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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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poet sukhmangal singh

मौसम बुलाने की कोशिश।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मौसम बुलाने की कोशिश। ♦

मौसम इशारों से बुलाने की सोचिए,
रुठा वह तो उसे मनाने की सोचिए।
जमाने में कोई दिवाना नहीं है तेरा,
गर मचले, सीने से लगाने की सोचिए।

ख़त लिख दी, एक प्यार की बातें,
तनहाई रंगीन बनाने की सोचिए।
जाग रहे मुझे अच्छा नहीं लगता,
अंधेरे की नींद चुराने की सोचिए।

मौसम मिजाज बढ़ चढ़ दिखाएं,
उमड़े ख्वाब दिखाने की कीजिए।
दिल को खुद समझाने की सोचिए,
पूर्वजों की थाती सजाने की सोचिए।

नदियां – झरना बचाने की सोचिए,
धरा पर पौधा लगाने की सोचिए।
कूड़ा – करकट हटाने की सोचिए,
मौसम धीरे से बुलाने की सोचिए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — मनुष्य के द्वारा प्राकृतिक संसाधन के असंतुलित दोहन प्रकृति का संतुलन बिगाड़ रहा हैं। अगर चाहते हैं की आने वाली पीढ़िया सुखमय जीवन जिए तो – आओ हम सब मिलकर ये संकल्प ले की सभी को प्रत्येक वर्ष कम से कम 1 पेड़ जरूर लगाना है, और उसका देखभाल भी करना है, तब तक जब तक वो पेड़ अच्छे से अपना बचाव और बढ़ाव खुद न करने लगे। जब ज्यादा पेड़ होंगे वर्षा भी अच्छी होगी जिससे नदियां – झरना सब जल से भरपूर होंगे, चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी। हमें साफ – सफाई का भी ध्यान रखना है कहीं भी यूँ ही कूड़ा – करकट नही करना हैं।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (मौसम बुलाने की कोशिश।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

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साहित्य – साहित्य की विशेषताएं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ साहित्य – साहित्य की विशेषताएं। ♦

साहित्य समाज का हित करने वाला,
विश्व के कल्याण की भावना रखता।
अपनी संस्कृति का पहचान कराता,
समाज का सुंदर दर्पण बनके आता॥

सत्यों की निरंतर खुद ध्यान करता रहता,
सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पलता।
समाज का प्रतिबिंब हुआ वह आता,
समंदर सी गहराई वह अंदर रखता॥

विविध भाषाओं के माध्यम से समाज,
की घुटने बचाने का प्रयास करता॥

भक्ति कालीन साहित्य आता और,
पावन धरा पर ही अवतरित होता।
समाज की सामाजिक विषमता को,
समूल नष्ट करने का प्रयत्न करता॥

रीति कालीन साहित्य जीवन की,
सरसता से ओत प्रोत करता है।
रीतिकालीन साहित्य किसी बंधन में,
बंध कर नहीं, रहना चाहता है॥

साहित्य समाज का आईना होता है,
वाचिक – लिखित रूप साहित्य होता।
साहित्य को मनोरंजन का ही केवल,
साधन नहीं माना जा सकता है॥

सबसे पुराना साहित्य वाचिक ही है,
जो आदिभाषी भाषाओं में मिलता है।
यह पाखंड की कटुता से दूर ले जाता,
सदाचार का मूल तत्व समझाता है॥

स्त्री और गृहस्थ जीवन के मोक्ष द्वार खोलता,
लोग साहित्य की ओर आकृष्ट होते हैं।
साहित्य में, भोग में निर्माण की भावना होती,
सिद्धों का सिद्धांत पक्ष सहज कहलाता है॥

सिद्ध अशिक्षित और हीन जाति से होते हैं,
विडम्बना, नारी का उपभोग करते हैं।
सिद्ध साहित्य, हिंदी साहित्य में महत्त्व रखता है,
संप्रदाय के सिद्धांतों से साहित्य का निर्माण करता है॥

