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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

आओं! गले मिल आते हैं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आओं! गले मिल आते हैं। ♦

आओं! आज हम सब रिश्तों के गले मिल कर आते हैं।
जो रिश्ते रूठ गए उनको अपने भाव अर्पण कर जाते हैं॥

भारतीय संस्कृति ने ही तो विश्व में अपना डंका बजाया।
फिर इसके गुणों को ही हमने क्यूँ इस कदर भुलाया॥

हर खुशी-गम को गले लग कर लेते थे बाँट।
फिर मिल-बैठ हर समस्या को हँस कर देते थे काट॥

अपने बच्चों को संस्कारों के गले मिलाकर ले आयें।
तब सच में ही हम अपनी संस्कृति को अपनायें॥

रिश्तों को गले लगाना ही सब गिले-शिकवे को देता मात।
सुख भरे सवेरे में तब तब्दील हो जाती हर दुख की रात॥

संयम, सब्र, संतोष को आलिंगन बद्ध करते हैं।
स्वयं की झोली ही आज खुशियों से भरते हैं॥

अपनी प्रीत केवल श्रीकृष्ण-सुदामा जैसी बना पायें हम।
सच्ची दोस्ती को ही इस कदर गले लगा मिटाए जीवन के तम॥

बस निस्वार्थ भाव से अपने गुणों की खुशबू हम फैलायें।
आओं! आज हम सब मानवता के गुणों को गले लगाए॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — गले मिलना अपनत्व का अहसास दिलाकर सुकून महसूस करवाता है दिलों दिमाग तक। गले मिलना भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही चला आ रहा है, जो आज मॉडर्न ज़माने में Hug Day के नाम से जाना जाता है। आखिरकार हमारी ही प्राचीन संस्कृति को नए नाम से हमे परोसा जा रहा है, क्योकि हम अपने प्राचीन संस्कृति और संस्कार को भूलते जा रहे है, और पश्चिमी सभ्यता वाले इसी का फायदा उठा रहे है। हमें हमारी ही प्राचीन संस्कृति को नए नाम से हमे सीखाने की कोशिश कर रहे है। इसी तरह की बहुत सारी प्राचीन भारतीय संस्कृति है जो हम छोड़ने की गलती कर रहे है और इसी का फायदा सदैव से ही पश्चिमी सभ्यता वाले उठा रहे है। अब भी समय है संभल जाओ और अपने प्राचीन भारतीय संस्कृति, सभ्यता व संस्कार का पूर्ण तन, मन से पालन करों। वर्ना पश्चिमी सभ्यता द्वारा हम पर हमारी ही प्राचीन संस्कृति, संस्कार को नए नाम के साथ थोपा जायेगा अपना अविष्कार बताकर।

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यह कविता (आओं! गले मिल आते हैं।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पीड़ा अंतः मन की।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पीड़ा अंतः मन की। ♦

अर्दित की स्मृति करे लहूलुहान मुझे,
पल-पल की यादें करती छलनी मुझे।

उर-वेदना की पीड़ा दृश्य पुराना दिखलाती,
छटपटाती काया जिसमें मृत तुल्य बतलाती।

हृदि-माला के घट में विजन सहन तक ले जाती,
खालीपन का बोध करा तन-निभृत कर ले आती।

द्रवित मन मेरा कसक हिय का ही बतलाये,
निशदिन खुद का दमन करूं अंतस् ये समझाये।

तेरा कुछ नहीं जग में विकल हो क्यूं तू फिरता,
अतिशय का रख बोध तन-मठ ही तेरा ही रहता।

इक दिन भस्मीभूत हो चिरयुवा तू हो जायेगा,
दारुण रुदन करता पुंगल तेरा चिरशान्त हो जायेगा।

आवेश न कर जग से तू तुझे जितना निसर्ग ने दिया,
अपने स्‍वप्‍न को अन्तर्घट में रख भव ने भार ले लिया।

सब सम्भाला हिय में अपने अधर तक न आने देना,
क्षण-क्षण जो बीते तुझपर होंठों को तुम सिल लेना।

