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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

धरती पर ही।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ धरती पर ही। ♦

धधक रही है विश्व धारा आज, ज्वालाओं सी बैर – विकारों से।
अराजकताएं है कहीं फैली तो, कहीं जल रही है भ्रष्टाचारों से।

अम्बर का सब पानी बुझा न सके, कहां ठंडक चांद सितारों से?
यह नस – नस में फैली नफरत कैसे, हो सकेगी दूर सरकारों से?

ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्यी आग से, हर देश है दुनियां में जुलस रहा।
कहीं जाति, धर्म के झगड़े हैं, कहीं आवाम सत्ता से उलझ रहा।

खतरे में आज है समूची दुनियां, न के महज एक मानव प्राणी।
आतंकवाद कहीं दमन की नीति, हर देश की देखो एक कहानी।

रोग – शोक और महामारी, भ्रष्टाचार से मानवता सब भूल गए।
नकली जीवन, झूठ फरेबी, सच्चे तो मशाल से ढूंढने को ही रहे।

भाई – भाई का बैरी बना है, बाप – बेटों में भी तो आज दरारें हैं।
बहनों के साथ भी निभती कहां? पति – पत्नी में भी तकरारें हैं।

अध्यात्म से होती दूर यह दुनियां, जल रही है दहकते अंगारों सी।
अध्यात्म की पावन जलधारा ही, धो सकेगी मैल ये विकारों की।

पर लोग कहां सुनते बात यहां अब, ज्ञान, ध्यान व संस्कारों की।
होड़ लगी है सब में तो बस, कैसे कृपा मैं पा सकूं सरकारों की।

धन से बड़ा तो कुछ नहीं लगता, आज दुनियां में देखो लोगों को।
लालसा बढ़ी कि, भोग ले धरती पर ही, स्वर्ग के सारे भोगों को।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से वर्तमान समय में धरती पर पर क्या – क्या हालात हो गए है, इंसानियत किस दिशा में जा रही है कुछ पता नही किसी को। वर्तमान समय में पृथ्वी पर अनियंत्रित बिखरे हालात का सुंदर मनोरम वर्णन किया है।

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यह कविता (धरती पर ही।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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Filed Under: 2021-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता, हेमराज ठाकुर जी की कविताये। Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur poems, kavi hemraj thakur, poem on earth day in hindi, small poem on earth in hindi, World Environment Day Hindi Kavita On Nature, कोरोना और पर्यावरण पर कविता, कोरोना का कहर, कोरोना वायरस का क़हर, धरती बचाओ पर कविता, धरती माँ पर कविता इन हिंदी, पृथ्वी पर कविता, प्रकृति के लिए लिखी गयीं हिंदी कविताएं, प्रकृति संरक्षण पर कविता, विश्व पृथ्वी दिवस पर कविता, हिंदी में पृथ्वी पर कविता, हेमराज ठाकुर जी की कविताये

अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस। ♦

आज बहुत ही, शुभ मंगल घड़ी आई।
सबको आज मित्रता दिवस की हार्दिक बधाई॥

मित्रता श्रीकृष्ण और सुदामा की, दुनिया में हो गए चर्चे।
महान थी उनकी मित्रता, दिए ब्रह्मांड ने भी अव्वल दर्जे॥

आओं मित्रों, अपने दिलों में मंथन करें आज।
जुबां से न बोलें सुदामा, फिर भी श्री कृष्ण ने सँवारे काज॥

एक भरोसा, एक आस्था, विश्वास था, दोस्ती के नाम में।
दुनिया भर की खुशी देखी, बस अपने श्याम में॥

अगाध प्रेम, श्रद्धा रखी थी, सुदामा ने अपने मित्र में।
जब-जब दोस्त का चेहरा देखें,
भगवान का ही अक्स नजर आए, उनके चित्र में॥

स्वार्थ वशीभूत होकर सुदामा ने,
कभी अपनी जिंदगी की व्यथा नही सुनाई।
ना ही कभी, अपने मित्र के समक्ष रखी गरीबी की दुहाई॥

सिर्फ एक लगन में ही, सुदामा रमें जा रहा था।
बस मित्रता के नाम में, भगवान जपे जा रहा था॥

