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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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You are here: Home / Archives for सुखमंगल सिंह जी की कविताएं

सुखमंगल सिंह जी की कविताएं

माँ सिद्धिदात्री।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ सिद्धिदात्री। ♦

सिद्धियां देकर माता,
सबको तार देती।
दीन दुखियों की पीड़ा,
मां उबार देती॥

वास्तविक भक्ति जिनमें,
आराधना करते तेरी।
शुद्ध अन्तःकरण में,
कृपा बरसती तेरी॥

सिंह पर सवार माता,
चारभुजा धारी।
चक्र शंख गदा कमल,
चारों हाथ धारी॥

चतुर्भुज धारी माता,
सिद्धियां देने वाली।
तू जब गतिमान रहती,
करती सिंह की सवारी॥

कमल पुष्प आसन पर,
विराजमान रहती।
अचला रूप में माई,
कमल आसन बैठती॥

असंभव – संभव कर दी,
पूजा पाठ ने तेरी।
नवरात्र के नवें दिन,
भी निष्ठा हो जिसकी॥

ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय,
प्राप्ति समर्थ होता।
एकाग्र मन से जपता,
सिद्धियां प्राप्त करता॥

‘मंगल’ शरण में तेरे,
बेड़ा पार करो माता।
दु :ख दरिद्र आलस्य से,
मुझे उबार दो माता॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — माता रानी के सिद्धिदात्री स्वरूप के गुणों और शक्तियों का बखूबी वर्णन किया है। कमल पुष्प आसन पर विराजमान रहती, अचला रूप में माई, कमल आसन बैठती। शेर पर सवार माँ का शांत मुद्रा वाला रूप सर्व व्यापकता, सर्व सुख देने वाली। पाप नाशक, ध्यान पूर्वक जो भी पूजन करता माँ सिद्धिदात्री देवी का, जीवन उसका सुखदायी हो जाता। माँ सिद्धिदात्री देवी है बहुत ही दयालु अपने भक्तों पर सदैव ही माँ है बलिहारी। सच्चे मन से जो भी इंसान माँ के इस रूप का पूजन व भजन करता उसे जल्द ही सुख, समृद्धि ज्ञान – शक्ति भरपूर मिलता। आओ हम सब सच्चे मन से माँ सिद्धिदात्री देवी का पूजन व भजन करे।

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यह कविता (माँ सिद्धिदात्री।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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माँ कालरात्रि।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ कालरात्रि। ♦

कालरात्रि आकर भक्तों के,
अंधकार नष्ट करती है।
कल्याण कारिणी-मंगल रूपिणी,
हम सदैव प्रणाम करते हैं॥

हंसिया हाथ में धारण करती,
तन बाघाम्बर ढके रहती।
अभीष्ट कार्य सिद्ध करती,
ज्ञानमयी ज्योति भरती॥

मां कृपा जिस पर कर दी,
विघ्न का विनाश करती।
ग्रह – बाधा दूर कर देती,
भय मुक्त – भक्त को करती॥

सहस्त्रार चक्र जाग जाता,
सिद्ध द्वार खुल जाता।
कांटेदार कटार रखती,
दुश्मन पर वार करती॥

सातवें दिन पूजा विधान,
शुभंकरी भी है नाम।
कालरात्रि स्वरूप डरावना,
सदैव शुभ फल है देता॥

अग्नि, जल शत्रु आदि से,
तुम ही भय मुक्त करती।
आराधना तेरी है न्यारी,
अक्षय पुण्य देने वाली॥

उपासना तुम्हारी जो करता,
मृत्यु भय से मुक्त रहता।
माई तोहार वरण काला,
भय मुक्त करने वाला॥

राक्षस ठहर नहीं पाता,
जो तेरे सामने आता।
साधना तुम्हारी न्यारी,
भक्तों की करे रखवारी॥

तीन नेत्र हैं मां तेरा,
तीनों लोक का घेरा।
साधक के मन भाती हैं,
सुख समृद्धि देती हैं॥

चन्द्र खड्ग धारण करती,
दुश्मन – नाश करती हैं।
दो हाथ में शंख ध्वनि से,
भीषण ध्वनि निकलती॥

तेरी महिमा महान तेजस्वी,
जय जय जय कार करूं मां।
तेरे द्वारे आया हाथ फैलाए,
मेरा बेड़ा पार करो मां॥

