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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

भारत में भूतहा जगह कहां और कौन?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारत में भूतहा जगह कहां और कौन? ♦

भारत में भूत-ही जगह देखने जब जाइए,
नियम और कानून का पालन करते हुए जाइए।
आप जब स्थानीय आदेश पर चलोगे अगर,
तो पर्यटन का आनंद मिलता रहेगा मंगल॥

पुणे का शनिवार बाड़ा किला है पुराना महान,
बाजीराव पेशवा से जुड़ा हुआ है यह स्थान।
हॉन्टेड माना जाने वाला इस किले के अंदर,
मना किया जाता है सूरज डूबने के बाद जाना॥

राजस्थान के अलवर में स्थित भानगढ़ का किला,
बहुत ही सुंदर सुहाना लेकिन किला है डरावना।
कहते 17 वीं सदी में इसका निर्माण हुआ था,
भूतिया गतविधियों से विद्यमान यह किला है।
सूरज डूबने के बाद शाम से यहां इंट्री बंद रहती,
यहां चाहे कोई राजनीतिक जाए या आए विद्वान॥

मुंबई के कोलाबा में स्थित है मुकेश मिल्स,
देश की 10 हॉन्टेड जगहों में यह शामिल हिल।
फिल्मों की शूटिंग के लिए मशहूर है मिल,
भूतों की कहानियां से भरपूर है सबका दिल॥

राजस्थान से 18 किलोमीटर दूरी पर स्थित गांव,
कुलधरा गांव में कभी 600 परिवार रहते थे।
सुना था रसोई के बाद यहां भी कोई नहीं रहता,
रातों रात गांव छोड़ कर लोग कहीं चले गये॥

हैदराबाद का गोलकुंडा फोर्ट का 13 वीं सदी में निर्माण हुआ,
इस फोर्ट में रानी तारामती की आत्मा रात में चलती है।
जिसको पति के साथ यहां दफनाया गया था,
डांस करती और डांस करने की आवाज आती॥

बृज राजभवन पैलेस कोटा राजस्थान में स्थित,
लगभग 180 वर्ष पुराना बताया जाता रहा है।
पैलेस को 18 सौ अस्सी में हेरिटेज होटल बना दिया गया,
हेरिटेज होटल में एक ब्रिटिश मेजर बर्टन का भूत रहता है।
ब्रिटिश मेजर बर्टन को सन 1857 में ही मारा गया था,
मेजर को भारतीय सिपाहियों ने हीं मारा था॥

दार्जिलिंग का डाव हिल, कुर्सियांग इलाका,
प्राकृतिक खूबसूरती में बहुत ही मशहूर है।
स्थानीय लकड़ हारो का कहना है कि यहां,
बिना सिर वाला एक लड़का टहलता रहता है।
यह इलाका भुतहा अनुभव से भरा हुआ है,
जंगल में लकड़ी काटने वालों ने सिर विहीन लड़का देखा॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में भारत के सभी मुख्य भूतहा जगह के बारे में बताने की कोशिश की है जो काबिले तारीफ है। भारत में भूत-ही जगह देखने जब जाइए, नियम और कानून का पालन करते हुए जाइए। आप जब स्थानीय आदेश पर चलोगे अगर, तो पर्यटन का आनंद मिलता रहेगा मंगल॥

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यह कविता (भारत में भूतहा जगह कहां और कौन?) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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हस्तिनापुर नरेश परीक्षित।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हस्तिनापुर नरेश परीक्षित। ♦

युधिष्ठिर द्रोपदी आदि से अनुमति लेकर,
श्री कृष्ण ने द्वारिका पुरी का किया प्रस्थान।
आंखों से ओझल हो जाने पर श्री कृष्ण के,
प्रेम जनित उत्कंठा के पर बस अर्जुन गुणवान॥

अभिन्न निर्दयता और प्रेम व्यवहार लिए,
याद पर याद आती रही वहीं बारंबार उन्हें।
शरीर प्राण से रहित होती तो मृत्यु होती सुने,
परंतु श्री कृष्ण वियोग में संसार अप्रिय दिखता उन्हें॥

उन्हीं के सानिध्य में देवताओं और इंद्र को भी,
जीत कर अग्नि देव को खांडव वन दान किया।
अनु जय भीम सेना ने उन्हें की शक्ति सेवा कर,
अभिमानी जरासंध का भी वध था किया॥

