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हिन्दी साहित्य

प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण? ♦

जीत तू जरूर,
छू ऊंचाइयों को।
कर मेहनत जरूर,
सपने कर पूरे,
बस तू कर मेहनत।

आज के आधुनिक दौर में आगे निकलने की दौड़ में सभी अपना वजूद ही खोते जा रहे हैं। जो है उनके पास स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं। मात-पिता प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अपने बच्चे को ही प्रथम लाना चाहते हैं। अच्छी बात है, पर दूसरों के साथ तुलना करके क्यों? सभी बच्चों में कौशल होता। हालांकि ये अलग बात है कि प्रतिभा अलग-अलग है। जैसे कोई चित्रकारी में, कोई नृत्य में, कोई गाने में, कोई पढ़ने में, कोई खेल में, कोई अपने घर के कार्यों में, पर अभिभावक चाहते हैं कि हमारा बच्चा ही हर काम में प्रथम आए। हमें सिर्फ अपने बच्चे की प्रतिभा को देखना है। वह किस क्षेत्र में अच्छा है, उसकी प्रशंसा करना, ना कि उस पर इतना दबाव बनाना कि वह अवसाद में चला जाए।

आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बच्चे भी अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं।पहले जमाने में तो अवसाद क्या होता है किसी को पता ही नहीं था। पर आज इसने अपना विकराल रूप धारण कर लिया है कि हमारे छोटे-छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ रहा है। यही माहौल हर जगह बन गया है सभी एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा रखते हैं। चाहे वह नौकरी हो, एक-दूसरे से आगे निकलना अच्छी बात है पर परंतु उसे अपने पर हावी ना होने दें।

हैसियत को देखकर ही तमाम कार्य करने चाहिए ना कि एक दूसरे की देखा-देखी।लोग दौड़ में लग जाते हैं उससे अच्छा घर, उससे अच्छे कपड़े, उससे अच्छी गाड़ी। क्यों? हमें सिर्फ और सिर्फ अपना देखना है हमारे हालात कैसे हैं। हमारे पास कितना धन है, यह नहीं कि दूसरों से अच्छा कैसे बनना और आगे कैसे निकलना है। क्योंकि सब में प्रतिभा होती है यह अलग बात है कि कोई पहचान लेता। कोई नहीं पहचानता, सिर्फ दौड़ में लग जाता है। यही दौड़ अवसाद का कारण बनती है क्योंकि हम एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में समय, पैसा, सुख-चैन खो देते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कब हम इस प्रतिस्पर्धा की भाग दौड़ में समय, पैसा और सुख-चैन को खो दिया। जब तक बात हमें समझ आती है अवसाद हमें चारों तरफ से घेर लेता है।

दुनिया भर में अवसाद ने अपने पैर पसार रखे हैं। अकेले भारत में लगभग 20 करोड़ लोग अवसाद से ग्रसित है। हमें जो मिला है उसमें खुश क्यों नहीं। ऐसे ही सारी सुख- सुविधाएं होने के बाद भी खुश नहीं है। क्योंकि उन्हें दूसरों से ज्यादा कमाना है, कमाइए जरूर। पर उसे अपने जीवन पर हावी ना होने दें।

और-और की चाहत में,
जो है उससे भी हाथ ना धो बैठे।
और-और की चाहत में,
जो है उसका भी लुत्फ उठा ना पाते।

बहुत लोग दिन-रात मेहनत करते हैं। कई बार तो अपने घर वालों के साथ समय भी नहीं बिताते। ना ही परिवार के साथ बात करने का समय होता। और कई वर्ष लग जाते मंजिल तक पहुंचने में, कई असफल भी हो जाते हैं। और बाद में बोलते हैं कि हमें तो पता ही नहीं चला कब बच्चे बड़े हो गए। हम तो कमाने में व्यस्त थे कि बच्चों का बचपन भी नहीं देख पाए। कोई इस जमाने में खुश ही नहीं है चाहे उसकी तनख्वाह 50,000 है, या लाख-लाख है। कोई भी खुश नहीं है। सभी प्रतिस्पर्धा की दौड़ में जो है, उससे भी जाते है। इसीलिए ज्यादा से ज्यादा सोचते रहते हैं यही सोचना उन्हें अवसाद की तरफ ले जाता है ।

जिंदगी है हसीन,
जी ले इसे।
गंवा देखा कीमती वक्त,
रह जाएगा पछताता।
मिलेंगे ना दुबारा,
ये सुनहरे पल।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हमारे पास कितना धन है, यह नहीं कि दूसरों से अच्छा कैसे बनना और आगे कैसे निकलना है। क्योंकि सब में प्रतिभा होती है यह अलग बात है कि कोई पहचान लेता। कोई नहीं पहचानता, सिर्फ दौड़ में लग जाता है। यही दौड़ अवसाद का कारण बनती है क्योंकि हम एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में समय, पैसा, सुख-चैन खो देते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कब हम इस प्रतिस्पर्धा की भाग दौड़ में समय, पैसा और सुख-चैन को खो दिया। जब तक बात हमें समझ आती है अवसाद हमें चारों तरफ से घेर लेता है।

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यह लेख (प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण?) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मकर संक्रांति का पर्व और हमारी मान्यताएं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मकर संक्रांति का पर्व और हमारी मान्यताएं। ♦

भारत वर्ष उत्सव प्रिय देश है। यहाँ अनेक धार्मिक उत्सव, पशु मेले, देव मिलन, फसलों का उत्सव, त्यौहार आदि अनेक प्रमुख है। ये मेले उत्सव, त्यौहार किसी न किसी धार्मिक आस्था विशेष प्रकटोत्सव, ऋतु परिवर्तन, नव फसल के काटने पर मनाया जाते हैं। देव भूमि हिमाचल प्रदेश के कोने-कोने में तो हर रोज कोई न कोई महोत्सव होता रहता है। चाहे वह किसी भी उद्देश्य से क्यों न हो। ज्योतिषानुसार सौरमंडल में सभी ग्रह सूर्य कि परिक्रमा करते हैं। सूर्य की परिक्रमा करने से रात-दिन का परिवर्तन होता है। छः-छः मास का एक अयन होता है। जिसे सूर्य का अयन कहते है। वसंत, शिशिर और ग्रीष्म ऋतुओं का परिवर्तन जब होता है, तब सूर्य उतरायण होता है। जब सूर्य दक्षिणायन होता है तो वर्षा, शरद और हेमंत ऋतु का आगमन होता है।

सूर्य एक मास में एक राशी में रहता है। जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशी में परिवर्तन करता है, उसे संक्रांति कहते है। जब सिंह राशि से मकर राशि में पहुंचता है तो मकर संक्रांति होती है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य की दिशा उतरायण हो जाती है। सूर्य के उतरायण होने पर देवताओं का जागने का समय माना जाता है। मकर संक्रांति के दिन करसोग क्षेत्र के इमला बिमला व तातापानी में सतलुज नदी के किनारे बाल, युवा, कुमार, स्त्री, पुरुष, वृद्ध जनादि स्नान करते हैं।

मकर संक्रांति का त्यौहार क्यों मनाया जाता है: मकर संक्रांति किसानों के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है। इसी दिन किसान अपनी फसल की पुष्टि का दर्प देखते हैं। मकर संक्रांति भारत का सिर्फ एक ऐसा त्यौहार है जो हर साल 14 या 15 जनवरी को ही मनाया जाता है। यह वह दिन होता है, जब सूर्य उत्तर की ओर बढ़ता है। हिन्दूओं के लिए सूर्य एक रोशनी, ताकत और ज्ञान का प्रतीक होता है। मकर संक्रांति त्यौहार सभी को अँधेरे से रोशनी की तरफ बढ़ने की प्रेरणा देता है। एक नए तरीके से काम शुरू करने का प्रतीक है। मकर संक्रांति के दिन, सूर्योदय से सूर्यास्त तक पर्यावरण अधिक चैतन्य रहता है। यानि पर्यावरण में दिव्य जागरूकता होती है। इसलिए जो लोग आध्यात्मिक अभ्यास कर रहे होते हैं, वे इस चैतन्य का लाभ उठा सकते है।

मकर संक्रांति से बदलता है वातावरण: मकर संक्रांति के बाद से वातावरण में बदलाव आ जाता है। नदियों में वाष्प की प्रक्रिया शुरू होने लगती है। इससे कई सारी बीमारियां दूर हो जाती हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, सूर्य के उत्तरायण होने से सूर्य का ताप सर्दी को कम करता है।

मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व: मकर संक्रांति के पावन दिन पर लंबे दिन और रातें छोटी होने लगती हैं। सर्दियों के मौसम में रातें लंबी हो जाती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं। जिसकी शुरुआत 25 दिसंबर से होती है। लेकिन मकर संक्रांति से ये क्रम बदल जाता है। माना जाता है कि मकर संक्रांति से ठंड कम होने की शुरुआत हो जाती है।

मकर संक्रांति का आयुर्वेदिक महत्व: धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व के अलावा मकर संक्रांति का आयुर्वेदिक महत्व भी है। संक्रांति को खिचड़ी भी कहते हैं। इस दिन चावल, तिल और गुड़ से बनी चीजें खाई जाती हैं। तिल और गुड़ से बनी चीजों का सेवन स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। इन चीजों के सेवन से इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है।

मकर संक्रांति का ज्योतिषीय और वैज्ञानिक महत्व: मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध के निकट होता है अर्थात् उत्तरी गोलार्ध से अपेक्षाकृत दूर होता है जिससे उत्तरी गोलार्ध में रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्ध की ओर आना शुरू हो जाता है।

मकर संक्रांति की कथा व कहानी: हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार इस विशेष दिन पर भगवान् सूर्य अपने पुत्र भगवान् शनि के पास जाते है, उस समय भगवान् शनि मकर राशि का प्रतिनिधित्व कर रहे होते है। पिता और पुत्र के बीच स्वस्थ सम्बन्धों को मनाने के लिए, मतभेदों के बावजूद, मकर संक्रांति को महत्व दिया गया, ऐसा माना जाता है कि इस विशेष दिन पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाते है, तो उनके संघर्ष हल हो जाते हैं और सकारात्मकता खुशी और समृधि के साथ साझा हो जाती है।

