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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Poems In Hindi

नारी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नारी है। ♦

पुरुष की बराबरी में सीमा पर जाती,
फिर भी दहेज की बलि चढ़ जाती।
कड़वा सत्य है समाज में नहीं आती,
नारी पुरुष से कम क्यों दिखाई जाती?

भिन्न – भिन्न रंगों के गाने गाते जाती,
बुरी नजर वालों को राख में मिलाती।
वक्त पर फूल और कांटा बन जाती है,
लक्ष्मी दुर्गा और काली कहलाती है।

बहन स्वरुप में स्नेह प्यार लुटाती है,
माता के रूप में ममता दिखाती है।
शोभित आभूषण युक्त होकर शिवाली,
युद्ध क्षेत्र में महाकाल पीर घरवाली।

प्रीति करने में सक्षम वहराधा रानी,
गृहस्थ करने में भी एक खानदानी है।
सम्मान की रक्षा के लिए वह काली,
दुश्मनों के लिए विकराल रूप वाली।

औरत है समस्याएं आती – जाती हैं,
सहती है, भावनाओं में नहीं बहती!
टूटती और बिखरती सहती जाती है,
कड़वी सच्ची, सच्चाई स्वीकारती है।

देवी का दर्जा मिला, उसने मांगा नहीं,
कितनी सशक्त है वह, यह जाना नहीं।
हर जीत में उसका जलवा, माना नहीं,
महान बल पर खास जिद, ठाना नहीं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है ये नारी तू नारायणी, जननी तू, माँ के रूप में प्यार ममता, स्नेह, लालन-पालन, जीवन के अंतिम पल तक दिखाती है। बहन स्वरुप में स्नेह प्यार सदैव लुटाती है। बुरी नजर वालों को राख में मिलाती तू, वक्त पर फूल और कांटा बन जाती है, लक्ष्मी, दुर्गा और काली कहलाती है। सदैव ही पुरुष की बराबरी में सीमा पर जाती, फिर भी दहेज की बलि क्यों चढ़ जाती। ये नारी है समस्याएं आती – जाती हैं, सहती है, भावनाओं में नहीं बहती! टूटती और बिखरती सहती जाती है, कड़वी सच्ची, सच्चाई स्वीकारती है। देवी का दर्जा मिला उसे, उसने कभी मांगा नहीं, कितनी सशक्त है वह, यह जाना नहीं। हर जीत में उसका जलवा, माना नहीं, महान बल पर खास जिद, ठाना नहीं कभी। नारी तू नारायणी।

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यह कविता (नारी है।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बलगम से निजात पाएं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बलगम से निजात पाएं। ♦

जाड़े का मौसम आया,
छाती पर बलगम छाया।
बूढ़ा जवान लड़का आया,
दादी मां ने काढ़ा पिलाया।

काढ़ा कैसे उसने बनाया,
उसमें उसने क्या मिलाया।
एक इंच का अदरक लाया,
तेजपात दो पत्ते पकाया।

पत्ते के दो टुकड़ा कर डाला,
साफ पानी में उसे धो डाला।
एक गिलास पानी में उबाला,
आधा पानी बचा, पी डालें।

काढे में कुछ शहद मिलाया,
गुनगुने काढ़े में उसे हिलाया।
धीरे-धीरे उसे उसने हलराया,
शिप शिप – पीने को बताया।

तेजपात बलगम निकालता,
छाती को वह निरोगी बनाता।
कोलेस्टॉल बनने नहीं देता,
यूरिक एसिड को कम करता।

अदरक से इंफेक्शन दूर होता,
मुख के छाले ठीक हो जाता।
शरीर में ताकत व बल लाता,
यह क्रीम नाशक है कहलाता।

शहद बल बुद्धि को तेज करता,
नस के ब्लॉकेज को दूर करता।
काया में अतुलित स्फूर्ति आती,
कामकाज में मन नहीं घबराता।

प्रतिदिन सर्दी में काला बनाएं,
तेजपात – अदरक को पकाएं।
एक गिलास पानी उसमें मिलाएं,
आधा बचे उसे पीने को बचाएं।

