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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

सागर और सरिता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सागर और सरिता। ♦

“सुनो सरिते रौद्र रूप धर,
क्यों तांडव तुम यूं करती हो?
है सहज सरल तुम शांत स्वभावी,
फिर दहशत क्यों तुम भरती हो?

आकंठ डुबाकर जनजीवन जल में,
क्यों त्राहि – त्राहि तुम मचाती हो?
रो उठते हैं प्राणी मात्र सब तब,
जब नीड़ उनका तुम बहाती हो।”

“मैं भूली बिसरी पावन सरिता,
हिमगिरी के शिखर से बहती हूं।
मैं कहां से निकली, कहां को जाती?
कभी, किसी से कुछ न कहती हूं।

गांव के पावन गलियारों में बहती,
पवनों में, शीतलता मैं ही देती हूं।
संचित कर के कृषित भूमि को,
मैं घट – घट को नवजीवन देती हूं।”

घाट – घाट पर तृप्ताती हूं सब को,
सब कूड़ा – कचरा जब मैं ढोती हूं।
सच कहती हूं मैं कुदरत की बेटी,
मानुषी करणी पर तब मैं रोती हूं।

क्यों भूल जाते हैं लोग मुझको?
तृषा नाशिनी मैं उनकी रोटी हूं।
निर्मल – पावन मैं आई गिरी से,
पिया तक पहुंचते मटमैली होती हूं।

जो जिसका किया वह उसे लौटाती,
मैं बदला कहां कब किसी से लेती हूं?
निज करणी का फल भोग रहे हैं सब,
तुम कहते हो मैं यह सब दंड देती हूं?

जिन जनी नहीं कोई जान जिस्म से,
प्रसव पीड़ा को वे भला क्या जाने?
मैं जननी हूं जलचर – थलचर की,
मेरी पीड़ा को भला वे क्यों माने?

मैं सज – धज – पावन निकली थी प्रियतम,
मटमैली गंदली होकर तुमसे मिलती हूं।
निर्दोष हूं मैं सनातनी परंपरा प्रवाहित,
निज प्रहारों से देहे कई की छीलती हूं।

“होती है मुझे भी पीड़ा तब प्रियतम
यह सब सुनकर सागर अकुलाता है।”
“मदहोश मानुष की यह जरूरत?” सागर,
सुनामी लहरों से आगबबूला हो जाता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति के पांच तत्व सलीके से अपना-अपना चक्र पूर्ण करते है, अर्थात प्रकृति के पांच तत्व तब तक मानव या जीव जंतु का नुकसान नहीं करते जब तक मनुष्य उनके प्राकृतिक रूप व पथ को अवरुद्ध न करें। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के पांच तत्व के साथ खिलवाड़ करता आ रहा जिसका परिणाम कहीं भूकंप, तो कहीं बाढ़, कहीं सुनामी, तो कहीं बर्फबारी और भी अनेकानेक रूप देखने को मिल रहे है, क्या नदी हो क्या समुद्र मनुष्य ने सभी के साथ खिलवाड़ किया हैं। हे मानव अब भी समय हैं सुधर जा वर्ना ये धरा तेरे रहने के लायक बिलकुल भी नहीं बचेगी। फिर कहां जायेगा तू रहने सोच जरा।

—————

यह कविता (सागर और सरिता।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सावन का महीना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सावन का महीना। ♦