साहित्य मौलिक लेखन की प्रेरणा देता,
मातृभाषा का परिपूर्ण महत्त्व बताता।
तार्किक और गंभीर शैली समझाता,
अलौकिक ज्ञान की अनुभूति कराता॥

साहित्य विविध रूपों से प्राकृतिक छवि दर्शाता,
रहस्यमयी युक्तियों की गुत्थी सुलझाता॥

साहित्य में अनुभूति और भावबेग मूल तत्व है,
भावबेग का चित्रण आनंद प्रदान करता है।
वास्तव में ही आनंद ही साहित्य का उद्देश्य,
सौंदर्य की तरफ आकृष्ट करना – काव्य उद्देश्य॥

आनंद की सृष्टि के मूल में साहित्यकार है,
साहित्यकार की आत्माभिव्यक्ति की शक्ति है।
साहित्य के मूल में साहित्यकार के आत्मा की आवाज,
सच्चाई और संपूर्णता के अनुपात से विद्यमान है॥

कुशल साहित्य साहित्यकार को आनंदित करता है,
और फिर पाठक को भी आनंद प्राप्त होता है॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

Note: — वाचिक = बोलकर समझाना।

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — युग चाहे कोई भी हो, साहित्य की जरूरत सदैव ही बना रहेगा। अच्छे साहित्य से ही अच्छे समाज का निर्माण होता है, और एक अच्छे समाज से एक अच्छे राष्ट्र का निर्माण होता हैं। साहित्य भूत, वर्तमान और भविष्य तो बताता ही हैं साथ में — कला, संस्कृति, गुणों, तार्किक और गंभीर शैली को भी समझाता है। अच्छा साहित्य विविध रूपों से प्राकृतिक छवि दर्शाता, अलौकिक ज्ञान की अनुभूति कराता, रहस्यमयी युक्तियों की गुत्थी को भी सरलता पूर्वक सुलझाता।

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यह कविता (साहित्य – साहित्य की विशेषताएं।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

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शारीरिक क्रियाएं – नव जीवन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शारीरिक क्रियाएं – नव जीवन। ♦

विद्युत तरंगों से पोषित मानव शरीर,
प्राकृतिक वातावरण शांति भाषा की।
शीघ्र मुक्ति पाने की कामना करता,
मंदिर – गिरजाघर खोज में रहता॥

सात्विक, आध्यात्मिक ऊर्जा संपन्न खोजने,
शास्त्र – पुराण में वह खोज करता है।
कष्ट प्रद स्थित में जब होता मानव,
असंतुष्ट हो कष्ट से छटपटाता॥

कामनाओं के भंवर से उबर नहीं पाता,
मुक्ति मार्ग पर वह भटकते हुए जाता है?
आत्मबल भी कमजोर हो जाता,
नकारात्मकता से वह जीवन बिताता।

आपाधापी से गुरूर होने लगता है,
प्रेत योनि में ही, वह अक्सर चला जाता।
दुर्घटना से शरीर तुरंत छूट जाती,
इच्छाएं कामनाएं ही याद में रह जाती॥

आत्मा का अस्तित्व शक्तिशाली होता,
कामना और इच्छा शक्ति प्रबल होती।
विद्युतीय सूक्ष्म शरीर का क्षरण नहीं होता,
अचानक आघात से शरीर का अंग काम नहीं करता॥

ब्राह्मण! अकाल मृत्यु होने पर ब्रह्म हो जाता,
हजारों वर्ष सूक्ष्म शरीर नष्ट होने का इंतजार करता।
भूत, प्रेत जिन्न – पिशाच में चला जाता,
जिस अस्तित्व का मानव कल्पना नहीं करता है॥

आधुनिक विज्ञान और पश्चिमी देशों ने,
भूत – प्रेत जीवधारी सूक्ष्म शरीर माना है।
स्वाभाविक मृत पहले, धीरे-धीरे शरीर की,
काम करने वाली क्रिया को बंद करते जाता है॥

यानी ऊर्जा परिपथ का क्षरण होता रहता,
शरीर सुन्न और मस्तिष्क का, ह्रदय से संबंध छूट जाता॥

