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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

बचपन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बचपन। ♦

काश! लौट आते वे बचपन के दिन आज,
जिसमें, दादी चूमती भालों को।

माता, लोरी गा कर सहज सुलाती,
बहना, चटकारी देती गालों को।

वह बाबुल की बाहों का झूला होता,
सागर समझता नदी और नलों को।

कोरे कागज की वह कश्ती होती,
खेलता, काठ के कृपाण और भालों को।

माँ डांटती, मैं रुस कर छुप जाता,
आँगन में बाबुल की पीठ के पीछे।

माँ खंगालती, घर का कोना – कोना,
दादी देखती, हर पलंग के नीचे।

बाबा, मौन रह देते, साथ मेरा तब,
गमछे से ढांपते, ताकि तनिक न दिखे।

बहना खोलती, भ्रातृ भेद सारा तब,
माँ झुंझलाती, अच्छा! तो ये तुम्हारी सीखें?

काश! मिट्टी के वे घरौंदे होते,
बनाता, मिटाता, फिर से बनाता।

किशोर पड़ोसिन कमला की चुगली,
तोतली आवाज में दादा से लगाता।

डांट पड़ती देख दादा से उसको,
मेरा रूआंसा सा चेहरा, फिर से खिलखिलाता।

काश! लौट आते वे बचपन के दिन आज,
जिंदगी जीने का बड़ा मजा आता।

आज न जाने क्या हो गया ये?
आलीशान बंगलों का सुख भी न भाता।

आंगन में लगे हुए झूले पर झूल कर भी,
वह बाबुल की बाहों सा चैन न आता।

काश! हुआ न होता बड़ा अगर मैं,
तो आज ये बचपन का भाव न सताता।

आज है भार सब अपने ही कंधों पर,
जो उठाया करते थे, तब मेरे पिता और माता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बचपन किसी भी इंसान के जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण समय होता है। बचपन में इतनी चंचलता और मिठास भरी होती है कि हर कोई फिर से उस बचपन को जीना चाहता है। बचपन में वह धीरे-धीरे चलना, गिर पड़ना कुछ देर के लिए रोना और फिर से उठकर दौड़ लगाना बहुत याद आता है। बचपन में दादी द्वारा प्यार से यूँ माथा को चूमना बहुत याद आता है। बचपन में पिताजी के कंधे पर बैठकर मेला देखने जाने का जो मजा होता था वह अब नहीं आता है। मां से डाट पड़ने पर पापा के पीछे यूँ छिप जाना, शरारत करने पर पिटाई के लिए खोजा जाना और दादा जी के पास छिप जाने का जो आनंद था उसका क्या कहना, बहन द्वारा पकड़वाना, फिर तो पिटाई होती थी। लेकिन आजकल के बच्चों का वह प्यारा सा बचपन तो कहीं खो ही गया। भावनात्मक या मन के स्तर पर मासूमों के पोषण की स्थिति दुनिया भर में बहुत ही बुरी है। भारत में हर दूसरा बच्चा वयस्कों की भावनात्मक प्रताड़ना का शिकार हो रहा है। खास बात यह है कि 83 फीसदी से ज्यादा मामलों में तो शोषण करने वाले खुद अपने मां-बाप होते हैं। बच्चों से उनका बचपन ना छीने, उन्हें उनका बचपन खुलकर जीने दे, तभी उनका सर्वांगीण विकास होगा।

—————

यह कविता (बचपन।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है। ♦

ऊपर वाले ने कुछ सोच कर, हमें बनाया होगा,
नाक नक्श संग संस्कारों का, साज सजाया होगा।
मिट्टी के पुतलो में रंगों की, छटा बिखेरा होगा,
बड़े अरमानों से अपने दिल में, सपने संजोया होगा।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

दिया होगा, सत्य पर चलने की सनक खास,
बनाकर एक बेहतर इंसान, पुतले में डाला होगा जान।
प्रकृति की रक्षा करेगा, बनाकर एक अपना मुकाम,
रंगमंच का भावी वजीर, करेगा भावनाओं का सम्मान।
दिन फिर बहुरेंगे, फिर बदलेंगी फिजाएं धरा की,
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है।
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

