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हिन्दी साहित्य

कार्तिक मास का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक पक्ष।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कार्तिक मास का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक पक्ष। ♦

आध्यत्मिक ऊर्जा एवं शारीरिक शक्ति संग्रह करनें में कार्तिक मास का विशेष महत्व है। इसमें सूर्य एवं चन्द्र की किरणों का पृथ्वी पर पड़ने वाला प्रभाव मनुष्य के मन मस्तिक को स्वस्थ रखता है।

कुछ रोचक तथ्य —

उत्सवों और त्योहारों का मास – कार्तिक मास —

हिन्दु पंचांग के अनुसार वर्ष का आठवां महीना *’कार्तिक मास‘* के नाम से जाना जाता है। पुरे माह में ब्रह्म मुहुर्त में स्नान, पाठ, तुलसी पूजन, व्रत कथा श्रवण दीपदान आदि का महात्मय बताया गया है। इसी मास में अधिकतम त्यौहार आते हैं जैसे:—

  • शरद पूर्णिमा
  • करवा चौथ
  • अहोई अष्टमी
  • रमा एकादशी
  • गोवत्स द्वादशी
  • नरक चर्तुदशी
  • तुलसी विवाह
  • हनुमान जयंति
  • दीपावली पर्व
  • अन्नकूट महोत्सव
  • गोवर्धन पूजा
  • भैया दूज
  • कार्तिक छठ पूजा
  • देवोत्थान एकादशी

जहाँ *’स्कंद पुराण‘* में इसे सबसे अच्छा महीना माना गया है वहीं *’पद्म पुराण‘* में कार्तिक मास को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष एवं भक्ति देने वाला मास कहा गया है।

• 7 नियम • —

पुराणों में कहा गया है कि भगवान नारायण ने ब्रह्मा जी को, ब्रह्मा जी ने नारद जी को और नारद जी ने राजा पृथु को कार्तिक मास के सर्वगुण संपन्न माहात्म्य के संदर्भ में बताया है। कार्तिक मास में 7 नियम प्रधान माने गए हैं।

• दीपदान • —

धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में सबसे प्रमुख नियम दीप दान करना बताया गया है। इस महीने में नदी, पोखर, तालाब, मन्दिर एवं शयन कक्ष में दीपदान किया जाता है। ऐसा करने से जीवन से अज्ञानरूपी अंधकार दूर होता है एवं भक्ति, सुख, वैभव एवम् लक्ष्मी का शुभ आगमन होता है।

• श्री तुलसी पूजा • —

*श्री कृष्ण प्रेयसी* के नाम से भी सम्बोधन किया जाता है तुलसी जी को। वैसे तो हर महीने तुलसी जी की पूजा करनी चाहिए। परन्तु विशेष रूप से इस महीने में तुलसी जी की वन्दना और पूजा करने से इसका फल कई गुणा हो जाता है एवं *निश्चित ही श्री कृष्ण प्रेम की प्राप्ति होती है।* श्री तुलसी वन्दन, श्री तुलसी परिक्रमा एवं श्री कृष्ण नाम संकीर्तन तुलसी जी के पास बैठ कर उच्च स्वर से गान करने से तुलसी मैया अति प्रसन्न होती है।

• भूमि पर शयन • —

भूमि पर शयन-कार्तिक मास का तीसरा मुख्य नियम हैं। इससे मन में कोमलता आती है। अहम् का नाश होता है। विकार समाप्त होते हैं।

• तेल और दालें वर्जित • —

  • कार्तिक महीनें में केवल एक बार नरक चतुर्थी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) के दिन ही तेल सेवन किया जाता है। कार्तिक मास में अन्य दिनों में तेल पकाना और लगाना दोनों नहीं किये जाते।
  • दलहन (दालों) खाना निषेध: कार्तिक महीने में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई, तथा बैंगन नहीं खाना चाहिए।

• ब्रह्मचर्य का पालन • —

कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है। इसका पालन नही करने पर पति – पत्नि को दोष लगता है और इसके अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं।

• संयम रखें • —

कार्तिक मास का व्रत करने वालों को चाहिए कि वह तपस्वियों की भांति व्यवहार करें। कम बोलें, किसी की निंदा नहीं करें विवाद नहीं करें। मन पर संयम रखें।

इन सभी उपरोक्त नियमों से अलग “नित्य से कम से कम दुगना भजन, कथा श्रवण एवं वे सभी क्रियाएँ जिससे ठाकुर जी के प्रति प्रीति बढ़े एवं उनका स्मरण सभी पहर बना रहें। करते रहना चाहिए। प्रिया लाल जी को इस मास में भजन अत्यधिक प्रिय है।”

॥श्री राधारमण समर्पण॥

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — “कार्तिक मास” यह साल के 12 मासों में उत्तम मास माना गया है। इस महीने में की गई प्रार्थना और पूजन सीधे भगवान विष्णु तक पहुंचती है। इस महीने की सबसे अच्छी बात यह है कि इस माह में भगवान विष्णु धरती पर जल में निवास करते हैं। इसलिए प्राचीन काल से परंपरा रही है कि लोग सूर्योदय से पूर्व ही नदी या तालाब में जाकर स्नान करते हैं और वहीं पर तिल के तेल या घी से दीपक जलाकर भगवान विष्णु की पूजा करके दीप को दोने में रखकर जल में प्रवाहित कर देते हैं। यह सुंदर नजारा आज भी गांवों में देखने को मिल जाता है। आपके आस-पास नदी-तालाब नहीं है तो आप घर पर भी सूर्योदय पूर्व स्नान करते भगवान विष्णु की पूजा करें और दीप जलाएं। इससे भी पुण्य के भागी बनेंगे।

—————

यह लेख (कार्तिक मास का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक पक्ष।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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छठ महापर्व – सूर्योपासना का महापर्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ छठ महापर्व – सूर्योपासना का महापर्व। ♦

🚩सनातन धर्म की जय 🚩🟢आइए छठ पर्व को समझें…

छठ महापर्व – सूर्योपासना का महापर्व – आइए इस पर्व की वैज्ञानिकता को समझें🚩तत्सवितुर्वरेण्यं – सूर्य की सविता शक्ति का पूजन।
(चार दिवसीय छठ पूजन उत्सव, 28 अक्टूबर कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से 31 अक्टूबर कार्तिक शुक्ल सप्तमी तक)

• महत्‍वपूर्ण तिथि व मुहूर्त •

  1. छठ पूजा का पहला दिन — नहाय-खाय 2022: 28 अक्टूबर, दिन शुक्रवार।
    सूर्योदय: प्रात: 06 बजकर 30 मिनट पर सूर्यास्त: शाम 05 बजकर 39 मिनट पर।
    शुभ समय — शोभन योग: प्रात:काल से देर रात 01 बजकर 30 मिनट सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 06 बजकर 30 मिनट से सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक रवि योग: सुबह 10 बजकर 42 मिनट से अगली सुबह 06 बजकर 31 मिनट तक।
  2. छठ पूजा का दूसरा दिन — लोहंडा और खरना 2022: 29 अक्टूबर, दिन शनिवार।
    सूर्योदय: प्रात: 06 बजकर 31 मिनट पर सूर्यास्त: शाम 05 बजकर 38 मिनट पर।
    शुभ समय — रवि योग: सुबह 06 बजकर 31 मिनट से सुबह 09 बजकर 06 मिनट तक सुकर्मा योग: रात 10 बजकर 23 मिनट से अगली सुबह तक।
  3. छठ पूजा का तीसरा दिन — छठ पूजा का संध्या अर्घ्य 2022: 30 अक्टूबर, रविवार।
    सूर्यास्त: शाम 05 बजकर 38 मिनट पर।
    शुभ समय — सुकर्मा योग: प्रात: काल से शाम 07 बजकर 16 मिनट तक धृति योग: शाम 07 बजकर 16 मिनट से अगली सुबह तक रवि योग: सुबह 07:26 बजे से अगले दिन सुबह 05:48 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 06:31 बजे से सुबह 07:26 बजे तक।
  4. छठ पूजा का चौथा दिन — छठ पूजा का प्रात: अर्घ्य 2022: 31 अक्टूबर, सोमवार
    सूर्योदय: प्रात: 06 बजकर 32 मिनट पर।
    शुभ समय — सर्वार्थ सिद्धि योग: प्रात: 05:48 बजे से सुबह 06:32 बजे तक त्रिपुष्कर योग: प्रात: 05:48 बजे से सुबह 06:32 बजे तक।

