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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी साहित्य

9th Anniversary of KMSRAJ51.COM

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ 9th Anniversary of KMSRAJ51.COM ♦

KMSRAJ51.COM की 9वीं वर्षगांठ

09-03-2013 – 09-03-2022

आज इस महायज्ञ (वेबसाइट) को 9 वर्ष पूर्ण हुए। इन 9 वर्षों में बहुत उतार चढ़ाव देखे हमने। यह महायज्ञ (वेबसाइट) हमने 09 मार्च 2013 को पूर्ण निश्वार्थ भाव से शुरू किया था जो अनवरत चल रहा है। इस महायज्ञ (वेबसाइट) का कार्य मेरे लिए सदैव ही प्रथम स्थान पर रहा है, चाहे कोई भी मौसम हो, या कोई भी परिस्थिति हमने इस कार्य को कभी भी रोका नहीं, इन 9 वर्षों में हमारे जीवन में भी बहुत ज्यादा उतार चढ़ाव आया। इन 9 वर्षों में हमने बहुत कुछ सीखा।

09 मार्च 2013 को इस महायज्ञ (वेबसाइट) की शुरुआत की थी, जिससे सम्पूर्ण विश्व में जन जन तक भारतीय साहित्य, संस्कृति, संस्कार व सभ्यता की जानकारी पहुंचे। वर्तमान और आने वाली पीढ़ी के दिलों दिमाग तक अपने महान भारतीय साहित्य, संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को पहुंचाने के लिए। आज यह महायज्ञ (वेबसाइट) वट वृक्ष की तरह महान भारतीय साहित्य, संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को सम्पूर्ण विश्व में जन जन तक पहुंचा रहा है। सम्पूर्ण विश्व में सभी उम्र के पाठकों द्वारा प्रेम से पढ़ा जा रहा है, इस महायज्ञ (वेबसाइट) से सभी लाभान्वित हो रहे हैं।

  • इस वेबसाइट पर आप सभी को पढ़ने को मिलेगा आधुनिक व प्राचीन भारतीय हिंदी साहित्य और ज्ञान, ध्यान, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेदिक चिकित्सा, सकारात्मक विचार, कैरियर मार्गदर्शन इत्यादि से संबंधित लेख, आर्टिकल, कविताएँ, निबंध व विचार, कोट्स मिलेंगे।
  • एक शांत दिमाग बेहतर साेच सकता है, एक थके हुए दिमाग की तुलना में।
  • मेरा स्लोगन ही है – “तू ना हो निराश कभी मन से” – मेरा लक्ष्य है सभी मनुष्यों को मानसिक रूप से पूर्ण Strong बनाना।
  • हर इंसान के अंदर असीमित शक्तियां निहित है, बस जरूरत है इन शक्तियों को सही तरीके से Use करना। मैं अपनी शक्तियों को Right Way में Use कर रहा हूँ, मुझे लिखना बहुत अच्छा लगता है मैं इस काम से कभी बोर नहीं होता।
  • आज के समय में लोगों की मदद करने के लिए – Internet किसी के लिए कितना उपयोगी हो सकता है इस बात को समझना कठिन नहीं है, पर दुःख की बात है कि हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी में Internet पर ना के बराबर Content उपलब्ध हैं। मैं इसी कमी को अपने स्तर से कम करने में प्रयासरत हूँ।

यह महायज्ञ (वेबसाइट) बहुत सारे पवित्र व महान आत्माओं के सहयोग से निरंतर आगे बढ़ रहा है। हमारे सहयोगी (पवित्र और महान आत्माएं) लेखक / लेखिका व कवि / कवयित्री निम्नवत है •……

  • विमल गांधी जी।
  • नंदिता शर्मा जी।
  • डॉ विदुषी शर्मा जी।
  • सुखमंगल सिंह जी।
  • अशोक सिंह जी।
  • शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी।
  • हेमराज ठाकुर जी।
  • वेदस्मृति ‘कृती’ जी।
  • कृष्ण कुमार सैनी जी।
  • रवि रंजन पाण्डेय जी।
  • ‘अजीब’ आदित्य कुमार जी।
  • आलम आजाद जी।
  • सारांश सागर जी।
  • डॉ कौशल किशोर श्रीवास्तव जी।
  • डॉ मुकेश कुमार जी।
  • डॉ रूपेश जैन जी।
  • सुशीला देवी जी।
  • विजयलक्ष्मी जी।
  • विवेक कुमार जी।
  • कविता पाल जी।
  • प्रो. मीरा भारती जी।
  • सतीश शेखर श्रीवास्तव – परिमल जी।
  • अमित प्रेमशंकर जी।
  • पूनम गुप्ता जी।
  • दौलत राम गर्ग जी।

20+ हमारे और भी सहयोगी (पवित्र और महान आत्माएं) लेखक / लेखिका व कवि / कवयित्री हैं। सभी के सहयोग से यह महायज्ञ (वेबसाइट) अनवरत चल रहा है, और चलता रहेगा। हमारा मानना है की मेरा जन्म ही हुआ है मानव जाति के कल्याण के लिए। अपने अंतिम स्वास तक इतना करके जाना है की आने वाली पीढ़ियां अनंत काल तक हमारे द्वारा किये गए कार्यों से लाभान्वित होती रहे। कहने को तो बहुत कुछ है मन में, समय के अभाव के कारण अभी नहीं लिख रहा हूँ, लेकिन आने वाले समय में सम्पूर्ण विस्तार से लिखकर बताऊंगा।

अरे तेरे “मैं मैं – तू तू भ्रामक विचार, तेरा मन ! तू !! तेरी काया !!
क्या शाश्वती का स्वप्न देख रहे हैं ? “प्यारे” गुमराह न हो !
उठो होष में आवो और अपने को पहिचानों ! अमरत्व तेरे पॉव तले की धूल है !!–KMSRAJ51

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आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा। ♦

नाथ परम्परा का नाम सुनते ही हमारे मनो मस्तिष्क में भभूतधारी अवधूत हठ योगियों की कर्णभेदी और कुंडलधारी, जटाजुट युक्त मृगछालधारी तथा गले में रुद्राक्ष मालाधारी व कांख में खप्परधारी छवि का दर्शन हो जाता है। सिंगी, त्रिशूल और आधारी को सदैव अपने साथ धारण करने वाला वह वैरागी समुदाय हमारे अंतःकरण में चलचित्र की भांति प्रकट होता है, जो सांसारिक भय, वितराग, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, वासनाओं और विपरीत लिंगी आकर्षण इत्यादि से सदैव मुक्त रहा तथा समाज को इसी दिशा की और चलने की शिक्षा – दीक्षा देता रहा।

इतिहास के गहन में जाकर जब खंगालने की कोशिश करेंगे तो हमें पता चलता है कि यह समुदाय हिंदी साहित्य के क्षेत्र में तब कूदा था जब सिद्ध परंपरा के साहित्य के उपभोग एवं विलासिता की पराकाष्ठा समाज में विद्यमान हो चुकी थी। ठीक -ठीक तो बताया नहीं जा सकता परंतु अंदाजन यह कहना गलत नहीं होगा कि लगभग नौवीं शताब्दी के बीच में इस परंपरा ने हिंदी साहित्य में अपने पंथ की विचारधारा को कलमबद्ध करके सामाजिक कुरीतियों का खंडन करना शुरू किया था।

अब इसके पीछे चाहे सिद्ध परंपरा के साहित्य का विरोध आधार बना हो या फिर तत्कालीन परिपेक्ष्य में अरब देशों से होने वाले विभिन्न आक्रमणकारियों एवं आतताइयों की आक्रमण शैली से समाज को बचाने के लिए उनका प्रतिकार करना रहा हो। सर्वधर्म समभाव की परिकल्पना भी उनकी एक विशुद्ध भावना इस काल में रही है।

आतताइयों के संक्रमण का खंडन करने वाली पृष्ठभूमि का एक उदाहरण गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य की एक रचना के अंश से स्पष्ट देखा जा सकता है, जिसमे धर्मगत विभक्तता से ऊपर उठकर यौगिक विशिष्टता बताई गई है:—

हिंदू मुसलमान खुदाई के बंदे, हम जोगी न कोई किस्से के छन्दे।

यह कतई नहीं नकारा जा सकता कि नाथ परंपरा ने हिंदी साहित्य में जो अपना योगदान हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक दौर में प्रदान किया है, वह हिंदी साहित्य का आधार बन गया। यदि हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को पढ़े तो पता चलता है कि हमारा हिंदी साहित्य का इतिहास विभिन्न काल खंडों में विभाजित किया गया है। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल को आदिकाल के नाम से नामित किया गया है। उस आदिकाल के साहित्य को भी तीन वर्गों में बांटा गया है:—

  1. धार्मिक साहित्य।
  2. लौकिक साहित्य।
  3. इतर साहित्य।

इनमें से यदि नाथ परंपरा के साहित्य की बात की जाए तो यह साहित्य निश्चित ही धार्मिक साहित्य के अंतर्गत आता है। जिस कालखंड में नाथ परंपरा का साहित्य हिंदी साहित्य जगत में प्रकट हुआ, वह कालखंड निश्चित संक्रांति के दौर से गुजर रहा था। वहां जहां एक ओर से समाज सिद्ध परंपरा की भोग विलास पूर्ण साहित्य पद्धति का शिकार बनता जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर विदेशी आक्रांताओं की आतंकपूर्ण जीवनशैली और भाषा वैविध्य के चक्रव्यू में भी निरंतर उलझता जा रहा था। इन सभी प्रकार के प्रपंचो से समाज को बाहर लाने के लिए नाथ परंपरा के साहित्यकारों ने अपनी साहित्यिक चमक को हिंदी साहित्य में प्रविष्ट करके भारतीय जनमानस को एक नई दिशा और गति दी।

अश्लीलता और मानसिक भ्रष्टाचार से बाहर ला कर समाज को आंतरिक शुद्धि एवं पवित्रता की ओर अग्रसर किया। आत्म संयम तथा मानसिक संतोष के सद चरित्र वाले जीवन को जीने के लिए जो मार्ग नाथ परम्परा के साहित्य ने भारतीय समाज को प्रशस्त किये, वे आगे चलकर कबीरपंथी विचारधारा में भी अपना वर्चस्व बनाए रखते हुए नजर आते हैं। यह बात जरूर है कि नारी जीवन से दूर रहने की प्रवृत्ति के कारण तथा उनके साधना तथा ज्ञान मार्ग की नीरसता एवं शुष्कता के कारण कालांतर में यह परंपरा धीरे – धीरे समाज के मानस पटल पर अपना दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ने में असमर्थ रही। अपने शिष्यों की कड़ी परीक्षा लेने के कारण भी इस परंपरा में आगे शिष्यों का निरंतर जुडना बाधित हो गया। परंतु इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस परंपरा के नाथों और साहित्य ने तत्कालीन भारतीय जनमानस के अंतःकरण को आंदोलित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

◊ नाथ परम्परा ◊

इससे पहले कि हम इस परंपरा के साहित्य की प्रवृत्तियों के बारे में बात करें; हमें नाथ परम्परा के बारे में संक्षिप्त रूप से जान लेना चाहिए। एक किंवदंती के अनुसार इस परंपरा के आरंभ की घटना उस पौराणिक आख्यान से जोड़ी जाती है जो भगवान शिव तथा माता पार्वती के अमर कथा संवाद के दौरान घटी थी। माना जाता है कि एक बार चलते – चलते भगवान शिव और माता पार्वती को किसी वन प्रदेश में रात हो गई। वे दोनों उस रात्रि को एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिए रुक गए।

इसी विश्राम के दौरान माता पार्वती ने भगवान शिव से अमर कथा सुनाने का आग्रह किया। माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने माता पार्वती को इस शर्त पर अमर कथा सुनाने की सहमति दी कि जब तक आप इस अमर कथा को सुनते – सुनते हुंकारा भरती रहेगी, तब तक मैं इस कथा को निर्बाध गति से सुनाता रहूंगा।जब हुंकारा बंद हो जाएगा तब मैं इस कथा को सुनाना बंद कर दूंगा। माता पार्वती ने भगवान शिव के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और भगवान शिव समाधि में विलीन होकर अमर कथा को मां पार्वती को सुनाने लगे। इस बीच माता को अर्ध रात्रि के समीप नींद आ गई।

माता के बदले यह हुँकारा उस पेड की कोटर में एक शुक (तोते) के फटे हुए अण्डे के कुछ हिस्से में बचे हुए तरल पदार्थ से अमर कथा के प्रभाव से उत्पन्न शुक के बच्चे ने भरना शुरू किया। माना जाता है कि उस जीर्ण क्षीर्ण और परित्यक्त अण्डे के एक टुकड़े में जो भी तरल पदार्थ फटने के बाद शेष रह गया था, उसी से शुक के बच्चे का अमर कथा के प्रभाव से जन्म हुआ और उसी बच्चे ने मानवानुकर्ण करके माता के सोने के बाद अमर कथा का आनंद लेने हेतु हुंकारा भरना शुरू किया। जब प्रातः काल भगवान शिव ने अपने नेत्र खोले, तो पाया कि माता पार्वती तो सोई हुई है।

ऐसे में उन्होंने देखा कि उनके द्वारा सुनाई गई अमर कथा को तो एक शुक का बच्चा सुन गया। भगवान शिव ने विचार किया कि यह शुक पुत्र तो अमर हो जाएगा। तब उन्होंने त्रिशूल लेकर उस शुक पुत्र का पीछा किया। आगे-आगे शुक पुत्र और पीछे-पीछे भगवान शिव। आगे किसी झरने में महर्षि वेद व्यास जी की धर्म पत्नी प्रातः काल सनान कर रही थी। उसने कूला करने के नियमित मुंह खोला था कि वह शुक पुत्र शरण लेने हेतु उनके मुंह में घुसकर ऋषि पत्नी के गर्भ में छिप गया।

भगवान शिव को पीछा करते हुए जब महर्षि वेद व्यास जी ने देखा और पीछा करने का कारण पूछा तो मुस्करा दिए। जब भगवान शिव ने क्रोधित स्वर में व्यास जी से मुस्कराने का कारण पूछा तो व्यास जी ने मुस्कराते हुए ही जबाव दिया कि हे प्रभु ! इसीलिए तो आपको भोलेनाथ कहा जाता है। हे प्रभु! जिस जीव ने साक्षात स्वयं आपके श्री मुख से अमर कथा का श्रवण किया हो, उसे भला कौन मृत्यु दे सकता है।इसलिए हे प्रभु! गुस्सा त्याग दो और लौट जाओ। यह जो शुक पुत्र का पीछा आप इसके प्राण हरण के नियमित कर रहे हैं, यह व्यर्थ है।

यह सुनकर भगवान शिव प्रसन्न होकर लौट जाते हैं। वह शुक का बच्चा 12 वर्ष तक बाह्य माया के डर से ऋषि पत्नी के गर्भ में पड़ा रहा। 12 वर्ष बाद वेद व्यास जी ने उससे बाहर आने की प्रार्थना की, हे पुत्र ! यह संसार के नियम के विरुद्ध है। अब आप अपनी मां के गर्भ से बाहर निकलो। आपकी मां को अतिशय कष्ट हो रहा है। तो तब उस गर्भस्थ शुक पुत्र ने अंदर से आवाज दी कि हे पिताश्री मैं एक ही शर्त पर बाहर आऊंगा यदि आप अपने सिद्धि बल से जगतपति प्रभु से यह प्रार्थना करें कि जिस क्षण तक मैं संसार में प्रविष्ट होने की प्रक्रिया से गुजरूं, उस क्षण तक अपनी योग माया को वे संसार में प्रभावहीन कर दें।

◊ 84 सिद्ध 9 नाथ ◊

माना जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने प्रभु से प्रार्थना की और प्रभु ने अपनी योग माया का प्रभाव क्षण भर के लिए संसार में रोक लिया। ठीक इसी क्षण शुकदेव के साथ-साथ 93 अन्य जीवात्माओं ने भी जन्म लिया। इस प्रकार उस माया हीन प्रभाव के क्षण में इस संसार में 94 जीवात्माएं पैदा हुई। उनमें 84 सिद्ध 9 नाथ और एक स्वयं शुकदेव जी महाराज उत्पन्न हुए। ये नौ नाथ निम्नलिखित माने जाते हैं:—

  1. आदिनाथ (स्वयं सदा शिव)।
  2. मच्छेंद्र नाथ या मत्स्येंद्र नाथ (गोरखनाथ के गुरु)।
  3. गुरु गोरखनाथ (नाथ साहित्य परंपरा के प्रवर्तक)।
  4. गहिणीनाथ।
  5. चर्पटनाथ।
  6. चौरंगीनाथ।
  7. जालंधर नाथ।
  8. भरथरी नाथ या भर्तृनाथ।
  9. गोपीचंद नाथ।

◊ नाथ संप्रदाय का आविर्भाव ◊

इस घटनाक्रम से भी नाथ पंथ या नाथ संप्रदाय को जोड़ा जाता है, जिसमें तर्क यह भी दिया जाता है कि भगवान सदा शिव उसी मायाहीन घड़ी में संसार में अपने पंथ का प्रादुर्भाव करने की इच्छा से लीला रूप में आए थे। इसके विपरीत यदि हिंदी साहित्य के इतिहास को खंगाले तो नाथ संप्रदाय का उद्भव हिंदी साहित्य में गुरु गोरखनाथ जी से उद्भूत हुआ मिलता है। गुरु गोरखनाथ जी के विषय में अगर इतिहास में देखें तो कुछ लोग उन्हें आठवीं सदी का मानते हैं तो कुछ 10वीं /11वीं या तेरहवीं सदी का मानते हैं। हालांकि गुरु गोरखनाथ जी का साहित्य लगभग 16वीं शताब्दी में सामने आता है। यह भी माना जाता है कि नाथपंथियों ने लगभग 40 ग्रंथों की रचना की। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने तो नौवीं शताब्दी के मध्य में नाथ पंथ का प्रादुर्भाव माना है। डॉ पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ का काल 10 वीं शताब्दी में निर्धारित किया है। यदि डॉ श्रीनिवास शर्मा की माने तो उक्त दोनों विद्वानों की टिप्पणियों के आधार पर उन्होंने नाथ संप्रदाय का आविर्भाव नौवीं शताब्दी के मध्य भाग में माना है।

यदि उक्त टिप्पणियों के साथ – साथ समग्र हिंदी साहित्य के इतिहास का गहन अन्वेषण किया जाए तो कहना न होगा कि नाथ साहित्य परंपरा का प्रभाव लगभग 9वीं सदी से 14वीं सदी तक हिंदी साहित्य में बना रहा। नाथ परंपरा ने इस कालखंड में भारतीय जनमानस पर साहित्य और धर्म का शासन किया।

यदि राहुल सांकृत्यायन जी की बात को माना जाए तो निश्चित रूप से नाथ परंपरा सिद्ध परंपरा की वज्रयान शाखा की सहज मार्गी परंपरा से विकसित हुई एक परम्परा है। इधर एक मत यह भी है कि नाथ संप्रदाय पर बौद्ध धर्म के महायान की तंत्र परंपरा का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलता है।

इस परम्परा के प्रादुर्भाव को स्पष्ट करते हुए सोशल मीडिया के कुछ आलेखों में पढ़ने को मिलता है की नाथ संप्रदाय का प्रादुर्भाव ना + थ से हुआ है। ‘ना’ का अर्थ ‘अनादि रूप है ‘ अर्थात सदाशिव तथा ‘थ’ का अर्थ वह अनादि धर्म है, जो भूवनत्रय की स्थिति का कारण है। नाथ – वह तत्व है जो मोक्ष प्रदान करता है।

इस परम्परा में नाथ एक उपाधि मानी जाती थी। जब कोई शिष्य गुरु परम्परा में कड़ी परीक्षा के बाद सफल सिद्ध होता था तो उसे यह नाथ की उपाधि प्रदान की जाती थी और वह शिष्य अपने नाम के पीछे नाथ शब्द का उपाधि सूचक शब्द लगाकर समाज में विशिष्ट व्यक्तित्व प्राप्त कर लेता था। ये अपने गुरु को ही भगवान मानते थे।

◊ नाथ परम्परा का हिंदी साहित्य को योगदान ◊

इस परम्परा का आदि गुरु भगवान शिव स्वयं काे माना जाता है। अर्थात आदिनाथ के रूप में भगवान शिव को ही इस परम्परा में स्थान प्राप्त है।
नाथ परम्परा का हिंदी साहित्य को योगदान :—…

हिंदी साहित्य को आदिकाल से आधुनिक काल तक एक दृष्टि से जब देखा जाए तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिंदी साहित्य के क्षेत्र में जो शिष्टता, आंतरिक शुद्धि, इंद्रिय निग्रह, वैचारिक पवित्रता,अष्टांग साधना, कुंडलीनी जागरण तथा उसके साथ – साथ प्राण शोधन तथा हठयोग इत्यादि मानसिक संयमों का प्राकाट्य यदि सर्वप्रथम किसने किया था, तो वह इस नाथ परम्परा ने ही किया था।उसके पीछे पृष्ठभूमि भले ही कुछ भी रही हो। या फिर कारण कोई भी रहा हो। परंतु व्यक्तिक सद-चरित्रता का संदेश प्रथम बार हिंदी साहित्य में यदि किसी परंपरा ने दिया है तो वह निश्चित तौर से नाथ साहित्य परंपरा से प्राप्त होता है। इस साहित्य परंपरा की प्रमुख प्रवृतियां निम्नलिखित रही है:—

1. उलटवासियों का प्रयोग: नाथ संप्रदाय के नाथों एवं कवियों ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी अंतरतम गहन साधना के रहस्य को भाषा के माध्यम से जिन छंदों और प्रतीकों के माध्यम से प्रकट किया है, उन्हें उल्टवासियों के नाम से जाना जाता है। यह रहस्य ऐसी शब्दावली के प्रयोग से प्रकट किया गया होता है कि आम जनमानस की समझ से कई बार परे हो जाता है ।उदाहरण के रूप में गुरु गोरखनाथ जी के गुरु मत्स्येंद्र नाथ की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है : –

जल कुंच है माछली, खण कुंचा है मोर।
सेवक चाहे राम कूं, ज्यौं ध्यंतवत चंद चकोर॥

इसी प्रकार से गुरु गोरखनाथ जी के काव्य संग्रह – “गोरख वाणी“ का एक उदाहरण है:-

यह मन सकती यहु मन सीव।
यहु मन पांच तत का जीव॥

इन उलटवासियों का प्रभाव आगे चलकर संत साहित्य में भी विशेषकर कबीर पंथ में साफ – साफ दिखाई देता है। इसकी पुष्टि करता हुआ एक उदाहरण देखें : –

नाथ बोले अमृत वाणी, बरिषै कंवली भीजेगा पांणी।
कउवा की डाली पीपल बासै, मूसा के सबद बिलइया नासै॥

नाथों का साहित्य अधिकतर साधनापरक है, इसलिए उसमें अधिकतर काव्य तत्वों की सरसता का पर्याप्त अभाव है।

