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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

धागे का प्रेम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ धागे का प्रेम। ♦

ऐसे पावन देश में जन्में हम, करते हैं इस पर गर्व।
देवों की भूमि ये, जहाँ हर माह आते हैं हर्ष भरें पर्व॥

बारह मासों में पावन श्रावण मास तो सदैव ही, हर आयु-वर्ग को हर्षाता रहा।
शिव-स्तुति, हरियाली तीज व रक्षाबंधन जैसा पर्व जीवन को आनंदित बनाता रहा॥

रक्षा-सूत्र का ये पावन पर्व, श्रावण माह की पूर्णिमा को अपना संकल्पभाव ले आएँ।
निश्छल प्रेम, रक्षा-कवच, मर्यादा-बंधन दो आत्माओं को दे जाएँ॥

प्राचीनकाल की ओर मुड़कर देखें, तो एक बात समझ में आये।
जीवनदायिनी वृक्ष भी, बहनों के प्रेम के कच्चे धागे में बंध जाएँ॥

जब इंद्राणी ने अपने सुहाग इंद्र की विजय की झोली फैलाई, भगवान विष्णु के आगे।
दिया आशीष उन्होंने विजयी भव का, कहा, जाकर उनकी कलाई पर बांधे धागें॥

तदोपरांत युद्धक्षेत्र के लिए कोई नरेश जाता, महल के द्वार खोल।
उससे पहले ही रानी तिलक कर, विजय-सूत्र का धागा बांधे अनमोल॥

जब से आँचल का कोना, रक्तरंजित श्रीकृष्ण की उँगली पर बांधा था।
तब से ही इस कर्ज को सूद समेत चुकाने, द्रोपदी को बहन माना था॥

इतिहास गवाह है कि श्रीकृष्ण ने कृष्णा को सूद समेत, चुकाया था ये कर्ज।
वसन का अंबार लगा, रोका चीर-हरण को, निभाया एक धर्म भाई का फर्ज॥

ऐसा ही होता है ये मांगलिक पल, जो सबको घने नेह से भर जायें।
अक्षत-रोली से तिलक कर, कच्चे धागे से स्नेह की उम्र दराज कर जायें॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — रक्षाबंधन का त्योहार भाई बहन के पवित्र प्यार का प्रतिक है, जिसे राखी का त्योहार भी कहा जाता है। रक्षा बंधन पर बहन, भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके दीर्घायु व सुखी जीवन की प्रार्थना करती है। इसके साथ ही बहन अपने भाई से अपनी सुरक्षा का वचन लेती है, की जीवन में जब भी उस पर कोई मुसीबत आएगा उसका भाई उसकी मदद के ली आ जायेगा। रक्षाबंधन हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है, जिसे पूरे भारत समेत अन्य देशों में भी मनाया जाता है।

—————

यह कविता (धागे का प्रेम।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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वाह रे ओ खुदगर्ज इंसान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वाह रे ओ खुदगर्ज इंसान। ♦

वाह रे ओ खुदगर्ज! चौरासी श्रेष्ठ इंसान,
मैं हूं इंसान बस, मैं ही रहूंगा जिंदा।
निरीह प्राणियों की, बलि चढ़ा कर,
क्यों करता है इंसानियत को शर्मिंदा?

हिन्दू – मुस्लिम दोनों ढोंगी,
देव – खुदा का करते बहाना।
प्रथा तो यहां पर नर बली की भी थी,
काटना मुझ को, पकाना – खाना।

बकरों की बलि से सुधरे कुछ तो,
इंसानी बलि से फिर होगा कमाल।
नर बलि को तो कानून बना डाले,
वे कटते रहे और होते रहे हलाल।

वे देव कहां फिर दानव है सब,
जो खुश होने को लेते हैं किसी की जान।
वे इंसान कहां फिर राक्षस है सब,
जो अपनी सलामती में करते हैं निरीह कुर्बान।

वे बकरीद की नमाज में हलाली चाहते हैं,
ये मंदिरों में काट – काट के करते हैं पूजा।
मेरे लेखे ये दोनों ही नृशंस – निरीह हत्यारे,
न एक है धर्मी गुण ज्ञानी और न ही तो दूजा।

वेद – कतेब में कहां लिखी बलि?
कौन स्वीकारता है इनकी पूजा?
ये दानव संस्कृति के संवाहक सारे,
मानव संस्कृति में कौन है जूझा?