इतनी आशाएं, आकांक्षाओं से लदा आया हूं इस कर्मधाम में,
लेकर एक विश्वास प्यार की, बंधी थी एक डोर।
इतनी बड़ी जवाबदेही थी मिली, सोंचा कैसे चुका पाऊंगा,
था अपना रोल जो मिला, खुद कैसे निभा पाऊंगा।
असत्य के सागर में अपना, सत्य के गोते लगा पाऊंगा,
प्रकृति के भक्षकगण से, रक्षा कैसे कर पाऊंगा।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

पूछा जब अंतरात्मा से अपने, पाया एक ही ज्ञान,
सबको न मिल पाता है, इस रंगभूमि की शान।
कर्म पथ पर पग तो बढ़ाओ, मिलेगा जग में मान,
संस्कारों की बात कहां, रग-रग में सबके बसता है।
ढूंढ पाए वो शख्स खड़ा है, लिए जान में जान,
कमर कस मैं खड़ा हो गया, लेकर प्रभु का नाम।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है।
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

मिले ज्ञान से सीख ले, लिया कर्म को साथ,
ठान लिया जब मैने तो, पाऊंगा अब मंजिल तमाम।
मिले जीवन को सरस बनाकर, दूंगा एक संदेश,
कर्तव्य से न कभी डिगूंगा, देता हूं विश्वास।
बड़ों के आशीष को पाकर, फूला न समा पाऊंगा,
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

रंगमंच से जो सीखा मैंने, आज ये साझा करता हूं,
कर्म करता हूं करूंगा, भटकूंगा न पथ से अपने।
सहयोग की भावना दिल में भरी हो, भाव ऐसी ही रखता हूं,
सीखा जिनसे सबकुछ, उन गुरुओं का आभार करता हूं।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

अंत में यह प्रण लेता हूं, करूंगा दायित्वों का निर्वहन,
सत्य को दिल से सजदा करूंगा, दूंगा उसका साथ।
गुरुओं का सम्मान करूंगा, नमाऊंगा अपना शीश,
ऊपर वाले की आस भरूंगा, चाहे मांगनी पड़े भीख।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भगवान ने सुंदर प्रकृति बनाया अनगिनत पेड़ पौधे बनाये, लेकिन इंसानो ने अपने स्वार्थ सिद्धि (इच्छा पूर्ति) के लिए प्रकृति को तहस नहस कर दिया। जिसका परिणाम मौसम का ख़राब होना, प्राकृतिक आपदा, और भी अनगिनत आपदा का अम्बार लग गया है, अगर ऐसे ही चलता (प्रकृति को तहस नहस करते रहेंगे) रहा तो पृथ्वी इंसान के रहने लायक नहीं रहेगी, फिर भाग कर जाओगे कहाँ ये कभी सोचा है? अब भी समय है सुधर जाओ इंसान, और प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करो, अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए जो तुम कर रहे हो। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले आज की हम ऐसा कोई भी कर्म नहीं करेंगे जिससे प्रकृति के पांचो तत्वों को नुकसान हो। हम सभी प्रत्येक वर्ष एक पेड़ जरूर लगाएंगे और तब तक उसका देखभाल करेंगे जब तक वह पेड़ अपना ख़ुराक ज़मीन खुद न लेने लगे।

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यह कविता (कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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शीशा ए दिल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शीशा ए दिल। ♦