“ॐ देवी कालरात्रि नम: ॐ “

स्तोत्र पाठ करने का नियम —

  • स्तोत्र पाठ मानसिक नहीं करना चाहिए।
  • वाणी से अस्पष्ट उच्चारण उत्तम नहीं मानना चाहिए।
  • बहुत जोर से बोल कर पाठ नहीं करना चाहिए।
  • शुद्ध एवं स्थिर चित्त से पाठ करना चाहिए।
  • उतावले पन में जोर – जोर से नहीं पढ़ना चाहिए।
  • पाठ याद न हो तो पुस्तक से देखकर पढ़ना चाहिए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — माता रानी के कालरात्रि स्वरूप के गुणों और शक्तियों का बखूबी वर्णन किया है। शेर पर सवार माँ का शांत रौद्र मुद्रा वाला रूप सर्व व्यापकता, सर्व सुख देने वाली। पाप नाशक, ध्यान पूर्वक जो भी पूजन करता माँ कालरात्रि देवी का, जीवन उसका सुखदायी हो जाता। माँ कालरात्रि देवी है बहुत ही दयालु अपने भक्तों पर सदैव ही माँ है बलिहारी। सच्चे मन से जो भी इंसान माँ के इस रूप का पूजन व भजन करता उसे जल्द ही सुख, समृद्धि ज्ञान – शक्ति भरपूर मिलता। आओ हम सब सच्चे मन से माँ कालरात्रि देवी का पूजन व भजन करे।

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यह कविता (कालरात्रि) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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हे आदिशक्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हे आदिशक्ति। ♦

अब तो आजा!
हे करुणावतार!
कुमकुम लगें पैरों से अब आजा।
इस दुनिया को चैन,
अमन का रास्ता दिखा जा॥

तेरी राहें बुहारें हैं, कब से हम।
आ मिटा दे ये चारों ओर फैला तम।
भीगी पलकों से तड़पते ह्रदय ने …
तुम्हें ही पुकारा है।
हम तेरे दीवानों को न कोई और सहारा है॥

तुझें बरसाना ही होगा,
अपनी करुणा का जल।
दहकती ज्वाला को शांत,
तुझें ही करना होगा।
चाहे तू आज करें या कल॥

हमने तो भिखारी बन,
दामन यहां ही पसारा है।
हे आदिशक्ति, झोली भर,
एक तूही तो जीवन का उजियारा है॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से — आदिशक्ति माँ का आह्वान किया है। इस कविता में भक्त के मन में चलने वाले भावों को बखूबी व्यक्त किया है। हे आदिशक्ति माँ हम पर बरसा अपनी करुणा का जल, हमने तो दामन यहां ही पसारा है। हे आदिशक्ति, झोली भर, एक तूही तो जीवन का उजियारा है।

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यह कविता (हे आदिशक्ति।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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माँ चंद्रघंटा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ चंद्रघंटा। ♦

माता चंद्रघंटा जी के घंटे के कंपन से,
मन की नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मक हो जाती है।
ऊर्जा का यह बदलाव मानव हृदय के,
भाग्य को बदलकर समृद्ध बना देती है॥

मनुष्य के जीवन में सुख शांति तथा खुशहाली आती है।
श्रद्धालुओं की साधना एवं मनोकामना पूरी हो जाती है।
मानव का शरीर और हृदय आनंद से भर जाता है।
उसके स्वर में दिव्य कांति और मधुरता का समावेश हो जाता है॥

माता का भजन स्व लिखित एक और प्रस्तुत कर रहा हूं …

शांति स्वरूपा चद्रघंटा,
दुनिया में तोहार मान हौ।
कल्याणकारी मैया,
जगत तूही से प्रकाशमान हौ॥

शरण में तेरे शीश झुकाया,
तेरा भक्त दर पर आया।
तुम्हारी शरण जो भी आता,
खाली हाथ नहीं जाता॥

तेरी शरण में तेरा भक्त,
भक्त के भक्ति को विचार दो।
बदली हुई मेरी भावना,
माता जी सद विचार दो॥

सुनो ! भक्त को माता लोक –
परलोक में सद्गति देती हो।
दर पर तेरी मेरी चेतना में,
दैवीय – निखार दो॥

तू जीवन परिवर्तन करके,
भाग्य समृद्धि करती हो।
साधक के सिर की बाधा,
क्षण में दूर हटा देती हो॥

भक्तों के कष्टों का निवारण,
शीघ्र ही कर देती हो।
सकारात्मक ऊर्जा भर कर,
भक्त का दिल खुश करती हो॥

शरणागत की रक्षा तुम,
प्रतिपल करती रहती हो।
अपनी भक्तों को मां,
पराक्रमी बनाए रखती हो॥

