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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2021-KMSRAJ51 की कलम से

देव दीपावली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ देव दीपावली। ♦

देव दीपावली महापर्व।

गंगा तट की लहरें डोलीं,
रोचक कथा कण – कण बोले।
देवता दीप प्रज्वलित करते,
देव दीपावली मनाते हैं।

योग साधना के द्वार खोलकर,
जंगल झाड़ पहाड़ खिलेंगे।
जितने सुखद विचार उठेंगे,
अनंत काल तक दीप जलेंगे।

तारकासुर राक्षस का वध किया,
कार्तिकेय देव के सेनापति।
बाप का बदला लेने के निमित्त,
घोर तपस्या की त्रिपुरा-सुर।

अमरता का वरदान दिया ब्रह्मा ने,
तीनों लोक में आतंक मचाया।
घोर विनाशक त्रिपुरासुर राक्षस,
देवताओं पर भी कहर बरपाया।

सभी देवता मिलकर शिवजी से,
अनुनय विनय निवारण खोजा।
देवताओं के आग्रह पर शिव जी ने,
त्रिपुरा सुर का वध का डाला।

राक्षस के वध की खुशी में ही,
देवों ने देव दीपावली सजाया।
देवता दीप प्रज्वलित करते हैं,
हम देव दीपावली मनाते हैं।

गुरु नानक की जन्म जयंती तिथि,
धर्म अनुयाई सिक्ख जगाते हैं।
इसीलिए वह भी देव दीपावली,
पुनीत त्यौहार खूब मनाते हैं।

चातुर्मास बिता कर विष्णु जी,
देव दीपावली पूर्व जग जाते हैं।
उन्हीं के प्रेम में पलते सनातनी,
देव दीपावली पर्व बनाते हैं।

काशी की संस्कृत परंपरा में ही,
गंगा जी का घाट सजाया जाता।
असंख्य दीपों की श्रृंखला के संग,
देव दीपावली मनाई जाती है।

कार्तिक अमावस्या को दीपावली,
पूर्णिमा को देव दीपावली आती है।
दीपावली के 15 दिन बाद पूर्णिमा
पर्व, देव दीपावली मनाई जाती है।

आप सभी को प्रेम पूर्वक तहे दिल से देव दीपावली महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — बुरी शक्तियों पर दैवी शक्तियों को जीत जब मिलता है, उस जीत की खुशी में सभी देवतागण द्वारा जो दीपक जलाकर अपनी खुशी जाहिर की जाती है वही देव दीपावली का महापर्व कहलाया। आओ हमसब मिलकर इस देव दीपावली महापर्व को सच्चे मन से मनाए। इस दिन ध्यान साधना करे, सच्चे मन से। अपने मन को शांत रखने के लिए इस देव दीपावली पर देशी घी से यज्ञ करे पूर्ण शांत मन से। देव दीपावली पर पुरे दिन अच्छे व सच्चे मन से ध्यान – साधना में रत रहे। पूर्ण शांत मन से ध्यान करने से, आपके आत्मा की सुषुप्त शक्तियां जागृत होने लगती। आत्मा की सुषुप्त शक्तियां जिस भी मनुष्य की जागृत हो जाती है, उसके लिए हर कार्य आसान हो जाता हैं।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (देव दीपावली।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बाल दिवस और इतिहास।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बाल दिवस और इतिहास। ♦

बाल दिवस सार्थक हो हमारा, ऐसा बाल दिवस मनाते हैं।

आओ हम सब मिलकर बाल दिवस मनाते हैं।
बाल दिवस के साथ थोड़ा इतिहास दोहराते हैं॥

सबसे पहले ये दिवस मनाने का बीड़ा उठाते हैं।
20 नवंबर 1956 को अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस मनाते है॥

सभी देश अलग – अलग तिथियों में ये दिवस मनाते है।
सभी देश मिलकर सर्वसम्मति से बच्चों के लिए न्यायिक कानून बनाते हैं॥

14 नवंबर 1889 को जन्मे प. जवाहर लाल जी भारत के प्रथम प्रधानमंत्री कहलाते हैं।
बच्चे थे उनको प्यारे इसलिए चाचा नेहरू नाम धराते है॥

27 मई1964 को नेहरू जी स्वर्ग सिधार जाते है।
उनकी याद में 14 नवंबर को हम राष्ट्रीय स्तर पर बाल दिवस मनाते हैं॥

आओ हम सब मिलकर थोड़ा इतिहास दोहराते हैं।
जो देश के लिए हुए कुर्बान बच्चे उनके बारे में बच्चों को बताते हैं॥

सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह कहे जाते है,
इनकी पत्नी जीतो की कोख से चार पुत्र जन्म पाते हैं॥

अजीत, जुझार, जोरावर, फतेह सिंह नाम धराते है,
नौकर की गद्दारी से जोरावर, फतेह सिंह को सरहिंद नवाब वजीर खां दीवार में चुनवाते है॥

1705 में औरंगजेब चमकौर में सेना के साथ हमला करवाते हैं,
अजीत, जुझार सिंह उनसे लड़ते हुए 18 और 14 वर्ष की आयु में शहिद हो जाते हैं॥

इन सब के साथ जहन में वीर हकीकत राय का नाम याद आ जाता है,
1719 मे पिता लाला भागमल पुरी, माता कैरो के घर जन्म पाते हैं॥

1734 में धर्म के अपमान का प्रतिकार करने के कारण मुसलमान उनकी गर्दन कटवाते है,
आओ हम सब मिलकर ऐसे वीर बच्चों के आगे शीश झुकाते हैं॥

विजयलक्ष्मी हरियाणा है कहती आओ हम सब मिलकर ऐसा बाल दिवस मनाते हैं,
सार्थक हो बाल दिवस मनाना जब हम हर बच्चे के मन में देश भक्ति का भावना भर पाते हैं॥

