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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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kavita in hindi

नारी सम्मान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नारी सम्मान। ♦

भगवान का दिया अनमोल,
उपहार, जग में नारी।
ईश्वर ने सब गुणों का,
समावेश कर, धरती पर उतारी।

त्याग, तपस्या, ममता का,
रूप इसने धारा।
जग में होती ये,
हर घर का उजियारा।

इस धरा को अपने अस्तित्व से,
प्रकाशवान किया, वो तो है नारी।
कभी पुत्री, कभी वधू , कभी माँ,
कभी सास का रूप ये धारी।

श्रृंगार, विरह, वेदना, प्रीत, ममता के,
सब रस इसमें ही समाहित।
इसके सद्गुणों का स्मरण भी,
करें प्रसन्न चित।

नारी – सम्मान को किन किन,
शब्दों से करूँ, मैं बखान।
इसके सद्गुणों पर वारी जाऊँ,
जो बढ़ा दे हर परिवार का मान।

नारी – सम्मान जग में लायें,
अमन, खुशहाली।
इनके गुणों का मान करें,
फिर हो जायें, रोज दीवाली।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस संसार में नारी की जगह कोई और नहीं ले सकता, नारी हर रूप में ममतामयी है। इस धरा को अपने अस्तित्व से, प्रकाशवान किया, वो तो है नारी। कभी पुत्री, कभी वधू , कभी माँ, कभी सास का रूप ये धारी। श्रृंगार, विरह, वेदना, प्रीत, ममता के, सब रस इसमें ही समाहित। इसके सद्गुणों का स्मरण भी, करें प्रसन्न चित।

—————

यह कविता (नारी सम्मान।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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अनमोल बूँद।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अनमोल बूँद। ♦

समुन्द्र की एक सीप से पूछों,
एक बूँद, कितनी अनमोल।
जो स्वाति नक्षत्र में गिरें तो,
बने सच्चा मोती, बिन मोल।

एक बूँद की कीमत चातक जानें,
स्वाति नक्षत्र की बूंद से प्यास बुझाए।
गर न मिलें, उचित समय तो,
पूरा वर्ष प्यासा रह जायें।

जब बरसे मेघा,
मयूर नृत्य करें, संग संग रोयें।
उसकी नेत्र-जल की बूंदों को पी,
मयूरी अपने विरह को धोयें।

जल जीवनदायीं,
क्यूँ व्यर्थ इसे बहायें।
बूँद बून्द सहेज लें, नीर की,
जो जीवन – अमृत कहलायें।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – सीप में स्वाति नक्षत्र में गिरें बूँद तो, बने सच्चा मोती, जो होता है अनमोल। इस एक बूँद की कीमत चातक जानें, स्वाति नक्षत्र की बूंद से प्यास बुझाए। गर न मिलें, उचित समय तो, पूरा वर्ष प्यासा रह जायें। प्रकृति का मनोरम दृश्य मयूर का यु मनमोहक नृत्य।

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यह कविता (अनमोल बूँद।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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त्रिभाग पर भरोसा करूं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ त्रिभाग पर भरोसा करूं। ♦

बंट चुका त्रिभाग में
किससे कहूं।
हो गया अवसाद माना
कैसे लिखूं।

हृदय शरीर दिमाग जाना
क्या कहूं।
पहले शरीर से अलग
किससे कहूं।

शरीर से अलग है हृदय
अलग दिखा दिमाग,
कहां पलूं।
देती शरीर जवाब
कैसे चलूं।

खुश रहता हूं फिर भी,
ब्रह्मा विष्णु महेश में,
यादों से कहता।

जैसे चलाएं।
चलता चलूं।
मचलता चलूं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – कौन हूँ मैं, शरीर, हृदय, या दिमाग। कौन शरीर से अलग है, भगवान चलाते जैसे चलाएं, चलता चलूं, मचलता चलूं। आत्मा, शरीर, हृदय, व दिमाग के बीच तालमेल।

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यह कविता (त्रिभाग पर भरोसा करूं।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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सोशल मीडिया – भारत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सोशल मीडिया – भारत। ♦

भारत पहले सबको मिलकर समझाता है।
सभ्यता और संस्कृत का उसको ज्ञान कराता है।
भारत की संस्कृति में यही कहा जाता है,
सबको यह पहले बहुत खूब समझाता है।

मनमानी करने वालों को ज्ञान पहले बताता है।
नियम और कानून का ध्यान उसको कराता है।
त्याग और तपस्या का भी पाठ उसे पढ़ाता है।
अहिंसा और शांति का संदेश उसको सिखाता है।