• लोक आस्था के महापर्व के रूप में प्रसिद्ध महापर्व छठ पूजा 2022 दिवाली के 6 दिन बाद मनाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में छठ पूजा बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। ये त्योहार साल में दो बार आता है। इस व्रत को पारिवारिक सुख और समृद्धि के लिए किया जाता है। ये त्योहार चार दिन तक मनाया जाता है। इस दौरान महिलाएं नदी या तालाब में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देती हैं।

• छठ की शुरुआत •

छठ की शुरुआत — ऐसी मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सारा राज-पाट हार गए, तब द्रौपदी बहुत दुःखी थीं। तब श्रीकृष्ण भगवान ने उन्हें सूर्योपासना गायत्री मन्त्र अनुष्ठान के साथ करने की सलाह दी। इसी सूर्य उपासना से उन्हें अक्षय भोजन पात्र मिला जिसमे भोजन कभी कम नहीं पड़ता था। सूर्य की सविता शक्ति गायत्री को ही छठी मईया भी कहा जाता है। गायत्री कल्पवृक्ष है, इससे असम्भव भी सम्भव है। सर्वप्रथम दौपदी ने छठ का व्रत किया, तब से मान्यता है कि व्रत के साथ गायत्री अनुष्ठान और सूर्योपासना करने से दौपद्री की तरह सभी व्रती की मनोकामना पूरी होती है, तभी से इस व्रत को करने प्रथा चली आ रही है।

• छठ पूजा विधि •

छठ पूजा 4 दिनों तक की जाती है, इस व्रत की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को और कार्तिक शुक्ल सप्तमी तक चलता है। इस दौरान व्रत करने वाले लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं, इस दौरान वे अन्न नहीं ग्रहण करते है, जिससे प्राणवायु अन्न पचाने में ख़र्च न हो और प्राण ऊर्जा ज्यादा से ज्यादा शरीर के 24 शक्ति केंद्रों तक पहुंचे और उन्हें जागृत कर शक्ति का संचार करे। जल प्रत्येक एक-एक घण्टे में पीते रहना चाहिए जिससे पेट की सफ़ाई हो, और आंते दूषित और पेट में जमा हुआ अन्न और चर्बी उपयोग में न ले सकें। जो लोग जल नहीं पीते उनकी आंते उनकी शरीर की चर्बी पचाते हैं, और पेट में संचित मल और अपच भोजन से शक्ति लेते है, उससे प्राणवायु शक्ति केन्द्रो तक नहीं पहुंचती।

  • यदि जलाहार में असुविधा हो रही हो तो एक या दो वक़्त रसाहार अर्थात् फ़ल के जूस ले लेवें। कोई तला-भुना या ठोस आहार लेना वर्जित है।

छठ महापर्व पर अनुष्ठान मंत्र एवं विधि —

  • व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य के पालन के साथ भूमि पर शयन अनिवार्य है। कम से कम सोयें और उगते हुए सूर्य का ध्यान करें।
  • दिन में तीन बार पूजन होगा, पहला पूजन सूर्योदय के समय, सूर्य के समक्ष जप करने के बाद अर्ध्य देना होगा।
  • दूसरा समय दोपहर का, गायत्री जप के बाद तुलसी को अर्घ्य देना होगा।
  • शाम को गायत्री जप के बाद नित्य शाम को पांच दीपकों के साथ दीप यज्ञ होगा।
  • इन चार दिनों में 108 माला गायत्री जप की पूरी करनी होती है। अर्थात् 27 माला रोज जप करना होगा। इसे अपनी सुविधानुसार दिनभर में जप लें।
  • पूजन के वक़्त पीला कपड़ा पहनना अनिवार्य है, उपवस्त्र गायत्री मन्त्र का दुपट्टा ओढ़े। आसन में ऊनी कम्बल या शॉल उपयोग में लें।
  • सूर्योपासना अनुष्ठान मन्त्र — ॐ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।
  • दीपदान के समय महामृत्युंजय मंत्र — ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
  • सूर्य गायत्री मन्त्र — ॐ भाष्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्॥

• सूर्य अर्घ्य देने की विधि •

  • यदि घर के आसपास नदी तलाब या कोई जलाशय हो तो पानी में कमर तक पानी में खड़े होकर अर्घ्य दें, यदि नहीं है तो घर की छत पर या ऐसी जगह अर्घ्य दें जहाँ से सूर्य दिखें। सूर्योदय के प्रथम किरण में अर्घ्य देना सबसे उत्तम माना गया है। सर्वप्रथम प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व नित्य-क्रिया से निवृत्त्य होकर स्नान करें। उसके बाद उगते हुए सूर्य के सामने आसन लगाए।
  • पुनः आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में पवित्र जल लें। रक्तचंदन आदि से युक्त लाल पुष्प, चावल आदि तांबे के पात्र में रखे जल या हाथ की अंजुलि से तीन बार जल में ही मंत्र पढ़ते हुए जल अर्पण करना चाहिए। जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्योदय दिखाई दे आप दोनों हाथों से तांबे के पात्र को पकड़कर इस तरह जल अर्पण करे की सूर्य तथा सूर्य की किरण जल की धार से दिखाई दें।
  • ध्यान रखें जल अर्पण करते समय जो जल सूर्य देव को अर्पण कर रहें है वह जल पैरों को स्पर्श न करे। सम्भव हो तो आप एक पात्र रख लीजिये ताकि जो जल आप अर्पण कर रहे है उसका स्पर्श आपके पैर से न हो पात्र में जमा जल को पुनः किसी पौधे में डाल दे। यदि सूर्य भगवान दिखाई नहीं दे रहे है तो कोई बात नहीं आप प्रतीक रूप में पूर्वाभिमुख होकर किसी ऐसे स्थान पर ही जल दे जो स्थान शुद्ध और पवित्र हो। जो रास्ता आने जाने का हो भूलकर भी वैसे स्थान पर अर्घ्य (जल अर्पण) नहीं करना चाहिए।

• सूर्य अर्घ्य मन्त्र •

ॐ सूर्य देव सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते।
अनुकंपये माम भक्त्या गृहणार्घ्यं दिवाकर:॥

ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय।
मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा :॥
ऊँ सूर्याय नमः। ऊँ घृणि सूर्याय नमः।

ऊं भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात॥

• छठ पूजा 2022 का प्रसाद •

छठ पूजा में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, इस दौरान छठी मैया को लड्डू, खीर, ठेकुआ, फल और कष्ठा जैसे व्यंजन के भोग लगाए जाते हैं। छठ पर कई प्रकार के पारंपरिक मिठाई भी बनाई जाती हैं। प्रसाद में लहसुन और प्याज का उपयोग नहीं किया जाता है।

जय सूर्य देव!