बकरे का बच्चा काट कर,
खुद के बच्चे की मनाते हैं खैर।
ईमान – धर्म तुम बांट रहे हो,
या कि, गुड में मिलाकर मीठा जहर ?

प्रलय – कयामत में क्या होगा?
जब खुदा – प्रभु की कचहरी होगी।
निरीह की होगी बल्ले – बल्ले,
तुम पर चोटें, गहरी होगी।

कुदरत सिखाती सत्य साहेब,
लॉकडाउन में क्यों सब बिन बलि रहे?
देव – खुदा का दोष नहीं सब,
इंसानी फितरत, क्या किससे कहे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बकरीद पर जानवरों को लटका देना और धारदार हथियार से मौत के घाट उतार देना अत्याचार के सिवा और कुछ भी नही। पशु बलि देना किसी के लिये भी ठीक नही है। यह बच्चों में जानवरों के प्रति संवेदनशीलता को समाप्त करता है व उनमें हिंसा की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। सनातन हिंदू धर्मं में कही भी इस बात की चर्चा नहीं की गई है की किसी देवी-देवता को किसी पशु-पक्षी या अन्य जीव की बली देनी चाहिए या बली देने से मनोकामना पूर्ण होती है या बलि देना अनिवार्य है। अपने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए धर्मांध बनकर निर्दोष-बेजुबान पशु-पक्षीओं का बलि देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है।

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यह कविता (वाह रे ओ खुदगर्ज इंसान।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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पावन बेला।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पावन बेला। ♦

सोमवार की आज ये अति शुभ बेला आई।
हर्षित हो आई आज सूरज की तरुणाई॥

जल-दूध अभिषेक ने शिवलिंग की गाथा सुनाई।
श्रावण माह के सोमवार को हर-हर महादेव की गूंज आई॥

यंत्र और मंत्र दोनो ने मिलकर भोलेबाबा को पुकार लगाई।
सब मंगलमय कर दो जन-जन के ह्रदय ने आवाज लगाई॥

इस श्रावण माह में सबकी झोली खुशियों से भर देना।
अवगुणों का विष पी अमृतमयी गुणों का वर देना॥

हे शम्भू, पधारों इस धरा पर स्वागत करें हम तेरा।
इस माह में तेरी ही धुन में बीतेगा तेरे भक्तों का साँझ-सवेरा॥

रहें हमेशा गले में तेरे सर्पों की माला।
सावन में तेरा पूजन करें जीवन में उजाला॥

हर दिशा में गूंजेंगे बम-बम भोले के जयकारे।
सच्चे ह्रदय से तुझें याद करने वाले सबकाज संवारे॥

भोलेनाथ तू तो है दया, करुणा का सागर।
असुर भी तेरी पूजा करें तो उसको भी दे वर॥

इंद्रदेव भी नतमस्तक होकर जो जल बरसाए।
तेरी जटाओं में बसी गंगा मैया उसको शीतलता दे जाए॥