पुरुषोत्तम का देश है भारत उनका मान दिखाता है।
सूर्पनखा रावण की बहना उसको भी समझाता है।
श्रीराम द्वारा लक्ष्मण की तरफ ध्यान दिया जाता है।
इधर उधर जाकर भी जब नहीं मानती शूर्पणखा है।

अंत कोप भाजन से नाक अपनी कटवा दी है।
जबकि श्रीराम द्वारा उसको समझाया जाता है।
एक कथा और सुनाने का मन कर जाता है।
बालकृष्ण के पास कंस की बहन को भेजा जाता है।

उसका भी अंत श्री कृष्ण द्वारा किया जाता है।
कहने का तात्पर्य ही है जो भारत में आया है,
भारत के बने कानून का पालन उसको करना है।
मनमानी इस देश में कहीं नहीं चलने वाला है।
एक समय तक ही उसको छूट दिया जाता है।

इसलिए नियम कानून के अंदर काम करने हैं।
शांति और विश्व बंधुत्व से यहां पर आने हैं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – यह आर्यावर्त – हमारा भारत देश है, हम सभी का दिल से सम्मान करते है यहाँ। लेकिन यहाँ पर रहना है तो – भारत के बने कानून का पालन उसको करना है। मनमानी इस देश में कहीं नहीं चलने वाला है, एक समय तक ही उसको छूट दिया जाता है। इसलिए नियम कानून के अंदर काम करने हैं। शांति और विश्व बंधुत्व से यहां पर आने हैं।

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यह कविता (सोशल मीडिया – भारत।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान। ♦

श्री कृष्ण बलराम जी वसुदेव जी को,
प्रातः दोनों आकर किया प्रणाम।
दोनों भाइयों का उन्होंने किया अभिनंदन,
ऋषियों के श्री मुख से सुना था जैसा वंदन।

हृदय से वसुदेव जी करने लगे दोनों से आलिंगन,
सच्चिदानंद स्वरूप का होने लगा उन्हें दर्शन।
वसुदेव बोले सच्चिदानंद स्वरूप श्री कृष्ण,
और मेरे महायोगेश्वर संकर्षण।

तुम दोनों ही जगत के हो प्रधान,
पुरुष के भी नियामक परमेश्वर।
तुम ही इस मायावी जगत के आधार हो,
तुम ही निर्माता और निर्माण सामग्री हो।

तुम दोनों जगत के स्वामी हो।
सब कुछ धारक तुम ही हो।
तुम भोग्य और भोक्ता से परे।
साक्षात भगवान तुम ही हो।

जगत की वस्तुओं के सृष्टिकर्ता,
पालन पोषण करता तुम ही हो।
विनाश वान सभी पदार्थों में तुम,
कारण रूप अविनाशी तत्व हो।

हो रहस्य ज्ञान योग माया का,
तुम्हारी कीर्ति गान लोग करते हैं।
भजन सुनकर श्री वासुदेव जी के,
भक्तवत्सल कृष्ण मुस्कुराने लगे।

विनय पूर्वक झुककर पिताजी को,
सु-मधुर वाणी में सुनाने लगे।

हम तो आपके पुत्र ही हैं पिता जी।
हमें लक्ष्य कर आपने ब्रह्म ज्ञान का,
उपदेश आप ही हमें सुनाने लगे।
मैं हूं! वही! सब आप ही बताने लगे।

जैसे छिति जल पावक गगन समीरा,
एक होते हुए अलग-अलग कहलाने लगे।
पंचमहाभूत अप्रकट – प्रकट होकर,
बड़े छोटे अधिक थोड़े दिखने लगे।

वैसे ही मैं! और बलराम जी भी,
भेद से ही दो पहचाने जाने लगे।

धरा पर जन्म – मृत्यु चक्कर रूप,
भटकते हुए जीव निमित्त आने लगे।
हम दोनों अन्याय के खिलाफ अपना,
आकर यहां शस्त्र उठाने लगे।

शरणागत उनके संसार भय को मिटाने लगे,
इस धरा को भार से मुक्ति दिलाने लगे।
मंगल प्रभु के श्री – चरण में जाने लगा,
अमृत तत्व सुख सागर सबको सुनाने लगा।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – श्री कृष्ण और वासुदेव जी के मिलन और संवाद का सुर मधुर वर्णन किया है। जहाँ एक तरफ पिता – पुत्र पर प्रेम वात्सल्य बर्षा रहा है तो, वहीं दूसरी तरफ श्री कृष्ण जी, वासुदेव जी को ब्रह्म ज्ञान दे रहे है। इस मधुर मिलन के साक्षी बलराम जी है।