बचपन के छुटे सब संगी साथी, रखी बस दोस्ती दिल मे निभायें।
निश्चल प्यार, दुलार की लगन रखी, श्री कृष्ण से लगाएं॥

था वो बहुत ही शुभ दिन, जब भगवान के घर भक्त चला आया।
भगवान ने भी मित्रता को ही, सर्वोपरि मान, मित्र को गले लगाया॥

वो एक ऐतिहासिक दिन था, जब भगवान भक्त के,
प्यार, आस्था, विश्वास से लबालब हो गया।
सिहांसन पर बैठा, चरण धोकर मित्र भक्त सुदामा के,
और भगवान भक्त के वश में हो गया॥

आओं, हम भी मित्रता के शब्द को सार्थकता में पिरोए।
आस्था, लग्न, प्रेम को सच्चे अर्थों में ही सँजोये॥

अपने जीवन में सदैव ही, सच्ची मित्रता के बोए मोती।
मित्र बने और बनायें ऐसे,
जो तेरे पथ को प्रकाशवान करें, ऐसी जगाए ज्योति॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से इस कविता में कवयित्री ने श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देकर, एक सच्चे मित्र के गुणों और व्यवहार का सुंदर मनोरम वर्णन किया है।

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यह कविता (अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु। ♦

कलयुग में साक्षात शिव रूप में अवतरित हुए,
गुरु आदि शंकराचार्य।
दूर किया मानव के भाती – भाती कलशों को,
आदि शंकराचार्य की तरह आंख मूंदकर,
हठ और तर्क नहीं करते॥

वे शास्त्रीय ढंग से शास्त्र प्रमाण युक्त बातें करते,
सत्य रूप अनुभव और अनुभूतियों से संदेश लोक में देते।
शिव के वैभव और शिष्टता को संसार में,
मुक्त कंठ से बदला आने वाले॥

कलयुग में अवतार लेने वाले सिद्ध गुरुओं में से एक,
आचार्यों में अद्वितीय है आदि शंकराचार्य।
सर्वज्ञान संपन्न महा पंडित जी आदि शंकराचार्य,
ब्रह्मा अनुभूति में रमण करने वाले ब्रह्म ज्ञानी॥

विभिन्न शक्तियों सिद्धियों से युक्त सिद्ध पुरुष शंकराचार्य,
आचार्यों की तरह साधारण पुरुष नहीं थे आदि शंकराचार्य।
असत्य बाद से दूर सत्यवादी थे आदि शंकराचार्य,
बुद्धि वाद या भ्रांति वाद से अलग अनुभूति वादी आदि शंकराचार्य॥

यथार्थवादी गुणों से भरपूर संपन्न आदि शंकराचार्य,
आचार्यों की भांत संकुचित होकर,
देवताओं की निंदा कभी नहीं किया है शंकराचार्य॥

शिव की जितनी उपासना किया उन्होंने,
उतनी ही जगदंबा, विष्णु, नरसिंह स्वामी आदि देवताओं की।
शिवानंद लहरी नामक ग्रंथ की अद्भुत ढंग से लिखा,
अद्वितीय शैली की रचना कर रहस्य ज्ञान को व्यक्त किया॥

जिस प्रकार ज्ञानी को ज्ञानी ही पहचान सकता,
सर्वोत्तम को जिस प्रकार सर्वोत्तम ही पहचानता।
उसी तरह महा ज्ञानी सर्वोत्तम महागुरु आदि शंकराचार्य,
देवाधिदेव शिव शंकर स्वरूप है आदि शंकराचार्य॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में कवि ने, आदि शंकराचार्य जी के गुणों, शक्तियों और कार्यों को समझाने की कोशिश की है। आदि शंकराचार्य जी कलयुग के प्रथम गुरु है।

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यह कविता (आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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राष्ट्र भक्त बनाना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राष्ट्र भक्त बनाना होगा। ♦

रक्षा सुरक्षा का साजो सामान,
सुरक्षित शस्त्र आगामी रखना।
देश के रक्षक नौजवान हो को,
महत्वपूर्ण सहयोग करना होगा।

अस्त्र – शस्त्र विद्या की बरसा से,
बचने के लिए वंकर बनाना होगा।
आडंबर के भंवरे झाल का भी,
समूल रूप से नष्ट करना होगा।

