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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

बहू या बेटी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बहू या बेटी। ♦

बहू को बेटी समझा जाये,
तो क्या इसमें गलत है।
जब माँ पिता के घर से आई,
वह एक अंजान घर में।

आकर वों नये लोंगो के,
बीच आकर जीवन की,
नयी शुरुआत करती है।
सारे परिवार की पसंद,
नापसंद का ख्याल रखती है।

किसको कब किस चीज,
की जरूरत या तकलीफ है।
सबके लिए वो त्याग करती है,
फिर हम उसको बहू मानते है।

बहू को अगर बेटी मान ले,
तो उसको कभी अपने घर,
की कभी याद नहीं आएगी।
और उसका मान भी बढ़ेगा।

उसको भी अहसास होगा,
वो भी गर्व से कह सकती है,
मैं घर की बहू नहीं बेटी हूँ।
बहू को बेटी समझा जाये,
यह रीति भी नयी होंगी।

तुम पराये घर से आयीं हो,
क्या समझोगी हमारा दुख।
यह कहकर चुप कराया जाता है।
बहु को बेटी समझ कर देखो,
वो भी किसी की बेटी है।

हम उसको माँ सा प्रेम देगें,
वो भी आपको माँ मानेगी।
आपका कहना भी सुनेंगी,
बहु से बेटी बनने में देर न लगेगी।

आपके मान सम्मान को रखेगी,
बहु को भी बेटी सा प्रेम मिले।
फिर क्यो पीहर की याद करें,
जो भी परेशानी हो उसको,
सासू माँ को ही बताएगी।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बहू को बेटी समझा जाये, तो क्या इसमें गलत है। विवाह के बाद जब माँ पिता के घर से आई, वह एक अंजान घर में। सभी नये लोंगो के बीच आकर जीवन की नयी शुरुआत करती है वह, परिवार के सभी सदस्यों के पसंद – नापसंद का सदैव ही ख्याल रखती है वह। सभी के सुख के लिए तकलीफ सहती त्याग करती वह। बहू को जब हम बेटी मान ले, तो उसको कभी भी अपने घर की याद नहीं आएगी, और उसका मन भी लगा रहेगा। उसको भी अच्छा लगेगा, वो भी गर्व से कह सकती है, मैं इस घर की बहू नहीं बेटी हूँ। जब हम उसको माँ सा प्रेम देगें, वो भी आपको माँ मानेगी। आपका कहना भी सुनेंगी, बहु से बेटी बनने में देर न लगेगी। सदैव ही आपके मान सम्मान का ख्याल रखेगी, बहु को भी बेटी सा प्रेम जब मिले, फिर क्यो पीहर की याद करें। जो भी परेशानी हो उसको, सासू माँ को ही बताएगी।

—————

यह कविता (बहू या बेटी।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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ईश्वर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ईश्वर। ♦

जीवन तुमने दिया है प्रभु,
गिरेंगे तो संभालो तुम्हीं।
पथ अगर भटक जाए कोई,
तो सही डगर दिखायो तुम्हीं।

नेक राह पर काटे उगाए कोई,
उसको गलत सही बताओगे तुम्हीं।
आपने दिया जीवन मानव का,
इसको मावन सेवा में लगाने का।

मार्गदर्शन भी कराओगे तुम्हीं,
किस पथ किस रूप में मदद मांगे।
कोई हो संदेह तो दूर करोगे तुम्हीं,
कोई दुख दर्द में हों प्रभु।

उसको देना अपनी दया,
आप ही करुणा बरसाने वाले।
जीवन भी हमारा आपके लिए,
जो चाहे वो बना दो हमें।

हम बहती नदिया के किनारे,
जहाँ देगे आप ही सहारा।
आप ही दुनियां के रखवाले,
सबको एक नजर से देखने वाले।