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यह कविता (श्री कृष्ण द्वारा वसुदेव को ब्रह्म ज्ञान।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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श्रृंगारदान।

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♦ श्रृंगारदान। ♦

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जरूरत का सारा सामान लाया हूँ।
मीना बाजार, घर, दुकान लाया हूँ।
कुछ ज़ाम भी है कुछ जख्म भी है।
कुछ तले भुने हुए अरमान लाया हूँ॥

अपनी अना को सस्ते में बेचकर।
तुम्हारा खोया स्वाभिमान लाया हूँ।
तू मेरी खिसकती जमीन मत देख।
तेरे हिस्से का धुला आसमान लाया हूँ॥

कस्ती से उसका पतवार छीनकर।
समंदर से साहिल, गुमान लाया हूँ।
और क्या क्या चाहिए बतला मुझे।
श्रृंगारदान में भरकर ईमान लाया हूँ॥

तुम कहते थे कायर हूँ, कंजूस हूँ मैं।
देख खिदमत में दिलो-जान लाया हूँ।
मत कहना अब मुझे बेवफा कभी तुम।
अपनी ग्रीवा तेरे लिए कृपाण लाया हूँ॥

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

  • “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” ने, कविता के माध्यम से कई सारे उदाहरण देकर बहुत ही सुंदर वर्णन किया है कि जीवन में कितना भी उतार – चढ़ाव आये कभी भी इंसानी गुणों को ना भूलो।

—•—•—•—

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यह कविता “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपने सच्चे मन से देश की सेवा के साथ-साथ एक कवि हृदय को भी बनाये रखा। आपने अपने कवि हृदय को दबाया नहीं। यही तो खासियत है हमारे देश के वीर जवानों की। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

About Yourself – आपके ही शब्दों में —

  • नाम: शैलेश कुमार मिश्र (शैल)
  • शिक्षा: स्नातकोत्तर (PG Diploma)
  • व्यवसाय: केन्द्रीय पुलिस बल में 2001 से राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत।
  • रुचि: साहित्य-पठन एवं लेखन, खेलकूद, वाद-विवाद, पर्यटन, मंच संचालन इत्यादि।
  • पूर्व प्रकाशन: कविता संग्रह – 4, विभागीय पुस्तक – 2
  • अनुभव: 5 साल प्रशिक्षण का अनुभव, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अफ्रीका में शांति सेना का 1 साल का अनुभव।
  • पता: आप ग्राम-चिकना, मधुबनी, बिहार से है।

आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे, जनमानस के कल्याण के लिए। उस अनंत शक्ति की कृपा आप पर बनी रहे। इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस लेख को विराम देता हूँ। तहे दिल से KMSRAJ51.COM — के ऑथर फैमिली में आपका स्वागत है। आपका अनुज – कृष्ण मोहन सिंह।

  • जरूर पढ़े: स्वाद बदलना होगा।
  • जरूर पढ़े: क्या-क्या देखें।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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चिट्ठी या खत।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ चिट्ठी या खत। ♦

chitthee-ya-khat-kmsraj51.png

इस इंटरनेट की दुनिया से, पाया हमने बहुत कुछ।
नई-नई दुनिया देखी, ज्ञान बढ़ाया बहुत कुछ।
जिज्ञासा मिटाई, जाना बहुत कुछ।
तो वहीं, मासूम गौरिया और चिट्ठियां॥

खोया भी हमने बहुत कुछ।
कभी पोस्ट कार्ड, कभी अन्तर्देशिये।
कभी सफेद लिफाफे वाली चिट्ठियाँ।
कहीं पे देती खुशखबरी, कहीं बांटती गम।
और कहीं बहनो ने भेजी राखियां॥

अगर कहीं डाकिये के पीछे, बच्चे मचाए शोर।
तो समझ लो परीक्षफल लेकर आयी चिट्ठियाँ।
जो भी हों, उन चिट्ठियों की अहमियत ही बहुत थी।
हर बार डाकिये से पूछना, हमारी आयी चिट्ठियाँ॥

वो चिठ्ठी का आना, सबको पढ़ के सुनाना।
कभी माँ का मामा, बुआ को चिठ्ठी लिखवाना।
कभी कोने से फ़टी, गमी का इशारा देती चिट्ठियाँ।
तो कहीं पीले चावल भेज कर, विवाह का संदेसा…
….. देती चिठियाँ॥
♦ भावना भारद्वाज ♦

♥⇔♥

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क्या हार जाऊँ मैं इनसे ?