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

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  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए समझाने की कोशिश की हैं — बच्चे मन के सच्चे होते है, वे कुम्हार के चाक पर रखे मिट्टी के समान होते है, उन्हें जैसा ढालना चाहे ढाल सकते हैं। बच्चों को संस्कारवान, परोपकारी व दया, प्रेम, धैर्य के गुणों से सिंचित करना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश का भविष्य उस देश के बच्चों पर ही निर्भर होता हैं। बच्चे आने वाले कल के सूत्रधार है। बच्चों पर कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए, यदि बच्चे कोई गलती करे तो उन्हें प्यार से समझा दे। कभी भी उनकी पिटाई न करे, पिटाई करने से उनके मन में आपके प्रति घृणा का भाव उत्पन्न होने लगता है, ऐसे बच्चे आगे चलकर बहुत ही गलत कदम उठाने लगते हैं। अतः सदैव ही बच्चों को प्रेम से ही समझाना चाहिए, जिससे वो समझ भी जाए, और उनके बाल मन पर कोई बुरा प्रभाव भी न पड़े।

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यह कविता (बाल दिवस और इतिहास।) “विजयलक्ष्मी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बालमन के घुंघरू चाचा नेहरू।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बालमन के घुंघरू चाचा नेहरू। ♦

निश्छल निर्मल स्वर्ण धरा पर,
कोमल संग मुस्कान लिए।
कच्ची मिट्टी सा मन है जिसका,
भविष्य जिसके भाल है।
नव निर्माण का जो आधार,
जिसके मन भांप बजाते थे थमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

बहुत सारे दिवस है आते,
बालमन को कोई कोई पहचाने।
मासूमियत भरी जिनकी निगाहें,
नटखट निराली बोली जिनकी।
सत्य की जो ईश्वरत्व आधार,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

बच्चों संग बच्चे बन जाते,
भावनाओं का करते सम्मान।
प्रथम नागरिक के समान,
उनकी महिमा का कैसे करें बखान।
बच्चों के लिए हर पल करते जतन,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

बच्चे है ईश्वरत्व की अनमोल देन,
मौलिक अधिकार है उनका हक।
फिर क्यूं मिलता नहीं वाजिब हक,
नेहरू जी ने उसे पहचाना।
उनके अधिकार दिलाने हेतु थे प्रतिबद्ध,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

भावी पीढ़ी के कर्णधार,
शिक्षा मिले सभी को समान अधिकार।
बाल शोषण का सब मिलकर करें काम तमाम,
बच्चें करेंगे स्वछंद विहार।
तभी सपने होंगे साकार,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

बाल दिवस पर आज करें विचार,
सब मिलकर बनाएं सुदृढ संसार।
ऐसा बनाएं चमन नाचे गाएं होकर मगन,
बच्चे मन के सच्चे, सारी जग की आंखों के तारे।
वो नन्हें फूल खिले भगवान को लगते प्यारे,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

आप सभी को प्रेम पूर्वक तहे दिल से बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — बच्चे मन के सच्चे होते है, वे कुम्हार के चाक पर रखे मिट्टी के समान होते है, उन्हें जैसा ढालना चाहे ढाल सकते हैं। बच्चों को संस्कारवान, परोपकारी व दया, प्रेम, धैर्य के गुणों से सिंचित करना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश का भविष्य उस देश के बच्चों पर ही निर्भर होता हैं। बच्चे आने वाले कल के सूत्रधार है। बच्चों पर कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए, यदि बच्चे कोई गलती करे तो उन्हें प्यार से समझा दे। कभी भी उनकी पिटाई न करे, पिटाई करने से उनके मन में आपके प्रति घृणा का भाव उत्पन्न होने लगता है, ऐसे बच्चे आगे चलकर बहुत ही गलत कदम उठाने लगते हैं। अतः सदैव ही बच्चों को प्रेम से ही समझाना चाहिए, जिससे वो समझ भी जाए, और उनके बाल मन पर कोई बुरा प्रभाव भी न पड़े।

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यह कविता (बालमन के घुंघरू चाचा नेहरू।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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साहित्य का प्रदेय।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ साहित्य का प्रदेय। ♦

“साहित्य समाज का दर्पण होता है” इस पंक्ति से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। किसी भी काल – खंड की तस्वीर जब हम देखना चाहते हैं तो उस दौर का साहित्य उठाते हैं और शोधों – परिशोधों के शिकंजे पर कस कर साहित्य – आइने में उस काल – खंड का अवलोकन करते हैं। इस शीशे को फ्रेम बद्ध करना एक सजग साहित्यकार का काम होता है। यानी संक्षेप में कहें तो इन तीनों का आपस में एक गहरा नाता है।भविष्य के फलक पर वर्तमान का यथार्थ अपनी कलम छेनी और कल्पना मिश्रित अनुभूति के हथौड़े से चित्रित करना जहां साहित्यकार का काम है, वहीं समाज की पीड़ाओं के आत्मसात भावबोध के उस उद्घाटन का नाम ही साहित्य है। स्पष्ट है कि साहित्य और साहित्यकार के दरम्यान (बीच में) समाज ही केंद्र बन कर रहता है।

• साहित्य मौखिक और लिखित दोनों रूपों में अनादिकाल से विद्यमान •

साहित्य मौखिक और लिखित दोनों रूपों में अनादिकाल से विद्यमान होकर अपनी सेवाएं दे रहा है। इसके अनवरत प्रवाह के चलते, इसने अनेकों पड़ावों को पार कर घाट – घाट का पानी पीया है। जहां साहित्य का प्रारंभिक रूप पौराणिक दंत कथाओं के रूप में लंबे समय तक मौखिक चलता रहा, वहीं श्रुतियों – स्मृतियों ने इस कड़ी को बनाए रखने की अपार भूमिका अदा की। समय बदला, परिस्थितियां बदली। इसी मौखिक रूप ने लिखित रूप धारण किया और अपने समय के साक्ष्य देने का जिम्मा उठाया। वेदों – वेदांतों से गुजरते हुए यह रामायण – महाभारत जैसी महा लोक कथाओं को पार कर जब हिन्दी साहित्य के आदिकाल में प्रवेश हुआ तो इसने अपना मिजाज सिद्धों – नाथों की चमत्कृत अनुभूतियों के साथ बदल दिया।