आप ही दुनियां के पालनहार,
दुख और कष्ट से उबारने वाले।
चरणों मे कोटि कोटि वंदन,
सब प्रभु की महिमा गाते है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह जीवन प्रभु का दिया हुआ है, हे प्रभु जब भी हम गिरेंगे तो संभालो तुम्हीं। जीवन में कभी अगर पथ भटक जाए कोई, तो सही मार्ग दिखायो तुम्हीं। सत्य व अच्छे के साथ अगर कोई बुरा करे तो, उसका फल उन्हें देना तुम्हीं। आपने दिया है जीवन मानव तन का, इसको मावन सेवा में ही लगाना है। हे प्रभु जीवन के हर मोड़ पर चाहे सुख हो या दुख दर्द, सदैव मार्गदर्शन करते रहना तुम्हीं। आप ही करुणा बरसाने वाले, करुणा के सागर, ये जीवन भी हमारा आपके लिए जो चाहे वो बना दो हमें। इस संसार रूपी बहती नदिया के किनारे हम, जहाँ देगे आप ही सहारा प्रभु। आप ही दुनियां के रखवाले है, सबको एक नजर से देखने वाले है। आप ही इस दुनियां के पालनहार हो प्रभु, सदैव ही दुख और कष्ट से उबारने वाले। हे प्रभु आपके चरणों मे कोटि कोटि वंदन।

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यह कविता (ईश्वर।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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सूर्य देव! आओ तुम्हारा स्वागत है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सूर्य देव! आओ तुम्हारा स्वागत है। ♦

हाथ जोड़ नमस्कार कर तेरा स्वागत करते है हम।
हे देव! तेरे दर्शनों के बिना सब आँखें हो गयी थी नम॥

हे सूर्य देव! लगभग एक महीने में दर्शन दिए हैं तुमने।
अपनी प्रकाश भरी किरणों से सराबोर किये तुमने॥

नमन तुझकों बारम्बार तुम्हारी बहुत बाट निहारी हमने।
दर्शन देकर ठंड से ठिठुरती हर जिंदगी सँवारी तुमने॥

इस बर्फीले मौसम में हर इंसान का खून भी जम सा गया था।
जरूरी कार्यों को करने का दौर भी थम सा गया था॥

तेरी रोशनी बिखराती किरणों ने उजियारा भर दिया।
जन-जन के दिलों के अंदर ऊर्जा का संचार कर दिया॥

छंट गया अब सब अंधकार धुंध, कोहरे, बरसात का।
ये सब चमत्कार है तेरे आने की करामात का॥

पचहत्तर करोड़ लोगों ने भी तुझें एक साथ नमस्कार किया।
नमन को स्वीकार कर तूनें अपनी रहमत को बरसा ही दिया॥

जो गुहार लगाई थी हर दिल ने तेरे आने की।
धन्य किया तुमने कृपा की जो धूप बरसाने की॥

हे सूर्य देव! हर अंधेरे को हरने वाली तेरी प्रकाशित किरणों को कोटिशः नमन मेरा।
अपने दर्शन देकर कर दिया तूनें हर घर – आँगन सुखों का सवेरा॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आधा से ज्यादा भारत में सर्द मौसम का कहर और उसके ऊपर बारिश का कहर और तो और सूर्य देव का यूँ लुकाछुपी, अचानक से मौसम में सर्द-गर्म होने की वजह से लोगों में ठिठुरन के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं सर्दी – जुकाम, बुखार का होना। सर्दी से ठिठुरन के कारण जरूरी कार्यों को भी समय से न कर पाना। इस तरह की और भी बहुत सारी समस्याएं थी, लेकिन अभी “तेरी रोशनी बिखराती किरणों ने उजियारा भर दिया। जन-जन के दिलों के अंदर ऊर्जा का संचार कर दिया। छंट गया अब सब अंधकार धुंध, कोहरे, बरसात का। ये सब चमत्कार है तेरे आने की करामात का।” पचहत्तर करोड़ लोगों ने भी तुझें एक साथ नमस्कार किया। नमन को स्वीकार कर तूनें अपनी रहमत को बरसा ही दिया।

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यह कविता (सूर्य देव! आओ तुम्हारा स्वागत है।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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नेताजी तो एक ही थे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नेताजी तो एक ही थे। ♦