भीष्म पितामह को मिला था इस दिन मोक्ष: ऐसा कहा जाता है कि महाभारत काल के भीष्म पितामह ने अपने मोक्ष की सुविधा के लिए अपने शरीर को छोड़ने के लिए इस दिन की प्रतीक्षा की थी। महाभारत के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने शैया पर पड़े हुये भीष्म जी से सम्पूर्ण ब्रह्मर्षियों तथा देवर्षियों के सम्मुख धर्म के विषय में अनेक प्रश्न पूछे। तत्वज्ञानी एवं धर्मेवेत्ता भीष्म जी ने वर्णाश्रम, राग-वैराग्य, निवृति प्रवृति आदि के सम्बंध में अनेक रहस्यमय भेद समझाये तथा दानधर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म, स्त्रीधर्म, भगवत्धर्म, द्विविध धर्म आदि के विषय में विस्तार से चर्चा की।

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के साधनों का भी उत्तम विधि से वर्णन किया। उसी काल में उत्तरायण सूर्य आ गये। अपनी मृत्यु का उत्तम समय जान कर भीष्म जी ने अपनी वाणी को संयम में कर के मन को सम्पूर्ण रागादि से हटा कर सच्चिदान्द भगवान श्रीकृष्ण में लगा दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना चतुर्भुज रूप धारण कर के दर्शन दिये। भीष्म जी ने श्रीकृष्ण की मोहिनी छवि पर अपने नेत्र एकटक लगा दिये और अपनी इन्द्रियों को रोकर भगवान की इस प्रकार स्तुति करने लगे – “मै अपने इस शुद्ध मन को देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों में अर्पण करता हूँ। जो भगवान अकर्मा होते हुये भी अपनी लीला विलास के लिये योगमाया द्वारा इस संसार की श्रृष्टि रच कर लीला करते हैं, जिनका श्यामवर्ण है, जिनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है, जो पीताम्बरधारी हैं तथा चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म कण्ठ में कौस्तुभ मणि और वक्षस्थल पर वनमाला धारण किये हुये हैं, ऐसे भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों में मेरा मन समर्पित हो। इस तरह से भीष्म पितामह ने मन, वचन एवं कर्म से भगवान के आत्मरूप का ध्यान किया और उसी में अपने आप को लीन कर दिया।

देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और दुंदुभी बजाये। युधिष्ठिर ने उनके शव की अन्त्येष्टि क्रिया की। सूर्य केवल भारतवर्ष में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में विशेष महत्व रखते हैं। वर्तमान समय में मकर संक्रांति के महत्व को अंग्रेज आज तक एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए ‘सनी डे’ की कामना करते हैं … प्राचीन मिस्र के लोग सूर्य की पूजा अटम और होरस के रूप में करते थे, मेसोपोटामिया के लोग शमाश के रूप में, जर्मन सोल के रूप में, ग्रीक हेलिओस और अपोलो के रूप में। पृथ्वी की धुरी में बदलाव के साथ, उत्तरायण की घटना मकर संक्रांति यानी 14 जनवरी स्थानांतरित हो जाती है।

मकर संक्रांति पूजा विधि: जो लोग इस विशेष दिन को मानते है, वे अपने घरों में मकर संक्रांति की पूजा करते है। इस दिन के लिए पूजा विधि को नीचे दर्शाया गया है- सर्व प्रथम पूजा शुरू करने से पूर्व पूण्य काल मुहूर्त और महा पुण्य काल मुहूर्त निकाल ले, और अपने पूजा करने के स्थान को साफ़ और शुद्ध कर ले वैसे यह पूजा भगवान् सूर्य के लिए की जाती है इसलिए यह पूजा उन्हें समर्पित करते है। इसके बाद एक थाली में 4 काली और 4 सफेद तीली के लड्डू रखे जाते हैं। साथ ही कुछ पैसे भी थाली में रखते हैं। इसके बाद थाली में अगली सामग्री चावल का आटा और हल्दी का मिश्रण, सुपारी, पान के पत्ते, शुद्ध जल, फूल और अगरबत्ती रखी जाती है। इसके बाद भगवान के प्रसाद के लिए एक प्लेट में काली तीली और सफेद तीली के लड्डू, कुछ पैसे और मिठाई रख कर भगवान को चढाया जाता है। यह प्रसाद भगवान् सूर्य को चढ़ाने के बाद उनकी आरती की जाती है।

पूजा के दौरान महिलाएं अपने सिर को ढक कर रखती हैं। इसके बाद सूर्य मंत्र ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सह सूर्याय नमः’ का कम से कम 21 या 108 बार उच्चारण किया जाता है। कुछ भक्त इस दिन पूजा के दौरान 12 मुखी रुद्राक्ष भी पहनते हैं, या पहनना शुरू करते है। इस दिन रूबी जेमस्टोन भी पहना जाता है।

मकर संक्रांति में क्यों खाई जाती है खिचड़ी: मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने की परंपरा है, इसलिए मकर संक्रांति के पावन पर्व को खिचड़ी भी कहते हैं। हालांकि इस दिन खिचड़ी खाने की एक वजह ये भी होती है कि मकर संक्रांति में फसल की कटाई होती है। चावल और दाल से बनी खिचड़ी का सेवन सेहत के लिए फायदेमंद होता है। ये पाचन तंत्र को मजबूत करती है।

करसोग क्षेत्र के तत्तापानी में होता है मकर सक्रांति का विशेष आयोजन: तत्तापानी में सतलुज नदी के किनारे लोग गर्म चश्मे (स्नान पात्र) में स्नान करते हैं। नवविवाहित स्त्रियां स्नान करते हुए सूर्य देव से पुत्र प्राप्ति की याचना करती है। मकर सक्रांति के दिन दान करने का बड़ा महत्व माना गया है इस दिन प्रत्येक घर में चावल माह की दाल घी दान किया जाता है। इस दिन प्रत्येक घर में खिचड़ी पकाने की परंपरा है।

मकर सक्रांति के दिन घर के सदस्य ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके अपने इष्ट देवता और सूर्य की पूजा करते हैं। लोग दूर-दूर से आकर तत्तापानी में पापों की मुक्ति के लिए दान व स्नान करते हैं। कहा जाता है अगर मकर सक्रांति को तत्तापानी, इमला विमला व बूढ़ा केदार या किसी देव सरोवर में स्नान करते हैं तो मनुष्य को चर्म रोग से भी मुक्ति मिलती है। इस दिन तत्तापानी में दूर-दूर से आए हुए लोग आसपास के क्षेत्रों में तुलादान भी करते हैं जिससे शनि का ढैया, शनि साढ़ेसाती या शनि दशा व शनि अनिष्टता का निवारण होता है। मकर सक्रांति का पावन पर्व पारस्परिक स्नेह और मधुरता का महोत्सव है। जिला मण्डी में यह त्यौहार बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

ज़रूर पढ़ें: लोहड़ी के त्यौहार उद्देश्य। 

♦ आचार्य रोशन शास्त्री जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “आचार्य रोशन शास्त्री जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह माना जाता है कि भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्‍वयं उनके घर जाते हैं और शनि मकर राशि के स्‍वामी है। इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। पवित्र गंगा नदी का भी इसी दिन धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए भी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता हैं। लोहड़ी का पर्व हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है क्योंकि हर साल मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है इस प्रकार 13 जनवरी को लोहड़ी मनायी जाती है। ऐसा माना जाता है की उस समय से दिन छोटे और राते लम्बी होने लगती है। लोहड़ी के दिन सभी लोग नए-नए कपडे पहनते है और खुशी मनाते है। इस दिन सभी लोग नाचते व गाते है। लोहड़ी की संध्या को आग जलाई जाती है । लोग अग्नि के चारो ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं व आग मे रेवड़ी, मूंगफली, खीर, मक्की के दानों की आहुति देते हैं । आग के चारो ओर बैठकर लोग आग सेंकते हैं। लोहड़ी भारत के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक त्यौहार है। यह पंजाब का सबसे लोकप्रिय त्यौहार है जिसे पंजाबी धर्म के लोगो द्वारा प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है।

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यह लेख (लोहड़ी के त्यौहार उद्देश्य।) “आचार्य रोशन शास्त्री जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आचार्य रोशन शास्त्री जी– राजकीय माध्यमिक पाठशाला, नौलखा, सुंदर नगर, जिला मंडी – हिमाचल प्रदेश।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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सावित्रीबाई फुले जयंती।

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♦ सावित्रीबाई फुले जयंती। ♦

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को एक दलित परिवार में महाराष्ट्र के नायगांव – सतारा में हुआ था। सावित्रीबाई फुले को देश की पहली महिला शिक्षिका माना जाता है आज उनकी 192 वी जयंती है। सावित्रीबाई फुले का 9 वर्ष की आयु में ही 13 साल के ज्योतिराव फुले के साथ विवाह हो गया था, सावित्रीबाई फुले अपने क्रांतिकारी पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर बेटियों के लिए कई कदम उठाए। उन्होंने लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले, जिसमें पहला स्कूल और 18वां स्कूल पुणे में खोला गया था।

सावित्रीबाई फुले देश की पहली अध्यापक नारी, नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता थी। असामाजिक और बुरी नीतियों के खिलाफ सावित्रीबाई फुले ने अपने पति के साथ मिलकर इसका विरोध किया। छुआछूत सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध काम किया उन्होंने मजदूरों के लिए भी रात में स्कूल खोला ताकि दिन में काम पर जाने वाले मजदूर रात में अपनी पढ़ाई कर सकें और अपने पैरों पर खड़े हो सके।

गांव की छुआछूत से परेशान सावित्रीबाई फुले ने पानी न मिल पाने के लिए परेशानी होने पर अपने ही घर में एक कुआं खोद दिया था जिससे सभी लोग पानी भरा करते थे। सावित्रीबाई ने बहुत बड़ा कदम उठाया एक विधवा को आत्महत्या करने से रोका और बाद में उस महिला को अपने घर में रख कर ही उसके पुत्र को पाल पोसकर बड़ा किया और डॉक्टर बनाया। सावित्रीबाई फुले एक भारतीय समाज सुधारक शिक्षाविद और महाराष्ट्र की कवियत्री थी।

अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ महाराष्ट्र में उन्होंने भारत में महिलाओं के अधिकारों को बेहतर बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें भारत के नारीवाद आंदोलन की अग्रणी माना जाता है सावित्रीबाई और उनके पति ने 1848 में पुणे में भारतीय लड़कियों के पहले और आधुनिकता स्कूल की स्थापना की। जाति और लिंग के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव और अनुचित व्यवहार को भी खत्म करने का विरोध किया और वह इस काम में सफल भी हुई।

सावित्रीबाई फुले की जयंती के दिन राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। सावित्रीबाई फुले का पूरा जीवन समाज सेवा में निकला। गलत लोगों के खिलाफ आवाज उठाई। समाज की कुरीतियों के खिलाफ उन्होंने आंदोलन किया, महिलाओं की हक के लिए लड़ी, और 1897 में प्लेग महामारी आने पर लोगों की सेवा करते-करते उन्होंने अंतिम सांस ली। लेकिन वह लोगों की सेवा करती रही ऐसे में सावित्रीबाई भी इसकी चपेट में आ गई और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सावित्रीबाई फुले एक भारतीय समाज सुधारक शिक्षाविद और महाराष्ट्र की कवियत्री थी। सावित्रीबाई फुले देश की पहली अध्यापक नारी, नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता थी। असामाजिक और बुरी नीतियों के खिलाफ सावित्रीबाई फुले ने अपने पति के साथ मिलकर इसका विरोध किया। छुआछूत सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध काम किया उन्होंने मजदूरों के लिए भी रात में स्कूल खोला ताकि दिन में काम पर जाने वाले मजदूर रात में अपनी पढ़ाई कर सकें और अपने पैरों पर खड़े हो सके।

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यह लेख (सावित्रीबाई फुले जयंती।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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गुरु गोबिंद सिंह जयंती।

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♦ गुरु गोबिंद सिंह जयंती। ♦

सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हिंदू पंचांग के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ था। इस वर्ष शुक्ल सप्तमी 29 दिसंबर को है इस दिन सिख समुदाय के लोग गुरु गोबिंद सिंह जयंती मनाते हैं, गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 को हुआ था, बिहार की राजधानी पटना के घर में हुआ था। उनके बचपन का नाम गोबिन्द राय था उनके पिता नौवें गुरु श्री तेग बहादुर जी कुछ समय बाद पंजाब वापस आ गए थे पटना के जिस घर में उनका जन्म हुआ उसमें उन्होंने 4 साल बिताए। गुरु गोबिंद सिंह जी बचपन से ही स्वाभिमानी और वीर थे, घोड़े की सवारी करना, हथियार पकड़ना, मित्रों की टोलियां एकत्रित करके युद्ध करना, शत्रु को हराने के लिए खेल में शामिल थे। उनकी बुद्धि काफी तेज थी, उन्होंने बहुत ही सरलता से हिंदी, संस्कृत, फारसी का ज्ञान प्राप्त किया था।

1670 में उनका परिवार पंजाब आ गया, हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों में स्थित चक्क नानकी नामक स्थान पर रहने लगे चक्क नानकी ही आजकल आनंदपुर साहिब कहलाता है। यहीं से उनकी शिक्षा का प्रारंभ हुआ गोबिन्द राय जी नित्य प्रति आनंदपुर साहिब में आध्यात्मिक, निडरता का संदेश देते थे। गोबिन्द जी शांत और क्षमा और सहनशीलता की मूर्ति थे।

कश्मीरी पंडितों का जबरन धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बनाए जाने के विरोध में गुरु तेग बहादुर जी आगे आए उस समय गुरु गोबिंद सिंह जी की उम्र 9 साल की थी। कश्मीरी पंडितों की फरियाद सुनकर उन्होंने जबरन धर्म परिवर्तन से बचाने के लिए स्वयं इस्लाम न स्वीकार न करने के कारण 11 नवंबर 1675 को औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से उनके पिता गुरु तेग बहादुर का सर कटवा दिया। इसके बाद वैशाखी के दिन 29 मार्च 1676 गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें गुरु घोषित हुए। गुरु बनने के बाद भी उनकी शिक्षा जारी रही, उन्होंने लिखना-पढ़ना, सवारी करना अनेक सैन्य कौशल सीखे।

1684 में उन्होंने चंडी दी वार की रचना की। गुरु गोबिंद सिंह जी जहां विश्व के बलिदानी परंपरा में अद्वितीय थे, वही वे एक महान लेखक, मौलिक चिंतक और संस्कृत व कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रन्थों की रचना की है। विद्वानों के संरक्षक थे उनके दरबार में 52 कवियों के लिए उपस्थिति रहती थी। उन्हें “संत सिपाही” भी कहा जाता था उन्होंने हमेशा भाईचारा, एकता प्रेम को सबसे ज्यादा महत्व दिया।

गुरु गोबिंद सिंह जयंती सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी की याद में हर साल मनाई जाती है। इस दिन विश्व भर में गुरुद्वारा को सजाया जाता है लोग अरदास भजन, कीर्तन के साथ लोग गुरुद्वारे में मत्था टेकने भी जाते हैं। इस दिन नानक वाणी भी पढ़ी जाती है और लोक कल्याण के तमाम अनेक कार्य किए जाते हैं। सभी लोग गुरुद्वारा में गुरु गोबिंद सिंह जयंती का महाप्रसाद खाने जाते हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी की 1708 में मृत्यु हो गई।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — गुरु गोबिंद सिंह जी जहां विश्व के बलिदानी परंपरा में अद्वितीय थे, वही वे एक महान लेखक, मौलिक चिंतक और संस्कृत व कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रन्थों की रचना की है। विद्वानों के संरक्षक थे उनके दरबार में 52 कवियों के लिए उपस्थिति रहती थी। उन्हें “संत सिपाही” भी कहा जाता था उन्होंने हमेशा भाईचारा, एकता प्रेम को सबसे ज्यादा महत्व दिया।

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यह लेख (गुरु गोबिंद सिंह जयंती।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हिन्दू और हिंदुत्व।

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Hindu and Hindutva – हिन्दू और हिंदुत्व।

हिन्दू और हिंदुत्व – एक समीक्षा।

हिंदुस्तान में हिन्दू और हिन्दुत्व की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। आज पूरी दुनियां में भारत एक ऐसा देश है, जिसमें हिन्दू और हिन्दुत्व के ऊपर एक जंग सी छिड़ गई है। सोशल मीडिया हो या प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या सामान्य जन वार्ता। राजनैतिक दल हो या फिर सामाजिक – धार्मिक संगठन। सभी की टिप्पणियां और मुहिमें हिन्दू और हिन्दुत्व के पक्ष और विपक्ष में निरन्तर चलती रहती है।

ऐसा नहीं है कि हिन्दू और हिन्दुत्व के विपक्ष में मात्र गैर हिन्दू समुदाय ही खड़े नजर आते हैं। बल्कि खुद को कट्टर हिन्दू कहने वाले लोग भी हिन्दू और हिन्दुत्व के खिलाफ मुक्त स्वर में बोलते हुए नजर आते हैं। खैर विचारधारा अपनी – अपनी।

पर यहां कई सवाल खड़े होते हैं कि जो ये लोग हिन्दू और हिन्दुत्व के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और जो ये हिन्दू और हिन्दुत्व के पक्ष में आंदोलित लोग नजर आ रहे हैं; ये सभी असल में हिन्दू और हिन्दुत्व के अर्थ को जानते भी है या नहीं। या फिर मात्र पक्ष के लिए पक्ष और विरोध के लिए विरोध करते रहते हैं। कहीं ये राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक संगठनात्मक विचारधारा से बंध कर तो यह सब करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं? कहीं ये सामाजिक सरोकारों को ठोकर मारकर अपने संगठनात्मक सरोकारों को साधने की कोशिश करते हुए तो ऐसी हरकत करने की जरूरत नहीं कर रहे हैं, जो समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।

• हिन्दू शब्द का अर्थ •

उससे पूर्व की हम आगे की बात करें। हिन्दू शब्द के अर्थ को समझना जरूरी है। यूं तो भारत में हिन्दू कहलाने वाले लोग स्वयं को सनातनी कहते हैं, जो सनातन धर्म की “वसुधैव कुटुंबकम्” की अवधारणा के धरातल पर खड़ी एक मानवीय सरोकारों की इमारत है। पर फिर भी हिन्दू शब्द के अर्थ को समझना जरूरी है। मेरे मत के अनुसार यदि हिन्दू शब्द को भाषिक संरचना के आधार पर परिभाषित किया जाए तो हिन्दू शब्द “हिं + दू” के मेल से बना है। इसमें “हिं” का अर्थ हिंसा और “दू” का अर्थ दूर होता है। अर्थात ऐसा व्यक्ति/समुदाय/समाज जो हिंसा से दूर रहता हो, वह हिन्दू है।

हिंसा मानसिक, तानसिक या फिर कोई भी हो सकती है। इसी प्रकार अहिंसात्मक भावना से ओतप्रोत मानस ही हिन्दुत्व है। इस सन्दर्भ में यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है, वह चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय का क्यों न हो। वह हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख हो या इसाई या फिर पारसी। जो सत्य और अहिंसा परमो धर्म का मार्ग नहीं अपनाता, वह हिन्दू धर्म का होकर भी हिन्दू नहीं है। यदि मैं गलत हूं तो फिर हिन्दू धर्म की पवित्र पुस्तकों के प्रमाण भी गलत है। महर्षि वाल्मिकी और तुलसी कृत रामायण में महा पण्डित रावण को राक्षस और कविलाई समाज के नायक गुह को तथा पशु समुदाय यानी वानर तथा रिक्ष समुदाय के हनुमान, सुग्रीव, अंगद तथा जामवंत आदि को साधु व सज्जन सिद्ध करना इसी हिंदूवादी सोच का उदाहरण है।

शबरी जैसी निम्न जाति की वृद्ध औरत के जूठे बेर प्रभु राम द्वारा खाना तथा केवट जैसे सामान्य जन के गले लगना आदि सभी प्रमाण हिंदूवादी सोच को पुष्ट करते हैं। और भी न जाने कितने-कितने प्रमाण कई शास्त्रों में भरे पड़े हैं। पर नहीं आज ये बाते किसी को न ही तो सुननी है और न ही समझनी है।