हे! शिवशंभु हे! शंकर हे! जटाधारी, हे त्रिनेत्रधारी।
श्रावण मास में सुन लेना अपने भक्तों की पुकार सारी॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सावन के महीने में अत्यधिक वर्षा होती है, इसीलिए यह समय भगवान शंकर का प्रिय महीना होता है। ऐसा कहा जाता है कि इस महीने में जो भी भक्त सच्चे मन से व पूरी लगन के साथ भगवान शंकर की पूजा करता है, उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है। इस महीने में सबसे अधिक त्यौहार आते हैं और हिंदुओं के हिसाब से उन त्योहारों को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। जावालोप निषद में उल्लिखित है कि रुद्राक्ष शिव के आंसू हैं। इनका तृतीय उ‌र्ध्व नेत्र व बाईं आंखों की संयुक्त शक्ति का प्रतीक है। डमरू ज्ञान का उद्गाता है। शिव का एक नाम त्रिलोचन भी है। शिवजी मृत्युन्जय हैं। इनकी पूजा मृत्यु और काल को पराजित करती है। अयोध्या में सरयूतट पर नागेश्वरनाथ मंदिर सावन मास में भक्तों से परिपूर्ण रहता है। सोमवार के दिन शिव आराधना करने पर चंद्रमा से आने वाली तरंगें मन को शांत बनाती हैं। कांवड़ शिव पूजा का एक स्वरूप है। गंगा या पवित्र नदियों सरयू आदि से जल भरकर शिव पर अभिषेक करने से परात्पर शिव के साथ विहार होता है। कांवड़ से ज्ञान की उच्चता का प्रतिपादन होता है।

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यह कविता (पावन बेला।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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स्वप्न कुसुम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ स्वप्न कुसुम। ♦

काव्य : ज्योतित कर दे माँ।

अस्तमनबेला में मुस्कुराता हुआ,
मद्धिम सुंदर चाल विस्मित ईरण।
नंदिनी माँ उतरी मेरे अँगना,
इंदु की चुलबुल धवल चरण।

चल आई कितना अचम्भा – अध्व,
श्वेतरथ समीरण-सी निःशब्द परी।
तरंगों वाली आकाशगंगा की,
सुधा झागित सिंधुजात की लहरी।

शर्मायी अचंभित-सी निहार रही थी,
मेरा दिनांत-आलोक अरुनार।
लुकाछिपी का दृश्यकाव्य,
क्या कस रही है प्रणयी जानदार।

तरंगित चंद्रिका के मनोभाव की,
केश उद्भावना-सी सुकुमार।
हर्षित हो भव में बिखर पड़ी ले,
नई तारिकाओं से मनोवेग अपार।

अलस की नूतन स्याह-किनारे में,
वृजिन-वेली-सी शशि छविमान।
भर लाई माँ किस मधुवन से,
लख-लख स्वप्न-कुसुम अजान।

मंजु-रैन के अधरों की वह,
सुधा-कुसुमित मुग्धित तान।
मेरे निभृत सपन-निकेतन में,
माया जाल सी मोहित अनजान।

घिर आवे! ज्योतित कर दे माँ,
मेरा निद्रित नयनपट संसार।
विलक्षणा-बेली की चंद्र-कुमुद-केश,
ही मेरी चंद्रकांता बने साकार।

अर्थ: विलक्षणा-बेली = स्वप्न की घाटी,
वृजिन = आकाश, उद्भावना = कल्पना

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (स्वप्न कुसुम।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू। ♦

भारत देश की भव्य भूमि पर,
यह फिर से नया इतिहास गढ़ा।
महामहिम के प्रतिष्ठित पद पर,
आदिवासी नारी का नाम पढ़ा।

सन 1958 के 20 जून का दिन था,
ओडिसा का मयूरभंज वह जिला था।
बैदापोसी गांव के संथाल परिवार में,
मुर्मू को सरपंच के घर जन्म मिला था।

बिरंची नारायण टुडू पिता थे इनके,
दादा जी भी इनके ग्राम प्रधान ही थे।
जीवन में राष्ट्र सेवा की शुभ शुरुआत,
मुर्मू ने आरंभ की थी अध्यापिका से।

श्यामा चरण मुर्म से विवाह हुआ,
इनके एक बेटी है और दो बेटे थे।
अकाल मृत्यु ने पति – बेटों को लीला,
मुर्मू ने जीवन में सघर्ष संकट देखे थे।

