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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

फिर भी चलती साथ-साथ वो हमेशा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Phir Bhi Chalti Saath-Saath Wo Hamesha | फिर भी चलती साथ-साथ वो हमेशा।

गुथे हुए हैं प्राणों से कुछ,
निर्वाक वैरागी से पतझड़।
खलती हैं मुझको तुम्हारी यादें,
फिर भी चलती साथ-साथ वो हमेशा।

राहों का सहचर सूनापन है,
आँसू और अकेलापन है।
वियोगिनी-सी दिल की धड़कन है,
निर्जन वन-कानन में चलते-चलते।
कामना थकी पर पाँव न थके मेरे,
फिर भी चलती साथ-साथ वो हमेशा।

जगी-जगी हैं दीप्तिपूर्ण रातें,
सुबकती है झम-झम बरसातें।
खोयी-खोयी सी अनंत सौगातें,
जल-जलकर बुझी हैं अभिलाषाएं।
दग्धित रही अँगारों-सी जिंदगी,
फिर भी चलती साथ-साथ वो हमेशा।

खानाबदोशों जैसी भटकन है,
रेगिस्तानों जैसा अंतर्मन है।
आकुल आशा घर आँगन है,
घायल हो श्रापित-सी जिंदगी।
रह-रहकर दुख रही चोटिल अंगों-सी,
फिर भी चलती साथ-साथ वो हमेशा।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (फिर भी चलती साथ-साथ वो हमेशा।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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यह डूबती सांझ।

Kmsraj51 की कलम से…..

Yah Doobati Sanjh | यह डूबती सांझ।

यह डूबती सांझ देखो, लेके, घना अंधेरा आएगी।
दिन भर की आपाधापी से, हमे मुक्ति दिलाएगी।

यह बात सच है कि यह, दैनिक प्रकाश छुपाएगी।
यह भी तो सच है कि, यह अपनी गोद में सुलाएगी।

मुमकिन है यह कि रात अंधेरी, हर दृश्य छुपाएगी।
पर यह भी वाजिब है कि, यह स्वप्न भी दिखाएगी।

कौन कहता है कि हर सांझ, दिवस को ही खाएगी?
मालूम है जग को यह भी कि, फिर नई भोर आएगी।

नाउम्मीदी में जीने से तो हमेशा, निराशा ही छाएगी।
सांझ ही तो रात को ला कर, सब थकान मिटाएगी।

आशावान को तो यह सांझ, पास मंजिल सी भाएगी।
निराशावान के लिए तो उसका, सारा संसार खाएगी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हम सब ये जानते है की सूर्यास्त के बाद शाम होगी ही और शाम होगी तभी रात भी होगा और इंसान दिन भर के कार्य से थका हारा आराम की नींद, ले पाता है जिससे उसकी सारी थकावट दूर होती है। आशावान को तो सदैव ही यह सांझ, पास मंजिल सी भाएगी, लेकिन निराशावान के लिए तो उसका, सारा संसार खाएगी। क्योकि आशावान जनता है की फिर भोर होगी और सूर्य उदय होगा। इसी तरह से जीवन में भी जब चारों तरफ से मुसीबत आ जाए तो घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि कोई भी समय लंबे वक्त तक नहीं रहेगा, उसके बाद अच्छा समय भी आएगा। इसलिए सदैव ही आशावान बने रहे और अच्छे कार्य करते चले जीवन में, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।

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यह कविता (यह डूबती सांझ।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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प्रकृति और होरी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Prakriti and Hori (Holi) | प्रकृति और होरी।

आकंठ अखंड उद्गार में,
बहता कण-कण विराग।
तिनका-तिनका तृण पल्लवी
कुसुमित हो मुस्कुराय।
दृग दिवस काल में,
देखे मन हर्षाये।
गोकर केश लोहिता,
पल-पल रूप दिखाय।