2. हठयोग एवं अष्टांग मार्ग का प्रतिपादन : नाथ परंपरा में हठयोग का विशेष महत्व रहा है, जिसका प्रभाव नाथ साहित्य में भी साफ- साफ नजर आता है। हठयोग से अभिप्राय नाथ परंपरा में – ‘ह’ से सूर्य और ‘ठ’ से चंद्र से है। अर्थात सूर्य और चंद्र स्वर की संयुक्त साधना जो शिव स्वर तन्त्र में त्रिनाड़ी तंत्र के अंतर्गत आती है; उस योग को हठयोग का नाम दिया गया है। कुछ लोग अपवाद स्वरूप इस को जबरदस्ती किया जाने वाला योग मार्ग भी कह देते हैं।जबकि यह नितांत गलत है। ध्यान से अगर हम नाथ साहित्य को पढ़ें तो स्वत: ही स्पष्ट हो जाता है कि महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में जो साधना पद्धति बताई गई है, नाथ पथियों का हठयोग भी उसी से मेल खाता है। उदाहरण के लिए नाथ साहित्य के कुछ अंश इस प्रकार है : –

 १ . आसण बैसिवा पवन निरोधिवा वान मान सब धंधा।
बदंत गोरखनाथ आतमा विचारत ज्यूँ लज लज दीसै चंदा॥

२ . ईडा मारग चन्द्र मणीजै प्यगुला मारग मानं।
सुषमनां मारग वांणी बोलिए त्रिय मूल अस्थानं॥

३ . भोगिया सूते अजहुं न जागे भोग नहींज रे रोग अभागे।

अतः कहा जा सकता है कि नाड़ी शोधन में इडा, पिंगला, सुषुम्ना नाडियों का प्रयोग, षडचक्र में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनहद, विशुद्ध और आज्ञा चक्र के साथ-साथ सहस्रार कमल या शुन्य समाधि स्थल का वर्णन भी नाथ साहित्य में मिलता है।कुंडली जागरण के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना और शुन्य समाधि स्थल में पहुंचकर अपनी साधना के चरम को प्राप्त करना नाथ पंथियो का मोक्ष कहलाता है।

3. गुरु की महिमा : इस परंपरा में गुरु को साक्षात भगवान का दर्जा दिया जाता है। इतना ही नहीं इस परंपरा के सभी साधकों का मानना यह था की मुक्ति और निवृत्ति गुरु कृपा से ही संभव है। उदाहरण के लिए नाथ साहित्य का एक अंश देखा जा सकता है : –

गुरु कीजै गहिला, निगुरा न रहिला।
गुरु बिन ग्यांन न पाइलर रे भाइला॥

गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति असंभव है। इस बात की पुष्टि करती हुई ये पंक्तियां अपने आप उस युग के साक्ष्य को देती है कि नाथ पंथ गुरु के प्रति कितना समर्पित था।

4. परंपरागत रूढ़ियों एवं बाह्य आडम्बरों का विरोध : यह बात ऊपर ही पुष्ट कर दी गई है कि जिस काल में नाथ संप्रदाय का साहित्य समाज के सामने उद्घाटित हुआ। वह संक्रांति काल था। उस समय मुस्लिमों के आगमन के कारण तथा सिद्ध पंथियो के विलासितापूर्ण साहित्यिक भावबोध से समाज नवीन नाथ परंपरा के साहित्य की ओर अग्रसर हो रहा था। समाज उस वक्त नाना प्रकार की कर्मकांडी प्रक्रियाओं से गुजर रहा था। वे सभी स्थितियां एवं क्रियाएं अधिकतर बाह्या अडम्बरों से परिपूर्ण थी। ऐसी परिस्थिति में इन सभी परिस्थितियों का विरोध करता हुआ एक नया संप्रदाय समाज के सामने अपने साहित्य को लेकर आता है, जो नाथ परंपरा के नाम से जाना जाता है। गुरु गोरखनाथ जी की गोरख वाणी में तो इन आडम्बरों का विरोध हुआ ही, हुआ है बल्कि उनके आगे भी इस परंपरा में बाह्य आडंबर का निरंतर विरोध होता रहा। इन्होंने सहज, सरल एवं निश्छल जीवन को जीने की शिक्षा के साथ-साथ शोषण मुक्त समाज की परिकल्पना साकार करने की शिक्षा भी तत्कालीन समाज को अपने साहित्य के माध्यम से देने की पूरी- पूरी कोशिश की।

5. चित्त शुद्धि और सदाचार में विश्वास : इस परंपरा के संपूर्ण साहित्य में हमें निरंतर आत्म शुद्धि, आंतरिक पवित्रता, मानसिक संयम एवं तप, पवित्र दृष्टि और पावन व्यवहार इत्यादि का चित्रण देखने को मिलता है। यह बात अलग है कि इन लोगों का बाह्य हुलिया आम जनमानस को देखने में भले ही ठीक नहीं लगता होगा। परंतु इनका अंतः करण और इनका जीवन व्यवहार जिस तरह से पवित्र था, उसी तरह की बातें इनके द्वारा लिखे गए साहित्य में संपूर्ण समाज को सदाचार की शिक्षा देती हुई नजर आती है। इंद्रिय निग्रह, कुंडलीनी जागरण, चित्त शुद्धि आदि-आदि बातें इनकी जीवन शैली में साक्षात नजर आती है और उन्हीं का परिणाम इनके साहित्य में भी फलीभूत हुआ है।

6. गृहस्थ जीवन के प्रति नकारात्मकता : यह बात सही है कि सिद्ध साहित्य की तरह नाथ साहित्य में नारी जीवन और गृहस्थ जीवन के प्रति आस्था नजर नहीं आती, परंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि नाथों का दृष्टिकोण नारी के प्रति और गृहस्थी के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिकूल था। हां यह सत्य है कि इस ओर नाथ पंथियों की नकारात्मक दृष्टि जरूर थी। नाथ परंपरा में यह विचारधारा जरूर पुष्ट थी कि चारित्रिक पतन का कारण नारी रहती है और इसलिए वह हमेशा नारी से दूरी बनाए रखने की सलाह अपने शिष्य परंपरा में देते रहते थे। यही वह मुख्य कारण था जिसके चलते कालांतर में यह परंपरा समाज में अपना प्रभाव धीरे – धीरे खोती गई। कुछ विद्वानों का मानना यह भी है कि यह विचारधारा गुरु गोरखनाथ जी में तब घर कर गई थी, जब उन्होंने बौद्ध बिहारों में बौद्ध भिक्षुणियों के व्यवहार को देखा होगा।

हिंदी साहित्य के आगामी कालो पर नाथ साहित्य का प्रभाव : –

हिंदी साहित्य के इतिहास को जब हम पढ़ते हैं तो नाथ साहित्य का सीधा – सीधा प्रभाव भक्ति काल में निर्गुण मार्गी शाखा में दिखाई पड़ता है। निर्गुण मार्गी शाखा में भी ज्ञानाश्रयी कबीर पंथ पर इस साहित्य परंपरा का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। उक्त की सारी प्रवृतियां तथा उलटवासियों की वही नाथपंथी शब्दावली कबीर मार्गी शाखा में साफ – साफ देखी जा सकती है। आचरण की शुद्धता की ओर अग्रसर कबीर पंथ को यदि नाथ साहित्य के साथ जोड़ कर देखा जाए तो बहुत सारी बातें इन दोनों पंथों की आपस में कहीं न कहीं मेल खाती है।

निष्कर्ष (Conclusion) : –

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि नाथ परंपरा हिंदी साहित्य के इतिहास में आदिकाल के प्रारंभिक चरण में नवी शताब्दी के आसपास विकसित हुई और निरंतर चौदहवीं सदी के आसपास तक समाज में अपना धार्मिक और साहित्यिक प्रभाव बनाए रखने में कामयाब हुई। इस पंथ की साहित्य परंपरा ने हिंदी साहित्य में जिस तरह से अपना प्रभाव छोड़ा है, वह अपने आप में अद्वितीय है। अतीत के संस्कृत साहित्य की गहन एवं गुप्त रहस्यमई घटनाओं को आम जनमानस की भाषा में उद्घाटित करने का कार्य हिंदी साहित्य में नाथपंथी परंपरा ने ही किया था। समाज के चारित्रिक उत्थान तथा मानसिक विकास का आधार यही परंपरा हिंदी साहित्य में बनी। अष्टांग योग के रहस्य को जनभाषा में प्रस्तुत करने की परिकल्पना नाथ संप्रदाय ने ही हिंदी साहित्य को प्रदान की। जिसका प्रभाव आगे चलकर कबीर पंथ में भी नजर आता है। गुरु के महत्व को और बाहरी आडंबर के खंडन को नाथ पंथियों की विचारधारा का स्वस्थ एवं पुष्ट पक्ष कहा जा सकता है। अतः कहा जा सकता है कि जब तक साहित्य की दुनिया में हिंदी साहित्य का पठन-पाठन होता रहेगा। तब तक नाथ साहित्य के महत्व को भुलाया नहीं जा सकता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस पंथ की साहित्य परंपरा ने हिंदी साहित्य में जिस तरह से अपना प्रभाव छोड़ा है, वह अपने आप में अद्वितीय है। अतीत के संस्कृत साहित्य की गहन एवं गुप्त रहस्यमई घटनाओं को आम जनमानस की भाषा में उद्घाटित करने का कार्य हिंदी साहित्य में नाथपंथी परंपरा ने ही किया था। समाज के चारित्रिक उत्थान तथा मानसिक विकास का आधार यही परंपरा हिंदी साहित्य में बनी। अष्टांग योग के रहस्य को जनभाषा में प्रस्तुत करने की परिकल्पना नाथ संप्रदाय ने ही हिंदी साहित्य को प्रदान की। आजकल की पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर भूलते जा रहे है अपनी ही प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को। “याद रखें- हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में, थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।”

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यह लेख (हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बसंत पंचमी।

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♦ बसंत पंचमी। ♦

बसन्त पंचमी भारत का प्रमुख पर्व है हर साल माघ के महीने के पांचवें दिन (पंचमी) को हिन्दू कलेण्डर के अनुसार मानते है। हिंदी भाषा मे ” बसंत” बसन्त का अर्थ है बसंत और ” पंचमी” का अर्थ है, पांचवे दिन इस दिन माँ सरस्वती की पूजा की जाती है जो सबको कला बुद्धि और विद्या का आशीर्वाद देती है। इस दिन देवी सरस्वती का जन्म दिन भी होता है।

शीत ऋतु के बाद बसंत का आगमन होता है इस मौसम में प्रकृति खिल उठती है। खेतो में सरसों के पीले-पीले फूल खिल जाते है इसलिए देवी की पूजा में पीले वस्त्र पहनकर पूजा करने का विधान है, पीले फूल देवी पर अर्पित करते है। इस दिन सभी कलाकार किसी भी वर्ग के हो सब अपने उपकरण का पूजन करते है माँ से आशीर्वाद मांगते है। इसके साथ ही कुछ प्राचीन कहानी भी जुड़ी है।

ब्रह्मा जी के विनती पर देवी सरस्वती ने वीणा बजायी सारे संसार को वाणी की प्राप्ति हुई इसी कारण देवी सरस्वती को वीणा की देवी कहा, ये सब बसन्त पंचमी वाले दिन हुआ।

रावण के द्वारा सीताजी के हरण के बाद श्री राम जी दक्षिण की ओर बढे सीताजी की खोज में चलते चलते वो दण्डकारण्य स्थान पर पहुंचे। वही शबरी भीलनी भी रहती थी, वो श्रीराम की परम भक्त थी जब रामजी उनकी कुटिया में पधारे तो वह अपनी सुधि बुधि भूल गयी और चख चख कर श्रीरामजी की मीठे बेर खिलाने लगी।

दंडकारण्य स्थान गुजरात और मध्यप्रदेश में आता है गुजरात के डॉग जिले का वह स्थान है जहाँ शबरी माँ का आश्रम था बसन्त पंचमी वाले दिन श्रीराम जी उनके आश्रम में आये थे, वो शिला आज भी पूजी जाती है जहाँ श्री रामजी विराजे थे वहीं शबरी माँ का मंदिर भी है।

बसन्त का रंग पीला होता है जो सभी को बहुत लुभावना लगता है पीले रंग से प्रकृति अपना सिंगार करती है बसन्त सबके जीवन में उत्साह और प्रेम भरता है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बसन्त पंचमी भारत का प्रमुख पर्व है। बसन्त पंचमी के महत्व, और बसन्त पंचमी के दिन क्या क्या हुआ था इस बारे में विस्तार से बताया है। ज्ञान और बुद्धि के बिना ये जीवन किसी काम का नहीं। ज्ञान, बुद्धि की देवी अपनी कृपा व करुणा का संचार कर हम पर, हे माँ तुम्हारी करुणा बड़ी अपरम्पार है। मां शारदे की महिमा से अछूता न कोई मनुष्य है, मां के रूपों में ही छुपा हुआ पूर्ण जग संसार है। उन्हीं के चरणों में ज्ञान का भंडार है, विद्यादायिनी मां से आज रज है हमारी। मां शारदे वर दे तू अपने ही रंग में रंग दे। जो नकारात्मक प्रवृतियों से सकारात्मकता का कराए सदैव भान, पुस्तक ही बस एक नाम। जो निरस जीवन में सरसता का, रंग भरती, वीणा ही वो सरगम। स्फटिक माला दर्शाती वैराग्य और ध्यान बिन, न मिलता संपूर्णता का है भाव। अपनाने के लिए तो बहुत है मगर, कल्याणकारी अपनाने की कला हंस है सिखलाता। कीचड़ में ही कमल है खिलता, अर्थात: सर्व विघ्न से न्यारे व पवित्र, कोमलता और सुंदरता का क्या अनुपम सार है। वीणापाणी मां के सर्वस्व संरचना में, सबक बहुत बेहिसाब है। आओ हम सब मिलकर सच्चे मन से माँ की वंदना करे।

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यह लेख (बसंत पंचमी।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मानसिक तनाव का शिकार।

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♦ मानसिक तनाव का शिकार। ♦

आज का मानव।

मानसिक तनाव जिंदगी का एक हिस्सा बन चुका है आजकल हर कोई इसका शिकार हो रहा है। अनवरत चल रही भागदौड़ वाली जिंदगी में अपने ही सकून के लिए परेशान है न उन्हें खाने पीने का होश, न सोने का, बस अपनी समस्या में ही उलझा रहता है व्यक्ति अपने आप तक ही सीमित हो गया है। सुकून के न होने पर नकारात्मक सोच ही उसको हींन भावना से ग्रसित कर रहा है।

क्या सही में ये सबकी मजबूरी है कि घर में एक साथ रहते हुए वो अकेलापन महसूस करता है? क्या इसका कोई निवारण नहीं है? जो इससे बाहर निकलकर एक अच्छा जीवन व्यतीत करें?

हम सब कुछ देखते हुई इस बीमारी को जन्म दे रहे है, हमने इनको समय पर छोड़ दिया है धीरे धीरे यह महसूस होता है कि जो हमे दीमक की तरह जिंदगी में अवसाद को जन्म दे रहा है।

बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक इसका असर देखा जा सकता है। अवसाद की वजह से अनेक शारीरिक समस्या जन्म ले रही है हर घर मे परिवार का वातावरण बदल रहा है पहले सब मिलकर बड़े परिवार में रहते थे अब ऐसा नहीं है। सब अपने तक ही सीमित हो गया है अपनी दुनिया में खुश होने के नाम पर बनावटी हँसी से दूसरों को प्रभावित करने में लगे रहते है।

जबकि वास्तव में ऐसा मुश्किल होता है। इस समस्या से उभरने की लिए हम सबको ही प्रयास करने होंगे। “सब एक साथ मिलकर अपने दुख सुख बाटे और जो भी परेशानी है उसको मिलकर उसका निदान करें। फिर कोई भी व्यक्ति दुखी या मानसिक तनाव का शिकार नहीं रहेगा। वह खुश रहेगा तो उनका शरीर भी स्वस्थ रहेगा तब ही परिवार, समाज और देश की सेवा करने में सहयोग प्रदान करेगा।“

इस संसार में ऐसा कोई भी समस्या नहीं है जिसका कोई समाधान न हो, अर्थात: हर समस्या का समाधान है। इसलिए अपने मन और बुद्धि को इतना पवित्र और मज़बूत बनाओ की किसी समस्या के आने पर आपका मन व बुद्धि चिंता/मानसिक तनाव का शिकार न हो जाएं।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक बात सदैव ही याद रखें:… चिंता/मानसिक तनाव किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता। यदि जीवन में कोई समस्या हो तो केवल समस्या के बारे में न सोचकर, समस्या के समाधान के बारे में सोचना हैं। जब आपका दिमाग समस्या के समाधान के बारे में सोचने लगता है, आपको हर समस्या सुलझता हुआ नज़र आने लगता है। इस संसार में ऐसा कोई भी समस्या नहीं है जिसका कोई समाधान न हो, अर्थात: हर समस्या का समाधान है। इसलिए अपने मन और बुद्धि को इतना पवित्र और मज़बूत बनाओ की किसी समस्या के आने पर आपका मन व बुद्धि चिंता/मानसिक तनाव का शिकार न हो जाएं। जब आपका मन व बुद्धि चिंता/मानसिक तनाव से मुक्त होगा, तब आपका शरीर भी स्वस्थ रहेगा। जब आपका शरीर भी स्वस्थ रहेगा तभी आप समाज और देश की सेवा करने में सहयोग प्रदान करेंगे।

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यह लेख (मानसिक तनाव का शिकार।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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10 हजार करोड़ की परियोजनाओं का लोकार्पण।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ 10 हजार करोड़ की परियोजनाओं का लोकार्पण। ♦

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से – दिनांक 6 दिसंबर, 2021 काे आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा।

नव भारत का नया उत्तर प्रदेश धीरे-धीरे हो रहा है जवान। उत्तर प्रदेश बना रहा है बड़ा नया कीर्तिमान। दुनियां में बढ़ रहा प्रदेश का नाम। उत्तर प्रदेश की जनता का बढ़ रहा सम्मान। देश में उत्तर प्रदेश सरकार का कार्य गुणगान। नए मान सम्मान के साथ आगे बढ़ रहा है यह अनोखा क्षेत्र। इंसानियत की मिसाल बनकर सामने रहा है उत्तर प्रदेश। माथे पर लगे मेघा कालिख को साफ़ कर रहा है राज्य। विकसित संसाधनों के साथ धरा को सजा रहा है योगी आदित्यनाथ जी का शासन।

ऐतिहासिक धरोहरों, धर्मशाला, कुंड, यात्रियों के लिए विश्रामालय और पेड़-पौधे लगवा रहा है उत्तर प्रदेश। गोरखपुर से मोदी जी, उत्तर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी आजमगढ़ के तहसील – सगडी आजमगढ़ से 32 परियोजनायें उत्तर देश को लोकार्पण और शिलान्यास द्वारा दी। वही तहसील – लालगंज, आजमगढ़ में 37 परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास 6 दिसंबर 2021 को किया। एक रचना प्रस्तुत —

सजने लगा है आजमगढ़,
सावन जस हो जाएगा गांव।
योगी आदित्यनाथ ने दे दी,
कुछ ऐसी ही भारी सौगात।
सोशल मीडिया सक्रिय हुआ॥

देखकर देश हो गया खुश प्रदेश।
लाइव प्रसारण हुआ बहुत ख़ूब,
बच्चा – बूढ़ा हो रहा है खुश।
200 करोड़ का तोहफा आया,
गांव शहर खुशियां भर लाया॥

उत्तर प्रदेश में तत्कालीन गोरखपुर के महंत अवैद्यनाथ जी के श्री चरणों में समर्पित होकर उनके द्वारा अपनाए गए ज्ञान और जन कल्याण की योजनाएं को आगे बढ़ाने का काम किया, गोरखपुर पीठ के महंत और उत्तर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने। उत्तर प्रदेश को महान प्रदेश बनाने का उठा लिया है बीड़ा। जिसे पूरा करने के लिए अपने कार्यकाल में हर संभव प्रयास कर रहे हैं बाबा योगी जी। इन्होंने पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक विकास की लहर घर – घर दौड़ा दिया है। सर्वांगीण विकास करना संभव है। जिसे लोग असंभव मानते थे। उत्तर प्रदेश का विकास संभव है योगी जी ने कर दिखाया। उन्होंने लोगों को बता दिया, दिखा दिया है।

बुराइयों को भष्म करने की ताकत संतो में होती,
जिसे उन्होंने दिखा कर सिखा दिया लोगों को।
बदल रहा प्रदेश यही लोगों का अपना विचार,
होने लगा है चारो तरफ से प्रदेश का विकास॥

रक्षा पर दिया जा रहा है शासन का पूरा ध्यान,
किसानों का रखा जा रहा है प्रदेश में मान।
व्यापारियों को मिल रहा है उचित सम्मान,
पूर्व विरासत का कराया जा रहा है कल्याण॥

परंपरा सत्य के साथ खड़े हो रहे हैं संदेश,
मोदी और योगी का यही है उन्नत उपदेश।

योगीराज में प्रदेश का हो रहा चहुंमुखी विकास,
गरीबों को मिल रहा है खाने के लिए अनाज।
पक्के घरों में ही जा रहे हैं सब लोग आज,
संतोष और शांति पूर्ण हो रहा है समाज॥

— योगी जी के ड्रीम प्रोजेक्ट का मोदी जी ने किया लोकार्पण —

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 हजार करोड़ की लागत से उतर प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ जी के ड्रीम प्रोजेक्ट खाद कारखाना, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान और बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर का किया लोकार्पण, दिनांक 6 दिसंबर 2021 को। सन 2016 में प्रधानमंत्री मोदी जी ने खाद कारखाने और AIIMS का शिलान्यास किया था। जिसे जनता को समर्पित किया।

— खाद कारखाने से लाभ —

यह कारखाना विगत 30 वर्षों से बंद पड़ा था। 30 वर्षों तक किसी भी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जिस पर योगी आदित्यनाथ जी की सरकार ने विशेष ध्यान दिया। उसका शिलान्यास 2016 में पुनः प्रधानमंत्री के हाथ से किया था। यद्यपि गोरखपुर की जनता लगातार उस कारखाने को चालू करने की मांग पूर्ववर्ती सरकारों से करती रही परंतु सर्व कल्याणकारी गोरक्षनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ जी ने अपने कार्यकाल में उसे पूर्ण करने का संकल्प लिया और प्रयास किया। जिसकी सफलता प्राप्त होती दिखाई दी। सौभाग्य से उत्तर प्रदेश के माननीय जनता की बहु प्रतीक्षित मांग पूरी हुई। लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई।

रोजगार का अवसर प्राप्त होगा। जिन राज्यों को लाभ होगा वह पड़ोसी राज्य बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, हरियाणा और मध्य प्रदेश के किसानों को, लगभग 20,000 लोगों को इससे रोजगार मिलेगा। इस खाद कारखाने से प्रतिदिन 3850 मीट्रिक टन नीम कोटेड यूरिया की निर्वाह उपलब्धता होगी। जिसका लाभ उत्तर प्रदेश सहित पूरेे देश को मिल सकेगा। यूरिया खाद के लिए उत्तर प्रदेश की जनता बहुत ज्यादा हलकाना होती रही। इसके बाद लोग जगह जगह से इसकी खेती किसानी में प्रयोग करने के लिए दर-दर की ठोकरें खाते रहते थे किसान। बहुत कमी थी। अवने – पवने दामों पर स्टॉकिईस्ट द्वारा इण्डिया में यूरिया खाद उपलब्ध कराया जाता रहा। अलग-अलग जिलों से लोग यूरिया को क़िसी तरह प्राप्त करते, लेकर अपने गांव आते थे। किसान समितियां भी पूर्ण रुप से किसानों को यूरिया खाद उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं थी। बहुत कुछ समितियां तो घोटाले बाजी में भी लगी रहती थीं। किसान समितियों में शेयर लगाता परंतु उसे उसका उचित सम्मान नहीं मिल पाता था।