पल-पल की पीड़ा से नम कारक दारुण हो ले,
शैल-शिखा की गति अपने खचित-उर तू कर ले।

अंतः मन की अर्दित सुध को प्रेत-पट समझ ओढ़ ले,
इक दिन उदधिमेखला के तन पर अर्घट बन उड़ ले।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — जब अंतः मन में पीड़ा होती है उस समय मन में चलने वाले विचारों और भावनावों को बताया है। जब भी अंतः मन में पीड़ा होती है मन के अंदर किस-किस तरह से संकल्पो का उथल पुथल चलता है इसे समझाने की कोशिश की है। अतीत के पीड़ादाई दृश्य को मन का दर्पण बार-बार दिखलाता है, जिसमें तन व मन को बहुत ही ज्यादा पीड़ा दिखलाती, जैसे की मृत तुल्य हो ये काया। अंतः मन में पीड़ा को हृदय की अंतः गहराई तक ले जाती व खालीपन का बोध करा तन-निभृत कर ले आती वापस। मेरा द्रवित मन बार-बार मुझें ये बतलाये, निशदिन मैं खुद का दमन कर रहा हूँ आंतरिक मन यही समझाए। अंतः मन सदैव ही यही समझाए इस संसार में कुछ भी नही है तेरा फिर इस मोह पास में क्यों फस कर रोता है तू। एक दिन ये तन आग के हवाले होकर भस्मीभूत हो जायेगा। ये रोता हुआ तेरा मन चिरशान्त होकर सो जायेगा। आवेश में आकर दुनिया से तू बैर न कर, तुझें जितना ये प्रकृति ने दिया उसे सही से उपयोग कर। अपने स्‍वप्‍न को अंतः मन में रख कर अंतः आत्मा ने भार ले लिया।

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यह कविता (पीड़ा अंतः मन की।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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सुरों की मल्लिका को नमन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सुरों की मल्लिका को नमन। ♦

सुरों की साज और तेरा काज,
मां शारदे का हाथ और तेरा राज,
समझ न पाएं हम मूढ़ आज,
सहसा दिल पर गिरा गाज,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

स्वर भी जिसका करता गुणगान,
वो कोई और नहीं थी इंसान,
हमारी लता जी थी वो महान,
गायिकी से जिसने बढ़ाया देश का मान,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

कला जगत की तुम थी सिरमौर,
नहीं था तुम्हारा कोई जोर,
लता दीदी तुम थी बेजोड़,
आपके जादू का नहीं था कोई तोड़,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

जिनके गीत से झूमी दुनिया सारी,
तुम लता जी अमिट पहचान हो हमारी,
गाए आपके गीत प्रेरणा देती तुम्हारी,
कोई न कर सकता तुम्हारी बराबरी,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

हमारे दिल की धड़कन हो तुम,
तेरा यूं जाना गम देगा हरदम,
तेरे समर्पण को सजदा करते है हम,
अपूरणीय क्षति से हमारे साथ स्तब्ध है सरगम,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

हमारे दिल की धड़कन हो तुम,
तेरा यूं जाना गम देगा हरदम,
तेरे समर्पण को सजदा करते है हम,
अपूरणीय क्षति से हमारे साथ स्तब्ध है सरगम,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

मेरे प्रिय पाठकों आपको सपरिवार बसंत पंचमी की शुभकामनाएं।-KMSRAJ51

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — मां शारदे का उन पर था अनमोल वरदान, वीणापाणी मां के सर्वस्व संरचना में अनमोल संरचना थी हमारी लता जी। स्वर भी जिसका करता गुणगान, वो कोई और नहीं थी इंसान, हमारी लता जी थी वो महान, गायिकी से जिसने बढ़ाया देश का मान। कला जगत की तुम थी सिरमौर, नहीं था तुम्हारा कोई जोर, लता दीदी तुम थी बेजोड़। लता मंगेशकर (28 सितंबर 1929 – 6 फ़रवरी 2022) भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका थीं, जिनका छः दशकों का कार्यकाल उपलब्धियों से भरा पड़ा है। हालाँकि लता जी ने लगभग तीस से ज्यादा भाषाओं में फ़िल्मी और गैर-फ़िल्मी गाने गाये हैं लेकिन उनकी पहचान भारतीय सिनेमा में एक पार्श्वगायिका के रूप में रही है।

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यह कविता (सुरों की मल्लिका को नमन।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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माँ सरस्वती वंदना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ सरस्वती वंदना। ♦

आदि ब्रह्मा की शुक्लाम्बरा,
कन्या हैं, माँ शारदा आप।
वेद-धर्म में है नारी सशक्त,
युग विचार की संविदा आप।
ब्रह्म-विद्या की वरदा हैं आप।

