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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

जनसंख्या कानून।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जनसंख्या कानून। ♦

जनसंख्या तेजी से बढ़ रही,
लोग प्रकृति को देते दोष।
साधन सीमित देश विदेश के,
आपस में ही लड़ते हैं लोग।

भूखे व्याकुल दुनिया में बच्चे,
लच्छेदार भाषण देते हैं लोग।
घोटाला करने वाले भी विरले,
दोष शासन को देते हैं लोग।

बड़े – बड़े महलों में रहने वाले,
गरीब देखकर हंसते हैं लोग।
सुखिया राशन गरीब का खाते?
दुखिया को ठग रहे हैं लोग।

विधवा पेंशन अमीर खा जाते!
गरीबों को पूछ सकते हैं लोग?
प्रधानमंत्री आवास योजना चली,
किस गरीब को मिलती सोच?

छात्रवृत्ति अल्पसंख्यक – मिलती,
कौन यहां अल्पसंख्यक हैं बोल।
सरकारी कर्मचारी भी लाभ उठाएं,
कौन करेगा अब इस पर खोज।

हम दो हमारे दो पुराना है नारा,
कानून लागू करेगा कौन सोच।
गरीब दुनियां में क्यों पिछड़ रहा,
जनसंख्या का हो रहा विस्फोट।

सरकारी सुविधा का लाभ ले रहे।
बोलते हैं शासन सत्ता में खोट।
अपनी ही मन की करते हैं लोग।
लोग प्रकृति को ही देते हैं दोष।

जनसंख्या विस्फोट हो रही है।
सब्सिडी वाले झगड़ते हैं लोग।
जिससे नौकरियां घटती रही।
आतंकी संगठन के बढ़ते लोग।

जमीन की आवश्यकता बढ़ती।
छप्पर फाड़ पर लड़ते लोग।
कपड़ों की कमी से बच्चे जूझते।
कुदरत बच्चा दिया कहते लोग।

मीठा पानी पीने योग्य घटाता।
दोष सरकार को तुरंत देते सोच।
बीमार पड़ जाता जब भी बच्चा,
प्रकृति को कोसते रहते लोग।

जनसँख्या वृद्धि पर रोक लगाओ, सबको तुम जागरूक बनाओ।
अपने घर को खुशहाल बनाओ, शिक्षित नागरिक होने का फर्ज निभाओ॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बहुत तेजी से जनसंख्या बढ़ने से क्या क्या परेशानियां हो रही है बताया है। लोगों के क्या क्या बहाने है जनसंख्या को बढ़ाने को लेकर यह भी बताया हैं। जब जनसंख्या कंट्रोल में होगा तभी सभी सुखी और संपन्न होंगे।

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यह कविता (जनसंख्या कानून।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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मेरा मन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरा मन। ♦

घड़ी दो घड़ी तो मेरे पास भी बैठ।
कभी खामोश कभी उदास भी बैठ।
तितलियों सा बेफिक्र डोलते रहते हो।
कभी परेशान कभी हताश भी बैठ।
आसमान में उड़ते रहते चिड़ियों सा,
सबके खेत में घुस जाते हो नदियों सा।

अपने पराये, लोकलाज का कोई शर्म नहीं।
ठहर क्यूँ नहीं जाते, ऐ मन, सदियों सा।
नजर लग जाएगी थक के कभी तू ,
मेरे पहलू में आ बदहवास भी बैठ
घड़ी दो घड़ी…..

मत भूल ये अपना गाँव नहीं शहर है।
जमाने की टेढी, तुम ही पे नजर है।
सभी को खबर है तेरी दिलनवाजी का।
तुमको ही अपनी नही कोई खबर है।
पर्दे का थोड़ा तो लिहाज लाजिमी है।
कभी नाउम्मीद, हो निराश भी बैठ।
घड़ी दो घड़ी…..

पंथी, ग्रंथी औ पुजारी, महापौर का,
तू मेरा ही है या है किसी और का।
तन-स्पंदन में भी कभी मिलते नहीं।
तू इसी दौर का है या है उस दौर का।
बता तुझे ला दूंगा सारे खेल खिलौने।
ला दूंगा तुझको जमीं आकाश भी बैठ।
घड़ी दो घड़ी…..

