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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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hindi

अर्श रोग (बवासीर)-Piles – का आयुर्वेदिक उपचार

Kmsraj51 की कलम से…..
Kmsraj51-CYMT-JUNE-15

अर्श रोग (बवासीर)-Piles 

Piles -अर्श रोग - बवासीर
अर्श रोग (बवासीर)-Piles

बवासीर गुदा मार्ग की बीमारी है । यह मुख्यतः दो प्रकार की होती है — खूनी बवासीर और बादी बवासीर। इस रोग के होने का मुख्य कारण ” कोष्ठबद्धता ” या ”कब्ज़ ” है। कब्ज़ के कारण मल अधिक शुष्क व कठोर हो जाता है और मल निस्तारण हेतु अधिक जोर लगाने के कारण बवासीर रोग हो जाता है। यदि मल के साथ बूंद -बूंद कर खून आए तो उसे खूनी तथा यदि मलद्वार पर अथवा मलद्वार में सूजन मटर या अंगूर के दाने के समान हो और मल के साथ खून न आए तो उसे बादी बवासीर कहते हैं। अर्श रोग में मस्सों में सूजन तथा जलन होने पर रोगी को अधिक पीड़ा होती है।

बवासीर का विभिन्न औषधियों द्वारा उपचार —

१- जीरा – एक ग्राम तथा पिप्पली का चूर्ण आधा ग्राम को सेंधा नमक मिलाकर छाछ के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से बवासीर ठीक होती है।

२- जामुन की गुठली और आम की गुठली के अंदर का भाग सुखाकर इसको मिलाकर चूर्ण बना लें | इस चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा में हल्के गर्म पानी या छाछ के साथ सेवन से खूनी बवासीर में लाभ होता है। 

३- पके अमरुद खाने से पेट की कब्ज़ दूर होती है और बवासीर रोग ठीक होता है।

४- बेल की गिरी के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर , ४ ग्राम की मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से खूनी बवासीर में लाभ मिलता है।

५- खूनी बवासीर में देसी गुलाब के तीन ताज़ा फूलों को मिश्री मिलाकर सेवन करने से आराम आता है।

६ – जीरा और मिश्री मिलकर पीस लें। इसे पानी के साथ खाने से बवासीर (अर्श ) के दर्द में आराम रहता है।

७- चौथाई चम्मच दालचीनी चूर्ण एक चम्मच शहद में मिलाकर प्रतिदिन एक बार लेना चाहिए। इससे बवासीर नष्ट हो जाती है।

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Poojya Acharya Bal Krishan Ji Maharaj-KMSRAJ51

पूज्य आचार्य बाल कृष्ण जी महाराज

मैं श्री आचार्य बाल कृष्ण जी महाराज का बहुत आभारी हूँ!!

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पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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Head Editor, Founder & CEO
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

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पिपरमिंट (Peppermint)

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पिपरमिंट (Peppermint) –

पिपरमिंट (Peppermint) -
पिपरमिंट (Peppermint)

यह विश्व में यूरोप,एशिया,उत्तरी अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है। समस्त भारत में यह बाग़-बगीचों में विशेषतः उत्तर भारत तथा कश्मीर में लगाया जाता है। यह अत्यंत सुगन्धित क्षुप होता है। इसके तेल,सत तथा स्वरस आदि का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसके पुष्प बैंगनी,श्वेत अथवा गुलाबी वर्ण के तथा पुष्पदण्ड के अग्र भाग पर लगे होते हैं। इसके फल चिकने अथवा खुरदुरे तथा बीज छोटे होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल सितम्बर से अप्रैल तक होता है।

पिपरमिंट का औषधीय प्रयोग –

१- पिपरमिंट के क्रिस्टल को दांतों के बीच में रखकर दबाने से दांत दर्द में लाभ होता है ।

२- पिपरमिंट को छाती पर लगाने से श्वसन संस्थान गत सूजन में लाभ होता है ।

३- पिपरमिंट क्रिस्टल का सेवन करने से उलटी,अतिसार,आध्मान तथा अजीर्ण में लाभ होता है ।

४- २५ ग्राम पिपरमिंट सत में शक्कर मिलाकर सेवन करने से पेटदर्द तथा पेट के विकार ठीक होते हैं ।

५- पिपरमिंट के पत्तों को पीसकर लगाने से चींटी आदि कीटों के काटने से होने वाली वेदना का शमन होता है ।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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पवित्र विचार-

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMS

Kmsraj51 – Motivational Thoughts 

अपनी साेंच काे वृहद बनाआे।

ये मत साेंचाे की कल तक तुम्हारे पास क्या था या तुम कैसे थें,

मगर तुम यह जरूर साेंचाे की आज तुम क्या कर रहें हाे, आैर अपने भविष्य के लिए क्या कर रहें हाे।

ये साेंचाे की आज तुम्हारे पास क्या हैं, अपना एक सटिक लक्ष्य बनाआेे।

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लिए समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

सच्चें मन से अगर कुछ करने की ठान लाे, ताे आपकाे सभी काम में सफलता मिल जाती हैं।

जीवन में जाे भी काम कराें पुरे मन से कराें, ताे सफलता आपकाे जरूर मिलेगी।

— आपका दोस्त —

कृष्ण मोहन सिंह ५१

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लिए समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

 

 

 

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जीवन परिवर्तक – हिन्दी उद्धरण