शीशा-ए-दिल कांच से भी नाजुक बनाया।
कितने भावों से इसको रब ने सजाया॥

कभी दूसरों के गम में ये जी भरकर रोता।
तो कभी ये अपनी ही चैन की नींद खोता॥

कभी लहरों सा चंचल दिल बन जाये।
कभी किरणों सी चमक भी दे जाये॥

आँख तो इससे खूब दोस्ती भी निभाती।
इसके दर्द को अपने आँसुओं में छिपाती॥

कभी-कभी बेवफाई देख इस ज़माने की।
पग-पग पर दिल के रोने-मुस्कराने की॥

कुछ पत्थर के गुण भी इसमें डाले होते।
फिर ये नयन भी तो न यूँ छम-छम रोते॥

चल पड़ते है लोग दिल के आजमाने को।
इस कदर खेल का हुनर क्यूँ दिया जमाने को॥

अगर ये शीशे की तरह चूर-चूर जो हो गया।
गमों के अंधेरे में जो एक बार सो गया॥

कौन सी लोरी से फिर इसको उठाओगे।
फिर से अर्श से फर्श पर ही इसको पाओगे॥

ए जमाने! बार-बार आजमाइश छोड़ दे तू।
गर तोड़ना है तो एक बार में ही तोड़ दे तू॥

न फिर कभी हमें तुम आवाज लगाना।
न सुन पाएंगे तेरा कोई नया बहाना॥

धीरे-धीरे नाजुकता को त्याग पत्थर का हो लिया।
देख अब इस काँच से नाजुक दिल ने बदल खुद को दिया॥

आखिर दिल की नजाकत को तो समझ लीजिए।
न खिलौना जान किसी के दिल के टुकड़े कीजिये॥

खिलौना तो नया मिल जाएगा बाजार से।
टूटे दिल को जोड़ न पाओगे किसी तार से॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — ये दिल भी बहुत ही खूब है कभी दूसरों के गम में ये जी भरकर रोता, तो कभी ये अपनी ही चैन की नींद में मदमस्त खोता। कभी लहरों सा चंचल ये दिल बन जाये तो कभी किरणों सी चमक भी दे जाये। ये आँख तो इससे खूब दोस्ती भी निभाती है, सदैव से ही इसके दर्द को अपने आँसुओं में छिपाती है। दिल को खिलौना समझकर न कर खिलवाड़ इसके साथ, ए जमाने! बार-बार आजमाइश करना छोड़ दे तू, अगर तोड़ना है तो एक बार में ही तोड़ दे तू इस दिल को। एक बात याद रखना खिलौना तो फिर भी नया मिल जाएगा बाजार से, लेकिन टूटे दिल को जोड़ न पाओगे किसी भी तार से। कुछ समय की ये ज़िंदगी है, इसे प्यार के साथ खुशी से बिता लो, न जाने कब इस धरा से ये शरीर छोड़ चले जाओगे तुम।

—————

यह कविता (शीशा ए दिल।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू। ♦

मेरे वतन की माटी की खुशबू, सुबह – शाम जिसे जब आती है।
मन हो उठता है बाग – बाग सा, रूह होती तब मदमाती है।

यह भक्ति – मुक्ति की पावन धरा है, राम -कृष्ण को जनाती है।
गंगा – यमुनी तहजीबों को, यह भूमि खुद पर ही तो बहाती है।

धर्म अनेक यहां नाना भाषाएं, कई कुल कुनबे, कई जाति है।
सीधा सादा मानुष यहां का, विश्व पटल पर जिसकी ख्याति है।

दादुर, म्यूर, पपिहरा के शोर और कोयल काली मीठा जब गाती है।
भारत देश की धरती सचमुच, हर्षित हो फूली न तब समाती है।

शीतल पवन जब हवा के झोंको से, धूल धारा से अम्बर में उड़ाती है।
यूं लगता है मानो भारत की भूमि, मस्ती में होली का पर्व मनाती है।

रिमझिम बारिश की शीतल बूंदें, सिंचित करती यहां की जब माटी है।
उग आती है तब नाना फसलें, भारत की जनता उन्हें तब खाती है।

छा जाए कभी संकट के बादल तो, वीर बिरादरी सर अपना जब चढ़ाती है।
बुंदेले हर बोलों की भांति फिर गौरव गाथा, जनता उनकी तब गाती है।

प्रेम करुणा की प्रवाहक यह भूमि, हमेशा विश्व में शान्ति ही चाहती है।
नाहक इसको छेड़े जो कोई, फिर तो दुश्मन की ईंट से ईंट बजाती है।