सर्दी और बरसात में प्रयोग करें,
अपनी काया इससे निरोध करें।
अपने घर में सबको इसे पिलाएं,
पास पड़ोस में लोगों को बताएं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है ये जो मौसम चल रहा है कभी ज्यादा सर्दी कभी हल्का गर्म, ऐसे मौसम में अचानक से होने वाले सर्दी, जुकाम और खांसी व बलगम से राहत पाने के लिए काढ़ा बहुत ही लाभकारी है सभी के लिए। इस मौसम में काढ़ा कैसे बनाए कवि ने ये समझने की कोशिश की है, और काढ़ा से होने वाले फायदे को भी बताने की कोशिश की है। काढ़ा वायरल इन्फेक्शन से भी बचता है। इम्यून सिस्टम सही रहता है काढ़ा पिने से।

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यह कविता (बलगम से निजात पाएं।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बड़ा दिन २५ दिसंबर – खानपान कर ध्यान!

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बड़ा दिन २५ दिसंबर – खानपान कर ध्यान! ♦

बड़ा दिन आए तो रखो छोटे दिन पर भी ध्यान,
जिसमें होते शुभ कामना के पूर्व नियम विधान।
नियम और कानून के बदलाव से बनते हैं काम,
खान पान के जीवन में रखना पड़ता है ध्यान।

चना बाजरा की रोटी मानव को बनाता बलवान,
पिज्जा – बर्गर खाने से पेट रोगी लीवर ट्रांसप्लांट।
घी मक्खन खाने से ज्ञानी और रहोगे बुद्धिमान,
केक आदि खाने से लीवर हो जाएगा बेजान।

दही और बेसन मिलाकर बृहस्पति का पकवान,
गुरु बृहस्पति खुश होगे तो हो जाओगे महान।
प्राचीन परंपरा में वैज्ञानिक खानपान का विधान,
संस्कार और आध्यात्म का उसमें होता था ज्ञान।

मनमानी पर अंकुश होता, लोग होते थे गुणवान,
नियम संयम से खान पान के जीवन में सुख धाम।
छोटा बड़ा सभी मिलकर करते सबका सम्मान,
ज्ञान और आध्यात्मिक बल से देश मेरा महान।

यीशु के प्रेम विज्ञान के दिन गिरजाघरों में गान,
वक्ता को फादर कह कर-कर के करते सम्मान।
सनातन धर्मी मानते हैं फादर एक है मान,
इसको कृपा निधान कहते करता है कल्याण।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है “चना बाजरा की रोटी मानव को बनाता बलवान, पिज्जा – बर्गर खाने से पेट रोगी लीवर ट्रांसप्लांट। इसलिए घी व मक्खन खाने से ज्ञानी और रहोगे बुद्धिमान, केक आदि खाने से लीवर हो जाएगा बेजान। समय से पहले हो जायेगा राम नाम सत्य तुम्हारा। इसलिए अपना खानपान सुधारों, अपनाओ सादा जीवन उच्च विचार, सादा भोजन उच्च विचार, सादा जीवन उच्च व्यवहार। अगर रहना है निरोग तो अपनाओ योग। योगी जीवन सबसे सुन्दर जीवन। करें योग रहे निरोग, आओ हम सब मिलकर करें ये संकल्प इस संसार को सुखमय बनाये। सभी तरह के फ़ास्ट फ़ूड का करें पूर्ण रूप से त्याग, तभी तुम पावोगे – निरोगी काया, सुखमय जीवन। सादा और स्वस्थ भोजन खाने की आदत डालो। ज्ञान, ध्यान और योग को अपने जीवन का अटूट अंग बना लो, तभी रहोगे स्वस्थ और मस्त। अपना व अपनों का जीवन सुखमय बनाएं, खुद भी और अपनों को सादा और स्वस्थ भोजन खाने की आदत डलवाये।

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यह कविता (“बड़ा दिन २५ दिसंबर” – खानपान कर ध्यान!) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ओ साजन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ओ साजन। ♦