महा पराक्रमी हिरण्याक्ष का सा,
फिर – फिर बध करना ही होगा।
जयद्रथ जैसी झूठ बोलने वाले,
को भी वैसा ही वध करना होगा।

भूखे प्यासे व्याकुल हो तो उसका,
हमें भरण – पोषण करना होगा।
कोई न भूखा नंगा रहे अपने राष्ट्र में,
विधि पूर्वक व्यवस्था करनी होगी।

देवी – देवताओं की पराक्रम गाथा,
शरणागत वत्सल को सुहाना होगा।
गृहस्थ आश्रम में रहकर सभी को,
गृहस्थ – धर्म अनुसार रहना होगा।

बुद्धिमानों को आवश्यकता अनुसार,
घर और राष्ट्र की सेवा करनी होगी।
सारी समाज को भी आगे आकर,
राष्ट्र भक्ति में योगदान करनी होगी।

गुरुकुल के नियमों में ही अब,
सत्संगी तुमको भी चलना होगा।
शास्त्र विद्या की यादें साथ – साथ,
शस्त्र विद्या का ध्यान करना होगा।

अर्जुन सा श्री कृष्ण का उपदेश,
प्रजाओं ने प्रचार करना होगा।
एकलव्य के धनुर्विद्या का ज्ञान,
शिक्षा साधारण को देनी होगी।

धर्म के अनुसार करता का ध्यान,
सारी समाज को करना होगा।
धर्म के अंदर अनादर करता का,
त्याग समाज को करना होगा।

तीर्थ का सेवन कराकर उसका,
अंतकरण से शुद्ध कराना होगा।
तत्व ज्ञानियों से शिक्षा का ज्ञान,
पास उनके जाकर लेना होगा।

पवित्र कथाओं का चरण बद्ध,
प्रचार – प्रसार भी करना होगा।
प्राकृतिक कोसी बचने के उपाय,
यज्ञ अनुष्ठान सब करना होगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है हम सभी को मिलकर ये प्रयास करना है की जो भूखे प्यासे व्याकुल हो तो उसका हमें भरण – पोषण करना होगा। कोई न भूखा नंगा रहे अपने राष्ट्र में विधि पूर्वक व्यवस्था करनी होगी। गृहस्थ आश्रम में रहकर सभी को गृहस्थ – धर्म अनुसार रहना होगा। शास्त्र विद्या के साथ-साथ शस्त्र विद्या का ध्यान करना होगा।

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यह कविता (राष्ट्र भक्त बनाना होगा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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पावन माह सावन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पावन माह सावन। ♦

पावन माह सावन में, देव शिव भी चले आयें।
इंद्रदेव भी उनके स्वागत में, मेघों से जल बरसाये।
मंगल ही मंगल होगा, अब तो सब।
सारे संकट संसार के, भोले भंडारी हर लेगें अब॥

इस पावन श्रावण मास में जप से ही,
त्रिलोकी नाथ ने सबको भव से उतार दिया।
माता पार्वती की भक्ति से प्रसन्न हो,
उनको वर का उपहार दिया॥

श्रावण मास में ही शिव ने,
समुन्द्र मंथन का विष-पान कर डाला।
समस्त ब्रह्मांड के कष्टों को,
इस भोले ने पल में हर डाला॥

ऋषि मार्कण्डेय की भी भक्ति से,
प्रसन्न हो, दिया ऐसा वरदान।
यमदेव भी नतमस्तक हो सम्मुख इसके,
इसकी भक्ति को दिया मान॥

आओं इस सावन मास, हम सब
इस अमरनाथ को रिझाएँगे।
कर अर्पण दूध-जल शिवलिंग पर,
संसार की खुशियाँ ये त्रिलोकी दे जायेंगे॥

कष्टों का जो फैला दिया इस महामारी ने,
अपना प्रकोप, इस जग में।
शिव-शक्ति कर देगी कल्याण, इसकी श्रद्धा,
आस्था, भक्ति बसा लो, अपने रग-रग में॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से इस कविता में कवयित्री ने सावन का पवित्र महीना जो की, वर्षा, हरियाली, खेतों में रौनक, और शिव की भक्ति से सराबोर होता है, भोले शिव के गुणों और शक्तियों व उनका संसार के प्रति कल्याणकारी कार्यों का अच्छे से वर्णन किया है।