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMS

स

  • संसार की चिंता में पढ़ना तुम्हारा काम नहीं है, बल्कि जो सम्मुख आये, उसे भगवद रूप मानकर उसके अनुरूप उसकी सेवा करो।
  • संसार के सारे दु:ख चित्त की मूर्खता के कारण होते हैं। जितनी मूर्खता ताकतवर उतना ही दुःख मज़बूत, जितनी मूर्खता कम उतना ही दुःख कम। मूर्खता हटी तो समझो दुःख छू-मंतर हो जायेगी।
  • संसार का सबसे बड़ानेता है – सूर्य। वह आजीवन व्रतशील तपस्वी की तरह निरंतर नियमित रूप से अपने सेवा कार्य में संलग्न रहता है।
  • संसार कार्यों से, कर्मों के परिणामों से चलता है।
  • संसार का सबसे बड़ा दीवालिया वह है, जिसने उत्साह खो दिया।
  • संसार में हर वस्तु में अच्छे और बुरे दो पहलू हैं, जो अच्छा पहलू देखते हैं वे अच्छाई और जिन्हें केवल बुरा पहलू देखना आता है वह बुराई संग्रह करते हैं।
  • संसार में सच्चा सुख ईश्वर और धर्म पर विश्वास रखते हुए पूर्ण परिश्रम के साथ अपना कत्र्तव्य पालन करने में है।
  • संसार में रहने का सच्चा तत्त्वज्ञान यही है कि प्रतिदिन एक बार खिलखिलाकर ज़रूर हँसना चाहिए।
  • संसार में केवल मित्रता ही एक ऐसी चीज़ है जिसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में दो मत नहीं है।
  • सारा संसार ऐसा नहीं हो सकता, जैसा आप सोचते हैं, अतः समझौतावादी बनो।
  • सात्त्विक स्वभाव सोने जैसा होता है, लेकिन सोने को आकृति देने के लिये थोड़ा – सा पीतल मिलाने कि जरुरत होती है।
  • सन्यासी स्वरुप बनाने से अहंकार बढ़ता है, कपडे मत रंगवाओ, मन को रंगों तथा भीतर से सन्यासी की तरह रहो।
  • सन्यास डरना नहीं सिखाता।
  • संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे – धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।
  • सच्चा दान वही है, जिसका प्रचार न किया जाए।
  • सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता और भी दुर्लभ है।
  • सच्चे नेता आध्यात्मिक सिद्धियों द्वारा आत्म विश्वास फैलाते हैं। वही फैलकर अपना प्रभाव मुहल्ला, ग्राम, शहर, प्रांत और देश भर में व्याप्त हो जाता है।
  • सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जाता।
  • सच्चाई, ईमानदारी, सज्जनता और सौजन्य जैसे गुणों के बिना कोई मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।
  • समाज में कुछ लोग ताकत इस्तेमाल कर दोषी व्यक्तियों को बचा लेते हैं, जिससे दोषी व्यक्ति तो दोष से बच निकलता है और निर्दोष व्यक्ति क़ानून की गिरफ्त में आ जाता है। इसे नैतिक पतन का तकाजा ही कहा जायेगा।
  • समाज सुधार सुशिक्षितों का अनिवार्य धर्म-कत्र्तव्य है।
  • समाज का मार्गदर्शन करना एक गुरुतर दायित्व है, जिसका निर्वाह कर कोई नहीं कर सकता।
  • सामाजिक और धार्मिक शिक्षा व्यक्ति को नैतिकता एवं अनैतिकता का पाठ पढ़ाती है।
  • सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में जो विकृतियाँ, विपन्नताएँ दृष्टिगोचर हो रही हैं, वे कहीं आकाश से नहीं टपकी हैं, वरन्‌ हमारे अग्रणी, बुद्धिजीवी एवं प्रतिभा सम्पन्न लोगों की भावनात्मक विकृतियों ने उन्हें उत्पन्न किया है।
  • सैकड़ों गुण रहित और मूर्ख पुत्रों के बजाय एक गुणवान और विद्वान पुत्र होना अच्छा है; क्योंकि रात्रि के समय हज़ारों तारों की उपेक्षा एक चन्द्रमा से ही प्रकाश फैलता है।
  • सत्य भावना का सबसे बड़ा धर्म है।
  • सत्य, प्रेम और न्याय को आचरण में प्रमुख स्थान देने वाला नर ही नारायण को अति प्रिय है।
  • सत्य बोलने तक सीमित नहीं, वह चिंतन और कर्म का प्रकार है, जिसके साथ ऊंचा उद्देश्य अनिवार्य जुड़ा होता है।
  • सत्य का पालन ही राजाओं का दया प्रधान सनातन अचार था। राज्य सत्य स्वरुप था और सत्य में लोक प्रतिष्ठित था।
  • सत्य के समान कोई धर्म नहीं है। सत्य से उत्तम कुछ भी नहीं हैं और जूठ से बढ़कर तीव्रतर पाप इस जगत में दूसरा नहीं है।
  • सत्य बोलते समय हमारे शरीर पर कोई दबाव नहीं पड़ता, लेकिन झूठ बोलने पर हमारे शरीर पर अनेक प्रकार का दबाव पड़ता है, इसलिए कहा जाता है कि सत्य के लिये एक हाँ और झूठ के लिये हज़ारों बहाने ढूँढने पड़ते हैं।
  • सत्य परायण मनुष्य किसी से घृणा नहीं करता है।
  • सत्य एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति है, जो देश, काल, पात्र अथवा परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती।
  • सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है, जो सूर्य के समान हर स्थान पर समान रूप से चमकता रहता है।
  • सत्य का मतलब सच बोलना भर नहीं, वरन्‌ विवेक, कत्र्तव्य, सदाचरण, परमार्थ जैसी सत्प्रवृत्तियों और सद्‌भावनाओं से भरा हुआ जीवन जीना है।
  • सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय, मान-अपमान, निंदा-स्तुति, ये द्वन्द निरंतर एक साथ जगत में रहते हैं और ये हमारे जीवन का एक हिस्सा होते हैं, दोनों में भगवान को देखें।
  • सुख-दुःख जीवन के दो पहलू हैं, धूप व छांव की तरह।
  • सुखी होना है तो प्रसन्न रहिए, निश्चिन्त रहिए, मस्त रहिए।
  • सुख बाहर से नहीं भीतर से आता है।
  • सुखों का मानसिक त्याग करना ही सच्चा सुख है जब तक व्यक्ति लौकिक सुखों के आधीन रहता है, तब तक उसे अलौकिक सुख की प्राप्ति नहीं हों सकती, क्योंकि सुखों का शारीरिक त्याग तो आसान काम है, लेकिन मानसिक त्याग अति कठिन है।
  • स्वर्ग व नरक कोई भौगोलिक स्थिति नहीं हैं, बल्कि एक मनोस्थिति है। जैसा सोचोगे, वैसा ही पाओगे।
  • स्वर्ग और मुक्ति का द्वार मनुष्य का हृदय ही है।
  • ‘स्वर्ग’ शब्द में जिन गुणों का बोध होता है, सफाई और शुचिता उनमें सर्वप्रमुख है।
  • स्वर्ग और नरक कोई स्थान नहीं, वरन्‌ दृष्टिकोण है।
  • स्वर्ग में जाकर ग़ुलामी बनने की अपेक्षा नर्क में जाकर राजा बनना बेहतर है।
  • सभ्यता एवं संस्कृति में जितना अंतर है, उतना ही अंतर उपासना और धर्म में है।
  • सदा, सहज व सरल रहने से आतंरिक खुशी मिलती है।
  • सब कर्मों में आत्मज्ञान श्रेष्ठ समझना चाहिए; क्योंकि यह सबसे उत्तम विद्या है। यह अविद्या का नाश करती है और इससे मुक्ति प्राप्त होती है।
  • सब ने सही जाग्रत्‌ आत्माओं में से जो जीवन्त हों, वे आपत्तिकालीन समय को समझें और व्यामोह के दायरे से निकलकर बाहर आएँ। उन्हीं के बिना प्रगति का रथ रुका पड़ा है।
  • सब जीवों के प्रति मंगल कामना धर्म का प्रमुख ध्येय है।
  • सब कुछ होने पर भी यदि मनुष्य के पास स्वास्थ्य नहीं, तो समझो उसके पास कुछ है ही नहीं।
  • सबसे बड़ा दीन दुर्बल वह है, जिसका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं।
  • सबसे धनी वह नहीं है जिसके पास सब कुछ है, बल्कि वह है जिसकी आवश्यकताएं न्यूनतम हैं।
  • सारे काम अपने आप होते रहेंगे, फिर भी आप कार्य करते रहें। निरंतर कार्य करते रहें, पर उसमें ज़रा भी आसक्त न हों। आप बस कार्य करते रहें, यह सोचकर कि अब हम जा रहें हैं बस, अब जा रहे हैं।
  • समय मूल्यवान है, इसे व्यर्थ नष्ट न करो। आप समय देकर धन पैदा कर रखते हैं और संसार की सभी वस्तुएं प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन स्मरण रहे – सब कुछ देकर भी समय प्राप्त नहीं कर सकते अथवा गए समय को वापिस नहीं ला सकते।
  • समय को नियमितता के बंधनों में बाँधा जाना चाहिए।
  • समय उस मनुष्य का विनाश कर देता है, जो उसे नष्ट करता रहता है।
  • समय महान चिकित्सक है।
  • समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।
  • समय की कद्र करो। प्रत्येक दिवस एक जीवन है। एक मिनट भी फिजूल मत गँवाओ। ज़िन्दगी की सच्ची कीमत हमारे वक़्त का एक-एक क्षण ठीक उपयोग करने में है।
  • समय का सुदपयोग ही उन्नति का मूलमंत्र है।
  • संघर्ष ही जीवन है। संघर्ष से बचे रह सकना किसी के लिए भी संभव नहीं।
  • सेवा का मार्ग ज्ञान, तप, योग आदि के मार्ग से भी ऊँचा है।
  • स्वार्थ, अहंकार और लापरवाही की मात्रा बढ़ जाना ही किसी व्यक्ति के पतन का कारण होता है।
  • स्वार्थ और अभिमान का त्याग करने से साधुता आती है।
  • सत्कर्म की प्रेरणा देने से बढ़कर और कोई पुण्य हो ही नहीं सकता।
  • सद्‌गुणों के विकास में किया हुआ कोई भी त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।
  • सद्‌भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से जिनका जीवन जितना ओतप्रोत है, वह ईश्वर के उतना ही निकट है।
  • सारी शक्तियाँ लोभ, मोह और अहंता के लिए वासना, तृष्णा और प्रदर्शन के लिए नहीं खपनी चाहिए।
  • समान भाव से आत्मीयता पूर्वक कर्तव्य -कर्मों का पालन किया जाना मनुष्य का धर्म है।
  • सत्कर्मों का आत्मसात होना ही उपासना, साधना और आराधना का सारभूत तत्व है।
  • सद्‌विचार तब तक मधुर कल्पना भर बने रहते हैं, जब तक उन्हें कार्य रूप में परिणत नहीं किया जाय।
  • सदविचार ही सद्व्यवहार का मूल है।
  • सफल नेतृत्व के लिए मिलनसारी, सहानुभूति और कृतज्ञता जैसे दिव्य गुणों की अतीव आवश्यकता है।
  • सफल नेता की शिवत्व भावना-सबका भला ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ से प्रेरित होती है।
  • सफलता अत्यधिक परिश्रम चाहती है।
  • सफलता प्राप्त करने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती और असफलता कभी अंतिम नहीं होती।
  • सफलता का एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुल जाता हैं लेकिन अक्सर हम बंद दरवाज़े की ओर देखते हैं और उस दरवाज़े को देखते ही नहीं जो हमारे लिए खुला रहता है।
  • सफलता-असफलता का विचार कभी मत सोचे, निष्काम भाव से अपने कर्मयुद्ध में डटे रहें अर्जुन की तरह आप सफल प्रतियोगी अवश्य बनेंगे।
  • स्वाधीन मन मनुष्य का सच्चा सहायक होता है।
  • संकल्प जीवन की उत्कृष्टता का मंत्र है, उसका प्रयोग मनुष्य जीवन के गुण विकास के लिए होना चाहिए।
  • संकल्प ही मनुष्य का बल है।
  • सदा चेहरे पर प्रसन्नता व मुस्कान रखो। दूसरों को प्रसन्नता दो, तुम्हें प्रसन्नता मिलेगी।
  • स्वधर्म में अवस्थित रहकर स्वकर्म से परमात्मा की पूजा करते हुए तुम्हें समाधि व सिद्धि मिलेगी।
  • सज्जन व कर्मशील व्यक्ति तो यह जानता है, कि शब्दों की अपेक्षा कर्म अधिक ज़ोर से बोलते हैं। अत: वह अपने शुभकर्म में ही निमग्न रहता है।
  • सज्जनों की कोई भी साधना कठिनाइयों में से होकर निकलने पर ही पूर्ण होती है।
  • सज्जनता ऐसी विधा है जो वचन से तो कम; किन्तु व्यवहार से अधिक परखी जाती है।
  • सज्जनता और मधुर व्यवहार मनुष्यता की पहली शर्ता है।
  • सत्संग और प्रवचनों का – स्वाध्याय और सुदपदेशों का तभी कुछ मूल्य है, जब उनके अनुसार कार्य करने की प्रेरणा मिले। अन्यथा यह सब भी कोरी बुद्धिमत्ता मात्र है।
  • साधना एक पराक्रम है, संघर्ष है, जो अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों से करना होता है।
  • समर्पण का अर्थ है – पूर्णरूपेण प्रभु को हृदय में स्वीकार करना, उनकी इच्छा, प्रेरणाओं के प्रति सदैव जागरूक रहना और जीवन के प्रतयेक क्षण में उसे परिणत करते रहना।
  • समर्पण का अर्थ है – मन अपना विचार इष्ट के, हृदय अपना भावनाएँ इष्ट की और आपा अपना किन्तु कर्तव्य समग्र रूप से इष्ट का।
  • सम्भव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है। असम्भव से भी आगे निकल जाना।
  • सत्कार्य करके मिलने वाली खुशी से बढ़कर और कोई खुशी नहीं होती।
  • सीखना दो प्रकार से होता है, पहला अध्ययन करके और दूसरा बुद्धिमानों से संगत करके।
  • सबसे महान धर्म है, अपनी आत्मा के प्रति सच्चा बनना।
  • सद्‌व्यवहार में शक्ति है। जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूँ, वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है।
  • सलाह सबकी सुनो पर करो वह जिसके लिए तुम्हारा साहस और विवेक समर्थन करे।
  • सलाह सबकी सुनो, पर करो वह जिसके लिए तुम्हारा साहस और विवेक समर्थन करे।
  • सत्प्रयत्न कभी निरर्थक नहीं होते।
  • सादगी सबसे बड़ा फैशन है।
  • ‘स्वाध्यान्मा प्रमद:’ अर्थात्‌ स्वाध्याय में प्रमाद न करें।
  • सम्मान पद में नहीं, मनुष्यता में है।
  • सबकी मंगल कामना करो, इससे आपका भी मंगल होगा।
  • स्वाध्याय एक अनिवार्य दैनिक धर्म कत्र्तव्य है।
  • स्वाध्याय को साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर अपने आवश्यक नित्य कर्मों में स्थान दें।
  • स्वाध्याय एक वैसी ही आत्मिक आवश्यकता है जैसे शरीर के लिए भोजन।
  • स्वार्थपरता की कलंक कालिमा से जिन्होंने अपना चेहरा पोत लिया है, वे असुर है।
  • सूर्य प्रतिदिन निकलता है और डूबते हुए आयु का एक दिन छीन ले जाता है, पर माया-मोह में डूबे मनुष्य समझते नहीं कि उन्हें यह बहुमूल्य जीवन क्यों मिला ?
  • सबके सुख में ही हमारा सुख सन्निहित है।
  • सेवा से बढ़कर पुण्य-परमार्थ इस संसार में और कुछ नहीं हो सकता।
  • सेवा में बड़ी शक्ति है। उससे भगवान भी वश में हो सकते हैं।
  • स्वयं उत्कृष्ट बनने और दूसरों को उत्कृष्ट बनाने का कार्य आत्म कल्याण का एकमात्र उपाय है।
  • स्वयं प्रकाशित दीप को भी प्रकाश के लिए तेल और बत्ती का जतन करना पड़ता है बुद्धिमान भी अपने विकास के लिए निरंतर यत्न करते हैं।
  • सतोगुणी भोजन से ही मन की सात्विकता स्थिर रहती है।
  • समस्त हिंसा, द्वेष, बैर और विरोध की भीषण लपटें दया का संस्पर्श पाकर शान्त हो जाती हैं।
  • साहस ही एकमात्र ऐसा साथी है, जिसको साथ लेकर मनुष्य एकाकी भी दुर्गम दीखने वाले पथ पर चल पड़ते एवं लक्ष्य तक जा पहुँचने में समर्थ हो सकता है।
  • साहस और हिम्मत से खतरों में भी आगे बढ़िये। जोखित उठाये बिना जीवन में कोई महत्त्वपूर्ण सफलता नहीं पाई जा सकती।
  • सुख बाँटने की वस्तु है और दु:खे बँटा लेने की। इसी आधार पर आंतरिक उल्लास और अन्यान्यों का सद्‌भाव प्राप्त होता है। महानता इसी आधार पर उपलब्ध होती है।
  • सहानुभूति मनुष्य के हृदय में निवास करने वाली वह कोमलता है, जिसका निर्माण संवेदना, दया, प्रेम तथा करुणा के सम्मिश्रण से होता है।
  • सन्मार्ग का राजपथ कभी भी न छोड़े।
  • स्वच्छता सभ्यता का प्रथम सोपान है।
  • स्वाधीन मन मनुष्य का सच्चा सहायक होता है।
  • साधना का अर्थ है – कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए भी सत्प्रयास जारी रखना।
  • सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, सम्पती अथवा दरिद्रता ये जिसके कार्यो मे बाधा नहीं डालते वही ज्ञानवान (विवेकशील) कहलाता है।
  • सभी मन्त्रों से महामंत्र है – कर्म मंत्र, कर्म करते हुए भजन करते रहना ही प्रभु की सच्ची भक्ति है।
  • संयम की शक्ति जीवं में सुरभि व सुगंध भर देती है।

म

  • मनुष्य को उत्तम शिक्षा अच्चा स्वभाव, धर्म, योगाभ्यास और विज्ञान का सार्थक ग्रहण करके जीवन में सफलता प्राप्त करनी चाहिए।
  • मनुष्य का मन कछुए की भाँति होना चाहिए, जो बाहर की चोटें सहते हुए भी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ता और धीरे-धीरे मंज़िल पर पहुँच जाता है।
  • मनुष्य की सफलता के पीछे मुख्यता उसकी सोच, शैली एवं जीने का नज़रिया होता है।
  • मनुष्य अपने अंदर की बुराई पर ध्यान नहीं देता और दूसरों की उतनी ही बुराई की आलोचना करता है, अपने पाप का तो बड़ा नगर बसाता है और दूसरे का छोटा गाँव भी ज़रा-सा सहन नहीं कर सकता है।
  • मनुष्य का जीवन तीन मुख्य तत्वों का समागम है – शरीर, विचार एवं मन।
  • मनुष्य जीवन का पूरा विकास ग़लत स्थानों, ग़लत विचारों और ग़लत दृष्टिकोणों से मन और शरीर को बचाकर उचित मार्ग पर आरूढ़ कराने से होता है।
  • मनुष्य के भावों में प्रबल रचना शक्ति है, वे अपनी दुनिया आप बसा लेते हैं।
  • मनुष्य बुद्धिमानी का गर्व करता है, पर किस काम की वह बुद्धिमानी-जिससे जीवन की साधारण कला हँस-खेल कर जीने की प्रक्रिया भी हाथ न आए।
  • मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है।
  • मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-विज्ञान की जानकारी हुए बिना यह संभव नहीं है कि मनुष्य दुष्कर्मों का परित्याग करे।
  • मनुष्य की संकल्प शक्ति संसार का सबसे बड़ा चमत्कार है।
  • मनुष्य जन्म सरल है, पर मनुष्यता कठिन प्रयत्न करके कमानी पड़ती है।
  • मनुष्य एक भटका हुआ देवता है। सही दिशा पर चल सके, तो उससे बढ़कर श्रेष्ठ और कोई नहीं।
  • मनुष्य दु:खी, निराशा, चिंतित, उदिग्न बैठा रहता हो तो समझना चाहिए सही सोचने की विधि से अपरिचित होने का ही यह परिणाम है। – वाङ्गमय
  • मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है; परन्तु इनके परिणामों में चुनाव की कोई सुविधा नहीं।
  • मनुष्य परिस्थितियों का ग़ुलाम नहीं, अपने भाग्य का निर्माता और विधाता है।
  • मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।
  • मनुष्य उपाधियों से नहीं, श्रेष्ठ कार्यों से सज्जन बनता है।
  • मनुष्य का अपने आपसे बढ़कर न कोई शत्रु है, न मित्र।
  • मनुष्य को एक ही प्रकार की उन्नति से संतुष्ट न होकर जीवन की सभी दिशाओं में उन्नति करनी चाहिए। केवल एक ही दिशा में उन्नति के लिए अत्यधिक प्रयत्न करना और अन्य दिशाओं की उपेक्षा करना और उनकी ओर से उदासीन रहना उचित नहीं है।
  • मनुष्यता सबसे अधिक मूल्यवान है। उसकी रक्षा करना प्रत्येक जागरूक व्यक्ति का परम कर्तव्य है।
  • मां है मोहब्बत का नाम, मां से बिछुड़कर चैन कहाँ।
  • माँ का जीवन बलिदान का, त्याग का जीवन है। उसका बदला कोई भी पुत्र नहीं चुका सकता चाहे वह भूमंडल का स्वामी ही क्यों न हो।
  • माँ-बेटी का रिश्ता इतना अनूठा, इतना अलग होता है कि उसकी व्याख्या करना मुश्किल है, इस रिश्ते से सदैव पहली बारिश की फुहारों-सी ताजगी रहती है, तभी तो माँ के साथ बिताया हर क्षण होता है अमिट, अलग उनके साथ गुज़ारा हर पल शानदार होता है।
  • माता-पिता के चरणों में चारों धाम हैं। माता-पिता इस धरती के भगवान हैं।
  • माता-पिता का बच्चों के प्रति, आचार्य का शिष्यों के प्रति, राष्ट्रभक्त का मातृभूमि के प्रति ही सच्चा प्रेम है।
  • ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव’ की संस्कृति अपनाओ!
  • मृत्यु दो बार नहीं आती और जब आने को होती है, उससे पहले भी नहीं आती है।
  • महान प्यार और महान उपलब्धियों के खतरे भी महान होते हैं।
  • महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिये बहुत कष्ट सहना पड़ता है, जो तप के समान होता है; क्योंकि ऊंचाई पर स्थिर रह पाना आसान काम नहीं है।
  • मानसिक शांति के लिये मन-शुद्धी, श्वास-शुद्धी एवं इन्द्रिय-शुद्धी का होना अति आवश्यक है।
  • मन की शांति के लिये अंदरूनी संघर्ष को बंद करना ज़रूरी है, जब तक अंदरूनी युद्ध चलता रहेगा, शांति नहीं मिल सकती।
  • मन का नियन्त्रण मनुष्य का एक आवश्यक कत्र्तव्य है।
  • मन-बुद्धि की भाषा है – मैं, मेरी, इसके बिना बाहर के जगत का कोई व्यवहार नहीं चलेगा, अगर अंदर स्वयं को जगा लिया तो भीतर तेरा-तेरा शुरू होने से व्यक्ति परम शांति प्राप्त कर लेता है।
  • मरते वे हैं, जो शरीर के सुख और इन्द्रीय वासनाओं की तृप्ति के लिए रात-दिन खपते रहते हैं।
  • मस्तिष्क में जिस प्रकार के विचार भरे रहते हैं वस्तुत: उसका संग्रह ही सच्ची परिस्थिति है। उसी के प्रभाव से जीवन की दिशाएँ बनती और मुड़ती रहती हैं।
  • महात्मा वह है, जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करती है।
  • मानव जीवन की सफलता का श्रेय जिस महानता पर निर्भर है, उसे एक शब्द में धार्मिकता कह सकते हैं।
  • मानवता की सेवा से बढ़कर और कोई बड़ा काम नहीं हो सकता।
  • मांसाहार मानवता को त्यागकर ही किया जा सकता है।
  • मेहनत, हिम्मत और लगन से कल्पना साकार होती है।
  • मुस्कान प्रेम की भाषा है।
  • मैं परमात्मा का प्रतिनिधि हूँ।
  • मैं माँ भारती का अमृतपुत्र हूँ, ‘माता भूमि: पुत्रोहं प्रथिव्या:’।
  • मैं पहले माँ भारती का पुत्र हूँ, बाद में सन्यासी, ग्रहस्थ, नेता, अभिनेता, कर्मचारी, अधिकारी या व्यापारी हूँ।
  • मैं सदा प्रभु में हूँ, मेरा प्रभु सदा मुझमें है।
  • मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मैंने इस पवित्र भूमि व देश में जन्म लिया है।
  • मैं अपने जीवन पुष्प से माँ भारती की आराधना करुँगा।
  • मैं पुरुषार्थवादी, राष्ट्रवादी, मानवतावादी व अध्यात्मवादी हूँ।
  • मैं मात्र एक व्यक्ति नहीं, अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र व देश की सभ्यता व संस्कृति की अभिव्यक्ति हूँ।
  • मेरे भीतर संकल्प की अग्नि निरंतर प्रज्ज्वलित है। मेरे जीवन का पथ सदा प्रकाशमान है।
  • मेरे पूर्वज, मेरे स्वाभिमान हैं।
  • मेरे मस्तिष्क में ब्रह्माण्ड सा तेज़, मेधा, प्रज्ञा व विवेक है।
  • मनोविकार भले ही छोटे हों या बड़े, यह शत्रु के समान हैं और प्रताड़ना के ही योग्य हैं।
  • मनोविकारों से परेशान, दु:खी, चिंतित मनुष्य के लिए उनके दु:ख-दर्द के समय श्रेष्ठ पुस्तकें ही सहारा है।
  • महानता के विकास में अहंकार सबसे घातक शत्रु है।
  • महानता का गुण न तो किसी के लिए सुरक्षित है और न प्रतिबंधित। जो चाहे अपनी शुभेच्छाओं से उसे प्राप्त कर सकता है।
  • महापुरुषों का ग्रंथ सबसे बड़ा सत्संग है।
  • मात्र हवन, धूपबत्ती और जप की संख्या के नाम पर प्रसन्न होकर आदमी की मनोकामना पूरी कर दिया करे, ऐसी देवी दुनिया मेंं कहीं नहीं है।
  • मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता।
  • मेरा निराशावाद इतना सघन है कि मुझे निराशावादियों की मंशा पर भी संदेह होता है।
  • मूर्ख व्‍यक्ति दूसरे को मूर्ख बनाने की चेष्‍टा करके आसानी से अपनी मूर्खता सिद्ध कर देते हैं।