प्रथम दिन है श्रावण माह का आज।
देवों के देव महादेव पूर्ण करें सब काज।

सावन की ऋतु चहुँ ओर बिखरायेगी हरियाली।
धरा के सब जीवों के मध्य होगी खुशहाली।

आषाढ़ की उमस भरी गर्मी से मिल जाएगी निजात।
नव कोपलें उभर-उभर कर आएगी हर डाल-पात।

मेघराज इंद्र भी खुश हो छम-छम बूँदें बरसाए।
उदासी से भरा जीवन प्रफुल्लित हो जाये।

प्रकृति अब तो धानी चुनर पहन इतरायेगी।
इसकी हर अदा अब हसीन हो जाएगी।

वातावरण में अब होगा संगम सुर-ताल का।
दीवाने होंगे सब प्रकृति की मतवाली चाल का।

त्यौहारों के आगमन की रुत का होगा आगाज।
खुशियों का हर ओर बजेगा सुंदर साज।

माना जाए बहुत ही पाक महीना ये सावन का।
हर पल ही दर्शाए अम्बर-धरा अपनेपन का।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सावन के महीने को भगवान शिव की भक्ति का भी महीना कहते है, शिव भक्त इस माह कांवर लेकर ज्योतिलिंग पर अर्पण करते है। यह ग्रीष्म ऋतु के बाद आता है और लोगों को गर्मी के कहर से राहत भी दे जाता है। सावन के महीने में बहुत ही ज्यादा बरसात होती है जिससे मौसम बहुत सुहावना हो जाता है। इस समय लोग अपने परिवार के साथ बाहर घूमने जाते हैं और सावन के खुशनुमा मौसम का आनंद लेते हैं। चारों तरफ हरियाली और ऊपर से बारिश की मंद-मंद बुँदे अंदर से तन मन को प्रफुल्लित कर जाता हैं। माना जाए बहुत ही पाक महीना ये सावन का। हर पल ही दर्शाए अम्बर-धरा अपनेपन का।

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यह कविता (सावन का महीना।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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गुरु का वंदन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु का वंदन। ♦

मिट्टी को प्रभु ने आकार दिया,
दिया जीवन का वरदान।
मां ने नौ महीने गर्भ में ढोकर,
दिया जीवन जीने का सम्मान।

परिवार ने पाल पोसकर बड़ा किया,
बताया मेरी क्या है पहचान।
मैं मिट्टी का कच्चा घड़ा था,
था तपने को तैयार।

पक्का रूप दिया गुरु ने,
पढ़ाया सच्चाई का पाठ।
इंसानियत का मर्म समझाकर,
दिखाया सत्य की राह।

जीवन संघर्ष की गाथा है,
जूझना इससे मुझे सिखाया।
मात-पिता ने तो जीवन दिया,
सार बताया गुरु ने।

ईश्वर को मैने नहीं देखा,
देखा भी तो अपने पालनहार को।
जिनका मान है सर्वोपरि,
उनके बाद कोई है अगर,

वो है हमारे सृजनकार गुरु,
ईश्वर से ऊंचा दर्जा है उनका।
करते है हम उनका सम्मान,
बार-बार शीश झुका करते प्रणाम।

चंद शब्द गुरु के लिए,
आज ये मैं कहता हूं।
गुरु वंदन जग वंदन,
गुरु जीवन आधार।
गुरु बिना कछु ज्ञान नहीं,
हम उनके आभार।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस संसार में प्रथम गुरु तो माँ ही हैं। गुरु हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाने में हमारी सहायता करते हैं। वही हमें जीवन जीने का असली तरीका सिखाते हैं; और वही हमें जीवन के राह पर ता-उम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। गुरु हमें अंधकार भरे जीवन से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु एक दीपक की भांति होता है जो अपने शिष्यों के जीवन को प्रकार से भर देते हैं। विद्यार्थी जीवन में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

—————

यह कविता (गुरु का वंदन।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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सतगुरु।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सतगुरु। ♦

जब कलम हो हाथ,
किताब हो साथ,
किस बात की चिंता।
भाग्य दाता,
ज्ञानदाता हो साथ तो,
किस बात की चिंता।

मेरे अंदर शिक्षा का,
बीज है जिसने बोया।
उन गुरुवर, उन मात पिता,
का जब साथ हो,
तो किस बात की चिंता।

आते आते ही आता है,
जाते जाते ही जाता है।
मन का तम तो,
आत्म के प्रेक्षण से ही जाता है।

अहंकार, निर्विवाद का,
जो है एक रास्ता।
गुरुवर की परछाई में शीप से,
एक मोती बन जाता है।