बीच – बीच में लंबी ताजी साँसें लो सुस्ता लो।
कभी – कभी अपने घर का भी रस्ता लो।
मेहमान नवाजी, आवारगी कुछ दिन ही अच्छी।
वतन वापसी का विकल्प भी बावस्ता लो।
रोज दीवान-ए-आम तू जाया करता है।
आज हृदय के साथ दीवान-ए-खास भी बैठ।
घड़ी दो घड़ी…..

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

  • “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है – मन के यूँ उमड़ने – घुमड़ने की प्रक्रिया को समझाने की कोशिश की है। मन से संवाद किया है, सभी को खबर है तेरी दिलनवाजी का तुमको ही अपनी नही कोई खबर है। मेरे पहलू में आ बदहवास भी बैठ घड़ी दो घड़ी।

—•—•—•—

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यह कविता (मेरा मन।) “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपने सच्चे मन से देश की सेवा के साथ-साथ एक कवि हृदय को भी बनाये रखा। आपने अपने कवि हृदय को दबाया नहीं। यही तो खासियत है हमारे देश के वीर जवानों की। आपकी कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

About Yourself – आपके ही शब्दों में —

  • नाम: शैलेश कुमार मिश्र (शैल)
  • शिक्षा: स्नातकोत्तर (PG Diploma)
  • व्यवसाय: केन्द्रीय पुलिस बल में 2001 से राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत।
  • रुचि: साहित्य-पठन एवं लेखन, खेलकूद, वाद-विवाद, पर्यटन, मंच संचालन इत्यादि।
  • पूर्व प्रकाशन: कविता संग्रह – 4, विभागीय पुस्तक – 2
  • अनुभव: 5 साल प्रशिक्षण का अनुभव, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अफ्रीका में शांति सेना का 1 साल का अनुभव।
  • पता: आप ग्राम-चिकना, मधुबनी, बिहार से है।

आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे, जनमानस के कल्याण के लिए। उस अनंत शक्ति की कृपा आप पर बनी रहे। इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस लेख को विराम देता हूँ। तहे दिल से KMSRAJ51.COM — के ऑथर फैमिली में आपका स्वागत है। आपका अनुज – कृष्ण मोहन सिंह।

  • जरूर पढ़े: चली जाती है।
  • जरूर पढ़े: अच्छा लगता है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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जय बोलो अयोध्या धाम की।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जय बोलो अयोध्या धाम की। ♦

श्री राम के दर्शन की अभिलाषी,
लहरें गाती हैं श्री सीताराम की।
शैल शिखर से सरयू प्रति प्रताप में,
महिमा गाती ललित कलाम की।
जय बोलो अयोध्या धाम की॥

कंचन महल दशांश – सुखरासी,
पांव पखारने आती लहरें नाथ की।
जहां पृथु यज्ञ में आते हैं अविनाशी,
जल का आचमन करते मृदुभाषी।
जय बोलो अयोध्या धाम की॥

जहां सनत कुमारों की आवा जाही,
माता सरयू मानव कल्याण की।
जिसके दर्शन करने से मनुष्य जीवन,
धन्य हो जाता, ध्यान करें उस धाम की।
जय बोलो अयोध्या धाम की॥

अविद्या रूपी कर्म – मार्ग गामी,
स-काम पुरुषों के उद्धार की।
बोलो बोलो जय श्री सीताराम की।
जय बोलो अयोध्या धाम की॥

उपासना रूपी विद्या – मार्ग आमी,
निष्काम उपासकों की गाथा कहानी।
जाने अनजाने में किया पाप नाशक,
पाप विनाशक अयोध्या धाम की।
बोलो जय बोलो सीताराम की॥

भोग प्राप्त करने वाले दक्षिण मार्गी,
मोक्ष प्राप्त करने वाले उत्तर मारगी।
यात्रा करने वाले पुरुषोत्तम भगवान जी,
दोनों आधारभूत के गुणगान की।
बोलो जय बोलो अयोध्या धाम की॥

रंग लाए, समुद्र में निकला शब्द ‘तप’,
प्रथम स्वर के ‘अ’ से निर्मित अयोध्या।
ब्रह्मा के कानों में जय घोष गान की,
जय बोलो जय बोलो सीताराम की।
बोलो जय बोलो अयोध्या धाम की॥