आज तो बस एक ही भूत सबके सिर पर सवार है कि मैं हिन्दू माता-पिता की संतान हूं तो मैं हिन्दू हूं। अधिकांश भाई बहन ऐसे हैं जिन्हें हिन्दू धर्म का क ख ग तक मालूम नहीं है पर है हम हिन्दू। मेरी बात झूठ है तो करें सर्वे। पूछिए जरा हिन्दू कहलाने वाले लोगों से कि वेद कितने हैं? पुराण कितने हैं? क्रमबद्ध उनकी सूची बनाने को कहे।इतनी सी बात से ही सारी हेकड़ी निकल जाएगी। उन ग्रंथों में लिखा ज्ञान तो दूर की कौड़ी है।

मेरा मक़सद किसी को जलील करना और किसी की पैरवी करना नहीं है। सोशल मीडिया में कई मुस्लिम भाई भी राम को अपना पूर्वज बताते हुए नजर आते हैं और वे ये मानते हैं कि हमारे पूर्वज हिन्दू थे। उनकी कवरगाहों में उर्फ कर के उनके हिन्दू होने का प्रमाण लिखा हुआ मिलता है। खैर मैं इस बात की पुष्टि नहीं कर रहा हूं। पर उन्हे बोलते मैने जरूर सुना है।

मेरा मतलब है कि फिर इस हिन्दू और हिन्दुत्व के मुद्दे पर इतनी जुमानी जंग क्यों? विशेष तौर पर इस मुद्दे पर भाजपा और आर एस एस से समर्थित लोगों को निशाने पर गैर भाजपाई और गैर आर एस एस संगठनों के हिन्दू कहलाने वाले लोग ही रखते हैं।खैर गैर हिंदूवादी संगठनों और समुदाय की बात तो अलग है। इस सन्दर्भ में मुझे तो इतना सा ही कहना है कि वह चाहे किसी भी दल या विचारधारा से जुड़ा हुआ व्यक्ति क्यों न हो। यदि वह किसी जीव की बलि चढ़ाता है, मांस खाता है, मदिरा पीता है, नशा करता है, अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे के मन को ठेस पहुंचाता है, भ्रष्टाचार, अनाचार, दुर्व्यवहार, बलात्कार और कोई अन्य असामाजिक कृत्य करता है तो वह हिन्दू हो ही नहीं सकता। शायद इस बात से बहुतों को बुरा भी लगे, क्योंकि आज का अधिकांश हिन्दू समाज इन्ही बुराइयों से बुरी तरह से घिरा हुआ है। “पर हित सरिस धर्म न भाई” की लोक मंगल भावना बहुतायत गायब सी हो रही है।

• संपूर्ण हिंदुत्व को प्रतिस्थापित करना? •

आज हिन्दू समाज को जाति प्रथा, बलि प्रथा, धर्मवाद और आरक्षण व्यवस्था जैसी मुसीबतों से दो-दो हाथ होना बहुत जरूरी है। जातिवाद के नाम पर हिन्दू धर्म को मानने वाले वर्गों में ही संघर्ष है। इस लड़ाई में कई राजनैतिक दल भी आमने सामने है। भीम आर्मी के लोग जहां जाति प्रथा को मनु स्मृति का फैलाया भ्रम समझते हैं तो वहीं अपने आपको उच्च वर्ग समझने वाला हिंदू समाज इस बात को मानने को कतई राजी नहीं है। उच्च वर्गीय कहलाने वाले हिंदू समाज का मानना है कि मनुस्मृति में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि शुद्र का बेटा शूद्र और ब्राह्मण का बेटा ब्राम्हण ही कहलाएगा। अर्थात वहां कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था का नियम प्रतिपादित किया गया है न कि जातिगत दासता का। उनके अनुसार यह वंशानुगत जातिगत परंपरा हमारे भारतीय संविधान की देन है, जिसमें ब्राह्मण का बेटा ब्राम्हण और शूद्र का बेटा शूद्र कहलाने की संवैधानिक मंजूरी प्रदान करके रखी है। इस सन्दर्भ में वे आरक्षण का भी हवाला देते हैं। इधर जातिगत आधार पर आरक्षण पाने वाले समुदायों के लोग अपना आरक्षण छोड़ने को किसी भी हद तक मंजूर नहीं है। ऐसे में भारतीय समाज से जातिगत भावना को दूर किए बिना संपूर्ण हिंदुत्व को प्रतिस्थापित करना कहीं से भी संभव होता हुआ नजर नहीं आता।

• जातिगत भेदभाव और छुआछूत •

आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारे भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत उतने ही मजबूत और दृढ़ है जितने कि वे स्वतंत्रता से पहले थे। इसमें भी अगर गौर से देखें उच्च वर्गीय कहलाने वाले समाज में इस प्रथा में कुछ सुधार जरूर हुए हैं। यहां ब्राह्मण, राजपूत, ठाकुर, राणा, कनैत, राठी, कुम्हार, तरखान आदि जातियों का आपस में एक साथ उठना बैठना और एक दूसरे के साथ मिलकर के खाना-पीना तथा आपस में अपने बेटे – बेटियों के रिश्ते तय करना लगभग शुरू हो चुका है; जो सामाजिक उत्थान की दिशा में एक अच्छा कदम है।

परंतु दूसरी ओर आरक्षण का लाभ लेने वाले निम्न वर्गीय कहलाने वाली जातियों के लोग आपस में यह क्रिया करते हुए नजर नहीं आते। लोहार और कोली, चर्मकार तथा अन्य निम्न जाति के लोग आपस में न ही तो सामाजिक तौर पर इकट्ठे बैठकर के खाना खाते हैं और न ही सामाजिक रिश्तो को निभाने में आपस में रिश्तेदारी करते हैं। सबसे पहले हिंदू और हिंदूवादी संगठनों को भारत से इस जातिवाद के भूत को बाहर फेंकना होगा। उसके साथ – साथ दूसरी सबसे बड़ी चुनौती भारतीय देवी-देवताओं को खुश करने के लिए निरीह पशु – पक्षियों की बलि चढ़ाने की प्रथा को समाप्त करने की है।

क्या यह हिंसात्मक घटनाएं नहीं है? सब जानते हैं कि ये कुप्रथाएं हैं और ये बंद होनी चाहिए। पर बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन? हिंदू धर्म के गैर भाजपाई और गैर स्वयं सेवक संगठन के लोग इन विचारधाराओं से जुड़े हुए हिंदुत्व का पक्षधर बनने वाले लोगों को साफ नसीहत देते हुए नजर आते हैं कि खुद ये लोग सभी प्रकार की हिंसाएं करते हैं और दूसरों को हिंदू बनने की नसीहत देते हैं। आखिरकार इस दोहरे चरित्र से ये लोग कब बाहर आएंगे, जिससे इनकी कथनी और करनी में एकरूपता नजर आए और हिन्दू समाज इनकी विचारधारा पर विश्वाश कर सके ? सवाल यह भी जायज है। यह तो नहीं चलेगा कि औरों को उपदेश और खुद को गोहटे।

⇒ भारत में हिंदुत्व कायम करना है तो…

हिंदूवादी संगठनों को यदि सचमुच भारत में हिंदुत्व कायम करना है तो उन्हें अपनी विचारधारा के साथ-साथ अपने सामाजिक व्यवहार को भी हिंदुत्व के आधार पर ही ढालना होगा। रही बात धर्मवाद की; उसमें तो भारत में असंख्य चुनौतियां हैं। यह ठीक है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है परंतु फिर भी हिंदुत्व की भावना सभी धर्मों से ऊपर उठकर धर्मनिरपेक्ष ही है। यह सच है कि सिख धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म आदि कई धर्म हिंदू धर्म के ही घटक है परंतु यहां भारतीय धार्मिक परंपरा के अनुसार मुस्लिम धर्म को हिंदू धर्म का कट्टर विरोधी धर्म भी माना जाता है। इसके समकक्ष ईसाई धर्म का प्रारूप भी खड़ा कर दिया जाता है। परंतु मैं इस बारे में अपनी राय ऊपर ही स्पष्ट कर चुका हूं कि अहिंसा की भावना से ओतप्रोत हर व्यक्ति मेरी नजर में हिंदू है।

उपरोक्त सभी कारण इस बात की पुष्टि करते हैं कि कुछ लोग मात्र विरोध के लिए विरोध और मात्र पक्ष के लिए पक्ष करते हुए नजर आते हैं, जबकि उन्हें हिंदू और हिंदुत्व की सही-सही समझ है ही नहीं। हालात यहां तक हो गए है कि हिंदू धर्म के ही मानने वाले कुछ राजनैतिक दलों के उच्च पदस्थ नेता हिंदू समाज के ही बीच में शहर ए आम हिंदुत्व को हराने की बात तक कह डालते हैं। आज भारत के लिए सचमुच एक बहुत बड़ी विडंबना है कि जिन पूर्वजों ने हिंदुत्व की भावना को पुष्ट करने के लिए अपनी अस्थियां तक गला दी, उनको आज यह कहकर श्रद्धांजलि दी जा रही है कि हमने हिंदुस्तान में हिंदू बहुल क्षेत्र में हिंदुत्व को परास्त कर दिया है।

• मानव धर्म •

शारीरिक संरचना के आधार पर देखें तो समूचे विश्व के लोग एक जैसी संरचना के आधार पर बने हुए हैं। उनके रंग जरूर अलग-अलग हो सकते हैं परंतु शरीर की बनावट एक जैसी है। उनके जन्मने और मरने का तरीका एक जैसा है। भले ही अंत्येष्टि की क्रिया अलग-अलग हो। उनके रक्त का रंग सबका एक जैसा है, भले ही उनके ग्रुप अलग – अलग हो। इस आधार पर अगर धर्म को परिभाषित करने की कोशिश करें तो कहना न होगा कि कुदरत ने मनुष्य जाति के लिए धरती पर एक ही धर्म प्रतिस्थापित किया है जिसका नाम है मानव धर्म।

• हिंदुत्व का मूल मंत्र •

संरचनात्मक ढांचे के अनुसार कुदरत ने जातियां भी दो ही बनाई हैं, जिनका नाम है नर और नारी। फिर ये बाकी के विवाद क्यों और किस लिए? संसार को सुंदर बनाने के लिए और अधिक सुखदाई बनाने के लिए हमें अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे की सुख – शांति में कभी बाधा नहीं पहुंचानी चाहिए। यही हिंदुत्व का मूल मंत्र है।