सब कुछ शरीर के अंग को सुन्न कर देता,
अंत में प्राण शरीर से निकल जाता है।
आत्मा कोई दूसरा विद्युत तरंगों की शरीर तलाशता,
भ्रूण के रूप में उसमें प्रवेश कर जाता है॥

मानव और जंतु का शरीर कोशिका से निर्मित होता,
उस शरीर में विविध अवयव पाया जाता है।
नाभिक में एक अदृश्य किरण जुड़ी होती है,
एक छोर पर सूक्ष्मतम परमाणु कण मिलता॥

जिसने उसके पालन पोषण का प्रयत्न करता,
वैज्ञानिक उसे गॉड पार्टिकल नाम से पुकारता।
अपने कर्मों के फल से जीव प्रेत योनि को पाता,
और धरती पर आकर अपना शुभ कर्म भूल जाता॥

धर्म परायण जीव भोग में जगत को पाता,
राजा बनकर धरती पर फिर, वही यहां आता।
विद्दूतीय तरंगों से पोषित मानव इस शरीर,
और प्राकृतिक वातावरण में, शांति पाता॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — पांच तत्वों से मिलकर बना ये शरीर जिसका मूल स्वरूप शांत है और इस शरीर को चलायमान बनाने वाली ऊर्जा का भी मूल स्वरुप शांत है। इंसान अपने कर्मों के अनुसार अपना भाग्य बनता है। इंसान के कर्म ही उसे इस संसार में जीवित रखते है। इसलिए अच्छे कर्म ही करना चाहिए मानव को इस संसार में। आपके अच्छे कर्म आपको सद्गति देंगे व बुरे कर्म दुर्गति देंगे। अकाल मृत्यु किसी भी इंसान को प्रेत योनि में ले जाता है। इच्छाओं के भंवर से बाहर निकले सत्य का बोध कर सन्मार्ग पर चलकर धर्म परायण अच्छे कर्म करें।

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यह कविता (शारीरिक क्रियाएं – नव जीवन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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पुरखे जागे – तुम जागो।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पुरखे जागे – तुम जागो। ♦

कल तक पुरखे जाग रहे थे,
जागो अब, तुम जागो।

आंगन मेरा ही है श्रृंगार,
जिसमें विविध पुष्पों का बहार।

विदीर्ण न हो आनंद कानन,
जागो फिर, तुम जागो।

आत्म निरीक्षण तुम करना,
धरा आलोकित अपनी रखना।

अनंत प्राकृतिक संपदा की,
रक्षा तुम्हीं को है करना।

मन के दिन मणि प्रेम प्रकाश,
पांव बढ़ाओ जागो।

बाहें अंगणित बढ़ने वाली,
बढ़ो बढ़ – छांटो पाश।

यदि हो आंगन आश,
रण में बिछा दो दुश्मन लाश।

होगी नहीं पूरी अभिलाषा,
बजा दो उनके ताशा।

नहीं पता है उसको आज,
बांधे सपने रक्खे ख्वाब।

व्यग्र निगाहें उचक उचक कर,
ढूंढ रही सूनी राह।

जागो तुम फिर जागो,
कल तक पुरखे जाग रहे थे।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — अभी तक घर के पुरखे ( वृद्ध ) लोग घर से लेकर बाहर तक सबकुछ देखते संभालते आ रहे थे अब तुम सम्भालो। अब तुम्हारी जिम्मेवारी है सब देख रेख करने का। अब तुम्हारे कंधो पर भविष्य की जिम्मेवारी है, जैसे को तैसा जवाब देने की बारी है।

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यह कविता (पुरखे जागे – तुम जागो।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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साहित्य और हथियार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ साहित्य और हथियार। ♦

साहित्य जीवन की शक्ति है,
जीना जीवन का अभिव्यक्ति।
साहित्य का पढ़ना भक्ति है,
साहित्य रचना अभिव्यक्ति है॥