जिन राजाओं को जरासंध ने बंदी था बनाया,
उन्हीं बहुत राजाओं को भगवान ने मुक्त कराया।
जिन – जिन दुष्टों ने भरी सभा में महारानी,
द्रोपदी को छूने का साहस रहा किया॥

आंखों में बिखरे आंसू भरकर तब द्रोपदी,
श्री कृष्ण के चरणों में जा गिरी पड़ी।
उस घोर अपमान का बदला लेने को,
भगवान श्री कृष्ण ने प्रण तब था ठाना॥

मन खडयंती दुर्योधन में आकर वन वास में,
ऋषि दुर्वासा ने हमें दुष्कर संकट में डाला था।
बचे पात्र की शाक की एक पत्ती के भोग,
लगाकर श्री कृष्ण ने हम सबको पता उबारा॥

भगवान के प्रताप से युद्ध में भी हमने आकर,
पार्वती सहित शंकर को आश्चर्य में डाला।
युद्धभूमि खुश होकर शंकर ने अस्त्र पशुपति प्रदान किया,
तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र लोक पालों ने हमें दिया॥

श्रेष्ठ पुरुष मुक्ति पाने को जिन चरणों का सेवन करते!
उन्होंने दुर्लभ और दुस्तर कार्यों को भी सरल बना डाला॥

युद्ध क्षेत्र में वही हमारे रथी बने रहे,
गांडीव धनुष और बाण बहुतेरे पर,
जबकि अस्त्र – शस्त्र सब सधे हैं मेरे,
फिर भी आज रथी मैं अर्जुन हूं॥

बड़े-बड़े राजा कल तक जो सिर झुकाते थे,
श्री कृष्ण के बिना वही सब सार शून्य हो गये।
युद्ध क्षेत्र में उनकी दी गई शिक्षाएं सभी हमको,
तब – तक शांति करने वाली होती थी॥

श्री कृष्ण के चरण कमलों का चिंतन करने से,
अर्जुन की चित्तवृत्ति जब निर्मल होने लगी,
भक्ति में गण के प्रवाह, प्रबल प्रवाह मंथन ने,
अर्जुन के सारे विकारों को बाहर कर डाला॥

बुद्ध क्षेत्र के भगवान श्री कृष्ण का उपदेश,
गीता – ज्ञान पुण्यस्मरण के साथ आया पाले।
जन्म मृत्यु रूपी संसार से मुख्य मुड़ता गया,
अपने को श्रीकृष्ण में लगाते हुए चला, लगाते हुए चला॥

लोक सृष्टि के भगवान श्री कृष्ण ने,
यादव शरीर से पृथ्वी का भार उतारा।
उसी मनुष्य के शरीर का उन्होंने,
पृथ्वी से परित्याग कर डाला॥

इधर पृथ्वी पर कलयुग ने आकर पांव पसारा,
देख महाराज युधिष्ठिर ने महाप्रस्थान का निश्चय कर डाला।
सहित समान गुणों से युक्त पौत्र परीक्षित को,
समुद्री से गिरी हस्तिनापुर का राजा बना डाला॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में बताया हैं की — किस तरह सभी देवी देवताओं ने महाराजा परीक्षित को तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र प्रदान किया। हस्तिनापुर नरेश परीक्षित के जीवन पर सटीक प्रकाश डाला है। अर्जुन का श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और प्रेम को दर्शाया हैं।

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यह कविता (हस्तिनापुर नरेश परीक्षित।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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आज न जाने क्यों?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज न जाने क्यों? ♦

आज न जाने क्यों मेरे हर हौसले है, यूं बेबजह पस्त हुए?
इस दुनियां में हर आदमी, क्यों बेपरवाह और व्यस्त हुए?