सचिव की जी हुजूरी करनी पड़ती थी। किसान सचिव के घर तक जाने के लिए उनके अनुयायियों के घर तक अपनी पहुंच बढ़ाने वाले होते तभी उनको कुछ अंश रूप खाद मिल पाता था। परंतु योगी सरकार उत्तर प्रदेश की जनता के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के सफल प्रयासों से नीम कोटेड यूरिया का निर्वाध उपलब्धता कराने का सफर, सफल प्रयास किया गया। किसानों का आत्मविश्वास बढ़ाने की योजना बनाई गई।

शासन – प्रशासन ने कार्यालयों के सहकर्मियों और कर्मचारियों को जिम्मेदारी दी। किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए समस्याओं के निवारण करने की योजना बनी। बदले हुए परिवेश के साथ लोग एडजस्ट करने की कोशिश करने लगे। वातावरण सामान्य होने लगा। निदान का आधार मिल गया। इस समस्या का निदान उत्तर प्रदेश सरकार ने निकाल लिया। दलदल में फंसी हुए किसानी राहत की सांस ली। रोज भोर में अपने घरों से निकल कर दुकान – दुकान और समितियों का चक्कर लगाने से किसानों को योगी सरकार में राहत की सांस मिली।

यूरिया खाद की उपलब्धता होने लगी।
चप्पे चप्पे पर सी. सी. टी. वी. कैमरा से,
किया जा रहा है निगरानी।
सुरक्षा के मामले में रखी जा रही है सावधानी।
मंदिरों में भक्तों को करना नहीं पड़ेगा इंतजार।
ऑनलाइन से हो जाएगा बहुत सारा कारोबार।
सेंसर किट का हो गया है अब आविष्कार।
चोरी पर लग जाएगी फागी वाली लगाम।
जल जीवन मिशन का सरकार ने चलाया अभियान।
विद्युत व्यवस्था से किसान हो गया है खुशहाल।
बूढ़ी – बूढ़ा को पेंशन योजना, प्रदेश हुआ गुजार।

— अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) गोरखपुर —

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र में अखिल भारती आयुर्विज्ञान संस्थान 300 बेड का हॉस्पिटल खुल जाने से पूर्वांचल ही नहीं उसके साथ साथ नेपाल, बिहार आदि जगहों के मरीज भी उत्कृष्ट चिकित्सा की सुविधाएं प्राप्त कर सकेंगे। इस आयुर्विज्ञान संस्थान से इलाज के लिए बड़े-बड़े शहरों पर निर्भरता में कमी आएगी। इस हॉस्पिटल में ऑपरेशन थिएटर, आयुष ब्लॉक, मेडिकल ब्लॉक और नर्सिंग कॉलेज का निर्माण कार्य पूर्ण होने वाला है।

— हॉस्पिटल में सुविधाएं —

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में सी टी स्कैन, एम आर आई और अल्ट्रासाउंड जैसी अन्य तमाम सुविधाएं उपलब्ध होंगी। भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में 125 एम बी बी एस की सीट उपलब्ध होगी। इस संस्थान द्वारा विविध तरह के रोगों पर शोध का कार्य भी होगा।

— रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर गोरखपुर —

रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर गोरखपुर में वायरस रिसर्च और परीक्षा लैब बना है। जापानी जापानी इंसेफेलाइटिस पर भी विचार होगा। यहां शोध किया जाएगा। इसके रोकथाम के लिए उच्च गुणवत्ता पूर्ण जांच की सुविधा है। जापानी इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए रिसर्च फेकल्टी बनाई गई है। अन्य विषाणु जनित बीमारियों पर भी शोध होगा। इस मेडिकल रिसर्च सेंटर से पूर्वांचल के सभी जनपदों को विशेष लाभ मिल सकेगा।

खाद का कारखाना गोरखपुर का छेत्रफल 600 एकड़ में फैला है। जिसकी लागत रुपया 8603 करोड। अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान का क्षेत्रफल 112 एकड़ जमीन पर मौजूद है जिसकी लागत रुपए 1011 करोड़। रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर गोरखपुर के साथ 10,000 करोड़ की तीन परियोजनाओं का लोकार्पण समर्पित किया, राष्ट्र को, भारतीय संस्कृति रक्षक माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गोरखपुर क्षेत्र में।

इस कार्यक्रम में गरिमामय उपस्थिति दर्ज की, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, उत्तर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मोर्य, डॉ दिनेश शर्मा, डॉ भारती प्रवीण पवार, राज्य मंत्री, स्वास्थ एवं परिवार कल्याण, भारत सरकार, पंकज चौधरी, राज्य मंत्री, वित्त, भारत सरकार, जय प्रताप सिंह, मंत्री, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं मातृ – शिशु कल्याण, उत्तर प्रदेश।

रवि किशन शुक्ला, सांसद, गोरखपुर, कमलेश पासवान, सांसद, बांसगांव, शिव प्रताप शुक्ल, सांसद, राज्यसभा। जगदंबिका पाल, सांसद, डुमरियागंज। प्रवीण कुमार निषाद, सांसद, संत कबीर नगर। डॉक्टर रमा पति राम त्रिपाठी, सांसद देवरिया। जयप्रकाश निषाद, सांसद, राज्यसभा। हरीश दिवेदी, सांसद, बस्ती। विजय कुमार दुबे, सांसद, कुशीनगर। रविंद्र कुशवाहा, सांसद, सलेमपुर। और स्वतंत्र देव सिंह, सदस्य, विधान परिषद उत्तर प्रदेश सहित गणमान्य अतिथि उपस्थित रहें।

— प्रगतिशील उत्तर प्रदेश नई ऊंचाइयों को छूने के लिए आगे बढ़ रहा है। —

प्रगतिशील उत्तर प्रदेश नई ऊंचाइयों को छूने के लिए आगे बढ़ रहा है। रिश्तों की प्रकाश का और निरंतरता सड़कों के माध्यम से, नदियों पर पुलों के निर्माण से, बुजुर्गों और बच्चों की सहूलियत का ध्यान रखने से, बस, रेल और हवाई अड्डे निर्माण कार्य से, गांव-गांव, शहर-शहर शौचालय की निर्माण से, प्रधानमंत्री आवास वितरण से, दलित समाज, वंचित तबकों का ध्यान देने से, कल कारखानों के विकास, कोरोना वायरस की फ्री वैक्सीन देने से, धार्मिक उन्माद पर नियंत्रण करने से, दंगा-फसाद पर रोक लगाने से, किसानों की खुशहाली की कामना करते होने से, कृषि विकास के लिए आधुनिक तकनीक पर विचार, छात्रों पर विशेष ध्यान देने से, वाहन की चोरी को रोकने के लिए एच एस आर सी लगाया जाना, शासन प्रशासन पर निगरानी रखने से, उत्तर प्रदेश की अमेठी में 300 मीटर लक्ष वाली ए के- २०३ राइफल निर्माण कारखाने के यह परियोजना 5000 करोड़ की है के पहल से, शहरों – नगरों में ड़कों के निर्माण, ई – बसों के संचालन प्रसार, ई- रिक्सा वितरण, दिव्यांगों को लाभ, डाक घरों का विस्तार सुधार, हस्त शिल्प और हस्त शिल्पियों का विशेष ध्यान देना, रेल पटरियों का विस्तार, रेलवे स्टेशन का पुनर्निर्माण और सुंदरी करण, बस का विस्तार, बस स्टेशन का पुनर्निर्माण सुंदरीकरण। स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान, वीर शहीदों का सम्मान, मनरेगा मजदूरों का मजदूरी बढ़ाई जाना, आधुनिक खेती पर बल देना, जैविक खेती को बढ़ावा देना, रोपवे की शहरों में सौगात।

मेट्रो रेल का विकास विस्तार, जन्म – मृत्यु प्रमाण पत्र का तत्कालीन निवारण, योजनाओं का धरातल पर करने का संकल्प, परिषदीय विद्यालय में छात्रों के अभिभाव को छात्र के ड्रेस का पैसा खाते में डालना, छात्रवृत्ति योजना का मेधावी छात्र को लाभ पहुंचाना, छात्र छात्राओं की सुरक्षा के लिए योजनाबद्ध जैसी काम करना, नारी के सम्मान का ध्यान रखना, गैंग वॉर पर अंकुश लगाना, आतंकवाद नक्सलवाद को नष्ट करना,, राजनीति में पारदर्शिता का आना, खिलाडियों को उचित सम्मान देना, जनता को लाइन लगने से बचाने के लिए ATM का विस्तार। ऑनलाइन पैसा ट्रांसफर करने की सुविधा व्यवस्था। बरेका इंजन की विदेश में भी बढ़ी मांग 111 देश में भेजे जा चुके 171 रेल कारखाना से रेल इंजन। केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रयास से सराहनीय क़दम उठाए गए हैं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — जब इरादे हो नेक, तो चहुँ ओर विकास होता है। इसी का प्रमाण है प्रगतिशील उत्तर प्रदेश नई ऊंचाइयों को छूने के लिए आगे बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 हजार करोड़ की लागत से उतर प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ जी के ड्रीम प्रोजेक्ट खाद कारखाना, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान और बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर का किया लोकार्पण, दिनांक 6 दिसंबर 2021 को। सन 2016 में प्रधानमंत्री मोदी जी ने खाद कारखाने और AIIMS का शिलान्यास किया था। जिसे जनता को समर्पित किया।

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यह लेख (10 हजार करोड़ की परियोजनाओं का लोकार्पण।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रथम चरण का लोकार्पण।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रथम चरण का लोकार्पण। ♦

दिनांक 13 दिसंबर 2021

तीर्थ यात्रा की परंपरा में काशी का विशेष महत्व है। काशी का पृथ्वी से संबंध नहीं है यह उचित उच्चतर लोक मंगल कारक है। काशी त्रिपुरारी की राज्य नगरी है। काशी क्षेत्र हर युग में रहता है। इसकी वाह्य स्वरुप में बदलाव होता रहता है परंतु इसका अस्तित्व हमेशा बना रहता है। इसका स्वरुप सतयुग में त्रिशूल आकार का, त्रेता युग में चंद्राकार का, द्वापर युग में रथ के आकार और कलयुग में शंख आकार रहता है। काशी गंगा के तट पर अवस्थित है। गंगा काशी विश्वनाथ धाम में उत्तर वाहिनी बहती चली आ रही है। गंगा प्राण वायु प्रदायनी हैं। भू-लोक पर जीव को जीवन दान देती हैं। गंगा प्राणियों का आश्रय दाता है। गंगा को धरती पर अपरा भी कहा जाता है। गंगा स्नान से स्वर्ग से धरा पर अवतरित माँ देवी गंगा मनुष्य जीव को पुण्य प्रदान करती हैं।

काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण दिनांक 13 दिसंबर को मान्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कर कमलों से होने वाला है। इस आयोजन को भव्य काशी और दिव्य काशी के आयोजन स्वरूप किया गया है। इस अवसर पर विद्यालय में रंगोली, पेंटिंग, और प्रतियोगिताओं का आयोजन होगा।

इस मौके पर 1 दिसंबर से 10 दिसंबर तक जिले में अनेक क्षेत्रों में विविध रूप से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है।

काशी विश्वनाथ धाम की परियोजनाएं

  • काशी विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र का विस्तारीकरण। 
  • काशी हिंदू विश्वविद्यालय में चिकित्सकों और नर्सों के लिए हॉस्टल तथा धर्मशाला।
  • रमना, वाराणसी में 50 एम एल डी छमता का एस टी पी।
  • शहर में विभिन्न स्थानों पर सी सी टी वी कैमरा स्टालेशन और बनिया बार-बार का जीर्णोद्धार व वाहन पार्किंग।
  • काशी हिंदू विश्वविद्यालय हॉस्पिटल में आई यू सी टी ई भव्य।
  • काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ही जोधपुर कालोनी व 80 फ्लैट। खिडकिया घाट का जीर्णोद्धार।
  • इसी के साथ कई वार्ड उनका विकास कार्य भी शामिल है।

स्मार्ट सिटी में वार्डों का विकास

  • गढ़वाली टोला वार्ड का विकास।
  • काल भैरव वार्ड का विकास।
  • कामेश्वर महादेव वार्ड का विकास।
  • राज मंदिर वार्ड का विकास।
  • जगबाडी वार्ड का विकास।
  • दशाश्वमेध वार्ड का विकास।

काशी विश्वनाथ धाम के आसपास के वार्डों का सौंदर्यीकरण का काम किया गया।

लोकार्पण के पहले शहर रंग रोगन

काशी विश्वनाथ धाम के प्रथम चरण के लोकार्पण के पहले गोदौलिआ से मैदागिन तक बनी हुई सड़क किनारे के भवनों को एक रंग में रंगने का काम किया।

संस्कृति विभाग की तरफ से आयोजित कार्यक्रम

  • बड़ा गणेश, सुनारपूरा लोटिया, 1 दिसंबर।
  • विष्णु मंदिर ललिता घाट और बृहस्पति मंदिर दशाश्वमेध घाट, 2 दिसंबर।
  • शीतला मंदिर शीतला घाट, और शैलपुत्री देवी, सरैया, 3 दिसंबर।
  • राम मंदिर खोजवा और राम मंदिर चौक से 4 दिसंबर।
  • बटुक भैरव कमच्छा और काल भैरव 5 दिसंबर।
  • मृत्युंजय महादेव मंदिर धारा नगर वह केदारनाथ मंदिर केदार घाट 6 दिसंबर।
  • बनकटी हनुमान मंदिर आनंद पार्क कौड़िया माई मंदिर कबीर नगर, 7 दिसंबर।
  • गोपाल मंदिर चौक खंभा और संकटा मंदिर चौक, 8 दिसंबर।
  • कामेश्वर महादेव मंदिर, कंदवा, और गैबी ए एकदिवसीय श्वरमंदिर छोटी गैवी, 9 दिसंबर।
  • अन्नपूर्णा मंदिर विश्वनाथ धाम और आदि केश्वरमंदिर राजघाट, 10 दिसंबर।
  • 11 दिसंबर को दुर्गा कुंड स्थित दुर्गा मंदिर में और संकट मोचन में भव्य भजन कीर्तन का कार्यक्रम समय 5:00 बजे से 7:00 बजे सायंकाल (शाम) में तय किया गया है।

लोकार्पण समारोह में — अनेक विचारधाराओं का समावेश।

13 दिसंबर 2021 ई. श्री काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण समारोह में देश की संपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा और अनेक विचारधाराओं का समावेश होगा। काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण समारोह इतिहास का पहला ओ अवसर कहा जाएगा। जिसमें सनातन परंपरा के सभी धारा के संतों की मौजूदगी होगी। काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण के अवसर पर राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता का संदेश पूरे विश्व को दिया जाएगा। यह भी एक कुंभ का आयोजन है यद्यपि हरिद्वार, प्रयाग, नाशिक में लगने वाले कुंभ में भी सनातन धर्म की सभी धारा के साधु संत और आम जनता इकट्ठा होती है। काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण में सनातन धर्म के सभी संप्रदाय और परंपरा के अनुयाई उपस्थित रहेंगे। इस कार्यक्रम में दक्षिण की परंपरा के वीर शैव और लिंगायत भी अपनी उपस्थिति दर्ज करेंगे।

शिक्षा विभाग की तरफ से कार्यक्रम

दिसंबर मास में 1 दिसंबर से वाराणसी नगर के विद्यालय भी विविध कार्यक्रमों का आयोजन करेंगे। इन कार्यक्रमों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, पेंटिंग का कार्यक्रम, प्रतियोगिता, नुक्कड नाटक, रंगोली प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता, चित्रकला, अंताक्षरी, चौपाई का श्लोक आदि प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएगी।

आजादी के अमृत महोत्सव के तहत

आजादी के अमृत महोत्सव के तहत शहर – नगर के विद्यालयों में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। बाबा की धाम दिव्यांगों – बुजुर्गों के आने की व्यवस्था, श्री काशी विश्वनाथ धाम लोकार्पण के दौरान बुजुर्ग श्रद्धालुओं और विज्ञान कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने के लिए विशेष प्रबंध किया गया। प्रवेश द्वार से लेकर निकास द्वार तक विशेष रैंप स्कलेटर बनाए गए। सुविधाओं को गंगा घाट, छत्ता द्वार, ढुंढ राज गणेश और नील कंठ द्वार से आने वाले सभी दिव्य गौर बुजुर्ग श्रद्धालुओं को बिना किसी प्रकार की परेशानी के बाबा विश्वनाथ जी का दर्शन करेंगे। जला सेन घाट से भी बाबा विश्वनाथ धाम में प्रवेश करने के लिए बुजुर्ग श्रद्धालु और दिव्यांग जनों के लिए विशेष व्यवस्था की गई है।

व्हील चेयर व ई-रिक्शा की निशुल्क व्यवस्था

बाबा विश्वनाथ मंदिर प्रशासन की ओर से निशुल्क ई-रिक्शा और व्हील चेयर का इंतजाम किया गया है। बाबा धाम के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के अनुसार बाबा के दर्शन के लिए आने वाले दिव्यांग – बुजुर्ग श्रद्धालुओं को मंदिर में सभी सुविधाएं प्रदान की जाएगी।

श्री काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण रवि योग और महासिद्धि योग के संजोग में, गणेश अथर्व शीर्ष और श्लोक के पाठ के बीच काशी विश्वनाथ धाम में उपस्थित होकर भारती प्रधानमंत्री मोदी जी लोकार्पण करेंगे। इस लोकार्पण के बाद गंगा की धारा से 5, 27, 730 वर्ग फीट तक का क्षेत्रफल श्रद्धालु के लिए आम हो जाएगा।

श्री काशी विगत परिषद के निर्देशानुसार संपूर्ण अनुष्ठान श्री राम जन्म भूमि पूजन की तरह ही जिम्मेदारी के साथ की जाएगी। इस अनुष्ठान को काशी के विद्वान कर्मकांडी ब्राह्मण ही संपन्न कराएंगे। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया जाएगा जो समस्त सनातन धर्मावलंबियों, साधु – संतों तथा आम जनता के लिए सुलभ होगा। भारत की सांस्कृतिक राजधानी काशी बनारस में बाबा विश्वनाथ जी देवताओं के आगमन की प्रसन्न मुद्रा में होते हैं और लोग कल्याण के लिए दुनियां के भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। काशी विश्वनाथ धाम अपने आज कालीन इतिहास का गवाह बना।

सारे अतिक्रमण साफ हो जाने के बाद श्री बाबा विश्वनाथ धाम की मणिमालाएं लोग कल्याण के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आने वाले दर्शनार्थियों को सहज रुप से काशी विश्वनाथ धाम में काशी पुराधीपती के साथ शिव कचहरी, काशी खंडोक्त मंदिर के साथ 178 विग्रह के दर्शन का भी लाभ मिलेगा।

शिव भक्तों की सड़क किनारे नहीं लगेगी कतार –
काशी विश्वनाथ धाम ऐसा होगा प्रकार,
सड़क किनारे नहीं लगेगी अब कतार।
पौराणिक मान्यता युक्त पूर्ण रूप धाम,
शिवरात्रि और सावन भक्तों को महान॥

लाखों भक्त के एक साथ दर्शन विधान,
काशी में शिव लगाये जाम पर लगाम।
सुविधाओं का विशेष रखा गया ध्यान,
बाबा चौक का लोग करेंगे गुणगान।
शिव शोभा निरख निरख किया गान।
बाबा गणों संग करेंगे जगत कल्याण॥

चलो काशी चलें अभियान

बनारस की छवि बढ़ाएगा बाबा विश्वनाथ धाम, महीनों का होगा पूरे शहर में आयोजन। 13 दिसंबर को पहले चरण का होगा लोकार्पण, आगे की सभी कार्यक्रम में वर्चुअल शामिल होंगे पी एम। काशी पुराधिपति के दरबार का भव्य होगा लोकार्पण।

आओ चलें काशी विश्वनाथ धाम,
करें शिव शंकर जी का ध्यान।
सूने घर में जलने वाले दीपक की लौ सा ना जलो,
चलो काशी विश्वनाथ मंदिर धाम लोकार्पण करें।
जलो तो ऐसे जलो की दुनियां को खुशहाल करो,
सत्संग से मिले सुख के रम्य में रमण हों प्रकाशित करें॥

देव दीपावली की तर्ज पर दुनिया देखेगी लाइव लोकार्पण। काशी के सिवालय सजेंगे, विश्वनाथ दरबार में उस समय प्रधानमंत्री रहेंगे। सभी सरकारी भवनों को सजाया जाएगा, तैंतीस कोटि देवी देवताओं को मनाया जाएगा। देव लोक जैसे पुष्प वर्षाया जाएगा, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम में कलाकारों को लाया जाएगा। काशी में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, काशी के पुनरोद्धार की जानकारी जन-जन तक पहुंचाएगी।

सांस्कृतिक आयोजन 13 दिसंबर से 12 जनवरी तक चलेगा। सोलह दिसंबर को उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्रियों को काशी में बुलाया जाएगा, प्रस्तावित कार्यक्रम पर मंत्रिमंडल विचार विमर्श करेगी। विश्वनाथ धाम के लोकार्पण को भव्य स्वरुप दिया जाएगा। काशी का भव्य, दिव्य, तेज, स्वरूप इतिहास बताने के लिए 100-100 पुरुष सौ – सौ महिलाओं को वालंटियर बनाया जाएगा। वालंटियर टीम को प्रशिक्षित किया जाएगा। काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण देश की प्रमुख संग क्योंकि उपस्थित में किया जाएगा। काशी विश्वनाथ कारीडोर में 19 भवन बनकर तैयार के संचालन की रुपरेखा तैयार की जाएगी। इस भवन में 14 जनवरी से सांस्कृतिक कार्यक्रम सहित अन्य कार्यक्रमों की श्रृंखला का आयोजन किया जाएगा।

मनुष्य भोग विलास और कामनाओं में अपने जीवन की आहुति दे देता है। इस जन्म में जिन भोग को भोग रहे हैं पिछले जन्म में ही उसे भोगा था अगले जन्म में भी उन्हें ही भोगेंगे। क्या हमारा जन्म इसलिए हुआ है। हमें उन जो पुरुष पर्वत की गुफाओं में बैठकर परम ज्योति का ध्यान करते हैं उनके आनंदाश्रुओं को पखेरू उनकी गोद में बैठ कर निर्भयता के साथ पीते हैं। हमें भगवान शंकर जो 14 भुवनों के स्वामी ब्रहमांड को अपने उदर में धारण करने वाले विष्णु, उनके सरण में जाने की आवश्यकता है।

एक रचना प्रस्तुत

भौतिकता का सुख तो क्षणभंगुर है,
संसार में सुंदरता की कमी नहीं है।
गर तुझे भवसागर से पार उतरना है,
वेद – स्मृति और पुराण ही पढ़ना है।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में लगे पत्थर

सात प्रकार की पत्थरों से पूरे मंदिर परिसर को संवारा सजाया गया है। जिसमें बालेश्वर स्टोन, मकराना मार्बल, कोटा ग्रे नाईट और मेडोना स्टोन का इस्तेमाल प्रमुख रुप से अधिक किया गया है।