पितामह संकल्प से सिरजें,
जंगम-स्थावर जीव अनेक।
मौन, उदास थे उनमे हरेक।
अभाव-तम में ज्योति आप।

ब्रह्मा, विष्णु ने की स्तुति, वह
परावाणी हैं, माँ शारदा आप।

सब दिश तिमिर घनघोर था,
सारहीन, जैसे मृत शरीर था।
विष्णु-आह्वान से आदि-मूल,
ज्योति-पुंज प्रकट होती माँ।
शब्द – रूपा शारदा आप।

श्वेतवर्ण तेजस्विनी, हैं दिव्य,
मातृरूप हैं तपस्विनी आप।

मातृ – वीणा करे जो मधुर-नाद,
वीणा-राग लाती है मधुर संवाद।
आप बनाती पशु से मनु-ज्ञानी,
वाद-प्रतिवाद जन्म देकर माँ।
साधक को दें आत्मज्ञान आप।

मुस्कान में उल्लास, पुस्तक में,
ज्ञान, माला है सत-वृत्ति दानी।
हंस सौंदर्य, मधुर स्वर प्रतीक,
जन-मन को करें समर्थ तन्मय।
छंद-रस से बनाती सिद्ध आप।

बनती जल-धार, पवन-वेग में,
भाव संग ओजस्विता दामिनी।
प्रज्ञा, बुद्धि, क्षमता के दान से,
बनीं जन-हित मंत्र-उच्चारिणी।

संगीत, कला में भाव संचारिणी,
मुक्तहस्त समभाव दानी आप।

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

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  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से बताने की कोशिश की है — ज्ञान और बुद्धि के बिना ये जीवन किसी काम का नहीं। ज्ञान, बुद्धि की देवी अपनी कृपा व करुणा का संचार कर हम पर, हे माँ तुम्हारी करुणा बड़ी अपरम्पार है। मां शारदे की महिमा से अछूता न कोई मनुष्य है, मां के रूपों में ही छुपा हुआ पूर्ण जग संसार है। उन्हीं के चरणों में ज्ञान का भंडार है, विद्यादायिनी मां से आज रज है हमारी। मां शारदे वर दे तू अपने ही रंग में रंग दे। जो नकारात्मक प्रवृतियों से सकारात्मकता का कराए सदैव भान, पुस्तक ही बस एक नाम। जो निरस जीवन में सरसता का, रंग भरती, वीणा ही वो सरगम। स्फटिक माला दर्शाती वैराग्य और ध्यान बिन, न मिलता संपूर्णता का है भाव। अपनाने के लिए तो बहुत है मगर, कल्याणकारी अपनाने की कला हंस है सिखलाता। कीचड़ में ही कमल है खिलता, अर्थात: सर्व विघ्न से न्यारे व पवित्र, कोमलता और सुंदरता का क्या अनुपम सार है। वीणापाणी मां के सर्वस्व संरचना में, सबक बहुत बेहिसाब है। आओ हम सब मिलकर सच्चे मन से माँ की वंदना करे।

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यह कविता (माँ सरस्वती वंदना।) “प्रो• मीरा भारती जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम मीरा भारती (मीरा मिश्रा/भारती) है। मैंने BRABU Muzaffarpur, Bihar, R.S College में प्राध्यापिका के रूप में 1979 से 2020 तक सक्रिय चिंतन और मनन, अध्यापन कार्य किया, आनलाइन शिक्षण कार्यक्रम से वर्तमान में भी जुड़ी हूं, मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे लेखनी का सुंदर उपयोग किया करते हैं। मैंने लगभग 130 कविताएं लिखी है, जिसमें अधिक प्रकाशित हैं, कई आलेख भी, लिखे हैं। दृढ़ संकल्प है, कि लेखन और अध्यापन से, अध्ययन के सामूहिक विस्तारण से समाज कल्याण – कार्य के कर्तृत्व बोध में वृद्धि हो सकती है। अधिक सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

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माँ शारदे वर दे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ शारदे वर दे। ♦

मां शारदे की महिमा से अछूता न कोई सार है,
मां के रूपों में ही छुपा जग संसार है।
उन्हीं के चरणों में ज्ञान का भंडार है,
विद्यादायिनी मां से आज रज है हमारी।
मां शारदे वर दे तू अपने ही रंग में रंग दे।