जय बोलो भाई जय बोलो सब, मां भारती के पावन आंचल की।
जय बोलो भाई जय बोलो सब, उतर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्वांचल की।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू का क्या कहना, सुबह – शाम जिसे जब भी आती है, मन हो उठता है बाग – बाग सा, रूह होती तब मदमाती है। यह वही पवित्र भूमि है जहाँ पर भक्ति – मुक्ति की पावन धारा सदैव ही बहती है, राम – कृष्ण को जनाती है यह भूमि। यही पर माँ गंगा, यमुना सरस्वती नदियों को यह भूमि खुद पर ही तो बहाती है। यहां पर धर्म अनेक यहां नाना भाषाएं, कई कुल कुनबे, कई जाति है, सीधा सादा मानुष यहां का, विश्व पटल पर जिसकी ख्याति है। रिमझिम बारिश की शीतल बूंदें जब सिंचित करती यहां की माटी को तब उग आती है तब नाना फसलें, भारत की जनता उन्हें तब खाती है। प्रेम व करुणा की प्रवाहक रही है सदैव से ही यह भूमि, हमेशा विश्व में शान्ति ही चाहती है, नाहक इसको छेड़े जो कोई भी, फिर तो दुश्मन की ईंट से ईंट बजाती है। जय बोलो भाई जय बोलो सब, मां भारती के पावन आंचल की। जय बोलो भाई जय बोलो सब, उतर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्वांचल की।

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यह कविता (मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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कानूनी दांवपेच।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कानूनी दांवपेच। ♦

सजा – ए – मौत सुनाकर भरी अदालत में,
फिर से अपील कर होती जहां पर माफी है।
वह अदालत की है शहर – ए – आम तौहीन,
या फिर, न्याय के चाहवानो से बेइंसाफी है।

जहां दशकों लग जाते हैं हे राम! तुझे ही,
अदालत में अपना ही नियत न्याय पाने में।
सोचो जरा क्या हालत होती होगी ऐसे में,
कमजोर, सर्वहारा, मजलूमों की जमाने में ?

अदालत भली है उस परवरदिगार की,
जहां न कोई वकालत है, न ही सुनवाई है।
माफी का तो कोई भी सवाल ही न उठाता,
जिसे एक बार सजा साहेब ने जो सुनाई है।

इस दुनियाँ में वकालत और सुनवाई के,
एक से बढ़ कर एक नए – नए लफड़े हैं।
कानूनी दांव पेच के बीच में ही मुकदमें,
सालों दर सालों अदालत में जकड़े हैं।

मिलता किसे है वक्त पर ही न्याय यहां?
मुकम्मल न्याय की तो उम्मीद ही बेकार है।
मुड़ जाती है अधिकतर न्याय की तासीर वहां,
जिधर को खड़ी दिखती खुद ही सरकार है।

दफ़न हो जाती है कई फाइलें यहां,
कई सालों दर सालों धूल फाक रही है।
इस महंगी होती हुई न्याय व्यवस्था में,
गरीबों ने हमेशा ही बेइंसाफी सही है।

रिमांड – शिनाख्त के नाम पर है धांधली यहां,
तो कभी जांच, पड़ताल, सबूतों में घोटाला है।
फिर भी मिल जाए न्याय सालों बाद किसी को,
तो क्या मजा? न ही तो अंधेरा न ही उजाला है।

अपनी बात कहने को अदालत में भला,
वकीलों की वकालत की क्या दरकार है?
कौन दोषी है इस लूट की व्यवस्था का?
स्वयं अदालत है या कि फिर सरकार है?

मुकदमा मेरा है तो मैं खुद बात रखूं,
भला जरूरत ही क्या है वकीलों की?
जरूरी कर दी जाए कानून की पढ़ाई तो,
दरकार कहां रहेगी वकीली दलीलों की?