यह सच है कि उस दौर में भी इसने वीर रस का पान करते हुए श्रृंगारित अनुभूतियों और युद्घिय वातावरण का चित्रण करने में कोई कोर – कसर न छोड़ी। जहां – जहां इसे वात्सल्य, वीभत्स, आदि दृश्यों को उद्घाटित करना था, सो भी कुल मिलाकर बखूबी किया। यानी इस काल में भी साहित्य की मूलभूत योग्यताओं और क्षमताओं का प्रदर्शन साहित्यकारों ने संतुलित किया।

• हिंदी साहित्य का यौवन ही निखर आया •

अब भक्ति काल या मध्यकाल में तो विशेष कर हिंदी साहित्य का यौवन ही निखर आया था। साहित्यिक रसों, गुणों, शब्द शक्तियों और छंद – अलंकारों के साथ – साथ साहित्य लेखन की महा विधाओं का उत्कर्ष ही निखर आया। इस काल – खंड के साहित्यकारों ने समाज की स्थिति को अपनी लेखनी की नोक से जिस क़दर साहित्य में उतारा, वह सच में काबिले तारीफ है। यह तो हिन्दी साहित्य का वह काल है, जिसे कोई चाह कर भी भूला नहीं सकता।

रीति काल में जहां दरबारी साहित्य की झलक के साथ – साथ शृंगारिकता का दर्शन होता है तो वहां आधुनिक काल में छायावादी कवियों का प्रकृति प्रेम दिखता है। आधुनिक काव्य साहित्य साहित्यिक परंपराओं को तोड़ता हुआ छंद मुक्त हो गया और इधर काव्य रचना की परिपाटी को तोड़ता हुआ गद्य साहित्य के क्षेत्र में उद्भूत हुआ।

• वह सब साहित्य का ही प्रदेय है •

यह तो भारतीय साहित्य परंपरा की एक संक्षिप्त गाथा है। परंतु साहित्य मात्र भारत में ही नहीं रचा गया। साहित्य तो विश्व के हर कोने – कोने में और हर जाति – धर्म में अपनी – अपनी भाषाओं में और अपनी – अपनी तहजीब में रचा गया। इधर यहूदी धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबल से क्रिश्चियन धर्म का साहित्य शुरू हुआ और आधुनिक ईसाई मिशनरियों और इलियट जैसे प्रसिद्ध कवियों की कृतियों के साथ पल्लवित एवं संवर्धित हुआ।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद यदि हिन्दुओं के पवित्र और पुरातन ग्रंथ है तो इंजल, जबूर, तोरात और कुरान मजीद या कुरान शरीफ इस्लाम के पवित्र और पुरातन ग्रंथ है। अब चाहे पारसियों का साहित्य उठाओ या फिर बौद्धों, जैनों या सिखों का साहित्य उठाओ। धम्मपद, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब जैसी पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करने पर या फिर किसी भी धर्म या संप्रदाय के साहित्य का अवलोकन करने पर जो कुछ हमें प्राप्त होता है वह सब साहित्य का ही प्रदेय है।

• भाषा के आधार पर साहित्य •

जाति, धर्म और संप्रदाय को छोड़कर यदि हम भाषा के आधार पर भी साहित्य को देखने की कोशिश करेंगे तो वह भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अब चाहे संस्कृत का साहित्य हो या फिर हिंदी का। उधर अंग्रेजी, अरबी, फारसी या उर्दू का साहित्य हो चाहे फिर पाली, प्राकृत भाषा में रचित। पंजाबी, चीनी आदि विभिन्न भाषाओं में विपुल साहित्य की रचना हमें पढ़ने के लिए मिलती है। बात यहीं खत्म नहीं होती। बात तो यहां से शुरू होती है की साहित्य का प्रदेय क्या है?

• साहित्य के दो रूप •

यह प्रश्न जितना सरल है उतना ही इसका उत्तर भी सरल है। सीधी सी बात है कि विश्व के मानव मात्र के मन – मस्तिष्क में आज जो कुछ भी ज्ञान भरा पड़ा है, वह सब संसार के विविध साहित्य की ही देन है। इस संसार में साहित्य विद्यमान नहीं होता तो न ही तो संस्कृति और सभ्यता ही विकसित होती और न ही तो मनुष्य के पास मानव कल्याण एवं समाज उत्थान सम्बन्धी ज्ञान – विज्ञान होता। साहित्य ने हमें क्या नहीं दिया? साहित्य की देन को समझने के लिए हमें अनादि काल के उस परिप्रेक्ष्य में जाना होगा जहां से मौखिक साहित्य का उदय हुआ था। हम भलीभांति जानते हैं कि साहित्य के दो रूप हमें देखने को मिलते हैं : —

  1. मौखिक साहित्य। — Oral literature

  2. लिखित साहित्य। — Written literature

संसार की हर भाषा का साहित्य इन दो विभागों में बंटा हुआ है। जब मनुष्य को पढ़ना – लिखना नहीं आता था तो अवश्य ही उस काल खण्ड में हर भाषा का साहित्य मौखिक रूप से लंबे समय तक लोक में प्रचलित रहा। इन दोनों साहित्यिक विभागों के प्रदेय को समझने के लिए हमें इन्हें अलग – अलग तरीके से समझना होगा।