द

  • दुनिया में आलस्य को पोषण देने जैसा दूसरा भयंकर पाप नहीं है।
  • दुनिया में भलमनसाहत का व्यवहार करने वाला एक चमकता हुआ हीरा है।
  • दुनिया में सफलता एक चीज़ के बदले में मिलती है और वह है आदमी की उत्कृष्ट व्यक्तित्व।
  • दूसरों की निन्दा और त्रूटियाँ सुनने में अपना समय नष्ट मत करो।
  • दूसरों की निन्दा करके किसी को कुछ नहीं मिला, जिसने अपने को सुधारा उसने बहुत कुछ पाया।
  • दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसन्द नहीं।
  • दूसरों के साथ सदैव नम्रता, मधुरता, सज्जनता, उदारता एवं सहृदयता का व्यवहार करें।
  • दूसरों के जैसे बनने के प्रयास में अपना निजीपन नष्ट मत करो।
  • दूसरों की सबसे बड़ी सहायता यही की जा सकती है कि उनके सोचने में जो त्रुटि है, उसे सुधार दिया जाए।
  • दूसरों से प्रेम करना अपने आप से प्रेम करना है।
  • दूसरों को पीड़ा न देना ही मानव धर्म है।
  • दूसरों पर भरोसा लादे मत बैठे रहो। अपनी ही हिम्मत पर खड़ा रह सकना और आगे बढ़् सकना संभव हो सकता है। सलाह सबकी सुनो, पर करो वह जिसके लिए तुम्हारा साहस और विवेक समर्थन करे।
  • दूसरे के लिए पाप की बात सोचने में पहले स्वयं को ही पाप का भागी बनना पड़ता है।
  • दुष्कर्मों के बढ़ जाने पर सच्चाई निष्क्रिय हो जाती है, जिसके परिणाम स्वरुप वह राहत के बदले प्रतिक्रया करना शुरू कर देती है।
  • दुष्कर्म स्वत: ही एक अभिशाप है, जो कर्ता को भस्म किये बिना नहीं रहता।
  • दण्ड देने की शक्ति होने पर भी दण्ड न देना सच्चे क्षमा है।
  • दुःख देने वाले और हृदय को जलाने वाले बहुत से पुत्रों से क्या लाभ? कुल को सहारा देने वाला एक पुत्र ही श्रेष्ठ होता है।
  • दु:ख का मूल है पाप। पाप का परिणाम है-पतन, दु:ख, कष्ट, कलह और विषाद। यह सब अनीति के अवश्यंभावी परिणाम हैं।
  • दिन में अधूरी इच्छा को व्यक्ति रात को स्वप्न के रूप में देखता है, इसलिए जितना मन अशांत होगा, उतने ही अधिक स्वप्न आते हैं।
  • दो प्रकार की प्रेरणा होती है- एक बाहरी व दूसरी अंतर प्रेरणा, आतंरिक प्रेरणा बहुत महत्त्वपूर्ण होती है; क्योंकि वह स्वयं की निर्मात्री होती है।
  • दो याद रखने योग्य हैं-एक कर्त्तव्य और दूसरा मरण।
  • दान की वृत्ति दीपक की ज्योति के समान होनी चाहिए, जो समीप से अधिक प्रकाश देती है और ऐसे दानी अमरपद को प्राप्त करते हैं।
  • दरिद्रता कोई दैवी प्रकोप नहीं, उसे आलस्य, प्रमाद, अपव्यय एवं दुर्गुणों के एकत्रीकरण का प्रतिफल ही करना चाहिए।
  • दिल खोलकर हँसना और मुस्कराते रहना चित्त को प्रफुल्लित रखने की एक अचूक औषधि है।
  • दीनता वस्तुत: मानसिक हीनता का ही प्रतिफल है।
  • दुष्ट चिंतन आग में खेलने की तरह है।
  • दैवी शक्तियों के अवतरण के लिए पहली शर्त है – साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता।
  • देवमानव वे हैं, जो आदर्शों के क्रियान्वयन की योजना बनाते और सुविधा की ललक-लिप्सा को अस्वीकार करके युगधर्म के निर्वाह की काँटों भरी राह पर एकाकी चल पड़ते हैं।
  • दरिद्रता पैसे की कमी का नाम नहीं है, वरन्‌ मनुष्य की कृपणता का नाम दरिद्रता है।
  • दुष्टता वस्तुत: पह्ले दर्जे की कायरता का ही नाम है। उसमें जो आतंक दिखता है वह प्रतिरोध के अभाव से ही पनपता है। घर के बच्चें भी जाग पड़े तो बलवान चोर के पैर उखड़ते देर नहीं लगती। स्वाध्याय से योग की उपासना करे और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
  • दया का दान लड़खड़ाते पैरा में नई शक्ति देना, निराश हृदय में जागृति की नई प्रेरणा फूँकना, गिरे हुए को उठाने की सामथ्र्य प्रदान करना एवं अंधकार में भटके हुए को प्रकाश देना।
  • दृढ़ता हो, ज़िद्द नहीं। बहादुरी हो, जल्दबाज़ी नहीं। दया हो, कमज़ोरी नहीं।
  • दृष्टिकोण की श्रेष्ठता ही वस्तुत: मानव जीवन की श्रेष्ठता है।
  • दृढ़ आत्मविश्वास ही सफलता की एकमात्र कुंजी है।

प

  • परमात्मा वास्तविक स्वरुप को न मानकर उसकी कथित पूजा करना अथवा अपात्र को दान देना, ऐसे कर्म क्रमश: कोई कर्म-फल प्राप्त नहीं कराते, बल्कि पाप का भागी बनाते हैं।
  • परमात्मा के गुण, कर्म और स्वभाव के समान अपने स्वयं के गुण, कर्म व स्वभावों को समयानुसार धारण करना ही परमात्मा की सच्ची पूजा है।
  • परमात्मा की सृष्टि का हर व्यक्ति समान है। चाहे उसका रंग वर्ण, कुल और गोत्र कुछ भी क्यों न हो।
  • परमात्मा जिसे जीवन में कोई विशेष अभ्युदय-अनुग्रह करना चाहता है, उसकी बहुत-सी सुविधाओं को समाप्त कर दिया करता है।
  • परमात्मा की सच्ची पूजा सद्‌व्यवहार है।
  • पिता सिखाते हैं पैरों पर संतुलन बनाकर व ऊंगली थाम कर चलना, पर माँ सिखाती है सभी के साथ संतुलन बनाकर दुनिया के साथ चलना, तभी वह अलग है, महान है।
  • पाप आत्मा का शत्रु है और सद्गुण आत्मा का मित्र।
  • पाप अपने साथ रोग, शोक, पतन और संकट भी लेकर आता है।
  • पाप की एक शाखा है – असावधानी।
  • पापों का नाश प्रायश्चित करने और इससे सदा बचने के संकल्प से होता है।
  • पढ़ना एक गुण, चिंतन दो गुना, आचरण चौगुना करना चाहिए।
  • परोपकारी, निष्कामी और सत्यवादी यानी निर्भय होकर मन, वचन व कर्म से सत्य का आचरण करने वाला देव है।
  • प्रेम करने का मतलब सम-व्यवहार ज़रूरी नहीं, बल्कि समभाव होना चाहिए, जिसके लिये घोड़े की लगाम की भाँति व्यवहार में ढील देना पड़ती है और कभी खींचना भी ज़रूरी हो जाता है।
  • पूर्वजों के गुणों का अनुसरण करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना है।
  • पांच वर्ष की आयु तक पुत्र को प्यार करना चाहिए। इसके बाद दस वर्ष तक इस पर निगरानी राखी जानी चाहिए और ग़लती करने पर उसे दण्ड भी दिया जा सकता है, परन्तु सोलह वर्ष की आयु के बाद उससे मित्रता कर एक मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए।
  • पूरी दुनिया में 350 धर्म हैं, हर धर्म का मूल तत्व एक ही है, परन्तु आज लोगों का धर्म की उपेक्षा अपने-अपने भजन व पंथ से अधिक लगाव है।
  • परमार्थ मानव जीवन का सच्चा स्वार्थ है।
  • परोपकार से बढ़कर और निरापत दूसरा कोई धर्म नहीं।
  • परावलम्बी जीवित तो रहते हैं, पर मृत तुल्य ही।
  • प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से जागती है और उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है।
  • पुण्य की जय-पाप की भी जय ऐसा समदर्शन तो व्यक्ति को दार्शनिक भूल-भुलैयों में उलझा कर संसार का सर्वनाश ही कर देगा।
  • प्रतिभावान्‌ व्यक्तित्व अर्जित कर लेना, धनाध्यक्ष बनने की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है।
  • पादरी, मौलवी और महंत भी जब तक एक तरह की बात नहीं कहते, तो दो व्यक्तियों में एकमत की आशा की ही कैसे जाए?
  • पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं, पर आज सीखना कौन चाहता है?
  • प्रकृतित: हर मनुष्य अपने आप में सुयोग्य एवं समर्थ है।
  • प्रस्तुत उलझनें और दुष्प्रवृत्तियाँ कहीं आसमान से नहीं टपकीं। वे मनुष्य की अपनी बोयी, उगाई और बढ़ाई हुई हैं।
  • पूरी तरह तैरने का नाम तीर्थ है। एक मात्र पानी में डुबकी लगाना ही तीर्थस्नान नहीं।
  • प्रचंड वायु में भी पहाड़ विचलित नहीं होते।
  • प्रसन्नता स्वास्थ्य देती है, विषाद रोग देते हैं।
  • प्रसन्न करने का उपाय है, स्वयं प्रसन्न रहना।
  • प्रत्येक अच्छा कार्य पहले असम्भव नज़र आता है।
  • प्रकृति के सब काम धीरे-धीरे होते हैं।
  • प्रकृति के अनुकूल चलें, स्वस्थ रहें।
  • प्रकृति जानवरों तक को अपने मित्र पहचानने की सूझ-बूझ दे देती है।
  • प्रत्येक जीव की आत्मा में मेरा परमात्मा विराजमान है।
  • पराक्रमशीलता, राष्ट्रवादिता, पारदर्शिता, दूरदर्शिता, आध्यात्मिक, मानवता एवं विनयशीलता मेरी कार्यशैली के आदर्श हैं।
  • पवित्र विचार-प्रवाह ही जीवन है तथा विचार-प्रवाह का विघटन ही मृत्यु है।
  • पवित्र विचार प्रवाह ही मधुर व प्रभावशाली वाणी का मूल स्रोत है।
  • प्रेम, वासना नहीं उपासना है। वासना का उत्कर्ष प्रेम की हत्या है, प्रेम समर्पण एवं विश्वास की परकाष्ठा है।
  • प्रखर और सजीव आध्यात्मिकता वह है, जिसमें अपने आपका निर्माण दुनिया वालों की अँधी भेड़चाल के अनुकरण से नहीं, वरन्‌ स्वतंत्र विवेक के आधार पर कर सकना संभव हो सके।
  • प्रगति के लिए संघर्ष करो। अनीति को रोकने के लिए संघर्ष करो और इसलिए भी संघर्ष करो कि संघर्ष के कारणों का अन्त हो सके।
  • पढ़ने का लाभ तभी है जब उसे व्यवहार में लाया जाए।
  • परोपकार से बढ़कर और निरापद दूसरा कोई धर्म नहीं।
  • प्रशंसा और प्रतिष्ठा वही सच्ची है, जो उत्कृष्ट कार्य करने के लिए प्राप्त हो।
  • प्रसुप्त देवत्व का जागरण ही सबसे बड़ी ईश्वर पूजा है।
  • प्रतिकूल परिस्थितियों करके ही दूसरों को सच्ची शिक्षा दी जा सकती है।
  • प्रतिकूल परिस्थिति में भी हम अधीर न हों।
  • परिश्रम ही स्वस्थ जीवन का मूलमंत्र है।
  • परिवार एक छोटा समाज एवं छोटा राष्ट्र है। उसकी सुव्यवस्था एवं शालीनता उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी बड़े रूप में समूचे राष्ट्र की।
  • परिजन हमारे लिए भगवान की प्रतिकृति हैं और उनसे अधिकाधिक गहरा प्रेम प्रसंग बनाए रखने की उत्कंठा उमड़ती रहती है। इस वेदना के पीछे भी एक ऐसा दिव्य आनंद झाँकता है इसे भक्तियोग के मर्मज्ञ ही जान सकते हैं।
  • प्रगतिशील जीवन केवल वे ही जी सकते हैं, जिनने हृदय में कोमलता, मस्तिष्क में तीष्णता, रक्त में उष्णता और स्वभाव में दृढ़ता का समुतिच समावेश कर लिया है।
  • परमार्थ के बदले यदि हमको कुछ मूल्य मिले, चाहे वह पैसे के रूप में प्रभाव, प्रभुत्व व पद-प्रतिष्ठा के रूप में तो वह सच्चा परमार्थ नहीं है। इसे कत्र्तव्य पालन कह सकते हैं।
  • पराये धन के प्रति लोभ पैदा करना अपनी हानि करना है।
  • पेट और मस्तिष्क स्वास्थ्य की गाड़ी को ठीक प्रकार चलाने वाले दो पहिए हैं। इनमें से एक बिगड़ गया तो दूसरा भी बेकार ही बना रहेगा।
  • पुण्य-परमार्थ का कोई अवसर टालना नहीं चाहिए; क्योंकि अगले क्षण यह देह रहे या न रहे क्या ठिकाना।
  • पराधीनता समाज के समस्त मौलिक निमयों के विरुद्ध है।
  • पति को कभी कभी अँधा और कभी कभी बहरा होना चाहिए।
  • प्रत्येक मनुष्य को जीवन में केवल अपने भाग्य की परिक्षा का अवसर मिलता हे। वही भविष्य का निर्णय कर देता है।
  • प्रत्येक अच्छा कार्य पहले असंभव नजर आता है।
  • पड़े पड़े तो अच्‍छे से अच्‍छे फ़ौलाद में भी जंग लग जाता है, निष्क्रिय हो जाने से, सारी दैवीय शक्तियां स्‍वत: मनुष्‍य का साथ छोड़ देतीं हैं।
  • प्रति पल का उपयोग करने वाले कभी भी पराजित नहीं हो सकते, समय का हर क्षण का उपयोग मनुष्‍य को विलक्षण और अदभुत बना देता है।
  • प्रवीण व्यक्ति वही होता हें जो हर प्रकार की परिस्थितियों में दक्षता से काम कर सके।