पाता जगा यदि जीवन इन्हीं तरंगों पर,
गीत तुम्हारे ओ साजन।

स्वप्न सारे रात के ये मोह-बन्धन तोड़ जाते,
घिर आती तुम्हारी छवि फिर अश्रुजल के किनारे।
बजते जिगर में तार गति के चरण निर्झर किरणों में,
लेता साध ही तुम्हें मैं वीणा मरण अधर में।
जो यह व्याप्त है चारों ओर मर्म के विरह-सा पथ में,
एक सुख से कांप उठता अमावस के पर्व में।
अवसाद श्यामल मेघ-सा साजन॥

कितने स्निग्ध शिशिर से सब्ज आते स्नेह से,
शेष संवाद किस अतल की सजाते किरणों से।
उठती चीख मर्म वाणी की अकथित भाषाहीन से,
कहानी उन प्रभातों की पाता भूल न पलभर।
घूमा निरंतर मैं रिक्तकर द्वार पर तुम्हारे जब से,
किस लिये चेतना का शून्य मन अशांत उमंगों से।
प्रचंड कुहराम है साजन॥

कितना विवश मैं आज पर जन्म-जन्मांतर से परिचित,
अन्तर की उमस से दग्ध पिपासा ही आज नीरव।
विराट-विप्लव यह लोहित कर्म का समर्पण आज,
किसी की सांस का दो कण खींच लाया निर्माल्य तक।
किसी दिन असफलता में साधना में लीन होगी मगर,
तुम्हारे इन्हीं जीवन तरंगों पर जगा पाया यदि अगर।
गा उठुंगा गान साजन॥

सदायें दिल की किसी को टूटते सुना पाता यदि,
ये रातें मरणवाहन जिसकी पनपती इक जिंदगी।
खोल पाता यदि अंतःस्थली की अमावस जिंदगी की,
पिपासाओं के प्रलय को अगर पी पाता समझ चेतन पावस।
यदि लेता सोख उभरती वांछा अपनी निदारुण,
फिर कभी बुझ न पाती मेरी लगाई।
शीतल-सी पावक साजन॥

मेरे जख्मों पर हँस सके वह दर्द का दौर आये,
रजनी सावित्री हो उठे मेरा दीप निहार बहाये।
बीती बहारें बींधती चमन में आये शिशिर को संग लाये,
मेरे मौन सूलों की गुहारें रुक न पाये ये विकल।
यदि न हो पाये मुखर भी नयन आकुल अन्तरों के,
रह ही जायेगा चिर-शून्य सच कह दूं मैं हूं शून्य।
दहक अंगार-सा जाऊंगा साजन॥

यह बसेरा इस वीरान में रात भर का मानता हूं,
कब उछाहों ने न घेरा बस विष बरसता ही मिला।
कौन सी आरज़ू लाऊं फूलों के महल में आज,
जीवन की निधियां लुटाऊं कौन संचित रह सकी जो।
जलती रहे रात भर मेरी चिरुकी भरपूर इतनी,
यह जीवन में रहे सर्वत्र क्या यही कम जलन विद्रुप रुदन के,
पाता जगा यदि जीवन इन्हीं तरंगों पर।
गीत तुम्हारे ओ साजन॥

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली , मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — अपने साजन की याद में एक सजनी की क्या मनोदशा होती है? उसके मन में किस तरह के विचारों व भावनाओ के तरंग उड़ते है ये बताने की कोशिश की है। उमड़ घुमड़ कर बहुत सारी भावनाएं चलती है उअके मन पटल पर, वो कही खो सी गई है। उसकी भावनाएं कुछ इस तरह चलती है…… मेरे जख्मों पर हँस सके वह दर्द का दौर आये, रजनी सावित्री हो उठे मेरा दीप निहार बहाये। बीती बहारें बींधती चमन में आये शिशिर को संग लाये, मेरे मौन सूलों की गुहारें रुक न पाये ये विकल। यदि न हो पाये मुखर भी नयन आकुल अन्तरों के, रह ही जायेगा चिर-शून्य सच कह दूं मैं हूं शून्य। दहक अंगार-सा जाऊंगा साजन।