1. मौखिक साहित्य का प्रदेय : —

मौखिक साहित्य हर भाषा में श्रुति – स्मृति परंपरा में ही विद्यमान रहा। इस साहित्य ने जहां मानव मस्तिष्क और हृदय में भावनाओं एवं कल्पनाओं का विकास किया, वहीं दूसरी ओर मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता को पाशविक संस्कृति एवं सभ्यता से पृथक करने में भी अपनी अहम भूमिका अदा की।

धर्मों के आधार पर यदि हम मानव परंपराओं को समझने की कोशिश करेंगे तो उसमें कई गतिरोध पैदा हो जाते हैं। इधर हिंदू मतानुसार यदि पुनर्जन्म की परिकल्पना की गई है तो इस्लामिक धर्म इसके विपरीत चलता है। इस कड़ी को ठीक से समझने के लिए यदि हम प्रागैतिहासिक घटनाओं और पुरातत्वविदों की परिकल्पना को ही वैज्ञानिक पृष्ठभूमि से जोड़कर आधार माने तो मौखिक साहित्य की देन का ठीक – ठीक विश्लेषण कर पाएंगे।

इस दृष्टि से माना जाता है कि मनुष्य का विकास पशु योनि से धीरे – धीरे विकसित होकर आदिमानव के रूप में हुआ। वह मौखिक ज्ञान – विज्ञान के आश्रय से बौद्धिक रूप से विकसित होता गया और उसी बौद्धिक ज्ञान – विज्ञान के आधार पर उसने अपने बाह्य वातावरण को और अपने शरीर को निरंतर परिष्कृत करके नवीन ढर्रे में ढालने की कोशिश की। आज का सभ्य मानुष उस आदिमानव का परिवर्धित एवं परिष्कृत रूप है।

यदि इस बात को आधार माना जाए तो यह स्पष्ट हैं कि मौखिक साहित्य ने सचमुच समाज के लिए बहुत कुछ दिया है। यह वह काल था जब मनुष्य ने धीरे-धीरे सोचना शुरू किया था। सोची हुई बातों को वैचारिक ताने-बाने में गूंथना शुरू किया था। इतना ही नहीं उन गुंथी हुई बातों को, कथा और कहानियों का रूप देकर के उन्हें स्मरण रखने की कला सीख ली थी। यह मौखिक साहित्य जितना प्रासंगिक उस काल खण्ड में था, उतना ही प्रासंगिक आज के दौर में भी है। यही साहित्य की वह विधा है जो पुरानी पीढ़ी का ज्ञान एवं अनुभव नई पीढ़ी में संप्रेषित करती है और नई पीढ़ी को उसके आगे आने वाली नई पीढ़ी के लिए ज्ञान – विज्ञान संप्रेषित करने के काबिल बनाती है।

हमें याद है कि हमारे घरों में हमारी दादियां और नानियां हमें ढेरों कहानियां मौखिक रूप से सुनाया करती थी और उन्हें वे कथाएं व कहानियां हमेशा के लिए सैकड़ों की तादात में जुबानी ही याद थी। उन कहानियों में मानवीय मूल्य, सामाजिक प्रेरणा और उदात्त भावनाओं के साथ – साथ मानवीय संबंधों को सुदृढ़ करने की एक विशेष परिकल्पना विद्यमान रहती थी। अतः कहना न होगा कि मौखिक साहित्य ने वैश्विक धरातल पर अपना जो योगदान समूची मानव जाति को दिया है, वह सचमुच अविस्मरणीय है।

दया, करुणा, मानवता, जिजीविषा, प्रेम, सामाजिकता, सहनशीलता, सहानुभूति, विश्वसनीयता, विनम्रता, मेहनत, धार्मिकता, आध्यात्मिकता और खोजबीन जैसे गुण यदि मनुष्य में विद्यमान हुए हैं तो इसका मुख्य साधन मौखिक साहित्य ही रहा है। मानव जाति को यदि सामाजिकता और निरन्तर खोजबीन का गुण मौखिक साहित्य न सिखाता तो आज के पढ़े लिखे एवं तर्क से परिपूर्ण समाज में अव्यवस्था फैल जाती।

कहना न होगा कि हम लोग पढ़े – लिखे आदिमानव कहलाते। यह बात जरूर है कि हर समाज एवं धर्म में अपनी-अपनी सृष्टि रचना का क्रम धार्मिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है, परंतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मनुष्य प्रकृति का एक अभिन्न अंग है और उसने अवश्य ही मौखिक साहित्य का सहारा लेकर के आज तक के समाज तक पहुंचते-पहचते बहुत प्रगति की है।

सेवा, साधना और समर्पण की भावनाएं यदि मनुष्य के भीतर किसी ने भरी है तो वह मौखिक साहित्य ने ही भरी है। वरना आज की पढ़ी – लिखी पीढ़ी में ये गुण दूर – दूर तक देखने को नजर नहीं आते। कारण यही है कि आज का बालक दादियों और नानियों की उन मौखिक कथा कहानियों को नहीं सुनता है। इसलिए उसके व्यवहार में प्यार कम और विकार ज्यादा प्रभावी हो रहे हैं। यह भी सत्य है कि विकार पाशविक प्रवृत्ति के द्योतक है।

2.लिखित साहित्य की देन : —

जहां मनुष्य के आंतरिक भावबोध और संस्कारों का निर्माण करना मौखिक साहित्य की देन रहा है, वहां मनुष्य के मन और मस्तिष्क के बाह्य सामाजिक और व्यवहारिक पक्ष को अधिक कलात्मक और रोचक बनाना लिखित साहित्य की देन है। यह बात जरूर है कि लिखित साहित्य बहुत लंबे समय के बाद अस्तित्व में आया। परंतु जो भूमिका लिखित साहित्य ने मनुष्य जाति के लिए अदा की है वह अपने आप में अभिन्न है। जब से लिखित साहित्य अस्तित्व में आया तब से मनुष्य ने अपनी छोटी-बड़ी सभी सामाजिक घटनाओं को लिखित रूप से संग्रहित करने की कला सीख ली और उसे अपने पास में संजो करके रखने का उपक्रम मनुष्य जान गया। यह साहित्य का वह पक्ष है जो किसी भी समाज विशेष की और किसी भी काल खण्ड की स्थिति को अपने में समेट कर भविष्य की पीढ़ी को आईने की तरह बीते समय का दिग्दर्शन करवाता है ।