व

  • व्रतों से सत्य सर्वोपरि है।
  • विधा, बुद्धि और ज्ञान को जितना खर्च करो, उतना ही बढ़ते हैं।
  • वह सत्य नहीं जिसमें हिंसा भरी हो। यदि दया युक्त हो तो असत्य भी सत्य ही कहा जाता है। जिसमें मनुष्य का हित होता हो, वही सत्य है।
  • वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक; किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं।
  • वही उन्नति कर सकता है, जो स्वयं को उपदेश देता है।
  • वही सबसे तेज़ चलता है, जो अकेला चलता है।
  • वही जीवति है, जिसका मस्तिष्क ठण्डा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है।
  • वे माता-पिता धन्य हैं, जो अपनी संतान के लिए उत्तम पुस्तकों का एक संग्रह छोड़ जाते हैं।
  • व्यक्ति का चिंतन और चरित्र इतना ढीला हो गया है कि स्वार्थ के लिए अनर्थ करने में व्यक्ति चूकता नहीं।
  • व्यक्ति दौलत से नहीं, ज्ञान से अमीर होता है।
  • वर्ण, आश्रम आदि की जो विशेषता है, वह दूसरों की सेवा करने के लिए है, अभिमान करने के लिए नहीं।
  • विवेकशील व्यक्ति उचित अनुचित पर विचार करता है और अनुचित को किसी भी मूल्य पर स्वीकार नहीं करता।
  • व्यक्तित्व की अपनी वाणी है, जो जीभ या कलम का इस्तेमाल किये बिना भी लोगों के अंतराल को छूती है।
  • वह मनुष्य विवेकवान्‌ है, जो भविष्य से न तो आशा रखता है और न भयभीत ही होता है।
  • विपरीत प्रतिकूलताएँ नेता के आत्म विश्वास को चमका देती हैं।
  • विपरीत दिशा में कभी न घबराएं, बल्कि पक्की ईंट की तरह मज़बूत बनना चाहिय और जीवन की हर चुनौती को परीक्षा एवं तपस्या समझकर निरंतर आगे बढना चाहिए।
  • विवेक बहादुरी का उत्तम अंश है।
  • विवेक और पुरुषार्थ जिसके साथी हैं, वही प्रकाश प्राप्त करेंगे।
  • विश्वास से आश्चर्य-जनक प्रोत्साहन मिलता है।
  • विचार शहादत, कुर्बानी, शक्ति, शौर्य, साहस व स्वाभिमान है। विचार आग व तूफ़ान है, साथ ही शान्ति व सन्तुष्टी का पैग़ाम है।
  • विचार ही सम्पूर्ण खुशियों का आधार हैं।
  • विचारों की अपवित्रता ही हिंसा, अपराध, क्रूरता, शोषण, अन्याय, अधर्म और भ्रष्टाचार का कारण है।
  • विचारों की पवित्रता ही नैतिकता है।
  • विचारों की पवित्रता स्वयं एक स्वास्थ्यवर्धक रसायन है।
  • विचारों का ही परिणाम है – हमारा सम्पूर्ण जीवन। विचार ही बीज है, जीवनरुपी इस व्रक्ष का।
  • विचारों को कार्यरूप देना ही सफलता का रहस्य है।
  • विचारवान व संस्कारवान ही अमीर व महान है तथा विचारहीन ही कंगाल व दरिद्र है।
  • विचारशीलता ही मनुष्यता और विचारहीनता ही पशुता है।
  • वैचारिक दरिद्रता ही देश के दुःख, अभाव पीड़ा व अवनति का कारण है। वैचारिक दृढ़ता ही देश की सुख-समृद्धि व विकास का मूल मंत्र है।
  • विद्या की आकांक्षा यदि सच्ची हो, गहरी हो तो उसके रह्ते कोई व्यक्ति कदापि मूर्ख, अशिक्षित नहीं रह सकता। – वाङ्गमय
  • विद्या वह अच्छी, जिसके पढ़ने से बैर द्वेष भूल जाएँ। जो विद्वान बैर द्वेष रखता है, यह जैसा पढ़ा, वैसा न पढ़ा।
  • वास्तविक सौन्दर्य के आधर हैं – स्वस्थ शरीर, निर्विकार मन और पवित्र आचरण।
  • विषयों, व्यसनों और विलासों में सुख खोजना और पाने की आशा करना एक भयानक दुराशा है।
  • वत मत करो, जिसके लिए पीछे पछताना पड़े।
  • व्यसनों के वश में होकर अपनी महत्ता को खो बैठे वह मूर्ख है।
  • वृद्धावस्था बीमारी नहीं, विधि का विधान है, इस दौरान सक्रिय रहें।
  • वाणी नहीं, आचरण एवं व्यक्तित्व ही प्रभावशाली उपदेश है
  • व्यक्तिगत स्वार्थों का उत्सर्ग सामाजिक प्रगति के लिए करने की परम्परा जब तक प्रचलित न होगी, तब तक कोई राष्ट्र सच्चे अर्थों में सामथ्र्यवान्‌ नहीं बन सकता है। -वाङ्गमय
  • वासना और तृष्णा की कीचड़ से जिन्होंने अपना उद्धार कर लिया और आदर्शों के लिए जीवित रहने का जिन्होंने व्रत धारण कर लिया वही जीवन मुक्त है।
  • व्यक्तिवाद के प्रति उपेक्षा और समूहवाद के प्रति निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों का समाज ही समुन्नत होता है।
  • विपत्ति से असली हानि उसकी उपस्थिति से नहीं होती, जब मन:स्थिति उससे लोहा लेने में असमर्थता प्रकट करती है तभी व्यक्ति टूटता है और हानि सहता है।
  • विपन्नता की स्थिति में धैर्य न छोड़ना मानसिक संतुलन नष्ट न होने देना, आशा पुरुषार्थ को न छोड़ना, आस्तिकता अर्थात्‌ ईश्वर विश्वास का प्रथम चिह्न है।
  • वहाँ मत देखो जहाँ आप गिरे। वहाँ देखो जहाँ से आप फिसले।
  • विद्वत्ता युवकों को संयमी बनाती है। यह बुढ़ापे का सहारा है, निर्धनता में धन है, और धनवानों के लिए आभूषण है।

य

  • यदि तुम फूल चाहते हो तो जल से पौधों को सींचना भी सीखो।
  • यदि कोई दूसरों की ज़िन्दगी को खुशहाल बनाता है तो उसकी ज़िन्दगी अपने आप खुशहाल बन जाती है।
  • यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निन्दा करना चाहे, तो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान न दो। इन बातों को सुनना भी महान पाप है, उससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा।
  • यदि व्यक्ति के संस्कार प्रबल होते हैं तो वह नैतिकता से भटकता नहीं है।
  • यदि पुत्र विद्वान और माता-पिता की सेवा करने वाला न हो तो उसका धरती पर जन्म लेना व्यर्थ है।
  • यदि ज़्यादा पैसा कमाना हाथ की बात नहीं तो कम खर्च करना तो हाथ की बात है; क्योंकि खर्चीला जीवन बनाना अपनी स्वतन्त्रता को खोना है।
  • यदि सज्जनो के मार्ग पर पुरा नहीं चला जा सकता तो थोडा ही चले। सन्मार्ग पर चलने वाला पुरूष नष्ट नहीं होता।
  • यदि आपको मरने का डर है, तो इसका यही अर्थ है, की आप जीवन के महत्त्व को ही नहीं समझते।
  • यदि आपको कोई कार्य कठिन लगता है तो इसका अर्थ है कि आप उस कार्य को ग़लत तरीके से कर रहे हैं।
  • यदि बचपन व माँ की कोख की याद रहे, तो हम कभी भी माँ-बाप के कृतघ्न नहीं हो सकते। अपमान की ऊचाईयाँ छूने के बाद भी अतीत की याद व्यक्ति के ज़मीन से पैर नहीं उखड़ने देती।
  • यदि मनुष्य कुछ सीखना चाहे, तो उसकी प्रत्येक भूल कुछ न कुछ सिखा देती है।
  • यदि उपयोगी और महत्‍वपूर्ण बन कर विश्‍व में सम्‍मानित रहना है तो सबके काम के बनो और सदा सक्रिय रहो।
  • यह सच है कि सच्चाई को अपनाना बहुत अच्छी बात है, लेकिन किसी सच से दूसरे का नुकसान होता हो तो, ऐसा सच बोलते समय सौ बार सोच लेना चाहिए।
  • यह संसार कर्म की कसौटी है। यहाँ मनुष्य की पहचान उसके कर्मों से होती है।
  • यह आपत्तिकालीन समय है। आपत्ति धर्म का अर्थ है-सामान्य सुख-सुविधाओं की बात ताक पर रख देना और वह करने में जुट जाना जिसके लिए मनुष्य की गरिमा भरी अंतरात्मा पुकारती है।
  • युग निर्माण योजना का लक्ष्य है – शुचिता, पवित्रता, सच्चरित्रता, समता, उदारता, सहकारिता उत्पन्न करना। – वाङ्गमय
  • युग निर्माण योजना का आरम्भ दूसरों को उपदेश देने से नहीं, वरन्‌ अपने मन को समझाने से शुरू होगा।
  • यज्ञ, दान और तप से त्याग करने योग्य कर्म ही नहीं, अपितु अनिवार्य कर्त्तव्य कर्म भी हैं; क्योंकि यज्ञ, दान व तप बुद्धिमान लोगों को पवित्र करने वाले हैं।
  • यथार्थ को समझना ही सत्य है। इसी को विवेक कहते हैं।
  • योग के दृष्टिकोण से तुम जो करते हो वह नहीं, बल्कि तुम कैसे करते हो, वह बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • योग्यता आपको सफलता की ऊँचाई तक पहुँचा सकती है किन्तु चरित्र आपको उस ऊँचाई पर बनाये रखती है।
  • या तो हाथीवाले से मित्रता न करो, या फिर ऐसा मकान बनवाओ जहां उसका हाथी आकर खड़ा हो सके।