अभिव्यक्ति समर्थ शक्ति है,
शक्ति में निहित भक्ति है।
साहित्य जीवन की शक्ति है,
भक्ति सत साहित्य प्रवीण है॥

इतिहास अतीत बताता है,
अतीत – मार्ग दर्शाता है।
साहित्य आगे चलने वाली ढाल,
शिक्षा विवेक शील हथियार है॥

शिक्षा से बदलाव आता है,
स्वावलंबी बनने में मददगार है।
और शिक्षा सदमार्ग दिखाती है,
शिक्षा लोकप्रिय बनाती है॥

हथियार रक्षा करता रहता है,
संस्कृति रक्षा आवश्यक है।
संस्कृति में सद्भाव पलता है,
सद्भाव सच्चा प्रेम रखता है॥

प्रेम से समाज बनता है,
समाज नेक काम करता है।
व्यवसाय में कभी केवल,
जज्बात नहीं चलती है।
सब कुछ होता है परंतु,
यह बात नहीं होती है॥

शोहरत इज्जत पाने में,
मैं! जिसने नीलाम किया।
वही आज इस दुनिया में,
सबमें बड़ा महान हुआ॥

उसी को ऊंचा नाम मिला,
जिसने सभी का गुणगान किया।
सबका उसने सम्मान किया,
उसको दुनिया ने मान लिया॥

लोगों को बर्बाद करने वाला,
पहले खुद बरबाद होता है।
सत्यवादी मार्ग बताने वाला,
घमंड का विनाश करता है॥

इच्छाएं अनंत राह चलने वाली,
विनम्रता उचाई देने वाली है।
संतोष से खुशियां मिलने वाली,
सद कर्म अच्छाई सिखाता है॥

सत कर्म मनुष्य करने वाला,
वक्त भांप कर चलने वाला।
जीवन में सदा संतोषी स्वभाव,
ही, सबकी भलाई करने वाला॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — किसी भी इंसान और समाज के लिए साहित्य और हथियार की क्या अहमियत है? किसी भी इंसान और समाज को कब साहित्य का और कब हथियार का उपयोग करना चाहिए? साहित्य और हथियार क्यों सभी के लिए जरूरी है? साहित्य बुद्धिमत्ता के लिए और आत्मरक्षा के लिए हथियार क्यों जरूरी है?

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यह कविता (साहित्य और हथियार।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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दुनिया हिंदी को राष्ट्रभाषा जानती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दुनिया हिंदी को राष्ट्रभाषा जानती। ♦

हिंदी भाषी राज्यों की आबादी,
46 करोड़ से अधिक बताई जाती।
जनगणना के हिसाब से भारत में,
1.2 अरब (2011) की है पूरी आबादी।

जिसमें 48.3 फीसदी मातृभाषा,
हिंदी ही माध्यम से बोली जाती।
80 करोड़ से अधिक लोग दुनिया में,
25 देशों में हिंदी बोली जाती।

विश्व में हिंदी भाषा धाक जमाई,
तीसरी ज्यादा बोली भाषा कहलाती।
हिंदी भाषा की पूरी शक्ति संपन्न सूची,
1298617995 गूगल हमें बताइए।

सन 1900 ई. में हिंदी को मिला,
कचहरियों में भी सफल स्थान।
सन 1905 ई. में बंग विच्छेद विरोध,
में स्वदेशी आंदोलन छिड़ गया।

धीरे धीरे यह आंदोलन बड़ा शक्तिशाली,
अखिल भारतीय रूप लेता गया।
स्वदेशी आंदोलन के फलस्वरुप,
हिंदी की ओर लोगों का ध्यान गया।

आगे चलकर काशी में ही 1910 में,
आखिर भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई।
हिंदी के भावी विकास में मददगार,
इस संस्था का सबसे बड़ा हाथ रहा।

विभिन्न क्षेत्र में विभिन्न भाषा फिर भी,
रूचि के लोगों ने हिंदी को अपनाया।
जिसने भी चाहा, हिंदी को उसने अपने,
ढंग से बोलना और लिखना आरंभ किया।