नेताजी तो एक ही थे बाकी सब तो व्यापारी हैं।
माँ की आजादी के लिए जिसने खुद को तड़ीपार किया,
गोरों की तोपों के आगे झुकने से भी इंकार किया।
जापान से जर्मनी तक क्या पीड़ा नहीं सहा उसने,
बिन संसाधन सिंगापुर में ‘आजाद हिंद फौज’ तैयार किया।
उस दूरदृष्टि पावन जज्बे के हम दिल से आभारी हैं।
नेताजी तो एक…

कौन खून देता है अब लोग बेच रहे पानी को भी,
चालाकी से भुना रहे जुर्म, प्रजा पे मनमानी को भी।
बेच दिया खुद का ज़मीर और जमीन, शुचिता माँ की,
अब बेच रहे हैं जात-पात, सपने, हिंदुस्तानी को भी।
वो गुलाम थे फर्ज था उनका हम प्रतिनिधि सांसारी हैं।
नेताजी तो एक…

ना दमन चक्र ना ही लाठी, तलवारों से डरते थे वो,
हर उच्छवास में “अंग्रेजों भारत छोड़ो” भरते थे वो।
अब तो जेल के नाम से ही घिग्घी बंध जाया करती है,
कारागार से भी “जय हिंद” हुंकार भरा करते थे वो।
वो सेवक थे वो सैनिक थे हम राजा हैं अधिकारी हैं।
नेताजी तो एक…

आज के नेता दिल्ली जाते हैं व्यक्तिगत स्वार्थ से,
हैं बैठते प्रायोजित धरने पे पार्टी के परमार्थ से।
अब “दिल्ली चलो” के नारे से दिल्ली क्या गली भी ना हिलती।
बड़ी-बड़ी कुर्बानियाँ देते टी वी पर शास्त्रार्थ से,
राष्ट्र बना धृतराष्ट्र लुट रही जनता, माँ गांधारी हैं।
नेताजी तो एक…

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

  • “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है – नेताजी तो एक ही थे, उनके जैसा सच्चा देशभक्त कोई नहीं। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत के एक महान देशभक्त और बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थे। वो स्वदेशानुराग और जोशपूर्ण देशभक्ति के एक प्रतीक थे। हर भारतीय बच्चे को उनको और भारत की स्वतंत्रता के लिये किये गये उनके कार्यों के बारे में जरुर जानना चाहिये। इनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक हिन्दू परिवार में हुआ था।

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यह कविता (नेताजी तो एक ही थे।) “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपने सच्चे मन से देश की सेवा के साथ-साथ एक कवि हृदय को भी बनाये रखा। आपने अपने कवि हृदय को दबाया नहीं। यही तो खासियत है हमारे देश के वीर जवानों की। आपकी कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

About Yourself – आपके ही शब्दों में —

  • नाम: शैलेश कुमार मिश्र (शैल)
  • शिक्षा: स्नातकोत्तर (PG Diploma)
  • व्यवसाय: केन्द्रीय पुलिस बल में 2001 से राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत।
  • रुचि: साहित्य-पठन एवं लेखन, खेलकूद, वाद-विवाद, पर्यटन, मंच संचालन इत्यादि।
  • पूर्व प्रकाशन: कविता संग्रह – 4, विभागीय पुस्तक – 2
  • अनुभव: 5 साल प्रशिक्षण का अनुभव, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अफ्रीका में शांति सेना का 1 साल का अनुभव।
  • पता: आप ग्राम-चिकना, मधुबनी, बिहार से है।

आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे, जनमानस के कल्याण के लिए। उस अनंत शक्ति की कृपा आप पर बनी रहे। इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस लेख को विराम देता हूँ। तहे दिल से KMSRAJ51.COM — के ऑथर फैमिली में आपका स्वागत है। आपका अनुज – कृष्ण मोहन सिंह।

  • जरूर पढ़े: चली जाती है।
  • जरूर पढ़े: अच्छा लगता है।

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पहले और अब – गणतंत्र दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पहले और अब – गणतंत्र दिवस। ♦

चलो कुछ नया सवेरा लाए, सत्य की राहों पर चले, देश में नया उजियारा फैलाएं।

वो जमीन न रही, वो आसमां न रहा,
गणतंत्र दिवस मना रहें हैं हम।
वो गण न रहे वो तंत्र न रहा,
वो जमीन न रही वो आसमां न रहा॥