कार्यक्रम के लिए योगी आदित्यनाथ के निर्देश

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने तीन दिवस के कार्यक्रम पर मोहर लगा दिया। इस मौके पर 12, 13 व 14 दिसंबर 2021 को पूरा काशी शहर रंगीन रोशनी से नहाएगा। रोशनी की सजावट गली से लेकर घाटो तक दिखेगी। इस कार्यक्रम को भव्य और दिव्य काशी का आयोजन बनाने के लिए अधिकारियों ने डिजिटल मैप तैयार कर लिया।

श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर लोकार्पण के दौरान तक काशी में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होता रहेगा। इसलिए चित्त! अब तू मोह को छोड़ और शीश पर अर्ध चंद्र धारण करने वाले भगवान शिव का ध्यान कर और चलकर गंगा के तट पर वृक्षों की छाया में विश्राम कर। जो मनुष्य ईश्वर के ध्यान में हैं, जिसे खाने-पीने, सोने पहनने-ओढ़ने की कोई चिंता नहीं होती है। जिनके मन में परम शांति का निवास होता है ऐसे व्यक्ति के लिए त्रिलोकी का राज भी तुच्छ लगता है।

एक रचना प्रस्तुत

जो मनुष्य सदाशिव की भक्ति में लीन रहते हैं,
जन्म – मरण का भय उनके हृदय ना बसते हैं।
मनोरथ पूर्ण करने वाली लक्ष्मी मिलती हैं,
परमपिता परमात्मा की अनुकंपा होती है।

काशी विश्वनाथ मंदिर सहित क्षेत्र के सत्तरह मंदिर जिसमें शामिल हैं उनमें से, जिसके प्रथम चरण का लोकार्पण 13 दिसंबर 2021 को शुभ मुहूर्तं में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के करकमलों द्वारा रवि योग में संपन्न होगा।

दूसरे चरण में धाम के शेष आठ मंदिरों के संरक्षण का काम किया जाना है। इस लोकार्पण समारोह के अनुष्ठान के मुख्य यजमान होंगे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी। इससे पहले प्रधानमंत्री गंगाजल माँ गंगा जी से लाकर बाबा विश्वनाथ जी का अभिषेक करेंगे।

काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण को विश्वव्यापी बनाने की तैयारी चल रही है। इस समारोह में शैव संप्रदाय के पीठाधीश्वरों को भी आमंत्रित किया जाना है। जिसमें कर्नाटक के लिंगायत, वीरशैव और तमिलनाडु के अधिनाम सहित उत्तर के सभी क्षेत्रों के संतों को शामिल करने की तैयारी की गई।

संत समाज को बाबा धाम में आने का निमंत्रण

महत्वपूर्ण, प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना काशी विश्वनाथ धाम को साकार करने के लिए होने वाले लोकार्पण के अवसर पर देश के अनेक क्षेत्रों से संत समाज को बाबा धाम में आने के लिए प्रधानमंत्री जी ने बाबा विश्वनाथ की तरफ से आमंत्रित किया।

इस लोकार्पण के अवसर पर संतो की उपस्थिति के लिए 25,000 संतो को काशी विश्वनाथ की पाती दी जानी है, जो संतो की थाती होगी। इस पाती के माध्यम से 13 दिसंबर 21 ई. को होने वाले लोकार्पण की जानकारी संतो के माध्यम से भव्य बाबा धाम का प्रचार, अपने अनुयायियों के बीच काशी आने का निमंत्रण, अनुयायियों के लिए भी दिया जा रहा है।

बाबा आदि विश्वेश्वर की स्थापना

काशी बनारस की गलियों में विराजमान आज विशेश्वर के 50 हजार वर्ग मीटर से ज्यादा में भव्य दरबार स्थापित किया जाना है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की पहल पर परिकल्पना की गई है।

संतो को भी जाने वाली पाती में लगभग 300 से ज्यादा भवनाें के अधिग्रहण और उसके लिए किए गए संघर्ष के साथ ही महादेव के दरबार का निर्माण पूरा करने तक की कहानी लिखी गई है। प्रधानमंत्री ने संत समाज को 13 दिसंबर से लेकर 12 जनवरी तक चलने वाले आयोजन की भी पूरी जानकारी होगी। पूरा प्रयास किया जा रहा है कि यह पाती सभी मठ मंदिर और संन्यासी तक पहुंचने का प्रयास किया गया है।

बाबा विश्वनाथ मंदिर का प्राचीन वैभव लौटा

काशी के बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर की दीवारों पर सन 2008 में तत्कालीन एक वरिष्ठ अधिकारी की मनमानी की वजह से एनामेल पेंट से पेंट कर दिया गया था। जिसका उस समय संत व आम जनता द्वारा विरोध किया गया था। 12 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद बाबा के मंदिर की दीवारों को संरक्षित करने की कवायद शुरू हो चुकी है। लोगों को उम्मीद है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रथम चरण के लोकार्पण के पूर्व ही पेंट को हटाकर दीवार को संरक्षित और सुशोभित कर दिया जाएगा।

इनामेल पेंट की पुताई की वजह से मंदिर के गर्भ गृह में लगे पत्थरों का क्षरण हो रहा था। दीवार में लगे चुनार के पत्थर खराब हो रहे थे। वाराणसी के मंडलायुक्त के अनुसार बाबा विश्वनाथ के मंदिर के जीर्णोद्धार और संरक्षण का काम किया जा रहा है। वाराणसी घर की सफाई का काम भी हो रहा है इस काम के लिए टाटा को लगाया गया है। उम्मीद है काशी विश्वनाथ मंदिर का प्राचीन वैभव लौटेगा। मंदिर के काम के लिए तत्परता, तनमयता त्याग, युद्ध स्तर पर काम करने की कोशिश की गई है।

बाबा विश्वनाथ मंदिर की दीवारों से एनामेल पेंट हटाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण अनुसंधान साला, तथा आई आई टी रुड़की की मदद ली गई, अनेक व्यवधानाें के उपरांत सन 2019 में iit रुड़की द्वारा मंदिर की दीवारों के संरक्षण के लिए काम शुरु किया लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से काम पूरा नहीं हो सका था। परंतु मंडलायुक्त वाराणसी के कथन अनुसार टाटा द्वारा कार्य पूरा किया जा सकेगा।

लोगों के दिलों में यह प्रश्न उठ रहे हैं कि आखिरकार माननीय प्रधानमंत्री जी मार्ग शीर्ष मास में और वह भी दिसंबर को काशी विश्वनाथ मंदिर धाम के प्रथम चरण का लोकार्पण का दिन क्यों चुना है। यह शुभ कार्य किसी और दिन भी किया जा सकता था। तो आपको बताना चाहेंगे जी कि मार्ग शीर्ष मास को अगहन मास के रूप में जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार सभी हिंदू महीनों का अपना विशेष महत्व है, परंतु उनमें से मार्गशीर्ष मास धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है। गीता में भगवान ने कहा है कि— मासानाम मार्ग शीर्यो यम॥

मार्गशीर्ष मास की प्रमुख विशेषताएं

  • सतयुग में देवो अगहन मास (मार्गशीर्ष मास) की प्रथम तिथि के दिन नया साल आरंभ किया।
  • कश्यप ऋषि द्वारा इसी दिन मन भावन, मनु हारी, सुंदर, सुखजीत, कश्मीर की रचना की थी।
  • मान्यता है जो के अनुसार सीमा स्नेह भगवान श्री राम और सीता जी का स्वयंवर रचा गया था।
  • मार्गशीर्ष मास में भगवान शिव और माता पार्वती का मिलन हुआ था ऐसी मान्यता है।
  • अगहन मास में पूर्णिमा को दत्तात्रेय की जन्म जयंती मनाई जाती है।
  • इसी मास में पूर्णिमा को चंद्रमा की पूजा की जाती है जिसका विशेष फल मिलता है।
  • मार्ग शीर्ष मास में विष्णु सहस्त्रनाम, भागवत गीता और गजेंद्र मोक्ष का पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है।
  • मार्गशीर्ष मास में ‘ओम दामोदराय नमः’ से गुरु और इस देव को प्रणाम करने से जीवन के अवरोध कष्ट दूर होते हैं।
  • मार्ग शीर्ष मास में भागवत ग्रंथ को देखने की विशेष महिमा है।अपने घर में भागवत को प्रणाम करना चाहिए।
  • मार्ग शीर्ष मास श्री कृष्ण का रूप माना गया है। भगवान श्री कृष्ण की पूजा कई रूपों में इस मास का पूजन करना फलदाई होता है।
  • मार्ग शीर्ष मास में शंख में तीर्थ स्थानों का जल भरकर पूजा स्थल पर मंत्र पढ़ते हुए देवताओं के ऊपर घुमाकर जल को दीवाल पर छिड़कने से घर की शुद्धि होती है, मन को शांति मिलती है और घर के लोगों को लाभ होता है। कष्ट निवारक है, कष्टाें से छुटकारा मिलता है।

रवि योग की महत्ता

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रवि योग शुद्ध शुभ कामना प्रदान करने वाला होता है। रवि योग योगिनी सूर्य की अभीष्ट सिद्धि, कृपा होने के कारण, समस्त कार्य पूर्ति करने वाला होता है। अनिष्ट को दूर करने वाला, निर्विघ्नं कार्य करने वाला, समस्त संकटों से सीधे तौर पर बचाने वाला, शुभ फल प्रदान करने वाला रवि योग है।

अगहन मास – मार्गशीर्ष मास क्यों कहलाता है?

इस मास में भगवान श्री कृष्ण की पूजा अर्चना अनेक रूपों में अनेक नाम से उसकी की जाती है इन्हीं रूपों में से एक रुप मार्ग शीर्ष श्री कृष्ण का ही रूप है।

प्राचीन मंदिर काशी विश्वनाथ धाम का शुभ लोकार्पण

13 दिसंबर को अद्वितीय अद्भुत भाग्यश्री काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण समारोह में शामिल होकर भारत के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी अगहन मास की दशमी तिथि को रवि योग में दिवस सोमवार को महा शिव जी योग समूह दोषों को नष्ट करने वाले समय में विद्युत समाज और संतो के बीच, सारे दोष से निवारक योग में, सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले योग में, शिव का प्रिय काशी नगरी में, गंगा की धारा के किनारे स्थित, प्राचीन मंदिर काशी विश्वनाथ धाम का, शुभ लोकार्पण, समारोह में, प्रधानमंत्री जी करेंगे। जो देश हित में है। संसार का कल्याण करने वाला समय है।

शिव नगरी काशी में सिय – पिय मिलन उत्सव

प्राचीन नगरी काशी, अविनाशी नगरी काशी, मोक्ष प्राप्त करने वाली नगरी में श्री राम के आराध्य शिव की नगरी में, प्राचीन विद्यालय तत्कालीन संपूर्णानंद विश्वविद्यालय में, बाबा विश्वनाथ की ओर से आयोजित महोत्सव की शुरुवात 1 दिसंबर से 9 दिसंबर तक शंभू आनंद संस्कृत विश्वविद्यालय प्रांगण में सीताराम विवाह महोत्सव का आयोजन आयोजित किया गया है।

सूचनानुसार कार्यक्रम की रूपरेखा

  • श्री गौरी शंकर भगवान विवाह लीला, 1 दिसंबर 2021 की।
  • जय विजय लीला, 2 दिसंबर।
  • राम जन्म और बाल लीला, 3 दिसंबर।
  • सीता जी का जन्म, विश्वामित्र से अहिल्या उद्धार की लीला, 4 दिसंबर।
  • जनकपुर प्रवेश एवं नगर दर्शन की लीला, 5 दिसंबर।
  • सिय – पिय मिलन फुलवारी और धनुष यज्ञ, 6 दिसंबर।
  • हल्दी मटकोर व राम बारात शोभायात्रा, 7 दिसंबर।
  • सीताराम विवाह, 8 दिसंबर।
  • राम कलेवा का आयोजन।
  • भागवत कथा का अमृत पान।

अवि मुक्त काशी

भगवान शिव ही प्राणियों के सृष्टि कर्ता संचालक तथा संघार करता है। क्योंकि जिसकी दृष्टि मात्र से ही प्रकृति शैवीयाे गई तथा सृष्टि के समय तक व्यक्त सभा वाली यह प्रकृति गुणों से युक्त हो गई। विश्व उद्धार करने वाली यह शक्ति अतिथि अजा नाम से विख्यात है। शिव कल्याण रूप, आनंद मय अनंत अनादि और ज्ञान के ध्येय हैं । वह पार्वती जी से खुद कहते हैं कि … हम तुम दोनों का अभिन्न तेज जो है वही अवि मुक्त काशी है। ज्योतिर्लिंग तू हो और लिंगवान महेश्वर मै हूं। इसी को जागृत रूप काशी कहा गया है। अवि का अर्थ पाप है। और जो पाप मुक्त क्षेत्र है वह अविमुक्त नाम से प्रसिद्ध है। वही काशी है।

स्कन्द पुराण के अनुसार

काशी का पृथ्वी से संबंध नहीं है, यह स्वाइन उचित उच्चतर लोक है। यह क्षेत्र मोक्ष दायनी है। काशी त्रिपुरारि की कृपा की राज नगरी है। मोक्ष कामी सन्यासी भी अविमुक्त क्षेत्र का सेवन करते हैं। इस क्षेत्र में रहने वाला पापी भी नरक में नहीं जाता है। लेकिन जानबूझकर पाप करने वाले को शिव शंकर माफ नहीं करते हैं।

विश्वनाथ मंदिर में दर्शनार्थियों के लिए एक श्लोक

माता तु पार्वती देवी पिता देव महेश्वर:।
बांधवा: शिव भक्ताष्च स्वदेशो भुवन त्रयम॥

कहने का तात्पर्य है कि काशी होने की कश्ती कसौटी है। यदि काशी में हो तो अपने को सीमित दायरे से बाहर निकालो। केवल अपनी माता को ही माता ना मानो अपितु सारी स्त्रियों को माता मानो, धूप पार्वती स्वरुप करुणा की देवी हैं। सारे पुरुषों को पिता मानो, जो अपने आचरण से तुम्हें अनुशासित करते हैं, वह सब महेश्वर हैं। जो लोक को धारण करने वाले हैं। लोक मंगल में लगे हुए हैं। ये ही हमारे भाई बंधु हैं।

यदि ऐसा हुआ तो तुम्हारा व्यक्तित्व पृथ्वी और पाताल लोक पर ही नहीं परलोक तक चमकने वाला, छा जाने वाला होगा। तभी तो तुम असली काशी वासी बनोगे। मान्यता और पुराणों के अनुसार शिव जी ने कई युगों में अपने इस विस्तृत काशी के स्वरुप की प्रदक्षिणा की है। इसलिए कल्याण के निमित्त काशी की पवित्र भूमि की प्रदक्षिणा करने वाली है। भव्य दिव्य नगर काशी को बारंबार प्रणाम। भगवान श्री राम के इष्ट शिव शंकर को मेरा सादर प्रणाम। भगवान शंकर की प्रिय श्री राम, लखन भरत शत्रुघ्न सहित माता सीता जी को सादर प्रणाम करता हूं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — विश्व उद्धार करने वाली यह शक्ति अतिथि अजा नाम से विख्यात है। शिव कल्याण रूप, आनंद मय अनंत अनादि और ज्ञान के ध्येय हैं । वह पार्वती जी से खुद कहते हैं कि … हम तुम दोनों का अभिन्न तेज जो है वही अवि मुक्त काशी है। ज्योतिर्लिंग तू हो और लिंगवान महेश्वर मै हूं। इसी को जागृत रूप काशी कहा गया है। अवि का अर्थ पाप है। और जो पाप मुक्त क्षेत्र है वह अविमुक्त नाम से प्रसिद्ध है। वही काशी है।

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यह लेख (काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रथम चरण का लोकार्पण।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का शिलान्यास।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का शिलान्यास। ♦

25 नवंबर 2021

Noida International Airport / Jewar Airport

Noida International Greenfield Airport

बुद्धि जड़ता को हरने वाली होती है। बुद्धि ही मनुष्य की वाणी में सत्यता लाती है और मनुष्य को प्रतिष्ठा देकर अभ्युदय करती है। मान प्रतिष्ठा की वृद्धि करती है। पाप कर्म को हरती है। दशो दिशाओं में यश कीर्ति फैलती है।

वह मनुष्य शास्त्रों द्वारा अलंकृत शब्दों से विभूषित सुंदर वाणी बोलने वाला होता है। समाज को उपदेश देने वाला होता है। आश्रित के ऊपर उदारता रखता है। दया और क्षमा की भावना उसमें कूट कूट कर भरी रहती है। जिस व्यक्ति के अंदर क्षमा है उसे किसी कवच की आवश्यकता नहीं होती है। इसके विपरीत दुष्टों की संगत करने वालों को विषैले सर पाद पालने की आवश्यकता नहीं होती है।

जो व्यक्ति संकल्प शील, पूर्ण विश्वासी, परिस्थितियों से समझौता ना करने वाला, पुरुषार्थ से भरा हुआ, विघ्नों से जूझने वाला, होता है वह जो संकल्प उठा लेता है उसे हर हाल में पूरा करता है। यह भी कहा जाता है कि इस संसार में जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु भी निश्चित रूप से होती है। लेकिन धन्य वही जो जन्म लेकर अपने कुल को गौरवान्वित करता है। तेजस्वी होता है।

इस संसार में कुछ ऐसे भी व्यक्ति है जो धनवान होने पर समस्त भूमंडल तृणवत समझते हैं। जब की कुछ ऐसे सत्य और निष्ठा वाले कठोर कदम उठाने वाले, तपी, मधुर वचन बोलने वाले, दयालु और समाज को नई दिशा देने वाले व्यक्ति होते हैं जो संयमी व्यक्ति होते हैं जिन्हें सभी में ईश्वर का रूप दिखता है।

बात कुछ और करना है।
25 नवंबर बृहस्पतिवार सन 2021 ई. समय 12:00 बजे दोपहर को जेवर में, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का शिलान्यास भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी के कर कमलों द्वारा हुआ। इस मौके पर माननीय जोतिरादित्य एम सिंधिया मंत्री, नागरिक विमानन भारत सरकार, नंद गोपाल गुप्ता नंदी मंत्री, नागरिक उड्डयन, राजनीतिक पेंशन, अल्पसंख्यक कल्याण, उत्तर प्रदेश की माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, उपमुख्यमंत्री आदरणीय केशव प्रसाद मौर्य, सांसद विधायक आज गाड़ी कर्मचारी की गरिमामय उपस्थिति में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट / जेवर एयरपोर्ट, गौतम बुद्ध नगर, का शिलान्यास हुआ। शिलान्यास का कार्य पूरा हो जाने के बाद दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, आगरा अलीगढ़ फरीदाबाद जैसी शहरों के साथ – साथ करोड़ों लोगों को इसका विशेष लाभ मिलता रहेगा।

उत्तर प्रदेश जिसे पहले पिछड़े प्रदेशों में गिना जाता रहा वहां योगी सरकार आने के बाद उत्तर प्रदेश को पांच इंटरनेशनल एयरपोर्ट मिल गया। जेवर में, नोएडा इंटर नेशनल एयरपोर्ट जिसका शिलान्यास हुआ वह एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट होगा। भारत के प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी जी कुशीनगर एयरपोर्ट का उद्घाटन और पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का लोकार्पण अभी हाल में ही किया।

नोएडा हवाई अड्डे के शिलान्यास समारोह के दौरान अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उत्तर प्रदेश को वह मिल रहा जिसका वह हकदार था। पहले की सरकारों ने जनता को झूठे सपने दिखाए। इसका प्रभाव उत्तर प्रदेश पर पड़ा। उत्तर प्रदेश में पहले अभाव और अंधकार, अब अंतरराष्ट्रीय छाप छोड़ रहा है प्रदेश। उत्तर प्रदेश आज राष्ट्रीय हित ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय छाप छोड़ रहा है।

कनेक्टिविटी के क्षेत्र में नोएडा बेहतरीन मॉडल बनेगा

जेवर में प्रधानमंत्री ने दुनिया के चौथे सबसे बड़े हवाई अड्डे की नींव 25 नंबर को नोएडा हवाई अड्डे के नाम से रखी। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में 21 वीं सदी का भारत ने एक से एक बढ़कर कदम उठा रहा है। उत्तर प्रदेश राजस्व गेटवे के रूप में भरेगा।

उन्होंने कहा कि कनेक्टिविटी के क्षेत्र में नोएडा बेहतरीन मॉडल बनेगा। एयरपोर्ट शुरू हो जाने पर किसानों की उपज सामग्री और स्थानीय उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आसानी से पहुंच सकेंगे। जो सब्जियां जल्द खराब हो जाती हैं वह भी चंद घंटो में विदेशी ग्राहक के पास तक पहुंच सकेंगी। इस एयरपोर्ट से मुरादाबाद के पीतल, सहारनपुर का फर्नीचर, आगरा का फुटवियर और पेठा उद्योग, सब कुछ सामान ए प्रतिस्पर्धा करने वाली हो जाएंगी।

उन्होंने कहा जिन प्रदेशों की सीमा समुद्र से मिलती है वहां बंदरगाह आर्थिक उन्नत का रास्ता होता है। परंतु उत्तर प्रदेश जैसी प्रदेशों के लिए जो समुद्र से दूर है इन राज्यों के लिए यही भूमिका एअरपोर्ट ही सही होती है। इसी एयरपोर्ट के बन जाने से उत्तर प्रदेश के साथ – साथ दिल्ली, हरियाणा, उतर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और छत्तीसगढ़, झारखंड सहित अन्य राज्यों को भी लाभ होगा।

माननीय ज्योतिरादित्य सिंधिया नागरिक गुड्डन मंत्री के अनुसार जेवर मे बन रहे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली में पहले से स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को पीछे छोड़ देगा।

खास बात यह है कि यहां मेंटेनेंस, रिपेयरिंग ओवरहार्लिंग (एम आर ओ) सर्विस की सुविधा भी सुलभ होगी। जबकि अभी तक विमानों की मरम्मत के लिए पचासी फीसदी विमानों को भारत से बाहर विदेशों में मरम्मत के लिए भेजा जाता रहा है।
इसी एयरपोर्ट के बन जाने और यहां दी जाने वाली सुविधाओं की परियोजनाएं पूर्ण हो जाने पर विमान मरम्मत में होने वाला सारा खर्च भारत में ही रहेगा। यही प्रधानमंत्री जी के मेक इन इंडिया विजन भी है।

उत्तर प्रदेश में इंटरनेशनल एयरपोर्ट

  • नोएडा इंटरनेशनल ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट / नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट / जेवर हवाई अड्डा
  • चौधरी चरण सिंह इंटरनेशनल एयरपोर्ट / लखनऊ एयरपोर्ट
  • लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट / वाराणसी एयरपोर्ट
  • कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट / कुशीनगर एयरपोर्ट

उत्तर प्रदेश में एयरपोर्ट

  • नोएडा इंटरनेशनल ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट / नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट / जेवर हवाई अड्डा
  • चौधरी चरण सिंह इंटरनेशनल एयरपोर्ट / लखनऊ एयरपोर्ट
  • लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट / वाराणसी एयरपोर्ट
  • कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट / कुशीनगर एयरपोर्ट
  • आगरा एयरपोर्ट – Agra Airport
  • इलाहाबाद एयरपोर्ट (प्रयाग) – Allahabad Airport (Prayag)
  • बरेली एयरपोर्ट – Bareilly Airport
  • हिंडन एयरपोर्ट – गाजियाबाद
  • गोरखपुर एयरपोर्ट – Gorakhpur Airport
  • कानपुर एयरपोर्ट – Kanpur Airport