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — छठ महापर्व (सूर्योपासना का महापर्व) के महत्‍वपूर्ण तिथि व मुहूर्त, छठ पूजा विधि, छठ महापर्व पर अनुष्ठान मंत्र एवं विधि, सूर्य अर्घ्य देने की विधि, सूर्य अर्घ्य मन्त्र इत्यादि के बारे में विस्तार से बताया है। शास्त्रों में बताया गया है कि माता छठी भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं। साथ ही कई जगह इन्हें सूर्य देव की बहन के रूप में भी बताया गया है। माना जाता है कि माता छठी की उपासना करने से संतान को लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है। संतान प्राप्ति के लिए भी माता छठी की उपासना को बहुत कारगर माना गया है। छठ माता लोगों को समृद्धि, धन, बच्चे, सभी कुछ का आशीर्वाद देती है। वह हमारी सभी इच्छाओं को पूरा करती है और अपने भक्तों को आशीर्वाद देती है। लोगों का बहुत दृढ़ विश्वास है, इसीलिए हर साल वे इस अवसर को बहुत ईमानदारी से मनाते हैं। वह हमारे जीवन को आनंद और खुशी से भर देती है जो हम सभी को पसंद है।

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यह लेख (छठ महापर्व – सूर्योपासना का महापर्व।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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श्री लाल बहादुर शास्त्री जयंती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्री लाल बहादुर शास्त्री जयंती। ♦

श्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय उत्तर प्रदेश में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहां हुआ था उनकी माता का नाम राज दुलारी था। शास्त्री जी के पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। पिता के निधन के बाद उनकी परवरिश उनके नाना जी के यहां हुई, प्राथमिक शिक्षा उनकी वहीं हुई इसके बाद हरिश्चंद्र चंद्र हाई स्कूल की शिक्षा काशी विद्यापीठ में हुई।

काशी विद्यापीठ से शात्री की उपाधि मिलते ही अपने नाम से जाति सूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा के लिए हटा दिया और अपने नाम के आगे शास्त्री लगा लिया।

श्री लाल बहादुर शास्त्री ने नारा “करो या मरो” का नारा दिया इस नारे ने देश में प्रचंड क्रांति को जन्म दिया। उनका एक और नारा “जय जवान जय किसान” आज भी लोगों को याद है।

अंग्रेजो के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में श्री लाल बहादुर शास्त्री थोड़े समय के लिए (1921) में जेल गए रिहा होने पर राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय काशी विद्यापीठ वर्तमान में (महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ) में अध्ययन किया संस्कृत भाषा में स्नातक की शिक्षा के बाद भारतीय सेवा संघ से जुड़ गए। स्वतंत्रता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आंदोलनों में उनकी सक्रिय भूमिका निभाई। कई बार जेल भी गए। उसमें 1921 का असहयोग आंदोलन 1930 का दांडी मार्च और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उल्लेखनीय है।

1929 में इलाहाबाद आने के बाद टंडन जी के साथ भारत सेवक संघ की इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया नेहरू जी के साथ उनकी निकटता बढ़ी।

1961 में मंत्रिमंडल में गृहमंत्री का पद मिला, नेहरू जी के मरने के बाद शास्त्री जी 1964 में वह भारत के प्रधानमंत्री बने। पड़ोसी पाकिस्तान से युद्ध के दौरान दिखाई गई साहस के लिए बहुत प्रशंसा हुई।

श्री शास्त्री जी की मृत्यु 1966 में हुई उनके मरणोपरांत “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया। शास्त्री जी को उनकी सादगी और देशभक्ति के लिए आज भी पूरा देश श्रद्धा से नमन करता है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — श्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन, मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे। जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी माँ अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं। शास्त्री जी को उनकी सादगी और देशभक्ति के लिए आज भी पूरा देश श्रद्धा से नमन करता है।

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यह लेख (श्री लाल बहादुर शास्त्री जयंती।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा। ♦

“नवरात्र” शब्द से ‘नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध’ होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि ‘रात्रि’ शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। जैसे- नवदिन या शिवदिन। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते।

नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम नवरात्र को समझ लेते हैं। मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है- विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र मनाया जाता है। लेकिन, फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।

हालांकि आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। यहां तक कि सामान्य भक्त ही नहीं अपितु, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। आज कल बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं।

• वैज्ञानिक आधार •

नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है।

प्रेम से बोलो – जय माता दी! सारे मिलकर बोलो जय माता दी!

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

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यह लेख (माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मां दुर्गा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मां दुर्गा। ♦

पर्वत से आयेगी,
शेरों वाली मां,
रहमत बरसायेगी।

घर घर जयकारा है,
मां के उत्सव में,
हर्षित जग सारा है।

करते हैं हम वंदन,
जगदंबे तेरा,
हम माटी तुम चंदन।

दुर्गा अम्बे काली,
हे मां जगजननी,
हर ले विपदा सारी।

करती हूं मैं विनती,
करुणाकर मैया,
सुन लो सबके मन की।

दुख सारे हर लेगी,
संकट हरणी मां,
अब झोली भर देगी।

मैया अब तो आओ,
हलवा पूड़ी का,
तुम भोग लगा जाओ।

कृपा घर आयेगी,
मैया जो चाहे,
विपदा टल जायेगी‌।

जब चूनर लहरायी,
समझ गये सारे,
मां आयी मां आयी।

महिषासुर को मारा,
शेरा वाली ने,
भय से सबको तारा।

♦ वेदस्मृति ‘कृती‘ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती‘ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इन माहिया में नवरात्रि और मां दुर्गा की कृपा को बखूबी समझाने की कोशिश की है — आज हम बात कर रहे हैं हमारे देश के सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) द्वारा मनाये जाने वाले नवरात्रि त्यौहार की, इस त्यौहार को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। नवरात्रि में लोग 9 दिन व्रत रखते हैं और आखिरी दिन मां की पूजा करके नौ कन्याओं को भोजन कराते हैं। यह त्यौहार अलग-अलग जगह पर अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। काफी जगह इस दिन लोग गरबा और डांडिया भी खेलते हैं। यह त्यौहार असत्य पर सत्य की जीत को दर्शाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि साल में दो बार मनाया जाता है। नवरात्रि नौ दिनों के लिए निरंतर चलता है जिसमे देवी माँ के अलग-अलग स्वरूपों की लोग भक्ति और निष्ठा के साथ पूजा करते है। भारत में नवरात्रि अलग-अलग राज्यों में विभिन्न तरीको और विधियों के संग मनाई जाती है।

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यह माहिया (मां दुर्गा। ) ” वेदस्मृति ‘कृती‘ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई• आई• टी• शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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बारिश का सबसे अलग और अद्भुत रूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बारिश का सबसे अलग और अद्भुत रूप। ♦

सावन के आते ही सबको बारिश का सुहाना रूप याद आता है जो मन में छुपे हुए प्रेम के उदगार, विरह की तपिश, बचपन के लड़कपन को उजागर करता है। प्रकृति भी हर ओर से पुकार करती नजर आती है। सब जीवों के नव संचार के लिए ये धरती पर अवतरित होती है। पर इस सुहाने और जीवनदायी मौसम के पीछे एक शब्द का कड़वा सच छिपा है जो उच्चवर्ग को छोड़ बाकी हम सभी ने बहुत नजदीक से देखा है और इसके दुख भी सहा है।

बारिश के आते ही टप-टप टपकती बूंदों से तड़-तड़ की आवाज़ से तेज होना सबको अच्छा लगता है। क्योंकि प्यासी धरती की प्यास बुझती है और सारी हरी-भरी वनस्पति नहाई हुई अति सुंदर लगती है, पर जब यही बरसना लगातार दो या तीन दिन हो तो आम आदमी के लिए ये बाहर तो क्या घर में ही एक माहौल ले आता है जब दिन-रात इसकी आहट से ही दिल घबराहट से भर जाता है जी।

और जब ये आता है तो अकेले बिल्कुल नही आता साथ में अपने परिवार को ले आता है जैसे कई पीढ़ियों का आगमन हम सब के घर में हो गया।

अब तो आप सभी को उसकी आहट आ ही गयी होगी। जी बिल्कुल सही पहचान गए आप सभी। क्योंकि हम सभी इसके दुख से भली-भांति परिचित है। क्योंकि हमारी चैन की नींद को न जाने कितनी बार इसने खराब किया है। कितनी बार इस टपके ने हमारे बाहर पहनने के कपड़ों पर भी बदनुमा दाग दिया।

कितनी बार इससे बचने के लिए रसोई के सारे छोटे-बड़े बर्तन कमरे में आये।कितनी बार इसने भरी बारिश में हम छत पर चढ़ाए।

एक बार तो ऐसा भी वर्ष आया था जब इतनी बारिश हुई कि कच्ची पक्की छतों ने सबने एक सुर में ही टपकना शुरू कर दिया था। अब तो सभी ने इस टपके का दर्द महसूस किया।

इस टपके का दर्द किसी भी दुख से बड़ा।
इसका आना तो ऐसे लगे जैसे कोई डंडा लेकर पीछे हो पड़ा॥