जहां मनुष्य ने अपने व्यवहारिक पक्ष को इस साहित्यिक पक्ष के द्वारा मजबूत किया वहीं उसने अपने सामाजिक पक्ष को भी साहित्य के इस पक्ष से सुदृढ़ किया। यह साहित्य का वह पक्ष है, जिसने विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं का वैचारिक आदान – प्रदान सुनिश्चित किया। इसी ने अनेकों संस्कृतियों और सभ्यताओं को लिखित रूप देकर मानव समाज के लिए सुरक्षित रखा। यही वह पक्ष है, जिसने मनुष्य को योग्य एवम साक्षर बनाया। यही वह पक्ष है, जिसने मनुष्य में तर्क, विवेक, स्पर्धा और निरंतर संघर्ष करना सिखाया। अध्ययन और अध्यापन भी इसी पक्ष की देन है। आज के युग में अध्ययन एवं अध्यापन का जो महत्त्व बन गया है, वह किसी से नहीं छुपा है। अनुलेखन, प्रतिलेखन अभिलेखन, पत्राचार, शीला लेखन या फिर स्तंभ लेखन आदि सारे उपक्रम इसी कड़ी की देन है।

आज का मनुष्य यदि देश – विदेश में जा कर या फिर इंटरनेट के माध्यम से जो कुछ भी सीख रहा है या फिर अपना अनुभव वैश्विक धरातल पर संप्रेषित कर रहा है तो वह साहित्य की इसी कड़ी का सहारा लेकर सब कर रहा है। लिखित साहित्य के माध्यम से ही आज यह संभव हो पाया है कि प्राचीनतम से भी प्राचीनतम ज्ञान – विज्ञान से लेकर नवीनतम से भी नवीनतम ज्ञान – विज्ञान को हम आज तथ्यात्मक ढंग से खोजबीन करके पुष्ट कर सकते हैं और समझ सकते हैं। यह जब मर्जी तब कर सकते हैं। यही लिखित साहित्य की विशेष उपलब्धि है।

यदि यह आज तक भी मात्र मौखिक ही रहा होता तो निश्चित तौर पर इस के अधिकतम प्रमाणिक अंश का या तो कुछ जानकारों के संसार छोड़ने के साथ अन्त हो जाता या फिर इनमें स्वार्थ वश कई प्रक्षिप्त अंश जुड़ जाते, जो मानव समाज को पथ भ्रष्ट करते। यह सच है कि अभी भी मौखिक साहित्य का एक बहुत बड़ा भाग लोक किंवदंतियों और दंत कथाओं में ही प्रचलित है। उसका लिखित रूप अभी तक सामने नहीं आ पाया है। उसे शोध के साथ खोजबीन करके लिखित रूप में लाने की नितान्त आवश्यकता है। परन्तु फिर भी संसार भर की समस्त भाषाओं का विपुल लिखित साहित्य मानव समाज को बहुत कुछ दे रहा है और निरन्तर देता ही रहेगा।

निष्कर्ष — Conclusion :

सार रूप से यदि कहा जाए तो इन दोनो साहित्यिक पक्षों ने मनुष्य जाति को बहुत कुछ दिया है। आज यदि मनुष्य के पास जो कुछ भी ज्ञान – विज्ञान है तो उसका मूल कारण साहित्य ही है। फिर वह चाहे लिखित हो या मौखिक। मानव ने जो कुछ भी भावात्मक या विचारात्मक सांस्कृतिक और सामाजिक विकास किया है, वह साहित्य के बल पर ही किया है। यह बात अलग है कि साहित्य के भी दो पहलू हैं। एक नकारात्मक साहित्य और एक सकारात्मक। आम तौर पर समाज का अधिकांश वर्ग साहित्य के सकारात्मक पक्ष को ही स्वीकार करता है और उसी के सहारे नई पीढ़ी को दशा और दिशा प्रदान करता है। यही साहित्य की असली प्रदेयता है और महता है।

अतः कहना न होगा कि साहित्य का सकारात्मक सृजन पुष्ट समाज के निर्माण के लिए निरन्तर होते रहना चाहिए और उसके पठन – पाठन का भी कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार चलता रहना चाहिए। साहित्य ही समाज की वह ताकत है जो किसी समुदाय और समाज को वैचारिक और व्यवहारिक रूप से समृद्ध बनाती है। यदि ऐसा न होता तो विदेशी आक्रांता हमारी भारतीय साहित्यिक कृतियों को लूट कर अपने देश नहीं ले जाते। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि साहित्य की प्रदेयता हर युग में विशेष रही है और रहेगी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हम सभी को मिलकर भारतीय साहित्य, संस्कृति और संस्कार को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण करने का कार्य कारण हैं। साहित्य का सकारात्मक सृजन पुष्ट समाज के निर्माण के लिए निरन्तर होते रहना चाहिए और उसके पठन – पाठन का भी कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार चलता रहना चाहिए। साहित्य ही समाज की वह ताकत है जो किसी समुदाय और समाज को वैचारिक और व्यवहारिक रूप से समृद्ध बनाती है। यदि ऐसा न होता तो विदेशी आक्रांता हमारी भारतीय साहित्यिक कृतियों को लूट कर अपने देश नहीं ले जाते। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि साहित्य की प्रदेयता हर युग में विशेष रही है और रहेगी।