—————

यह कविता (पावन माह सावन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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माँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ। ♦

माँ, तेरे हर रूप की महिमा ने,
सम्पूर्ण ब्रह्मांड को हर्षाया।
तेरी चाैखट पर,
सब देवगणों ने शीश झुकाया।

जगदम्बे, तू सबकी माँ,
वरदाती कहलायें।
सर्वस्व
सब तुझ में ही समाये।

सिंघवाहिनी तेरे शेर की गर्जना,
जब-जब हो जाये ।
तब-तब सुन,
महाकाल भी थर्राए।

तेरे आलाैकिक, अद्भुत,
रूपों की त्रिलोक महिमा गाये।
तेरे हर रूप की महिमा,
जग का कल्याण कर जाए।

हे विश्व विनोदिनी, वरदाती
तेरी एक मधुर मुस्कान से,
विश्व का कल्याण हो जायें।
हे! माँ स्वीकार करो बारम्बार नमन,
पड़े तेरे चरणों में ये सिर झुकाए।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवयित्री ने माता रानी के गुणों और शक्तियों का महत्व बयां किया है। माता रानी से प्रार्थना: किया है इंसानियत के सुख और खुशियों के लिए, प्रकृति का सुन्दर मनोहर उपहार मिला।

—————

यह कविता (माँ।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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विश्व विख्यात प्राचीन पुरी अयोध्या।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ विश्व विख्यात प्राचीन पुरी अयोध्या। ♦

सरयू नदी के तट पर स्थित प्राचीन काल की अयोध्या,
उत्तर प्रदेश राज्य का एक प्रमुख विख्यात धाम अयोध्या।
राजा मनु के दौरान बसाई गई परम पूज्य प्रसिद्ध अयोध्या,
युद्ध के माध्यम से प्राप्त न होने वाली, पुनीत नगरी अयोध्या॥

योग प्रतीक के रूप में है अथर्ववेद कहता है अयोध्या,
रामायण के कहे अनुसार मनु जी द्वारा स्थापित है अयोध्या।
स्कन्द पुराण कथा कहती अमरावती के रूप में है अयोध्या,
हिंदू मठ मंदिर से सजी-धजी मूल रूप से अविनाशी अयोध्या॥

तीर्थकर ऋषभ नाथ जी की जन्म स्थली भी रही अयोध्या,
अजित नाथ जी दूसरे तीर्थकर का जन्म स्थान रही अयोध्या।
चौथे तीर्थकर अभिनन्दन नाथ जी की भी सम्मानित अयोध्या,
सुमित नाथ जी का जन्म बनारस धर्म कर्म प्रेरित अयोध्या॥

जैन वैदिक मतो के प्रवर्तक भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या,
चौदहवें तीर्थकर अनंत नाथ जी की आराध्य देव अयोध्या।
कोशल जनपद की पहले राजधानी रही यह थी अयोध्या,
सूर्यवंशी प्रतापी क्षत्रपों की प्रसिद्ध राजधानी रही अयोध्या॥

भगवान की जन्म स्थली विश्व विदित कल्याणकारी अयोध्या,
मानव सभ्यता की पहली पौराणिक काल की पूरी अयोध्या।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली धुनि रमी है सदा सुखी अयोध्या,
कवि लेखक और पत्रकार की रचना करती रही अयोध्या॥

हनुमान गढ़ी के निकट भविष्य खिंच कनक भवन अयोध्या,
कनक भवन के सामने अवस्थित है दसरथ दरबार अयोध्या।
महावीर हनुमान जी रहते हैं यहीं गुफा में एक अयोध्या,
करते हैं जगत विदित रामजन्म भूमि – राम कोटि रक्षा अयोध्या॥

यहां न्याय प्रक्रिया से गुजरना पड़ा स्वाभाविक ही अयोध्या,
सिक्ख धर्म के लिए महत्व पूर्ण स्थान है पूज्य प्रसिद्ध अयोध्या।
यात्रा सलाहकार यहां पर गुरुनानक देव जी आए अयोध्या,
राजा रानी का संबंध कोरिया ने रहा है मूल रूप अयोध्या॥