ऐतिहासिक कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ऐतिहासिक कदम उठाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं। उनका मानना है कि मेरा वनवासी, मेरा दलित, मेरा वंचित, इसको मुझे विकास की यात्रा में ऊपर लाना है। वह जिस समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे आदिवासियों के लिए 40 हजार करोड़ का वनबंधु पैकेज तैयार किया। गुजरात की आदिवासी क्षेत्र में कार्यरत लोग आज भी इस पर अभ्यास कर रहे हैं। गुजरात में मोदी ने कमाल कर दिखाया था। शहरी गरीबों के लिए भी बहुत काम किया था। युवा / युवकों में शक्ति का संवर्धन के हमेशा शक्ति प्रदान करते रहते हैं।

रोजगार के अवसर

  • इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बाद लोकल उत्पादन, और उपज, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पहुंचेगा जिससे अधिक प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
  • लाखों लोगों को इससे रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।
  • एयरपोर्ट के साथ एयरो-सिटी के निर्माण की भी योजना है। इसमें भी लोगों को रोजगार के मौके प्राप्त होंगे।
  • प्रति वर्ष करीब सवा करोड़ लोगों का आवागमन होगा जिसका लाभ उत्तर प्रदेश को प्रत्यक्ष रुप से मिल मिलेगा।

जेवर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनने से उत्तर प्रदेश में देश के राज्यों में सर्वाधिक पांच इंटरनेशनल एयरपोर्ट वाला राज्य उत्तर प्रदेश हो जाएगा। उत्तर प्रदेश ,उत्तर भारत की सीमा क्षेत्र में स्थित लॉजिस्टिक गेटवे के रूप में प्रदेश यानी उत्तर प्रदेश ग्लोबल लॉजिस्टिक मैप पर उभर रहा है।

भारत में पहली बार इंटेग्रेटेड मल्टी मॉडल कार्गो हब एयरपोर्ट का निर्माण, लॉजिस्टिक लागत में कमी और समय की बचत होगी ऐसा बताया गया। इंटरनेशनल एयरपोर्ट होने से हॉस्पीटल की और टूरिज्म सेम टू बढ़ावा मिलेगा। एयरपोर्ट के साथ ग्राउंड ट्रांसपोर्टेशन सेंटर का भी विकास होगा, जिससे एयरपोर्ट तक रोड, रेल और मेट्रो की निरंतर कनेक्टिविटी बनी रहे। इस एयरपोर्ट का काम बस 2024 तक पूरा होने का लक्ष्य रखा गया।

आखिर उनकी वह कौन सी विशेषताएं हैं ……

आखिर उनकी वह कौन सी विशेषताएं हैं जिसे देखकर भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व अपनी समस्याओं का हल निकालने के लिए उनके अंदर तलाश करते हैं। गुजरात में मुख्यमंत्री हुए उन्होंने गुजरात को आगे लाकर खड़ा कर दिया। एक बार जब मुख्यमंत्री रहे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर एक, भारत राज्य का राज्य में केंद्र सरकार हल नहीं कर पा रही है गुजरात, पाकिस्तान की सीमा से लगा हुआ है, गुजरात के लोगों के खिलाफ उसे किसी प्रकार की गलत नियत से आने की हिम्मत नहीं। जिस विकास का फंडा लेकर गुजरात में उन्होंने परचम लहराया उसी फंडा को लेकर उस पर चलकर पूरी भारत में विकास का परचम लहरा दिया। इसलिए उन्हें प्रगट पुरुष, सम्राट, संत पुरुष, तपस्वी, विश्लेषण से जनता उन्हें सम्मान पूर्वक नाम लेती है। रचनाकार कहता है —

………

एक गुजराती निज तप बल पर,
भारत को स्वर्ग बना डाला।
आतंकी और गद्दारों के सीने पर,
चढ़कर प्रगट पुरुष छाया।

उसने कसमें खाई मां की खाई थी,
धरा पे आतंकी नहीं आने देंगे।
समय समझ चुके भोले शंकर के,
मां पर दाग ना लगने देंगे।

जो भी सेना का अपमान करेंगे,
उनको अब नहीं छोड़ेंगे।
राष्ट्र से गद्दारी करने वालों की,
सीना पर जाकर बोलेंगे।

केसर की क्यारी में ऐसा कोई,
आतंकी नहीं पलने देंगे।
इसकी दुश्मनों को अब हमनें ,
अच्छे से पहचान लिया।

देश में गद्दारी करने वालों को,
सारा समाज जान लिया।
दिल्ली की धरती पर हमने,
गद्दारों को देखा था।
रस्साकसी है देवासुर संग्राम की,
जय श्री राम की।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — आखिर उनकी वह कौन सी विशेषताएं हैं जिसे देखकर भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व अपनी समस्याओं का हल निकालने के लिए उनके अंदर तलाश करते हैं। गुजरात में मुख्यमंत्री हुए उन्होंने गुजरात को आगे लाकर खड़ा कर दिया। एक बार जब मुख्यमंत्री रहे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर एक, भारत राज्य का राज्य में केंद्र सरकार हल नहीं कर पा रही है गुजरात, पाकिस्तान की सीमा से लगा हुआ है, गुजरात के लोगों के खिलाफ उसे किसी प्रकार की गलत नियत से आने की हिम्मत नहीं। जिस विकास का फंडा लेकर गुजरात में उन्होंने परचम लहराया उसी फंडा को लेकर उस पर चलकर पूरी भारत में विकास का परचम लहरा दिया। इसलिए उन्हें प्रगट पुरुष, सम्राट, संत पुरुष, तपस्वी, विश्लेषण से जनता उन्हें सम्मान पूर्वक नाम लेती है।

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यह लेख (नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का शिलान्यास।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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साहित्य का प्रदेय।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ साहित्य का प्रदेय। ♦

“साहित्य समाज का दर्पण होता है” इस पंक्ति से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। किसी भी काल – खंड की तस्वीर जब हम देखना चाहते हैं तो उस दौर का साहित्य उठाते हैं और शोधों – परिशोधों के शिकंजे पर कस कर साहित्य – आइने में उस काल – खंड का अवलोकन करते हैं। इस शीशे को फ्रेम बद्ध करना एक सजग साहित्यकार का काम होता है। यानी संक्षेप में कहें तो इन तीनों का आपस में एक गहरा नाता है।भविष्य के फलक पर वर्तमान का यथार्थ अपनी कलम छेनी और कल्पना मिश्रित अनुभूति के हथौड़े से चित्रित करना जहां साहित्यकार का काम है, वहीं समाज की पीड़ाओं के आत्मसात भावबोध के उस उद्घाटन का नाम ही साहित्य है। स्पष्ट है कि साहित्य और साहित्यकार के दरम्यान (बीच में) समाज ही केंद्र बन कर रहता है।

• साहित्य मौखिक और लिखित दोनों रूपों में अनादिकाल से विद्यमान •

साहित्य मौखिक और लिखित दोनों रूपों में अनादिकाल से विद्यमान होकर अपनी सेवाएं दे रहा है। इसके अनवरत प्रवाह के चलते, इसने अनेकों पड़ावों को पार कर घाट – घाट का पानी पीया है। जहां साहित्य का प्रारंभिक रूप पौराणिक दंत कथाओं के रूप में लंबे समय तक मौखिक चलता रहा, वहीं श्रुतियों – स्मृतियों ने इस कड़ी को बनाए रखने की अपार भूमिका अदा की। समय बदला, परिस्थितियां बदली। इसी मौखिक रूप ने लिखित रूप धारण किया और अपने समय के साक्ष्य देने का जिम्मा उठाया। वेदों – वेदांतों से गुजरते हुए यह रामायण – महाभारत जैसी महा लोक कथाओं को पार कर जब हिन्दी साहित्य के आदिकाल में प्रवेश हुआ तो इसने अपना मिजाज सिद्धों – नाथों की चमत्कृत अनुभूतियों के साथ बदल दिया।

यह सच है कि उस दौर में भी इसने वीर रस का पान करते हुए श्रृंगारित अनुभूतियों और युद्घिय वातावरण का चित्रण करने में कोई कोर – कसर न छोड़ी। जहां – जहां इसे वात्सल्य, वीभत्स, आदि दृश्यों को उद्घाटित करना था, सो भी कुल मिलाकर बखूबी किया। यानी इस काल में भी साहित्य की मूलभूत योग्यताओं और क्षमताओं का प्रदर्शन साहित्यकारों ने संतुलित किया।

• हिंदी साहित्य का यौवन ही निखर आया •

अब भक्ति काल या मध्यकाल में तो विशेष कर हिंदी साहित्य का यौवन ही निखर आया था। साहित्यिक रसों, गुणों, शब्द शक्तियों और छंद – अलंकारों के साथ – साथ साहित्य लेखन की महा विधाओं का उत्कर्ष ही निखर आया। इस काल – खंड के साहित्यकारों ने समाज की स्थिति को अपनी लेखनी की नोक से जिस क़दर साहित्य में उतारा, वह सच में काबिले तारीफ है। यह तो हिन्दी साहित्य का वह काल है, जिसे कोई चाह कर भी भूला नहीं सकता।

रीति काल में जहां दरबारी साहित्य की झलक के साथ – साथ शृंगारिकता का दर्शन होता है तो वहां आधुनिक काल में छायावादी कवियों का प्रकृति प्रेम दिखता है। आधुनिक काव्य साहित्य साहित्यिक परंपराओं को तोड़ता हुआ छंद मुक्त हो गया और इधर काव्य रचना की परिपाटी को तोड़ता हुआ गद्य साहित्य के क्षेत्र में उद्भूत हुआ।

• वह सब साहित्य का ही प्रदेय है •

यह तो भारतीय साहित्य परंपरा की एक संक्षिप्त गाथा है। परंतु साहित्य मात्र भारत में ही नहीं रचा गया। साहित्य तो विश्व के हर कोने – कोने में और हर जाति – धर्म में अपनी – अपनी भाषाओं में और अपनी – अपनी तहजीब में रचा गया। इधर यहूदी धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबल से क्रिश्चियन धर्म का साहित्य शुरू हुआ और आधुनिक ईसाई मिशनरियों और इलियट जैसे प्रसिद्ध कवियों की कृतियों के साथ पल्लवित एवं संवर्धित हुआ।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद यदि हिन्दुओं के पवित्र और पुरातन ग्रंथ है तो इंजल, जबूर, तोरात और कुरान मजीद या कुरान शरीफ इस्लाम के पवित्र और पुरातन ग्रंथ है। अब चाहे पारसियों का साहित्य उठाओ या फिर बौद्धों, जैनों या सिखों का साहित्य उठाओ। धम्मपद, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब जैसी पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करने पर या फिर किसी भी धर्म या संप्रदाय के साहित्य का अवलोकन करने पर जो कुछ हमें प्राप्त होता है वह सब साहित्य का ही प्रदेय है।

• भाषा के आधार पर साहित्य •

जाति, धर्म और संप्रदाय को छोड़कर यदि हम भाषा के आधार पर भी साहित्य को देखने की कोशिश करेंगे तो वह भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अब चाहे संस्कृत का साहित्य हो या फिर हिंदी का। उधर अंग्रेजी, अरबी, फारसी या उर्दू का साहित्य हो चाहे फिर पाली, प्राकृत भाषा में रचित। पंजाबी, चीनी आदि विभिन्न भाषाओं में विपुल साहित्य की रचना हमें पढ़ने के लिए मिलती है। बात यहीं खत्म नहीं होती। बात तो यहां से शुरू होती है की साहित्य का प्रदेय क्या है?

• साहित्य के दो रूप •

यह प्रश्न जितना सरल है उतना ही इसका उत्तर भी सरल है। सीधी सी बात है कि विश्व के मानव मात्र के मन – मस्तिष्क में आज जो कुछ भी ज्ञान भरा पड़ा है, वह सब संसार के विविध साहित्य की ही देन है। इस संसार में साहित्य विद्यमान नहीं होता तो न ही तो संस्कृति और सभ्यता ही विकसित होती और न ही तो मनुष्य के पास मानव कल्याण एवं समाज उत्थान सम्बन्धी ज्ञान – विज्ञान होता। साहित्य ने हमें क्या नहीं दिया? साहित्य की देन को समझने के लिए हमें अनादि काल के उस परिप्रेक्ष्य में जाना होगा जहां से मौखिक साहित्य का उदय हुआ था। हम भलीभांति जानते हैं कि साहित्य के दो रूप हमें देखने को मिलते हैं : —

  1. मौखिक साहित्य। — Oral literature

  2. लिखित साहित्य। — Written literature

संसार की हर भाषा का साहित्य इन दो विभागों में बंटा हुआ है। जब मनुष्य को पढ़ना – लिखना नहीं आता था तो अवश्य ही उस काल खण्ड में हर भाषा का साहित्य मौखिक रूप से लंबे समय तक लोक में प्रचलित रहा। इन दोनों साहित्यिक विभागों के प्रदेय को समझने के लिए हमें इन्हें अलग – अलग तरीके से समझना होगा।

1. मौखिक साहित्य का प्रदेय : —

मौखिक साहित्य हर भाषा में श्रुति – स्मृति परंपरा में ही विद्यमान रहा। इस साहित्य ने जहां मानव मस्तिष्क और हृदय में भावनाओं एवं कल्पनाओं का विकास किया, वहीं दूसरी ओर मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता को पाशविक संस्कृति एवं सभ्यता से पृथक करने में भी अपनी अहम भूमिका अदा की।

धर्मों के आधार पर यदि हम मानव परंपराओं को समझने की कोशिश करेंगे तो उसमें कई गतिरोध पैदा हो जाते हैं। इधर हिंदू मतानुसार यदि पुनर्जन्म की परिकल्पना की गई है तो इस्लामिक धर्म इसके विपरीत चलता है। इस कड़ी को ठीक से समझने के लिए यदि हम प्रागैतिहासिक घटनाओं और पुरातत्वविदों की परिकल्पना को ही वैज्ञानिक पृष्ठभूमि से जोड़कर आधार माने तो मौखिक साहित्य की देन का ठीक – ठीक विश्लेषण कर पाएंगे।

इस दृष्टि से माना जाता है कि मनुष्य का विकास पशु योनि से धीरे – धीरे विकसित होकर आदिमानव के रूप में हुआ। वह मौखिक ज्ञान – विज्ञान के आश्रय से बौद्धिक रूप से विकसित होता गया और उसी बौद्धिक ज्ञान – विज्ञान के आधार पर उसने अपने बाह्य वातावरण को और अपने शरीर को निरंतर परिष्कृत करके नवीन ढर्रे में ढालने की कोशिश की। आज का सभ्य मानुष उस आदिमानव का परिवर्धित एवं परिष्कृत रूप है।

यदि इस बात को आधार माना जाए तो यह स्पष्ट हैं कि मौखिक साहित्य ने सचमुच समाज के लिए बहुत कुछ दिया है। यह वह काल था जब मनुष्य ने धीरे-धीरे सोचना शुरू किया था। सोची हुई बातों को वैचारिक ताने-बाने में गूंथना शुरू किया था। इतना ही नहीं उन गुंथी हुई बातों को, कथा और कहानियों का रूप देकर के उन्हें स्मरण रखने की कला सीख ली थी। यह मौखिक साहित्य जितना प्रासंगिक उस काल खण्ड में था, उतना ही प्रासंगिक आज के दौर में भी है। यही साहित्य की वह विधा है जो पुरानी पीढ़ी का ज्ञान एवं अनुभव नई पीढ़ी में संप्रेषित करती है और नई पीढ़ी को उसके आगे आने वाली नई पीढ़ी के लिए ज्ञान – विज्ञान संप्रेषित करने के काबिल बनाती है।

हमें याद है कि हमारे घरों में हमारी दादियां और नानियां हमें ढेरों कहानियां मौखिक रूप से सुनाया करती थी और उन्हें वे कथाएं व कहानियां हमेशा के लिए सैकड़ों की तादात में जुबानी ही याद थी। उन कहानियों में मानवीय मूल्य, सामाजिक प्रेरणा और उदात्त भावनाओं के साथ – साथ मानवीय संबंधों को सुदृढ़ करने की एक विशेष परिकल्पना विद्यमान रहती थी। अतः कहना न होगा कि मौखिक साहित्य ने वैश्विक धरातल पर अपना जो योगदान समूची मानव जाति को दिया है, वह सचमुच अविस्मरणीय है।

दया, करुणा, मानवता, जिजीविषा, प्रेम, सामाजिकता, सहनशीलता, सहानुभूति, विश्वसनीयता, विनम्रता, मेहनत, धार्मिकता, आध्यात्मिकता और खोजबीन जैसे गुण यदि मनुष्य में विद्यमान हुए हैं तो इसका मुख्य साधन मौखिक साहित्य ही रहा है। मानव जाति को यदि सामाजिकता और निरन्तर खोजबीन का गुण मौखिक साहित्य न सिखाता तो आज के पढ़े लिखे एवं तर्क से परिपूर्ण समाज में अव्यवस्था फैल जाती।

कहना न होगा कि हम लोग पढ़े – लिखे आदिमानव कहलाते। यह बात जरूर है कि हर समाज एवं धर्म में अपनी-अपनी सृष्टि रचना का क्रम धार्मिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है, परंतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मनुष्य प्रकृति का एक अभिन्न अंग है और उसने अवश्य ही मौखिक साहित्य का सहारा लेकर के आज तक के समाज तक पहुंचते-पहचते बहुत प्रगति की है।

सेवा, साधना और समर्पण की भावनाएं यदि मनुष्य के भीतर किसी ने भरी है तो वह मौखिक साहित्य ने ही भरी है। वरना आज की पढ़ी – लिखी पीढ़ी में ये गुण दूर – दूर तक देखने को नजर नहीं आते। कारण यही है कि आज का बालक दादियों और नानियों की उन मौखिक कथा कहानियों को नहीं सुनता है। इसलिए उसके व्यवहार में प्यार कम और विकार ज्यादा प्रभावी हो रहे हैं। यह भी सत्य है कि विकार पाशविक प्रवृत्ति के द्योतक है।

2.लिखित साहित्य की देन : —

जहां मनुष्य के आंतरिक भावबोध और संस्कारों का निर्माण करना मौखिक साहित्य की देन रहा है, वहां मनुष्य के मन और मस्तिष्क के बाह्य सामाजिक और व्यवहारिक पक्ष को अधिक कलात्मक और रोचक बनाना लिखित साहित्य की देन है। यह बात जरूर है कि लिखित साहित्य बहुत लंबे समय के बाद अस्तित्व में आया। परंतु जो भूमिका लिखित साहित्य ने मनुष्य जाति के लिए अदा की है वह अपने आप में अभिन्न है। जब से लिखित साहित्य अस्तित्व में आया तब से मनुष्य ने अपनी छोटी-बड़ी सभी सामाजिक घटनाओं को लिखित रूप से संग्रहित करने की कला सीख ली और उसे अपने पास में संजो करके रखने का उपक्रम मनुष्य जान गया। यह साहित्य का वह पक्ष है जो किसी भी समाज विशेष की और किसी भी काल खण्ड की स्थिति को अपने में समेट कर भविष्य की पीढ़ी को आईने की तरह बीते समय का दिग्दर्शन करवाता है ।

जहां मनुष्य ने अपने व्यवहारिक पक्ष को इस साहित्यिक पक्ष के द्वारा मजबूत किया वहीं उसने अपने सामाजिक पक्ष को भी साहित्य के इस पक्ष से सुदृढ़ किया। यह साहित्य का वह पक्ष है, जिसने विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं का वैचारिक आदान – प्रदान सुनिश्चित किया। इसी ने अनेकों संस्कृतियों और सभ्यताओं को लिखित रूप देकर मानव समाज के लिए सुरक्षित रखा। यही वह पक्ष है, जिसने मनुष्य को योग्य एवम साक्षर बनाया। यही वह पक्ष है, जिसने मनुष्य में तर्क, विवेक, स्पर्धा और निरंतर संघर्ष करना सिखाया। अध्ययन और अध्यापन भी इसी पक्ष की देन है। आज के युग में अध्ययन एवं अध्यापन का जो महत्त्व बन गया है, वह किसी से नहीं छुपा है। अनुलेखन, प्रतिलेखन अभिलेखन, पत्राचार, शीला लेखन या फिर स्तंभ लेखन आदि सारे उपक्रम इसी कड़ी की देन है।

आज का मनुष्य यदि देश – विदेश में जा कर या फिर इंटरनेट के माध्यम से जो कुछ भी सीख रहा है या फिर अपना अनुभव वैश्विक धरातल पर संप्रेषित कर रहा है तो वह साहित्य की इसी कड़ी का सहारा लेकर सब कर रहा है। लिखित साहित्य के माध्यम से ही आज यह संभव हो पाया है कि प्राचीनतम से भी प्राचीनतम ज्ञान – विज्ञान से लेकर नवीनतम से भी नवीनतम ज्ञान – विज्ञान को हम आज तथ्यात्मक ढंग से खोजबीन करके पुष्ट कर सकते हैं और समझ सकते हैं। यह जब मर्जी तब कर सकते हैं। यही लिखित साहित्य की विशेष उपलब्धि है।

यदि यह आज तक भी मात्र मौखिक ही रहा होता तो निश्चित तौर पर इस के अधिकतम प्रमाणिक अंश का या तो कुछ जानकारों के संसार छोड़ने के साथ अन्त हो जाता या फिर इनमें स्वार्थ वश कई प्रक्षिप्त अंश जुड़ जाते, जो मानव समाज को पथ भ्रष्ट करते। यह सच है कि अभी भी मौखिक साहित्य का एक बहुत बड़ा भाग लोक किंवदंतियों और दंत कथाओं में ही प्रचलित है। उसका लिखित रूप अभी तक सामने नहीं आ पाया है। उसे शोध के साथ खोजबीन करके लिखित रूप में लाने की नितान्त आवश्यकता है। परन्तु फिर भी संसार भर की समस्त भाषाओं का विपुल लिखित साहित्य मानव समाज को बहुत कुछ दे रहा है और निरन्तर देता ही रहेगा।

निष्कर्ष — Conclusion :

सार रूप से यदि कहा जाए तो इन दोनो साहित्यिक पक्षों ने मनुष्य जाति को बहुत कुछ दिया है। आज यदि मनुष्य के पास जो कुछ भी ज्ञान – विज्ञान है तो उसका मूल कारण साहित्य ही है। फिर वह चाहे लिखित हो या मौखिक। मानव ने जो कुछ भी भावात्मक या विचारात्मक सांस्कृतिक और सामाजिक विकास किया है, वह साहित्य के बल पर ही किया है। यह बात अलग है कि साहित्य के भी दो पहलू हैं। एक नकारात्मक साहित्य और एक सकारात्मक। आम तौर पर समाज का अधिकांश वर्ग साहित्य के सकारात्मक पक्ष को ही स्वीकार करता है और उसी के सहारे नई पीढ़ी को दशा और दिशा प्रदान करता है। यही साहित्य की असली प्रदेयता है और महता है।