फैला इस संसार में,
विपुल गंध हर जोर।
डाली-डाली लद गई,
फूलों से चहुँ ओर।
वन कानन की शोभा बढ़ी,
बढ़ी सृष्टि आगार।
कनक पूत की आभा चढ़ी,
फागुन की है बड़जोर।

ताल तम्य तरकश में,
गाये गीत मधुमाधवी।
हर ताल-ताल के छंद में,
मधुर मिलन उत्साही रंग।
आम्र पल्लवी मधुप महुए की,
नवरंग रसरंग की बटायें।
बढ़ी चली हर छोर-छोर,
होरी है बरजोर-जोर।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (प्रकृति और होरी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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तुम से ही।

Kmsraj51 की कलम से…..

Tum Se Hi | तुम से ही।

तुम एक स्त्री हो,
विधि का विधान हो,
तू गुणों की खान हो।

हर शै में समाई हो,
कभी बहन, कभी बेटी,
कभी सुंदर गृहणी बन आई हो।

तेरे बिना अस्तित्व नहीं संसार का,
तू तो सार है केवल आर~पार का,
तू ही तो संसार का श्रृंगार हो।

तू घर की पूजा है तू ही तो आराधना है,
तुझ से ही तो मकान से घर बना है,
तेरी हंसी से खिलता घर का आंगन हो।

जीवन संभव नहीं कोई तेरे बिना,
तुझ बिन जग में होता नही जीना,
संस्कृति में तो तू ही दुर्गा और काली हो।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — नारी तू नारायणी, तू आदिशक्ति की अंश है, कभी माँ के रूप में, बहन के रूप में, बेटी के रूप में, व पत्नी के रूप में व अन्य बहुत सारे रूपों में सदैव ही अपना कर्त्तव्य बहुत अच्छे से निभाती हैं। तेरे बिना अस्तित्व नहीं इस संसार का, तू ही तो सार है केवल आर~पार का, तू ही तो संसार का श्रृंगार हो। जीवन संभव नहीं कोई तेरे बिना, तुझ बिन जग में होता नही जीना। तू ही तो घर की पूजा है तू ही तो आराधना है, हे नारी तुझ से ही तो मकान से घर बना है, तेरी हंसी से खिलता सदैव घर का आंगन हैं।

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यह कविता (तुम से ही।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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होली के रंग खुशियों के संग।

Kmsraj51 की कलम से…..

Holi ke Rang Khushiyon ke Sang | होली के रंग खुशियों के संग।

फागुन की बयार लाए, मौसम की फुहार,
उदास मन में लाए नवीनता की बहार।
सूने चमन में छाए, उमंगों की खुमार,
अनकहे रिश्तों में लाए बेहतरीन निखार।

टूटे दिलों को जोड़े ऐसे रंगतों में सुमार,
फगुआ, आमोद प्रमोद का एकमात्र त्योहार।
आपसी भाईचारे को बनाता खास,
प्रेम बंधुत्व में घोलता, नई मिठास।

सूने जीवन को रंगीन बना, करता सपने साकार,
आपसी रंजिश मिटा, लोग होते गुलजार।
एक दूजे संग कड़वाहट भूला, होते एक,
लाल हरी पीली मगर गुलाल होते एक।

गालों पर लगी रंगों की लाली,
हाथ में सजी गुलाल से भरी थाली।
लगाकर एक दूसरे को गले, जतलाते प्यार,
ये बस एक रिवाज नहीं, है अनोखा त्योहार।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — होली अर्थात – प्रेम, स्नेह व स्वार्थ से मुक्त आत्मिक रिश्ता, जहां अपने विकारों को त्याग कर, सभी के प्रति करुणा का भाव मन में रख सबका भला करना। सभी गीले शिकवे भुला कर प्रेम से सबका सम्मान करना व गले लगाना, सबकी मदद करने का भाव मन में प्रकट हो। रंगो की तरह सदैव ही जीवन खुशहाल हो सभी का यही संदेश देता ये महापर्व होली।

—————

यह कविता (होली के रंग खुशियों के संग।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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आओ खेले पुरानी होली।

Kmsraj51 की कलम से…..