संविधान हम सब पूजते हैं,
हर जन के मन में विधान न रहा।
न्याय है किताबों में हकीकत में न रहा,
वो जमीन न रही वो आसमां न रहा॥

बात जब आती है अधिकारों पर,
तरिका-ए-कार न रहा।
वो मानव अधिकार न रहा,
वो जमीन न रही वो आसमां न रहा॥

प्रस्तावना को उद्देशिका कहा जाता रहा,
संविधान निर्माता राष्ट्र निर्माण सजाता रहा।
संपूर्ण प्रभुता के साथ संपन्नता दिखाता रहा,
वो जमीन न रही वो आसमां न रहा॥

समाजवाद, पंथ निरपेक्षता को 42वें,
संशोधन से जोड़ा गया॥
लोक तंत्रात्मक जनता का शासन बताते रहे,
वो जमीन न रही वो आसमां न रहा॥

गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को हम मनाते रहे,
सामाजिक, आर्थिक न्याय की गुहार लगाते रहे।
न्यूनतम और अधिकतम आयु हमें दर्शात रहा,
वो जमीन न रही वो आसमां न रहा॥

राजनीति, विचार अभिव्यक्ति बताते रहे,
अध्याय 19(1) जनमत निर्माण हमें बताते रहे।
विश्वास, धर्म उपासना का अधिकार भी बताता रहा,
वो जमीन न रही वो आसमां न रहा॥

प्रतिष्ठा और अवसर की समानता भी बताता रहा,
व्यक्ति की गरिमा न रही फिर भी गिनवाता रहा।
राष्ट्र की एकता अखंडता सलामत रही।
भाई से भाई को मरवाता रहा,
वो जमीन न रही वो आसमां न रहा॥

आओ हम सब सच्चाई का रूख अपनाएं,
26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाए।
हर जन में मानव व मानवीयता बनी रहे।
वो जमीन भी उजागर हो आसमां भी उजागर रहे॥
जय हिन्द जय भारत॥

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

—————

  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए समझाने की कोशिश की हैं — कड़वा है मगर सत्य है… जिन सूरमाओं ने अपने रक्तिम रंग से खेली क्रांति की होली थी। भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी। सदैव ही इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी। वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी। इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी? यह राष्ट्रीय पर्व हमें देश की एकता और गौरव को बनाये रखने की प्रेरणा देता है। हम सभी को संविधान के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 26 जनवरी के दिन ही भारत को गणराज्य का सर्वोत्तम दर्जा प्राप्त हुआ। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक परेड निकाली जाती है। जिस वतन ने हमें प्यार, मां का आंचल, समरसता, रंग रूप भेष भाषा सभी को मिलता मान दिया उस वतन पे हमें नाज है। जिस वतन का सबसे बड़ा संविधान लोकतंत्र जिसकी शान वो भारत देश महान वो भारत देश महान। वतन हमारी आन हमारा सम्मान है उस मां को हमारा सलाम वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम्॥

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यह कविता (पहले और अब – गणतंत्र दिवस।) “विजयलक्ष्मी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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उन्मुक्त जिंदगी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ उन्मुक्त जिंदगी। ♦

याद इन्हें भी कर लें आज।

दे दी हमें उन्मुक्त सी जिन्दगी।
आज़ादी में साँस लेने के लिये।
रो रही थी माँ भारती।
बेड़ियों में पड़ी गुलामी में,
हुंकार उठी नव खूनों में।

दासता की बेड़ियां तोड़ने के,
सन् सत्तावन में लगी आग बरसने।
अंग्रेजों के सीनों पर,
नाना तात्या मंगल बहादुर,
रानी लक्ष्मी कुंवर के हाथों से।

ह्यूज कार्नेल और डलहौजी जैसे,
कितने भागे अपने सिवरों में।

मेरठ कानपुर सतारा झांसी,
दिल्ली बिठूर लेते जाते वीरों ने।
फड़नवीश के तलवारों से,
क्रांतिवीर के हुंकारों से।