ब

  • बुद्धिमान बनने का तरीका यह है कि आज हम जितना जानते हैं, भविष्य में उससे अधिक जानने के लिए प्रयत्नशील रहें।
  • बुद्धिमान वह है, जो किसी को ग़लतियों से हानि होते देखकर अपनी ग़लतियाँ सुधार लेता है।
  • बड़प्पन बड़े आदमियों के संपर्क से नहीं, अपने गुण, कर्म और स्वभाव की निर्मलता से मिला करता है।
  • बड़प्पन सुविधा संवर्धन में नहीं, सद्‌गुण संवर्धन का नाम है।
  • बड़प्पन सादगी और शालीनता में है।
  • बाहर मैं, मेरा और अंदर तू, तेरा, तेरी के भाव के साथ जीने का आभास जिसे हो गया, वह उसके जीवन की एक महान व उत्तम प्राप्ति है।
  • बिना गुरु के ज्ञान नहीं होता।
  • बिना सेवा के चित्त शुद्धि नहीं होती और चित्तशुद्धि के बिना परमात्मतत्व की अनुभूति नहीं होती।
  • बिना अनुभव के कोरा शाब्दिक ज्ञान अंधा है।
  • बहुमूल्य समय का सदुपयोग करने की कला जिसे आ गई उसने सफलता का रहस्य समझ लिया।
  • बहुमूल्य वर्तमान का सदुपयोग कीजिए।
  • बच्चे की प्रथम पाठशाला उसकी माता की गोद में होती है।
  • ब्रह्म विद्या मनुष्य को ब्रह्म – परमात्मा के चरणों में बिठा देती है और चित्त की मूर्खता छुडवा देती है।
  • बुरी मंत्रणा से राजा, विषयों की आसक्ति से योगी, स्वाध्याय न करने से विद्वान, अधिक प्यार से पुत्र, दुष्टों की संगती से चरित्र, प्रदेश में रहने से प्रेम, अन्याय से ऐश्वर्य, प्रेम न होने से मित्रता तथा प्रमोद से धन नष्ट हो जाता है; अतः बुद्धिमान अपना सभी प्रकार का धन संभालकर रखता है, बुरे समय का हमें हमेशा ध्यान रहता है।
  • बुराई मनुष्य के बुरे कर्मों की नहीं, वरन्‌ बुरे विचारों की देन होती है।
  • बुराई के अवसर दिन में सौ बार आते हैं तो भलाई के साल में एकाध बार।
  • बहुमत की आवाज़ न्याय का द्योतक नहीं है।
  • बाह्य जगत में प्रसिद्धि की तीव्र लालसा का अर्थ है-तुम्हें आन्तरिक सम्रध्द व शान्ति उपलब्ध नहीं हो पाई है।
  • बुढ़ापा आयु नहीं, विचारों का परिणाम है।
  • बलिदान वही कर सकता है, जो शुद्ध है, निर्भय है और योग्य है।
  • बातचीत का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह होता है कि ध्यानपूर्वक यह सुना जाए कि कहा क्या जा रहा है।

श

  • शुभ कार्यों को कल के लिए मत टालिए, क्योंकि कल कभी आता नहीं।
  • शुभ कार्यों के लिए हर दिन शुभ और अशुभ कार्यों के लिए हर दिना अशुभ है।
  • शक्ति उनमें होती है, जिनकी कथनी और करनी एक हो, जो प्रतिपादन करें, उनके पीछे मन, वचन और कर्म का त्रिविध समावेश हो।
  • शालीनता बिना मूल्य मिलती है, पर उससे सब कुछ ख़रीदा जा सकता है।
  • शत्रु की घात विफल हो सकती है, किन्तु आस्तीन के साँप बने मित्र की घात विफल नहीं होती।
  • शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अंग्रेज़ी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो।
  • शरीर स्वस्थ और निरोग हो, तो ही व्यक्ति दिनचर्या का पालन विधिवत कर सकता है, दैनिक कार्य और श्रम कर सकता है।
  • शरीर और मन की प्रसन्नता के लिए जिसने आत्म-प्रयोजन का बलिदान कर दिया, उससे बढ़कर अभागा एवं दुबुद्धि और कौन हो सकता है?
  • शिक्षा का स्थान स्कूल हो सकते हैं, पर दीक्षा का स्थान तो घर ही है।
  • शिक्षक राष्ट्र मंदिर के कुशल शिल्पी हैं।
  • शिक्षक नई पीढ़ी के निर्माता होत हैं।
  • शूरता है सभी परिस्थितियों में परम सत्य के लिए डटे रह सकना, विरोध में भी उसकी घोषण करना और जब कभी आवश्यकता हो तो उसके लिए युद्ध करना।

ज्ञ

  • ज्ञान मूर्खता छुडवाता है और परमात्मा का सुख देता है। यही आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है।
  • ज्ञान अक्षय है। उसकी प्राप्ति मनुष्य शय्या तक बन पड़े तो भी उस अवसर को हाथ से न जाने देना चाहिए।
  • ज्ञान ही धन और ज्ञान ही जीवन है। उसके लिए किया गया कोई भी बलिदान व्यर्थ नहीं जाता।
  • ज्ञान और आचरण में बोध और विवेक में जो सामञ्जस्य पैदा कर सके उसे ही विद्या कहते हैं।
  • ज्ञान के नेत्र हमें अपनी दुर्बलता से परिचित कराने आते हैं। जब तक इंद्रियों में सुख दीखता है, तब तक आँखों पर पर्दा हुआ मानना चाहिए।
  • ज्ञान से एकता पैदा होती है और अज्ञान से संकट।
  • ज्ञान का अर्थ मात्र जानना नहीं, वैसा हो जाना है।
  • ज्ञान का अर्थ है – जानने की शक्ति। सच को झूठ को सच से पृथक्‌ करने वाली जो विवेक बुद्धि है- उसी का नाम ज्ञान है।
  • ज्ञान अक्षय है, उसकी प्राप्ति शैय्या तक बन पड़े तो भी उस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।
  • ज्ञानदान से बढ़कर आज की परिस्थितियों में और कोई दान नहीं।
  • ज्ञान की आराधना से ही मनुष्य तुच्छ से महान बनता है।
  • ज्ञान की सार्थकता तभी है, जब वह आचरण में आए।
  • ज्ञान का जितना भाग व्यवहार में लाया जा सके वही सार्थक है, अन्यथा वह गधे पर लदे बोझ के समान है।
  • ज्ञान का अंतिम लक्ष्य चरित्र निर्माण ही है।
  • ज्ञान और आचरण में जो सामंजस्य पैदा कर सके, उसे ही विद्या कहते हैं।
  • ज्ञान मुक्त करता है, पर ज्ञान का अभिमान नरकों में ले जाता है।
  • ज्ञानयोगी की तरह सोचें, कर्मयोगी की तरह पुरुषार्थ करें और भक्तियोगी की तरह सहृदयता उभारें।
  • ज्ञानीजन विद्या विनय युक्त ब्राम्हण तथा गौ हाथी कुत्ते और चाण्डाल मे भी समदर्शी होते हैं।

न

  • न तो दरिद्रता में मोक्ष है और न सम्पन्नता में, बंधन धनी हो या निर्धन दोनों ही स्थितियों में ज्ञान से मोक्ष मिलता है।
  • न तो किसी तरह का कर्म करने से नष्ट हुई वस्तु मिल सकती है, न चिंता से। कोई ऐसा दाता भी नहीं है, जो मनुष्य को विनष्ट वस्तु दे दे, विधाता के विधान के अनुसार मनुष्य बारी-बारी से समय पर सब कुछ पा लेता है।
  • नेतृत्व पहले विशुद्ध रूप से सेवा का मार्ग था। एक कष्ट साध्य कार्य जिसे थोड़े से सक्षम व्यक्ति ही कर पाते थे।
  • नेतृत्व ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है, क्योंकि वह प्रामाणिकता, उदारता और साहसिकता के बदले ख़रीदा जाता है।
  • नेतृत्व का अर्थ है वह वर्चस्व जिसके सहारे परिचितों और अपरिचितों को अंकुश में रखा जा सके, अनुशासन में चलाया जा सके।
  • निश्चित रूप से ध्वंस सरल होता है और निर्माण कठिन है।
  • नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की और निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है।
  • नेता शिक्षित और सुयोग्य ही नहीं, प्रखर संकल्प वाला भी होना चाहिए, जो अपनी कथनी और करनी को एकरूप में रख सके।
  • नास्तिकता ईश्वर की अस्वीकृति को नहीं, आदर्शों की अवहेलना को कहते हैं।
  • निरंकुश स्वतंत्रता जहाँ बच्चों के विकास में बाधा बनती है, वहीं कठोर अनुशासन भी उनकी प्रतिभा को कुंठित करता है।
  • निष्काम कर्म, कर्म का अभाव नहीं, कर्तृत्व के अहंकार का अभाव होता है।
  • ‘न’ के लिए अनुमति नहीं है।
  • निन्दक दूसरों के आर-पार देखना पसन्द करता है, परन्तु खुद अपने आर-पार देखना नहीं चाहता।
  • नित्य गायत्री जप, उदित होते स्वर्णिम सविता का ध्यान, नित्य यज्ञ, अखण्ड दीप का सान्निध्य, दिव्यनाद की अवधारणा, आत्मदेव की साधना की दिव्य संगम स्थली है- शांतिकुञ्ज गायत्री तीर्थ।
  • निरभिमानी धन्य है; क्योंकि उन्हीं के हृदय में ईश्वर का निवास होता है।
  • निकृष्ट चिंतन एवं घृणित कर्तृत्व हमारी गौरव गरिमा पर लगा हुआ कलंक है। – वाङ्गमय
  • नैतिकता, प्रतिष्ठाओं में सबसे अधिक मूल्यवान्‌ है।
  • नर और नारी एक ही आत्मा के दो रूप है।
  • नारी का असली शृंगार, सादा जीवन उच्च विचार।
  • नाव स्वयं ही नदी पार नहीं करती। पीठ पर अनेकों को भी लाद कर उतारती है। सन्त अपनी सेवा भावना का उपयोग इसी प्रकार किया करते हैं।
  • नौकर रखना बुरा है लेकिन मालिक रखना और भी बुरा है।
  • निराशापूर्ण विचार ही आपकी अवनति के कारण है।
  • न्याय नहीं बल्कि त्याग और केवल त्याग ही मित्रता का नियम है।

ह

  • हर शाम में एक जीवन का समापन हो रहा है और हर सवेरे में नए जीवन की शुरुआत होती है।
  • हर व्यक्ति संवेदनशील होता है, पत्थर कोई नहीं होता; लेकिन सज्जन व्यक्ति पर बाहरी प्रभाव पानी की लकीर की भाँति होता है।
  • हर व्यक्ति जाने या अनजाने में अपनी परिस्थितियों का निर्माण आप करता है।
  • हर दिन वर्ष का सर्वोत्तम दिन है।
  • हर चीज़ बदलती है, नष्ट कोई चीज़ नहीं होती।
  • हर मनुष्य का भाग्य उसकी मुट्ठी में है।
  • हर वक्त, हर स्थिति में मुस्कराते रहिये, निर्भय रहिये, कत्र्तव्य करते रहिये और प्रसन्न रहिये।
  • हमारा शरीर ईश्वर के मन्दिर के समान है, इसलिये इसे स्वस्थ रखना भी एक तरह की इश्वर – आराधना है।
  • हीन से हीन प्राणी में भी एकाध गुण होते हैं। उसी के आधार पर वह जीवन जी रहा है।
  • हमें अपने अभाव एवं स्वभाव दोनों को ही ठीक करना चाहिए; क्योंकि ये दोनों ही उन्नति के रास्ते में बाधक होते हैं।
  • हमारे शरीर को नियमितता भाती है, लेकिन मन सदैव परिवर्तन चाहता है।
  • हमारे वचन चाहे कितने भी श्रेष्ठ क्यों न हों, परन्तु दुनिया हमें हमारे कर्मों के द्वारा पहचानती है।
  • हमारे सुख-दुःख का कारण दूसरे व्यक्ति या परिस्थितियाँ नहीं अपितु हमारे अच्छे या बूरे विचार होते हैं।
  • हमारा जीना व दुनिया से जाना ही गौरवपूर्ण होने चाहिए।
  • हँसती-हँसाती ज़िन्दगी ही सार्थक है।
  • हम क्या करते हैं, इसका महत्त्व कम है; किन्तु उसे हम किस भाव से करते हैं इसका बहुत महत्त्व है।
  • हम अपनी कमियों को पहचानें और इन्हें हटाने और उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियाँ स्थापित करने का उपाय सोचें इसी में अपना व मानव मात्र का कल्याण है।
  • हम कोई ऐसा काम न करें, जिसमें अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कारे। – वाङ्गमय
  • हम आमोद-प्रमोद मनाते चलें और आस-पास का समाज आँसुओं से भीगता रहे, ऐसी हमारी हँसी-खुशी को धिक्कार है।
  • हम मात्र प्रवचन से नहीं अपितु आचरण से परिवर्तन करने की संस्कृति में विश्वास रखते हैं।
  • हम किसी बड़ी खुशी के इन्तिजार में छोटी-छोटी खुशियों को नजरअन्दाज कर देते हैं किन्तु वास्तविकता यह है कि छोटी-छोटी खुशियाँ ही मिलकर एक बड़ी खुशी बनती है। इसलिए छोटी-छोटी खुशियों का आनन्द लीजिए, बाद में जब आप उन्हें याद करेंगे तो वही आपको बड़ी खुशियाँ लगेंगी।
  • हमारी कितने रातें सिसकते बीती हैं – कितनी बार हम फूट-फूट कर रोये हैं इसे कोई कहाँ जानता है? लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं, कोई लेखक, विद्वान, वक्ता, नेता, समझा हैं। कोई उसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढ़ाँचे में बैठी बिलखती दिखाई पड़ती है।
  • हम स्वयं ऐसे बनें, जैसा दूसरों को बनाना चाहते हैं। हमारे क्रियाकलाप अंदर और बाहर से उसी स्तर के बनें जैसा हम दूसरों द्वारा क्रियान्वित किये जाने की अपेक्षा करते हैं।
  • हे मनुष्य! यश के पीछे मत भाग, कत्र्तव्य के पीछे भाग। लोग क्या कहते हैं यह न सुनकर विवेक के पीछे भाग। दुनिया चाहे कुछ भी कहे, सत्य का सहारा मत छोड़।
  • हाथी कभी भी अपने दाँत को ढोते हुए नहीं थकता।