आज है फुरसत नहीं यहां, किसी को किसी से बतियाने की।
रही तहजीब नहीं है शेष अब, किसी में किसी को मनाने की।

जो रूठ गया सो रूठ गया, फिर करता ही कोई बात नहीं।
अरे भाई सुलह भी तो रास्ता है, हर बात का हल तलाक नहीं।

नेमत है यह जिन्दगी खुदा की, यूं ही तो कोई इतेफाक नहीं।
सौदे जिन्दगी के हैं ये दोस्त, कोई सड़कों पर बिछी खाक नहीं।

बुजुर्गों की अब सुनता ही कौन है? युवा नशों में है खो गए।
चोर – उचक्के घूम रहे हैं खुले आम आज, कोतवाल है सो रहे।

ऊपर से नीचे तक है फैल गया, देखो तो आज भ्रष्टाचार यहां।
आदमी से आदमी का रिश्ता है स्वार्थ का, रहा कहां अब प्यार यहां?

खौलता है देख के खून तो अपना, यह लूटपाट होती खुले आम, में।
चाहकर भी न कर पाता हूं इच्छित कुछ, फंस जाता हूं बने विधान में।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बताया है की “आजकल के युवाओं का जीवन किस राह पर भटक रहा है, उनको खुद ही नही मालूम। उनके अनियंत्रित भटकते हुए जीवन का कोई किनारा नहीं।” ये कैसा समय चल रहा है जहां खुले आम लूटपाट होती है। चोर – उचक्के घूम रहे हैं खुले आम आजकल, कोतवाल है सो रहे।

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यह कविता (आज न जाने क्यों?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जीवंत भाषा में ग्राही शक्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जीवंत भाषा में ग्राही शक्ति। ♦

जीवंत भाषा का उत्तम लक्षण,
उसकी ग्राही का शक्ति होती है।
विशेषता के अनुरूप औरों से,
जितना अधिक ग्रहण कर लेते।

दूरगामी प्रभाव उसका प्रांजल।
हिंदी ने ग्रहण करने की दिशा में,
उदासीनता कभी नहीं दिखाई।
जब भी जैसे जरूरत पड़ी उसने,
अपनी भाषा शक्ति समृद्धि बढ़ाई।

विभिन्न भाषाओं की शब्द शैली,
यात्रा लंबी चलकर कदम बढाई।
ज्यों ज्ञान – विज्ञान विस्तृत होता,
हिंदी की शक्ति यदि और बढ़ती।

ग्रहण शीलता से संपन्नता आती,
हिंदी साहित्य के और काम बाकी।
चिंतन मनन में कमी न हो उदासी,
ज्ञान दर्पण के क्षेत्र में बढ़े देश वासी।

हिंदी साहित्य का बढ़ाया ज्ञान,
संस्कृत का अधिकांश ही दान।
शब्द शैली पद रचना व व्याकरण,
हिंदी अलंकार से अलंकृत होती।

भाषा संस्कृत संकुचित सीमा से पार,
जनता के विशाल क्षेत्र में जब आई!
भाषा की सहजता का प्रयोग प्रश्न,
जनता के अनरूप करने की पाई।

माना कि शासन प्रशासन शिक्षा का,
हिंदी करण तेजी से आगे बढ़ रहा है।
विस्तार के अनुकूल शब्द भंडार भरे
अनिवार्यता का अभाव भी खल रहा।

दुनियां ने ज्ञान विज्ञान की दौड़ में,
तेजी से विस्तार की रफ्तार बढ़ाया।
हिंदी शब्द भंडार में बहुलता मूल्य,
विरासत में पैतृक सम्पत्ति से पाया।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — हिंदी भाषा के गुणों और महत्व को बताते हुए अन्य भाषाओं में इसकी उपयोगिता को बताया है, चाहे वो संस्कृत की भाषा को निखारने की बात हो या अन्य भाषा की। हिंदी भाषा में जो अपनापन है वो दुनिया के किसी भी अन्य भाषा में नही है।

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यह कविता (जीवंत भाषा में ग्राही शक्ति।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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धरती पर ही।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ धरती पर ही। ♦

धधक रही है विश्व धारा आज, ज्वालाओं सी बैर – विकारों से।
अराजकताएं है कहीं फैली तो, कहीं जल रही है भ्रष्टाचारों से।

अम्बर का सब पानी बुझा न सके, कहां ठंडक चांद सितारों से?
यह नस – नस में फैली नफरत कैसे, हो सकेगी दूर सरकारों से?

ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्यी आग से, हर देश है दुनियां में जुलस रहा।
कहीं जाति, धर्म के झगड़े हैं, कहीं आवाम सत्ता से उलझ रहा।

खतरे में आज है समूची दुनियां, न के महज एक मानव प्राणी।
आतंकवाद कहीं दमन की नीति, हर देश की देखो एक कहानी।

रोग – शोक और महामारी, भ्रष्टाचार से मानवता सब भूल गए।
नकली जीवन, झूठ फरेबी, सच्चे तो मशाल से ढूंढने को ही रहे।

भाई – भाई का बैरी बना है, बाप – बेटों में भी तो आज दरारें हैं।
बहनों के साथ भी निभती कहां? पति – पत्नी में भी तकरारें हैं।

अध्यात्म से होती दूर यह दुनियां, जल रही है दहकते अंगारों सी।
अध्यात्म की पावन जलधारा ही, धो सकेगी मैल ये विकारों की।

पर लोग कहां सुनते बात यहां अब, ज्ञान, ध्यान व संस्कारों की।
होड़ लगी है सब में तो बस, कैसे कृपा मैं पा सकूं सरकारों की।

धन से बड़ा तो कुछ नहीं लगता, आज दुनियां में देखो लोगों को।
लालसा बढ़ी कि, भोग ले धरती पर ही, स्वर्ग के सारे भोगों को।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से वर्तमान समय में धरती पर पर क्या – क्या हालात हो गए है, इंसानियत किस दिशा में जा रही है कुछ पता नही किसी को। वर्तमान समय में पृथ्वी पर अनियंत्रित बिखरे हालात का सुंदर मनोरम वर्णन किया है।

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यह कविता (धरती पर ही।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस।

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♦ अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस। ♦

आज बहुत ही, शुभ मंगल घड़ी आई।
सबको आज मित्रता दिवस की हार्दिक बधाई॥

मित्रता श्रीकृष्ण और सुदामा की, दुनिया में हो गए चर्चे।
महान थी उनकी मित्रता, दिए ब्रह्मांड ने भी अव्वल दर्जे॥

आओं मित्रों, अपने दिलों में मंथन करें आज।
जुबां से न बोलें सुदामा, फिर भी श्री कृष्ण ने सँवारे काज॥

एक भरोसा, एक आस्था, विश्वास था, दोस्ती के नाम में।
दुनिया भर की खुशी देखी, बस अपने श्याम में॥

अगाध प्रेम, श्रद्धा रखी थी, सुदामा ने अपने मित्र में।
जब-जब दोस्त का चेहरा देखें,
भगवान का ही अक्स नजर आए, उनके चित्र में॥

स्वार्थ वशीभूत होकर सुदामा ने,
कभी अपनी जिंदगी की व्यथा नही सुनाई।
ना ही कभी, अपने मित्र के समक्ष रखी गरीबी की दुहाई॥

सिर्फ एक लगन में ही, सुदामा रमें जा रहा था।
बस मित्रता के नाम में, भगवान जपे जा रहा था॥

बचपन के छुटे सब संगी साथी, रखी बस दोस्ती दिल मे निभायें।
निश्चल प्यार, दुलार की लगन रखी, श्री कृष्ण से लगाएं॥

था वो बहुत ही शुभ दिन, जब भगवान के घर भक्त चला आया।
भगवान ने भी मित्रता को ही, सर्वोपरि मान, मित्र को गले लगाया॥

वो एक ऐतिहासिक दिन था, जब भगवान भक्त के,
प्यार, आस्था, विश्वास से लबालब हो गया।
सिहांसन पर बैठा, चरण धोकर मित्र भक्त सुदामा के,
और भगवान भक्त के वश में हो गया॥

आओं, हम भी मित्रता के शब्द को सार्थकता में पिरोए।
आस्था, लग्न, प्रेम को सच्चे अर्थों में ही सँजोये॥

अपने जीवन में सदैव ही, सच्ची मित्रता के बोए मोती।
मित्र बने और बनायें ऐसे,
जो तेरे पथ को प्रकाशवान करें, ऐसी जगाए ज्योति॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से इस कविता में कवयित्री ने श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देकर, एक सच्चे मित्र के गुणों और व्यवहार का सुंदर मनोरम वर्णन किया है।

—————

यह कविता (अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु। ♦

कलयुग में साक्षात शिव रूप में अवतरित हुए,
गुरु आदि शंकराचार्य।
दूर किया मानव के भाती – भाती कलशों को,
आदि शंकराचार्य की तरह आंख मूंदकर,
हठ और तर्क नहीं करते॥