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यह लेख (साहित्य का प्रदेय।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मैं तो जनता हूं जनाब।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मैं तो जनता हूं जनाब। ♦

मैं तो जनता हूं जनाब,
पन्ने दर पन्ने की खुली किताब।
मुझे पढ़ने का देते हैं सभी सुझाव,
जो पढ़े न मुझको उसे देती हूं जवाब।
घटना के बाद फिजूल है हिसाब किताब,
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

समझ नहीं आते सत्ताधीशों के ख़्वाब,
भीगी बिल्ली वोटों को, कुर्सी पे रूआब।
मेरी हाट के सौदे का, मुझे ही बताते भाव,
फिर तो मुझे भी आता है, देना भाई जवाब।
मैने भी तो देखे हैं, पड़ावों पर आते पड़ाव,
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

भोली हूं मैं, कुछ बहुत ही ज्यादा साहब,
मुझ पर खेले हैं, कई शकुनी मामाओं ने दाव।
सबका बारी – बारी से, मैने पूरा किया है चाव,
मेरी ही धौंकनी से, मिला है सबको सदा से ताव।
फिर भी न जाने क्यों? करते नहीं है मेरा बचाव?
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

मैं कहां कहती हूं? कि जश्न जीत का न मनाओ,
बल्कि मुझे भी जश्न ए जीत में चाहो तो बुलाओ।
मैं कहां कहती हूं? कि तुम भूखे रहो न खाओ,
मैने कब कहा? तुम अपनी उपलब्धियां न गिनाओं।
पर साहेब, मुझ पे ही सवार हो, मुझे ही तो न भुलाओ,
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — चुनाव नजदीक आते ही नेता लोग आने लगते है हमारे घर पर वोट मांगने, जितने के बाद नेता जी 5 वर्ष के लिए लापतागंज में लापता हो जाते है। एक बार भी भूल से भी नज़र नहीं आते नेता जी। और तो और जनता के पैसे पर ऐश करेंगे और हमे ही डराएंगे व धमकाएंगे, कोई कार्य नहीं करेंगे, बस अपना खज़ाना भरेंगे। अपनी 12 पीढ़ियों के लिए खज़ाना भरेंगे। इनके नज़रिये से जनता जाए भाड़ में अपना खज़ाना भरेंगे दबा के।

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यह लेख (मैं तो जनता हूं जनाब।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जीवन – संग्राम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जीवन – संग्राम। ♦

है जीवन में संग्राम बहुत,
लड़ते इनसे जाओ।
संग्राम बीज आराम भी है,
सोकर नहीं बिताओ।

जीवन के सुख दुख दो पहलू,
इनसे ना घबराओ।
सुख के खातिर बिछावना को,
नित्य बिछाते जाओ।

विजय बिछावना कर्मयोग का,
करतब समझ दिखाओ।
पेट के खातिर लोक समाज में,
कर्मयोग को अपनाओ।

लड़ाईया लड़ने की खातिर तुम,
खुद को तैयार करो।
जीवन एक संग्राम कठिन लेकिन,
पुरुषार्थ अपना दिखलाओ।

कभी पैदल और कभी गाड़ी से,
बाट गुजर जाएंगे।
कभी कंक्रीट, कभी वृक्ष छांव में,
सोकर बीत जाएंगे।

बचपन लड़कपन में बीत गया,
जवानी घर बिताएंगे।
लोरी जिन्हें पहले गाकर सुनाया,
आंख बुढ़ापे में दिखाएंगे।

कब से बच्चे – बच्चे वाले हो गए,
पता नहीं कर पाएंगे।
माता पिता, नाना नानी के अलावा,
दूसरा नहीं दिखाएंगे।

सोच-सोच कर नीद नहीं आएगी,
पूरी रात बिताएंगे।
फिर भी सच का पता नहीं चलेगा,
कर कुछ नहीं पाएंगे।

बड़का छोटका – छोटका बड़का,
कहते ही रह जाएंगे।
रिश्ते सारे सपने जैसे शहरों में गुम,
होकर खोते जाएंगे।

कभी कभी मिलेगी पुआ – मिठाई,
पर अभागे सो जाएंगे।
विविध तरह से यह जीवन चलता,
जिसे देख इठलाएंगे।

यह जीवन सतरंगी विरासत पर,
बेरहम धक्के खाएंगे।
जीवन ऐसो आराम में गुजरे फिर,
पैर पकड़ हिलाएंगे।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — मानव जीवन एक कड़वा संग्राम है यहां आराम भी है, दुःख भी है, सुख भी है, आत्म आनंद भी है। मौसम की तरह सुख दुःख आते जाते रहते है मानव जीवन में। लेकिन मेरा अनुभव कहता है की यह सुख और दुःख का सृजन मनुष्य का मन करता है। जिस मनुष्य का मन व आत्मशक्ति मजबूत हो वह मानव हर परिस्थिति में एक समान रहता है, चाहे दुःख हो या सुख। हमे अपने आप को मानसिक रूप से इतना मजबूत बनाना है की कोई भी परिस्थिति हमे बिचलित ना कर सके। हर एक मनुष्य आत्मा के अंदर अनंत शक्तियां, सुषुप्त अवस्था में निहित है, बस जरूरत है इन शक्तियों को जागृत कर, सही समय पर, सही जगह उपयोग करने की। किसी भी शक्ति के उपयोग में समय और जगह का उच्च स्थान होता है। सही समय व सही जगह पर उपयुक्त शक्ति का उपयोग करने पर हर कार्य सफलता पूर्वक पूर्ण हो। इस संसार में ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जिसका समाधान ना हो। बस जरूरत है अपने नज़रिये को बदलने का। आपका सकारात्मक नजरिया आपके उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करेगा।

—————

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यह कविता (जीवन – संग्राम।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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उत्सव में जीवन मोक्ष।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ उत्सव में जीवन मोक्ष। ♦