लगातार बारिश का ये रूप अनोखा और घर के अंदर ही दुख ऐसा देने वाला जो हर वर्ष बारिश के आने से पहले स्वतः ही अपना रूप दिखा जाता है। एक बात तो बारिश का हर रूप अपने आप में ही अलग ही है।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सावन की बारिश जब भी आती सब तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ ले आती। सावन के आते ही सबको बारिश का सुहाना रूप याद आता है जो मन में छुपे हुए प्रेम के उदगार, विरह की तपिश, बचपन के लड़कपन को उजागर करता है। प्रकृति भी हर ओर से पुकार करती नजर आती है। सब जीवों के नव संचार के लिए ये धरती पर अवतरित होती है। पर इस सुहाने और जीवनदायी मौसम के पीछे एक शब्द का कड़वा सच छिपा है जो उच्चवर्ग को छोड़ बाकी हम सभी ने बहुत नजदीक से देखा है और इसके दुख भी सहा है। बारिश के आते ही टप-टप टपकती बूंदों से तड़-तड़ की आवाज़ से तेज होना सबको अच्छा लगता है। पर जब यही बरसना लगातार दो या तीन दिन हो तो आम आदमी के लिए ये बाहर तो क्या घर में ही एक माहौल ले आता है जब दिन-रात इसकी आहट से ही दिल घबराहट से भर जाता है जी।

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यह लेख (बारिश का सबसे अलग और अद्भुत रूप।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी। ♦

गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा।

भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

अब वे व्यापारी से यहां के सरकारी हुक्काम बन बैठे। जब भारत के रियासती शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता को भी अंग्रेजी चाल का पता चला कि ये तो हमे उकसाने का और लड़ाने का काम कर रहे हैं और अपना सम्राज्य स्थापित कर रहे हैं, तो तब अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए भारतीय शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता के जागरूक तबके ने भी आजादी की जंग मिलकर अंग्रेजी शासन व्यवस्था के खिलाफ छेड़ दी।

फिर वह चाहे 1857के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बात हो या फिर असेंबली हाल के बम्ब विस्फोट की घटना। चाहे फिर आजाद हिन्द फौज की स्थापना की बात हो या फिर भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम। इन सभी प्रक्रियाओं में एक लम्बा वक्त जरूर लगा पर यह भी सत्य है कि यही वे घटनाक्रम थे, जिनकी बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं और “आजादी का अमृत महोत्सव” उत्सव मना रहे हैं।

यह भी सच है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इस महा अभियान में गर्म दल और नर्म दल दोनों ने अपनी – अपनी भूमिकाएं अपने – अपने तरीके से निभाई। पर न जाने आज “आजादी के 75साल” बीत जाने के बाद हम क्यों उन तमाम वीर शहीद बहादुरों को भूल से जा रहे हैं, जिन्होंने हमे यह आजादी की सौगात दिलाने में अंग्रेजी हुकूमत की कड़ी यातनाओं के साथ – साथ अपने प्राणों की आहुति भी खुशी – खुशी दी। यदि आज हम औपचारिकता के तौर पर विशेष अवसरों के मौकों पर चन्द स्वतंत्रता सेनानियों को और आजादी के प्रमुख नेताओं को याद करते भी हैं तो उसमें भी एक अधूरा सा पन मुझे नजर आता है।

मैं सोचता हूं कि क्या मात्र इन चन्द कद्दावर नेताओं या स्वतंत्रता सेनानियों ने ही भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई? यदि ऐसा ही था तो फिर भारत इतने लम्बे दौर तक गुलाम क्यों रहा? क्यों फिर रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान ही भारत आजाद नहीं हुआ? ऐसे अनगिनत सवाल बुद्धि के विवेक कक्ष में उठते हैं और दौड़ते रहते हैं।

यह सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़(पहाड़) नहीं फोड़ता। पर फिर भी पूरी मुहिम का अधिकाश श्रेय उस मुहिम के मुख्य पत्र को जाता है और जाना भी चाहिए, क्योंकि उसने उस मुहिम को शुरू किया होता है तथा बाकियों को चेतना दे कर उस मुहिम में शामिल किया होता है। परन्तु मेरे मन में फिर से एक प्रश्न कौंधता है कि ठीक है, मुख्य पत्र को श्रेय दो। परन्तु उस मुहिम को सफल बनाने में अपना योगदान देने वाले अनेकों साथियों को भी तो उस सन्दर्भ में याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने उस मुहिम को कामयाब बनाया होता है। पर नहीं, यह एक परिपाटी सी बन गई है और निरन्तर चली आ रही है कि मुख्य पात्र को ही याद किया जाता है और बाकियों को समय के गहवर में बिसार दिया जाता है।

कुछ ऐसा ही आजादी के आंदोलन की घटना में भी देखने को मिलता है। जो लोग इस मुहिम के नायक थे या यूं कहो कि रसूखदार व्यक्तित्व थे, उन्हे तो आज भी हम याद करते हैं और उनके नाम के कसीदे गढ़ते हैं। पर जिन्होंने जमीनी स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम को गति दी और अंजाम दिया, उन्हे इतिहास के पन्नों में स्थान तक नहीं दिया गया।

यह बात ठीक है कि प्रभावशाली व्यक्तित्वों का जिक्र विशेष रूप से होना चाहिए।परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फिर बाकियों को बिल्कुल भूल ही जाएं।यह तो उनके साथ न्याय नहीं है और इसके साथ – साथ यह रवैया नई पीढ़ी में भी नकारात्मकता भरता है कि “करता कोई और है और वाहवाही किसी और को ही मिलती है।” मेरा मानना है कि जिसका जो मान – सम्मान बनता है, वह उसे मिलना चाहिए। तभी किसी कार्य या बात का उत्कर्ष बना रहता है। वरना नकारात्मकता स्वभाविक है।

आज आजादी के अमृत महोत्सव के सुअवसर पर यह बात मैं इसलिए कर रहा हूं कि हम सब मिलकर इस बात का मन्थन करे कि इस आजादी को दिलाने में अपना योगदान और बलिदान देने वाले ऐसे कितने स्वतंत्रता सेनानी थे, जो हमारे क्षेत्र या जिले के थे पर इतिहास के पन्नों में उनका नाम न होने के कारण आज समाज उन्हें और उनके बलिदानों को थोड़ा सा भी नहीं जानता। यदि थोड़ा बहुत कुछ कोई जानता भी है तो वह भी गौण है।

मेरे जिला मण्डी हिमाचल प्रदेश से ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में अपना योगदान तो दिया पर उन्हें इतिहास में या लोक साहित्य में वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था। हां कृष्ण कुमार नूतन और डा गंगा राम राजी ने अपने साहित्य में कुछ – कुछ जिक्र इन स्वतंत्रता सेनानियों का जरूर किया है पर उससे शायद इन्हें वह सम्मान मिला हो, जिसके ये हकदार हैं। इन स्वतंत्रता सेनानियों में कुछ की जानकारी जो मैं जुटा पाया हूं, कुछ यूं है :—

• रानी खैरागढ़ी उर्फ रानी ललिता कुमारी •

रानी खैरागढ़ी का नाम जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रगण्य है। असल में इनका नाम रानी ललिता कुमारी था। परन्तु इनका पैतृक घर खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में था, जहां से इनका विवाह जिला मण्डी के प्रथम पढ़े लिखे राजा भवानी सेन से हुआ था। शायद तत्कालीन पहाड़ी रिवायत के चलते मण्डी जनपद के लोगों ने रानी का नाम उनके मायके के नाम के आधार पर खैरीगढ़ी रख दिया हो। क्योंकि पहाड़ों में उस दौर औरतों को उनके असली नाम से हट कर उनके पैतृक गांव के आधार पर रखे नाम से ही पुकारा जाता था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि रानी के राष्ट्र प्रेम से प्रभावित होकर जनता उन्हे प्यार से रानी खैरीगढी कहते और यही नाम मशूहर हो गया। जबकि रानी के पिता के गांव का नाम खैरागढ़ था तो उस आधार से नाम तो खैरागढी बनता था। पर जनता ने खैरीगढ़ी रख दिया तो वही प्रसिद्ध हुआ।