राम हो या, या हो कृष्ण,
पग पग पर डगर कठिन।

टूटे ना है रूठे ना है,
कर्तव्य मार्ग से फिसले न है।
पाकर विश्वामित्र का साथ,
पाकर संदीपन ऋषि का साथ,
कर दिया विश्व का कल्याण।

मातृभूमि हो जब संकल्प,
बलिदान के सिवा कुछ ना विकल्प।
ऐसे राणा, ऐसे नानक,
ऐसे गुरु गोविंद जी साहब।

खुद में ही जो रखते हैं,
एक गुरुवर की भूमिका जीते हैं।
ऐसे वीरों को मैं करती,
अपनी कविता से कोटि-कोटि नमन।

गुरु मूर्त है, गुरु अमूर्त है,
गुरु पार है गुरु ब्रह्मा है।
जिसके माथ हो गुरु का हाथ,
उसका तो बेड़ा ही है पार।

♦ कविता पाल जी – नई दिल्ली ♦

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  • “कविता पाल जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — गुरु हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाने में हमारी सहायता करते हैं। वही हमें जीवन जीने का असली तरीका सिखाते हैं; और वही हमें जीवन के राह पर ता-उम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। गुरु हमें अंधकार भरे जीवन से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु एक दीपक की भांति होता है जो अपने शिष्यों के जीवन को प्रकार से भर देते हैं। विद्यार्थी जीवन में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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यह कविता (सतगुरु।) ” कविता पाल जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए, माता रानी की कृपा से।

नाम : कविता पाल
शिक्षा : पुस्तकालय विज्ञान में D.LIS, B.LIS, और M.LIS
PG Diploma in YOGA.

शौक : अध्यापन, लेखन, समाज सेवा द्वारा महिलाओं की स्थिति में जागरूकता लाना।

— अपने बारे में कुछ शब्द साहित्यिक गतिविधियां काव्य लेखन, गद्य लेखन एवं फेसबुक के विभिन्न साहित्यिक समूहों में सक्रिय सहभागिता रहती है अतः सक्रिय लेखक सम्मान एवं पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।
— मेरे द्वारा फेसबुक पर अनमोल अल्फाज नामक पेज का संचालन भी किया जाता है। जिसका एकमात्र उद्देश्य समाज में मेरी कविताओं द्वारा महिलाओं एवं अन्य क्षेत्र में जागरूकता का कार्य करना है।

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गुरु महिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु महिमा। ♦

गुरु पूर्णिमा एक बहुत ख़ास अवसर है, क्योंकि एक गुरु ही है जो पूरे समाज की नींव होता है। तो आइए हम आपको बताते है गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु के चरणों में मेरी एक छोटी सी कविता समर्पित है।

गुरु ब्रह्मा-गुरु विष्णु है, गुरु ही मान महेश।
गुरु से अन्तर-पट खुलें, गुरु ही हैं परमेश॥

—♦—

मां बाप ने जन्म दिया,
प्रथम गुरु मां कहलाए।
दूसरा गुरु शिक्षक कहलाए,
भले बुरे का भेद बताए।

इंसान और जानवर में भेद बताए,
जीवन पथ की डगर दिखाए।
परछाई की तरह साथ निभाए,
धैर्यता का पाठ पढ़ाए।

संकट में हंसना सिखाए,
अपमान महत्वाकांक्षा से ऊपर उठाएं।
मिथ्या आडंबरों से बचाए,
देश भक्ति की भावना जगाने।

सूर्य की उर्जा सा धमकाए,
अंबर सा विस्तार बनाए।
गुरु की अराधना से,
पानी में पत्थर दिए तराए।

गुरु के स्मरण से,
अर्जुन ने धनुष दिया उठाए।

जो गुरु की शरण में आए,
भवसागर तर जाए।
आओ गुरु चरण वंदन करें,
भाग्य रेखा भी बदल जाए।