अनेकत्व, स्वयंमेव तिरोहित है,
समाज निष्ठा है संजीवनी जहां।
पुरातन गीत छठ महापर्व में छुपा,
संदेश इक जीवन-शैली का शाश्वत।

प्रथम दिवस खरा सोना जैसा ही,
स्वर्णिम हिंद का शुद्धि प्रतीक है।
करके, शुद्ध – स्व अंतः करण को,
एकभुक्त व्रती लेते हैं शुभ प्रसाद।

संध्या काल शान्त भक्ति सुलग्न में,
छठ गीत में समूह योग का साध्य है।
सतत संघर्ष में सर्वसहा का भाव है,
प्रकृति के विचार-तत्व से मानवता के,
अध्यवसाय, साहस कामिलन – उत्सव।

मन को शून्य कर, शील सम-वृत्ति को,
पूर्ण रूप देने में, समवेत स्वर तृप्ति है।
सूप, हथेली पर उठे पावन अर्घ्य में,
जीवन – संघर्ष की… जो स्वीकार्यता है,
खुद को खोकर, समुदाय मोक्षभाव है।

छठ संगीत में अध्यात्म रहस्य भाव,
प्राण प्रिय मोक्ष सुखद अनुभूति है।
यह परा जीवन का प्रेम, प्रातः अर्घ्य,
की अभिव्यक्ति, अद्भुत पूर्णाहुति है।

गंगा जल तरण करते दीप जोत में,
एकमना होने का सतत संदेश है।
संगीत भाव में, बाती – सा जलकर,
आत्म – दान के संग – संग, सदानीरा,
नारी शक्ति की जय – जयकार है।

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

—————

  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से बताने की कोशिश की है — इस भारत भूमि के हर उत्सव में जीवन मोक्ष का पर्याय छिपा रहता है, चाहे वो पर्व कोई भी हो, दीपावली हो, छठ पूजा, होली हो, दशहरा हो। हमारे ऋषि मुनि और पूर्वजों ने अध्यात्म व विज्ञान के साथ-साथ नियमित और शांत तरीके से हर पर्व का नियम बनाया ऋतुओं को ध्यान में रखकर। जिससे हर एक मनुष्य को शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य का लाभ हो। हर उत्सव में मनुष्य को जीवन मोक्ष का अनुभव हो।

—————

यह कविता (उत्सव में जीवन मोक्ष।) “प्रो• मीरा भारती जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम मीरा भारती (मीरा मिश्रा/भारती) है। मैंने BRABU Muzaffarpur, Bihar, R.S College में प्राध्यापिका के रूप में 1979 से 2020 तक सक्रिय चिंतन और मनन, अध्यापन कार्य किया, आनलाइन शिक्षण कार्यक्रम से वर्तमान में भी जुड़ी हूं, मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे लेखनी का सुंदर उपयोग किया करते हैं। मैंने लगभग 130 कविताएं लिखी है, जिसमें अधिक प्रकाशित हैं, कई आलेख भी, लिखे हैं। दृढ़ संकल्प है, कि लेखन और अध्यापन से, अध्ययन के सामूहिक विस्तारण से समाज कल्याण – कार्य के कर्तृत्व बोध में वृद्धि हो सकती है। अधिक सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

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सृजनहार माँ और गुरु।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सृजनहार माँ और गुरु। ♦

ब्रह्मांड की दो अनुपम कृति,
इक जननी तो इक गुरू दोनों हैं सृजनहार।

श्रद्धा विश्वास भक्ति और समर्पण की मिसाल,
आकार संस्कार से बांधे धर्म-कर्म के सृजनहार।

शक्ति सामर्थ्य सदृश्य संसार,
साकार पारब्रह्म के समान।

ज्ञान विद्या जीवंतता कल्याण,
परम पद आलंभ के चर-सर्वशक्तिमान।

ज्योति सद्वृत्ति नीरद गान,
अनन्य अद्भुत माधुर्य का मिश्रित वरदान।

अध्येता सम-जड़ता अविदित दर्प कुसुम समान,
गुरू सूक्तद्रष्टा धात्री जगदम्बिका समान।

प्रदीप्त आत्मज्ञान की कान्ति-सौरभ गान,
गुरू और मातु हैं दृग उर्वी पुष्कर समान।

हम थे निर्बुद्धि मुर्च्छित मृण प्रस्तर समान,
परस प्राप्ति जब मिली हम हुये आकृति समान।

मातु और गुरू हैं उदधि उर्मि अमर्त्य वसुंधरा समान,
शत-शत नमन है इन्हें, जो हैं रत्नगर्भा अंबुनिधि व्योम समान।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली , मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस संसार में माँ और गुरु की जगह कोई भी नही ले सकता। जहां माँ जन्म देने के साथ साथ प्रथम गुरु है और सदैव ही अपने बच्चे के सर्वागीण विकास के लिए तत्पर रहती है। वही एक सच्चा गुरु उसे सदैव ही सन्मार्ग पर चलकर मर्यादा पुरुषोत्तम ज्ञान व ध्यान से भरपूर जीवन जीने की कला सीखाता है। माँ और गुरु सदैव ही जीवन के हर क्षेत्र में वृद्धि चाहते है, उन्नत और प्रगतिशील जीवन के सूत्रधार है दोनों।

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यह कविता (सृजनहार माँ और गुरु।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हे छठी मईया भर द झोलिया हमार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हे छठी मईया भर द झोलिया हमार। ♦

आस्था और विश्वास का, सबसे अनूठा पर्व,
कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को आता, यह महापर्व।
षष्ठी तिथि के कारण इसे, कहा जाता छठ, होता है गर्व,
मनोवांछित फल पाने की लालसा में, व्रती करती सब्र।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