Aao Khele Purani Holi | आओ खेले पुरानी होली।

आप सभी को तहे दिल से सपरिवार महापर्व होली की शुभकामनाएं!

जब न शिकवा था न थी कोई शिकायत,
बस प्यार ही प्यार ही था रिश्तों में बेजोड़।

वो पुरानी होली हुआ करती थी ऐसी,
रंग दिखाती थी ऐसा जिसका न कोई तोड़।

सूखे मेवे और फल बिस्कुट से भरी पहनकर माला,
जब लगाते थे बच्चें होली – पूजन की दौड़।

फिर रंग भरी बाल्टी, गुलाल भरी थाल, कोलड़ो की मार,
देवर – भाभी के प्यार को बनाती थी बेजोड़।

कोलड़ो की मार से बचने के लिए हर गली के,
हर मोहल्ले के मापे जाते मोड़।

एक डंडा ही बनता उनका सुरक्षा कवच,
भाभियों के आते ही भागे सब कुछ छोड़।

थकान को दूर करने बीच-बीच में आकर करें आराम,
सब चाय संग पकौड़े खाते नही देते छोड़।

वो पूरे गाँव, मोहल्ले के लोग इकठ्ठा होकर मनाते पर्व,
जो हर रिश्ते को देता था प्रेम से जोड़।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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यह कविता (आओ खेले पुरानी होली।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हे नारी तू।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hey Nari Tu | हे नारी तू।

हे! नारी तू उठ जा,
विजयपथ पर।
जीत का परचम लहरा जा,
तू मत डर।
आंधी की तरह बढ़ आगे,
डटी रहो,
जीवन रथ पर।

अरमानों को मत दबा,
रख बाजुओं पर भार अपना।
चल पड़, निकल ले,
उठा ले खुद को।
राहों में मिलेंगे,
टेढ़े- मेढ़े रास्ते।
मत डरना, मत रुकना,
डटी रहना पथ पर।

मंजिल की कुछ दूरी पर,
होगी तू डांवाडोल जरूर।
फिर ऊर्जा से भर जाना,
रास्ता अब नजदीक है।
पथ पर पहुंचेगी,
ठोकरे होंगी हजारों सीमा।
ठोकरों को मार ठोकर,
बढ़ जाना विजय की ओर।

परचम जीत का लहरा देना,
मर्दानी तू , दुर्गा रूप में खड़ी रहना।
सिंह पर हो सवार,
डटी रहना विजय रथ पर।
लहरा देना जीत का परचम,
है नारी तू डटना यूं ही।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — नारी तू नारायणी है, माँ दुर्गा का रूप है, तुझमें सब शक्तिया निहित है, सर्व शक्ति संपन्न है तू। जीवन में कैसी भी बिपरीत परिस्थितियां आ जाएं तू कभी भी घबराना नहीं, तू डटी रहना बिना डरे, बिना थके, तेरी जीत निश्चित है देवी क्योकि – माँ आदिशक्ति की अपार शक्ति है तुझमें। ये भारत देश शक्ति सम्पन्न देवियों का है, इस धरा पर महान देवियों का जन्म सदैव से ही होता आया है। नारी अपने जिम्मेदारियों को निभाती है और कठिन परिस्थितियों में अपने शक्ति का परिचय देती हुयी नज़र आती है। देश में कई महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्र में अपने साहस और सूझ बुझ का परिचय दिया है।

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यह कविता (हे नारी तू।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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रस आनन्द इस होली में।

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Ras Anand is Holi Mein | रस आनन्द इस होली में।

आके हुई प्रकट वह रात होली में,
मिली फागुन की सौगात होली में।
बजी जलतरंग से मिलकर सितारों से,
हुआ तरानों का नृत्य अगाध होली में।
हर्ष-आनन्द का बढ़ा व्यापार होली में,
जिह्वा पर नाम आया बार-बार होली में।