चश्मदीद गवाहों की गवाहियां ही जहां,
वक्त पल भर में ही बदल दी जाती है।
उस दुनियां की न्याय व्यवस्था पर तो,
मुझे अजीबो गरीब सी घिन आती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक बेहतर कानून व्यवस्था जनमानस के लिए और अच्छे समाज और अच्छा माहौल का निर्माण करती है। मुजरिम जो भी हो उसे किसी कीमत पर न छोड़ा जाए, पर क्या ऐसा हो रहा हैं? पैसे वाले आखिर बच कैसे जा रहे है? क्यों कानून व्यवस्था के नाम पर आर्थिक और मानसिक रूप से गरीबों का शोषण हो रहा हैं? क्यों लम्बे इन्तजार के बाद भी उन्हें उचित न्याय नही मिल रहा है? आखिर अपनी बात कहने को अदालत में भला, वकीलों की वकालत की क्या दरकार है? कौन दोषी है इस लूट की व्यवस्था का? स्वयं अदालत है या कि फिर सरकार है? यह सोचने का विषय है।

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यह कविता (कानूनी दांवपेच।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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जीवन भी एक उड़ती पतंग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जीवन भी एक उड़ती पतंग। ♦

जीवन भी एक उड़ती पतंग तरह है,
कभी इधर लहराती कभी उधर लहराती है।
कभी नीचे जाती कभी ऊपर आती है,
हवा के रुकने से वो उड़ नहीं पाती है।

जब ऐसे में दो पतंग आपस में उलझे,
एक पतंग का कटना और गिरना निश्चित समझे।
जिस उमंग से पतंग उड़ती वही हवा का झुकाव रखती है,
पेंच का ही खेल सही रहता जो सब विधा में माहिर है।

पतंग का धागा अगर मजबूत हो तो गिरना नामुकिन है,
कोई गाँठ कमजोर न हो ये देखना होता है।
वैसे ही जीवन में अगर रिश्ते मजबूत है,
खुशहाल जीवन भी उसी का होता है।

पतंग भी एक अजीब खेल खेलती है,
कभी अपने ही धागे में उलझ कर कट जाती है।
वैसे ही रिश्ते भी कभी कभी इतने उलझ जाते है,
लाख कोशिश करने बाद सुलझ नहीं पाते है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इंसान का जीवन भी एक उड़ती पतंग की तरह है, कभी इधर लहराती है तो कभी उधर लहराती है, कभी नीचे जाती तो कभी ऊपर आती है। हवा के रुकने से वो उड़ नहीं पाती है। हम सभी जानते है की पतंग का धागा अगर मजबूत हो तो गिरना नामुकिन होता है, कोई गाँठ कमजोर न हो ये देखना होता है। वैसे ही जीवन में भी अगर रिश्ते मजबूत हो तो, खुशहाल जीवन होता है। जैसे पतंग कभी-कभी अपने ही धागे में उलझ कर कट जाती है, वैसे ही रिश्ते भी कभी-कभी इतने उलझ जाते है, लाख कोशिश करने के बाद भी सुलझ नहीं पाते है।

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यह कविता (जीवन भी एक उड़ती पतंग।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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बस एक के आगे हाथ फैलाओ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बस एक के आगे हाथ फैलाओ। ♦

किसी के आगे तो ये हाथ फैलाना।
आत्म-स्वाभिमान को ठेस पहुँचाना॥

जरूरतमंद के लिए स्वतः ही सहारा।
होता था हम सबका कर्तव्य प्यारा॥

ये बात तो होती थी उस प्राचीन काल की।
पर वक्त ने ये कैसी बिठाई ताल सी॥

अब हाथ फैलाने में लोगों को कोई शर्म नहीं।
भीख मांगना तो किसी बात का मरहम नहीं॥

फिर क्यूँ हर गली, सड़क, चौराहे पर मिलते।
हट्टे-कट्टे होते हुए भी उनके हाथ भीख को हिलते॥

क्या हो गया इंसान के जमीर को आज?
क्यूँ भिखारी का चोला पहने न करे काज॥

क्यूँ इन्होंने कुछ भी कर्म न करने की ठानी।
खुद के ईमान से कर रहे ये तो बेईमानी॥

इस अनमोल शरीर से हर पल नेक कर्म कर।
शाश्वत शक्ति के आशीष से अपनी झोली भर॥

हाथ ही फैलाना है तो फैला परमेश्वर के आगे।
जिसके आगे झोली फैलाने से किस्मत जागे॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस ब्रह्मांड में सच्चा दाता केवल एक ही हैं, अगर मांगना ही है तो उस परम शक्ति से ही मांगे केवल उसी के आगे अपना हाथ व झोली फैलाये। क्या हो गया है आजकल के इंसान के जमीर को, आखिर क्यूँ भिखारी का चोला पहने न करे काम काज? क्यूँ इन्होंने कुछ भी कर्म न करने की ठानी? खुद के ही ईमान से कर रहे ये तो बेईमानी। एक बात याद रखे वह परम सत्ता भी उसी की मदद करता है जो सच्चे मन से उसे याद करता है व पवित्र दिल से कर्म करता हैं।