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यह कविता (ओ साजन।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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ये इश्क।

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♦ ये इश्क।  ♦

सुना करते है ये इश्क तो होता है बहुत लाजवाब।
न किया तो सोचों खो दिया एक सुनहरा ख्वाब॥

सोचा चलो हम भी इश्क कर ही लेते है।
इस दिल को एक नया उपहार देते है॥

कुछ नियम तो नहीं, मालूम नही थे इसके हमको।
बस शिद्दत से चाहना होता है इश्क करो जिसको॥

हम करने लगे उसको दिल जान से प्यार।
बना लिया उसको रात – दिन का यार॥

दुनिया वाला इश्क दिल से आकर चला गया न जाने कब।
यूँ प्यार भरी नजरों से देखते ही रहें हमें सब॥

पर हम तो बहुत दीवाने हुए हो गए मस्ताने।
अपनी प्यारी कलम के इश्क में बन गए परवाने॥

सच कहूँ तो मुझें भी खबर न लगी ये हुआ कब।
मेरे इश्क ने इसको सच्ची प्रेमिका बना लिया अब॥

कुछ जुनून कुछ इश्क मेरा, मेरी कलम से।
मेरी मंजिल तक पहुँचा देगी, कसम से॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक सच्चे और अच्छे रचनाकार का पूर्ण प्रेम मात्र अपनी कलम और अपनी रचना से होती है। एक सच्चा रचनाकार अपनी रचनाओं से सभी दिलों में सच्चा व पवित्र सात्विक प्रेम जागृत करता है। इस संसार के प्रेम की बात करे तो… इश्क का मतलब क्या केवल दो जिस्मों का मिलन ही होता है या फिर कुछ और ? अगर सच कहु तो सच्चा इश्क वो होता है जिसमे दो आत्माओ का मन का तार जुड़ता है, पूर्ण मन से एक दूजे को समझते है। सच्चे इश्क में स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता है। बस होता है तो पूर्ण मन से प्रेम ही प्रेम। प्रेम का मतलब दो जिस्मों का मिलन नहीं होता, प्रेम का मतलब होता है पूर्ण मन से एक दूजे का सम्मान करना, रक्षा करना, ख्याल रखना।

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यह कविता (ये इश्क।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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पृथु का पृथ्वी पर क्रोध।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पृथु का पृथ्वी पर क्रोध। ♦

अन्न – औषधि छिपा के पृथ्वी,
सृष्टि में, रूप बदल कर डाले।
प्रजा भूख से हो रही व्याकुल,
श्री मैत्रेय, विदुर से बोले।

जीवन सभी का अटका – अटका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

प्रजा करुण – क्रंदन सुन पृथु ने,
शस्त्र उठा लिया हाथ में।
पृथ्वी, गौ का रूप धारण कर,
थर-थर – थर-थर लगी कांपने।

पृथ्वी ने सर, पांव पर पटका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

गौ रूपी पृथ्वी ने आकर,
विनीत भाव से नमन किया।
आप जगत – उत्पत्ति – संहारक,
विश्व – रचना का मन बना।

मेरा हाल तो नटनी – नट का,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

मेरी अन्न – औषधि सब,
राक्षस मिलकर खा जाते थे।
सही ढंग से जिन्हें था मिलना,
अन्न – औषधि नहीं पाते थे।

यह सब देख के माथा ठनका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है कि महाराजा पृथु ने पृथ्वी पर क्यों क्रोध, किया। महाराजा पृथु सदैव ही अपनी प्रजा को सुखमय जीवन देने के लिए तत्पर रहते थे, चाहे कैसी भी विकट समय क्यों न हो। हर विकट समस्या से बाहर निकलने की पूर्ण क्षमता थी उनमे।

—————

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यह कविता (पृथु का पृथ्वी पर क्रोध।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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महाराजा पृथु अभिषेक।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ महाराजा पृथु अभिषेक। ♦

पृथु – अभिषेक आयोजन हुआ।
अभिनंदन वेदमयी ब्राह्मणों ने किया।
पृथ्वी, नदी, गौ, समुद्र, पर्वत, स्वर्ग,
सब ने अर्पण उपहार किया।