स्वर्गादी फल देने वाली कर्म – विद्या,
आदि अंत स्थान अयोध्या धाम की।
ऋषि – मुनि – महात्मा के देव स्थान,
गाती लहरें श्री पुरूषोत्तम धाम की।
बोलो जय बोलो सीताराम की॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने सरयू नदी व अयोध्या के गुणों और विशेषताओं का वर्णन किया है। महापुरुषों की पावन भूमि का मनोरम वर्णन किया है, जहाँ पर उपासना रूपी विद्या – मार्ग आमी, निष्काम उपासकों की पुण्य गाथा से कण – कण सुशोभित है।

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यह कविता (जय बोलो अयोध्या धाम की।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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शारदे दया करो।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शारदे दया करो। ♦

बसंत ऋतु की मंगल बेला में,
बागेश्वरी शारदा प्रकट हुई।
बसंत पंचमी की तिथि थी वह,
पांचों तत्व थीं लिये खड़ी।

ज्ञानतत्व कुबुद्धी का नाशक,
समूल में ज्ञान मा भरती हो।
अमृत्तत्व सर्वज्ञान – का सूचक,
कल्याण निरंतर करती हो।

विद्यातत्व सर्वकल्यान का सूचक,
मधुर वाणी में रमती हो।
प्रकृतितत्व शुभ्र ज्योत्स्ना सूचक,
शक्ति कुंडलनी कहलाती हो।

वीणा बजा जगाकर जग को,
विनीत ज्ञान दे लुभाती हो।
भवानी भाव से मगन हो पर,
मेरी यह विनती सुन लो।

अज्ञानी को मां ज्ञान तू देती।
सर चरणों में अर्पित, घ्यान करो।
मैं हूं बालक तेरा शक्ति भर दो।
सुदूर दृष्टि वाली दया तु कर दो।

हाथ जोड़कर विनती करता हूं,
शारदा हमें क्षमा कर, वर दो।
हर पल तेरे नाम की महिमा,
तेरी जय – जय जयकार करूं।

पूजन में तेरे शामिल होकर,
तेरा ही गुणगान करूं।
द्वारे पर मेरे माता आकर,
इस जीवन का उद्धार करो।

मां तेरी जय जय जयकार करूं।
भव सागर से मां पार तरूं।
ब्रह्म विद्या का तत्व ज्ञान जपूं।
तेरी जय – जय जयकार करूं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने माँ शारदे के गुणों और शक्तियों का गुणगान करते हुए, माता रानी से स्तुति की है मानवता के कल्याण के लिए।

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यह कविता (शारदे दया करो।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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राजा पृथु को मुनिश्वरों का उपदेश।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राजा पृथु को मुनिश्वरों का उपदेश। ♦

पृथ्वी पालक पृथु महाराज का,
प्रजा जब स्तुत गान करती रही।
उसी समय चार तेजस्वी मुनीश्वर,
तेज पुंज, आकाश मार्ग से आए।

आकाश और से उतरते हुए उन्हें,
राजा पृथु – अनुचर पहचान गए।
आगे बढ़ महाराज किए सम्मान,
उचित संस्कार से मुनियों का मान।

राजा निवेदन सनकादी ने माना,
आपस में बातचीत से पहचाना।
मुनि के चरणों दक सीष लगाया।
सत्य पुरुषों सा व्यवहार दिखाया।

सोने के सिंहासन पर उन्हें बिठाया।
विधिवत पूजा पाठ उनका कराया।
अग्नि देवता सदृष्य तेज था उनका।
मुनियों के तेज से आह्लादित जनता।

विनम्रता पूर्वक राजा पृथु जी बोले,
आपका दर्शन योगियों को दुर्लभ।
यद्यपि आप सर्वव्यापी और सर्वत्र,
फिर भी सर्वसाक्षी आत्मा ना सुलभ।

जिस घर आप कुछ ग्रहण करते हैं,
धनहीन भी ध्यान कर धन्य हो जाता।
हम सभी इंद्रिय संबंधी भोगों को,
अपना पुरुषार्थ मान लिया करते हैं।

आप एकाग्र चित्त ब्रह्म चारी महान।
श्रद्धा भक्ति आचरण पालक विद्वान।
जिस पर आपकी कृपा दृष्टि बरसती,
वह इस संसार में हो जाता है महान।