अतः कहना न होगा कि साहित्य का सकारात्मक सृजन पुष्ट समाज के निर्माण के लिए निरन्तर होते रहना चाहिए और उसके पठन – पाठन का भी कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार चलता रहना चाहिए। साहित्य ही समाज की वह ताकत है जो किसी समुदाय और समाज को वैचारिक और व्यवहारिक रूप से समृद्ध बनाती है। यदि ऐसा न होता तो विदेशी आक्रांता हमारी भारतीय साहित्यिक कृतियों को लूट कर अपने देश नहीं ले जाते। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि साहित्य की प्रदेयता हर युग में विशेष रही है और रहेगी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हम सभी को मिलकर भारतीय साहित्य, संस्कृति और संस्कार को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण करने का कार्य कारण हैं। साहित्य का सकारात्मक सृजन पुष्ट समाज के निर्माण के लिए निरन्तर होते रहना चाहिए और उसके पठन – पाठन का भी कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार चलता रहना चाहिए। साहित्य ही समाज की वह ताकत है जो किसी समुदाय और समाज को वैचारिक और व्यवहारिक रूप से समृद्ध बनाती है। यदि ऐसा न होता तो विदेशी आक्रांता हमारी भारतीय साहित्यिक कृतियों को लूट कर अपने देश नहीं ले जाते। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि साहित्य की प्रदेयता हर युग में विशेष रही है और रहेगी।

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यह लेख (साहित्य का प्रदेय।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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एक पाती : अपने आराध्य के नाम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक पाती : अपने आराध्य के नाम। ♦

एक कवि की कल्पना, एक लेखक की उड़ान की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए वह अपनी कल्पना में क्या सोचता है, किसका सृजन करता है इसके बारे में कई बार वो स्वयं भी नहीं जान पाता। इसलिए मैं अपने वादे के लिए किसी इंसान के बजाय उस सृष्टि के रचयिता से ही अपनी बात कहना चाहती हूं, क्योंकि मेरा सोचना थोड़ा अलग है कि क्यों ना हम अपनी इच्छाएं,अपनी आकांक्षाएं, अपना दु:ख, अपनी संवेदनाएं उस ईश्वर से ही साझा करें जो बदले में केवल शांति, सुकून, आलंबन और आशीर्वाद ही प्रदान करता है। ना कि वक्त आने पर हमारा ही मजाक उड़ा देता है जो कि इंसानी फितरत है।

• सर्वशक्तिमान ईश्वर कण-कण में विराजमान है। •

हम जानते हैं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर कण-कण में विराजमान है। ईश्वर का साकार, साक्षात रुप है यह अथाह समुद्र, यह विशालकाय पर्वत श्रृंखला, यह अविचल, अविरल धारा, ये अनन्त क्षितिज यह सब उसी का ही तो प्रमाण है, और सबसे जीवंत प्रमाण तो हम स्वयं है कि जिस में इतना कुछ उस ईश्वर ने डाला है कि एक जीवन भी उसके बारे मे समझने के लिए कम है। यदि हम यह महसूस करें कि जब हम बहुत प्रसन्न होते हैं तो हमारा मन हिलोरे लेता है कि हम अपनी खुशी को अधिक से अधिक उसके साथ बैठे जो हमारी खुशी को दुगना करें तो इस अवस्था में प्रकृति हमारे साथ हमारी खुशी को दुगना कर के हमें लौटाती है।

• आपने कभी सागर की लहरों को देखा है? •

आपने कभी सागर की लहरों को देखा है? यदि हम खुश हैं तो वह और उफन- उफन कर हमारी खुशी में लहरा कर नाचने का एहसास कराती हैं और हमें यह बताती हैं कि देखो; ….. हम तुम्हारी खुशी से कितने प्रसन्न है।

इसके विपरीत यदि हम दुखी हैं, खिन्न है, अकेले हैं तो मानो बार-बार आकर हमें आलिंगन करते हुए सांत्वना प्रदान करती हैं कि….. कोई बात नहीं यही दुनियां है, ये इसी तरह ही चलती है। मेरे (समुद्र के) मेरे पानी को ही देखो न…. न जाने कितने के आंसुओं को पी कर ही नमकीन हुआ है। इसलिए धैर्य रखो…… सब ठीक हो जाएगा… और थोड़ी देर में ही हम इन लहरों का सानिध्य पाकर अपने आप को शांत पाते हैं।

आप कितने ही लोगों के बारे में जानते होंगे जो दोनों ही अवस्थाओं में प्रकृति के सानिध्य में रहना पसंद करते हैं क्योंकि एक ईश्वर ही सत्य है, प्रामाणिक है, आदि अनंत है, यह हम सबका है और यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम सब ही उसके ना आज तक हुए हैं ना भविष्य में हो सकेंगे, क्योंकि पूर्ण समर्पण जिन्होंने भी किया है वह बहुत कम है।

• कुछ लोग ईश्वरीय सत्ता को मानते ही नहीं •

कुछ लोग ईश्वरीय सत्ता को मानते ही नहीं और कुछ ऐसे हैं जो अपने जन्म, अपनी क्षमताओं, को अपनी उपलब्धियों को केवल अपने से ही संबंधित मानते हैं और इसका श्रेय केवल स्वयं को देते हैं। इसमें उन्हें किसी का सहयोग, किसी का आशीर्वाद, किसी की तपस्या, किसी का देवत्व नजर ही नहीं आता है।
खैर… जाने दो।

यहां बात सिर्फ मेरी और मेरे परम मित्र ईश्वर की है। जहां वह मेरे इतने निकट है कि मैं उनसे अधिकार से भी बहुत कुछ कह सकती हूं। वह मेरे अपने हैं जिनसे लिपट कर मैं रो सकती हूं। जिनको मैं अपने आसपास महसूस कर सकती हूं। यह एक भाव है, एक पागलपन है जिसे समझने के लिए उच्च कोटि की संवेदना, सुकोमल हृदय, पवित्र भावनाएं, निष्ठा, भक्ति और समर्पण चाहिए।
..… तो मैं अपनी बात कहना चाहती हूं अपने परम मित्र ईश्वर से कि सुनो; तुम करो वादा ….…

तुम तो सर्वशक्तिमान हो, तो आज मुझसे यह वादा करो कि तुम जब भी नई सृष्टि की रचना करो तो उसमें इंसान को इतना ज़हरीला ना बनाना जितना वह बन चुका है। तुम वादा करो मुझसे कि ऐसे इंसानों को इस धरती पर जन्म ही नहीं दोगे जो केवल स्वार्थी हैं, केवल अपने ही बातें करते हैं, अपने ही कामों के प्रति सचेत हैं, आत्म प्रशंसा के अतिरिक्त उन्हें कुछ आता ही नहीं। वे इतने निष्ठुर हैं कि किसी इंसान की भावनाएं, उसकी सेवा, उसकी निष्ठा, उसका भोलापन, उसकी निश्चल संवेदनाओं को एक पल में कुचल कर रख देते हैं वह भी इतने नुकीले कीलों से कि लहूलुहान कर के रख देते हैं।
तुम वादा करो….. मुझसे अपनी इस नई सृष्टि में उन इंसानों को जन्म नहीं दोगे जो दरिंदे हैं, छोटी बच्चियों को नोच खाते हैं, विक्षिप्त मानसिकता के शिकार हैं।

• तुम वादा करो…… •

तुम वादा करो….. अपनी नई दुनिया में उन लोगों को जगह नहीं दोगे तो अपनी वासना के लिए, क्षणिक शारीरिक आनंद के लिए अपनी संतान को प्लास्टिक की थैली में जिंदा ही फेंक देते हैं। तुम्हारी इस अनूठी, अप्रितम, अतुलनीय सृजन शक्ति का इतना घिनौना रूप सामने लाते हैं। एक जीव को, एक जीवन को इस दुनिया में लाकर कुत्तों के खाने के हवाले कर देते हैं। कूड़े के ढेर में तुम्हारे ही स्वरूप को फेंक देते हैं, क्योंकि बच्चे तो साक्षात भगवान का ही स्वरूप होते हैं। अपने जिगर के टुकड़े को स्वयं से ही दूर कैसे कर लेते हैं ये लोग?
तुम वादा करो मुझसे….. अपनी इस नई दुनिया में कहीं भी धोखा, फरेब नहीं होगा। इंसान को इंसान समझा जाएगा क्योंकि आज के हालात तो ऐसे हैं कि….

“कहीं गीता में ज्ञान नहीं मिलता,
कहीं कुरान में ईमान नहीं मिलता,
अफसोस तो है कि इस दुनियां में
इंसान को,
इंसान में,
इंसान नहीं मिलता”।

उस दुनियां में जहां रिश्तों की, भावनाओं की कद्र होगी। जहां कान खजूरे की टांगों की तरह उतने ही लोगों के दंश नहीं होंगे, क्योंकि सांप और बिच्छू के डंक और जहर से तो बचा जा सकता है क्योंकि उनका ज़हर दिखाई देता है परंतु इंसानी ज़हर आत्मा को छलनी कर देता है। मैं बहुत परेशान हूं तुम्हारी इस दुनियां से जहां इतना पाप, इतना धोखा, इतना छल भरा हुआ है कि हिंसक जानवरों से तो बचा जा सकता है परंतु जो इंसानों का ही शिकार करें उनसे कैसे बचा जाए? तुम ही बताओ …..

अब तुम जो कहोगे मैं जानती हूं ……
तुम कहोगे कि मैंने तो यह सृष्टि बहुत सुंदर, निर्मल, निश्चल ही बनाई थी। परंतु तुम इंसानों ने ही इसे अपने कर्मों के द्वारा ऐसा बनाया है। जहां मेरा कीर्तन, मेरा नाम लेकर कितने गलत काम किए जाते हैं। मुझे ‘बनाते’ हो, मुझे ही सजाकर बाजार में बेचते हो, भला कौन ऐसा है जो मुझे ‘बना’ सके? मेरा ‘निर्माण’ कर सके? मेरी बोली लगा सके? और मेरी कीमत में भी मोल – भाव करते हो।

• मैं तो केवल श्रद्धा, भक्ति, भाव और प्रेम से ही बिक जाता हूं। •

किसमें इतनी हिम्मत है कि मुझे पैसों में खरीद सके ? अरे मैं तो केवल श्रद्धा, भक्ति, भाव और प्रेम से ही बिक जाता हूं। परंतु इन सब केआभाव में तुम कलयुगी मानवों ने मेरा कितना मजाक उड़ाया है?…… तुम अपराधी होकर भी मेरा स्वरूप होने की घोषणा करते हो…….. और स्वयं भगवान होने के दावे करते हो……. क्या मैं ऐसा हूं? ……. तुम मेरी शक्तियों का इतना दुरुपयोग करते हो, मेरा कितना दोहन करते हो। मुझ पर पत्थर फेंकते हो। परंतु मैं तो फिर भी तुम्हें मधुर फल ही देता हूं, और क्या – क्या बताऊं तुम्हें। यदि मैं बोलने पर आया तो तुम कोई भी नहीं सुन पाओगे …….।
इसलिए सिर्फ इतना ही कि यह सब तुम्हारे कर्मों का फल है और इस धरती को तुमने ही ऐसा बनाया है, मैंने नहीं।

मैं जानती हूं तुमने जो कहा है, सब सत्य है। पर मेरे परम मित्र, मेरे आधार, मेरे आराध्य…. इसलिए इतना होने के बाद भी तो सिर्फ तुमसे….. और सिर्फ तुमसे ही तो यह कह सकती हूं कि अगली सृष्टि में इंसान बनाना ही नहीं क्योंकि केवल वही ऐसे हैं जो सब दूषित करते हैं। मैं यह भी जानती हूं कि बहुत से अच्छे लोग भी हैं जो अपना जीवन मानवता, वैश्विक मूल्यों पर, प्रकृति प्रेम, भाईचारे पर ही, न्यौछावर कर देते हैं। पर इनकी संख्या बहुत कम है क्योंकि यही तो पृथ्वी की धुरी कहे जा सकते हैं। तभी तो पृथ्वी निराधार, निरंतर घूम रही है।
पर तुम वादा करो….. यदि ऐसे ही दुनिया बनाओगे तो ठीक है वरना फिर उसमें भी यही सब व्याप्त हो जाएगा और जितनी तकलीफ मुझे हो रही है उससे ज्यादा तुम्हें होगी। पर तुम तो बर्दाश्त कर लोगे पर शायद मैं ना कर पाऊं…. क्योंकि मैं थक चुकी हूं दोगले इंसानों से, इस नकली हंसी से, इस झूठी शख्सियतों से।
मैं नहीं चाहती इस दुनिया में रहना……

तुम वादा करो मुझसे…. मुझे अपने साथ ही रखोगे, अपने पास ही रखोगे, जब भी मैं आऊंगी तुम्हारे पास मुझे अपनी बाहों में भर कर अपने अनंत वक्षस्थल से जुदा मत करना। मुझे अपने पास ही रखना और नई दुनियां में इंसान मत बनाना और बनाना तुम्हारी मजबूरी हो तो कृपया मुझे इंसान नहीं बनाना। कुछ भी बनाना पर इंसान नहीं।

• मीरा की तरह…… •

नहीं झेल पाऊंगी दोबारा से यह सब। मैं टूट जाऊंगी, बिखर जाऊंगी। तुम तो सब समझते हो ना….. तुम तो मेरे अपने हो ना….. फिर तुम ऐसा नहीं करना….. तुम करो वादा कि मुझे फिर छलने के लिए नहीं छोड़ोगे। खुश रखने के झूठे वादे करने वालों से तुम मुझे बचाओगे। तुम अपने पास ही मुझे रखना… वहीं जहां झूठ फरेब, धोखे यह सब ना हो।

जहां अनंत, अगाध प्रेम हो…. निष्कपटता हो….. निश्छलता हो….. मासूमियत हो….. भावनाएं हो…..आलिंगन हो….. स्पंदन हो…. खुशी हो…. आत्मा हो….. चेतना हो……. स्पर्श हो…. समर्पण हो….. भाव हो….. एकैक्य हो….. सरलता हो…… सहजता हो……साम्य हो…… अनंतता हो….. और वो सब सिर्फ तुम्हारे पास है….. तुम्हारे साथ है….. इसलिए तुम करो वादा .. कि……

बस मीरा की तरह तुम में ही समा जाऊं….. तुम में खो कर, तुमको ही पा जाऊं….
बस तुम करो वादा…. तुम करो वादा……

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा अगर गंदगी किसी प्राणी ने किया है तो वो प्राणी इंसान ही है। चाहे बात प्रकृति को गन्दा करने की हो या अन्य गंदगी की वो सब इंसान ने ही किया है। पूरी पृथ्वी को नर्क बना दिया है इंसानो ने। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार के वशीभूत हो, विकर्म पर विकर्म करता चला जा रहा है आज का इंसान। सत्य व अच्छे कार्यों से दूर होता जा रहा है। अभी भी समय है तू संभल जा इंसान वर्ना सिर्फ पछताता रह जायेगा बाकि बचे हुए जीवन भर। तुम वादा करो मुझसे…. मुझे अपने साथ ही रखोगे, अपने पास ही रखोगे, जब भी मैं आऊंगी तुम्हारे पास मुझे अपनी बाहों में भर कर अपने अनंत वक्षस्थल से जुदा मत करना। मुझे अपने पास ही रखना और नई दुनियां में इंसान मत बनाना और बनाना तुम्हारी मजबूरी हो तो कृपया मुझे इंसान नहीं बनाना। कुछ भी बनाना पर इंसान नहीं।

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यह लेख (एक पाती : अपने आराध्य के नाम।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हिमाचली लोक संस्कृति में प्रभु श्री राम और दिवाली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦हिमाचली लोक संस्कृति में प्रभु श्री राम और दिवाली। ♦

हिमाचल का नाम सुनते ही हर किसी के मन व मस्तिष्क में बर्फ से ढकी हुई चोटियां और प्राकृतिक सौंदर्य से लवरेज वादियां एकदम से अपना परिदृश्य प्रस्तुत कर देती है। जिस तरह से हिमाचल का नाम पर्यटकों को अपनी ओर स्वतः आकर्षित कर लेता है ठीक उसी तरह हिमाचल की लोक संस्कृति भी पर्यटकों को अपनी ओर लुभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती।

एक सहज, सरल, सुबोध और आतिथ्य धर्मी हिमाचली संस्कृति में जब प्रभु राम का समावेश हो जाता है तो यह संस्कृति और भी भाव ग्राह्य और मनमोहक बन पड़ती है। हिमाचल की इस सुरम्य प्राकृतिक छटा के बीच यहां की लोक संस्कृति में राम कहां – कहां है और उनकी मान्यताओं की क्या – क्या परंपराएं हैं तथा वे कब से हिमाचली संस्कृति में समावेशित हुए? ऐसे अनगिनत सवालों का एक शोध परक अवलोकन कुछ यूं किया जा सकता है:—

1 » लोक मान्यताओं, गाथाओं और गीतों में राम:—

यह किसी से नहीं छुपा है कि हिमाचल की लोक भाषा पहाड़ी है। इसका अपना कोई लिखित प्रारूप न होने के कारण यहां की अधिकतर लोक गाथाएं और स्मृतियां लोकगीतों में ही श्रुति – स्मृति परंपरा से अद्यतन प्रचलित है। इन लोकगीतों में राम संबंधित लोकगीत लोक गाथात्मक प्रचलन में आज भी निम्नलिखित प्रकार से हिमाचली संस्कृति में अपना स्थान ज्यों का त्यों बनाए हुए हैं।

यह जरूर है कि वर्तमान परिपेक्ष्य में प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिमाचली संस्कृति के पुरातन ढर्रे को थोड़ी ठेस पहुंचाई है, परंतु अभी भी हिमाचली संस्कृति के संवाहक अपनी इन पारंपरिक धरोहरों को संभालने में लगे हुए हैं।पहाड़ी में गाई जाने वाली पहाड़ी रामायण इन लोकगीतों की शैली में आज भी हिमाचल के विभिन्न जिलों में भिन्न – भिन्न तहजीबों में गेय शैली में विद्यमान है। इन्हीं लोकगीतों में से कुछ लोकगीत इस प्रकार से हैं:—

राम कृपा से संबंधित लोक गीत:—

राज होंदे हुए भी हुआ वनवास,
ओ रामा मेरे जोगणुआ।………… 2

— • —

“सूणे भी ता लया यारो गंगा रे ओ तारूओ,
रामा लया लखणा जो तारे ओ जी……!”

— • —

“पैरा भी ता लया धोणे दैए ओ मेरे मालको,
इन्हा री धुडा़ कै बणदे पात्थरा री नारी ओ जी ….!
एओ आसा काठा री बणी री ओ नावा,
एओ बणी गई ता दुई दूई, आसा केथी पाणी ओ जी..?
एक ता पहले ही थोकड़ा जे टबर नी ओ पाल्दा,
तूसे देख्या बगाड़दे आसा री कहाणी ओ जी……!”

(सन्दर्भ: — “श्री दिला राम मिस्त्री” घाट, जिला मंडी।)
यह पहाड़ी रामायण का पद्य भाग महात्मा तुलसी एवं महर्षि बाल्मीकि रामायण के केवट प्रसंग से मेल खाता है। इसमें राम और लक्ष्मण को नदी से पार पहले ले जाने के लिए आग्रह किया गया है और प्रत्युत्तर में केवट राम के चरणों की धूलि का महत्व बताते हुए अपनी लकड़ी से बनी हुई नौका के नारी बनने के डर से उन्हें अपना पांव नौका में बैठने से पहले केवट के हाथों धुलवाने की प्रार्थना करते हैं।

केवट यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि कहीं प्रभु के अनधुले चरण नाव में पड़ने से केवट की गृहस्थी में किसी प्रकार का खलल न पड़ जाए और केवट के छोटे से परिवार का गुजर – बसर ही कहीं ठप न पड़ जाए। कहीं नाव के नारी बन जाने पर केवट के परिवार की रोजी रोटी सदा के लिए बंद न हो जाए और दो – दो पत्नियां केवट के लिए कलह का कारण न बन जाए। इस प्रकार की बात कह कर केवट राम के चरणामृत को चालाकी से प्राप्त कर लेना चाहता है। यह सब घटना श्रीराम द्वारा अंदर ही अंदर भांप ली जाती है और वे अपने पांव केवट से धुलवाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

राम रावण युद्ध संबंधी लोक गीत:—

“भाई जुद्ध लागो रे, रामो – रावण रा,
जुद्ध लागो रे, केसी री ताईए॥”

(संदर्भ: — श्री लाल सिंह सिरमौर से प्राप्त जानकारी।)
यह राम रावण युद्ध की पूरी गाथा गेय शैली में लोग बड़ी श्रद्धा से गाते भी हैं और इसके साथ – साथ छुकड़ा नृत्य भी करते हैं। यह नृत्य जलते हुई विशाल अग्निकुंड में देवताओं के गुरों (पुजारियों) द्वारा एक विशेष प्रकार के ऊनी वस्त्र को धारण करके छलांग लगाते हुए किया जाता है। हैरत अंगेज करने वाली घटना यह होती है कि इतनी भारी आग में प्रवेश करने के बाद भी वे नंगे पांव और ऊनी वस्त्र धारी गूर तनिक भी आग से नहीं झुलसते।

यह प्रक्रिया सिरमौर की गिरी पार की पहाड़ियों में तो होती ही होती है, इधर शिमला और सोलन आदि क्षेत्रों में भी यह छुकड़ा नृत्य एक विशेष अवसर पर कुतप वाद्य यंत्रों की पारंपरिक वैदिक धुनों के साथ किया जाता है। जब ऊनी वस्त्र धारी गुर लोग गले में चांदी की बनी मालाओं और हाथ में चांदी की बनी भाले जैसी छड़ी के साथ यह नृत्य करते हैं तो देखते ही बनता है। एक विहंगम दृश्य उत्पन्न होता है।

सिया लोकगीत: —

“सिया ऊबे बिउजाल, सिया ऊबे बिउजाल..2
लोखणा ढोन्दाणे पाणे,लोखणा ढोन्दाणे पाणे।
सिया किन्दे खे आए , सिया किन्दे खे आणे?…2
सिया रामा रे राणे, सिया रामा रे राणे……2
सिया पाणी खे लाओ रे, सिया पाणी खे लाओ ।
सिया ढोन्दे ने पाणी रे, सिया लान्दे ने पाणी।”

(संदर्भ: — श्री लाल सिंह सिरमौर से प्राप्त जानकारी।)
यहां वनवास के दौरान श्री लक्ष्मण नित्य प्रति सेवा करने के पश्चात उब जाने के कारण प्रभु श्री राम जी से माता सीता के प्रति शिकायत प्रकट करते हुए कहते हैं कि मैं नित्य प्रति पानी लाने जाता हूं और माता सीता तो दिन भर बैठी रहती है। वे तो कुछ भी नहीं करती है। ऐसी शिकायतों के चलते जब माता सीता पानी लाने स्वयं जाती है तो उनको मायावी मृग मिलता है। वे उस मृग को पकड़ने की जिद करती है। इसमें ठीक वही घटना आगे के गीत में दर्शाई गई है, जो प्रतिष्ठित रामायण में घटती है।

बरमा ने जाए “बिरसु” (बिरसु नाटी) :—

“थानों तेरो हनोले देवा, रोवे हनोले आये।
तेरी आए चरणो देवा, लोए महिमा गाए॥”
(देव हनोल की महिमा)