वे शास्त्रीय ढंग से शास्त्र प्रमाण युक्त बातें करते,
सत्य रूप अनुभव और अनुभूतियों से संदेश लोक में देते।
शिव के वैभव और शिष्टता को संसार में,
मुक्त कंठ से बदला आने वाले॥

कलयुग में अवतार लेने वाले सिद्ध गुरुओं में से एक,
आचार्यों में अद्वितीय है आदि शंकराचार्य।
सर्वज्ञान संपन्न महा पंडित जी आदि शंकराचार्य,
ब्रह्मा अनुभूति में रमण करने वाले ब्रह्म ज्ञानी॥

विभिन्न शक्तियों सिद्धियों से युक्त सिद्ध पुरुष शंकराचार्य,
आचार्यों की तरह साधारण पुरुष नहीं थे आदि शंकराचार्य।
असत्य बाद से दूर सत्यवादी थे आदि शंकराचार्य,
बुद्धि वाद या भ्रांति वाद से अलग अनुभूति वादी आदि शंकराचार्य॥

यथार्थवादी गुणों से भरपूर संपन्न आदि शंकराचार्य,
आचार्यों की भांत संकुचित होकर,
देवताओं की निंदा कभी नहीं किया है शंकराचार्य॥

शिव की जितनी उपासना किया उन्होंने,
उतनी ही जगदंबा, विष्णु, नरसिंह स्वामी आदि देवताओं की।
शिवानंद लहरी नामक ग्रंथ की अद्भुत ढंग से लिखा,
अद्वितीय शैली की रचना कर रहस्य ज्ञान को व्यक्त किया॥

जिस प्रकार ज्ञानी को ज्ञानी ही पहचान सकता,
सर्वोत्तम को जिस प्रकार सर्वोत्तम ही पहचानता।
उसी तरह महा ज्ञानी सर्वोत्तम महागुरु आदि शंकराचार्य,
देवाधिदेव शिव शंकर स्वरूप है आदि शंकराचार्य॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में कवि ने, आदि शंकराचार्य जी के गुणों, शक्तियों और कार्यों को समझाने की कोशिश की है। आदि शंकराचार्य जी कलयुग के प्रथम गुरु है।

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यह कविता (आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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राष्ट्र भक्त बनाना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राष्ट्र भक्त बनाना होगा। ♦

रक्षा सुरक्षा का साजो सामान,
सुरक्षित शस्त्र आगामी रखना।
देश के रक्षक नौजवान हो को,
महत्वपूर्ण सहयोग करना होगा।

अस्त्र – शस्त्र विद्या की बरसा से,
बचने के लिए वंकर बनाना होगा।
आडंबर के भंवरे झाल का भी,
समूल रूप से नष्ट करना होगा।

महा पराक्रमी हिरण्याक्ष का सा,
फिर – फिर बध करना ही होगा।
जयद्रथ जैसी झूठ बोलने वाले,
को भी वैसा ही वध करना होगा।

भूखे प्यासे व्याकुल हो तो उसका,
हमें भरण – पोषण करना होगा।
कोई न भूखा नंगा रहे अपने राष्ट्र में,
विधि पूर्वक व्यवस्था करनी होगी।

देवी – देवताओं की पराक्रम गाथा,
शरणागत वत्सल को सुहाना होगा।
गृहस्थ आश्रम में रहकर सभी को,
गृहस्थ – धर्म अनुसार रहना होगा।

बुद्धिमानों को आवश्यकता अनुसार,
घर और राष्ट्र की सेवा करनी होगी।
सारी समाज को भी आगे आकर,
राष्ट्र भक्ति में योगदान करनी होगी।

गुरुकुल के नियमों में ही अब,
सत्संगी तुमको भी चलना होगा।
शास्त्र विद्या की यादें साथ – साथ,
शस्त्र विद्या का ध्यान करना होगा।

अर्जुन सा श्री कृष्ण का उपदेश,
प्रजाओं ने प्रचार करना होगा।
एकलव्य के धनुर्विद्या का ज्ञान,
शिक्षा साधारण को देनी होगी।