उपहार मिला सब तटका – टटका
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

गंधर्व ने मिल किया गुणगान,
सिद्धों ने मिल पुष्प वर्षा कर बढ़ाया मान।
समवेत स्तुति ब्राह्मणों ने किया करके,
दिया मुक्त मन से समुचित ज्ञान।

दीया ज्ञान सब ने दस – दस का
हूं कवि मैं सरयू तट का।

विश्वकर्मा ने दिया सुंदर रथ।
चंदा ने अश्व दिये अमृत मय।
सुदृढ़ धनुष दिया अग्नि ने।
सूर्य ने बाण दिया तेजोमय।

शत्रु को करारा दे जो झटका,
कवि हूं मैं सरयू तट का।

सुदर्शन चक्र दिया विष्णु ने।
लक्ष्मी ने दी संपत्ति अपार।
अंबिका चंद्राकार चिन्हों की ढाल।
रूद्र दे दिए चंद्राकार तलवार।

काम जो करे सरपट सरपट का,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

पृथ्वी दी योगमयि पादुकाएं।
आकाश ने नित्य पुष्प मालाएं।
सातों समुद्र ने दिया शंख।
पर्वत नदियों ने हटाई पथ बालाएं।

बना दिया आपको जीवट का,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

जल – फुहिया जिससे प्रतिपल झ,
वरुण ने छत्र – छत्र श्वेत चंद्र – सम।
धर्म ने माला वायु दो चंवर दिया।
मुकुट इंद्रने ब्रह्मा ने वेद कवच का दम।

संपूर्ण सृष्टि का माथा ठनका,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

सुंदर वस्त्रों – अलंकारों से,
हुये सुसज्जित श्री पृथु राज।
स्वर्ग – सिंहासन विराजमान,
आभार अग्नि की जस महाराज।

पहुंचे सभी न कोई अटका,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

सूत – माधव बंदीजन गाने लगे।
सिद्ध गंधर्व आदि नाचने बजाने लगे।
प्रीति को मिली अंतर्ध्यान शक्ति।
महाराज को सभी बहलाने लगे।

दे दे करके लटकी – लटका,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

गुण कर्मों का बंदीजन गुणगान किया।
महाराज ने सभी को मुक्त भाव से दान दिया।
मंत्री पुरोहित पुरवासी सेवक का मान किया।
चारों वर्णों का महाराज ने सम्मान किया।

गुंजाइश नहीं किसी खटपट का,
कवि हूं मैं सरयू – तट का ।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने राजा पृथु के अभिषेक का मनोरम सुन्दर दृश्य का सटीक वर्णन किया है। बहुत ही सरल शब्दों में बताया है, की किस किस दैवी शक्ति ने कौन – कौन सा अस्त्र दिया महाराजा पृथु को। इस कविता को पढ़ते समय आप महाराजा पृथु के दरबार की अनुभूति करेंगे।

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यह कविता (महाराजा पृथु अभिषेक।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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नारी सम्मान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नारी सम्मान। ♦

भगवान का दिया अनमोल,
उपहार, जग में नारी।
ईश्वर ने सब गुणों का,
समावेश कर, धरती पर उतारी।

त्याग, तपस्या, ममता का,
रूप इसने धारा।
जग में होती ये,
हर घर का उजियारा।

इस धरा को अपने अस्तित्व से,
प्रकाशवान किया, वो तो है नारी।
कभी पुत्री, कभी वधू , कभी माँ,
कभी सास का रूप ये धारी।

श्रृंगार, विरह, वेदना, प्रीत, ममता के,
सब रस इसमें ही समाहित।
इसके सद्गुणों का स्मरण भी,
करें प्रसन्न चित।

नारी – सम्मान को किन किन,
शब्दों से करूँ, मैं बखान।
इसके सद्गुणों पर वारी जाऊँ,
जो बढ़ा दे हर परिवार का मान।