“बरमेना जाए रे देवा मेरा,
बरमेना जाए रे, बरमेना जाए रे।
हाटकोटी गाएने देवी दुर्गा माई रे ,
भूले देली बिसरो रास्ता लाई रे।
भूले देली बिसरो रास्ता लाई रे,
बिरसु पखवाणो बरये खे जाए रे।

—•—

तेरी जाणी हनोले देवा होले पाणी री कोई दाडीए,
त्यूणी सेटो मोड़ों दो रो सिहनी सोई रे,
बरमेना जाए बिरसु बरमे ना जाए रे।”

संदर्भ: — (श्री लाल सिंह सिरमौर से प्राप्त जानकारी।)
असल में यह गीत सिरमौरी लोक भाषा में देव हनोल (महासू राम) के गुर की घटना और महासु राम के शक्तिशाली प्रभाव का प्रचार करने के सम्बन्ध में गया जाता है।

असल में घटना यह है कि पुराने समय में देव का गुर लोगों से पाथा (फसल आने पर लोगों से अनाज के दाने देव सेवा हेतु लेना) इक्कठा करता था। देव हनोल महसूस राम के गुर ने बीच में यह प्रक्रिया इसलिए छोड़ दी क्योंकि उनके इलाके के रास्ते में घना जंगल था जिसमें एक शेरनी की गुफा थी और साथ में तौन्स (तमसा) नदी पर एक जर्जर लकड़ी का पुल खतरे का कारण था। इन के डर से गुर ने यह पाथा इकट्ठा करना बंद कर दिया था। परंतु देव महासू राम के प्रभाव से गुर को एक भयंकर प्रकोप होता है जिसके चलते उसे यह पाथा ग्रहण करने के लिए जना ही पड़ता है। वह शेरनी की गुफा से तो जैसे तैसे बच निकलता है, परंतु तौन्स नदी पर बने जर्जर पुल के टूट जाने से वह नदी में गिर जाता है। देव महासू राम की कृपा से गुर जी तो बच जाते है, पर उनका पाथा, शूप और डाल (अनाज इकट्ठा करने के सामान) नदी में बह कर यमुना नदी में जा मिले। वहां से वे बहते – बहते दिल्ली पहुंचे। वहां पर दिल्ली के राजा के मछुआरों ने उनको नदी में आया हुआ देखकर पकड़ कर बाहर निकाला और अपने बच्चों को खेलने के लिए दे दिया।

इस बीच दिल्ली के राजा के पेट से अजीब – अजीब जानवरों की आवाजें आने लगी। राजा ने इसके बारे में कई जगह छानबीन की। अंत में राजा को पता चला कि उसके राज्य में ऐसा – ऐसा देव महासू राम का सामान पहुंचा था, जिसे मछुआरों ने अपने बच्चों को खेलने के लिए दे दिया। उससे देव महासू राम राजा से नाराज है। तब राजा ने उन सभी सामानों को यथाशीघ्र हनोल में जाकर देव महासू राम के मंदिर में पहुंचाया। उस पर देव महासू ने राजा को प्रतिवर्ष लगने वाले भंडारे में नमक दंड के रूप में देने के लिए कहा। इस दंड को अदा करने के पश्चात राजा की वे अजीब – अजीब आवाजें सदा के लिए समाप्त हो गई। लोक मान्यता यह भी है कि आज भी दिल्ली से राष्ट्रपति भवन से वह नमक का पैकेट हनोल के इस बड़े मंदिर में नियमित रूप से प्रतिवर्ष भंडारे के लिए आता है।

देव महासू का मंदिर असल में भगवान राम का ही मंदिर है।

लोक मान्यता के मुताबिक उत्तराखंड में त्यूणी से लगभग 40 किलोमीटर दूर हनोल में बना देव महासू का मंदिर असल में भगवान राम का ही मंदिर है। यह एक पुरानी घटना है। इस जगह पर एक भयानक राक्षस रहता था। उस राक्षस के प्रकोप से निजात पाने के लिए, इस स्थान पर भगवान राम की प्रतिष्ठा कर के देव महासू के रूप में स्थापना की गई, जिसे बौठा (बड़ा) महासू कहा जाने लगा और इसके साथ – साथ इसी क्षेत्र के आसपास तीन और महासू मंदिर है, जिनका संबंध क्रमशः भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न से है। सिरमौरी लोग हाटकोटी होते हुए इस भव्य मंदिर की यात्रा पर प्रतिवर्ष श्रद्धा पूर्वक जाते हैं।

बरलाज लोक गीत (सोलन और शिमला): —

श्री जियालाल ठाकुर सोलन द्वारा प्रदत जानकारी के मुताबिक बरलाज का शुद्ध रूप बलिराज पूजन है। परंतु प्राकृत भाषा में चलता हुआ इसका अपभ्रंश रूप बरलाज बन गया। श्री जियालाल ठाकुर जी ने सन 2006 मैं ढोल नगाड़ों की थाप पर ‘राष्ट्रीय गान, राष्ट्रीय गीत और सारे जहां से अच्छा’ गीतों को वैदिक धुनों के ताल पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम के सामने गायन कर पेश किया गया था, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इसके साथ – साथ सन 2015 में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल आचार्य देवव्रत के समक्ष इन्होंने पहाड़ी रामायण (बरलाज) को कुतप वाद्य यंत्रों की वैदिक धुनों पर गा कर प्रस्तुत किया, जिसके लिए राज्यपाल महोदय ने इन्हें विशेष संस्तुति से नवाजा। हाल ही में इनकी एक शोध पुस्तक “विरासती संस्कृति का डंका” छप कर आने वाली है। अतः इस आधार पर इनके द्वारा प्रदत बरलाज संबंधी जानकारी विशेष महत्वपूर्ण है। इससे पहले कि इस विषय को गहनता से समझे, हमें कुतप वाद्य यंत्रों के बारे में जान लेना चाहिए। इसमें चार प्रकार के वाद्य यंत्र आते हैं, जो वैदिक परंपराओं से संबंध रखते हैं:—

अवनाद वाद्य : —

ढोल, नगाड़े, मृदंग, डमरु आदि चमड़ी द्वारा निर्मित वाद्य यंत्रों की धुने इस श्रेणी में आती हैं।

सुशीर वाद्य : —

शहनाई, शंख, करनाल, रणसिंगा, बांसुरी, तुरी, सिंगी आदि फूंक से बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों की धुने इसमें आती है।

घन वाद्य: —

थाल, घंटी, घड़ियाल, करताल आदि धातु द्वारा बने हुए वाद्य यंत्रों से निकलने वाली धुने इस श्रेणी में आती है।

तार वाद्य: —

एक तारा, तुंबा, वीणा, धनतारू या धनोटू, सारंगी आदि तार से बजने वाले वाद्य यंत्रों की धुने इस श्रेणी में आती है।

नोट: — इन सभी वाद्य यंत्रों के एक साथ सामूहिक वादन को नवगत ताल के नाम से भी जाना जाता है, जिससे नवग्रह प्रसन्नता के साथ – साथ देव पूजन भी किया जाता है। श्री जिया लाल ठाकुर के मुताबिक बरलाज गायन की परम्परा त्रेता काल से ही हिमाचल में प्रचलित थी। यह पहले कार्तिक अमावस्या के दिन विशेष तौर से गाई जाती थी। इसके पीछे वे रामायण से संबंधित एक ऐतिहासिक घटना का जिक्र करते हैं।

उनके अनुसार जब पताल के राजा अहिरावण ने रावण के अनुरोध पर छल से राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में नागपाश से फांसकर अचेत करके चुपके से पहुंचाया था तो उनकी जगह – जगह खोज करने के बाद भी कोई जानकारी हासिल नहीं हो पा रही थी। तत्कालीन पाताल के राजा अहिरावण उनकी बलि पाताल की देवी “सकला” को चढ़ाने वाले थे। इस बीच राक्षसी माया से सभी दैवीय शक्तियां अवरुद्ध की जा चुकी थी। ऐसे में जब महाराज बलि अपने भगवान “वामन” के पास यह सूचना लेकर आते हैं कि श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी इस तरह से पाताल में अचेत पड़े हैं, उन्हें बचा लो। वरना उन्हे कुछ ही देर में “सकला” देवी को भेंट चढ़ा दिया जाएगा। यह खबर सुनकर भगवान “वामन” पृथ्वी पर हनुमान जी से मिलने आते हैं और उन्हें सारी कहानी सुनाकर सचेत करते हैं। क्योंकि उनकी शक्तियां उन्हें स्मरण कराने पर पुनः जागृत हो जाया करती थी।

हनुमान जी – सूक्ष्म रूप बनाकर प्रविष्ट।

बाकी सभी शक्तियां असुरी माया के वश में की जा चुकी थी। तब हनुमान जी क्रोधित होते हैं और पाताल लोक में जाकर पाताल लोक के राजा की मालिनी के हाथ की फूल माला में सूक्ष्म रूप बनाकर प्रविष्ट हो जाते हैं, जो फूल मालाएं देवी सकला को चढ़ाने के लिए वह मालिन राजा के आदेश पर हर रोज की तरह ले जा रही थी। उन फूल मालाओं के माध्यम से हनुमान सकला देवी तक पहुंचते हैं और उस मूर्ति के अंदर प्रविष्ट हो जाते हैं। अब मूर्ति के अंदर से हनुमान स्वयं तरह – तरह की आवाजें निकालते हैं। असुरों द्वारा पेश किया गया सब कुछ चट कर जाते हैं। असुर यह समझते हैं कि आज तो हमारी कुलदेवी बहुत प्रसन्न है जो हमारे द्वारा प्रस्तुत किया गया यह बहुत कुछ खा गई।

ऐसे में हनुमान पूर्ण रूप को धारण करते हुए असुरों के सामने प्रकट होते हैं और भयंकर युद्ध करके उन सब का नाश करके अपने प्रभु श्री राम और लक्ष्मण को पाताल लोक से छुड़वा कर ले आते हैं। इस समय जब हनुमान श्री राम और लक्ष्मण को पाताल से ले आ रहे थे, तो श्री राम जी ने महाराज बलि को इस कृतज्ञता के लिए एकवचन दिया कि आज से हर कार्तिक अमावस्या को धरती पर मेरे नाम के साथ – साथ आपके नाम की भी लोग पूजा किया करेंगे।

अतः बरलाज को तब से हर कार्तिक मास की अमावस्या को गाया जाने लगा। इसमें महाराज बलि का पूजन भी लोग भगवान वामन और भगवान राम के साथ – साथ विधिवत करते थे और बरलाज का गायन कर श्री राम के गुणगान के साथ – साथ बलि की कृतज्ञता और महानता का भी गुणगान करते थे। परंतु इसमें भी बीच में किन्हीं कारणों से कहीं व्यवधान पड़ा।

फिर इस बरलाज को द्वापर काल में पांडवों के द्वारा पुनर्जीवित किया गया। पांडवों ने अपनी पहली बरलाज सोलन में बीड धार की चोटी पर गाई थी। उन्होंने इस धार की चोटी पर अपने अज्ञातवास के दौरान एकादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की थी और उनकी पूजा अर्चना करके बरलाज गायन का पुनरुत्थान किया था।

सर्यांजी नामक गांव में पांच पांडवों के मंदिर

तब से यह परंपरा आज तक निर्वाहित होती आई है। आज सर्यांजी नामक गांव में पांच पांडवों के मंदिर बने हैं। वहां से प्रतिवर्ष पांच पांडवों की जातर (मेला जलूस) बीड़ धार तक जाती है। फिर रात को गुरु लोग मुद्रो (हाथ मुंह धोकर के अच्छी तरह से ब्रश करके कुला आदि करने के पश्चात निर्जल व्रत रखना) बांधते हैं और फिर कहीं भी नहीं जाते हैं। तब सारी रात वे गुरु लोग अन्य सिर्फ पुरुष लोगों के साथ छुकडा नृत्य रात को करते हैं, जिसमें वे ऊनी वस्त्र धारण कर नंगे पांव से अपनी जटाएं फैला कर भारी अग्निकुंड में भी प्रवेश करते हैं। उससे भी उनका कुछ नहीं बिगड़ता।

यह सारा नृत्य कुतप वाद्य यंत्रों की धुनों से विधिवत देव पूजन करके बरलाज गायन के साथ किया जाता है। सुबह मुद्रो खोल दिया जाता है और महिलाओं के साथ “सिया समृति” गायन गाते हुए सामूहिक नृत्य किया जाता है और उत्सव समाप्त किया जाता है। श्री जिया लाल ठाकुर के अनुसार यह गायन गायत्री छंद और देश तथा कल्याण राग के आधार पर गाया जाता है। अब लोग परंपरा के अनुसार यह बरलाज गायन हर वर्ष सायर पर्व (अश्वनी मास की संक्रान्ति) से शुरू किया जाता है और मकर संक्रान्ति को समाप्त किया जाता है। इस गायन में भगवान राम से संबंधित सोलह संस्कारों को लोग क्रमबद्ध इस लंबे अंतराल में कथा के रूप में गाते हैं और प्रभु श्री राम के सद चरित्रों का बखान करते हैं। प्रभु के जन्म से लेकर निर्वाण तक का पूरा वृतांत गायन शैली में वर्णन किया जाता है। यह परंपरा हिमाचल के विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों में भी कुछ यूं ही लंबे अंतराल तक विद्यमान रही है। हमारे यहां मंडी में एक प्रसिद्ध कहावत है: —

“जौ कणक निसरी, कथा बझुणी बिसरी।”

अर्थात शरद ऋतु शुरू होते ही लोग घरों – घरों में झुंढों में इकट्ठा होते थे और कथाएं गा – गा कर सुनते – सुनाते थे। जैसे ही जौ और गेहूं में वालियां निकलती थी, तब वे सब भूल जाया करते थे। क्योंकि फिर उन पर काम का बोझ पड़ जाता था। उक्त घटना के अनुसार सोलन और शिमला के आस – पास गाई जाने वाली बरलाज के कुछ अंश: यूं देखे जा सकते हैं: —

भगवान वामन और महाराजा बली वृतांत: —

“उटा – उटा बामणा डबारीरे डेवा …..2
वारी पारी बामणा मारी गंगा री छाला….2
मांगी लो बे बामणा रे दाण,
मांगी लो बे बामणा रे ss दाण।
जे त मांगे, ताखे देऊ प्रमाण…2
जेओडी जेई राजेया माखे दाणो री देणी …2
जेओडी बिना बोलणी जिशे बासुकी नागे …2
ढाई कदम राजेया माखे पृथ्वी देणी ……2
एकी बीखे नापेया से आधा संसार ……..2
दूजी बीखे नापेया से सारा संसार ……….3
तीजी बीखो खे जगा न रोए ……..2
राजा बलिए कनगी ढाली …………..2″

हनुमान का श्री राम एवं लक्ष्मण को बचाने हेतु जाना: —

“रामा लखणा रे बले लाए देणी ……2

—•—

हणो बे हुन्दरिया मेरा, हणो बे हुन्दरिया मेरा।”
(हुन्दरिया का अर्थ क्रोधित होना )

“कणदी ढणदी फूल मालण आई ………2
आजकै जे फूलणो बड़े गरकै होए ……..2
मुंह मांगे भोजनो म्हारी देविए खाए,
शौ घड़े दुधा रे म्हारी देविए पीए ………..2

—•—

बोलो हणो बे हुन्दरिया मेरा……………2″

ये सारे प्रमाण सोलन, सिरमौर और शिमला आदि के इलाकों में दीपावली के अवसर पर या फिर किसी संक्रांति, विवाह आदि उत्सवों के अवसर पर विशेष तौर में स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले लोक मंचनो में देखने को मिल जाते हैं। यदि श्री जिया लाल ठाकुर की माने तो हिमाचल वैदिक संस्कृति का गर्भ गृह रहा है। ठाकुर साहब किन्नौर जिले को वैदिक संस्कृति का प्रमुख केंद्र मानते हैं।

कुल्लू घाटी की लोक प्रचलित मान्यता एवं श्रीराम से संबंधित घटनात्मक गाथा: —

इधर कुल्लू घाटी में भगवान राम के हिमाचली संस्कृति में प्रवेश को लेकर एक अलग प्रकार की लोक प्रचलित मान्यता एवं कथा है। यहां के लोगों का मानना है कि वर्तमान में जो जिला कुल्लू के मुख्यालय में स्थित सुल्तानपुर में श्री रघुनाथ जी का मंदिर है, उसकी मूर्तियां श्री त्रेता नाथ मंदिर श्री अयोध्या धाम से लाई गई थी। इसके पीछे यहां के स्थानीय लोग एक बहुत पुरानी रोचक कहानी सुनाते हैं। लोगों का मानना है कि सन 1637 से 1662 तक कुलूत राज्य की राजगद्दी पर एक धर्मात्मा एवं प्रतापी राजा “श्री जगत सिंह” जी विराजमान रहे। उन्होंने 1637 ई में राजगद्दी संभाली। एक दिन उनसे टिप्परी गांव के एक ब्राम्हण “दुर्गा दत्त “की अनजाने में हत्या हो गई। उस ब्राम्हण की आत्मा ने उन्हें ब्रह्महत्या का शाप दे डाला, जिसके चलते उन्हें हर वक्त के भोजन में छोटे – छोटे कीड़े मकोड़े ही दिखाई देने लगे और धरती का सारा पानी खून जैसा लाल नजर आने लगा। ऐसे में राजा को कुछ भी खाना पीना बहुत ही मुश्किल हो गया। इसके साथ – साथ राजा के शरीर में कुष्ठ रोग निकल आया।

सुप्रसिद्ध एवं सिद्ध संत “कृष्णदास पयहारी” जी

उन्हीं दिनों शहर के समीप ही एक वैष्णो संप्रदाय के सुप्रसिद्ध एवं सिद्ध संत “कृष्णदास पयहारी” जी रहते थे। वे सिर्फ पेय पदार्थों का ही सेवन करते थे। किसी प्रकार का अन्य – फल आदि नहीं खाते थे। इसीलिए उनके नाम के साथ पयहारी लगाया जाता था। परंतु स्थानीय लोगों में “फुहारी बाबा” के नाम से ही जानते थे। यह अपभ्रंश रूप ही इलाके में प्रसिद्ध था।

राजा ने अपनी समस्या का समाधान जगह – जगह करवा लिया था। हर देवी – देवता और वैद्यों के पास जा – जा कर के राजा थक चुका था परंतु किसी से भी कोई राहत मिलती हुई नजर नहीं आ रही थी। एक दिन राजा फुहारी बाबा के पास अपनी समस्या लेकर उपस्थित होते हैं। राजा की समस्या को सुनकर के फुहारी बाबा ने अपनी सिद्धि शक्ति से उनका भोजन में कीट पतंगे दिखना और पानी का खून जैसा लाल दिखना तो तुरंत प्रभाव से ठीक कर दिया था परंतु उनका कुष्ठ का रोग फिर भी ठीक नहीं हो सका था। इस बीच राजा इस चमत्कार को देखकर के प्रभावित होकर फुहारी बाबा का शिष्य बन गया। बाबा ने राजा को भगवान नरसिंह की मूर्ति दी। राजा ने वह मूर्ति अपनी राजगद्दी पर विराजमान करवा दी और स्वयं एक छड़ी दार (प्रधान सेवक) की भूमिका में राज्य की सेवा करने लगे।

बाबा की चमत्कृत करने वाली अपार सिद्धि शक्ति से राजा बहुत प्रभावित हुआ और उनकी धार्मिक भावना और भी बलवती हो गई। एक दिन फिर से राजा बाबा के पास अपने कुष्ठ रोग निवारण हेतु प्रार्थना लेकर गए। तब बाबा ने उन्हें सलाह दी कि इस रोग को खत्म करने की क्षमता सिर्फ और सिर्फ त्रेता नाथ श्री रघुनाथ जी के ही पास है। अतः इसके लिए तुम्हें श्री अयोध्या धाम में विराजमान श्री त्रेता नाथ जी की मूर्ति और माता सीता जी की मूर्ति को यहां ले आना होगा। मूर्तियों को अयोध्या से ले आने के लिए बाबा ने अपने शिष्य “पंडित दामोदर दास” को भेजा, जो उन दिनों की सुकेत रियासत में रहते थे। आजकल यह सुकेत रियासत जिला मंडी का सुंदर नगर कस्बा है।

वैदिक रीत में किसी भी मूर्ति का असली माप

पंडित दामोदर दास जी बाबा के आदेशानुसार श्री अयोध्या धाम पहुंचे और वर्षभर वहां श्री रघुनाथ जी के पूजन अर्चन की विधियां और सारे क्रियाकलापों को गौर से देखा। फिर एक दिन सुअवसर आने पर वे भगवान श्री रामचंद्र और माता सीता की त्रेता काल में बनी मूल मूर्तियों को उठाकर कुल्लू की ओर चल दिए। लोक मान्यता है कि ये मूल मूर्तियां त्रेता काल में भगवान श्री रामचंद्र जी ने स्वयं ही अपने अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर बनाई थी। ये अंगुष्ट प्रमाण है। वैदिक रीत में किसी भी मूर्ति का असली माप यही माना जाता है। वैदिक रीति में यह मान्यता है कि मूर्ति का माप अंगुष्ट प्रमाण होना चाहिए। क्योंकि मूर्ति आत्मा का प्रतिरूप होती है। जिस प्रकार आत्मा अति सूक्ष्म होती है, दिखाई ही नहीं देती। उसी प्रकार मूर्ति भी अति लघु होनी चाहिए। अतः वे मूल मूर्तियां है, जिन्हें आज भी कुल्लू में बने श्री रघुनाथ जी के मंदिर में पर्दे के अंदर रखा जाता है। इनके दर्शन किसी को नहीं करवाए जाते। किसी विशेष घड़ी या स्थिति में इनका दर्शन प्राप्य है। परंतु आम दिनों में इनको परदे से बाहर नहीं किया जाता।

लोक मान्यता

लोक मान्यता के अनुसार पंडित दामोदर दास चलता – चलता जब मंडी रियासत में वर्तमान कनैड नामक स्थान पर पहुंचा तो वहां उन्होंने मूर्तियों समेत रात्रि विश्राम किया। अतः लोगों ने वहां भी मंडी के राजा की मदद से एक पुरातन शैली में राम मंदिर का निर्माण कर डाला। वहां से पंडित जी मणिकरण पहुंचे और उन मूल मूर्तियों को मणिकरण में ही स्थापित किया।

वहीं पर अयोध्या की रीत से नित्य प्रति रघुनाथ जी की पूजा अर्चना होने लगी। राजा जगत सिंह भी नित्य प्रति प्रभु श्री राम और माता सीता के चरणामृत को ग्रहण करने सुबह – सुबह मणिकरण पहुंच जाते। कुछ दिनों यह सिलसिला चला। कुछ दिनों बाद राजा का कुष्ठ रोग चरणामृत के पान से नदारद हो गया। इससे राजा की धार्मिक भावना और बलवती हुई। यह खबर जब इलाके में फैली तो मूर्तियों के चमत्कार से प्रभावित होकर कुल्लू घाटी के सभी देवी देवता मूर्तियों का दर्शन करने मणिकरण आ पहुंचे।