इन कर्मों के निस्तार का कोई उपाय,
जो भी हो मुनिवर हमको बताइए।
सांसारिक मनुष्य का कैसे होता है,
कल्याण, उसको हमें समझाइए।

यह भी सच है कि उपासक धीर,
पुरुषों के ऊपर वह कृपा करते हैं।
अजन्मा नारायण भगवान जी,
भक्तों का अपने कल्याण करते हैं।

राजा के गंभीर मधुर वाणी सुनकर,
मुनीश्वर प्रशन्नता से कहने लगे?
आप सबकुछ जानते हैं फिर भी,
जन कल्याण हेतु अच्छी बातें पूछी।

साधु पुरुषों की ऐसी बुद्धि होती।
प्रश्न से उनके कल्याण होता है।
मधुसूदन के चरणों में आपकी प्रीत,
अविरल सुंदर है आप की नीति।

ईश्वर में अविरल प्रेम जाग जाता।
वासनायें उसकी सभी नष्ट हो जाती।
आत्म स्वरूप निर्गुण का मुनि ने,
राजा पृथु जी को ब्रह्म ज्ञान बताया।

मुनीश्वर ने राजा पृथु को पावन,
पुनीत प्रीति युक्त भजन सुनाए।
ब्रह्म में लीन हो जाने पर पुरुष,
सतगुरु की शरण में जाता बताए।

विषय इंद्रिय संबंधी भोगों से बचाएं।
विचार शक्ति को बढ़ाते ही जाएं।
विचार शक्ति नष्ट हो जाने पर,
पूर्व स्मृतियां भी नष्ट हो जाती हैं।

और स्मृतियों के नष्ट हो जाने पर,
ध्यान – ज्ञान नष्ट होने लगता है।
अपने द्वारा आत्मा नाश होने पर,
जीवन का सब हानि हो जाता है।

भगवान के चरण, चरण कमल ही,
दुस्तर समुद्र को पार कर देते हैं।
कुमार से आत्मीय उपदेश सुनकर,
राजा पृथु उनकी प्रशंसा करने लगे।

आप लोग बड़े ही दयालु कृपालु हैं।
श्रीहरि भेजी, मुझ पर कृपा की है।
जिस कार्य के लिए आप पधारे थे,
आपने अच्छी तरह उसे संपन्न किया।

इस उपकार के बदले आपको क्या दूं ?
मेरा जो वह महापुरुषों का प्रसाद है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है कि महाराजा पृथु ने कैसे मुनिश्वरों का स्वागत किया। आत्म स्वरूप निर्गुण मुनिश्वरों ने बहुत ही सरल शब्दों में राजा पृथु जी को ब्रह्म ज्ञान बताया।

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यह कविता (राजा पृथु को मुनिश्वरों का उपदेश।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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तोते में जान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तोते में जान। ♦

मुहब्बत की यूँ इब्तिदा नजर आती है।
उसकी सूरत में मुझे माँ नजर आती है,
दिल ये मानने को हरगिज राजी नहीं।
उसकी ना – ना में भी हाँ नजर आती है।

मेरे नाम पे उसकी भी नजर झुक जाती।
थोड़ी – थोड़ी वो भी मेहरबां नजर आती है।
वो जो नहीं भी कहती मैं समझ जाता हूँ।
आँखें आईना ही नहीं जुबां नजर आती है।

जबसे मन नें नजरिया, लिबास बदला है।
बहुत खूबसूरत ये दुनियाँ नजर आती है।
खुद से भी लंबी गुप्तगू होने लगी है अब।
साँसों में एक दरिया रवां नजर आती है।

ये दुनियाँ कहती है कि तू बावरा हो गया है।
मुझे ये दुनियाँ बावरा, दरमियाँ नजर आती है।
हो सकता है कि वो ठीक भी कह रहे हों,
पर मुझे बारहा ये उल्टा चश्मा नजर आती है।

मतलब साफ है कि हमें इश्क़ हो गया है।
आशिकों को और कुछ कहाँ नजर आती है।
अब समझ में आ रहा, क्यों किसी को खुदा,
और एक तोते में अपनी जाँ नजर आती है।

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

  • “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है – प्यार के दौरान मन में उमड़ने वाले भावनावों को सरल शब्दों में बयां किया है। किस-किस तरह के विचार मन में उमड़ने लगते है, यह भी समझाने की कोशिश की हैं।