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ क्या हार जाऊँ मैं इनसे ? ♦

kya-haar-jaoon-main-inase-kmsraj51.png

एक पीड़ा सघन सक्षम।
नेत्र अश्रुओं से देती भर।
लड़ूँ जिजीविषा ले अश्रु से।
या पीड़ा के मन भाऊँ।
क्या हार जाऊँ मै इनसे ॥

चुकता जाता जीवन पल पल।
शिथिल गात अवरुद्ध उच्छवास ले।
नित संघर्षो से जूझूँ या
स्वीकार थकन बस अलस जिऊँ।
क्या हार जाऊँ मैं इनसे॥

तरु बगिया के चिड़िया चुनमुन।
बढते उड़ते, थकते नहीं पल भर।
जीते जीवन दाने चुनचुन।
नित उड़ान निज मन की भरते।
मैं कैसे समेट लूँ डैने॥

पार नभ के किस विध जाऊँ।
भवसागर में डुबा उमंगें।
विगत मोह डूबूँ उतराऊँ।
क्या मैं हार जाऊँ ?
♥ आशा सहाय ♥

♥⇔♥

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मगर यह जरूरी नहीं कि…।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ मगर यह जरूरी नहीं कि…। ϒ

प्यार…

 ____ 🙂 मगर यह जरूरी नहीं कि…।

मगर यह जरूरी नहीं कि…

प्रेम पर हक़ तो नही किसी का भी।
मगर यह ,ज़रूरी नही कि….
हम जिसे चाहे, बहुत दिल से,
वह भी चाहे दिल से हमे।
ज़बरदस्ती किसी से प्यार…
किया, नही जा सकता।
और ना ही ज़बरदस्ती किसी से,
प्यार लिया जा सकता है।

♦—♦

किसी को देख कर भी नज़र अंदाज़ करना।
उससे आँख नही मिलाना उससे बात नही करना।
एक तरह से उसका अपमान करना ही है।
लेकिन कुछ लोग अपमान का बदला ज़रूर लेते है।
लेकिन कुछ लोग इस अपमान को भूल जाते है।
और फिर भी बात करनी बंद नही करते।

♦—♦

दूसरो को खुश रखते रखते, ‘अक्सर’
कुछ लोग अपना दिल बहुत दुंखाते है।
चेहरे पर नक़ली मुसकराहट ला ला कर।
अंदर ही अंदर घुटने चले जाते है।

♦—♦

अच्छे इन्सान ने अच्छा जाना मुझे।
बुरे इंसान ने बुरा जाना मुझे।
जैसी जिसकी साेच थी वैसे ही,
उसने जाना पहचाना मुझे।

::) जरूर पढ़े – प्रसन्नता बाहर से नहीं अंदर से आती है।

♦—♦

माता पिता बच्चों को जैसे संस्कार बचपन से देते है।
बच्चे वैसे ही बडे हो कर बनते है – अच्छे या बुरे।
अगर माता-पिता के मन मे सब की सेवा करने की भावना रहती है।
तो बच्चों मे भी बडे हो कर वही भावना आती है, बच्चे
जो देखते है वही करते है और बडे हो कर वैसे ही बनते है।

♦—♦

ज़िंदगी में कभी उदास ना होना।
कभी किसी बात पर निराश ना हाेना।
कभी ख़ुद को लाचार ना महसूस करना।
क्योंकि जिंदगी संघर्ष है चलती रहेगी।
कभी अपने जीने का अन्दाज़ ना खाेना।
क्योंकि हर दुँख के बाद सुख और खुशी का,
सूरज तो निकलता ही है – हर हाल मे।

♦—♦

रिश्ते बनाना इतना आसान है,
जैसे मिट्टि पर मिट्टी से मिट्टि लिखना,
और रिश्ते निभाना उतना ही मुश्किल,
जैसे पानी पर पानी से पानी लिखना।

रिश्ते निभाने के लिये सब से पहले,
सहनशक्ति चाहिये वह आज कल,
किसी के पास नही है सब ख़ुद को,
सही और दूसरे को ग़लत समझते है।

♦—♦

माता पिता बच्चों को अगर कभी डाँटते है।
तो उन्हें बिलकुल बुरा नही लगता क्योंकि,
वह बच्चों की भलाई के लिये ही डाँटते है।
लेकिन,…
अगर सास ससुर बहु को कुछ बोल दे तो,
बहुत बड़ी कहानी बन जाती है,
और बहुत बुरा लगता है।
अगर सास ससुर को भी माता पिता समझो तो,
फिर भला लड़ाई किस बात की।