ध

  • धर्म का मार्ग फूलों सेज नहीं, इसमें बड़े-बड़े कष्ट सहन करने पड़ते हैं।
  • धर्म अंत:करण को प्रभावित और प्रशासित करता है, उसमें उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को कार्यान्वित करने की उमंग उत्पन्न करता है। – वाङ्गमय
  • धर्म की रक्षा और अधर्म का उन्मूलन करना ही अवतार और उसके अनुयायियों का कत्र्तव्य है। इसमें चाहे निजी हानि कितनी ही होती हो, कठिनाई कितनी ही उइानी पड़ती हो।
  • धर्म को आडम्बरयुक्त मत बनाओ, वरन्‌ उसे अपने जीवन में धुला डालो। धर्मानुकूल ही सोचो और करो। शास्त्र की उक्ति है कि रक्षा किया हुआ धर्म अपनी रक्षा करता है और धर्म को जो मारता है, धर्म उसे मार डालता है, इस तथ्य को।
  • धर्मवान्‌ बनने का विशुद्ध अर्थ बुद्धिमान, दूरदर्शी, विवेकशील एवं सुरुचि सम्पन्न बनना ही है।
  • धीरे बोल, जल्दी सोचों और छोटे-से विवाद पर पुरानी दोस्ती कुर्बान मत करो।
  • धन अच्छा सेवक भी है और बुरा मालिक भी।
  • ध्यान-उपासना के द्वारा जब तुम ईश्वरीय शक्तियों के संवाहक बन जाते हो, तब तुम्हें निमित्त बनाकर भागवत शक्ति कार्य कर रही होती है।
  • धन अपना पराया नहीं देखता।
  • धनवाद नहीं, चरित्रवान सुख पाते हैं।
  • धैर्य, अनुद्वेग, साहस, प्रसन्नता, दृढ़ता और समता की संतुलित स्थिति सदेव बनाये रखें।
  • धरती पर स्वर्ग अवतरित करने का प्रारम्भ सफाई और स्वच्छता से करें।
  • ध्यान में रखकर ही अपने जीवन का नीति निर्धारण किया जाना चाहिए।
  • धन्य है वे जिन्होंने करने के लिए अपना काम प्राप्त कर लिया है और वे उसमें लीन है। अब उन्हें किसी और वरदान की याचना नहीं करना चाहिए।

भ

  • भगवान से निराश कभी मत होना, संसार से आशा कभी मत करना; क्योंकि संसार स्वार्थी है। इसका नमूना तुम्हारा खुद शरीर है।
  • भगवान‌ की दण्ड संहिता में असामाजिक प्रवृत्ति भी अपराध है।
  • भगवान‌ को घट-घट वासी और न्यायकारी मानकर पापों से हर घड़ी बचते रहना ही सच्ची भक्ति है।
  • भगवान को अनुशासन एवं सुव्यवस्थितपना बहुत पसंद है। अतः उन्हें ऐसे लोग ही पसंद आते हैं, जो सुव्यवस्था व अनुशासन को अपनाते हैं।
  • भगवान प्रेम के भूखे हैं, पूजा के नहीं।
  • भगवान सदा हमें हमारी क्षमता, पात्रता व श्रम से अधिक ही प्रदान करते हैं।
  • भगवान जिसे सच्चे मन से प्यार करते हैं, उसे अग्नि परीक्षाओं में होकर गुजारते हैं।
  • भगवान के काम में लग जाने वाले कभी घाटे में नहीं रह सकते।
  • भगवान की सच्ची पूजा सत्कर्मों में ही हो सकती है।
  • भगवान आदर्शों, श्रेष्ठताओं के समूच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति मनुष्य के जो त्याग और बलिदान है, वस्तुत: यही भगवान की भक्ति है।
  • भगवान भावना की उत्कृष्टता को ही प्यार करता है और सर्वोत्तम सद्‌भावना का एकमात्र प्रमाण जनकल्याण के कार्यों में बढ़-चढ़कर योगदान करना है।
  • भगवान का अवतार तो होता है, परन्तु वह निराकार होता है। उनकी वास्तविक शक्ति जाग्रत्‌ आत्मा होती है, जो भगवान का संदेश प्राप्त करके अपना रोल अदा करती है।
  • भाग्य को मनुष्य स्वयं बनाता है, ईश्वर नहीं।
  • भाग्य साहसी का साथ देता है।
  • भाग्य पर नहीं, चरित्र पर निर्भर रहो।
  • भाग्य भरोसे बैठे रहने वाले आलसी सदा दीन-हीन ही रहेंगे।
  • भाग्यशाली होते हैं वे, जो अपने जीवन के संघर्ष के बीच एक मात्र सहारा परमात्मा को मानते हुए आगे बढ़ते जाते हैं।
  • भले बनकर तुम दूसरों की भलाई का कारण भी बन जाते हो।
  • भले ही आपका जन्म सामान्य हो, आपकी मृत्यु इतिहास बन सकती है।
  • भीड़ में खोया हुआ इंसान खोज लिया जाता है, परन्तु विचारों की भीड़ के बीहड़ में भटकते हुए इंसान का पूरा जीवन अंधकारमय हो जाता है।
  • भलमनसाहत का व्यवहार करने वाला एक चमकता हुआ हीरा है।
  • भूत लौटने वाला नहीं, भविष्य का कोई निश्चय नहीं; सँभालने और बनाने योग्य तो वर्तमान है।
  • भूत इतिहास होता है, भविष्य रहस्य होता है और वर्तमान ईश्वर का वरदान होता है।

ल

  • लोगों को चाहिए कि इस जगत में मनुष्यता धारण कर उत्तम शिक्षा, अच्छा स्वभाव, धर्म, योग्याभ्यास और विज्ञान का सम्यक ग्रहण करके सुख का प्रयत्न करें, यही जीवन की सफलता है।
  • लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।
  • लोग क्या कहते हैं – इस पर ध्यान मत दो। सिर्फ़ यह देखो कि जो करने योग्य था, वह बनपड़ा या नहीं?
  • लोकसेवी नया प्रजनन बंद कर सकें, जितना हो चुका उसी के निर्वाह की बात सोचें तो उतने भर से उन समस्याओं का आधा समाधान हो सकता है जो पर्वत की तरह भारी और विशालकाय दीखती है।
  • लोभ आपदा की खाई है संतोष आनन्द का कोष।
  • लज्जा से रहित व्यक्ति ही स्वार्थ के साधक होते हैं।
  • लकीर के फ़कीर बनने से अच्‍छा है कि आत्‍महत्‍या कर ली जाये, लीक लीक गाड़ी चले, लीक ही चलें कपूत । लीक छोड़ तीनों चलें शायर, सिंह, सपूत ।।

र

  • रोग का सूत्रपान मानव मन में होता है।
  • राष्ट्र निर्माण जागरूक बुद्धिजीवियों से ही संभव है।
  • राष्ट्रोत्कर्ष हेतु संत समाज का योगदान अपेक्षित है।
  • राष्ट्र को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के लिए आदर्शवाद, नैतिकता, मानवता, परमार्थ, देश भक्ति एवं समाज निष्ठा की भावना की जागृति नितान्त आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय स्तर की व्यापक समस्याएँ नैतिक दृष्टि धूमिल होने और निकृष्टता की मात्रा बढ़ जाने के कारण ही उत्पन्न होती है।
  • राष्ट्र के नव निर्माण में अनेकों घटकों का योगदान होता है। प्रगति एवं उत्कर्ष के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयास चलते और उसके अनुरूप सफलता-असफलताएँ भी मिलती हैं।
  • राष्ट्रों, राज्यों और जातियों के जीवन में आदिकाल से उल्लेखनीय धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्रान्तियाँ हुई हैं। उन परिस्थितियों में श्रेय भले ही एक व्यक्ति या वर्ग को मार्गदर्शन को मिला हो, सच्ची बात यह रही है कि बुद्धिजीवियों, विचारवान्‌ व्यक्तियों ने उन क्रान्तियों को पैदा किया, जन-जन तक फैलाया और सफल बनाया।
  • राष्ट्र का विकास, बिना आत्म बलिदान के नहीं हो सकता।
  • राग-द्वेष की भावना अगर प्रेम, सदाचार और कर्त्तव्य को महत्त्व दें तो, मन की सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है।
  • राष्ट्र को बुराइयों से बचाये रखने का उत्तरदायित्व पुरोहितों का है।
  • राजा यदि लोभी है तो दरिद्र से दरिद्र है और दरिद्र यदि दिल का उदार है तो राजा से भी सुखी है।

श्र

  • श्रम और तितिक्षा से शरीर मज़बूत बनता है।
  • श्रेष्ठता रहना देवत्व के समीप रहना है।
  • श्रद्धा की प्रेरणा है – श्रेष्ठता के प्रति घनिष्ठता, तन्मयता एवं समर्पण की प्रवृतित। परमेश्वर के प्रति इसी भाव संवेदना को विकसित करने का नमा है-भक्ति।
  • श्रेष्ठ मार्ग पर क़दम बढ़ाने के लिए ईश्वर विश्वास एक सुयोग्य साथी की तरह सहायक सिद्ध होता है।

त

  • तुम सेवा करने के लिए आये हो, हुकूमत करने के लिए नहीं। जान लो कष्ट सहने और परिश्रम करने के लिए तुम बुलाये गये हो, आलसी और वार्तालाप में समय नष्ट करने के लिए नहीं।
  • तीनों लोकों में प्रत्येक व्यक्ति सुख के लिये दौड़ता फिरता है, दुखों के लिये बिल्कुल नहीं, किन्तु दुःख के दो स्रोत हैं-एक है देह के प्रति मैं का भाव और दूसरा संसार की वस्तुओं के प्रति मेरेपन का भाव।
  • तुम्हारा प्रत्येक छल सत्य के उस स्वच्छ प्रकाश में एक बाधा है जिसे तुम्हारे द्वारा उसी प्रकार प्रकाशित होना चाहिए जैसे साफ़ शीशे के द्वारा सूर्य का प्रकाश प्रकाशित होता है।
  • तर्क से विज्ञान में वृद्धि होती है, कुतर्क से अज्ञान बढ़ता है और वितर्क से अध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है।

फ

  • फूलों की तरह हँसते-मुस्कराते जीवन व्यतीत करो।
  • फल की सुरक्षा के लिये छिलका जितना जरूरी है, धर्म को जीवित रखने के लिये सम्प्रदाय भी उतना ही काम का है।
  • फल के लिए प्रयत्न करो, परन्तु दुविधा में खड़े न रह जाओ। कोई भी कार्य ऐसा नहीं जिसे खोज और प्रयत्न से पूर्ण न कर सको।

Source:- http://bharatdiscovery.org/

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

 

—–

मन काे कैसे नियंत्रण में करें।

मन के विचारों काे कैसे नियंत्रित करें॥

विचारों के प्रकार-एक खुशी जीवन के लिए।

अपनी सोच काे हमेशा सकारात्मक कैसे रखें॥

“मन के बहुत सारे सवालाें का जवाब-आैर मन काे कैसे नियंत्रित कर उसे सहीं तरिके से संचालित कर शांतिमय जीवन जियें”

अगर जीवन में सफल हाेना हैं. ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर

१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए॥

-Kmsraj51

“तू ना हो निराश कभी मन से”

 

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KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT08

कृष्ण मोहन सिंह 51 या (kmsraj51) ~ सकारात्मक विचारों का समूह …..

:- गहराई से सोचना प्रत्येक शब्द 

मेरे(kmsraj51) कुछ व्यक्तिगत सकारात्मक विचारों का समूह …..

अपनी सोच को हमेशा सकारात्मक रखना …..

हमेशा मन को शांत रखना …..

दिमाग को हमेशा अनुसंधान में लगाये रखना …..

हमेशा (सदैव) अन्य लोगों से अपनी सोच को अलग रखना …..

हमेशा अपनी मन की कमजोरी को दूर रखना …..

हमेशा आंतरिक आत्मा की (आत्मा के अंदर की आवाज) आवाज सुनो …..

हमेशा ईस सूत्र का उपयोग करें …..

….. कोशिश + कोशिश + कोशिश + कोशिश + कोशिश = सफलता

आपके जीवन में हमेशा खुशी मिलेगी …..

आपका कृष्ण मोहन सिंह 51 या (kmsraj51) ….. मैं एक शुद्ध आत्मा हूँ!! …..

** ओम शांति!! ~ ओम साईराम!! ~ ओम शांति!! ~ ओम साईराम!! ~ओम शांति!! ~ ओम साईराम!!

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

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आपका सबका प्रिय दोस्त,

Krishna Mohan Singh(KMS)
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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

APT-KMSRAJ51-CYMT

“अगर जीवन में सफल हाेना हैं, ताे कभी भी काेई भी कार्य करें ताे पुरें मन से करे।

जीवन में सफलता आपकाे देर से ही सही लेकिन सफलता आपकाे जरुर मिलेगी॥”

 ~KMSRAJ51

“अगर जीवन में सफल हाेना हैं. ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर,

१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए॥”

 ~KMSRAJ51

 

 

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एक सफल जीवन के लिए-आत्मा का दैनिक भोजन (ब्रह्माकुमारी-हिन्दी मुरली)

kmsraj51 की कलम से…..

Coming Soon book,,

जल्द ही आ रहा, पुस्तक,

“तू न हो निराश कभी मन से” book

~Change your mind thoughts~

 

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मेरे प्रिय पाठकों / मित्रों,

मैं शुरू कर रहा हूँ, एक मन परिवर्तक दैनिक आधार स्तम्भ !!

एक सफल जीवन  के लिए मंत्र – मुक्त मन तनाव के लिए मंत्र !!