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यह कविता (बस एक के आगे हाथ फैलाओ।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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नारी की कहानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नारी की कहानी। ♦

ओ नारी तेरे जीवन की भी क्या अजीबो गरीब कहानी है?
दमन में बीता बचपन है तेरा और जुर्म में बीती जवानी है।

किशोर हुई मासिक धर्म को झेला, सब झेल हुई सयानी है।
यौवन में कर शादी, पड़ती गृह त्याग की रसम निभानी है।

गर्भ का पालन, प्रसव पीड़ादि भी तो जुर्म की ही निशानी है।
जो कुदरत ने किए सिर्फ तेरे ही साथ, बातें किसे बतानी है?

बड़ा सहज है कहना नर समाज को, यह तो रीत पुरानी है।
अपने घर लगी आग दुख देती है, सेंकने को आग बेगानी है।

तारीफ की मारी नारी बेचारी, निज शोषण स्वयं करवाती है।
कुरूप हुई नकारी है जाती, सुरूप चापलूसी में आ जाती है।

कुत्ते का बैरी कुत्ता फिर, एक दूसरी को ही नीचा दिखाती है।
श्रृष्टि रचयिता होकर भी, पुरुष के आगे खुद को नचाती है।

करे श्रृंगार जो घना बेचारी, तो लूटपाट की बात बन जाती है।
कुरूप तो शोषित, सुरुप अवशोषित, जाती बेचारी बलाती है।

जाए तो जाए-जाए किधर को? आगे कुआं खाई पीछे आती है।
जहाज का पंछी फिर वहीं लौटेगा, जानती यह नर की जाती है।

सास-बहू के झगड़े में भी, नारी ही नारी का शोषण करवाती है।
घर-संसार है तुझ से ओ देवी! अपने आप को ही क्यों लड़ाती है?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सबने कहा नारी आज की शिक्षित है, फ़िर भी क्यों आज भी नारी सब दर्द को चु्पचाप है सहती, चाहे बात बचपन की हो या किशोर हुई मासिक धर्म को झेला, सब झेल हुई सयानी है। यौवन में कर शादी, पड़ती गृह त्याग की रसम निभानी है उसको। माना की नारी का मातृत्व दर्द होना प्रकृति का नियम है, गर्भ का पालन, प्रसव पीड़ादि भी तो जुर्म की ही निशानी है। जो कुदरत ने किए सिर्फ तेरे ही साथ, बातें किसे बतानी है?

—————

यह कविता (नारी की कहानी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मेघराज आये माँ तेरा स्वागत करने।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेघराज आये माँ तेरा स्वागत करने। ♦

हे जगदम्बे माँ! तेरे गुप्त नवरात्रि की सबको बधाई।
इस वर्ष की फिर से शुभ मंगल, पावन घड़ी आई॥

कई दिनों से इन मेघों का उमड़-घुमड़ कर आना।
फिर इस पावन दिन पर ही इनका यूँ बरस जाना॥

सार्थक किया देव इंद्र ने भी अपने नाम को।
उचित समय अंजाम दे दिया अपने काम को॥

धरा को अपनी प्यारी बूंदों के स्पर्श से किया पावन।
प्रकृति भी शीश झुका कर मानो हो रही मनभावन॥

धरा ने इन बूंदों से खुद को कर लिया निर्मल।
जैसे खुद को पाक किया, डाला जैसे गंगा-जल॥

पावन नवरात्रि में चारों दिशाएँ तुझें पुकार रही।
तेरे स्वागत में अतृप्त नैन राहें तेरी बुहार रही॥