• चन्द पैसों के लालच में अपना जमीर नहीं बेचना •

पर न जाने आज समाज के हर बुद्धिजीवी वर्ग को और समाज के हर प्रतिष्ठित व्यक्ति को कौन सा नशा लग गया है कि वे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दे रहे हैं और जनमानस के एक बड़े भाग की भावना को अपनी आर्थिक समृद्धि या सांस्कृतिक उठापटक के चलते आहत कर रहे हैं। उन्हे यह ध्यान रखना चाहिए कि वे समाज के आदर्श होते हैं। वे यदि समाज में फुहड़ता परोसेंगे तो समाज उनकी नकल करके फुहड़ता का शिकार बनता जाएगा। वे यदि शालीनता पेश करेंगे तो समाज भी शालीन होगा। इसलिए उन्हें बड़ी जिम्मेवारियों के साथ हर भूमिका अदा करनी चाहिए। चन्द पैसों के लालच में अपना जमीर नहीं बेचना चाहिए।

हर नेता – अभिनेता को बड़ी जिम्मेवारी के साथ अपना बयान देना चाहिए। हिंदुस्तान में हिंदुत्व की भावना को हराने की बात करना अपने आप में बहुत बड़ी विडंबना है। इसका सीधा सा अर्थ है हिंदुस्तान में अहिंसात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देना और असामाजिक व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना। आज प्रत्येक भारतीय को जाति, धर्म और सम्प्रदाय के झगड़ों से ऊपर उठ कर पूर्ण हिंदुत्व को समझना होगा तथा उपनिवेशवाद की विकृत मानसिकता से बाहर आना होगा। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जिस दिन हम पूरे भारत को मानसिक रूप से विदेशी संस्कृति और सभ्यता का गुलाम बना देंगे।

• शारीरिक गुलामी से कहीं ज्यादा खतरनाक मानसिक गुलामी •

यह विषय भी विचारणीय है कि शारीरिक गुलामी से कहीं ज्यादा खतरनाक मानसिक गुलामी होती है। इस बात के प्रमाण इतिहास में भरे पड़े हैं कि संस्कृति और सभ्यताएं कई बार विकृत मानसिकता की शिकार हो चुकी है। उदाहरण के लिए पारसी धर्म है, जो आज लगभग अपने ही जन्म स्थल देश में समाप्त सा हो चुका है। हां भारत ही एक ऐसा देश है, जहां उसके भी कुछ अंश शेष है। यही है हिंदुत्व के समर्थक हिन्दुस्तान का हिन्दू जनमानस। जो सब धर्मों का सम्मान करता है पर शर्त यह है कि वे दूसरे धर्मों के मतावलंबी भी किसी दूसरे धर्म के भाव बोध को जाने – अनजाने में ठेस पहुंचाने की कोशिश न करें।

जबकि आज के दौर में यही सब जान बूझ कर हो रहा है। भारत में दक्षिण और वाम पंथ की लड़ाई अधिकतर इन्ही वैचारिक संघर्षों के धरातल पर निरन्तर जारी है। आज लोग अपनी मानवीय संवेदनाओं को खोते जा रहे हैं। हमे निर्भया हत्या काण्ड के दौरान हुए राष्ट्रव्यापी आंदोलनों का दृश्य और भाव भी याद है तथा आज श्रद्धा और उसके जैसी कई और निर्मम हत्याओं के मामले भी याद है। पर यह साफ – साफ देखा जा सकता है कि धीरे – धीरे देश के लोगों की मानसिक भावनाएं व संवेदनाएं निरन्तर पतन की ओर जा रही है।

निर्भया के दौर का जन भाव आज श्रद्धा के मामले तक फीका पड़ गया। ऐसा नहीं है कि सब कुछ खत्म ही हो गया है। पर यह सत्य है कि लोग व्यवस्था की चक्की में पिस कर ज्यादा चिकने हो गए हैं। या शायद उन्हे यह ज्ञान हो गया हो कि व्यवस्था का विरोध करने से कुछ नहीं होगा क्योंकि यहां सुनता ही कोई नहीं है। यहां तो हकीकत यह हो गई है कि जिसकी चलती है तो उसकी क्या गलती है?

उदाहरण के लिए हाल ही में विवादों में घिरी पठान फिल्म के गाने को ही ले लो। एक पक्ष उसे ठीक ठहरा रहा है और दूसरा गलत। जबकि दोनों पक्षों में वाद विवाद करने वाले अधिकतर हिन्दू ही है। जबकि असलियत तो यह है कि इस तरह के अश्लील चलचित्रों को स्क्रीन पर प्रदर्शित करने से रोकने के लिए तो सभी धर्मों के लोगों को एक जुट होकर सामने आना चाहिए। इस प्रकार की अर्धनग्नता भरी सभ्यता समाज में परोसना नीरी पाश्विकता परोसना है। यह पाश्विकता न ही तो हिन्दू धर्म वालों की सामाजिकता के लिए ठीक है और न ही तो मुस्लिम धर्म के लोगों की सामाजिकता के लिए।

इतना ही नहीं किसी भी धर्म की सामाजिकता के लिए ऐसी पाश्विकता बिल्कुल भी सुसभ्य नहीं है। ऐसी घटनाएं चाहे जान बूझ कर कोई करे चाहे अनजाने में। उसका सार्वजनिक विरोध होना चाहिए। फिर वह किसी भी धर्म का हो या फिर किसी भी समुदाय का। यह फूहड़ मानसिकता समाज के लिए किसी भी सूरत में ठीक नहीं है। ऐसे उचाटन भरे फिल्मी दृश्य तथा नशीले पदार्थों के सेवन समाज को मानसिक तौर पर अपाहिज बना कर छोड़ेंगे।

शायद इससे बड़ी कोई और हिंसा, मानसिक हानि हो ही नहीं सकती। फिर भी किसी को अपनी ही बात को सही ठहराना हो तथा अपनी रोजी के चक्कर में समाज के पतन को नजरंदाज करना हो, तो उसका कोई इलाज नहीं है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मेरे मत के अनुसार यदि हिन्दू शब्द को भाषिक संरचना के आधार पर परिभाषित किया जाए तो हिन्दू शब्द “हिं + दू” के मेल से बना है। इसमें “हिं” का अर्थ हिंसा और “दू” का अर्थ दूर होता है। अर्थात ऐसा व्यक्ति/समुदाय/समाज जो हिंसा से दूर रहता हो, वह हिन्दू है। अगर धर्म को परिभाषित करने की कोशिश करें तो कहना न होगा कि कुदरत ने मनुष्य जाति के लिए धरती पर एक ही धर्म प्रतिस्थापित किया है जिसका नाम है मानव धर्म। संरचनात्मक ढांचे के अनुसार कुदरत ने जातियां भी दो ही बनाई हैं, जिनका नाम है नर और नारी। फिर ये बाकी के विवाद क्यों और किस लिए? संसार को सुंदर बनाने के लिए और अधिक सुखदाई बनाने के लिए हमें अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे की सुख – शांति में कभी बाधा नहीं पहुंचानी चाहिए। यही हिंदुत्व का मूल मंत्र है। अश्लील चलचित्रों को स्क्रीन पर प्रदर्शित करने से रोकने के लिए तो सभी धर्मों के लोगों को एक जुट होकर सामने आना चाहिए। इस प्रकार की अर्धनग्नता भरी सभ्यता समाज में परोसना नीरी पाश्विकता परोसना है। यह पाश्विकता न ही तो हिन्दू धर्म वालों की सामाजिकता के लिए ठीक है और न ही तो मुस्लिम धर्म के लोगों की सामाजिकता के लिए।

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यह लेख (हिन्दू और हिंदुत्व – एक समीक्षा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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भावनाओं से खिलवाड़ करते विज्ञापन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भावनाओं से खिलवाड़ करते विज्ञापन। ♦

विज्ञापन जो किसी भी चीज के गुण को दर्शा कर उसकी बिक्री का साधन बनते थे। आज के कुछ विज्ञापन क्या सिखाना चाह रहे हैं ये पता ही नही लग पा रहा है। चंद पैसों की खातिर पता नही इन विज्ञापनों में क्या-क्या परोसा जा रहा है। जिनमें न तो भावी पीढ़ी के लिए संस्कार झलकते हैं और न ही कुछ ऐसा दर्शा पाते हैं जो किसी भी प्रकार से उपयोगी हो।

एक बीमे के विज्ञापन में भी एक औरत के हाल को इस प्रकार दर्शाया जाता है कि उसे बाइक पर बैठाकर ले जाया जा रहा है और वह गर्भवती है। उसका गर्भवती होना एक तरबूज से दर्शाया जा रहा है और एकदम से वो तरबूज गिराया जाता है। उसी समय फोन पे से बीमा एकदम कर दिया जाता है।

इस विज्ञापन को देखते हुए मुझें ये समझ नही आता कि क्या इस प्रकार के प्रदर्शन से इसकी सार्थकता कहाँ तक सिद्ध हो रही हैं।

इस प्रकार के विज्ञापन जो कि एक औरत के उस अनमोल लम्हें के प्रति खिलवाड़ करती है। जो उसे इस संसार में मातृत्व का सुख प्रदान करता है, और इस प्रकार से तरबूज के माध्यम से उसका गिरना न केवल उस औरत की मनोदशा पर आघात करता है जो इस प्रकार के दुखदायी समय से गुजरती है।

दूसरी बात भावी पीढ़ी में उस अवगुण को जाने-अनजाने दे जाती है जो उन्हें झूठ को अपनाकर अपने कार्य को सिद्धि प्रदान करते है।

एक उस औरत के दिल के मर्म को जानने की कोशिश मात्र से ही इन आँखों के कोर गीले हो जायेगे जिसने विवाह के कई साल तक इस मातृत्व का सुख न पाया हो।

इस प्रकार के विज्ञापन में तरबूज का गिरना भी शून्यहीन भावों को भर देता है जब मुस्कराना दिखाया जाता है। पहले तो इसमें एक गर्भवती के दुख को देखकर सब मदद को आयेंगे लेकिन दृश्य कुछ और ही होता है जब उस गर्भ रूपी तरबूज को गिराकर मुस्कराया जाता है।

कितना भाव-विहीन ये दृश्य लगता है क्योंकि असलियत में जब किसी भी कारण से किसी महिला को इन परिस्थितियों से गुजरना पड़े तो उसके दुख का सहज ही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। गर्भपात इस प्रकार सरेआम सड़क पर किसी कारण से होता है तो उस महिला की पीड़ा को केवल वो और उसका सहयोग करने वाले ही समझ सकते हैं।

क्या इस सारे वृतांत को हटाकर इस विज्ञापन को दिखाते तो क्या इस बीमे की सार्थकता कम हो जाती?