शब्दों की मनमानी के साथ वाक्य रचना,
और शैली भी भिन्न – भिन्न प्रयुक्त होने लगी।
इस विविधता में भाषा की आंतरिक,
शक्ति को बढ़ाने में क्षति नहीं पहुंची।

मातृभाषा के लिए अनुराग और सेवा का,
कर्तव्य बोध अवश्य लोगों में जागा।
हिंदी की पुस्तकें ज्यादा आने लगी,
हिंदी पत्रों के पढ़ने वाले ग्राहक बढ़ने लगे।

स्कूल कालेजों में हिंदी पढ़ने वाले छात्रों,
की संख्या बढ़ने और पढ़ने लगी।
सन 1891 ई. हिंदी पत्रों की संख्या,
कुल ग्राहक संख्या 8000 ही थी।

और सन 1936 में हिंदी पत्रों की संख्या,
324880 तक की लोगों में पहुंच गई।
तत्कालीन मुसलमानों ने अस्तित्व की ,
उनमें बड़ी आशंका होनी लगी।

धर्म की दुहाई देकर भाषा का,
खुल्लम खुल्ला विरोध करने लगे।
कुछ ने कहा हिंदी नाम की कोई भाषा ही नहीं,
इस विवाद के कारण हिंदी और आगे बढ़ी।

जीवंत भाषा का सबसे बड़ा लक्षण,
उसकी ग्राहीका शक्ति होती।
जीवंत भाषा का लक्षण हिंदी में,
बौद्धिक मानसिक स्तर को उठाता।

विश्व मानता हिंदी को राष्ट्रभाषा,
साहित्यकारों बतलाओ अपनी आशा।
( साभार हिं. साहित्य का वृ. इतिहास, गूगल वर्तमान )

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

नोट: इस कविता/लेख में जनसंख्या का आंकड़ा भारतीय जनगणना 2011 के अनुसार है। भारत की वर्तमान जनसंख्या 136.64 crores (2019) है। बहु भाषी भारत के हिन्दी भाषी राज्यों की आबादी 46 करोड़ से अधिक है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की 1.2 अरब आबादी में से 41.03 फीसदी की मातृभाषा हिंदी है। हिन्दी को दूसरी भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने वाले अन्य भारतीयों को मिला लिया जाए तो देश के लगभग 75 प्रतिशत लोग हिन्दी बोल सकते हैं।

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — अंग्रेजो से आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा की मान्यता आधिकारिक रूप से क्यों दर्ज नही हुआ, हिंदी को उसका सम्मान क्यों नहीं मिला? हिन्दी राष्ट्रभाषा के महत्व, गुणों और प्रभाव को बताया है। हिन्दी हर भारतीय के दिल से निकलने वाली भाषा हैं। हिन्दी भाषा दिल को दिल से जोड़ने का कार्य करती है। एकलौती हिन्दी भाषा ही है जिसमे अपनापन है दुनिया की किसी भी अन्य भाषा अपनापन का स्थान नहीं।

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यह कविता (दुनिया हिंदी को राष्ट्रभाषा जानती।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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बढ़ती जनसंख्या।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बढ़ती जनसंख्या। ♦

बढ़ रही जनसंख्या समाज बचाएं,
सबको समझाएं आगे आयें।

मतभेद – मनभेद न पालें सीमित संसाधन,
उत्तम जुगति अपनायें आगे आयें।

अंधविश्वासी देश न हो ईश्वरीय विधान बताके,
भूखा बच्चा न सुलायें आगे आयें।

नियंत्रण आवश्यक कानून बनवाएं,
पालन कराने आगे आयें।

भूख से बेहाल न हो दूध मुहें बालक हमारे,
थोथी ढोल ना बजायें आगे आयें।

बालक दूध नसीब नहीं इधर-उधर की बातें होती,
समय ना गंवायें आगे आयें।

भीड़ बहुत बढ़ रही रोटी के लाले पड़े,
स्त्री मशीनरी नहीं, दुनियां – समझाएं।

विवशता पर चर्चा होगी? स्त्रियों की दुर्दशा होती,
कृत्रिम साधन अपनायें, आगे आयें।

ब्रह्मचर्य – संयम अपनायें बल – बुद्धि बढ़ाएं,
राष्ट्र निकम्मा न हो लोगों से बताएं।