मां की कृपा के बिना न होता ज्ञान का संचार है,
इनकी करुणा बड़ी अपरम्पार है।
अपने रूपों में धारित वस्तु से,
मां जग को सबक देती खास है।
विद्यादायिनी मां से आज रज है हमारी,
मां शारदे वर दे तू अपने ही रंग में रंग दे।

नकारात्मक प्रवृतियों से सकारात्मकता का,
कराए भान, पुस्तक ही बस एक नाम।
निरस जीवन में सरसता का,
रंग भरती, वीणा ही वो सरगम।
विद्यादायिनी मां से आज रज है हमारी,
मां शारदे वर दे तू अपने ही रंग में रंग दे।

स्फटिक माला दर्शाती वैराग्य और,
ध्यान बिन, न मिलता संपूर्णता का है भाव।
अपनाने के लिए तो बहुत है मगर,
कल्याणकारी अपनाने की कला हंस है सिखलाता।
विद्यादायिनी मां से आज रज है हमारी,
मां शारदे वर दे तू अपने ही रंग में रंग दे।

कीचड़ में ही कमल है खिलता,
कोमलता और सुंदरता का क्या अनुपम सार है।
वीणापाणी मां के सर्वस्व संरचना में, सबक बेहिसाब है,
विद्यादायिनी मां से आज रज है हमारी।
मां शारदे वर दे तू अपने ही रंग में रंग दे।

हम अज्ञानी मुरख हमें ज्ञान का दर्श दिखा दे मां,
अपने ज्ञान के रस में हमें तू सराबोर कर दे मां।
विद्यादायिनी मां से आज रज है हमारी,
मां शारदे वर दे तू अपने ही रंग में रंग दे।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

मेरे प्रिय पाठकों आपको सपरिवार बसंत पंचमी की शुभकामनाएं।-KMSRAJ51

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — ज्ञान और बुद्धि के बिना ये जीवन किसी काम का नहीं। ज्ञान, बुद्धि की देवी अपनी कृपा व करुणा का संचार कर हम पर, हे माँ तुम्हारी करुणा बड़ी अपरम्पार है। मां शारदे की महिमा से अछूता न कोई मनुष्य है, मां के रूपों में ही छुपा हुआ पूर्ण जग संसार है। उन्हीं के चरणों में ज्ञान का भंडार है, विद्यादायिनी मां से आज रज है हमारी। मां शारदे वर दे तू अपने ही रंग में रंग दे। जो नकारात्मक प्रवृतियों से सकारात्मकता का कराए सदैव भान, पुस्तक ही बस एक नाम। जो निरस जीवन में सरसता का, रंग भरती, वीणा ही वो सरगम। स्फटिक माला दर्शाती वैराग्य और ध्यान बिन, न मिलता संपूर्णता का है भाव। अपनाने के लिए तो बहुत है मगर, कल्याणकारी अपनाने की कला हंस है सिखलाता। कीचड़ में ही कमल है खिलता, अर्थात: सर्व विघ्न से न्यारे व पवित्र, कोमलता और सुंदरता का क्या अनुपम सार है। वीणापाणी मां के सर्वस्व संरचना में, सबक बहुत बेहिसाब है। आओ हम सब मिलकर सच्चे मन से माँ की वंदना करे।

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यह कविता (माँ शारदे वर दे।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बाप बेटी के रिश्ते।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बाप बेटी के रिश्ते। ♦

वह नन्ही सी कली जब, खिल आंगन में आई।
सारे घर की शोभा तब, थी उसीने ही बढ़ाई।
निज पेट काट – काटकर, तब पिता ने पढ़ाई।
ज्यों जवान हुई थी, त्यों ही कर दी थी सगाई।
भावना प्रेम की दोनों ने, अंदर ही अन्दर छुपाई।
‘शादी हुई तो सह न पाया’ बाप बेटी की विदाई।

पत्नी बोली बस करो जी, यह भी कैसी है रुलाई ?
छुपा लो चीखें ज्यूँ , अर्थी पे जवां बेटे की छुपाई।
बाप बेटी के रिश्ते को पगली, तू क्या समझ पाई ?
आज बेटी नहीं जी मैंने, अपनी रूह ही है बेहाई।
न जाने फूल सी पली को, कैसे रखेगा जंवाई ?
चिंता बाप की है पगली, तेरी समझ में न आई।

फूट – फूट कर बिटिया रोए, मां – बाप और भाई।
टाली भी न जाए जी रीत, न ही जाए यह निभाई।
पिता तो यूं रोता है जैसे, लुट गई हो उसकी कमाई।
गम, मौत बेटे की झेल लिया, झेल सका न विदाई।
जब डोली उठी तो पिता को, यादें बहुत सारी आई।
भला बेटी के जाने की, कर पाएगा कौन कहाँ भरपाई ?

