी की बनती ढाल।
वृक्ष संग प्रकृति की बजती ताल॥

जहाँ जगह मिले वही पेड़ है उगाने।
हरे-भरे पौधों के जीवन भी बचाने॥

वृक्ष ही बनते जीवन का सूत्रधार।
जश्न जीत की होती जीवन में भरमार॥

बिना तुम्हारे ये जीवन जीना दुश्वार।
मानव-जीवन को इनसे करना प्यार॥

हर वर्ष इन वृक्षों की तादाद बढ़ाएंगे।
प्रकृति संग अति सुंदर जीवन पाएंगे॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे हम खाने के बिना नहीं रह सकते। वैसे ही पेड़-पौधे के बिना भी हमारा जीवन अधूरा है। जैसे हमें जीवित रहने के लिए भोजन-पानी की आवश्यकता है वैसे ही प्रकृति को जिंदा रखने के लिए पेड़-पौधे, साफ-सफाई, प्रदूषण रहित धरा बनाने की आवश्यकता है। जलवायु प्रदूषण को रोकना होगा और वृक्षों की कटाई रोकनी होगी। कटाई की जगह वृक्षों को लगाना होगा जिससे कि प्राकृतिक आपदा से हम बच सकें। पर्यावरण को बचाना, प्रकृति को बचाना हमारे हाथ में है। कब तक अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहोगे इंसान। अगर अब भी न सुधरे तुम तो पृथ्वी का वातावरण बिलकुल ही गर्म हो जाएगा, तुम्हारे जीने के लाले पड़ जायेंगे; फिर रोते रहना। प्रत्येक वर्ष बहुत सारे पेड़ आग लगने से जल जाते है, और इंसान कम थोड़े ही है ये भी अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहते है। अभी जब गर्मी पड़ रही है तो इन्हें पेड़ की कमी खल रही हैं। जब हरे भरे पेड़ और पौधे होते है तो कितना खूबसूरत मौसम व वातावरण होता है, सभी ऋतुएँ अपने चक्र के अनुसार चलती है, और सभी फसल समय पर होते हैं। अब भी समय हैं सुधर जा तू इंसान। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की प्रत्येक वर्ष दो पेड़ जरूर लगाएंगे, और उनका अच्छे से देख रेख करेंगे तब तक; जब तक वो पेड़ अपना खुराक खुद न लेने लगे पृथ्वी से।

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पेड़ों का महत्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पेड़ों का महत्व। ♦

‘या’  पेड़ो की महता।

दूषित धारा को करने वालो, कुदरत का कहर तो बरपे गा।
दूसरों के दर्द से दर्द न होगा, निज पीड़ा से आंसू ढरके गा।

इन मौन गगन को चूमने वाले, पेड़ों की महता कुछ तो जानो।
जल – प्राण रगों में बहने वाले, इनकी देन है यह तो पहचानो।

माना कि लकड़ी जरूरत है, बेवजह से तो न इनको काटो।
काट काट कर इनको यारो, जीवन के बीच में खाई न पाटो।

इस धरती के सौंदर्य के खातिर, पेड़ – पौधे तुम खूब लगाओ।
मानव -मानव में चेतना भर दो, जल वायु का संकट हटाओ।

अवैध खनन और अंधा विकास भी, कहां खतरे से खाली है?
चुन – चुनकर लेगा बदला हमसे, बैठा अम्बर में वह माली है।

उसकी लाठी आवाज न करती, पर पीड़ा बहुत ही भरी है।
कई बार झेली ये पीड़ा सबने, हमको भूलने की बीमारी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे हम खाने के बिना नहीं रह सकते। वैसे ही पेड़-पौधे के बिना भी हमारा जीवन अधूरा है। जैसे हमें जीवित रहने के लिए भोजन-पानी की आवश्यकता है वैसे ही प्रकृति को जिंदा रखने के लिए पेड़-पौधे, साफ-सफाई, प्रदूषण रहित धरा बनाने की आवश्यकता है। जलवायु प्रदूषण को रोकना होगा और वृक्षों की कटाई रोकनी होगी। कटाई की जगह वृक्षों को लगाना होगा जिससे कि प्राकृतिक आपदा से हम बच सकें। पर्यावरण को बचाना, प्रकृति को बचाना हमारे हाथ में है। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की हमसब खुद प्रत्येक दिन पेड़-पौधे लगाएंगे और सभी को पेड़-पौधे लगाने के लिए जागरूक करेंगे।

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यह कविता (पेड़ों का महत्व।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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