बेड़ियां लगी टूटने जब,
हाय! कैसी बिडंबना आई।
रानी गई काल-कवलित हो,
दे अगली पीढ़ी को,
हम न सके पूरे तोड़ने बेड़ी को,
माँ रो रही है बेड़ी में।

भुवन के नन्हें कामों से,
फिर जोश-उल्लास भर गया।
नौजवानों में।
हुंकार उठे कूका-बिरसा,
ले आदिवासी वीरों ने।

नीलांबर-पीताम्बर बंधुओं ने,
बरसा तीर-कमानों से।
छुड़ा दिये पसीने अंग्रेजों के,
लेकिन ये भी लड़े भिड़े,
तोड़ न पाये जंजोरों को।

पुनः नई आवाज उठी,
बेटों-बेटियों के हुंकारों से।
किशोर युवा चले मिटाने।
गुलामी की जंजीरों को।

कूद पड़े लाला लाजपत राय,
तिलक चापेकर बंधु पटेल खान।
ये सब बातों से,
कहां सुनने वाले थे।

बहरे थे कानों के,
इन्हें धमाके सुनने थे।
असफाक विस्मित दीनबन्धु,
खुदीराम बोस के गानों के।
पंजाब से उठे शोले फैले।

उत्तर प्रदेश बंगाल गुजरात,
मध्यभारत ओड़ीसा कर्नाटक,
आन्द्रा के हुंकारों से,
डोल गया एलिजाबेथ का,
सिंहासन लंदन के गलियारों में।
थर-थर कांपने लगे कागज के वीर,
जो उन्मुक्त हो करते,
अत्याचार भारत के गलियों में।

सुभाष बोस की सेना जब रंगून गई,
भागे अंग्रेज अपने घरों में।
लक्ष्मी सहगल बनी लेफ्टीनेंट,
मुजिबुर्रहमान बने कमाण्डर।
कर दिये बेड़ागर्क अंग्रेजों के,
उपनिवेश की आँधी ले चलते थे,
उड़ गए फिर तूफानों में।

भगत सिंह राजगुरू सुखदेव,
भाभी दुर्गा के चण्डों से।
फणीश्वर जैसे बच्चे गरजे,
भरी अदालत में बंदूकों से।
रक्त जब गिरने लगा अंग्रेजों के,
नाच उठी मौत की छाया।
जब इनके सीनों में।

भाग पड़े अंग्रेज अपने बिलों में,
दिल कांपा मन बिचलित हो भागा।
फिर लंदन की गलियों में।
मिली स्वतंत्रता जब भारत को,
माउण्टबेटन ने तभी चली चाल।

माँ भारती के सीने में,
कर दिये दो टुकड़े।
हिन्दुओं के वृहद को खंडित कर,
यवन को पाकिस्तान दे।
भारत को खंडों में विभक्त कर दिया।

आजाद भगतसिंह खुदीराम सुभाष,
असफाक विस्मिल राजगुरू जैसे,
कितने वीरों के सपनों को तोड़,
कर दिया टुकड़े में अंग्रेजों ने।

जतिन दास के भूखों में भी,
देखे थे सपने उन्मुक्त वृहद भारत के।
आज़ादी के सपने,
सब शहीदों ने मिलकर दें दिया हमको,
आज़ादी से उन्मुक्त जीने को।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है — जिन सूरमाओं ने अपने रक्तिम रंग से खेली क्रांति की होली थी। भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी। सदैव ही इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी। वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी। इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी? यह राष्ट्रीय पर्व हमें देश की एकता और गौरव को बनाये रखने की प्रेरणा देता है। हम सभी को संविधान के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 26 जनवरी के दिन ही भारत को गणराज्य का सर्वोत्तम दर्जा प्राप्त हुआ। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक परेड निकाली जाती है। जिस वतन ने हमें प्यार, मां का आंचल, समरसता, रंग रूप भेष भाषा सभी को मिलता मान दिया उस वतन पे हमें नाज है। जिस वतन का सबसे बड़ा संविधान लोकतंत्र जिसकी शान वो भारत देश महान वो भारत देश महान। वतन हमारी आन हमारा सम्मान है उस मां को हमारा सलाम वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम्॥

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यह कविता (उन्मुक्त जिंदगी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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26 जनवरी की पावन बेला।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ 26 जनवरी की पावन बेला। ♦

जिन सूरमाओं ने रक्तिम रंग से, खेली क्रांति की होली थी।
भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी।
इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी।
वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी।
इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी?