1997 में पार्षद बनकर के था,
राजनैतिक जीवन शुरू किया।
दो बार विधायक भी बनी फिर,
था उड़ीसा में मंत्री पद भी लिया।

भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा की,
उपाध्यक्ष भी तो रही है महामहिम जी।
आदिवासी मोर्चा की राष्ट्रीय सदस्य बन,
आदि वासी समुदाय को तुमने बुलंदी दी।

2015 में झारखंड की राज्यपाल बनकर तुमने,
प्रथम आदिवासी राज्यपाल का खिताब लिया।
2022 में भारत की 15वीं महामहिम बनकर,
प्रथम आदिवासी राष्ट्रपति का दर्जा प्राप्त किया।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — रद्रौपदी मुर्मू (जन्म : २० जून १९५८) एक भारतीय राजनेत्री हैं। इन्हें 21 जुलाई 2022 को भारत की 15वें राष्ट्रपति के रूप में चुना गया है। द्रौपदी मुर्मू 25 जुलाई को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगी। इसके पहले 2015 से 2021 तक वे झारखण्ड की राज्यपाल थीं। जीवन के संघर्ष व नकारात्मक समय से अपने आप को उबार कर आगे बढ़ने की सीख आने वाली पीढ़ी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी से मिलेगा।

—————

यह कविता (राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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राखी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राखी। ♦

अपने घर से मेरे घर तक,
पैदल ही तो तुम चली आती थी।
फुर्सत कहां थी तुम्हारे किसानी जीवन में,
वह तो खींच के, राखी तुम्हें यहां लाती थी।

आज कहां हो तुम बहना?
देख, कलाई मेरी सुनी है।
मैं पूछ रहा हूं विधि से बार-बार,
तूने जिंदगी देकर, मौत काहे को चुनी है?

रो रहा हूं भीतर ही भीतर,
पड़ोस में, बहने सबकी आई है।
उनके घरों में खुशियां हैं आज तो,
बहने जो राखी लाई है।

चीर डालो आज अंबर का सीना,
सूरज की किरणों पर बैठकर तुम आओ।
छोटा हूं मैं तुम्हारा बहना,
चांद – सितारे आज तुम मुझे पहनाओ।

निष्पाप प्रेम का बंधन यह बहना,
लोगों को, रेशम का जो धागा है।
क्या जाने ये कीमत राखी की बहना?
इनकी जिंदगी से, शायद कोई अपना ऐसा न भागा है?

अभी उम्र ही क्या थी बयालीस की,
क्यों छोड़ के तुम हमें चली गई?
पहले, भैया छोड़ कर चले गए, अब तुम,
हमारी तो जिंदगी ही जैसे छली गई।

जहां भी होंगे तुम, ओ बहना – भैया!
महफूज रहे तुम, सदा खुश रहना।
वहीं मनाना त्योहार राखी का तुम,
ओ सूरज – चंदा! तुम उनसे यह कहना।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — रक्षा बंधन का त्योहार सावन महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। रक्षा बंधन को “राखी के पर्व” नाम से भी जाना जाता है, जो भाई और बहन के बीच पवित्र प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। रक्षा बंधन का अर्थ है ‘सुरक्षा का बंधन’। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई बहन को उपहार देता है। भविष्य पुराण में एक कथा है कि वृत्रासुर से युद्ध में देवराज इंद्र की रक्षा के लिए इंद्राणी शची ने अपने तपोबल से एक रक्षासूत्र तैयार किया और श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई में बांध दी। इस रक्षासूत्र ने देवराज की रक्षा की और वह युद्ध में विजयी हुए। यह घटना भी सतयुग में हुई थी।

—————

यह कविता (राखी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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संवेदना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ संवेदना। ♦

अरे भाई, न जाने इस भूपटल पर,
क्यों आज संवेदनाएं खो गई है?
विकल – व्यथित है बच्चा – बच्चा,
समूची मानवता क्यों रो रही है?