रूस – भारत का प्राचीतम संबंध स्थापित किया अयोध्या,
भगवान बुद्ध के पूर्वजों की रचना हुई थी वही यह अयोध्या।
श्री राम नवमी, श्री जानकी नवमी, गुरूपूर्णिमा सावन झूला अयोध्या॥

चौरासी कोसी परिक्रमा क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएं अयोध्या,
चौदह भुवन चारों दिशाओं में पूज्य प्रसिद्ध अयोध्या।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग त्रिपुरारी की बनवाया कुश ने अयोध्या,
धूम मचाने शिव रात्रि को शिव जी आते राम की अयोध्या॥

सरयू नदी के तट पर स्थित प्राचीन काल से बसी अयोध्या,
अमरावतीपुरी सी दुनिया को अपनाती, भक्ति भाव में स्थित अयोध्या॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने प्राचीन पुरी अयोध्या के गुणों और विशेषताओं का वर्णन किया है। महापुरुषों की पावन भूमि का मनोरम वर्णन किया है, जहाँ से पूरी दुनिया को ज्ञान, ध्यान, धर्म का बोध सदैव ही होता रहा। जिस भूमि पर प्राचीन समय से ही महापुरुष तपस्या करते आये है, निष्काम उपासकों की पुण्य गाथा से कण – कण सुशोभित है प्राचीन पुरी अयोध्या धाम। महाबली हनुमान जी के आराध्य की नगरी अयोध्या धाम।

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यह कविता (विश्व विख्यात प्राचीन पुरी अयोध्या।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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आता है अकेला – चार कंधे से जाता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आता है अकेला – चार कंधे से जाता। ♦

इंसान आता है इस धरा पर अकेला — चार कंधे से जाता।

मनुष्य धरा पर अकेला आता,
रोता हुआ खुद जन्म पाता।
जन्म जिस घर में वह लेता,
गीत गवनई वहां गाया जाता।

छठी बरही भी किया जाता,
पालन करने वाला पिता होता।
वहां ढोल मजीरा बजता पाता,
गांव में मुंह मीठा किया जाता।

बच्चे – बच्ची खुशहाली आती,
कालिया आंगन की खुल जाती।
माता उसी की दुखहर्ता होती,
चारों तरफ से बधायां मिलती।

क्रिया – कर्म समझ नहीं पाता,
कुछ दिन बाद खुद उलझ जाता।
मोह – माया में मनुष्य बध जाता,
जन्म – मरण चक्कर फंसा पाता।

आप पाप पुण्य में फंस जाता,
कंचन चक्कर, धरा में घस जाता।
जो भी मंशा लेकर मानव आता,
ठगा हुआ दुनिया में खुद पाता।

कर्म धर्म सारे समझ नहीं पाता,
उसके संग कुछ भी नहीं जाता।
जबकि मनुष्य जीवन सुंदर पाता,
यश कीर्ति धरा पर ही रह जाती।

जिस जीवन हेतु देवता तरस जाता,
उसी पाकर मनुष्य दुख लेकर आता।
जीवन चक्र में वह सुख कहां पाता,
शरण में देवताओं के जब नहीं जाता।

मुक्ति पाने की अभिलाषा लाता,
सत्कार मुंह से जाने क्यों कराता।
अपनी भूल पर अंत छटपटाता,
पाप – पुण्य कर्म समझ नहीं पाता।

झटपट अर्थार्जन में ध्यान बटाता,
पितृ – ऋण भी चुका नहीं पाता।
मृत्यु के समय सबको रुला जाता,
चार कंधों से श्मशान घाट जाता।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बहुत भाग्य से मानव जीवन मिला है जिसके लिए देवता भी तरशते है। अपने इस अनमोल जीवन को यूँ ही नष्ट ना कर दो। अपने इस अनमोल जीवन का सार्थक प्रयोग करो। जीवन के खट्टे- मीठे उतार चढ़ाव का मधुर वर्णन किया है। अच्छे कर्म कर, जीवन का सदुपयोग कर, मानव जन्म को आनंदमय बनाएं।

—————

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यह कविता (आता है अकेला – चार कंधा से जाता।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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देहातन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ देहातन। ♦

वे गोबर से मटमैले हाथ, पसीने की बूंदों से तर वह चेहरा।
गौ सेवा में रत ओ री देहातन ! कितना सुन्दर रूप वह तेरा?