 आत्मा का दैनिक भोजन (ब्रह्माकुमारी-हिन्दी मुरली)-


 

मुरली सार:- “मीठे बच्चे – याद में रहकर भोजन बनाओ तो खाने वाले का हृदय शुद्ध हो जायेगा, तुम ब्राह्मणों का भोजन बहुत ही शुद्ध होना चाहिए”

प्रश्न:- सतयुग में तुम्हारे दर पर कभी भी काल नहीं आता है – क्यों?
उत्तर:- क्योंकि संगम पर तुम बच्चों ने बाप द्वारा जीते जी मरना सीखा है। जो अभी जीते जी मरते हैं उनके दर पर कभी काल नहीं आ सकता है। तुम यहाँ आये हो मरना सीखने। सतयुग है अमर-लोक, वहाँ काल किसी को खाता नहीं। रावण राज्य है मृत्युलोक, इसलिए यहाँ सभी की अकाले मृत्यु होती रहती है।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बन्धन मुक्त बनने वा अपनी उन्नति करने के लिए बुद्धि ज्ञान से सदा भरपूर रखनी है। मास्टर ज्ञान सागर बन, स्वदर्शन चक्रधारी होकर याद में बैठना है।
2) नींद को जीतने वाला बन याद और सेवा का बल जमा करना है। कमाई में कभी सुस्ती नहीं करनी है। झुटका नहीं खाना है।

वरदान:- इस अलौकिक जीवन में संबंध की शक्ति से अविनाशी स्नेह और सहयोग प्राप्त करने वाली श्रेष्ठ आत्मा भव
इस अलौ¬किक जीवन में संबंध की शक्ति आप बच्चों को डबल रूप में प्राप्त है। एक बाप द्वारा सर्व संबंध, दूसरा दैवी परिवार द्वारा संबंध। इस संबंध से सदा नि:स्वार्थ स्नेह, अविनाशी स्नेह और सहयोग सदा प्राप्त होता रहता है। तो आपके पास संबंध की भी शक्ति है। ऐसी श्रेष्ठ अलौकिक जीवन वाली शक्ति सम्पन्न वरदानी आत्मायें हो इसलिए अर्जी करने वाले नहीं, सदा राज़ी रहने वाले बनो।

स्लोगन:- कोई भी प्लैन विदेही, साक्षी बन सोचो और सेकण्ड में प्लेन स्थिति बनाते चलो।

आध्यात्मिक सेवा में,
ब्रह्माकुमारी

brahmakumaris-kmsraj51

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Picture Quotes By- “तू न हो निराश कभी मन से” किताब से

Book-Red-kmsraj51

100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 Soulword_kmsraj51 - Change Y M T

कुछ भी आप के लिए संभव है ॥

जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥

~kmsraj51

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मैं अपने सभी प्रिय पाठकों का आभारी हूं…..  I am grateful to all my dear readers …..

“तू न हो निराश कभी मन से” book

~Change your mind thoughts~

 

 

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प्रेम एक पंछी है !!

kmsraj51 की कलम से…..

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प्रेम एक पंछी है !!

“प्रेम एक पंछी है, उसे आज़ाद रखो ! उस पर एकाधिकार करने की कोशिश मत करो ! 

एकाधिकार करोगे तो वह मरजाएगा ! 

एक सम्पूर्ण व्यक्ति वह है जो बिना शर्त प्रेम कर सकता है !

 जब प्रेम बिना किसी बंधन के, बिना किसी शर्त के 

प्रवाहित होता है तो और कुछ उपलब्द्ध करने 

के लिए रह ही नहीं जाता, व्यक्ति को उसकी मंजिल मिल जाती है !”

t1larg.romantic.love.drug

 

 

 

 

जब हम किसी से कहते हैं : आई लव यू, तो दरअसल हम किसी बारें में बात कर रहे होते हैं ? 

इन शब्दों के साथहमारी कौनसी मांगें और उमीदें, कौन कौन सी अपेक्षाएं और सपने जुड़े हुए हैं ! 

तुम्हारे जीवन में सच्चे प्रेम कीरचना कैसे हो सकती है ?

 

तुम जिसे प्रेम कहते हो, वह दरअसल प्रेम नही है ! जिसे तुम प्रेम कहते हो, वह और कुछ भी हो सकता है, 

पर वह प्रेमतो नहीं ही है ! हो सकता है कि वह सेक्स हो ! हो सकता है कि वह लालच हो ! 

हो सकता है कि अकेलापन हो !

वहनिर्भरता भी हो सकता है ! खुद को दूसरों का मालिक समझने की प्रवृति भी हो सकती है ! 

वह और कुछ भी हो सकता है,पर वह प्रेम नहीं है ! 

प्रेम दूसरों का स्वामी बनने की प्रवृति नही रखता ! प्रेम का किसी अन्य से लेना देना होता ही नहीं है! 

वह तो तुम्हारे प्रेम की एक स्थिति है ! प्रेम कोई सम्बन्ध नहीं है ! 

हो सकता है कि कोई सम्बन्ध बन जाए, पर प्रेमअपने आप में कोई सम्बन्ध नहीं होता ! 

सम्बन्ध हो सकता है, पर प्रेम उसमें सीमित नहीं होता ! वह तो उससे कहींअधिक है !

 

प्रेम अस्तित्व की एक स्थिति है ! जब वह सम्बन्ध होता है तो प्रेम नहीं हो सकता, 

क्योंकि सम्बन्ध तो दो से मिलकरबनता है !

 और जब दो अहम होंगे, तो लगातार टकराव होना लाजमी होगा ! 

इसलिए जिसे तुम प्रेम कहते हो, वह तोसतत संघर्ष का नाम है !

 

प्रेम शायद ही कभी प्रवाहित होता हो ! 

तकरीबन हर समय अहंकार के घोड़े की सवारी ही चलती रहती है ! 

तुम दूसरे कोअपने हिसाब से चलने की कोशिश करते हो और दूसरा तुम्हें अपने हिसाब से ! 

तुम दूसरे पर कब्ज़ा करना चाहते होऔर दूसरा तुम अधिकार करना चाहता है ! 

यह तो राजनीती है, प्रेम नहीं ! 

यह ताकत का एक खेल है ! यही कारण है कीप्रेम से इतना दु:ख उपजता है ! 

अगर वह प्रेम होता तो दुनिया स्वर्ग बन चुकी होती, जो कि वह नहीं है ! 

जो व्यक्ति प्रेमको जनता है, वह आनंदमग्न रहता है, बिना किसी शर्त के ! 

उसके बजूद के साथ जो होता रहे, उससे उसे कोई अंतर नहींपड़ता ! 

मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा प्रेम फैले, बढे ताकि प्रेम की ऊर्जा तुम पर छा जाये ! 

जब ऐसा होगा तो प्रेम निर्देशित नहीं होगा! तब वह साँस लेने की तरह होगा! 

तुम जहाँ भी जाओगे, तुम साँस लोगे ! तुम जहाँ भी जाओगे, प्रेम करोगे ! 

प्रेमकरना तुम्हारे जीवन की एक सहज स्थिति बन जायेगा !

 किसी व्यक्ति से प्रेम करना तो केवल एक सम्बन्ध बनाना भरहै ! 

यह तो ऐसा हुआ की जब तुम किसी खास व्यक्ति के साथ होते हो तो साँस लेते हो 

और जब उसे छोड़ते हो तो साँसलेना बंद कर देते हो ! 

सवाल यह है की जिस व्यक्ति के लिए तुम जीवित हो, उसके बिना साँस कैसे ले सकते हो ! 

प्रेम के साथ भी यही हुआ है ! हर कोई आग्रह कर रहा है, मुझे प्रेम करो, 

पर साथ ही शक भी कर रहा है कि शायद तुमदूसरे लोगों को भी प्रेम कर रहे होंगे ! 

इसी ईर्ष्या और संदेह ने प्रेम को मार डाला है ! पत्नी चाहती है कि पति केवल उससेप्रेम करे ! 

उसका आग्रह होता है कि केवल मुझसे प्रेम करो ! जब तुम दुनिया में बाहर जाओगे, 

दुसरे लोगों से मिलोगे तोक्या करोगे ? 

तुम्हें लगातार चौकन्ना रहना होगा कि कि कहीं किसी के प्रति प्रेम न जता दो ! 

 प्रेम करना तुम्हारेअस्तित्व कि एक स्थिति है ! प्रेम साँस लेने के सामान है ! 

सांसें जो तुम्हारे शरीर के लिए करती है, 

प्रेम वही तुम्हारीआत्मा के लिए करता है !

 प्रेम के माध्यम से तुम्हारी आत्मा साँस लेती है इसलिए ईर्ष्यालु मत बनो !

यही बजह है कि सारी दुनिया में हर कोई कहता है कि आई लव यू, 

पर कहीं पर कोई प्रेम नहीं दिखाई पड़ता ! 

उसकीआँखों में न कोई चमक होती है न चेहरे पर वैवभ ! 

न ही तुम्हें उसके ह्रदय की धडकनें तेज होते हुए सुनाई देंगी !

 किसीभी कीमत पर अपने प्रेम को न मरने दो, 

वरना तुम अपनी आत्मा को मार डालोगे और न ही

 किसी दूसरे को यहनुकसान पहुँचने दो ! 

प्रेम आज़ादी देता है ! और प्रेम जितनी आज़ादी देता है, 

उतना ही प्रेममय होता जाता है !

 

प्रेम एक पंछी है, उसे आज़ाद रखो ! 

उस पर एकाधिकार करने की कोशिश मत करो ! 

एकाधिकार करोगे तो वह मरजाएगा ! 

एक सम्पूर्ण व्यक्ति वह है जो बिना शर्त प्रेम कर सकता है ! 

जब प्रेम बिना किसी बंधन के, बिना किसी शर्त केप्रवाहित होता है तो 

और कुछ उपलब्द्ध करने के लिए रह ही नहीं जाता, व्यक्ति को उसकी मंजिल मिल जाती है !

अगर प्रेम प्रवाहित नहीं हो रहा है तो तुम महान संत क्यों न जाओ, रहोगे दुखी ही !

 अगर प्रेम प्रवाहित नहीं हो रहा है तोभले ही तुम महान विद्वान, 

धर्मशास्त्री या दार्शनिक ही क्यों न बन जाओ, तुम न बदल पाओगे ! न ही रूपांतरित होपाओगे ! 

केवल प्रेम ही रूपांतरण कर सकता है, 

क्योंकि केवल प्रेम के माध्यम से ही अंहकार समाप्त होता है !
ध्यान का अर्थ है, प्रेम के संसार में प्रवेश ! सबसे बड़ा साहस है, 

बिना शर्तों के प्रेम करना, केवल प्रेम के लिए प्रेम करना,इसी को तो ध्यान कहते हैं ! 

और प्रेम तुम्हें फ़ौरन बदलना शुरू कर देगा ! 

वह अपने साथ एक नया मौसम लायेगा और तुम खिलना शुरू हो जाओगे !

 

लेकिन एक बात याद रखो, व्यक्ति को प्रेममय होना होगा !

 तुम्हें इसके लिए चिंतित होने की जरुरत नहीं है कि दूसराबदले में प्रेम करता है कि नहीं ! 

प्रेम कि माँग कभी मत करो, प्रेम अपने आप आएगा !

 वह जब आता है तो सौ गुना मात्रमें आता है ! 

तुम प्रेम दोगे तो वह जरुर आएगा ! हम जो भी देते हैं वो वापस मिलता है ! 

याद रहे जो भी तुम्हें मिल रहाहै, वह तुम्हें किसी न किसी रूप में मिल जरुर रहा है ! 

लोग सोचते हैं कि कोई उन्हें प्रेम नहीं करता इससे साफ हो जाताहै कि उन्होंने प्रेम किया ही नहीं !

 वे हर समय दूसरों को कसूरवार समझते हैं, पर उन्होंने जो फसल बोई ही नही, 

वोभला उसे काट कैसे सकते हैं !

 

इसलिए अगर प्रेम तुम्हारे पास आया है तो समझ लो कि तुम्हें प्रेम देना आ गया है ! 

तो फिर और प्रेम दो तुम्हें भी औरमिलेगा ! इससे कभी कँजूसी ना बरतो ! 

प्रेम कोई ऐसी चीज नहीं है कि देने से ख़त्म हो जाये ! 

असलियत तो यह है किवह देने से और बढ़ता है ! 

और जितना अधिक देते हैं, उतना ही ज्यादा बढ़ता है ! !

 

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0 दिमाग तेज बनाने के लिए रोजाना सुबह सैर करें। हरी घास पर चलने से दिमाग के साथ-साथ ब्लड प्रेशर भी ठीक बना रहता है।

0 दांत मजबूत बनाने के लिए नीम की दातून का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे दांत में कीड़ा नहीं लगता और आपके दांत मजबूत भी बनते हैं।

0 सर्दियों में अपनी डाइट में ड्राई फ्रूट्स को भी शामिल करें। ये पौष्टिक तो हैं ही, त्वचा के लिए भी लाभदायक हैं।

0 फ्रिज की ठंडी चीजें सीधे खाने से बचें। इसे हल्का सा गर्म करके खायेंगे, तो पाचन तंत्र ठीक रहेगा।

0 गर्दन में दर्द न हो, इसके लिए सोने का सही तरीका अपनाएं। तकिए का इस्तेमाल कम करें। फिर भी दर्द है तो एक्सरसाइज या योग करें। तब भी आराम न मिले तो डाक्टर से सलाह लें।

Ayurvedic-Tips-in-Hindi-kmsraj51

0 गर्म मसाला चूर्ण को नींबू के रस में भिगो दें। भोजन के बाद इसे आधा चम्मच लें। यह पाचन के लिए बेहतरीन दवाई का काम करता है।

0 ज्यादा लिपिस्टिक लगाने से कभी-कभी होठों का रंग काला पड़ने लगता है। हो सके तो इसे लगाने से परहेज करें। लगानी भी पड़े तो, बाद में उसे साफ करके होंठों पर नींबू का रस लगायें। इससे आपके होंठ काले नहीं पडेंगे।

0 अगर आपको पिंपल की समस्या है, तो साबून का प्रयोग न करें। साबुन आपके चेहरे से आयल को सोख लेता है जिससे आपकी समस्या कम होने की जगह बढ़ सकती है। चेहरे पर नीम का फेस पैक लगाएं।

0 अगर आपकी आंखों के नीचे काले घेरे या झुर्रियां पड़ गयी हैं, तो दूध की मलाई से उस जगह की रोजाना मालिश करें।

0 त्वचा को मुलायम बनाने के लिए शहद में नींबू का रस मिलाकर पांच मिनट मालिश करें।

0 तनाव न हो, इसके लिए सकारात्मक सोच अपनाएं। अधिक तनाव से केवल आपके दिमाग पर असर पड़ता है बल्कि ब्यूटी पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। जैसे बालों का गिरना, आंखों के नीचे काले घेरे होना और चेहरे की चमक घीरे-धीरे गायब होने लगेगी।

0 बाल सफेद न हों, इसके लिए विटामिन-ई युक्त तेल का प्रयोग करें। इससे आपके बाल असमय सफेद नहीं होंगे साथ ही गिरना बन्द हो जायेंगे। खाने में भी इस तेल का इस्तेमाल फायदेमंद होता है।

 

Post inspired by-Poojya Acharya Bal Krishan Ji Maharaj

Bal Krishna Ji-2 Bal Krishna Ji

I am grateful to “पूज्य आचार्य बाल कृष्ण जी महाराज”

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100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

 

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जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥

~kmsraj51

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Performing A Spiritual Audit At The End Of The Day !!