राजनीति में चर्चा होती, उठ कर जानें क्यों दबती,
फिर वही भाषा आती राष्ट्रभाषा अपनाएं।

लंपट के काफिलों में शैतान को पहचानिए,
कानून नया बताएं आगे आयें।

प्रेमचंद का उपन्यास 1929 ई. पढ़ जायें,
नियंत्रण कानून लायें आगे आयें।

हम दो और हमारे दो का मूल मंत्र अपनाएं,
स्वस्थ समाज बनायें आगे आयें।

संतुलित आहार जरूरी, युग परिवर्तन आवश्यक,
खुद बुद्धि सबल बनायें आगे आयें।

जीवन है अनमोल दुधमुंहे को दूध पिलाएं,
बच्चों को मजबूत बनाएं शोक में न आयें।

प्रेमचंद की कहानी ‘ गमी ‘ कहती,
नियंत्रण अपनाए आगे आयें।

भवजाल से ऊपर संकल्प अपनाएं,
अपना संतोष जनक समाज बनाएं।

मजबूत जिगर के बच्चे अपनी धरा पर आएं,
नियंत्रण नियम अपनाएं कानून लाएँ।

ओजस्विता की खोज में भाव सकारात्मक हो,
समय ना गवाएं, कानून बनाएं आगे आयें।

शहर से दूर गांव तक, सौदागरों के ठांव पर,
मालिक दहलीज तक आगे जाएं।

अंधेरे की कोठरी से निकल बाहर आएं,
दूर दृष्टि अपनाएं आगे आएं।

गलतफहमी में तकलीफ भोलेपन से बाहर निकलें,
इंसानियत न छिपाएं जनता को जगाएं।

छोटी सी झुंझलाहट निकालने की आहट,
आगे बढ़ कर आए लोगों को बताएं।

जनसंख्या नियंत्रण कानून मिलकर बनवाएं,
उसका पालन कराने आगे आयें।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जनसंख्या नियंत्रण कानून क्यों जरूरी है? जनसंख्या को नियंत्रण करने के लिए हम सभी को आगे क्यों आना है? जनसंख्या को नियंत्रित करने से आने वाली पीढ़ियां ज्यादा तकलीफ में नही रहेंगी। इस संसार के सारे संसाधन सीमित मात्रा में ही है, इसलिए संभल जाएं वरना पछताने के सिवा कुछ नहीं बचेगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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वंदे मातरम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वंदे मातरम। ♦

झूम – झूम कर वीर जवानों,
जनगणमन के गीत गाना।
शांति – भक्ति साथ तुम्हारे,
वंदे मातरम मीत सुनाना॥

शांति – क्रांति की लहर उठी,
तिरंगा ऊंचा लहराना।
माता बहनें बच्चे रहे सुरक्षित,
सबको लोकतंत्र में सिखाना॥

गुप्त मंत्र, नाम के सौदागर,
संग गाऊं को घटा बताना।
छीटे, कीचड़ हैं पड़ोस के,
तड़क – भड़क से बचे रहेंगे।
भावी भेंट चढ़े ना ‘मंगल ‘
वर्तमान बढ़ – चढ़ चलना॥

फूक – फूक पग नाप चलें,
वीर जवानों साथ चलें।
फ़ौलादी बंजारे – हरकारे
रस्ते अंधियारे स्याह करें।
बादल ऊपर घर आतंकी,
ओलों की बौछार करें॥

दुश्मन ओढ़े खाल अड़ियल,
उनको सबक सिखाना।
कंचन ओढ़े धन – वैभव,
सीमा पर उन्हें बुलाना।
यतन योग जागृति लव ले,
चारों दिशाओं में फैलाना॥