ससुराल में गम सब सहे पर, पिता को गाली न सह पाई।
स्वाभिमान जो है पिता उसका, चाहे हो जाए फिर लड़ाई।
दिक हुई तो लाडली, लौट, पुनः बाबुल के घर को आई।
लाड प्यार से समझा बुझा के, बाबुल ने वापिस भिजवाई।
मौत पे पिता की जिसने, दुख में छाती कूट कूट कर बजाई।
मां – बाप तक ही तो था ये मायका, हो गई हूँ अब मैं पराई।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस संसार में पिता और पुत्री का रिश्ता बहुत ही पवित्र और स्नेह भरा होता है। जहा माँ उसके स्वास्थ्य और तंदुस्र्स्ती का ध्यान रखती है, वही पिता उसके भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए अनवरत कार्य करता रहता है। एक माँ तो अपने पुत्री से अपना प्यार व स्नेह दिखाती रहती है, लेकिन एक पिता अपनी बेटी के प्रति अपना अति स्नेह व प्यार को कभी बताता या जताता नही है। अपनी बेटी की सुख सुविधाओं के लिए हर संभव कोशिश करता रहता है। जब बिटिया बड़ी होती है, उसका विवाह कर पिता को अपने आप से बिटिया का दूर चले जाना बहुत ही दुखमय होता है। पर क्या करें दुनिया की जो रीत है उसे भी तो निभाना है। ससुराल में वह गम सब सहे पर, पिता को गाली न सह पाई कभी। स्वाभिमान जो है पिता उसका, चाहे हो जाए फिर लड़ाई। दिक हुई तो लाडली, लौट, पुनः बाबुल के घर को आई। लाड प्यार से समझा बुझा के, बाबुल ने वापिस भिजवाई।

—————

यह कविता (बाप बेटी के रिश्ते।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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तकनीक गंगा प्रवाह।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तकनीक गंगा प्रवाह। ♦

कोरोना संकट के दो वर्ष, सतत करें शिक्षण संघर्ष,
ई-शिक्षा सहज हो, शिक्षा विवेक को दे सतत प्रकर्ष।

शिक्षा को अवसर में बदलें, प्रयास हो रहे अपर्याप्त,
पाठ्यक्रम असमान, अंतर्जाल-गति, तकनीक अशक्त।

तन-मन स्थिति पर विपरीत असर, दैनिक नियम चलें सुस्त,
छात्र-शिक्षक नहीं सम्मुख, तो रहे न चेतन-ज्ञान स्वानुभूत।

ई -शिक्षा सदी 21, करे गुणवत्ता बेंचमार्क, गुणवत्ता तंत्र मांग,
कौशल-संग प्रयास, बाधा-पर्वत झुकें, नव-तकनीक सप्तरंग।

एक भी छात्र वंचित, तो तकनीक माध्यम होगी विफल,
वर्ग द्वार खुले, पर हो ऑनलाइन शिक्षा सुगम औ सरल।

वायु, जल, संचेतना सम, तकनीक सद्भाव से हो वितरित,
उच्च तकनीक जन-मन में, हो मलय पवन-सा विस्तारित।