घर-घर रंग सजे उल्लासों की चहल-पहल में,
भर-भर के थाल सजे रंग अबीर गुलालों से।
नश-नश में उमंग आवेग भरे गीत गोविंदों से,
बन-बन दमकती आभा रचते स्वाँगों में,
उमड़ा हुजूम गज़ब हर गली किनारों होली में।

गली चौबारों में शोर मचा इस अवसर में,
बिखरने लगी रंग की धार गली चौराहों में।
भीगे बदन मले गुलाल चेहरों में,
खुशियों की गवाही दे रहा घर-आँगन चौराहों में,
मेला देखने निकले प्रियतम् होली में।

रंग दी चुनरिया फागुन बहार से,
दिल की कामना उभर आई होंठों के द्वार से।
नैना लड़ा के पूँछे हर इक शैदाई से,
रंग – बिरंगी पोशाकों की पैमाईश से,
हसीन चेहरे-मोहरे हर्षोल्लास से भरे होली में।

देख मुखड़े पर मले गुलाल की लाली,
दिलों में भर आई हमारे खुशहाली।
नजर ने दी हमें रमणी रंग से भरी प्याली,
जो हमें दे हँस – हँसकर गाली,
तब हम समझे की ऐसी है प्यार भरी होली में।

हमनें तुमने की इक तरफा तैयारी होली की,
जिसने जिस तरह देखा इस तरफ होली की।
हमारी आन लगती हमको तो प्यारी,
लगा दो हाथ से न मारो पिचकारी होली की,
रंग – बिरंगी सतरंगी रंगों के सिंगार की होली में।

उड़ाओ तुम उधर से हम भी इधर तैयार खड़े,
मलो अबीर गुलाल हँस – हँसकर मुखड़े पर।
खुशी आनन्द का इजहार करो होली पर,
है कसम तुमको इस होली पर।
मिटा दो बैर अपने सारे गिले – शिकवे भी,
इसी उम्मीद में था वतन इंतजार होली में।

मूर्तिमान हो दे गाली हमें हँस – हँसकर,
रंग पड़ता है कपड़ों पर उड़ता गुलाल तन पर।
लगा के घात कोई मुखड़े पर लगाता है,
‘परिमल’ प्यार से कोई कहता है,
हमें भी दिखा तू रस आनन्द इस होली में।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (रस आनन्द इस होली में।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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होली का त्यौहार।

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Holi Festival | होली का त्यौहार।

फाल्गुन का महीना आया होली का उत्सव आया है,
फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।
हिरण्यकश्यप ने स्वयं को भगवान बताया था,
पुत्र का ही शत्रु बन बैठा बहन होलिका को बुलाया था।

भक्त प्रहलाद विष्णु की पूजा करता था,
इसी बात से क्रोधित होकर प्रहलाद को बहन की गोद में बिठाया।
होलिका की गोद में बैठा प्रहलाद जल नहीं पाया था,
हुई कृपा प्रहलाद पर विष्णु की होलिका का दहन हुआ था।

नरसिंह का रूप रख विष्णु धरती पर आया था,
हिरण्यकश्यप का वध किया सारा जग हर्षाया था।
जब से होली का पर्व मनाया जाता है,
होली रंगों और खुशियों का त्यौहार है।

रंग बरसे लाल, गुलाबी, पीले रंगों से सब होली खेलते है,
भर – भर पिचकारी चलाये एक दूसरे रंग को रंग बरसाते है।
ढोलक की थाप पर नाचते सब नर – नारी है,
बनते घर – घर पकवान और व्यजंन है।