 

KMSRAJ51की कलम से…..

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Brahma Kumaris – Soul Sustenance and Message for the day

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Soul Sustenance 24-04-2014
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Performing A Spiritual Audit At The End Of The Day – Part 2 

Yesterday we had explained how self evaluation at the end of the day is extremely vital to one’s progress and development. A useful exercise in this regard is keeping a daily chart for about 3 personality traits or pointsand filling it up every night (lesser than 3 is also fine, but not more , because then you might feel lazy in keeping the chart after a few days and also you might lose focus and the personality traits may not transform as much as you want). You could either evaluate yourself with a yes or no or perform a percentage wise evaluation like 50% or 90% for e.g. We have mentioned below, some of the common traits from which you could select the traits to keep a daily chart for. You could incorporate some other specific traits (not mentioned in this list), which you want to change or develop, depending on your personality: 

In the entire day, today; not only in my words and actions, but also in my thoughts: 
* Did I see everyone’s specialties and keep good wishes for each one, in spite of obvious weaknesses being visible? 
* Did I remain free from all forms of anger, like irritation, frustration, grudge, revenge, etc.? 
* Did I ensure that I neither give nor take sorrow, hurt, pain from anyone? 
* Did I remain free from waste and negative? 
* Did I remain ego less? 
* Did I remain untouched by name, fame, praise, insult? 
* Did I remain stable? 
* Did I remain free from judgments, criticism, jealousy, comparison, hatred, etc.? 
* Did I keep a conscious of serving each one whom I met? 
* Did I bring the 8 main powers into practice and experience being powerful? 
* Did I remain in self-respect and give respect to everyone? 
* Did I practice being soul-conscious in actions and interactions? 
* Did I take a one minute break every hour to reflect, meditate and control the traffic of thoughts in the mind?

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Message for the day 24-04-2014
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Humility is to respect everything that comes our way. 

Expression: To love simple things is humility. It teaches to respect all that life brings. That means there is an ability to appreciate and value everything appropriately. So one is able to use everything that comes one way to the fullest extent for the benefit of the self and that of others. 

Experience: When I am humble I am able to remain focused on my inner peace and not lose my sense of personal well-being. I am able to simply learn from everything that happens to my life and add on to this sense of well-being. No situation is difficult or impossible to work on, but I am able to overcome all challenges with ease. 


In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

brahmakumaris-kmsraj51

 

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Soul Sustenance 23-04-2014
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Performing A Spiritual Audit At The End Of The Day – Part 1 

Our normal day at the office or/and at home is filled with lots of actions and interactions. On a normal day, without realizing consciously, we create almost 30,000-40,000 thoughts. So, not only are we active physically but extremely active on a subtle or non-physical level also. Imagine sleeping with all this burden of thoughts, words and actions which have been created throughout the day, many of which have been waste and negative in nature. What would be the resulting quality of my sleep? So it is extremely important to perform a spiritual/emotional audit or evaluation at the end of each day. 

In a lot of professional sectors of life today, people recognize the need for reflection and audit, not only of financial records but also a general evaluation of the respective sector, to maintain and improve both the service to customers and the job satisfaction of people working in the sector. Checking my own behavior, as a daily exercise; not just checking, but also bringing about respective changes for the next day, enables me to continue to develop and grow, as a human being and in the quality of my work and personal and professional relationships. Have gone through the self-evaluation, it is also advised to become completely light by submitting the mistakes made and heaviness accumulated in the day to the Supreme Being. Doing this helps me put a full-stop to the same and settle all my spiritual accounts at the end of the day. I need to put an end to all commas (when looking at scenes that caused me to slow down and reduced the speed of my progress), question marks (when looking at scenes which caused a why, what, how, when, etc…. in my consciousness) and exclamation marks (when looking at negative or waste scenes, which were unexpected and surprising) which were created in the day’s activities. Along with remembering what all good happened during the day, what did I achieve and what good actions did I perform, there is lots to forget at the end of the day, which should not be carried into my sleep at any cost. Disturbed, thought-filled, unsound sleep, will result in a not so fresh body and mind the next morning, which will cause my mood to be disturbed, adversely affecting the following day. 


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Message for the day 23-04-2014
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To be clean at heart is to give happiness to others. 

Expression: The one who has a clean heart is the one who always tries to do the best for those with whom he comes in contact. Thus, the person develops the ability to accept others as they are and ignore anything wrong done by them. Instead, he is able to do the right action without losing the balance. So such a person brings happiness for himself and for others through every action he performs. 

Experience: When I have a clean heart I am able to have an experience of my inner qualities. I am able to enjoy the beauty of the different relationships, each relationship and each person being unique. Thus others are able to get in touch with their inner beauty too. So there is happiness experienced by all. 


In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

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Picture Quotes By- “तू न हो निराश कभी मन से” किताब से

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100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए – (100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

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सफलता के लिए ज़रूरी है Focus !!

kmsraj51 की कलम से …..
SUCCESSSuccess Key

यह पोस्ट गोपाल मिश्रा द्वारा प्रस्तुत है…..

सफलता के लिए ज़रूरी है Focus !

ऐसा क्यों होता है कि कई बार सब कुछ होते हुए भी हम वो नहीं कर पाते जिसको करने के बारे में हमने सोचा होता है ….दृढ निश्चय किया होता ……खुद को promise किया होता है कि हमें ये काम करना ही करना है …चाहे जो हो जाए ….!!!

“सब कुछ होते हुए” से मेरा मतलब है आपके पास पर्याप्त talent, पैसा , समय , या ऐसी कोई भी चीज जो उस काम को करने के लिए ज़रूरी है ; होने से है .

2009-10 में मैंने अपने दोस्तों के साथ मिल कर Bodhitree Consulting Group (BCG) की शुरुआत की थी , इसके अंतर्गत हमने कुछ Personality Development ओर Quizzing से related programs भी किये , जो काफी पसंद किये गए ,….पर within 6-7 months BCG को बंद करना पड़ा .

आज जब मैं इस बारे में सोचता हूँ कि आखिर BCG क्यों unsuccessful रहा …तो मुझे ऐसी कोई वजह नहीं दिखती जो इस ओर इशारा करे की हमारे team में Talent, Time , या पैसे की कमी थी ….हमारे अन्दर जोश भी काफी था ….पर फिर भी हम इस venture को successful नहीं बना पाए .

तो आखिर वजह क्या थी ?


Focus-to-Succeeed-150x150Focus On Your Goal


वजह थी FOCUS.

चूँकि BCG शुरू करने का initiative मेरा ही था इसलिए मुझे इसपर पूरी तरह से अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए था …..पर मैं उस वक़्त अपनी Tata Aig की जॉब में इतना अधिक involve था कि मैं BCG पर focus नहीं कर पाया …और सबकुछ होते हुए भी हम इसे सफल नहीं बना पाए .

यह एक शाश्वत सत्य है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हम जिस चीज पर ध्यान केन्द्रित करते हैं उस चीज में आश्चर्यजनक रूप से विस्तार होता है . इसलिए सफल होने के लिए हमें अपने चुने हुए लक्ष्य पर पूरी तरह से focussed होना होगा ; और तभी हम उसे हकीकत बनते देख पायेंगे .

Focus करने का क्या अर्थ है ?

एक idea लो . उस idea को अपनी life बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो , उस idea को जियो . अपने दिमाग , muscles, nerves, शरीर के हर हिस्से को उस आईडिया में डूब जाने दो , और बाकी सभी ideas को किनारे रख दो . यही सफल होने का तरीका है , यही वो तरीका है जिससे महान लोग निर्मित होते हैं .

Friends, उपरोक्त कथन Swami Vivekananda के हैं और मुझे लगता है कि Focus शब्द को शायद ही इससे अच्छे ढंग से समझा जा सकता है .

इस कथन में जहाँ स्वामी जी ने किसी एक आईडिया को अपनाना आवश्यक बताया है वहीँ दूसरी तरफ इस दौरान अन्य ideas को किनारे रखने के लिए भी कहा है. और सही मायने में यही है Focussed होना.

Focus करता क्या है ?

आपने बचपन में lens ज़रूर use किया होगा ….lens देखने में तो एक साधारण कांच का टुकड़ा लगता है …पर जब हम उसे कागज़ के किसी एक हिस्से पर focus करते हैं तो थोड़ी देर में वो कागज़ जलने लगता है …..

Focus चीजों को संभव बनाता है ….जब आप भी अपने goal पर focused रहते हैं तो मार्ग में आने वाली बाधाएं जल कर ख़ाक हो जाती हैं , आपका रास्ता साफ़ हो जाता है , और आप अपना goal achieve कर पाते हैं . Focus आपको सिर्फ यह नहीं बताता कि करना क्या है , यह भी बताता है कि क्या नहीं करना है .Focus आपको आपके goal से बांधता ही नहीं , आपको बेकार की चीजों में बंधने से बचाता भी है .

मैं हमेशा से सोचता था की मुझे कुछ बड़ा achieve करना है . मेरे लिए बड़े का अर्थ कभी lucrative jobs और अधिक पैसे कमाना नहीं रहा है, हालांकि मैं भी financially abundant होना चाहता हूँ … पर मेरे लिए जो काम बड़ा है वो है अधिक से अधिक लोगों का जीवन बेहतर बनाना . और कुछ हद्द तक मैं ऐसा अपनी NGO Kartavya के through कर पाया …पर वो मेरे लिए satisfactory नहीं था . इसीलिए जब मैंने AchhiKhabar.Com(AKC) की शुरआत की तभी मैंने ठान लिया था की अब मैं अपना पूरा focus इसी एक चीज पर रखूँगा , और तब तक रखूँगा जब तक मैं इसमें सफल नहीं हो जाता , इस दौरान मैं किसी और चीज पर ध्यान नहीं दूंगा …यहाँ तक की अपनी NGO की तरफ भी , और ना ही अपनी जॉब में exceptional होने की कोशिश करूँगा , अब मेरा एक ही लक्ष्य होगा AKC को अपनी पहली major Success Story बनाना . और आज इसे Worl’d Most Read Hindi Blog* बना कर मैं कुछ हद्द तक सफल भी हुआ हूँ , पर अभी भी मैं इसे major success नहीं कह सकता , इसमें कुछ और समय लगेगा. 🙂

क्या Focused रहना आसान है ?

नहीं , पिछले डेढ़ साल में AKC पर अपना focus बनाये रखने के लिए मैंने बहुत सी चीजों को ना कहा है ; including better job opportunities, foreign travel breaks, other promising income generating ideas, etc. Friends, अगर आपको कुछ World Class करना है तो आपको पूरी तरह से उस काम में डूबना होगा और तब तक लगे रहना होगा जब तक की आप अपने efforts को physical reality में तब्दील होते हुए ना देख लें .बीच में बहुत सारे distractions आयेंगे ; पर उस वक़्त आपको अपना focus नहीं loose करना है ….और ऐसा तभी संभव होगा जब आप अपने काम या idea में पूरी तरह से believe करते हैं . इस मुश्किल समय में जब mind में self doubt आने लगता है तब आपका belief system ही आपको distract होने से बचा सकता है . इसलिए काम शुरू करने से पहले ही आप उस पर अच्छी तरह से सोच विचार कर लीजिये , in fact आप अपने friends को आपको उस idea या plan को लेकर challenge करने के लिए भी कह सकते हैं . और अगर कोई भी तर्क -वितर्क आपकी आईडिया को लेकर आपके अन्दर doubt डालता है तो आप उस पर पुनः विचार कर सकते हैं . कुछ शुरू करने से पहले आपका अपने काम के successful होने पर believe करना बहुत ज़रूरी है आगे यही आपके FOCUS को उस पर बनाये रखने में मदद करेगा .

तो क्या focus करने का ये मतलब है कि हम और कोई काम करे ही नहीं ?

नहीं , आप और काम करते हुए भी अपना focus किसी एक चीज पर बनाये रख सकते हैं . For example: Mahendra Singh Dhoni Railways में TTE की job करते थे पर फिर भी उनका focus cricket था . आप रोज TV पर कितने ही singers और dancers को देखते हैं , वो भी और लोगों की तरह पढने जाते हैं या job करते हैं पर उनका focus तो singing या dancing होता है . इसी तरह मैंने आपके साथ World’s Youngest CEO , Suhas Gopinath की story share की थी , पढाई करते वक़्त भी उनका focus अपनी company establish करने का था ; और इसी एकाग्रता के दम पर उन्होंने छोटी सी उम्र में multi million dollar company खड़ी कर दी.

देखिये , जब तक आपके मन का काम आपको financially support नहीं करने लगता तब तक कुछ ना कुछ तो करते रहना होगा ….पर ध्यान देने की बात ये है कि आपको और चीजों को सिर्फ करना है …पर आपने अपने लिए जो Goal decide किया है उसे achieve करने के लिए आपको उसमे डूबना है , और यही आपकी success और failure के बीच का सबसे बड़ा differentiator होगा.

इतना याद रखिये कि अपने जीवन में एक normal focussed व्यक्ति एक talented unfocussed व्यक्ति से कहीं ज्यादा achieve कर सकता है . और सच पूछिए तो अगर हमने इस अनमोल जीवन को छोटी – मोटी चीजें करने में ही बिता दिया तो हमारे life की कोई value नहीं रहेगी …..हमारी अपनी नज़रों में भी ….इसलिए बड़े लक्ष्य बनाइये और उस पर focussed होकर उसे achieve करिए ….तभी जीने का असली मजा है .

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Post inspired by AKC. I am grateful to Mr. Gopal Mishra & AKC (http://www.achhikhabar.com/) Thanks a lot !!



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