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

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  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए; इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — गुरु हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाने में हमारी सहायता करते हैं। वही हमें जीवन जीने का असली तरीका सिखाते हैं; और वही हमें जीवन के राह पर ता-उम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। गुरु हमें अंधकार भरे जीवन से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु एक दीपक की भांति होता है जो अपने शिष्यों के जीवन को प्रकार से भर देते हैं। विद्यार्थी जीवन में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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यह कविता (गुरु महिमा।) “विजयलक्ष्मी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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अज्ञान से प्रकाश की ओर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अज्ञान से प्रकाश की ओर। ♦

काव्य : गुरुदेव तुम्हें नमन।

जब जीवन में आये गुरुवर महक जाये चंदनथ,
मे से पल में हजारों-लाखों बहार लायें गुरुवर।

ज्ञान का विज्ञान की संज्ञा दे समझायें,
मूल्य समाज का खुद के आदर्श का बतलायें गुरुवर।

हर्ष का उल्लास का धर्म के आधार का जीवन के,
कार्य का स्वयं के उद्धार का डग बतलायें गुरुवर।

तिमिर अंधकार का प्रकाश के प्यार का सबक,
हम सब अज्ञानी को बतलायें गुरुवर।

मानव के कर्म का प्रकृति के संग के उपकार का,
क्षितिज से अनुराग का माँ के दुलार बतलायें गुरुवर।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — गुरु हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाने में हमारी सहायता करते हैं। वही हमें जीवन जीने का असली तरीका सिखाते हैं; और वही हमें जीवन के राह पर ता-उम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। गुरु हमें अंधकार भरे जीवन से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु एक दीपक की भांति होता है जो अपने शिष्यों के जीवन को प्रकार से भर देते हैं। विद्यार्थी जीवन में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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यह कविता (अज्ञान से प्रकाश की ओर।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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चलो चलते हैं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चलो चलते हैं। ♦

चलो चलते है सब हौसलों की कमान लेकर।
सपनों को उमंग के पंखों की नई उड़ान देकर।

सीधे रास्ते कभी नही मिलते इस जीवन में।
जिस पर चलकर सहज खुशी हो जाए मन में।

राह में आयेंगे अनेकों बार दुखों के रोड़े।
पर धैर्य के दामन को हम कभी न छोड़े।

सहनशीलता है सबसे सुंदर गुण एक ऐसा।
सोने पर हो बिल्कुल सुहागे ही जैसा।

आओं तराश ले कुछ अपने ही हुनर को ऐसे।
सुनार सोने के आभूषण गढ़ सुंदर रूप दे जैसे।

रास्ते की आई किसी भी मुसीबत से न घबराना।
बस नेक कर्म संग प्रभु स्मरण ही करते जाना।

हर अंधेरा छंट जाएगा तेरी उस नायाब राह का।
जवाब हँसी में मिलेगा तुझें तेरी हर आह का।

विवेक को सदैव ही रखना दिल में करके समाहित।
फिर हासिल हो जाये जीवन में हर मंजिल की जीत।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे सोने को जितना तपाया जाता है उससे सारी गंदगी बाहर आ जाती है, तब जाकर अच्छा आभूषण बनता है, अपने इसी सहनशीलता के गुण के कारण सोने का मूल्य बढ़ जाता है। मानव जीवन में भी बहुत उतार चढ़ाव आते है, लेकिन संयम व धैर्य से जीवन के हर मुश्किलों से बाहर निकला जा सकता हैं। एक बात सदैव ही याद रखे अपने कर्म पर व अपने आप पर सदैव ही विश्वास बनाये रखे, अपने सपनों को उमंग के पंखों की नई उड़ान देकर आगे चलते चले।

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यह कविता (चलो चलते हैं।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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मेरा गांव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरा गांव। ♦

सुदूर जो दिखती सुन्दर बस्ती, और घने पेड़ों की छांव है।
हवा के बहते जहां मंद पावन झोंके, यही तो मेरा गांव है।