आठों याम तू लगी रहती है, गौ सेवा में ही चारा कभी पानी।
दूध पिलाते, घी खिलाते, तेरी यूं ही गुजर जाती है जिंदगानी।

बचपन – बुढ़ापा यूं ही गुजरे तेरा, तेरी यूं ही गुजरे ये जवानी।
शालीन, सभ्य ओ नारी रत्न तेरी! कौन समझेगा यह कहानी?

जो भी किया वह, दूसरों के लिए, किया तूने ओ महादानी!
देहात से शहर तक मेहर तेरी पर, किसी ने ये कब है मानी?

जब जूझती है नित नई उलझन से, लगती है झांसी की रानी ।
खेत खलिहानो में उगाती फसलें, खिलाती सबको है महारानी।

दिन व दिन की मेहनत के चलते, ढल जाती तेरी जवानी।
हाड़ मांस सब सुखा देती है तू, सुखा देती है चेहरे का पानी।

झुर्रियों से भरपूर तेरा चेहरा, बताता है मेहनत की कहानी।
बुढ़ापे का वह नूर तेरा, है तेरे मेहनतकश जीवन की निशानी।

वह सुख सन्तोष उन झुर्रियों से झरता, बस काया हुई पुरानी।
बूढ़ी धमनियों में अभी भी शेष है, लहू में वही स्फूर्ति रवानी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – गांव के पवित्र और शुद्ध वातावरण में सुन्दर जीवन यापन। आठों पहर तू लगी रहती है, गौ सेवा में ही चारा कभी पानी। दूध पिलाते, घी खिलाते, तेरी यूं ही गुजर जाती है जिंदगानी। झुर्रियों से भरपूर तेरा चेहरा, बताता है मेहनत की कहानी। बुढ़ापे का वह नूर तेरा, है तेरे मेहनतकश जीवन की निशानी।

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यह कविता (देहातन।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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संसार ही स्वर्ग बन जाता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ संसार ही स्वर्ग बन जाता। ♦

काश! सासें बहुओं को बेटी ही मानती,
बहुएं सासों को मानने लग जाए माता।
क्या जरूरत थी तब भिस्त की चाह की?
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

बाप – बेटे, भाइयों को पत्नियां न लड़ाए,
दोस्त सा व्यवहार करने लगे हर भ्राता।
घर की बहुएं – बेटियां बहनों सी रहे सब,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

बहुओं को न सताए हम और बेटे हमारे,
बेटियों को न सताए ससुराल – जामाता।
हर रिश्तों में प्यार ही प्यार फैल जाए तो,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

काश! पड़ोसी से कोई पड़ोसी न लड़ता,
ईर्ष्या, राग, द्वेष का भाव खत्म हो जाता।
मोह, ममता, नफरत की दीवारें गिर जाती,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

रहते न रोग – शोक, दम्भ, आधी और व्याधि,
न रहता झगड़े का हेतु जोरु, जमी और बुढ़ापा।
सबके घरों में रहती बराबर सी सुविधाएं तो,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

सर्पणी सा न लीलती निज जाए को जननी,
पिता पर नारी के झांसे में सुत को न भुलाता।
बहु – बेटे न ठुकराते अपने ही मां – बाप को तो,
फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

रंग भेद, जाति – धर्म के सब झगड़े ही मिट जाते,
आता न आजीवन किसी को इस जग में बुढ़ापा।
दया, करुणा, सहजता, सरलता सब में फैल जाती,
तो फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – हर सास अपनी बहु को बेटी समझे और वैसा ही व्यवहार करें तथा हर बहु सास को माँ की तरह समझे और वैसा ही व्यवहार करें, तो यह घर संसार शांतिमय स्वर्ग जैसा बन जाये। बाप – बेटे, भाइयों को पत्नियां न लड़ाए। दोस्त सा व्यवहार करने लगे हर भ्राता। घर की बहुएं – बेटियां बहनों सी रहे सब। फिर तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाता।

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यह कविता (संसार ही स्वर्ग बन जाता।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

ठंडी व्यार।

रिश्तों को निभाना सीखो।

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