जेल गए वे तख्त चढ़े, कलई अंग्रेजों की उन्होंने खोली थी।
हर वार सहे हर प्रहार सहे पर, उफ तक न उन्होंने बोली थी।
शूर वीर उन महारथियों की, एक नियत, एक ही तो बोली थी।
इंकलाब ज़िंदाबाद, गुलामी की बेड़ी उन्होंने ही खोली थी।
इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्जत, माटी में रोली थी?

सरताज तिरंगा भारत का बनाने हेतु, दुश्मनी तब मोली थी।
जुर्म सहे लाख अत्याचार भी, जो कोड़े खा खाल खोली थी।
निज लहू के पावन जन जल से, गुलामी की कीच धो ली थी।
फिरंगी को भगाकर भारत से, भारत मां की जय बोली थी।
इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्जत, माटी में रोली थी?

26 जनवरी की पावन बेला, यूं ही तो न भारत में आई थी।
इस दिन को देखने खातिर, पूर्वजों ने लड़ी कड़ी लड़ाई थी।
15 अगस्त को आजादी पाकर, संविधान सभा बनाई थी।
तब जाकर 26 जनवरी की, यह सद पावन बेला आई थी।
किताबी ज्ञान में नेता जी की, असलियत काहे छुपाई थी?

आजाद हुआ फिर भारत धन्य, संविधानी पोथी बनाई थी।
26 जनवरी1950 को तब, नियमावली भी लागू कराई थी।
इस बीच फिरंगी ने अपनी, फूट डालो की चाल चलाई थी।
भारत के टुकड़े करने हेतु, हिन्दू मुस्लिम में डाली लड़ाई थी।
किताबी ज्ञान में नेता जी की, असलियत काहे छुपाई थी।

नई पीढ़ी के लोग क्या जाने, कि ये घड़ियां कैसे आई थी?
पुरखों ने घड़ियां पाने खातिर, खून की नदियां जो बहाई थी।
कई कोखें उजड़ी, मांगे उजड़ी, तब जाकर आजादी आई थी।
छुप छुप कर गोरों से लड़े भिड़े, तब जाकर आजादी पाई थी।
किताबी ज्ञान में नेता जी की, असलियत काहे छुपाई थी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है… जिन सूरमाओं ने अपने रक्तिम रंग से खेली क्रांति की होली थी। भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी। सदैव ही इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी। वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी। इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी? यह राष्ट्रीय पर्व हमें देश की एकता और गौरव को बनाये रखने की प्रेरणा देता है। हम सभी को संविधान के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 26 जनवरी के दिन ही भारत को गणराज्य का सर्वोत्तम दर्जा प्राप्त हुआ। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक परेड निकाली जाती है। जिस वतन ने हमें प्यार, मां का आंचल, समरसता, रंग रूप भेष भाषा सभी को मिलता मान दिया उस वतन पे हमें नाज है। जिस वतन का सबसे बड़ा संविधान लोकतंत्र जिसकी शान वो भारत देश महान वो भारत देश महान। वतन हमारी आन हमारा सम्मान है उस मां को हमारा सलाम वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम्॥

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यह कविता (26 जनवरी की पावन बेला।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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गणतंत्र दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गणतंत्र दिवस। ♦

गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा फहराने वाले हम,
लोकतंत्र का ईमानदार असली रूप दिखाने वाले हम।
स्वाभिमान का फिर से जागरूकता लाने वाले हम,
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा फहराने वाले हम॥

देशभक्ति का सुंदर दर्पण है पाठ पढ़ाने वाले हम,
दर्शन और काव्य समन्वय की रेखा खींचने वाले हम।
सपनों के बाजार में उपलब्ध सहायता लाने वाले हम,
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा फहराने वाले हम॥