इस बस्ती के बीचो बीच हरी – हरी, छोटी सी मेरी ठांव है।
लहलाती फसले जौ और गेहूं की, यही तो मेरा गांव है।

जहां पाण्डव शीला के पास थिरकते, स्कूली बच्चों के पांव है।
वह पहाड़ियों के बीच में घरों का टोला, यही तो मेरा गांव है।

किनारे से बहती कलकल खड्ड है, पेड़ों पर कौवों की कांव है।
नील आसमां से शुभ्र सूरज है चमके, यही तो मेरा गांव है।

घने वन जहां बने पड़े हैं, जंगली जीव – जंतुओं की ठांव है।
जहां वे बाग – बगीचे फुले – खिले हैं, यही तो मेरा गांव है।

जहां रहती है शांति बनी हमेशा, शोर – शराबे का न झांव है।
जहां मिलजुल कर रहता है हर आदमी, यही तो मेरा गांव है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अपने गांव के प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन किया है, जहां पर है घने पेड़ों की छांव, शुद्ध हवा के बहते जहां मंद पावन झोंके, यही तो मेरा गांव है।
    इसी बस्ती के बीचो बीच हरी – हरी, छोटी सी मेरी भी ठांव है, जहां लहलाती फसले जौ और गेहूं की। जहां प्राचीन पाण्डव शीला है जिसके पास थिरकते मेरे गांव के स्कूली बच्चों के पांव है। वह पहाड़ियों के बीच में घरों का जो टोला दिख रहा है, यही तो मेरा गांव है। घने वन जहां खड़े हैं, जंगली जीव – जंतुओं की ठांव जहां है। जहां वे बाग – बगीचे फुले – खिले हैं, यही तो मेरा गांव है। जहां सभी शांति व प्रेम से मिल जुलकर रहते है, ऐसा प्यारा मेरा गांव है।

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यह कविता (मेरा गांव।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हकीकत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हकीकत। ♦

नौका है टूटी हुई,
जाना है उस पार।
ना जानूं कितना गहरा पानी,
नैया बिन पतवार।

पीने को पानी नसीब नहीं,
कुऍं का ख्वाब रखता हूं।
खाने को भोजन नहीं,
दुश्मन पे फतह का ख्याल रखता हूं।

ख्वाब में भी न सोचा था हमनें,
दोस्ती का वास्ता देकर,
वो दुश्मन बन गया होगा।
उसे गुमां हो गया,
कद देखकर नाटा।

शास्त्री जी पर गुमां है सबको,
दुश्मन को दिखाया हिन्दुस्तानी चाटा।
नफरतों की फिजाओं में,
प्यास मुहब्बतों की नहीं बुझती।

कोशिश चाहे लाख कर लो,
आग से कभी आग नहीं बुझती।
पलट गई तख्तो ताज,
हिल गई सल्तनत।

हौसला व बहादुरी के आगे,
सर झुकाती हैं, हरकतें नापाक।
आग लगी है तेरे शहर में,
चिंगारी तेरे घर तक आएगी।

कभी साथ मनाते थे ईद और होली,
आज चलाते हो सरहद पे गोली।
मत ललकारो ये है हिन्दुस्तान,
तेरा मुल्क नहीं बचेगा,
बन जाएगा कब्रिस्तान।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हम भारत वासी दिल से प्रेम करने वाले को प्रेम करते है और जो हमें आँख दिखाते है उनका आँख भी निकाल लेते है। हम कभी किसी पर पहले वार नही करते है लेकिन अगर दुश्मन हम पर वार करे तो हम हाथ पर हाथ धरे बैठे भी नहीं रहते है। हमें गर्व है अपने वीर सेनानी सुभाष चंद्र बोस जी पर, उन्होंने दुश्मन को दिखाया हिन्दुस्तानी चाटा। एक बात याद रखे नफरतों की फिजाओं में कभी भी प्यास मुहब्बतों की नहीं बुझती। चाहे कोई भी पड़ोसी देश हो हमारा हमसे प्यार करेगा, हम भी उन पर प्यार बरसायेंगे, लेकिन अगर हमसे गद्दारी करेंगे तो उसका जवाब उसी की भाषा में हमें देना आता हैं, जय हिन्द – जय हिन्द की सेना।