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यह कविता (तोते में जान।) “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपने सच्चे मन से देश की सेवा के साथ-साथ एक कवि हृदय को भी बनाये रखा। आपने अपने कवि हृदय को दबाया नहीं। यही तो खासियत है हमारे देश के वीर जवानों की। आपकी कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

About Yourself – आपके ही शब्दों में —

  • नाम: शैलेश कुमार मिश्र (शैल)
  • शिक्षा: स्नातकोत्तर (PG Diploma)
  • व्यवसाय: केन्द्रीय पुलिस बल में 2001 से राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत।
  • रुचि: साहित्य-पठन एवं लेखन, खेलकूद, वाद-विवाद, पर्यटन, मंच संचालन इत्यादि।
  • पूर्व प्रकाशन: कविता संग्रह – 4, विभागीय पुस्तक – 2
  • अनुभव: 5 साल प्रशिक्षण का अनुभव, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अफ्रीका में शांति सेना का 1 साल का अनुभव।
  • पता: आप ग्राम-चिकना, मधुबनी, बिहार से है।

आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे, जनमानस के कल्याण के लिए। उस अनंत शक्ति की कृपा आप पर बनी रहे। इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस लेख को विराम देता हूँ। तहे दिल से KMSRAJ51.COM — के ऑथर फैमिली में आपका स्वागत है। आपका अनुज – कृष्ण मोहन सिंह।

  • जरूर पढ़े: चली जाती है।
  • जरूर पढ़े: अच्छा लगता है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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राजा पृथु के यज्ञ शाला में प्रभु का प्रादुर्भाव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राजा पृथु के यज्ञ शाला में प्रभु का प्रादुर्भाव। ♦

राजा पृथु ने सौ अश्वमेध – यज्ञ करने की दीक्षा ली,
पूर्व मुखी सरस्वती तट पर मनु के ब्रम्हावर्त क्षेत्र में यज्ञ की।
महाराज पृथु ने यज्ञ में खुश होकर आहुती दी,
सर्व लोक पूज्य जगदीश्वर भगवान श्रीहरि का साक्षात दर्शन की।

हाजिर जगदीश्वर के साथ ब्रह्मा रूद्र अनुचर लोकपाल भी जी,
नर -नारी देवी – देवता भी साथ साथ आए थे।
गंधर्व आदि और अप्सराएं प्रभु की गा रही थी गीत,
और प्राकृति कितने तरह – तरह की सामग्री समर्पित की।

छद्म वेश धारण कर इंद्र अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा खोला,
आकाश मार्ग से घोड़ा लेकर भागने का प्रयास किया।
ईर्ष्या वस गुपचुप इंद्र ने घोड़ा हरने का प्रयत्न किया,
और कवच रूप पाखंड धरवेश अपनी रक्षा में धारण किया।

पृथु अंतिम यज्ञ हेतु भगवान की पूजा में थे लीन,
एक दृष्टि, पृथु – महारथी पुत्र को अत्री ने इंद्र को मारने की आज्ञा दी।
पृथु – पुत्र महाबली घोड़े की रक्षा ने मानो ऐसे लगता,
जिस तरह रावण के पीछे जटायु ने सीता को बचाने दौड़ा।

उसका वह प्रारंभिक करती जी ने उसका नाम,
वीर विजिताश्व बहुत सोच समझकर ही है रखा।
फिर दुबारा वही इंद्र ने वहां पर घोर अंधकार फैला दिया,
उसी घोड़े को सोने की जंजीर सहित आकाश मार्ग ले जाता।

पृथु पुत्र राजकुमार को इंद्र हेतु फिर से अत्रि ने उकसाया,
राजकुमार गुस्से में आकर इंद्र पर लक्ष कर धनुष – बाण चढ़ाया।
देख, देवराज इंद्र छद्म वेष – घोड़ा छोड़ अंतर्ध्यान हो गया,
वीर विजिताश्व अपना घोड़ा लेकर पिता की व्यवस्था में आ गया।

इंद्र ने अश्व हरण की इच्छा से वो था रूप बनाया,
आपके खंड होने के कारण वही था पाखंड कहलाया।