ग्राम जीवन के गौरव में निखार लाने वाले हम,
अंधेरी से लोगों को प्रकाश में लाने वाले हम।
वेद शास्त्र का मानव जीवन में पाठ पढ़ाने वाले हम,
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा फहराने वाले हम॥

घृणा और भय का वह बाजार मिटाने वाले हम,
लोक संस्कृति लोक भाषा को स्थापित करने वाले हम।
राष्ट्रीयता से भरा पूरा समाज बनाने वाले हम,
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा फहराने वाले हम॥

नौजवानों को तरह-तरह का हुनर सिखाने वाले हम,
भेदभाव रहित समाज का निर्माण करने वाले हम।
दुनिया के लिए सुंदर वैज्ञानिक देने वाले हम,
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा फहराने वाले हम॥

शांति और शक्ति का नया विधान लाने वाले हम,
सारी दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाने वाले हम।
गणतंत्र दिवस और आजादी का तिरंगा लहराने वाले हम।
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा फहराने वाले हम॥

गुलामी की मानसिकता वाले जंजीरों को तोड़ने वाले हम,
आजादी के लिए वीर ​मरने – मिटने वाले हम।
क्रांतिकारियों से भरा है भारत गणतंत्र मनाने वाले हम,
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा लहराने वाले हम॥

राजनीति को खूंटी पर टांग कर संग्राम में कूदने वाले हम,
भगत आजाद का भारत देश कहीं ना झुकने वाले हम।
जाति धर्म से ऊपर उठकर समानता लाने वाले हम,
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा फहराने वाले हम॥

दुनिया में सबसे ऊपर तिरंगा लहराने वाले हम,
गणतंत्र दिवस की शुभ बेला में वंदे मातरम कहने वाले हम।
सेना की अनुपम वीरता की गाथा गाने वाले हम,
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर तिरंगा फहराने वाले हम॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

मेरे प्रिय पाठकों आपको सपरिवार गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं।-KMSRAJ51

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — यह राष्ट्रीय पर्व हमें देश की एकता और गौरव को बनाये रखने की प्रेरणा देता है। हम सभी को संविधान के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 26 जनवरी के दिन ही भारत को गणराज्य का सर्वोत्तम दर्जा प्राप्त हुआ। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक परेड निकाली जाती है। जिस वतन ने हमें देशभक्ति, प्यार, मां का आंचल, समरसता, रंग रूप भेष भाषा सभी को मिलता मान दिया उस वतन पे हमें नाज है। जिस वतन का सबसे बड़ा संविधान लोकतंत्र जिसकी शान वो भारत देश महान वो भारत देश महान। वतन हमारी आन हमारा सम्मान है उस मां को हमारा सलाम वंदे मातरम् …वंदे मातरम् …वंदे मातरम्॥

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (गणतंत्र दिवस।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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मां तुझे सलाम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मां तुझे सलाम। ♦

जिस
वतन ने
हमें प्यार दिया
उस वतन पे हमें नाज है॥

जिस
वतन ने
हमें महफूज किया
उस वतन पे हमें नाज है॥

जिस
वतन को
दासता से मुक्त किया
उस देश भक्त पे हमें नाज है॥

जिस
वतन ने
मां का आंचल दिया
उस ममता पे हमें नाज है॥

जिस
वतन की
आजादी के लिए
प्राणों की आहुति तक दी
उन देशप्रेमी के जज्बे पे हमें नाज है॥

जिस
वतन ने
समरसता का
पाठ सिखलाया
उस वतन पे हमें नाज है॥

जिस
वतन में
रंग रूप भेष भाषा
सभी को मिलता मान
उस देश पे हमें नाज है॥

जिस
वतन ने हमें
सबकुछ दिया
लहू से कर्ज चुकाएंगे
देश प्रेम के जज्बे को और बुलंद बनाएंगे॥

जिस
वतन का
सबसे बड़ा संविधान
लोकतंत्र जिसकी शान
वो भारत देश महान वो भारत देश महान॥