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

—————

  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से बताने की कोशिश की है — क्या पिछले कुछ समय समय से कोरोना संकट के दो वर्ष ई-शिक्षा के माध्यम से जो शिक्षा दिया जा रहा है, वह नई पीढ़ी के के लिए बहुत बड़ा संकट तो नहीं बनने वाला हैं? क्योंकि स्कूली शिक्षा का वातावरण ना मिलना और प्रैक्टिकल गतिविधि के ना होने से बच्चे प्रैक्टिकल रूप से कमजोर हो जायेंगे। ये सोचने का विषय है। बच्चों को स्कूली शिक्षा का वातावरण मिलना इसलिए जरूरी है… शिक्षण व शिक्षा ऐसा हो जिससे मानसिक रूप से हर बच्चा शक्तिशाली बने। मानसिक रूप से हर बच्चा इतना शक्तिशाली बने की जीवन के हर उतार चढ़ाव में मन से स्थिर रहे, उसे कोई भी समस्या विचलित न कर सके। कोई उसकी बुराई करे तो उसके मन पर किसी भी तरह का नकारात्मक असर न पड़े। चाहे घर हो या स्कूल कोशिश यही हो सभी की, की बच्चों को हर जगह सकारात्मक वातावरण मिले। बच्चों को जैसा वातावरण मिलता है बच्चे वैसे ही बनते है, आपके अच्छे व बुरे संस्कार और आदतों का बच्चों के मन पर बहुत असर पड़ता है। बच्चें कच्चे मिट्टी के घड़े के समान होते है, उन्हें जैसे और जिस तरह से ढाला जाये वो ढलते जायेंगे।

—————

यह कविता (तकनीक गंगा प्रवाह।) “प्रो• मीरा भारती जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम मीरा भारती (मीरा मिश्रा/भारती) है। मैंने BRABU Muzaffarpur, Bihar, R.S College में प्राध्यापिका के रूप में 1979 से 2020 तक सक्रिय चिंतन और मनन, अध्यापन कार्य किया, आनलाइन शिक्षण कार्यक्रम से वर्तमान में भी जुड़ी हूं, मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे लेखनी का सुंदर उपयोग किया करते हैं। मैंने लगभग 130 कविताएं लिखी है, जिसमें अधिक प्रकाशित हैं, कई आलेख भी, लिखे हैं। दृढ़ संकल्प है, कि लेखन और अध्यापन से, अध्ययन के सामूहिक विस्तारण से समाज कल्याण – कार्य के कर्तृत्व बोध में वृद्धि हो सकती है। अधिक सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

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बसंत बहार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बसंत बहार। ♦

आयी देखो बसंत बहार,
खिली खिली सुहानी धूप।
सबका ह्रदय खिल खिल जाए,
सूरज किरणें पड़ती है धरा पर।

पीली फसलों को लहराए,
चारों और बसंत इठलाये।
प्रकृति भी अनेक रंग दिखाये,
आयी बसंत बहार मस्तानी।

पेड़ पर भी नये पत्तो का हुआ सर्जन,
भवरे भी फूलों पर मंडराए।
कोयल भी मीठी तान सुनाए,
बसंत अपने रंग रूप दिखाये।

सब तरफ हरियाली छाए।
नदियां, झरना कल कल बहता जाए।

शीत भी जैसे कम हो जाए,
पीला पीला रंग ओढे प्रकृति।
खेतों में छाए पीली सरसों।
देखकर सब मंत्र मुग्ध हुए।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — वसंत ऋतु में प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती है। क्या फूल, क्या भवरो का फूलों पर मंडराना, क्या पतझड़ के बाद नए पत्तो का आना, पक्षियों का यूँ मस्त चहचहाना चारों ओर खुशिया ही खुशिया। आयी देखो बसंत बहार, खिली खिली सुहानी धूप। इस वसंत ऋतु में प्रकृति के साथ साथ सबका ह्रदय खिल खिल जाए, सूरज किरणें पड़ती है धरा पर। कोयल भी अपनी मीठी तान सुनाए, बसंत अपने रंग रूप दिखाये। सब तरफ हरियाली छा जाये। नदियां, झरना भी कल कल बहता जाए।

—————

यह कविता (बसंत बहार।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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बहू या बेटी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बहू या बेटी। ♦

बहू को बेटी समझा जाये,
तो क्या इसमें गलत है।
जब माँ पिता के घर से आई,
वह एक अंजान घर में।

आकर वों नये लोंगो के,
बीच आकर जीवन की,
नयी शुरुआत करती है।
सारे परिवार की पसंद,
नापसंद का ख्याल रखती है।

किसको कब किस चीज,
की जरूरत या तकलीफ है।
सबके लिए वो त्याग करती है,
फिर हम उसको बहू मानते है।

बहू को अगर बेटी मान ले,
तो उसको कभी अपने घर,
की कभी याद नहीं आएगी।
और उसका मान भी बढ़ेगा।

उसको भी अहसास होगा,
वो भी गर्व से कह सकती है,
मैं घर की बहू नहीं बेटी हूँ।
बहू को बेटी समझा जाये,
यह रीति भी नयी होंगी।