आखिरकार इन विज्ञापनों के जरिये क्या परोसा जा रहा है। कुछ विचार कुछ चिंतन इन विषयों पर भी होना चाहिए कि हमें कुछ दिखाने के बहाने न जाने क्या-क्या दिखाया जा रहा। बहुत ही विचारणीय विषय है आओं मिलकर सभी विचार करें।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — विज्ञापन के नाम पर कुछ भी उलूल – जुलूल दिखाया जाता है, जिसका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होती है उस विषय से। आखिर क्यों उलूल – जुलूल विज्ञापन के माध्यम से नकारात्मक माहौल बनाया जाता हैं। एक उस औरत के दिल के मर्म को जानने की कोशिश मात्र से ही इन आँखों के कोर गीले हो जायेगे जिसने विवाह के कई साल तक इस मातृत्व का सुख न पाया हो।

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यह लेख (भावनाओं से खिलवाड़ करते विज्ञापन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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अहंकार विनाश की जननी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अहंकार विनाश की जननी। ♦

पद, प्रतिष्ठा, दौलत, शक्ति, अहंकार की जननी है। अहंकार विनाश की पहली सीढ़ी है। रावण बहुत ज्ञानी था, अगर वास्तव में ज्ञानी होता तो आज पूज्य होता। ज्ञानी का अहंकारी होना, दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं अपितु, उसे विनाशकारी बना देता है। इतिहास गवाह है- सुन्दर स्त्री बाद में शूर्पनखा निकली, सोने का हिरण बाद में मारीच निकला और भिक्षा मांगने वाला साधु रावण निकला, सभी रुप बदलने की कला में निपुण थे। कला-ज्ञान का गलत उद्देश्य एंव उपयोग करने के कारण समाज में नफरत की दृष्टि से देखे जाते हैं- हर जगह भ्रम, शंका और अविश्वास पैदा करने वाले कभी सम्मान नहीं पा सकते।

⇒ प्रेम और सम्मान का आधार विश्वास है।

प्रेम और सम्मान का आधार विश्वास है, अशोक वाटिका में सीता मां राम नाम की मुद्रिका मिलने पर विश्वास कर लेती है। उन्हें प्रभु राम पर इतना विश्वास है। रामायण विश्वास करना ही तो सिखाती है। माँ कठोर हुई लेकिन विश्वास नहीं छूटा, परिस्थितियाँ विषम हुई लेकिन विश्वास बना रहा, लक्ष्मण को मरणासन्न देखा लेकिन धैर्य और विश्वास बना रहा, वानर और रीछ की सेना थी लेकिन विजय अवश्य मिलेगी, ये विश्वास बना रहा, प्रेम की परीक्षा हुई लेकिन विश्वास नहीं टूटा चाहे भरत का विश्वास हो, शबरी का हो, विभीषण का हो, जामवंत का हो, या किसी भी सहयोगी का हो-विश्वास ही नहीं, अगाध विश्वास था। हर इंसान का जीवन शंका भ्रम, निराशा असफलता, दुःख और रावण जैसे पापियों से भरा है, केवल विश्वास की नौका ही इस भवसागर से पार कर सकती है।

⇒ ज्ञान और ज्ञानी के कारण ही मानव सर्वश्रेष्ठ प्राणी।

आज ज्ञान और ज्ञानी के कारण ही मानव सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना जाता है। महर्षि वाल्मिकी, महर्षि वेद व्यास, महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, गुरु नानक जी, गौतम बुद्ध, महर्षि महेश योगी, महर्षि योगानन्द अपने ज्ञान एंव अनुभव से प्रभु से निकटता का मार्ग बताकर मानव समाज को सुखशांति से जीने का रास्ता दिखाया। अंधविश्वास के पर्द को हटाया। किसी गुरु ने स्वंय की पूजा करने की वकालत नहीं की। श्रद्धा और प्रेम से उनके बताए मार्ग पर चलना ही उनकी भक्ति एंव उनके प्रति सम्मान है।

⇒ हर मुसीबत में अन्तरात्मा की आवाज सुनने वाले।

जब उल्टी दृष्टि से कोई दुनिया को देखेगा तो हर वस्तु उल्टी दिखाई देगी। यदि अंधेरे कमरे में अपने को बन्द कर लें तो समस्त ब्रह्माण्ड अंन्धकार से भरा दिखाई देगा और प्रकाश में हर चीज स्पष्ट एंव चमकती हुई दिखाई देगी, हर इन्सान ईश्वर के हाथ का खिलौना है जो खुद ईश्वर बन बैठेगा उसकी हालत रावण और कंश जैसी होगी, संसार के सभी जीव जन्तुओं को परमात्मा भाव से देखो, अपने को सेवक समझ कर, स्वामी बनकर नहीं। हर मुसीबत में अन्तरात्मा की आवाज सुनने वाले, परमात्मा के करीब होने का अनुभव करते हैं, पूर्ण शांति उनके कदमों को चूमती है।

⇒ ईर्ष्या का भूत।

ईर्ष्या का भूत मानसिक तनाव उत्पन्न करने में मुख्यरुप से अपनी भूमिका अदा करता है। पराई उन्नति देखकर जलना ज्ञानी का नहीं, अज्ञानी का स्वभाव है। सीख ग्रहण करना ज्ञानी को महाज्ञानी बना देता है। शिष्ट, सहृदय, निष्कपट और मित्रता पूर्ण व्यवहार ही प्रसन्न बने रहने, तनाव मुक्त होने के लिए पर्याप्त है। महाज्ञानी वैज्ञानिक, चिकित्सक, इंजिनियर, शिक्षक संयमित रहते हुए मानव समाज के कल्याण के लिए सदा तत्पर रहते है। क्रोध और अभिमान से कोसों दूर, मानसिक शक्ति की कमी हो जाने पर क्रोध का वेग विवेक से नहीं रुकता। क्रोध आने पर विवेक दूर भाग जाता है।

⇒ क्रोध का लक्ष्य हानी करना होता है।

जब उन्मत्त हाथी जंजीर तोड़ लेता है तो महावत दूर भाग जाता है। क्रोध का लक्ष्य हानी करना होता है। हानी होने के बाद मनुष्य अपने को कोसने लगता है, निराशावादी बन जाता है। चतुराई स्वंय खत्म हो जाती है। क्रोध का निराकरण विरक्ति और प्रेम से होता है। संसार के प्रति अमोह का व्यवहार तथा सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भावना रखने पर, क्रोध की स्थिति में अविवेक युक्त काम करने से रोक देता है।

अगर दुर्योधन मैत्री भाव रखता तो “महाभारत” नहीं होता, युद्ध से केवल विनाश होता है। प्रेम से निर्माण होता है। स्वार्थ और सर्वोच्च होने का अभिमान मानव समाज को खोखला कर देता है। सेवाभाव, “वसुधैव कुटुम्बकम” का भाव ही मानव समाज की रक्षा कर सकता है। अगर प्राचीन काल में सभी विद्यायों को गुप्त न रखकर सार्वनिक किया जाता तो, प्राचीन भारत का ज्ञान जो अद्धितीय था, वह आज भी होता, गुप्त रखने के कारण आज लुप्त हो गया।

“कद्रदानों के लिए कद्रदान हूँ मैं,
बेरहम नहीं, मेहरबान हूँ मैं।
भरोसा है जिहें मुझ पर
उनके के लिए कभी दोस्त, कभी इन्सान हूँ मैं॥”

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अहंकार विनाश की पहली सीढ़ी है। ज्ञानी का अहंकारी होना, दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं अपितु, उसे विनाशकारी बना देता है। कला-ज्ञान का गलत उद्देश्य एंव उपयोग करने के कारण समाज में नफरत की दृष्टि से देखे जाते हैं- हर जगह भ्रम, शंका और अविश्वास पैदा करने वाले कभी सम्मान नहीं पा सकते। हर इंसान का जीवन शंका भ्रम, निराशा असफलता, दुःख और रावण जैसे पापियों से भरा है, केवल विश्वास की नौका ही इस भवसागर से पार कर सकती है। किसी गुरु ने स्वंय की पूजा करने की वकालत नहीं की। श्रद्धा और प्रेम से उनके बताए मार्ग पर चलना ही उनकी भक्ति एंव उनके प्रति सम्मान है। हर मुसीबत में अन्तरात्मा की आवाज सुनने वाले, परमात्मा के करीब होने का अनुभव करते हैं, पूर्ण शांति उनके कदमों को चूमती है। क्रोध का लक्ष्य हानी करना होता है। हानी होने के बाद मनुष्य अपने को कोसने लगता है, निराशावादी बन जाता है। चतुराई स्वंय खत्म हो जाती है। क्रोध का निराकरण विरक्ति और प्रेम से होता है। अगर प्राचीन काल में सभी विद्यायों को गुप्त न रखकर सार्वनिक किया जाता तो, प्राचीन भारत का ज्ञान जो अद्धितीय था, वह आज भी होता, गुप्त रखने के कारण आज लुप्त हो गया।

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यह लेख (अहंकार विनाश की जननी।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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नैतिक शिक्षा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नैतिक शिक्षा। ♦

नैतिक मूल्यों का ह्रास —

सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता जीवन के हर क्षेत्र में नैतिक मूल्यों का ह्रास दृष्टिगोचर हो रहा है। राजनीति हो, व्यव्साय हो, समाज हो, कार्यालय हो या विद्यालय, हर जगह मानवीय मूल्यों में गिरावट परिलक्षित हो रही है वर्त्तमान समय में मानव इतना स्वार्थान्ध हो गया है कि उसे अपने स्वार्थ के अलावा, कुछ दिखाई नहीं देता। सिध्दान्तों, आदर्शों एंव मान्यताओं का विचार केवल किताब के पन्नों में सिमट कर रह गया है।