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यह कविता (हकीकत।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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योग निद्रा कीं दुष्ट संहार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ योग निद्रा कीं दुष्ट संहार। ♦

योग निद्रा का कर ध्यान,
मधु कैटभ किया संधान।
धरा पे जो कुटिल कामी,
चुनक मारती कल्यानी?

खल कामी खड्योत पर,
कर लो जी अनुसंधान।
चक्र सुदर्शन विष्णु का
बोल रे जय श्री राम।

दुष्टों से धरा खाली हो,
शिव शक्ति बहाली हो।
भारत मां की रखवाली,
शास्त्र समस्त संधान।

दुष्ट दमन श्री राम किये,
प्रेम ने बोला जय श्री राम।
बानर – भालू संग लिया,
रावण ऊपर प्रहार किया।

खर दूषण त्रिसरा मारा,
बाली मुक्तिधाम सिधारा।
सुग्रीव का साथ निभाया,
सेनापति जामवंत बनाया।

तीर समुद्र जब सेना आई,
तब समझ नहीं, आंख दिखाई।
समुद्री तंहा रघनाथ तप कीना,
अनसुनी, श्रीराम क्रोध दुना।

धनुष बाण का किया संधान,
समुद्र कांपते आया मान।
रघुनंदन आगे शीश झुकाया,
राम सेना लंका भिजवाया।

महामाया देवी मोह स्वरूपा,
जो दुष्टों की रहती है भूखा।
सिंह वाहिनी की है गर्जना,
विश्व में हलचल बढ़ तीखा।

समुद्र का पूछता जल युग,
धरा पर हलचल भय मुक्त।
महामाया ने दुष्ट को मारा,
दैत्य को जिसे नहीं सहारा।

असिलोमा नामक दैत्य सेना,
बिडाल! राक्षस दौड़ा आया।
सिन्हनाद ओर लक्ष्य कराया,
महिषासुर को मां दौड़ आई।

महिषासुर दौड़ा दौड़ा आया,
भगवती पर अस्त्र चलाया।
संग्राम में तैयार दैत्य की हार,
आसुरों पर परमेश्वरी संहार।

देवी शक्ति का खडग प्रहार,
महा दैत्यों का किया संहार।
संग्राम महोत्सव में बदल गया,
ढोल नगाड़ा ताशा बज रहा।

देवी दैत्यों की कमर तोड़ी,
कितनों की गर्दन मरोड़ डाली।
जगदंबा का करो मन से ध्यान,
संतुष्ट हो जाएगा सारा जहान।

देवी करती है सबका कल्याण,
देवताओं पर है उसका ध्यान।
कहता मंगल देवी सबसे महान,
जगत का मां करती कल्याण।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — इतिहास इस बात का साक्षी है, दुष्ट कभी सुधरते नहीं, दुष्टों का संहार करना ही पड़ता है दुनिया व समाज में शांति और खुशहाली के लिए, फिर चाहे युग (समय) कोई भी हो। अगर रावण सुधरने वाला होता तो प्रभु श्री राम उसका वध कभी भी नहीं करते, माना की रावण बुद्धिमान था लेकिन था तो दुष्ट, अपनी दुष्टता के कारण ही रावण मारा गया। अगर महिषासुर सुधर जाता तो माँ दुर्गा को उसका वध नहीं करना पड़ता। इसलिए युग चाहे कोई भी हो दुष्ट की एकमात्र सजा है, उसका वध, अगर दुष्ट का वध नहीं किया गया तो अपने देश, समाज और पूरी दुनिया के लिया नासूर बन जायेगा।

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (योग निद्रा कीं दुष्ट संहार।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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