अपने आंतरिक गुणों की पहचान करें और अपनी सफलता के लिए इसका उपयोग करें। -KMSRAJ51

©- विमल गांधी जी। ∇

Vimal Gandhi-kmsraj51
विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी Quotes & Poems साझा करने के लिए।

विमल गांधी जी के लिए मेरे विचार:

♣ “विमल गांधी जी” की कविताआे और Quotes के हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं और Quotes छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं और Quotes काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

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अपनी शीतलता छोड़ता नही।

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ϒ अपनी शीतलता छोड़ता नही। ϒ

चन्दन का पेड़

 ____ 🙂 अपनी शीतलता छोड़ता नही।

सज्जन को मिले अगर करोडो दुष्ट…
फिर भी वो अपना स्वभाव बदलता नहीं।
जैसे चन्दन का पेड़ अपनी शीतलता-
छोड़ता नही, चाहे उससे लिपटे रहे साँप कई।
वह हमेशा देता है शीतलता सभी को।
सज्जन पुरुष भी सभी के साथ अच्छा ही चलते है।

♦—♦

गुणहीन व्यक्ति की-
… सुन्दरता व्यर्थ है।
दुष्ट स्वभाव वाले व्यक्ति का-
अच्छे कुल का होना व्यर्थ है।
यदि लक्ष्य की प्राप्ति ना हो-
… तो शिक्षा व्यर्थ है।
जिस धन का सदुपयोग ना हो-
… तो वह धन व्यर्थ है।

♦—♦

अकड़ शब्द में कोई मात्रा नहीं होती-
पर ….. यह अलग अलग मात्रा में-
__ हर एक ….. इंसान में मौजूद है।
किसी में ज्यादा तो किसी में बहुत कम।

♦—♦

कभी किसी से शिकायत मत करो।
कोई फायदा नहीं होगा।
ना ही परेशान हो कर होगा।
परिस्थिति के साथ चलो और ख़ुश रहो।
या परिस्थितियों को अपने हिसाब से बदल-
,… सकते हो तो बदल लो।
वरना जो है उसमें ही खुश रहो।

♦—♦

वक्त की हो धूप या हो तेज आँधियाँ।
कुछ कदमों के निशान कभी नहीं खाेते।

जिन्हें याद कर मुस्कुरा दे ये आँखे।
वो लोग दूर होकर भी दूर नहीं होते।

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♦—♦

ज्यादा बोलने वाले जो नहीं बोलना चाहिए वो भी बोलते जाते है।
बोलने से पहले सोचते नहीं और कम बोलने वाले जो ज़रूरी____
बोलना चाहिए वो भी नहीं बोल पाते है, वो सिर्फ साेचते ही रह जाते है।

♦—♦

आम का पेड़ लगाता कोई है।
आम खाता कोई और है।
इस संसार में जो आया है-
जाना तो है ही उसको इक दिन।
फिर क्यों ना काेई ऐसा काम करो-
पीछे भला हो सभी का, याद करे सभी।
फूलों की तरह गुलशन महका दाे।
_____ पीछे लोग ढूंढे तुम्ही को।
_____ वरना _____
जीते जी नहीं पूछता ज़माना बुरे इंसान को।
पीछे क्या याद करेगा और क्या ढूंढेगा उसी को।

♦—♦

इंसान को अपनी उम्र के बारे में-
कभी भी नही सोचता चाहिये।
भगवान ने हर किसी को बुद्धि और __
शक्ति दी है उसका उपयाेग करते हुये।
हर उम्र में कुछ ना कुछ सीखते रहना चाहिए।

♦—♦

यह काँच के खिलाैने ___
यह इंसान के सपने और यह धागे।
किसे ख़बर कि कब और कैसे टूट जाये।
मोहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के।
ना जाने ये किस मोड़ पर डूब जाये।
सोचो कुछ और हो जाता है __ कुछ।
किसे पता की जीवन में कल क्या हो जाये।

♦—♦

जब आप किसी काम की शुरुआत करें।
तो असफलता से मत डरें।
और उस काम को ना छोड़ें।
जो लोग ईमानदारी से काम __
करते हैं वो सबसे प्रसन्न रहते है।
और कामयाब भी हाेते है।
बेशक समय लगता है लेकिन __
इक दिन कामयाब जरुर होते है।

♦—♦

दिन भर दिन, जिंदगी हाथ से फिसल रही है।
_____ मुट्ठी में पकड़ी रेत की तरह।
कुछ पल तो खुशी से जी ले_
___ समंदर में बहती लहरों की तरह।
ना चिंता करे किसी बात की, ना किसी की।
जो पल (समय) है सामने ___
उसमे बस जी ले खुशी से, जी ले खुशी से।

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