आयी – आयी देखो होली मस्तानों की टोली आयी है,
मिटाकर सारे गले – शिकवे एक दूसरे के गले मिलते है।
प्रेम, एकता की भावना का यह पर्व यही संदेश देता है,
न किसी से बैर करो, न ही किसी के दिल को दुखाना है,
मिलकर सबको होली का पर्व मानना है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आत्मिक प्रेम, निस्वार्थ स्नेह, करुणा व मानवता का पवित्र महापर्व होली हैं। अपने सम्पूर्ण विकारों को अग्नि को समर्पित कर एक अच्छे व सच्चे योगी जैसे पवित्र जीवन के नियमों के अनुसार जीवन जीना ही सच्ची होली हैं। याद रहे मलिन मन क्या जाने इस होली का उत्सव? पावनता तो जरूरी है। तन के रंगने से नहीं, मन के रंगे बिन, होली सबकी अधूरी है। मौसम के बदलाव की, नव फसलों के उगाव की, यह धुरी है। संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की, होली की क्रीड़ा पूरी है। बहन, भाई, मां, बेटी, पत्नी, पिता को, होली के रंग ही लहदे हैं। प्रेम है सब में, पर रूप अनेक है, यही तो रिश्तों के ओहदे हैं। अहंकार का नाश कर, सद्गुणों को धारण करने का महापर्व है होली। भक्त प्रह्लाद विष्णु के भक्त थे। हिरण्यकश्यप के वध के बाद वे ही असुरों के सम्राज्य के राजा बने थे। प्रहलाद के महान पुत्र विरोचन हुए और विरोचन से महान राजा बलि का जन्म हुआ जो महाबलीपुरम के राजा बने। इन बलि से ही श्री विष्णु ने वामन बनकर तीन पग धरती मांग ली थी।

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यह कविता (होली का त्यौहार।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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आया फाल्गुन का महीना।

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Aaya Phagun Ka Mahina | आया फाल्गुन का महीना।

आया फाल्गुन का महीना,
लेके ढेर सारी सौगात।
प्रकृति को मानें या धर्म को,
अपने आप में है धार्मिक मास।

भारतवासियों के लिए बड़ा सुंदर महीना,
पंचांग में होता साल का आखरी मास।
ये महीना लाता दो बड़े त्योहार,
पहली महाशिवरात्रि, दूसरी होली का त्योहार।

सूरज की बढ़ती गर्मी की होती शुरुआत,
मौसम होती बड़ी सुहानी,
धरती पर आती वसंत की बहार।
ढोल, नगाड़े, झाल बजाते,
सभी गाते होली के गीत।

भेद भाव को भुलाकर, गले लगाते,
मुख पे लगाते रंग, गुलाल, अबीर,
भारतीय संस्कृति में हो जाते सब लीन।
हर घर से निकले, लेके रंग, अबीर,
रंगों में रंगा सबका चेहरा,
धन्य है हिंदुस्तान की जमीन।

ना कोइ हिन्दू, ना कोइ मुस्लिम,
ना कोइ सिक्ख, ईसाई, सबका चेहरा एक जैसा।
लगते हैं सब सगे भाई भाई,
ना कोइ ऊंचा, ना कोइ नीचा, होली है महान।
सारी नफरतें जल गई होलिका में,
यही है अनेकता में एकता, मेरा भारत है महान।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आत्मिक प्रेम, निस्वार्थ स्नेह, करुणा व मानवता का पवित्र महापर्व होली हैं। अपने सम्पूर्ण विकारों को अग्नि को समर्पित कर एक अच्छे व सच्चे योगी जैसे पवित्र जीवन के नियमों के अनुसार जीवन जीना ही सच्ची होली हैं। याद रहे मलिन मन क्या जाने इस होली का उत्सव? पावनता तो जरूरी है। तन के रंगने से नहीं, मन के रंगे बिन, होली सबकी अधूरी है। मौसम के बदलाव की, नव फसलों के उगाव की, यह धुरी है। संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की, होली की क्रीड़ा पूरी है। बहन, भाई, मां, बेटी, पत्नी, पिता को, होली के रंग ही लहदे हैं। प्रेम है सब में, पर रूप अनेक है, यही तो रिश्तों के ओहदे हैं। अहंकार का नाश कर, सद्गुणों को धारण करने का महापर्व है होली।

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यह कविता (आया फाल्गुन का महीना।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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