उसके मुख मंडल पर,
कांति धैर्य की वृद्धि करती हो।
उसकी मन वचन काया को,
परिपूर्ण – पवित्र करती हो॥

स्वर सार्थक में विनम्रता,
माधुर्य – समावेश लाती।
धीरता वीरता निर्भीकता,
सर्वदा बनाए रखती हो॥

भक्त के मन में नकारात्मक,
ऊर्जा फटक नहीं पाती।
जिसके ऊपर माता कृपा,
दिल से तेरी हो जाती॥
” ॐ देवी घंटा दी “

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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शारदा प्राकट्य – बसंत पंचमी।

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♦ शारदा प्राकट्य – बसंत पंचमी। ♦

हाथ में वीणा और पुस्तक,
माँ के दर सिर झुकाया जाए।
बागेश्वरी की जयंती तिथि,
शारदा माँ को मनाया जाए॥

पांच तत्व व बसंत पंचमी,
जभी एक जगह मिल आते ही।
ज्ञान तत्व और अमृत तत्व,
अमृत – ज्ञान बरसातें हैं॥

विद्या तत्व औ बुद्धि तत्व मिल,
सारे जहां सद्भाव लाते हैं।
प्रकृति तत्व भी जब मिलता,
आदिशक्ति सामने आती है॥

उनके हाथों में जप माला,
कमल – पुस्तक धारण करती।
तरुण चंद से शोभित मोती,
अभीष्ठ इच्छा प्रदान करती॥

कुंद – पुष्प सी कांति चमकती,
प्रकाशित शारदा प्रकट होती।
शारदा कुंडलिनी कहलाती,
सदा ज्ञान की ज्योति जगाती॥

माता के हाथ की वह पुस्तक,
सूक्ष्म ज्ञान की सूचक है।
एकाग्रता, मातृ शक्ति सूचक,
हाथों में माँ की माला है॥

कमलासन है सृष्टि प्रतीक,
ज्ञान मुद्रा सर्व व्यापकता है।
माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी,
बसंत पंचमी कहलाती है॥

पाप मोचनी तिथि पञ्चमी,
बागेश्वरी जयंती तिथि तय!
ध्यान पूर्वक जो पूजन करता,
जीवन उसका सुखदायी है॥

विशुद्ध वस्त्र धारण करती,
चंद्रप्रभा उनसे तुच्छ जैसे।
सदा सुंदरी हंसती रहती,
देवताओं से सुशोभित हैं॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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यह कविता (शारदा प्राकट्य – बसंत पंचमी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

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मनुष्य की चाह।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मनुष्य की चाह। ♦

कार्य कितना भी कठिन हो,
मनुष्य जो चाह दे।
पथ पर पड़े कांटे जटिल,
क्षण भर में ढाह दे।

दुनिया दागी – गमगीन,
जिंदा दिलवर ला दे।
है कौन इन्सा जहां में,
मोहब्बत की गीत सुना दे।

दिल पर पत्थर रख बैठा जहां,
माहौल खुशनुमा बना दे।
शहर आईना निहार बैठा,
कोई तो चिराग जला दे।

शांति वीरान हुए जुल्म बहुत,
यारी पक्की करा दे।
सूख गई स्याह गुलशन की,
महफिल का रंग जमा दे।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — कोई भी कार्य कितना भी कठिन क्यों न हो, जब इंसान सच्चे मन से उस कार्य को करना चाहे तो, वह कार्य आसान हो जाता है। बस जरूरत है सच्चे मन से दृढ़ता के साथ उस कार्य की शुरुआत कर पूर्ण करने की।

—————

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यह कविता (मनुष्य की चाह।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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मौसम बुलाने की कोशिश।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मौसम बुलाने की कोशिश। ♦

मौसम इशारों से बुलाने की सोचिए,
रुठा वह तो उसे मनाने की सोचिए।
जमाने में कोई दिवाना नहीं है तेरा,
गर मचले, सीने से लगाने की सोचिए।

ख़त लिख दी, एक प्यार की बातें,
तनहाई रंगीन बनाने की सोचिए।
जाग रहे मुझे अच्छा नहीं लगता,
अंधेरे की नींद चुराने की सोचिए।

मौसम मिजाज बढ़ चढ़ दिखाएं,
उमड़े ख्वाब दिखाने की कीजिए।
दिल को खुद समझाने की सोचिए,
पूर्वजों की थाती सजाने की सोचिए।