संदेहों के हैं बाजीगर सारे,
चहल – पहल दिखाना।
मन – मंथन पाछे कर लेंगे,
आगे बढ़कर चलते जाना॥

बदली – बदली चाले चलती,
शौर्य गाथा औ अभिलाषा,
झंझावाती बातूनी हरियाली,
भूले बिसरे पथ हो खुशहाली।
संघर्षों का वह ध्यान सुनाना,
आगे बढ़ – चढ़ चलते जाना॥

लाल गुलामी वा हो काली,
इतिहास का पाठ पढ़ाना।
राष्ट्र सुरक्षा में मां के वीर,
बढ़ – चढ़ कदम बढ़ाना॥

प्राचीन इतिहास से सीखते,
नवीन संकल्प दोहराना।
शंकाओं के आनन फानन में,
शंख ध्वनि, गांडीव उठाओ॥

झूम – झूम कर वीर जवानों,
वंदे मातरम मीत सुनाना।
शांति का क्रांतिकारी कदम बढ़ा,
आगे बढ़ते और चलते जाना॥

सदैव ही भारत माता की सेवा में तत्पर रहो मेरे देश के वीर सपूतो, तुम रूकना नहीं, थकना नहीं चाहे दिन हो या रात। भारत माता की सेवा में अपना सर्व ऊर्जा लगाकर, आतंकी का खात्मा कर, शांति का क्रांतिकारी कदम बढ़ा, आगे बढ़ते और चलते जाना।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — झूम – झूम कर वीर जवानों, जनगणमन के गीत गाना। शांति – भक्ति साथ तुम्हारे, वंदे मातरम मीत सुनाना। वीर रस से भरपूर उत्साह बढ़ाने वाला संचार भर कर तन मन में, सदैव ही भारत माता की सेवा में तत्पर रहो मेरे देश के वीर सपूतो, तुम रूकना नहीं, थकना नहीं चाहे दिन हो या रात। भारत माता की सेवा में अपना सर्व ऊर्जा लगाकर, आतंकी का खात्मा कर, शांति का क्रांतिकारी कदम बढ़ा, आगे बढ़ते और चलते जाना। झूम -झूम कर वीर जवानों, वंदे मातरम मीत सुनाना। बहुत ही खूबसूरत वर्णन किया है।

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यह कविता (वंदे मातरम।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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राम : द्वारा दुष्टों का संहार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राम : द्वारा दुष्टों का संहार। ♦

राजा दशरथ के सत्य वचन की रक्षा में,
श्रीराम राज पाठ छोड़ कर वन में निकले।
वन में वे चलते चलते जब थक जाते,
हनुमान और लखन उनका पांव दबाते॥

सहन नहीं कर पाते कुमारी से पांव दबवाना,
जनक नंदिनी सुकुमारी जानकी जी को सबने माना।
श्रीराम के वक्ष: स्थल में जिसे सम्मान मिला,
उन्हें लक्ष्मी – सीता जी का ही नाम मिला है॥

लक्ष्मण द्वारा रावण की बहन सूर्पनखा का,
नाक कान काटने से,
अपनी प्रियतमा का वियोग उन्हें सहना पड़ा।
वियोग के कारण उनकी क्रोध में तनी भौहों से,
भारी समुद्र को भी भयभीत होना पड़ा॥

लंका जाने के लिए एक पुल बाधा गया,
समुद्र ऊपर पुल से सेना लंका कूंच किया।
पहले ही वीर हनुमान ने लंका को जैसे जला दिया।
जस जंगल की दावाग्नि जले वैसे ही मिटा दिया॥

सीता स्वयंबर में शिव का धनुष जिसको,
बड़ा – बड़ा वीर योद्धा भी हिला नहीं पाया।
गुरु का आदेश मिलते ही बात – बात में राम ने,
डोरी चढ़ा खींच कर दो टुकड़ा उसका कर दिया॥