जानकारों की माने तो राजा भवानी सेन मण्डी का पहला पढ़ा लिखा राजा हुआ। इस कारण उनके लिए एक पढ़ी लिखी रानी के रिश्ते की तलाश की गई। चारों ओर जब खोजबीन शुरू हुई तो एक उचित रिश्ता खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में जा कर रानी ललिता कुमारी का मिला। राजा की रानी से शादी हो गई। उत्तर प्रदेश में उन दिनों अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावतें चर्म पर थी। तो जाहिर है कि कुमारी ललिता भी पढ़ी लिखी सजग नारी होने के नाते उन बगावती सुरों में ताल देने में अहम किरदार रही होगी। रानी का यह चस्का विवाह के बाद भी कम नहीं हुआ। जब उसने देखा की मण्डी रियासत की जनता के साथ न्याय नहीं हो रहा है। वे अंग्रेजी शासन व्यवस्था के चंगुल में कोल्हू के बैल की तरह परेशान है और राजा तथा राजा के मंत्री भी जनता का शोषण ही कर रहे हैं।

उन्हे जनता के सुख – दुःख की चिन्ता ही नहीं है और राजा जनता से कट कर अपने ही रसूख में जी रहा है। तब रानी ने जनकल्याण और देश प्रेम की भावना राज्य की जनता में भरना शुरू की। यह खबर राजा को अंग्रेजों ने और राजा के चाटुकार मंत्रियों ने गुप्त रूप से देना शुरू कर दी थी और राजा को रानी के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया था। राजा मंत्रियों और अंग्रेजों की बातों में आ कर रानी से विमुख होता रहा। नौबत यहां तक आ गई कि रानी को राजा के प्रेम से वंचित रहना पड़ा। परन्तु रानी ने हार नहीं मानी। वह जनता की सेवा में लगी रही और उनमें राष्ट्र प्रेम की आग जलाती रही। जब रानी को लगा कि राजा उसकी बाते नहीं मानेगा तो वह स्वयं राज्य का कामकाज देखने लगी। परन्तु वहां भी मंत्रियों ने रानी के आदेशों की पालना को नकारना शुरू किया।

तब रानी को लगा कि व्यक्तिगत सुखों से कहीं ज्यादा बड़ा सुख जन सामूहिक सुख है। एक राज घराने का प्रमुख कर्तव्य भी वही होता है। रानी की यह सोच उसके अविवाहित जीवन के बगावती तेवरों को और ताव देती है तथा रानी इस पहाड़ी रियासत में आजादी के आंदोलन की प्रमुख पैरोकार बनी। अब उसे अपने जैसे कुछ और ऐसे सरफीरों की तलाश थी, जिनके भीतर भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ रानी की ही तरह बगावती आग जल रही थी। इतना ही नहीं, कुछ जानकारों का तो कहना है कि परिस्थितियां तो यहां तक बिगड़ गई थी कि रानी को इस सन्दर्भ में राजा भवानी सेन से भी दो – दो हाथ करने पड़े थे। यानी पहाड़ी रियासतों में रानी खैरागड़ी ने झांसी की रानी की भूमिका निभाई।

• भाई हिरदा राम •

इनका नाम मण्डी रियासत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुखता से लिया जाता है। इनका जन्म 28 नवम्बर 1885 को मण्डी शहर में श्री गज्जन सिंह जी के घर हुआ था। लोगों में इनको भाई के नाम से प्रसिद्धी मिली थी। स्वामी कृष्णानंद जी से प्रेरणा ले कर ये क्रांति पथ पर चल पड़े थे। सन 1914 में ये अमृतसर में रासबिहारी बोस, डा• मथरा सिंह, भाई परमानंद तथा पिंगले आदि क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए। धीरे – धीरे ये रासबिहारी बोस के विश्वास पात्र बने।

31 दिसम्बर 1914 की विरपाली धर्मशाला में हुई क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक में इन्हें बंब बनाने का काम दिया गया। यह बात भी खासी चर्चा में है कि भगत सिंह जी ने जो बंब असैम्बली हाल में फैंका था, वह भाई हिरदा राम ने बनाया था। इन्हे इस संघर्ष में अंग्रेजी सरकार द्वारा असैम्बली बंब धमाके की साजिश में पकड़े जाने पर फांसी की सजा सुनाई गई, परन्तु बाद में वह सजा आजीवन कारावास की सजा में बदली गई। आजीवन कारावास की सजा पाने के लिए इन्हें काला पानी यानी अंडोमान की जेल में भेजा गया। वहां पर वीर सावरकर और भाई हिरदा राम एक ही कोठरी में रखे गए थे।

सन 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो भाई जी को जेल से मुक्ति मिली। इस तरह अपने जीवन को राष्ट्र सेवा में समर्पित करते हुए 21अगस्त 1965 ई० को भाई जी पंच तत्त्व में विलीन हो गए। इनकी यादगार में आज मण्डी शहर के बीचो बीच बनी इन्दिरा मार्केट में एक प्रतिमा बनाई गई है, जिसका अनावरण 21अगस्त 2002 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल जी ने तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री भारत सरकार एवम पूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश श्री शांता कुमार जी के साथ मिल कर किया था। इस अवसर पर सांसद सुरेश चंदेल, महेश्वर सिंह और अनिल शर्मा जी भी मौजूद रहे।

• कृष्णा नन्द स्वामी •

स्वामी जी मण्डी शहर के निवासी थे। इनके स्वतंत्रता आन्दोलन का क्षेत्र सिंध प्रांत रहा। इनकी सारी गतिविधियां सिंध से ही चलती थी। स्वामी जी ने 35 वर्षों के अपने स्वतंत्रता संघर्ष में कई बार जेल की सजा भुगती। यही वे कारण थे, जिनके चलते सरदार पटेल ने इन्हे सिंध के गांधी की उपाधि दी थी। इन्होंने दो लाख से भी अधिक हिंदुओं को समुद्र के रास्ते सिंध से मुम्बई और अहमदाबाद पहुंचाया था।

इनकी जेल यातनाओं में 1921-22 में पिकेटिंग के लिए धारा 132 के अधीन एक वर्ष का कारावास, खुलेआम भाषण के लिए धारा 108 सी.पी. सी. के अधीन अक्टूबर 1922 से सितम्बर 1923 तक एक वर्ष का कारावास, सी. पी. सी.की धारा 177 के तहत 1930 से 1931 तक एक वर्ष का कारावास, 1932 से 1934 तक दो साल का कारावास तथा भारत छोड़ो आन्दोलन में 1942 से1945 तक तीन साल का कारावास गिना जाता है। भाई हिरदा राम जी ने भी स्वामी जी से ही क्रान्ति की प्रेरणा पाई थी।

• अर्जुन सिंह राणा •

अर्जुन सिंह राणा जी का जन्म 30 मई 1920 को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान में हुआ। राणा जी एक पढ़े – लिखे व्यक्ति थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में बढ़-चढ़कर के भाग लिया। 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी, उस फौज में राणा जी ने कैप्टन के पद पर अपनी सेवाएं दी थी। राणा जी ने एक वर्ष तक का कारावास भी भोगा। इनका संबंध हिमाचल प्रदेश स्वतंत्रता सेनानी संगठन से भी रहा।

• केशव चंद्र शर्मा •

केशव चन्द्र शर्मा जी जिला मण्डी के रिवालसर नामक स्थान में रियूर नामक ग्राम के निवासी थे। 1944 में शर्मा जी प्रजामंडल की गतिविधियों में शामिल हुए थे। इतना ही नहीं ये नौकरी करते थे परंतु आंदोलन का सहयोग करने के लिए इन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। रियासती विलय आंदोलन में शर्मा जी ने भी भरपूर संघर्ष किया था। शर्मा जी ने 4 माह 10 दिन तक मंडी जेल में सजा भी काटी थी।

• खेम चंद •

खेम चंद जी का जन्म लगभग 1904 ई० के आस पास हुआ माना जाता है। इनके पिता का नाम श्री बृज लाल था। इनका जन्म स्थान जिला मंडी के मंडी शहर में भूतनाथ नामक स्थान पर हुआ था। इन्होंने अपने पिता के साथ जलावतन रहने से देशभक्ति की भावना प्राप्त की थी। मंडी राज्य में प्रजामंडल आंदोलन में खेम चंद जी ने अपनी सक्रिय भूमिका अदा की थी। इस दौरान इन्हें मुंशी की नौकरी से भी निष्कासित कर दिया गया था। सन 1936 – 37 में खेम चंद जी ने मंडी सत्याग्रह में भी अपनी भागीदारी प्रदान करके आजादी के संघर्ष में अपना योगदान दिया था।खेम चंद जी का स्वर्गवास 3 जुलाई 1982 ई० को हुआ।