मानव – मानस में सिर्फ स्पर्धाएं रह गई,
सारा संवेदन खो गया।
आदमी – आदमी से लड़ – भीड़ रहा है,
न जाने यह क्या हो गया?

कहां तो थे यहां चौरासी से ऊपर,
मानव – मानस के कोमल भाव।
परहित में अपनी जाने गवा दी,
अब कहां गया वह मानव पड़ाव?

महल – अटालिकाएं खूब बनाई,
भाई – भाई में रहा न संवेदन – प्रेम।
बेहाता बहने पराई हो गई अब,
कौन पूछता है, उनका योग – क्षेम?

सास – ससुर से छुटकारा हो कैसे?
बहू – बेटियां भी ऐसा चाहती है।
जब बूढ़ों को ठुकराते बेटे उनके,
तब मानव संवेदना शर्मसार हो जाती है।

धान में सुलगी आग आज तो,
पराल भी कल जल जाएगा।
न जाने इन पश्चिम के अनुयायियों को,
यह सत्य समझ कब आएगा?

संवेदनहीन मानव, “मानव” कहां फिर?
वह पशु से भी बड़ा ढोर बन जाएगा।
यूं गिरता मानव – मानस कल तक,
समाज को, गर्त में ही ले जाएगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “दिल की गहराई तक जो पहुंच कर अपने अनुभव कराएं संवेदना वह मानसिक प्रक्रम है, जो आगे विभाजन योग्य नहीं होता। यह ज्ञानेन्द्रियों को प्रभावित करने वाली उत्तेजना द्वारा उत्पादित होता है, तथा इसकी तीव्रता उत्तेजना पर निर्भर करती है, और इसके गुण ज्ञानेन्द्रिय की प्रकृति पर निर्भर करते हैं।” जब माता-पिता बूढ़े हो जाते है तो आजकल के युवा पीढ़ी द्वारा खासकर नई नवेली बहु द्वारा बूढ़े सास-ससुर का अनादर व खरी-खोटी बोलना उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख देता हैं। ये युवा पीढ़ी यह कैसे भूल जाते है की जो वह जो अपने माता-पिता के साथ कर रहे है… उनका अपना पुत्र भी उनके साथ वैसा ही करेगा। एक बात याद रखे कभी भी आप अपने माता-पिता का अनादर कर जीवन के किसी भी क्षेत्र में तरक्की नही कर पाएंगे, माता-पिता का आशीर्वाद ही आपके सफलता का सीढ़ी बनता हैं। इसलिए कभी भी अपने माता-पिता का अनादर ना करें, वर्ना जीवन में कभी भी सुखी नहीं रह पाएंगे।

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यह कविता (संवेदना।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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भारत के लाल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारत के लाल। ♦

मेरी नौका है पुरानी,
ये नदी भी है अन्जानी।
डरने वाले कभी दरिया पार नहीं करते,
कायरों की दुनिया ख्वाबों में होती हैं।

कायर वो गद्दार कभी तिरंगे से प्यार नहीं करते,
दुश्मन को भारतीयों की एकता व हौसला बहुत अखरता है।
वो वाकिफ नहीं, हर भारतीय के रगों में,
सुभाष एंव खुदीराम बोस का लहू दौड़ता हैं।

उसे क्या मालूम, हर घर में महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज,
राजेन्द्र, जय प्रकाश, वीर कुंवर ही पलता हैं।
हमें सिखाया पुर्वजों ने, जब तक सफल न हो,
संघर्ष का मैदान छोड़कर, कायरों की तरह मत भागो।

लाल बहादुर शास्त्री जैसे कर्मठ की कभी हार नहीं होती,
कुछ किए बिना कभी जय जयकार नहीं होती।
तुम भारत मां के लाल हो, इस गुलशन के गुलाब हो,
दुश्मन का सपना कभी सच न हो,
तुम्ही कल के आफताब हो।