पिता वचन शिरोधार्य कर स्वजन छोड़ जंगल  पयान,
योगी जैसे काया छोड़ चलता है अपने धाम।
खर दूषण, तृषिरा जैसे राक्षसों का संहार किया,
महा धनुष बाण चला कर दुष्टों पर वार किया॥

पर्ण कुटी तक स्वर्ण हिरण भेष में छुपे मरीच आया,
श्री राम ने उसको भी दौड़ा कर मार गिराया।
दक्ष प्रजापति को जैसे वीरभद्र ने मारा था,
उसी तरह श्री राम ने उसका पीछा कर संहार किया॥

सुग्रीव का बड़ा भाई बलवान और था आतताई,
बालि हरण कर सुग्रीव की पत्नी को घर लाया।
वचन देकर सुग्रीव को श्री राम ने उसको मारा,
मार उसे राम ने वचन और मित्रता का धर्म निभाया॥

राम और रावण की सेना में भीषण युद्ध हुआ,
एक एक कर क्रमश: रावण के वीरों का संहार किया।
जब श्री राम जी के सम्मुख था रावण आया,
शिरोमणि राम ने अभिमानी को फटकार लगाया॥

मेरी अनुपस्थिति में प्राण प्रिया मेरी हर कर लाया?
काल को कोई टाल नहीं सकता तेरी सामत आई!
वज्र समान वाण चलाया, खून फेंक दिया रावण वहीं,
रावण का हृदय विदीर्ण हुआ वह हुआ धरासाई॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — समय समय पर रावण से लेकर खर दूषण, तृषिरा जैसे राक्षसों का संहार किया – मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ने, बहुत ही खूबसूरत वर्णन किया है।

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यह कविता (राम: द्वारा दुष्टों का संहार।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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पंजशीर : मानवता शर्मसार हुई।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पंजशीर : मानवता शर्मसार हुई। ♦

दुनिया के सारे आतंकी इकट्ठा एक जगह आये,
मानवता के विरोध में पाकिस्तान ने साथ दिया।
उसने अफगानी मनुष्यों को निरीह बनाया,
मानवाधिकार का दुनिया ने आवाज नहीं उठाया॥

भोजन पानी आवश्यक वस्तु जनता नहीं पा रही,
दुनिया इस घोर अत्याचार को आंखों से देख रही।
इतिहास लिखने वालों ने कोरी कलम चलाया,
धिक्कार धिक्कार धिक्कार दुनिया को सुनाया॥

पाक प्रायोजित प्रोपोगंडा तालीवान ने फैलाया,
पंजशीर को जीतने का भ्रम दुनिया से चलाया।
मसूद के लड़ाकों ने मंगलवार को हवाई हमला किया,
16 दिन से मसूद, तालीवान – पाकिस्तान से लड़ रहा॥

पाक आई एस प्रमुख हे फैज अफ़ग़ान आया,
अर्ध रात्रि सितंबर 3, 21को पाकिस्तान बम बरपाया।
पाक ने पंजशीर में सेना लेकर उसपर दहाया,
दुनियां से पंजशीर गुहार सहायता की लगाया॥

अहमद मसूद पाक और तालीवान से लड़ रहा,
मसूद ने तालिबान के खिलाफ आने की उम्मीद की।
अफगानी औरतों ने विरोध का बिगुल बजाया,
मसूद के लड़ाकों ने हजारों दुश्मन मार गिराया॥

अपने को भी पंजशीर ने लड़ाई में वीर गवाया,
उधर ईरानी पाकिस्तान को संदेश देकर चेताया।
अपनी हद में रहने की इमरान को इरान सुनाया,
भीषण युद्ध आगे होने वाला है ऐसा संदेश आया॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — वर्तमान समय में तालिबान के लड़ाकों या यूँ कहे इंसानियत के दुश्मन आतंकवादियों द्वारा अफगानिस्तान के पंजशीर पर कब्जा और उनकी बर्बरता लूट, बलात्कार, हत्या, और खून खराबा करने की नाकाम कोशिश को दर्शाया है।

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यह कविता (पंजशीर : मानवता शर्मसार हुई।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: अफगानी – दुर्दशा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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