• गुलजारी राम •

गुलजारी राम जी का जन्म 10 अगस्त 1915 ई० में जिला मंडी के सरका घाट इलाके में भदरोट नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री टोडर था। आजाद हिंद फौज में इन्होंने बतौर सैनिक काम किया। गुलजारी राम जी दिसंबर 1940 से मई 1946 तक सिंगापुर, रंगून और मलाया आदि स्थानों में लंबे कारावास में भी रहे। इन्हें बिना वेतन के निष्कासित कर दिया गया था और पांच वर्ष तक युद्ध बंदी बनाकर इन्हें कठिन से भी कठिन यातनाएं दी गई थी।

• गौरी प्रसाद •

गौरी प्रसाद जी का जन्म 18 अक्टूबर 1918 ई० को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान पर हुआ था। प्रसाद जी लाहौर से मेडिसिन में डिग्री लेकर आए थे। उन दिनों लाहौर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था इसलिए प्रसाद जी ने वहीं से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की प्रेरणा प्राप्त की थी।

इस आंदोलन में कूदकर गौरी प्रसाद जी ने अपना बढ़-चढ़कर योगदान दिया। जब वहां से लौटकर वे मंडी आए तो उन्होंने 1940 में मंडी प्रजामंडल में प्रवेश किया। 1940 से लेकर 1947 ई॰ तक प्रजामंडल के प्रधान रहे। इसी दौरान उन्हें 6 मार्च की जेल की सजा भी खानी पड़ी थी। सन 1951 में प्रसाद जी को विधानसभा का सदस्य चुना गया था। प्रसाद जी का योगदान अनेक संस्थानों एवं गतिविधियों में निरंतर रहता था।

• जे पी बागी •

बागी जी का जन्म 15 जुलाई 1908 ई० को स्कूल बाजार जिला मंडी में हुआ माना जाता है। अंग्रेजो के खिलाफ हमेशा बगावती तेवर रखने वाले जे पी बागी को यह बागी नाम इसी कारण प्राप्त हुआ था। 1928 से 1934 तक लाहौर जेल में लाहौर षड्यंत्र के जुर्म में उन्हे 6 साल तक के कारावास की सजा भी हुई थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और 1947 तक 2 वर्ष 6 माह कारावास में रहे। कुल साढ़े ग्यारह वर्ष तक जेल यात्रा में रहे। भारत सरकार ने इन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया था।

• नरेंद्र पाल जोशी •

नरेंद्र जी जिला मंडी के लूनापानी के निवासी थे। 15 मई 1892 में उनका जन्म हुआ था। इन्होंने 1912 में एक अंग्रेज की हत्या की थी। यही इनका स्वाधीनता संग्राम में प्रवेश होने का प्रथम सोपान था। इन्होंने शादी नहीं की थी। 1918 में सूरत के जंगलों में पुलिस मुठभेड़ में इन्हें गोली लगी थी। जलियावाला बाग कांड के बाद अंग्रेजों का विरोध करते हुए पकड़े गए और पांच साल तक जेल में ही रहे। 1942 में जब जेल से रिहाई हुई तो पुनः संघर्ष में जुट गए। रावलपिंडी बम विस्फोट में 3 वर्ष का कारावास हुआ। 1928 में अंग्रेजों ने इन्हे पुनः गिरफ्तार कर लिया। 1932 में हिसार में 1 वर्ष का कारावास और काटा। सन 1934 में पुनः 3 वर्ष की सजा हुई। 1936 के बाद आर्य प्रतिनिधि सभा में कार्य कियाl इसके बाद वे लूनापानी में स्थाई रूप से रहने लगे थे।

• बुद्ध भाट •

भाट जी जिला मंडी की तत्कालीन सुकेत रियासत के सुंदर नगर पुराना बाजार में रहते थे। इनकी भागीदारी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से रही। इन्होंने कई वर्षों तक कठिन सजा भी काटी। सुकेत रियासत के विरुद्ध क्रांति तथा षड्यंत्र के झूठे आरोप में अभियोग तथा लंबे समय के लिए कारावास की यातनाएं भाट जी ने सही। सुकेत रियासत की जेल तथा पंजाब जेल में ग्यारह मास, जालन्धर में छः मास, रायपुर में दस मास, मुल्तान में आठ मास, रावलपिंडी में दस मास तथा शिमला में एक मास तक कारावास काटा।

• सन्त सिंह आजाद •

सन्त सिंह जी का जन्म 1914 में कटोह नामक गांव में समराला में हुआ था। जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज खड़ी की तो सन्त सिंह आजाद जी भी नेता जी के आवाह्न पर उनकी फौज में लेफ्टिनेंट के पद पर शामिल हुए। आजाद हिन्द फौज का हिस्सा होने के नाते ही इन्होंने अपने नाम के साथ आजाद शब्द जोड़ दिया था।

सन्त सिंह आजाद ने नवम्बर 1943 में मांडला में “दिल्ली चलो” का नारा बुलन्द किया था तथा 1944 में दलेल नामक स्थान पर अंग्रेजों पर हमला किया था। इसी साल वे दीमापुर चले गए थे और वहां पर एक हमले के दौरान जख्मी हो गए थे।इसके बाद अंग्रेज सेना द्वारा गिरफ्तार किए गए।

17 अप्रैल 1946 को मण्डी पहुंच कर प्रजामंडल के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया। सन 1947 में पुनः तीन मास के लिए मण्डी की जेल में कारावास काटा। सत्याग्रह आन्दोलन में शामिल होने के कारण बिलासपुर के राजा द्वारा बन्दी बना लिए गए तथा जेल में भारी मार पीट उनके साथ की गई थी। वहां से छूटने पर पुनः सत्याग्रह आन्दोलन में सक्रियता से जुट गए। भारत सरकार ने इन्हे 1972 में ताम्रपत्र से सम्मानित किया।

• कुछ नायक ऐसे भी •

कुछ नायक ऐसे भी थे जिन्होंने अपने परिवार की कोई परवाह न करते हुए देश से अंग्रेजों को खदेड़ने के कार्य में रात दिन एक कर दिया। मण्डी एक ऐसा जिला रहा है, जहां से बहुतेरे स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं। इतना ही नहीं इन स्वतंत्रता प्रेमियों को राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता था और मण्डी का नाम राष्ट्रीय फलक पर अंकित कर राष्ट्र की आजादी में अपना अहम योगदान दिया। इसी प्रकार के अनेकों रणबांकुरों ने अपने घर परिवार की परवाह छोड़ कर देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया। परंतु उन्हें समय के प्रवाह में जमाने ने भूला दिया। वे सब उनके योगदान के अनुसार न ही तो आज याद किए जाते हैं और न ही उन्हें इतिहास के पन्नों में जगह मिली। यह दशा अपने आप में एक गम्भीर विडम्बना है। यही वे कारण है, जिनके चलते समाज में कोई भी किसी कुव्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो कर अपना बलिदान नहीं देना चाहता। क्योंकि हमें समाज की काम निकल जाने के बाद भूल जाने की आदत पता है। इसलिए हम भी अपनी सुख सुविधा का उपभोग करते हुए व्यवस्था के साथ हो जाते हैं। जबकि हम सब जानते हैं कि यहां बहुत गलत हो रहा है।

अतः आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं। गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा। भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

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यह लेख (आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिंदी भाषा और लिपि।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिंदी भाषा और लिपि। ♦

विधा — आलेख।

विश्व की प्राचीन समृद्ध, सरल भाषा होने के साथ-साथ हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा भी है। वह दुनिया में हमें सम्मान भी दिलाती है, हिंदी ने हमें विश्व में एक नई पहचान दिलाई है। हिंदी दिवस भारत में हर वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाता है भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया – कि हिंदी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी इस निर्णय को प्रतिपादित महत्व देते हुए हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर सन 1953 से संपूर्ण भारत में हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