लोक गुरु भगवान ब्रह्मा के समझाने पर प्रबल पराक्रमी,
महाराज पृथु ने अंतिम यज्ञ आग्रह को छोड़ दिया।
यज्ञांत में जब उन्होंने निवृत होकर स्नान किया,
यज्ञ से तृप्त देवताओं ने उन्हें अभीष्ट वर दिया।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है कि महाराजा पृथु ने सौ अश्वमेध – यज्ञ करने की दीक्षा ली, पूर्व मुखी सरस्वती तट पर मनु के ब्रम्हावर्त क्षेत्र में यज्ञ की। महाराज पृथु ने यज्ञ में खुश होकर आ-हुती दी, सर्व लोक पूज्य जगदीश्वर भगवान श्रीहरि का साक्षात दर्शन की। छद्म वेश धारण कर इंद्र अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा खोला, आकाश मार्ग से घोड़ा लेकर भागने का प्रयास किया। इंद्र से अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा लेन के लिए, पृथु अंतिम यज्ञ हेतु भगवान की पूजा में थे लीन, एक दृष्टि, पृथु – महारथी पुत्र को अत्री ने इंद्र को मारने की आज्ञा दी।

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यह कविता (राजा पृथु के यज्ञ शाला में प्रभु का प्रादुर्भाव।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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दीप जलाना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दीप जलाना होगा। ♦

घर – घर दीप जलाना होगा।
अंधेरा दूर भगाना होगा।
आसमान ही टूट पड़ा है,
कंधा सबको लगाना होगा।

माना विपदा बहुत बड़ी है।
जिंदगी सहमी डरी खड़ी है।
नागवार मुश्किल वक्त है।
मानव अस्त-व्यस्त, त्रस्त है।

इन्सां इन्सां को लील रहा है।
बचे खुचे को छील रहा है।
हवा में ऐसी जहर घुली है।
राजा रंक की पोल खुली है।

जंग जारी है, जंग जीतेंगे।
गर रहे एकजुट संग, जीतेंगे।
थोड़ी त्याग, तपस्या थोड़ी,
सबको ही कर जाना होगा।
घर – घर दीप जलाना होगा।

बंद करो जनसभा ओ धरना।
कुंभ, समागम, चुनाव लड़ना।
आपदा में भी अवसर ढ़ूढ़ना।
भेष बदल भाईयों को लूटना।

लाशों पे भी राजनीति, छी छी,
मुनाफाखोर आयोग, समिति, छी छी।
साँसें दो, उच्छवास दो हमें।
महफूज हूँ, एहसास दो हमें।

मेरे हिस्से की हवा चाहिये।
रोटी मत दो, दवा चाहिये।
मेरी जरुरत फिर तुझे होगी।
सत्ता को भी धमकाना होगा।
घर – घर दीप जलाना होगा।

किसकी कम या ज्यादा गलती।
साँस नहीं इस बात से चलती।
ये वक्त नहीं दोषारोपण का,
मेरी, तेरी, छिद्रान्वेषण का।

अब तो कहना, अनुशासन मानो।
कौन, कहाँ, क्या, कब, पहचानो।
वरना समूल ही मिट जाएगा।
इक प्यादा से पिट जाएगा।

जागो, उठो, अब भी संभलो।
कुछ दिन भीड़ मे मत निकलो।
साहस, विश्वास, सहयोग से बढ़के।
वैद्य न कोई, समझाना होगा।
घर – घर दीप जलाना होगा।

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

  • “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है – जीवन में कितना भी उतार चढ़ाव आए, कितनी भी विपरीत परिस्थिति आए यूँ ही घबराकर रुकना नहीं, एक न एक दिन फिर से जीवन में खुशियों की बरसात होगी। किसकी कम या ज्यादा गलती। साँस नहीं इस बात से चलती। ये वक्त नहीं दोषारोपण का एक दूसरे पर।

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यह कविता (दीप जलाना होगा।) “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपने सच्चे मन से देश की सेवा के साथ-साथ एक कवि हृदय को भी बनाये रखा। आपने अपने कवि हृदय को दबाया नहीं। यही तो खासियत है हमारे देश के वीर जवानों की। आपकी कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