नारी – सम्मान जग में लायें,
अमन, खुशहाली।
इनके गुणों का मान करें,
फिर हो जायें, रोज दीवाली।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस संसार में नारी की जगह कोई और नहीं ले सकता, नारी हर रूप में ममतामयी है। इस धरा को अपने अस्तित्व से, प्रकाशवान किया, वो तो है नारी। कभी पुत्री, कभी वधू , कभी माँ, कभी सास का रूप ये धारी। श्रृंगार, विरह, वेदना, प्रीत, ममता के, सब रस इसमें ही समाहित। इसके सद्गुणों का स्मरण भी, करें प्रसन्न चित।

—————

यह कविता (नारी सम्मान।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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पृथु का प्रादुर्भाव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पृथु का प्रादुर्भाव। ♦

कवि हूं मैं सरयू – तट का।
समय चक्र के उलट पलट का।

मानव मर्यादा की खातिर,
मेरी अयोध्या खड़ी हुई।
कालचक्र के चक्कर से ही,
विश्व की आंखें गड़ी हुई।

हाल ये जाने है घट घट का।
कवि मैं सरयू – तट का।

प्रादुर्भाव हुआ पृथु – अर्ती का,
अंग – वंश वेन- भुजा मंथन से।
विदुर – मैत्रेय का हुआ संवाद,
गंधर्व ने सुमधुर गान किया मन से।

मन भर गया हर – पनघट का।
भाग्यशाली घूंघट का।

मनमोहक हरियाली छाई।
सकल अवध खुशियाली आई।
राजा पृथु का आना सुनकर।
ऋषियों की वाणी हरसाई।

मगन हुआ मन घट – पनघट का।
कवि हूं मैं सरयू तट का।

पृथु के पृथ्वी पर प्रादुर्भाव से,
दोस्तों को लगा बड़ा झटका।
माया – मोह को उसी ने पटका,
काबिल हूं मैं सारी घूंघट का।

विवेकी पुरुष कहीं ना भटका।
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने राजा पृथु के प्रादुर्भाव का, अवध के मनोरम सुन्दर दृश्य का वर्णन किया है। ऋषियों के वाणी हरसाई, सकल अवध खुशियाली आई।

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यह कविता (पृथु का प्रादुर्भाव।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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अपने घर में मगन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अपने घर में मगन। ♦

रच – रच कर रचनाएं,
कालिख पन्नों पर घोली।
अपनी ही गति में मगन,
प्रतिबिंब कही नहीं खोली।

मन – मजीरा चौरस खापें,
चौखट – चौखट पे खांचा।
धरा की संरचना ऐसी की,
जाकर चारों तरफ से भागा।

आस – पास में खतरे सारे,
भीड़ भरी सड़कों को नापा।
उबड़ खाबड़ गिरी बस्ती में,
गीत गांव – गांव नया गाता।

चिकने – चिकने रंग रूप से,
लिख पढ़ कर सभी लुभाता।
राग – रंग व्यापारिक सपना,
दुनिया को अपना ही भाता।

दूर-दूर अपरिचित सब जैसे,
कैसे कहां कौन हंसा पाता।
रोशनी में बंधा हुआ अंधरा,
कोई कैसे किसे समझा पाता।

मोहित होता है अपना मन,
पढ़-पढ़ कर रचना की पक्ति।
ज्ञात नहीं पीतल की उत्पत्ति,
करता रहता सुवरण पर गर्व।

ओ कुशल लेखनी का संभल,
निश्चित जगत में तेरा है पथ।
पवन घन को जैसे है हांकता,
दिनकर की किरणों सा चल।

वाह्य जगत में जीवन मेरा,
हो अंतर जीवन प्रतिबिंवित।
सुख की अभिलाषा में कवि,
रचते रहें वह रचना उत्कृष्ट।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने एक लेखक / कवि के मन में चलने वाले विचारों के प्रवाह में बसने वाले एक-एक शब्द को जोड़ कर उसे सही तरीके से संजोने को बहुत ही अच्छी तरह से कई सारे उदहारण देकर बताया हैं।

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यह कविता (अपने घर में मगन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार।

योग दिवस – 2026

निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

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