हिंदी भाषा विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली दूसरी भाषा है। हिंदी राजभाषा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पसंद किया जाने लगा है। इसका एक कारण यह भी है भारतवर्ष की संस्कृति और संस्कारों का प्रतिबिंबित देश है।

आज विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थी भारतीय संस्कृति और भाषा को सीखने के लिए आते हैं। भारत जब अंग्रेजों के अधीन था तब भी देश के महामानव और महान नेताओं ने एक राज्य भाषा की आवश्यकता को समझा। उन्होंने आजादी के साथ-साथ हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण कार्य किये। राष्ट्रभाषा हिंदी को राज भाषा की उपाधि दी है, उन्होंने कहा “राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा होता है” प्रत्येक राष्ट्र की अपनी राष्ट्रभाषा होती है।

राष्ट्रभाषा के जरिए ही हम राष्ट्र की एकता भाईचारे, सौहार्द, सद्भावना जैसे गुण, नागरिक में कर्तव्य का विकास करने में सहायक होता है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान सभा ने हिंदी भाषा को देश की राजभाषा के रूप में सावधानिक मर्यादा प्रदान की है।

हिंदी दिवस को बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा आज कई रूपों में इस कार्यक्रम को मनाने का सिलसिला जारी है। खासकर सरकार के सभी कार्यालय उपक्रमों, निगमों, संस्थानों में यह दिवस बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।

बैंक, रेलवे, तेल कंपनी सरकारी दफ्तर आदि संस्थानों में हिंदी दिवस पर विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित होती है। भाषण में बड़े-बड़े महानुभावों को आमंत्रित किया जाता है, हिंदी में काम करने वाले कर्मचारियों को पुरस्कार भी दिया जाता है। सरकारी क्षेत्रों में हिंदी को बढ़ावा देने हेतु पूरे सितंबर महीने तक अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदी भाषा के विकास में प्राप्त उपलब्धि को स्मरण किया जाता है।

पूरे भारतवर्ष में हिंदी सर्वाधिक बोली जाती है देश की 80% जनता हिंदी भाषा समझ सकती है। तथा अपने विचार को प्रकट कर सकती है, हिंदी भाषा सहज और सरल है इसे संस्कृत की भगनी भी कहा जाता है। हिंदी भाषा में प्रादेशिक भाषाओं का भी उपयोग किया जाता है। हिंदी भाषा देवनागरी लिपि है, पंजाबी, उड़िया, गुजराती, राजस्थानी आज कई भाषाओं के शब्द देखने को मिलते हैं। सभी भारतवासी को हिंदी भाषा पर गर्व है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हिंदी ने हमें एक नई पहचान दिलाई है, यह संपूर्ण विश्व में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में से एक है। हिंदी विश्व की सबसे प्राचीन, सरल और समृद्ध भाषाओं में से एक है। हिंदी संवैधानिक तौर पर राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई, लेकिन हम भारतीय हिंदी को ही अपनी राष्ट्रभाषा मानते हैं। पूरे भारतवर्ष में हिंदी सर्वाधिक बोली जाती है देश की 80% जनता हिंदी भाषा समझ सकती है। तथा अपने विचार को प्रकट कर सकती है, हिंदी भाषा सहज और सरल है इसे संस्कृत की भगनी भी कहा जाता है। हिंदी भाषा में प्रादेशिक भाषाओं का भी उपयोग किया जाता है। हिंदी भाषा देवनागरी लिपि है, पंजाबी, उड़िया, गुजराती, राजस्थानी आज कई भाषाओं के शब्द देखने को मिलते हैं। सभी भारतवासी को हिंदी भाषा पर गर्व है।

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यह लेख (हिंदी भाषा और लिपि।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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गुरु गुण और शिक्षा प्रणाली।

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♦ गुरु, गुण और शिक्षा प्रणाली। ♦

गुरु बिन गुण असम्भव।

गुरु शब्द अपने आप में एक पूर्ण शब्द है जो मानवता के कल्याण एवं उत्थान के लिए एक सर्वोपरि दायित्व है। भारतीय शिक्षा जगत में जहां गुरु पद की महिमा को विभिन्न उपाधियों से अलंकृत किया है वहीं अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी गुरु के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।

प्राचीनतम इतिहास में यदि हम देखें तो गुरु अध्यात्म विद्या से संबंधित ज्ञान को देने वाले एक विशिष्ट धर्मात्मा को कहा जाता था। लेकिन कालांतर में व्यवस्था बदलती गई और गुरु का वह स्थान वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शिक्षक ने दे दिया है। जिसे आमतौर पर अध्यापक भी कहा जाता है।

• गुरुकुल शिक्षा प्रणाली •

यह भी एक पूर्ण सत्य है कि पुरातन समय में गुरु गुरुकुल व्यवस्था को संचालित करता था और वह उस कार्य के लिए किसी राज्य सरकार से कोई वेतन विशेष नहीं बल्कि अनुग्रहित अंशदान प्राप्त जरूर करता था।

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली जहां सामाजिक निर्माण के साथ-साथ मानसिक निर्माण का बीड़ा उठाती थी वही वह अध्यात्म विद्या के साथ – साथ चरित्र निर्माण का बोध कराने वाली शिक्षा का भी प्रावधान करती थी। मानसिक, बौद्धिक, काल्पनिक, आध्यात्मिक, चारित्रिक और राष्ट्र निर्माण के साथ-साथ आत्मा सुरक्षा और राष्ट्र सुरक्षा के भावों से ओतप्रोत शिक्षा प्रणाली में निरंतर भारतवर्ष में दी जाती रही।

यहां इस बात को स्पष्ट करना अति आवश्यक हो जाता है कि इस प्रणाली में गुरु का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव था, वह अपने आप में महत्वपूर्ण था। मानव के भीतर मानवता, इंसान के भीतर इंसानियत, हुकमाराम के भीतर हुकूमत और आवाम के भीतर राज भक्ति और राष्ट्रभक्ति की भावना अगर कोई भरता था तो वह गुरु ही होता था।

इन सभी गुणों के साथ – साथ अध्यात्म का परम लक्ष्य युक्त भावबोध अपने शिष्यों के अंदर जागृत करना इन गुरुओं का परम कर्तव्य और दायित्व होता था। इस दायित्व का निर्वहन करने के लिए ये गुरु लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। शायद यही वह कारण था जिस कारण से वे गुरु के पद पर विराजमान थे और समाज इन्हें आदर की दृष्टि से पूर्ण सम्मान के साथ देखता था।

• वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली •

वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली में जो मैकाले शिक्षा पद्धति चली। उसमें गुरुकुल व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया तथा उसके स्थान पर स्कूल शिक्षा प्रणाली को लागू किया गया। स्कूलों में अध्यापक प्रतिनियुक्त किए गए। इससे धीरे-धीरे गुरु पद की मर्यादा और गरिमा हीन होती गई। इसके पीछे अध्यापकों का वेतन भोगी होना भी एक कारण हो सकता है और उसके साथ – साथ समाज का पाश्चात्य शैक्षिक रवैया भी एक कारण हो सकता है।

• भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा •

परंतु इस सत्य को किसी भी तरह से नहीं चलाया जा सकता कि मनुष्य के जीवन में गुरु के बिना गुणों का प्रादुर्भाव संभव ही नहीं है। यही वह कारण है जिसके चलते भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा दिया गया और उसके पश्चात तो निरंतर हमारे जीवन में कई गुरु विभिन्न क्षेत्रों में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

इस बात का स्पष्ट उदाहरण भारतीय पौराणिक आख्यानों में दत्तात्रेय के जीवन चरित्र से हमारे सामने आता है। गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और सहजता ही इन गुणों को ग्रहण करने का एक मुख्य माध्यम होता है।

परंतु बड़े खेद की बात है कि आज के वर्तमान समाज में इन्हीं सब प्रारंभिक भावों का ही मनुष्य में पतन होता जा रहा है। गुरु शब्द का एक अर्थ बड़ा भी होता है। अर्थात अपने घर के, परिवार के और समाज के बड़ों के प्रति आदर, सम्मान, श्रद्धा और विश्वास रखना ही हम सब लोगों का दायित्व बनता है और वही दायित्व एक सद चरित्र व संतुलित – पुष्ट समाज का निर्माण करता है।

• बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है •

विडंबना यह है कि आज अपने बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है परंतु जो शिक्षक हमारी तोतली आवाज को सुधार कर एक पहलवानी का रूप प्रदान करता है और समाज को दशा और दिशा देता है। “छोटे से लेकर बड़े हो दीदार तक की मानस पटल को निखार करो” उसे देश और समाज का संचालन करने के लिए योग्य बनाता है। उसी गुरु के प्रति निरंतर श्रद्धा भाव घटता जा रहा है। शायद यही वह कारण है कि आज समाज में अनायास मानवीय घटनाएं हो रही है। अप्रिय वातावरण बढ़ता जा रहा है। चरित्र हीनता बढ़ती जा रही है। भ्रष्टाचार और लूट घसीट बढ़ती जा रही है।

मैं यह कतई नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह से समाज ही जिम्मेवार है। मैं यह भी नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह राजनेता और सरकारें ही जिम्मेवार है। हां इतना जरूर कहना चाहूंगा जो सरकार सत्ता में रह करके शिक्षकों के मान-सम्मान के प्रति इस समाज को जागृत करने का काम करेगी और शिक्षक वर्गों को चरित्रवान समाज के निर्माण के लिए प्रोत्साहित करेगी तथा शिक्षा प्रणाली में वह वातावरण तैयार करेगी। वह सरकार वास्तव में अपने दायित्व का पालन करने वाली राजनीतिक शक्ति कहलाएगी और इतिहास के पन्नों में अपना नया अध्याय अंकित करेगी।

ठीक इसी तरह समाज को भी अपने दायित्व का निर्वहन करने के लिए गुरु की मर्यादा का सम्मान करने वाले भावबोध को पुनः अपने भीतर जागृत करना होगा तथा सेवा, सत्कार और सत्संग जैसी महत्वपूर्ण गुणों को अपने भीतर पुनः समाहित करना होगा।

परंतु इस बात से भी मैं कभी गुरेज नहीं करता इसके लिए एक सद चरित्रवान गुरु का होना भी अनिवार्य है।

“आज के वर्तमान वातावरण में गुरु ने भी अपना चरित्र इस कारण से बिगाड़ दिया है, क्योंकि वह अपने आप को एक शिक्षक मान बैठा है। मैं यहां स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूंगा कि मैकाले की जो मंशा थी। आज पूरे शिक्षक वर्ग को उस मंशा से बाहर निकलने की जरूरत है।”

• राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में •

भले ही हम वेतनभोगी हो। परंतु राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने।

हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है।

भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने। हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है। भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

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यह लेख (गुरु, गुण और शिक्षा प्रणाली।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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दोहरी मानसिकता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दोहरी मानसिकता। ♦

आज के युग में एक ऐसी दोहरी मानसिकता ने बहुत इंसानों के दिल में इस प्रकार से घर कर लिया है ऐसा लगता है मानों ये इसी प्रकार से इस धरती पर जन्में हो, और ये प्रवृति इंसान समय मिलते ही दिखाने लगते हैं। इसका जीता जागता उदाहरण हमें अपने बच्चों के मुख से भी सुनने को मिल जाता है जब वो बोलते है कि मेरा भाई प्राइवेट स्कूल में है और हम बहनें सरकारी स्कूल में।

जब अभिभावक-अध्यापक मीटिंग में उनसे इस बारें में कोई चर्चा होती है तो वो हँसते हुए इस बात को कहते है कि जी एक लड़का है इसलिए वहाँ पर पढ़ा रहें हैं और जब हम पूछते है कि आपकी बेटियों की पढ़ाई यहाँ पर कैसी है तब वो कहते हैं कि बहुत अच्छी पढ़ाई होती है यहाँ भी। आजकल तो सरकारी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई होती है। कई बार तो वो तुलनात्मक स्थिति में ये भी कह देते है कि बेटियाँ अच्छा काम कर रही है।

फिर समझ में नही आता कि फिर भी माता-पिता का ये भेदभाव क्यूँ।

घर में एक साथ रहने वाले बेटा-बेटी के साथ ये अलगाव की स्थिति घर से ही पैदा हो जाती है। जो लड़कियों के बालमन पर कई बार ऐसी छाप छोड़ देती है जो चाह कर भी जिंदगी भर दूर नही होती। क्योंकि हमें अक्सर इस प्रकार के बच्चों के कोमल दिल से ऐसे भाव देखने सुनने को मिलते है जो हम शिक्षकों को भी दुख देने में पीछे नही रह पाते।

खासकर वो पूरा वर्ष पढ़ाई संबंधी चीजें कॉपी, पेंसिल, रबड़ व नए बैग, टिफ़िन और बोतल के लिए झूझते दिखाई देते है जैसे भाई की ही पुरानी बोतल में पूरा साल काम चलाना या कॉपी के पिछले पन्नों पर लिखा मिटाकर काम करना। इस प्रकार की बहुत सी बातें हमें अपनी कक्षाओं में देखने को मिलती है जिससे माता-पिता की दोहरी मानसिकता दिखाई दे जाती। इसका सबसे ज्यादा उदाहरण हमारे सरकारी विद्यालयों में मिलता है जो कि एक कड़वा सच है। आखिरी में दसवीं, बारहवीं तक आते-आते लड़कियाँ ही टॉप करती है हर वर्ष।

क्योंकि एक सरकारी अध्यापक के लिए तो कक्षा का हर छात्र-छात्रा एक समान है। इसलिए उनमें किसी प्रकार भेदभाव किए बिना ही उनको एक समान शिक्षा मिलती है।

अंत में वे बेटियाँ ही माता-पिता की शान बनती है जिनको सरकारी विद्यालयों में ये सोच कर दाखिला दिलवाते है कि इन पर पैसा तो खर्च करना नहीं होगा बल्कि कुछ न कुछ इनसे हासिल ही होता है। पर ये अपनी योग्यता से हर बार सिद्ध कर ही देती है कि लड़कियाँ कभी भी पीछे नही रही बल्कि उन्होंने हर जगह ही सफलता का परचम लहराया। सही तो सार्थक कथन इन बेटियों के लिये:—

हम हर हाल में अपने माता-पिता का नाम रोशन कर जाएगी।
देखोगे जिधर भी बेटियाँ ही सफलता का परचम लहराएगी।।
एक शिक्षिका की कलम से…
(श्रीमती सुशीला देवी – जे.बी.टी.अध्यापिका करनाल हरियाणा)

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आखिर कब तक समाज में ये दोहरी मानसिकता चलता रहेगा लड़कियों के लिए। आखिर क्यों लड़कियों को लड़को के बराबर सबकुछ नहीं दिया जा रहा है, क्यों उनको दोयम दर्जे का प्यार और सबकुछ दिया जा रहा है आज भी समाज में, क्या यही मानसिक विकास है? प्राचीन समय में भारत के हर स्थान की नारी स्वतंत्र थी, महिलाओं पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं था। महिलाएं यज्ञों और अनुष्ठानों में भी भाग लेती थी। मध्य युग में धीरे-धीरे समय बदलने के साथ पुरुष ने अपने अहम भाव के कारण नारी को निम्न स्थान दिया। आज फिर से नारी समाज में प्रतिष्ठित और सम्मानित हो रही है अपने अद्भुद समझ व अच्छे ज्ञान व प्रतिभा के प्रदर्शन के दम पर। अक्सर यह देखा गया है— अंत में वे बेटियाँ ही माता-पिता की शान बनती है जिनको सरकारी विद्यालयों में ये सोच कर दाखिला दिलवाते है कि इन पर पैसा तो खर्च करना नहीं होगा बल्कि कुछ न कुछ इनसे हासिल ही होता है। पर ये अपनी योग्यता से हर बार सिद्ध कर ही देती है कि लड़कियाँ कभी भी पीछे नही रही बल्कि उन्होंने हर जगह ही सफलता का परचम लहराया।

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यह लेख (दोहरी मानसिकता।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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