परमार्थ का चिन्तन व्यर्थ समझा जाने लगा हर इन्सान यह साबित करने में लगा है कि उससे अच्छा, ईमानदार कोई नहीं, फिर इतना अपराध, अन्याय कौन कर रहा है। समाज एंव देश का चारित्रिक पतन क्यों हो रहा है। हर आदमी दूसरे को दोषी मानता है, सुधार चाहता है लेकिन स्वंय को छोड़कर, यह उत्तरदायित्व केवल विद्यालय का
नहीं है। कोई भी विघालय व्देष, घृणा, हिंसा, धूसखोरी, मिलावट, धोखा एंव भ्रष्टाचार की शिक्षा नहीं देता है।

चारित्रिक पतन को रोकने के लिए…

गाय हमेशा शुध्द दूध देती है लेकिन पानी मिलाने वालों की कमी नहीं है। सुगन्धित फूलों को बचाने के लिए जहरीले पौधों को हटाना ही होगा। जब तक नैतिक शिक्षा, ईमानदारी, भाईचारा, देश प्रेम का भाव नहीं होगा तब तक भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। नैतिक शिक्षा द्वारा मनुष्य के जीवन में सुख, शांति, प्रेम, भाईचारा, त्याग, सौहार्द एंव विश्ववंधुत्व की भावना जागृत होती है। जब तक चारित्रिक उत्थान न हो तब तक सामजिक, राजनीतिक, आर्थिक एंव वैज्ञानिक प्रगति व्यर्थ है। इच्छा शक्ति, दृढ संकल्य एंव ईमानदारी ही सभी कार्यों को सफल बनाता है। नैतिक शिक्षा-धर्म, भाषा, वर्ण, लिंग, जाति, ऊँच-नीच आदि की भावना समाप्त कर निष्पक्ष रुप से विचार करने
एंव व्यव्हार करने की प्रवृति जागृत करता है। चारित्रिक पतन को रोकने के लिए समाज का शिक्षित होना अति आवश्यक है।

सही शिक्षा-योग्य, कुलीन, अनुभवी, चरित्रवान, शिक्षक ही दे सकते हैं हर क्षेत्र में, हर व्यक्ति में, हर संस्था में सुधार की जरुरत है- नए समाज एंव देश के निर्माण के लिए।
भ्रष्टाचार तभी खत्म होगा जब कोई भ्रष्ट न हो।

“येंषा न विघा न तपो न दान
झानं न शीलं न गुणो न धर्म ।
ते मर्त्यलोके भूवि भारभूतां
मनुष्य रुपेण मृगाश्चरन्ति ।।”

शिक्षा ही अस्त्र एंव शस्त्र दोनों है। सर्प को देखकर मनुष्य खौफ खाता है लेकिन चन्दन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। शिक्षा और योग्य शिक्षक ही इन्सान को चन्दन बनाते है। जो अपनी सुगन्ध, त्याग, नम्रता, बुद्धि, से देश का नाम रौशन करते हैं। इन्सान किसी को दोषी ठहराने के लिए अंगुली उठाता है तो तीन अंगुली उसके स्वंय के तरफ इशारा करती है।

“प्रेम की मीनार उठाएं,
नफरत की दीवार गिराएं।
झूठ की बाढ़ को बांध न सकें तो,
सच की राह में रोड़ा भी न बने॥”

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सही शिक्षा-योग्य, कुलीन, अनुभवी, चरित्रवान, शिक्षक ही दे सकते हैं हर क्षेत्र में, हर व्यक्ति में, हर संस्था में सुधार की जरुरत है- नए समाज एंव देश के निर्माण के लिए। भ्रष्टाचार तभी खत्म होगा जब कोई भ्रष्ट न हो। नैतिक शिक्षा। शिक्षा ही अस्त्र एंव शस्त्र दोनों है। सर्प को देखकर मनुष्य खौफ खाता है लेकिन चन्दन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। शिक्षा और योग्य शिक्षक ही इन्सान को चन्दन बनाते है। जो अपनी सुगन्ध, त्याग, नम्रता, बुद्धि, से देश का नाम रौशन करते हैं। इन्सान किसी को दोषी ठहराने के लिए अंगुली उठाता है तो तीन अंगुली उसके स्वंय के तरफ इशारा करती है।

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यह लेख (नैतिक शिक्षा।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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♦ क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है? ♦

समाज की युवा पीढ़ी यह जरूर पढ़े: —

प्रिय मित्रो हिंदुस्तान के माथे पर आज एक और कलंक आफताब और श्रद्धा की लिव इन रिलेशनशिप की कहानी के दर्दनाक अन्त से लगा है। साथियों आज के इस अंध आधुनिकता के दौर में हमारी युवा पीढ़ी पश्चिम की अति स्वतंत्रय प्रिय सभ्यता को अपनाने में उतारू है और उसी पागलपन के नशे में हमारे बच्चे विपरीत लैंगिक होते हुए भी लीव इन रिलेशनशिप के नाम पर बिना विवाह किए ही पति – पत्नी की तरह इकट्ठा रहने लगे हैं। एक तो यह परम्परा भारतीय परिवारवाद और समाजवाद की दृष्टि में पहले ही भद्दा एवम भुंडा कर्म है। ऐसी वृति को हमारे यहां पशु वृति की संज्ञा शास्त्रों में दी गई है।

उसके बावजूद भी यदि पश्चिमी सभ्यता के अंधा अनुकरण में नई पीढ़ी इस व्यवस्था में दैहिक विपासा के कारण रहना ही चाहती है और यह पीढ़ी इस व्यवहार को कोई पाश्विकता नहीं मानती बल्कि पश्चिमी देशों के कानून की तर्ज पर इसे अपना कानूनी अधिकार समझती है तो इसमें समाज उनकी दुर्दशा के लिए कहां तक जिम्मेदार है? खैर यह घटना आज जिरह की नहीं है बल्कि दिल को दहला देने वाली है। इस पर हर किसी को आफताब की करतूत पर गुस्सा आ रहा है और आना भी चाहिए। यह श्रद्धा की विकट मौत का ही वाक्य नहीं है बल्कि हिंदुस्तान की हर जाति, धर्म और सम्प्रदाय की नौजवान बहु – बेटियों की सुरक्षा का सवाल है।

पर बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि आखिर क्या जरूरत है बिना शादी के लड़का – लड़की को सांसारिक व्यवहार में रहने की? हमारी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था के मुताबिक 25 वर्ष तक का समय पढ़ने – लिखने का है और उस बीच दो लड़का – लड़की में प्रेम भी हो जाता है तो कोई गुनाह नहीं है। शर्त यह है कि वह प्रेमी जोड़ा विवाह पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित न करें। हमारी संस्कृति के नौजवान अधिकांश भले ही सामाजिक लाज लपेट के चलते ही सही; इस नियम का पालन भी करते आए हैं। उसके पश्चात विवाह घर वालों की सहमति से करते हैं और सांसारिक जीवन का आनंद लेते हैं।

हमारी संस्कृति में बेटी जब एक बार ससुराल जाती थी तो उसे शिक्षा दी जाती थी कि कभी ससुराल को छोड़ कर वापिस पीहर मत आना। वह बेटी भी उसी शिक्षा का पालन करती थी। युग बदला परिस्थितियां बदली। अंग्रेज भारत में आए, उन्होंने भारतीय सामाजिक और वैवाहिक जीवन के ढर्रे को बदलने में अहम भूमिका निभाई। लोग दैहिक सुख को व्यक्तिक अधिकार समझने लगे। बड़े – बड़े घरानों के लोग इस बात को कोई बेगैरत नहीं बल्कि रईसी रसूख समझने लगे।

हमारी माताएं बहनें औरत/देवी से मैडम के पद पर पदच्युत हुई। उसी बीच बेदवा यानी डाइवर्स ने भी भारत में प्रवेश किया। हां तलाख तो मुगल काल में ही आ गया था पर भारत में डाइवर्स अंग्रेजों की देन हैं। क्योंकि यह पश्चिम की रीत थी। “वहां अत्यधिक स्वातंत्र्य के चलते शादी ज्यादा दिनों तक टिकती ही नहीं थी। यदि किसी की साल भर टिक गई तो सालगिरह मनाई जाती थी और 25 साल टिकी तो सिलवर जुबली मनाई जाती थी। यूं ही गोल्डन जुबली आदि। पर यह मौका पश्चिम में बहुत कम लोगों को मिलता था। भारत में ये कोई भी प्रक्रम मौजूद नहीं थे। यहां शादी का नाम एक वचन था, जिसे एक पवित्र रिश्ता एवम जीवन यज्ञ समझा जाता था। हम इसे जीवनपर्यंत हर हाल में निभाते थे। बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण ने हमारी संस्कृति और समाज का तरीका बदला। हम पश्चिम का अनुकरण करने लगे और आज तलाक, डाइवर्स, सालगिरह आदि रस्मे हमारे समाज में आम प्रक्रियाएं हो गई है।”

खैर यह एक चर्चा का विषय था। पर मेन मुद्दा श्रद्धा की लाश को 35 टुकड़ों में काट कर अलग – अलग स्थलों में ले जा कर सबूतों को जड़ से मिटाने का तथा उस नव युवती की बेरहमी से की गई हत्या का है। प्रिय मित्रो आज भले ही हमारे देश के कई विद्वान और व्यक्तिक स्वातंत्र्य के प्रेमी लिव इन रिलेशनशिप के मुद्दे पर कड़ा कानून बनाने की बात कर रहे हो। पर मेरे विचार से लिव इन रिलेशनशिप जैसे कानून को भारत में कोई जगह नहीं दी जानी चाहिए।

क्योंकि हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था इतनी मजबूत और पवित्र है कि उसमें दम्पति से ले कर बच्चे और बूढ़े तक सुरक्षित है। यदि लिव इन रिलेशनशिप का कानून भारत में स्थान प्राप्त करता है तो भारतीय समाज हवस का शिकार हो जाएगा। न ही तो रिश्तों नातों की अहमियत रहेगी और न ही नारी जाति का सम्मान रहेगा।भविष्य की नई पीढ़ी और वृद्ध लोग असहज और असुरक्षित होंगे तथा इस प्रकार की श्रद्धा की कहानी जैसी कई घटनाएं सामने आएगी। इसमें मात्र लड़कियां ही घटना की शिकार नहीं होगी बल्कि लड़के भी इस लिव इन रिलेशनशिप के चंगुल में फंस कर शिकार होंगे।