धर्म के अनुसार करता का ध्यान,
सारी समाज को करना होगा।
धर्म के अंदर अनादर करता का,
त्याग समाज को करना होगा।

तीर्थ का सेवन कराकर उसका,
अंतकरण से शुद्ध कराना होगा।
तत्व ज्ञानियों से शिक्षा का ज्ञान,
पास उनके जाकर लेना होगा।

पवित्र कथाओं का चरण बद्ध,
प्रचार – प्रसार भी करना होगा।
प्राकृतिक कोसी बचने के उपाय,
यज्ञ अनुष्ठान सब करना होगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है हम सभी को मिलकर ये प्रयास करना है की जो भूखे प्यासे व्याकुल हो तो उसका हमें भरण – पोषण करना होगा। कोई न भूखा नंगा रहे अपने राष्ट्र में विधि पूर्वक व्यवस्था करनी होगी। गृहस्थ आश्रम में रहकर सभी को गृहस्थ – धर्म अनुसार रहना होगा। शास्त्र विद्या के साथ-साथ शस्त्र विद्या का ध्यान करना होगा।

—————

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यह कविता (राष्ट्र भक्त बनाना होगा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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पावन माह सावन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पावन माह सावन। ♦

पावन माह सावन में, देव शिव भी चले आयें।
इंद्रदेव भी उनके स्वागत में, मेघों से जल बरसाये।
मंगल ही मंगल होगा, अब तो सब।
सारे संकट संसार के, भोले भंडारी हर लेगें अब॥

इस पावन श्रावण मास में जप से ही,
त्रिलोकी नाथ ने सबको भव से उतार दिया।
माता पार्वती की भक्ति से प्रसन्न हो,
उनको वर का उपहार दिया॥

श्रावण मास में ही शिव ने,
समुन्द्र मंथन का विष-पान कर डाला।
समस्त ब्रह्मांड के कष्टों को,
इस भोले ने पल में हर डाला॥

ऋषि मार्कण्डेय की भी भक्ति से,
प्रसन्न हो, दिया ऐसा वरदान।
यमदेव भी नतमस्तक हो सम्मुख इसके,
इसकी भक्ति को दिया मान॥

आओं इस सावन मास, हम सब
इस अमरनाथ को रिझाएँगे।
कर अर्पण दूध-जल शिवलिंग पर,
संसार की खुशियाँ ये त्रिलोकी दे जायेंगे॥

कष्टों का जो फैला दिया इस महामारी ने,
अपना प्रकोप, इस जग में।
शिव-शक्ति कर देगी कल्याण, इसकी श्रद्धा,
आस्था, भक्ति बसा लो, अपने रग-रग में॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से इस कविता में कवयित्री ने सावन का पवित्र महीना जो की, वर्षा, हरियाली, खेतों में रौनक, और शिव की भक्ति से सराबोर होता है, भोले शिव के गुणों और शक्तियों व उनका संसार के प्रति कल्याणकारी कार्यों का अच्छे से वर्णन किया है।

—————

यह कविता (पावन माह सावन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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माँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ। ♦

माँ, तेरे हर रूप की महिमा ने,
सम्पूर्ण ब्रह्मांड को हर्षाया।
तेरी चाैखट पर,
सब देवगणों ने शीश झुकाया।

जगदम्बे, तू सबकी माँ,
वरदाती कहलायें।
सर्वस्व
सब तुझ में ही समाये।

सिंघवाहिनी तेरे शेर की गर्जना,
जब-जब हो जाये ।
तब-तब सुन,
महाकाल भी थर्राए।

तेरे आलाैकिक, अद्भुत,
रूपों की त्रिलोक महिमा गाये।
तेरे हर रूप की महिमा,
जग का कल्याण कर जाए।

हे विश्व विनोदिनी, वरदाती
तेरी एक मधुर मुस्कान से,
विश्व का कल्याण हो जायें।
हे! माँ स्वीकार करो बारम्बार नमन,
पड़े तेरे चरणों में ये सिर झुकाए।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवयित्री ने माता रानी के गुणों और शक्तियों का महत्व बयां किया है। माता रानी से प्रार्थना: किया है इंसानियत के सुख और खुशियों के लिए, प्रकृति का सुन्दर मनोहर उपहार मिला।

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यह कविता (माँ।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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