नदियां – झरना बचाने की सोचिए,
धरा पर पौधा लगाने की सोचिए।
कूड़ा – करकट हटाने की सोचिए,
मौसम धीरे से बुलाने की सोचिए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — मनुष्य के द्वारा प्राकृतिक संसाधन के असंतुलित दोहन प्रकृति का संतुलन बिगाड़ रहा हैं। अगर चाहते हैं की आने वाली पीढ़िया सुखमय जीवन जिए तो – आओ हम सब मिलकर ये संकल्प ले की सभी को प्रत्येक वर्ष कम से कम 1 पेड़ जरूर लगाना है, और उसका देखभाल भी करना है, तब तक जब तक वो पेड़ अच्छे से अपना बचाव और बढ़ाव खुद न करने लगे। जब ज्यादा पेड़ होंगे वर्षा भी अच्छी होगी जिससे नदियां – झरना सब जल से भरपूर होंगे, चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी। हमें साफ – सफाई का भी ध्यान रखना है कहीं भी यूँ ही कूड़ा – करकट नही करना हैं।

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यह कविता (मौसम बुलाने की कोशिश।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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साहित्य – साहित्य की विशेषताएं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ साहित्य – साहित्य की विशेषताएं। ♦

साहित्य समाज का हित करने वाला,
विश्व के कल्याण की भावना रखता।
अपनी संस्कृति का पहचान कराता,
समाज का सुंदर दर्पण बनके आता॥

सत्यों की निरंतर खुद ध्यान करता रहता,
सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पलता।
समाज का प्रतिबिंब हुआ वह आता,
समंदर सी गहराई वह अंदर रखता॥

विविध भाषाओं के माध्यम से समाज,
की घुटने बचाने का प्रयास करता॥

भक्ति कालीन साहित्य आता और,
पावन धरा पर ही अवतरित होता।
समाज की सामाजिक विषमता को,
समूल नष्ट करने का प्रयत्न करता॥

रीति कालीन साहित्य जीवन की,
सरसता से ओत प्रोत करता है।
रीतिकालीन साहित्य किसी बंधन में,
बंध कर नहीं, रहना चाहता है॥

साहित्य समाज का आईना होता है,
वाचिक – लिखित रूप साहित्य होता।
साहित्य को मनोरंजन का ही केवल,
साधन नहीं माना जा सकता है॥

सबसे पुराना साहित्य वाचिक ही है,
जो आदिभाषी भाषाओं में मिलता है।
यह पाखंड की कटुता से दूर ले जाता,
सदाचार का मूल तत्व समझाता है॥

स्त्री और गृहस्थ जीवन के मोक्ष द्वार खोलता,
लोग साहित्य की ओर आकृष्ट होते हैं।
साहित्य में, भोग में निर्माण की भावना होती,
सिद्धों का सिद्धांत पक्ष सहज कहलाता है॥

सिद्ध अशिक्षित और हीन जाति से होते हैं,
विडम्बना, नारी का उपभोग करते हैं।
सिद्ध साहित्य, हिंदी साहित्य में महत्त्व रखता है,
संप्रदाय के सिद्धांतों से साहित्य का निर्माण करता है॥

साहित्य मौलिक लेखन की प्रेरणा देता,
मातृभाषा का परिपूर्ण महत्त्व बताता।
तार्किक और गंभीर शैली समझाता,
अलौकिक ज्ञान की अनुभूति कराता॥

साहित्य विविध रूपों से प्राकृतिक छवि दर्शाता,
रहस्यमयी युक्तियों की गुत्थी सुलझाता॥

साहित्य में अनुभूति और भावबेग मूल तत्व है,
भावबेग का चित्रण आनंद प्रदान करता है।
वास्तव में ही आनंद ही साहित्य का उद्देश्य,
सौंदर्य की तरफ आकृष्ट करना – काव्य उद्देश्य॥

आनंद की सृष्टि के मूल में साहित्यकार है,
साहित्यकार की आत्माभिव्यक्ति की शक्ति है।
साहित्य के मूल में साहित्यकार के आत्मा की आवाज,
सच्चाई और संपूर्णता के अनुपात से विद्यमान है॥

कुशल साहित्य साहित्यकार को आनंदित करता है,
और फिर पाठक को भी आनंद प्राप्त होता है॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

Note: — वाचिक = बोलकर समझाना।

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — युग चाहे कोई भी हो, साहित्य की जरूरत सदैव ही बना रहेगा। अच्छे साहित्य से ही अच्छे समाज का निर्माण होता है, और एक अच्छे समाज से एक अच्छे राष्ट्र का निर्माण होता हैं। साहित्य भूत, वर्तमान और भविष्य तो बताता ही हैं साथ में — कला, संस्कृति, गुणों, तार्किक और गंभीर शैली को भी समझाता है। अच्छा साहित्य विविध रूपों से प्राकृतिक छवि दर्शाता, अलौकिक ज्ञान की अनुभूति कराता, रहस्यमयी युक्तियों की गुत्थी को भी सरलता पूर्वक सुलझाता।