यह हम सभी जानते हैं कि एक वक्त के बाद अक्सर हम स्त्री – पुरुष, पति- पत्नी व्यवहार में रह कर एक दूसरे से ऊब ही जाते हैं। वह तो हम लोक लाज और बच्चों की वजह से ताउम्र पति – पत्नी हो कर जिन्दगी भर साथ रह लेते हैं और रहना भी चाहिए। यदि लिव इन रिलेशनशिप हमारे समाज पर हावी हुआ तो महिलाओं का और बच्चों का घणा शोषण होगा। वह कैसे और क्यों? इसका जबाव समाज स्वयं जानता है। अधिकतर लोग विवाह से पूर्व ही दैहिक भोग को भोग कर एक दूसरे से ऊब कर किनारा कर लेंगे और यह सिलसिला समाज में आम हो जाएगा। नए – नए साथी के साथ रहने का शौक स्त्री पुरुष दोनों में जन्मेगा और सामाजिक ढांचा विकृत हो जाएगा। चरित्र नाम की बात बेईमानी हो जाएगी। बाकी सभी की अपनी – अपनी सोच है।

अब सवाल उठाते हैं कि :—

  1. क्या भारत में संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की शिक्षा स्कूलों में शुरू नहीं करनी चाहिए?
  2. क्या यह भारत की अति सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता का परिणाम है?
  3. क्या यह घटना लव जिहाद का मामला है?
  4. क्या भारत में डेटिंग एप जैसे समाज विरोधी सोशल मीडिया पर बैन लगाना चाहिए?
  5. क्या यह घटना हिन्दू – मुस्लिम भाईचारे और प्यार पर कलंक नहीं है?
  6. क्या लव जेहाद और धर्म परिवर्तन भारतीय समाज में राष्ट्र द्रोह के समक्ष जुर्म नहीं है?
  7. क्या एक देश एक विधान जरूरी नहीं है?
  8. क्या स्कूली पाठ्यक्रम में धार्मिक और सांस्कृतिक विषयवस्तु के साथ – साथ सभी धर्मों के सार तत्व मानवीय मूल्यों की शिक्षण सामग्री डलवाना जरूरी नहीं है?
  9. क्या इस्लामिक शिक्षा पद्धति के संस्थानों “मदरसों” को औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर करके उन सभी मुस्लिम बच्चों को भी सामान्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था के आम संस्थानों यानी सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए? आखिर मदरसों की क्या जरूरत है?
  10. क्या निजी शिक्षण संस्थानों को बन्द करके सरकारी शिक्षण संस्थानों को और उन्नत कर के, उनमें संस्कारवान अध्यापक, अध्यापिकाओं की भर्ती कर एक देश एक शिक्षा व्यवस्था और एक ही पाठ्यक्रम की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
  11. क्या अध्यापक भर्ती का पैरामीटर लिखित, मौखिक परीक्षाओं से हट कर उसकी जगह चारित्रिक आंकलन पर आधारित नहीं होना चाहिए? अध्यापक बनने वाले प्रार्थी का खानपान, रहन सहन, पहनावा, बातचीत, सेवा, सत्कार, संयम, साधना,
    त्याग, समाज और राष्ट्र के प्रति सोच और निस्वर्थता, ईमानदारी, शालीनता, गुरुत्व व गंभीरतव आदि पहलू चैक नहीं होने चाहिए क्या? मात्र सैलरी के लिए शिक्षक का कार्य करने वाला शिक्षक शिक्षिका क्या उचित शिक्षक हो सकते हैं क्या?
  12. स्कूली बच्चों को स्कूलों में अध्यापक द्वारा संस्कार स्थापित करने के लिए आंशिक डांट – फटकार और सजा देने का कानूनन प्रावधान नहीं होना चाहिए क्या?
  13. अत्यधिक स्वातंत्र्य शिक्षार्थी जीवन में ठीक है क्या?
  14. माता – पिता और अभिभावकों को भी कमाई से ज्यादा फिक्र अपने बच्चों के संस्कारों की नहीं करनी चाहिए क्या? जो हम उन्हे आवारा छोड़ देते हैं और सारा ठीकरा अध्यापक के सिर पर फोड़ते है, वह ठीक है क्या?
  15. क्या एक अध्यापक को भी अपने छात्र और छात्राओं के प्रति उतने ही चिन्तित और संवेदनशील नहीं होना चाहिए, जितना कि वह अपने बच्चों के प्रति होता है?
  16. क्या महिलाओं की निर्मम हत्या सिर्फ मुस्लिम समुदाय के पुरुष ही करते हैं या बाकी धर्मों ( हिन्दू धर्म, सिख धर्म और ईसाई आदि) के पुरुष भी करते हैं? और भी बहुत कुछ। पर कितना लिखे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “वहां अत्यधिक स्वातंत्र्य के चलते शादी ज्यादा दिनों तक टिकती ही नहीं थी। यदि किसी की साल भर टिक गई तो सालगिरह मनाई जाती थी और 25 साल टिकी तो सिलवर जुबली मनाई जाती थी। यूं ही गोल्डन जुबली आदि। पर यह मौका पश्चिम में बहुत कम लोगों को मिलता था। भारत में ये कोई भी प्रक्रम मौजूद नहीं थे। यहां शादी का नाम एक वचन था, जिसे एक पवित्र रिश्ता एवम जीवन यज्ञ समझा जाता था। हम इसे जीवनपर्यंत हर हाल में निभाते थे। बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण ने हमारी संस्कृति और समाज का तरीका बदला। हम पश्चिम का अनुकरण करने लगे और आज तलाक, डाइवर्स, सालगिरह आदि रस्मे हमारे समाज में आम प्रक्रियाएं हो गई है।”

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यह कविता (क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कार्तिक पूर्णिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कार्तिक पूर्णिमा। ♦

• कार्तिक माह • —

कार्तिक मास अपने आप में विशेषता लिए हुए है। इसकी गणना बहुत पवित्र माह के रूप में की जाती है। इस माह में किया गया पूजा पाठ भगवान् को अत्यंत प्रिय माना जाता है। पूरे माह ब्रह्ममुहर्त में स्नान करने का विशेष महत्व है। लोग कार्तिक महात्म्य पढ़कर अथवा भावानुसार पूजा पाठ कर प्रभु को याद करते हैं।

• कार्तिक माह के मुख्य त्योहार • —

कार्तिक माह विभिन्न त्योहारों जैसे अहोई अष्टमी, करवा चौथ, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, कार्तिक पूर्णिमा जैसे त्योहारों की माला पिरोकर हम सभी को आनंदित करता है। सभी त्योहारों को लेकर विभिन्न कथायें प्रचलित हैं। तुलसी विवाह इस माह में आकर्षण का केंद्र माना जा सकता है, जिसका अपना ही महत्व है। मंदिरों में, घरों में इस दिन सभी तुलसी, शालिग्राम जी का पूजन कर ईश्वरीय कृपा प्राप्त करने हेतु आतुर रहते हैं। इसी प्रकार कार्तिक पूर्णिमा की महिमा भी अदिवित्य होती है, जिसे देख कर हृदय को प्रसन्नता मिलती है।

• कार्तिक पूर्णिमा • —

कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत हो कर सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए, ऐसी मान्यता है कि इस दिन दीपदान आदि करने से भगवान् प्रसन्न होते हैं। लोग अपनी आस्था के अनुरूप इस दिन व्रत करते हैं और दान – पुण्य आदि करते हैं।

• कार्तिक पूर्णिमा के अन्य नाम • —

इसे देव दीपावली, त्रिपुरी पूर्णिमा, गंगा स्नान आदि नामों से भी जाना जाता है। इसी दिन गुरुपर्व भी मनाया जाता है।

• कार्तिक पूर्णिमा से सम्बंधित कथा • —

  • ऐसा कहा जाता है कि इस दिन भगवान् शंकर ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध कर धर्म को उजागर किया था, जिसके कारण उन्हें महादेव त्रिपुरारी भी कहा गया। अतः इस दिन को ‘महापुनित पर्व’ की भी संज्ञा दी गयी। और देव दीपावली मनाई गयी। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सभी देवता धरती पर आकर गंगा स्नान करते हैं। इस दिन गंगा स्नान का इतना महत्व है कि यदि किसी के लिए गंगा स्नान करना संभव नहीं है तो वे अपने घर में स्नान हेतु लिए हुए जल में गंगाजल की कुछ बूंदे डालकर स्नान करने में अपना सौभाग्य मानते हैं।
  • देव दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को पड़ने वाली दीपावली के 15 दिन बाद मनाई जाती है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस तिथि को भगवान् का मत्स्यावतार हुआ था। इसी शुभ दिन गुरुनानक जी का जन्म हुआ था, अतः इस दिन गुरुनानक देव जयंती भी पूरे उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान तथा सामर्थ्य के अनुसार ज़रूरत मंद को अन्न दान आदि करने से भगवान् की कृपा मिलने के साथ-साथ असीम शांति तथा किसी की मुस्कान का कारण बन कर निसंदेह ही हृदय को प्रसन्नता प्राप्त होती है।

♦ नंदिता शर्मा जी। – नोएडा, उत्तर प्रदेश ♦

♦ अध्यापिका – बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, नोएडा, उत्तर प्रदेश ♦

लेखिका नंदिता शर्मा जी अभी अध्यापिका के पद पर कार्यरत है — बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, नोएडा, उत्तर प्रदेश में। नंदिता शर्मा जी KMSRAJ51.COM की सीनियर लेखक टीम पैनल की सदस्य भी है। (Nandita Sharma Ji, is also a member of the Senior Writers Team Panel of KMSRAJ51.COM.)

—————

हम दिल से आभारी हैं नंदिता शर्मा जी के “कार्तिक पूर्णिमा।” विषय पर हिन्दी में Article साझा करने के लिए।

नंदिता शर्मा जी के लिए मेरे विचार:

♣ “नंदिता शर्मा जी” ने “कार्तिक पूर्णिमा।” विषय पर कितना सुंदर-शिक्षाप्रद व अनुकरणीय वर्णन किया हैं। कार्तिक मास अपने आप में विशेषता लिए हुए है। इसकी गणना बहुत पवित्र माह के रूप में की जाती है। इस माह में किया गया पूजा पाठ भगवान् को अत्यंत प्रिय माना जाता है। पूरे माह ब्रह्ममुहर्त में स्नान करने का विशेष महत्व है। लोग कार्तिक महात्म्य पढ़कर अथवा भावानुसार पूजा पाठ कर प्रभु को याद करते हैं।

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