इंद्रदेव खुश होकर झमाझम जल बरसाए।
धरा भी शीतल हो तेरे आगमन में मन्द-मन्द हर्षाये॥

तू भी अपने लाल-लाल चुनरी को ओढ़ कर आएगी।
कुम-कुम लगे पग तेरे खुशहाली बिखेर जाएगी॥

तेरा ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड गुणगान करेगा।
ये भी अपने दामन को तेरे आशीष से भरेगा॥

हे जग जननी, तू तो वरदायिनी ममतामयी माँ।
तुझसा इस ब्रह्मांड में कोई और कहाँ॥

इस पृथ्वी माँ को धन्य करती तुम बारम्बार।
मानव मन पर दया कर बार-बार करती उपकार॥

तेरे ही पावन चरण कमलों में हर सुख का बसेरा है माँ।
तेरी कृपादृष्टि से तो हर रात में भी खुशियों का सवेरा है माँ॥

तू अपनी कृपादृष्टि बिखरा जाना नूर ही नूर, माँ।
हे विश्वविनोदिनि माँ, तेरे खजाने तो रहमतों से भरपूर, माँ॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पवित्र प्रकृति व वर्षा भी मातारानी का दिल से स्वागत कर रहा है। हे जगदम्बे माँ! तेरे इस गुप्त नवरात्रि की सबको बधाई। धरा को अपनी प्यारी बूंदों के स्पर्श से किया पावन। प्रकृति भी शीश झुका कर मानो हो रही मनभावन। धरा ने इन बूंदों से खुद को कर लिया निर्मल, जैसे खुद को पाक किया, डाला जैसे गंगा-जल हो।

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यह कविता (मेघराज आये माँ तेरा स्वागत करने।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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पिता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पिता। ♦

मां की महिमा तो सबने गाई,
बाप बेचारा क्यों भूल दिया?
जिसने हमेशा से नव राहें दी,
नई तालीम, नया उसूल दिया।

मां तो रो लेती है तंगी में उनके कंधों पर,
बाप बेचारे ने अपना सब दुख है पिया।
हम बच्चों के लालन – पालन में खोकर,
अपना जीवन भी उसने कहां है जीया?

रोजी रोटी की चिन्ता में रहकर कभी,
कभी बच्चों के सपनों में ही वह जीया।
हो जाए मेरे बच्चे सफल कैसे न कैसे,
इस होड़ में ही अपना सर्वस्व है दिया।

कौन कुचलता है अपने अरमानों को इस कदर?
दूसरों के खातिर, जैसे पुत्र हेतु है पिता ने किया।
फिर भी न जाने इस निष्ठुर समाज ने आखिर,
क्यों पिता के बलिदान को है दरकिनार किया?

वह दफ्तर से लौटा थका हारा मांदा सा,
तलाश सकून की, मां ने परेशान किया।
लहू तक सुखा देता है वह बच्चों के लिए,
फिर भी कहते हैं कि तुमने क्या किया?

वाह री ओ ! इन्सानी फितरत, क्या गजब?
बे एहसानों सा पल में उसे भुला है दिया।
मुंह का निवाला तक अपने तुझको दिया,
जिसने, तेरे खातिर अपना जीवन जिया।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — पापा का प्यार निराला है, पापा के साथ रिश्ता न्यारा है, इस रिश्ते जैसा कोई और नहीं यही रिश्ता दुनिया में सबसे प्यारा है। मेरे होठों की हँसी मेरे पापा की बदौलत है, मेरी आँखों में खुशी मेरे पापा की बदौलत है, पापा किसी भगवान से कम नही क्योकि मेरी ज़िन्दगी की सारी खुशी पापा की बदौलत है। ये बाप तुझे अपना सब कुछ दे जाएगा, और तेरे कंधे पर दुनिया से चला जाएगा। पिता हैं तो हमेशा बच्चो का दिल शेर होता हैं। वो इस छोटी सी दुनिया में मेरा अनंत संसार है। एक पापा की बदौलत ही मेरा जीवन खुबसूरत बन पाया।

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यह कविता (पिता।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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योग दिवस – 2026

निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

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