वतन
हमारी आन
हमारा सम्मान है
उस मां को हमारा सलाम
वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम्॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

मेरे प्रिय पाठकों आपको सपरिवार गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं।-KMSRAJ51

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — यह राष्ट्रीय पर्व हमें देश की एकता और गौरव को बनाये रखने की प्रेरणा देता है। हम सभी को संविधान के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 26 जनवरी के दिन ही भारत को गणराज्य का सर्वोत्तम दर्जा प्राप्त हुआ। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक परेड निकाली जाती है। जिस वतन ने हमें प्यार, मां का आंचल, समरसता, रंग रूप भेष भाषा सभी को मिलता मान दिया उस वतन पे हमें नाज है। जिस वतन का सबसे बड़ा संविधान लोकतंत्र जिसकी शान वो भारत देश महान वो भारत देश महान। वतन हमारी आन हमारा सम्मान है उस मां को हमारा सलाम वंदे मातरम् …वंदे मातरम् …वंदे मातरम्॥

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यह कविता (मां तुझे सलाम।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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राष्ट्रीय पराक्रम दिवस।

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♦ राष्ट्रीय पराक्रम दिवस। ♦

नेता जी को राष्ट्रीय पराक्रम दिवस का पहनाए ताज।
इनके हौंसले, वीरता भरे जज्बातों को शीश झुकाए आज॥

स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता कहलायें सुभाष चन्द्र बोस।
जो भी नारा दिया बना बाद में वहीं आजादी का विजय-घोष॥

विरासत में मिला इनको दमन चक्र के विरोध का जज़्बा।
इनके पिता जी ने भी ठुकराया था रायबहादुर के पद का रुतबा॥

अंग्रेजों से आजादी दिलाने चले राष्ट्र-प्रेम का संकल्प लेकर।
सेना में जोश भरते आजादी के नए-नए नारों का विकल्प देकर॥

राष्ट्रसेवा के पथ से विचलित न होना कभी दिया पिता ने मूलमंत्र।
समभाव, निडरता से एकता के सूत्र में बांधा जनतंत्र॥

सच्चाई, कर्तव्य, बलिदान देकर ही देश के प्रति बने वफादार।
नेताजी की प्यारी बातों को समाहित कर दिखलाए सच्चा राष्ट्र-प्यार॥

उनके विचारों में तो संघर्ष भरा जीवन ही संग अपने समाधान लायें।
संघर्षहीन व कायरता युक्त जीवन तो स्वादहीन कहलायें॥

सुभाषचंद्र जी ने तो लेखन से भी भारतीयों को शब्द-क्रांति सिखलाई।
इनकी पुस्तक भारत का संघर्ष फिर लंदन से प्रकाशित हो आई॥

“तुम मुझें खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” ये प्रसिद्ध उनका था नारा।
ऐसे वीर देशभक्त को सदैव नमन करेगा राष्ट्र हमारा॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है ऐसे महापुरुष सदी में एक दो ही जन्म लेते है… इस कविता के माध्यम से नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के पराक्रम, कर्तव्य व देश प्रेम को बताने की कोशिश की है। इनके साहस, हौंसले, वीरता भरे जज्बातों को शीश झुकाए आज भी हम सभी। हमे गर्व है अपने नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के पराक्रम पर, जिनके नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम व आजादी का विजय-घोष हुआ। विरासत में मिला इनको दमन चक्र के विरोध का जज़्बा, इनके पिता जी ने भी ठुकराया था रायबहादुर के पद का रुतबा। अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए चले राष्ट्र-प्रेम का संकल्प लेकर, सेना में सदैव जोश भरते आजादी के नए-नए नारों का विकल्प देकर। राष्ट्रसेवा के पथ से विचलित न होना कभी दिया पिता ने मूलमंत्र, समभाव, निडरता से एकता के सूत्र में बांधा जनतंत्र को। “तुम मुझें खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” ये प्रसिद्ध उनका था नारा। ऐसे वीर देशभक्त को सदैव ही नमन करेगा राष्ट्र हमारा।

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यह कविता (राष्ट्रीय पराक्रम दिवस।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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