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यह कविता (साहित्य – साहित्य की विशेषताएं।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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पुरखे जागे – तुम जागो।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पुरखे जागे – तुम जागो। ♦

कल तक पुरखे जाग रहे थे,
जागो अब, तुम जागो।

आंगन मेरा ही है श्रृंगार,
जिसमें विविध पुष्पों का बहार।

विदीर्ण न हो आनंद कानन,
जागो फिर, तुम जागो।

आत्म निरीक्षण तुम करना,
धरा आलोकित अपनी रखना।

अनंत प्राकृतिक संपदा की,
रक्षा तुम्हीं को है करना।

मन के दिन मणि प्रेम प्रकाश,
पांव बढ़ाओ जागो।

बाहें अंगणित बढ़ने वाली,
बढ़ो बढ़ – छांटो पाश।

यदि हो आंगन आश,
रण में बिछा दो दुश्मन लाश।

होगी नहीं पूरी अभिलाषा,
बजा दो उनके ताशा।

नहीं पता है उसको आज,
बांधे सपने रक्खे ख्वाब।

व्यग्र निगाहें उचक उचक कर,
ढूंढ रही सूनी राह।

जागो तुम फिर जागो,
कल तक पुरखे जाग रहे थे।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — अभी तक घर के पुरखे ( वृद्ध ) लोग घर से लेकर बाहर तक सबकुछ देखते संभालते आ रहे थे अब तुम सम्भालो। अब तुम्हारी जिम्मेवारी है सब देख रेख करने का। अब तुम्हारे कंधो पर भविष्य की जिम्मेवारी है, जैसे को तैसा जवाब देने की बारी है।

—————

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यह कविता (पुरखे जागे – तुम जागो।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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साहित्य और हथियार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ साहित्य और हथियार। ♦

साहित्य जीवन की शक्ति है,
जीना जीवन का अभिव्यक्ति।
साहित्य का पढ़ना भक्ति है,
साहित्य रचना अभिव्यक्ति है॥

अभिव्यक्ति समर्थ शक्ति है,
शक्ति में निहित भक्ति है।
साहित्य जीवन की शक्ति है,
भक्ति सत साहित्य प्रवीण है॥

इतिहास अतीत बताता है,
अतीत – मार्ग दर्शाता है।
साहित्य आगे चलने वाली ढाल,
शिक्षा विवेक शील हथियार है॥

शिक्षा से बदलाव आता है,
स्वावलंबी बनने में मददगार है।
और शिक्षा सदमार्ग दिखाती है,
शिक्षा लोकप्रिय बनाती है॥

हथियार रक्षा करता रहता है,
संस्कृति रक्षा आवश्यक है।
संस्कृति में सद्भाव पलता है,
सद्भाव सच्चा प्रेम रखता है॥

प्रेम से समाज बनता है,
समाज नेक काम करता है।
व्यवसाय में कभी केवल,
जज्बात नहीं चलती है।
सब कुछ होता है परंतु,
यह बात नहीं होती है॥

शोहरत इज्जत पाने में,
मैं! जिसने नीलाम किया।
वही आज इस दुनिया में,
सबमें बड़ा महान हुआ॥

उसी को ऊंचा नाम मिला,
जिसने सभी का गुणगान किया।
सबका उसने सम्मान किया,
उसको दुनिया ने मान लिया॥

लोगों को बर्बाद करने वाला,
पहले खुद बरबाद होता है।
सत्यवादी मार्ग बताने वाला,
घमंड का विनाश करता है॥

इच्छाएं अनंत राह चलने वाली,
विनम्रता उचाई देने वाली है।
संतोष से खुशियां मिलने वाली,
सद कर्म अच्छाई सिखाता है॥

सत कर्म मनुष्य करने वाला,
वक्त भांप कर चलने वाला।
जीवन में सदा संतोषी स्वभाव,
ही, सबकी भलाई करने वाला॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — किसी भी इंसान और समाज के लिए साहित्य और हथियार की क्या अहमियत है? किसी भी इंसान और समाज को कब साहित्य का और कब हथियार का उपयोग करना चाहिए? साहित्य और हथियार क्यों सभी के लिए जरूरी है? साहित्य बुद्धिमत्ता के लिए और आत्मरक्षा के लिए हथियार क्यों जरूरी है?

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यह कविता (साहित्य और हथियार।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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