About Yourself – आपके ही शब्दों में —

  • नाम: शैलेश कुमार मिश्र (शैल)
  • शिक्षा: स्नातकोत्तर (PG Diploma)
  • व्यवसाय: केन्द्रीय पुलिस बल में 2001 से राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत।
  • रुचि: साहित्य-पठन एवं लेखन, खेलकूद, वाद-विवाद, पर्यटन, मंच संचालन इत्यादि।
  • पूर्व प्रकाशन: कविता संग्रह – 4, विभागीय पुस्तक – 2
  • अनुभव: 5 साल प्रशिक्षण का अनुभव, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अफ्रीका में शांति सेना का 1 साल का अनुभव।
  • पता: आप ग्राम-चिकना, मधुबनी, बिहार से है।

आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे, जनमानस के कल्याण के लिए। उस अनंत शक्ति की कृपा आप पर बनी रहे। इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस लेख को विराम देता हूँ। तहे दिल से KMSRAJ51.COM — के ऑथर फैमिली में आपका स्वागत है। आपका अनुज – कृष्ण मोहन सिंह।

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पृथु का पृथ्वी पर क्रोध।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पृथु का पृथ्वी पर क्रोध। ♦

अन्न – औषधि छिपा के पृथ्वी,
सृष्टि में, रूप बदल कर डाले।
प्रजा भूख से हो रही व्याकुल,
श्री मैत्रेय, विदुर से बोले।

जीवन सभी का अटका – अटका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

प्रजा करुण – क्रंदन सुन पृथु ने,
शस्त्र उठा लिया हाथ में।
पृथ्वी, गौ का रूप धारण कर,
थर-थर – थर-थर लगी कांपने।

पृथ्वी ने सर, पांव पर पटका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

गौ रूपी पृथ्वी ने आकर,
विनीत भाव से नमन किया।
आप जगत – उत्पत्ति – संहारक,
विश्व – रचना का मन बना।

मेरा हाल तो नटनी – नट का,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

मेरी अन्न – औषधि सब,
राक्षस मिलकर खा जाते थे।
सही ढंग से जिन्हें था मिलना,
अन्न – औषधि नहीं पाते थे।

यह सब देख के माथा ठनका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है कि महाराजा पृथु ने पृथ्वी पर क्यों क्रोध, किया। महाराजा पृथु सदैव ही अपनी प्रजा को सुखमय जीवन देने के लिए तत्पर रहते थे, चाहे कैसी भी विकट समय क्यों न हो। हर विकट समस्या से बाहर निकलने की पूर्ण क्षमता थी उनमे।

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यह कविता (पृथु का पृथ्वी पर क्रोध।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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पितृ-दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पितृ-दिवस। ♦

पिता की सेवा कर पाए, ऐसा श्रवण तू बन जा।
बस अपने सद्कर्मों से तू , अपने पिता को गंगा नहा।
पितृ-दिवस होता है, मातृ- दिवस का पूरक।
दोनों से ही होता है, ये जीवन संपूरक।

पिता सुखों के अम्बर की, होता है छाया।
जिसने हर पल संतान की खातिर, ईश्वर के समक्ष हाथ फैलाया।
उसके एक प्यार भरे स्पर्श में, लाखों आशीषों को हमनें पाया।
परिवार की खुशी के लिए, हर गम से वज्र बन टकराया।

नारियल जैसे गुणों को, इसने भगवान से पाया।
अंदर से मुलायम ह्रदय, बाहर से कठोरता को अपनाया।
जिसने जीवन की हर विषम परिस्तिथियों में भी,
प्यार को ही गुनगुनाया।
पिता के प्रेम को माप दे, बनी ऐसी कोई भाषा नही।

पिता की महत्ता अनन्त है,
जिसकी कोई परिभाषा नही।
कोई परिभाषा नही।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – वैसे – माता और पिता दिवस ताे हर मनुष्य काे अपने अंतिम श्वास तक मनाना चाहिये। एक सच्चा पिता सदैव ही अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिये दिन-रात अनवरत (continuously) कार्य करता हैं। जहा माता अपने बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखती हैं ताे वही पिता उन्हे सही ज्ञान और समझ देते हैं। जहा प्रथम गुरु माँ हैं ताे वही पिता गुरु हाेने के साथ-साथ सच्चा संरक्षक भी हाेता हैं।

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यह कविता (पितृ-दिवस।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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