कुल्लू का राज्य रघुनाथ जी के नाम

तब राजा श्री राम जी और माता सीता की मूर्तियों को मणिकरण से कुल्लू सुल्तानपुर में स्थित रघुनाथपुर ले गए। वहां उन्होंने श्री रघुनाथ जी के भव्य मंदिर का निर्माण किया और उसी में मूर्तियों को विधिवत प्रतिष्ठित एवं स्थापित किया। तब से लेकर राजा ने अपनी राजगद्दी पर रघुनाथ जी को विराजमान करवाया और स्वयं उनका छड़ी दार (प्रधान सेवक) होकर रहने की घोषणा की। इसके साथ – साथ राजा ने अपने राज्य के अलग – अलग इलाकों को 365 देवी – देवताओं में बतौर जागीर बांट दिया। तब से कुल्लू का राज्य रघुनाथ जी के नाम पर चलने लगा और राज्य के भिन्न-भिन्न क्षेत्र देव जागीरों के नाम से चलने लगे।

लोक मान्यता यह भी है कि तभी से प्रतिवर्ष कुल्लू के ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में दशहरे का मेला आयोजित होने लगा। इस मेले में सुल्तानपुर से एक लकड़ी के बने भव्य रथ पर रघुनाथ जी की सवारी निकलती है और उनके पीछे जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए समस्त देवी देवताओं की एक विशाल जलेड लोक वाद्य यंत्रों की धुनों के साथ- साथ भारी जनसैलाब के साथ निकलती है। इस प्रकार लगभग 40 छोटे – बड़े उत्सव कुल्लू में रघुनाथ जी की अध्यक्षता में आयोजित किए जाते हैं। तब से ले कर आज तक श्री रघुनाथ जी को कुल्लू का प्रधान देवता माना जाने लगा। असल में श्री रघुनाथ जी भगवान श्री राम के ही रूप है।

संदर्भ: —
१. श्री सुदेश कुमार कुल्लू से प्राप्त जानकारी।
२. श्री रघुनाथ जी मंदिर में चस्पा की गई इतिहास पट्टीका।)

हिमाचल में राम मंदिर: —

हिमाचल के कुछ एक राम मंदिरों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से हैं: —

श्री रघुनाथ जी मंदिर जिला कुल्लू: —

यह मंदिर जिला कुल्लू के सुल्तानपुर बाजार में रघुनाथपुर में सन 1637 से 1662 ईसवी के बीच राजा जगत सिंह के द्वारा बनाया गया माना जाता है। यह कुल्लू के बस स्टैंड से थोड़ा सा ऊपर को बना हुआ है। पैदल पौडियों वाले रास्ते से यहां तक पहुंचा जाता है। इस मंदिर की बाकी विशेषताएं ऊपर विस्तार से बताई जा चुकी है। वर्तमान में भगवान श्री राम और सीता जी की भव्य मूर्तियां इस मंदिर में स्थापित की गई है। यहां वर्ष भर प्रतिदिन श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। यह मंदिर कुल्लू जिला के प्रधान देव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

मणिकरण में स्थित राम मंदिर: —

यह मंदिर मणिकरण नामक तीर्थ स्थल पर बना हुआ है। हिंदू लोग इस मंदिर परिसर में बने हुए गरम पानी के कुंडों में स्नान कर के अपने पापों का प्रक्षालन करते हैं। यहां स्त्री और पुरुषों के लिए अलग – अलग स्नान ग्रह बनाए गए हैं। जिनका नाम रामकुंड और सीता कुंड के नाम से रखा गया है। राम कुंड में पुरुष स्नान करते हैं और सीता कुंड में स्त्रियां स्नान करती है। वर्ष भर में लाखों श्रद्धालु इस तीर्थ स्थल में स्नान करने आते हैं।

गर्म पानी के चश्मे से संबद्ध राम और सीता कुंड में स्नान करके अपने पापों को धुला हुआ प्रतीत करते हैं। इसी विशेष तीर्थ यात्रा के दौरान सभी श्रद्धालु भगवान श्री रामचंद्र के मणिकरण स्थित इस भव्य मंदिर के भी विधिवत दर्शन करते हैं और प्रभु राम की कृपा प्राप्त करते हैं। इस मंदिर में नित्य प्रति प्रभु कृपा से श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का भी आयोजन किया जाता है। इस मंदिर के प्रांगण में लकड़ी का बना हुआ एक भव्य रथ भी हमेशा मौजूद रहता है। मान्यता है कि इस रथ पर प्रभु राम जी की सवारी विशेष अवसरों पर निकाली जाती है।

जिला मंडी में राम मंदिर: —

जिला मंडी में भगवान राम के दो मंदिर है: —

  1. सनातन धर्म सभा राम मंदिर भगवाहण मोहल्ला मंडी बाजार। यह मंदिर जिला मंडी के उपायुक्त कार्यालय के ठीक पीछे बना है। इस मंदिर में भगवान श्री राम, लक्ष्मण एवं माता सीता की मूर्तियां विराजमान है। लोग वर्षभर प्रतिदिन यहां दर्शन करने आते हैं। सुबह – शाम की पूजा अर्चना और आरती इत्यादि में बराबर भाग लेते हैं। नवरात्रों के दिनों या फिर किसी राम कथा के आयोजन के दिनों यहां विशेष जन भीड़ उमड़ पड़ती है।
  2. यह एक पुरातन शैली में पत्थरों से बना हुआ राम मंदिर है, जिसमें भगवान श्री राम और सीता जी की मूर्तियां विराजमान है। यह मंदिर कनैड के पास बना हुआ है। इसका जिक्र भी ऊपर किया जा चुका है। परंतु वर्तमान समय में यह जीर्ण अवस्था में है। इसको पुनरुत्थान की आवश्यकता है। यहां लोगों का आना जाना आज बहुत कम है। (ग) यहां करसोग में भी राम मंदिर बना है।इस बाबत कोई खास जानकारी यहां उपलब्ध नहीं हो पाई है।

सूद सभा राम मंदिर शिमला: —

यह मंदिर जिला शिमला में बस स्टैंड के साथ ही रिज मैदान के नीचे को बना हुआ है। यह एक बहुत ही भव्य मंदिर है। इसके ठीक सामने जाखू में भगवान हनुमान का मंदिर है। शिमला के इस मंदिर में भगवान राम लक्ष्मण और माता सीता की मूर्तियां विद्यमान है। यहां भी नित्य प्रति श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है।

महासू राम मंदिर सिरमौर: —

हिमाचल के जिला सिरमौर का इलाका उत्तराखंड की सीमा से सटा हुआ है। यहां देव महासू के जितने भी मंदिर है उन सब मंदिरों में भगवान श्री रामचंद्र जी की ही प्रतिस्थापना मानी जाती है। इन मंदिरों का जिक्र भी ऊपर किया जा चुका है। असल में मूल महासू (बौठा महासू) मंदिर आज उत्तराखंड में त्यूणी से लगभग 40 किलोमीटर आगे मुख्य सड़क पर ही है। इसके साथ साथ तीन और महासू मंदिर यहां पर विद्यमान है, जिनमें क्रमशः भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न की प्रतिस्थापना मानी जाती है। इनके साथ साथ हनुमान, जामवंत, अंगद, सुग्रीव जैसे वानर वीरों की भी इन क्षेत्रों में पूजा अर्चना बौठा महासू के साथ की जाती है। बौठा महासू स्वयं भगवान राम ही है। इन्हीं मंदिरों के प्रारूप सिरमौर जिला की गिरी पार की पहाड़ियों में जगह – जगह बने हैं और लोग इन्हें बड़ी श्रद्धा से पूछते हैं।

जिला चंबा के मुख्य बाजार का राम मंदिर: —

जिला चंबा में मुख्य बाजार के साथ ही एक राम मंदिर बना हुआ है। वहां भी काफी श्रद्धालु आते रहते हैं। सुनने में आता है कि इस मंदिर की मूर्तियां कुछ समय पहले चोरी हुई थी। बाद में वे मुंबई में मिली थी।

हरिपुर राम मंदिर धर्मशाला कांगड़ा: —

यह मंदिर बनेर खड्ड के मुहाने पर हरिपुर नामक स्थान पर बना हुआ है। इसमें भी भगवान श्री रामचंद्र और लक्ष्मण के साथ-साथ माता सीता की मूर्ति स्थापित की गई है। इस मंदिर के निर्माण में अलग-अलग प्रकार की मान्यताएं। कुछ लोग इसे 825 वर्ष पुराना मानते हैं तो कुछ लोग इसे 1398 ईसवी से 1405 ईसवी के बीच राजा हरिचंद के द्वारा बनाया हुआ मानते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार यह मंदिर पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान बनाया था। डॉ योगेश रैना की टिप्पणी को अगर ध्यान में रखें तो उनके अनुसार यह मंदिर 825 वर्ष पुराना है। उनका मानना है कि मंदिर में 825 साल पुराने एक घंटे में तिथि अंकित है। इसलिए यह मंदिर उसी कालखंड में बना होगा। कांगड़ा जिले में शायद ही ऐसा दूसरा कोई राम मंदिर हो। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां की मिट्टी हाल ही में श्री अयोध्या जी में बनने वाले भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए भी ले गए हैं।

भव्य राम मंदिर निर्माण श्री अयोध्या धाम के विषय में कांगड़ा के पालमपुर स्थित रोटरी भवन का जिक्र आजकल खासा चर्चा में है। कहा जाता है कि लगभग 500 सालों से लटके हुए भव्य राम मंदिर निर्माण मामले की रूपरेखा इसी रोटरी क्लब में हुई 9 जून से लेकर 11 जून 1989 तक की भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक मैं तैयार की गई थी। इस बैठक का आयोजन पूर्व मुख्यमंत्री श्री शांता कुमार जी ने तत्कालीन राष्ट्रीय भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी जी और भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेई जी के निर्देशानुसार किया था। इसमें भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बहुत से नेताओं ने हिस्सा लिया था। इसी बैठक में वर्तमान में अयोध्या में बनने वाले भव्य राम मंदिर का प्रारूप तैयार किया गया था और पूरे का पूरा मसौदा बनाकर राम मंदिर के मुद्दे पर आगामी रणनीति बनाई गई थी। राजनीतिक विशेषज्ञों की टिप्पणियों को यदि ध्यान में रखा जाए तो यही वह बैठक थी जो 1984 में मात्र 2 सीट वाली भाजपा को 1989 में 85 सीटें प्रदान करवाती है। अतः श्री अयोध्या धाम के भव्य राम मंदिर में हिमाचली संस्कृति की ओट में लिए गए इस अहम निर्णय का भी एक विशेष महत्त्व सुनहरे अक्षरों में सदा के लिए चिन्हित रहेगा।

इसके अतिरिक्त भी कई देवताओं के नाम से या फिर स्वयं भगवान श्री रामचंद्र जी के नाम से राज्य के विभिन्न जिलों में और भी मंदिर स्थित है, जिनका जिक्र अधूरी खोज के चलते यहां करना उचित नहीं है।

हिमाचली लोक यात्राओं में राम: —

लोक यात्रियों के रूप में हिमाचल में मात्र सिरमौर जिले के लोग ही उत्तराखंड में स्थित हणोल बौठा महासू मंदिर की यात्रा के लिए प्रतिवर्ष विधिवत जाते हैं। यह यात्रा पहले पैदल की जाती थी परंतु आज के दौर में इस मंदिर तक सड़क बनी हुई है और अब यह यात्रा गाड़ियों पर की जाती है। इस यात्रा के लिए लोग रोहडू से हाटकोटी होते हुए त्यूणी से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर तक यात्रा करते हैं और वहां पर बौठा महासू के रूप में भगवान श्री रामचंद्र जी के दर्शन करके अपने – अपने घरों को पुनः प्रभु का आशीर्वाद लेकर लौट आते हैं।

यहां कुल्लू जिले में स्थित मणिकरण की तीर्थ यात्रा भी श्री राम जिसे आँशिक संबंध रखती है। परंतु मूलतः लोग इस स्थान पर मणिकरण स्नान की दृष्टि से जाते हैं। ऐसे में इसे विशुद्ध राम दर्शन यात्रा नहीं कहा जा सकता।

लोक अभिवादनों और संस्कारों में राम : —

अभिवादन के रूम से हिमाचल के लोग सुबह उठकर ही आपस में एक दूसरे को “राम – राम” कह कर प्रणाम करते हैं, जिसकी जगह वर्तमान में गुड मॉर्निंग धीरे-धीरे ले रहा है। परंतु फिर भी अधिकांश पहाड़ी लोग “राम-राम” कह कर ही अपना अभिवादन प्रस्तुत करते हैं। हां नई पीढ़ी में इस संबंध में कुछ विकार आ चुका है परंतु पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी इसी परंपरा को अपनाए हुए हैं। संस्कार के नाम पर मृत्यु संस्कार के समय “राम नाम सत्य है” का जय घोष भी भारत की अखंड संस्कृति के अद्वितीय नियमों के अनुसार ही हिमाचली लोग भी बखूबी करते हैं।

तीज – त्योहारों और उत्सव में राम: —

  1. त्योहारों के रूप में एक तो हिमाचल में कार्तिक मास की अमावस्या को समूचे भारतवर्ष की तर्ज पर प्रभु राम की स्मृति में दिवाली का पर्व मनाया जाता है। परंतु हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र की मान्यता के अनुसार यह पर्व महाराज बलि की कृतज्ञता हेतु भगवान श्री रामचंद्र जी के वचनानुसार हिमाचल में मनाया जाता है न कि उनके अयोध्या पुनरागमन की खुशी पर। परंतु वर्तमान में यह समूचे भारतवर्ष की तरह भगवान राम के अयोध्या वापस लौटने के पुनरागमन की खुशी का पर्याय ही बन गया है।
  2. दूसरा राम से संबंधित त्यौहार हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में “बूढ़ी दिवाली” का मनाया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार हिमाचल के दूरदराज के क्षेत्रों में भगवान रामचंद्र जी के वनवास से लौटने की सूचना एक महीना देर से प्राप्त हुई थी और कहीं कहीं तो दो महीना देर से पहुंची थी। अतः उन लोगों ने जैसे उनको सूचना मिली वैसे ही दिवाली का उत्सव इन पहाड़ी क्षेत्रों में मनाया। तब से यह परंपरा वैसे ही चलती आई। यह दिवाली कुछ लोग मार्गशीर्ष मास की अमावस्या को मनाते हैं तो कुछ लोग पौष मास की अमावस्या को मनाते हैं। इस दिवाली को मनाने का अलग – अलग जगहों पर अलग – अलग तरीका है। सोलन, सिरमौर, शिमला तथा मंडी आदि के ऊपरी क्षेत्रों में यह दिवाली भिन्न – भिन्न मासो में मनाई जाती है। कुछ लोग इस दिन रात को लकड़ियों की छोटी-छोटी अधिक जवलन क्षमता वाली बारीक झिल्लियों (जगनी) को इकट्ठा करके एक लंबे लकड़ी के डंठल पर वन बेलों से बांधते हैं और उसकी विशाल मशाल तैयार करते हैं। फिर रात्रि के अंधेरे में सब ग्रामीण इकट्ठा होकर के इन मशालों से दिवाली खेलते हैं। बहुत सी खाने – पीने की वस्तुएं भी बनाते हैं। यह मशाल जुलूस और खेल देखने लायक होता है। कहीं – कहीं विशाल अग्निकुंड जलाकर यह दिवाली मनाई जाती है। लोक मान्यता के अनुसार उस समय किसी प्रकार का संचार का साधन ना होने के कारण इन इलाकों में सूचना देर से मिली थी। इसलिए यह दिवाली अयोध्या की दिवाली से बाद मनाई गई थी। अर्थात तब तक यह बात पुरानी हो गई थी। परंतु फिर भी लोगों ने राम के आगमन की सूचना सुनकर एक विशाल जश्न मनाया जिसका नाम बूढ़ी दिवाली रखा गया। इस अवसर पर लोग कई जगहों पर ढोल नगाड़ों के साथ दिवाली गाते भी हैं और नृत्य भी करते हैं।
  3. रामनवमी एवं दशहरा पर्व — ये पर्व भी हिमाचली संस्कृति में समूचे भारत की संस्कृति की तरह मनाए जाते हैं। परंतु दशहरा पर्व की दृष्टि से कुल्लू का दशहरा पर्व समूचे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। जिला कुल्लू के ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में इस अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला कई दिनों तक चलता रहता है। इसमें देश के भिन्न – भिन्न भागों से व्यापारी सामान लेकर आते हैं और हिमाचल के भिन्न – भिन्न जिलों के सभी लोग भगवान राम की याद में मनाए जाने वाले इस पर्व के अवसर पर लगने वाले मेले का भरपूर आनंद उठाते हैं। इस अवसर पर सभी आगंतुक मेले में खूब खरीद-फरोख्त भी करते हैं।
  4. उत्सवों में राम — अमूमन देखा गया है कि बाल जन्मोत्सव के अवसर पर जो बधाई गीत गाए जाते हैं, उनमें महिलाएं रामलला का जिक्र जरूर किया करती है। एक पंक्ति कुछ यूं देखी जा सकती है: —“बधाई हो बधाई जी आज,राम लल्ला ने दर्श दियो है।”
    इसके साथ – साथ कुछ ऊपरी इलाकों में सिया स्मृति को भी बेटी के विवाह के अवसर पर गाया जाता है। बेटे के विवाह के अवसर पर वधू प्रवेश के दौरान भी कुछ इसी तर्ज के गीत गाए जाते हैं।
  5. लोकनाट्य विधाओं में राम – हिमाचली लोक संस्कृति में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले लोकनाट्य की शैली प्रचलित थी। उसमें बांठडा, स्वांग और करियाला नृत्य नाट्य शैली आदि बहुत से नाट्य मंचन स्थानीय कलाकारों के द्वारा
    लोक मनोरंजन हेतु किए जाते थे किए जाते थे। उन नाट्य मंचनों मैं रामकथा के किसी एक अंश विशेष पर स्थानीय कलाकार राम के महान चरित्र को प्रदर्शित करने वाले नाटक को प्रस्तुत किया करते थे और लोग उन नाटकों को देखकर मनोरंजन के साथ – साथ एक विशेष शिक्षा ले कर के भी जाते थे।ये कार्यक्रम साल के एक आध बार आयोजित किए जाते थे। बाद में इनकी जगह रामलीला मंचन ने ले ली। रामलीला भी लोग बड़ी श्रद्धा और भक्ति भाव से देखते थे। ये कार्यक्रम एक स्थान पर 14 वर्षों तक आयोजित किए जाते थे और फिर रामलीला किसी दूसरे स्थान पर स्थानांतरित की जाती थी। इन रामलीलाओं में मंडी में जोगिंदर नगर, किन्नौर में भावानगर की रामलीलाएं विशेष आकर्षक एवं महत्वपूर्ण मानी जाती है। असल में किन्नौर जिला में रामलीलाओं का प्रचलन सन 1979 में भावनगर विद्युत प्रोजेक्ट के कर्मचारियों के द्वारा शुरू किया गया। उससे पहले किन्नौर में इस प्रकार का कोई भी नाट्य मंचन प्रभु श्री राम जी की जीवन घटना पर मौजूद नहीं था। यह जानकारी श्री लाल सिंह ठाकुर विद्युत प्रोजेक्ट भावनगर के कर्मचारी द्वारा प्रदान की गई।वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चलते तथा धारावाहिकों के प्रसारण के चलते और उसके साथ – साथ अब इंटरनेट की दुनियां के चलते ये सब कलाएं धीरे – धीरे लुप्त प्राय होती जा रही है। हां अब हिमाचली संस्कृति में भी रामकथा का पंडालीय चलन समूचे भारतवर्ष की तरह अधिकता से होने लगा है।
  6. हिमाचली संस्कृति में राम वनवास काल से संबंधित साक्ष्य – यह सर्वविदित है कि श्री राम जी का वनवास काल अधिकतर दक्षिण भारत में ही गुजरा। इसलिए यहां उनके इस काल का कोई खास साक्ष्य नहीं मिलता। परंतु हां जिला शिमला में रिज के मैदान के ठीक सामने जाखू में हनुमान मंदिर को उनके वनवास काल से जरूर जोड़ा जाता है। लोक मान्यता है कि जब भगवान श्री रामचंद्र जी के छोटे भाई लक्ष्मण जी मूर्छित होकर के अचेत पड़े थे तो उन्हें संजीवनी लाने के उद्देश्य से हनुमान इस जगह से होते हुए हिमालय की ओर बढ़े थे। इस जगह पर हनुमान जी याकु ऋषि से मिले थे। अतः इस स्मृति में जाखू मैं हनुमान का मंदिर बनाया गया है। अब तो यहां पर हनुमान जी की 108 फुट ऊंची मूर्ति का निर्माण भी किया गया है।

निष्कर्ष (Conclusion) : —

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि हिमाचली संस्कृति में भगवान राम के प्रति आस्था व विश्वास त्रेता काल से ही प्रगाढ़ रूप में विद्यमान है। यहां की भोली – भाली जनता भारतीय जनमानस के नायक भगवान श्री रामचंद्र जी के जीवन चरित्र से बहुत ही प्रभावित है और भगवान रामचंद्र जी के पद चिन्हों पर चलने के लिए निरंतर प्रयासरत रहती है।

यहां की देव संस्कृति में भले ही प्रभु श्री राम को किसी देव विशेष के नाम से अभिहित किया गया हो, परंतु आस्था और मान्यता फिर भी भगवान राम के ही प्रति बनी हुई है। विषय चाहे लोकगीतों, लोक संस्कारों, मंदिरों, लोक गाथाओं तथा लोक श्रुति – स्मृतियों का हो या फिर तीज त्योहारों का हो, राम कहीं ना कहीं हिमाचली संस्कृति में साक्षात नजर आ ही जाते हैं। हिमाचली संस्कृति के उन्नत वैभव में प्रभु श्री रामचंद्र जी का मिश्रण कुछ इस कदर हो गया है कि मानो आटे में नमक मिल गया हो।

अब इन्हें कोई चाह कर भी अलग नहीं कर सकता। बूढ़ी दिवाली के पर्व को लेकर जो मान्यता है या फिर सोलन, शिमला, सिरमौर के लोक पारंपरिक रामायण गीतों (बरलाज) की जो मान्यताएं हैं, उनको यदि तथ्य माना जाए तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हिमाचली संस्कृति में राम सचमुच त्रेता काल से ही प्रतिष्ठित रहे है। हिमाचली संस्कृति और राम का आपस में घनिष्ठ संबंध है।

घोषणा : —

उपरोक्त साक्ष्य एवं संदर्भों के अनुसार प्राप्त जानकारी के तहत यह मेरा मौलिक और स्वरचित शोध आलेख है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हिमाचली संस्कृति में भगवान राम के प्रति आस्था व विश्वास त्रेता काल से ही प्रगाढ़ रूप में विद्यमान है। यहां की भोली – भाली जनता भारतीय जनमानस के नायक भगवान श्री रामचंद्र जी के जीवन चरित्र से बहुत ही प्रभावित है और भगवान रामचंद्र जी के पद चिन्हों पर चलने के लिए निरंतर प्रयासरत रहती है। विषय चाहे लोकगीतों, लोक संस्कारों, मंदिरों, लोक गाथाओं तथा लोक श्रुति – स्मृतियों का हो या फिर तीज त्योहारों का हो, राम कहीं ना कहीं हिमाचली संस्कृति में साक्षात नजर आ ही जाते हैं। हिमाचली संस्कृति के उन्नत वैभव में प्रभु श्री रामचंद्र जी का मिश्रण कुछ इस कदर हो गया है कि मानो आटे में नमक मिल गया हो।

—————

यह लेख (हिमाचली लोक संस्कृति में प्रभु श्री राम और दिवाली।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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