न गुलाब चाहिए, न माहताब चाहिए,
भारत के सपूतों की ऑंखों में, भारत मां के लिए प्यार चाहिए।
दुश्मन का प्यार तो है बस दिखाने के लिए,
ढूढ़ते हैं वो बहाने हर वक्त जुल्म ढ़ाने के लिए।

अपने आप कश्ती किनारे तक नहीं जाती कभी,
हौसला, हिम्मत चाहिए किनारा पाने के लिए।
तिरंगा देखकर, दुश्मन हुए भयभीत,
भगदड़ मच गई है, तुम्हारी होगी जीत।

भारत के लाल तेरी जीत बनेगी मिसाल,
शेर सा दहार सुनकर, दुश्मन होगा बेहाल।
लगा दो आग, जहां बारूद रखता हैं,
बना दो कब्र उनकी जो टेढ़ी नजर से देखता हैं।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह भारत भूमि वीरों की भूमि है, उसे क्या मालूम, हर घर में महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज, राजेन्द्र, जय प्रकाश, वीर कुंवर ही पलता हैं। हमें सिखाया पुर्वजों ने, जब तक सफल न हो, तब तक संघर्ष का मैदान छोड़कर, कायरों की तरह मत भागो। हम भारत वासी दिल से प्रेम करने वाले को प्रेम करते है और जो हमें आँख दिखाते है उनका आँख भी निकाल लेते है। हम कभी किसी पर पहले वार नही करते है लेकिन अगर दुश्मन हम पर वार करे तो हम हाथ पर हाथ धरे बैठे भी नहीं रहते है। हमें गर्व है अपने वीर सेनानी लाल बहादुर शास्त्री जी पर, उन्होंने दुश्मन को दिखाया हिन्दुस्तानी चाटा। एक बात याद रखे नफरतों की फिजाओं में कभी भी प्यास मुहब्बतों की नहीं बुझती। चाहे कोई भी पड़ोसी देश हो हमारा हमसे प्यार करेगा, हम भी उन पर प्यार बरसायेंगे, लेकिन अगर हमसे गद्दारी करेंगे तो उसका जवाब उसी की भाषा में हमें देना आता हैं, जय हिन्द – जय हिन्द की सेना।

—————

यह कविता (भारत के लाल।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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सागर और सरिता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सागर और सरिता। ♦

“सुनो सरिते रौद्र रूप धर,
क्यों तांडव तुम यूं करती हो?
है सहज सरल तुम शांत स्वभावी,
फिर दहशत क्यों तुम भरती हो?

आकंठ डुबाकर जनजीवन जल में,
क्यों त्राहि – त्राहि तुम मचाती हो?
रो उठते हैं प्राणी मात्र सब तब,
जब नीड़ उनका तुम बहाती हो।”

“मैं भूली बिसरी पावन सरिता,
हिमगिरी के शिखर से बहती हूं।
मैं कहां से निकली, कहां को जाती?
कभी, किसी से कुछ न कहती हूं।

गांव के पावन गलियारों में बहती,
पवनों में, शीतलता मैं ही देती हूं।
संचित कर के कृषित भूमि को,
मैं घट – घट को नवजीवन देती हूं।”

घाट – घाट पर तृप्ताती हूं सब को,
सब कूड़ा – कचरा जब मैं ढोती हूं।
सच कहती हूं मैं कुदरत की बेटी,
मानुषी करणी पर तब मैं रोती हूं।

क्यों भूल जाते हैं लोग मुझको?
तृषा नाशिनी मैं उनकी रोटी हूं।
निर्मल – पावन मैं आई गिरी से,
पिया तक पहुंचते मटमैली होती हूं।

जो जिसका किया वह उसे लौटाती,
मैं बदला कहां कब किसी से लेती हूं?
निज करणी का फल भोग रहे हैं सब,
तुम कहते हो मैं यह सब दंड देती हूं?