तुम पराये घर से आयीं हो,
क्या समझोगी हमारा दुख।
यह कहकर चुप कराया जाता है।
बहु को बेटी समझ कर देखो,
वो भी किसी की बेटी है।

हम उसको माँ सा प्रेम देगें,
वो भी आपको माँ मानेगी।
आपका कहना भी सुनेंगी,
बहु से बेटी बनने में देर न लगेगी।

आपके मान सम्मान को रखेगी,
बहु को भी बेटी सा प्रेम मिले।
फिर क्यो पीहर की याद करें,
जो भी परेशानी हो उसको,
सासू माँ को ही बताएगी।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बहू को बेटी समझा जाये, तो क्या इसमें गलत है। विवाह के बाद जब माँ पिता के घर से आई, वह एक अंजान घर में। सभी नये लोंगो के बीच आकर जीवन की नयी शुरुआत करती है वह, परिवार के सभी सदस्यों के पसंद – नापसंद का सदैव ही ख्याल रखती है वह। सभी के सुख के लिए तकलीफ सहती त्याग करती वह। बहू को जब हम बेटी मान ले, तो उसको कभी भी अपने घर की याद नहीं आएगी, और उसका मन भी लगा रहेगा। उसको भी अच्छा लगेगा, वो भी गर्व से कह सकती है, मैं इस घर की बहू नहीं बेटी हूँ। जब हम उसको माँ सा प्रेम देगें, वो भी आपको माँ मानेगी। आपका कहना भी सुनेंगी, बहु से बेटी बनने में देर न लगेगी। सदैव ही आपके मान सम्मान का ख्याल रखेगी, बहु को भी बेटी सा प्रेम जब मिले, फिर क्यो पीहर की याद करें। जो भी परेशानी हो उसको, सासू माँ को ही बताएगी।

—————

यह कविता (बहू या बेटी।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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ईश्वर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ईश्वर। ♦

जीवन तुमने दिया है प्रभु,
गिरेंगे तो संभालो तुम्हीं।
पथ अगर भटक जाए कोई,
तो सही डगर दिखायो तुम्हीं।

नेक राह पर काटे उगाए कोई,
उसको गलत सही बताओगे तुम्हीं।
आपने दिया जीवन मानव का,
इसको मावन सेवा में लगाने का।

मार्गदर्शन भी कराओगे तुम्हीं,
किस पथ किस रूप में मदद मांगे।
कोई हो संदेह तो दूर करोगे तुम्हीं,
कोई दुख दर्द में हों प्रभु।

उसको देना अपनी दया,
आप ही करुणा बरसाने वाले।
जीवन भी हमारा आपके लिए,
जो चाहे वो बना दो हमें।

हम बहती नदिया के किनारे,
जहाँ देगे आप ही सहारा।
आप ही दुनियां के रखवाले,
सबको एक नजर से देखने वाले।

आप ही दुनियां के पालनहार,
दुख और कष्ट से उबारने वाले।
चरणों मे कोटि कोटि वंदन,
सब प्रभु की महिमा गाते है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह जीवन प्रभु का दिया हुआ है, हे प्रभु जब भी हम गिरेंगे तो संभालो तुम्हीं। जीवन में कभी अगर पथ भटक जाए कोई, तो सही मार्ग दिखायो तुम्हीं। सत्य व अच्छे के साथ अगर कोई बुरा करे तो, उसका फल उन्हें देना तुम्हीं। आपने दिया है जीवन मानव तन का, इसको मावन सेवा में ही लगाना है। हे प्रभु जीवन के हर मोड़ पर चाहे सुख हो या दुख दर्द, सदैव मार्गदर्शन करते रहना तुम्हीं। आप ही करुणा बरसाने वाले, करुणा के सागर, ये जीवन भी हमारा आपके लिए जो चाहे वो बना दो हमें। इस संसार रूपी बहती नदिया के किनारे हम, जहाँ देगे आप ही सहारा प्रभु। आप ही दुनियां के रखवाले है, सबको एक नजर से देखने वाले है। आप ही इस दुनियां के पालनहार हो प्रभु, सदैव ही दुख और कष्ट से उबारने वाले। हे प्रभु आपके चरणों मे कोटि कोटि वंदन।

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यह कविता (ईश्वर।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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