जिन जनी नहीं कोई जान जिस्म से,
प्रसव पीड़ा को वे भला क्या जाने?
मैं जननी हूं जलचर – थलचर की,
मेरी पीड़ा को भला वे क्यों माने?

मैं सज – धज – पावन निकली थी प्रियतम,
मटमैली गंदली होकर तुमसे मिलती हूं।
निर्दोष हूं मैं सनातनी परंपरा प्रवाहित,
निज प्रहारों से देहे कई की छीलती हूं।

“होती है मुझे भी पीड़ा तब प्रियतम
यह सब सुनकर सागर अकुलाता है।”
“मदहोश मानुष की यह जरूरत?” सागर,
सुनामी लहरों से आगबबूला हो जाता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति के पांच तत्व सलीके से अपना-अपना चक्र पूर्ण करते है, अर्थात प्रकृति के पांच तत्व तब तक मानव या जीव जंतु का नुकसान नहीं करते जब तक मनुष्य उनके प्राकृतिक रूप व पथ को अवरुद्ध न करें। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के पांच तत्व के साथ खिलवाड़ करता आ रहा जिसका परिणाम कहीं भूकंप, तो कहीं बाढ़, कहीं सुनामी, तो कहीं बर्फबारी और भी अनेकानेक रूप देखने को मिल रहे है, क्या नदी हो क्या समुद्र मनुष्य ने सभी के साथ खिलवाड़ किया हैं। हे मानव अब भी समय हैं सुधर जा वर्ना ये धरा तेरे रहने के लायक बिलकुल भी नहीं बचेगी। फिर कहां जायेगा तू रहने सोच जरा।

—————

यह कविता (सागर और सरिता।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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सावन का महीना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सावन का महीना। ♦

प्रथम दिन है श्रावण माह का आज।
देवों के देव महादेव पूर्ण करें सब काज।

सावन की ऋतु चहुँ ओर बिखरायेगी हरियाली।
धरा के सब जीवों के मध्य होगी खुशहाली।

आषाढ़ की उमस भरी गर्मी से मिल जाएगी निजात।
नव कोपलें उभर-उभर कर आएगी हर डाल-पात।

मेघराज इंद्र भी खुश हो छम-छम बूँदें बरसाए।
उदासी से भरा जीवन प्रफुल्लित हो जाये।

प्रकृति अब तो धानी चुनर पहन इतरायेगी।
इसकी हर अदा अब हसीन हो जाएगी।

वातावरण में अब होगा संगम सुर-ताल का।
दीवाने होंगे सब प्रकृति की मतवाली चाल का।

त्यौहारों के आगमन की रुत का होगा आगाज।
खुशियों का हर ओर बजेगा सुंदर साज।

माना जाए बहुत ही पाक महीना ये सावन का।
हर पल ही दर्शाए अम्बर-धरा अपनेपन का।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सावन के महीने को भगवान शिव की भक्ति का भी महीना कहते है, शिव भक्त इस माह कांवर लेकर ज्योतिलिंग पर अर्पण करते है। यह ग्रीष्म ऋतु के बाद आता है और लोगों को गर्मी के कहर से राहत भी दे जाता है। सावन के महीने में बहुत ही ज्यादा बरसात होती है जिससे मौसम बहुत सुहावना हो जाता है। इस समय लोग अपने परिवार के साथ बाहर घूमने जाते हैं और सावन के खुशनुमा मौसम का आनंद लेते हैं। चारों तरफ हरियाली और ऊपर से बारिश की मंद-मंद बुँदे अंदर से तन मन को प्रफुल्लित कर जाता हैं। माना जाए बहुत ही पाक महीना ये सावन का। हर पल ही दर्शाए अम्बर-धरा अपनेपन का।

—————

यह कविता (सावन का महीना।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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