चार दिनों का यह पावन पर्व, अतुल्य अनमोल,
साक्षात ईश्वर के दर्शन का, बड़ा ही है मोल।
नहाय खाय से इस व्रत का, होता है आगाज,
दिल में लिए समर्पण भाव, व्रती करती काज।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

चार दिनों के पर्व में पहला दिन, होता काफी अहम,
घर की साफ सफाई से हर व्रती, शुरू करती काम।
कद्दू की सब्जी का उस दिन, महत्तम है अपार,
सबसे बड़े इस पर्व की महिमा है अपरम्पार।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

पर्व का दूसरा दिन खरना या लोहंडा काफी खास,
इस दिन व्रती करती पूर्ण उपवास।
बड़े निर्मल मनोभाव से बनाती प्रसाद, लेकर आस,
सूर्यदेव को नैवैद्य दे, करती एकांतवास।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

36 घंटों के व्रत के तीसरे दिन, पूरी होती मुराद,
मिलन की आस, संध्या अर्घ्य देती, संग प्रसाद।
प्रसाद में ठेकुआ, इस पर्व को बनाता खास,
सभी व्रती सूर्यदेव की कर पांच परिक्रमा, नमाती शीश।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

महापर्व का अंतिम दिन सूर्योपासना के बाद,
उषा अर्घ्य दे पूर्ण करती व्रत, उठाकर प्रसाद।
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए,
प्रसिद्ध लोकगीत, हर छठ व्रती गुनगुनाती जाए।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

अंत में इस पर्व का विशेष महत्व, सुने सज्जन जन,
ऐसी मान्यता है अपार, व्रत करे जो सच्चे मन।
छठी मईया पूरी करती, मन में हो जो जतन,
मुरादे होती पूरी, होता जग का कल्याण।
इसलिए व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — छठी मैया का व्रत को कैसे करना है? छठी मैया का व्रत करने से अनादि काल से ही लोगों को सूर्यदेव से मन चाहा फल मिलता आया है। समय समय पर जिस किसी ने भी सच्चे मन से छठी मैया का व्रत रख कर सूर्य देव की आराधना की है उसे जरूर मनोवांछित फल मिलता है। इस व्रत को कुवारी कन्या नहीं रख सकती। जिस जिस ने पूजा सच्चे मन से सूर्य देव को किया उनका कल्याण सूर्य देव ने। आओ मिलकर सूर्य भक्ति में छठ की अलख जगायें। करें वंदना चार दिनों तक, दो दिन नमक न खाएं। अस्ताचलगामी सूर्य देव को अर्घ्य प्रथम चढ़ाएं। होते सवेरे दूसरे दिन फिर जाकर सूरज को मनाए।

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यह कविता (हे छठी मईया भर द झोलिया हमार।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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एक पाती : अपने आराध्य के नाम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक पाती : अपने आराध्य के नाम। ♦

एक कवि की कल्पना, एक लेखक की उड़ान की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए वह अपनी कल्पना में क्या सोचता है, किसका सृजन करता है इसके बारे में कई बार वो स्वयं भी नहीं जान पाता। इसलिए मैं अपने वादे के लिए किसी इंसान के बजाय उस सृष्टि के रचयिता से ही अपनी बात कहना चाहती हूं, क्योंकि मेरा सोचना थोड़ा अलग है कि क्यों ना हम अपनी इच्छाएं,अपनी आकांक्षाएं, अपना दु:ख, अपनी संवेदनाएं उस ईश्वर से ही साझा करें जो बदले में केवल शांति, सुकून, आलंबन और आशीर्वाद ही प्रदान करता है। ना कि वक्त आने पर हमारा ही मजाक उड़ा देता है जो कि इंसानी फितरत है।

• सर्वशक्तिमान ईश्वर कण-कण में विराजमान है। •

हम जानते हैं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर कण-कण में विराजमान है। ईश्वर का साकार, साक्षात रुप है यह अथाह समुद्र, यह विशालकाय पर्वत श्रृंखला, यह अविचल, अविरल धारा, ये अनन्त क्षितिज यह सब उसी का ही तो प्रमाण है, और सबसे जीवंत प्रमाण तो हम स्वयं है कि जिस में इतना कुछ उस ईश्वर ने डाला है कि एक जीवन भी उसके बारे मे समझने के लिए कम है। यदि हम यह महसूस करें कि जब हम बहुत प्रसन्न होते हैं तो हमारा मन हिलोरे लेता है कि हम अपनी खुशी को अधिक से अधिक उसके साथ बैठे जो हमारी खुशी को दुगना करें तो इस अवस्था में प्रकृति हमारे साथ हमारी खुशी को दुगना कर के हमें लौटाती है।

• आपने कभी सागर की लहरों को देखा है? •

आपने कभी सागर की लहरों को देखा है? यदि हम खुश हैं तो वह और उफन- उफन कर हमारी खुशी में लहरा कर नाचने का एहसास कराती हैं और हमें यह बताती हैं कि देखो; ….. हम तुम्हारी खुशी से कितने प्रसन्न है।

इसके विपरीत यदि हम दुखी हैं, खिन्न है, अकेले हैं तो मानो बार-बार आकर हमें आलिंगन करते हुए सांत्वना प्रदान करती हैं कि….. कोई बात नहीं यही दुनियां है, ये इसी तरह ही चलती है। मेरे (समुद्र के) मेरे पानी को ही देखो न…. न जाने कितने के आंसुओं को पी कर ही नमकीन हुआ है। इसलिए धैर्य रखो…… सब ठीक हो जाएगा… और थोड़ी देर में ही हम इन लहरों का सानिध्य पाकर अपने आप को शांत पाते हैं।

आप कितने ही लोगों के बारे में जानते होंगे जो दोनों ही अवस्थाओं में प्रकृति के सानिध्य में रहना पसंद करते हैं क्योंकि एक ईश्वर ही सत्य है, प्रामाणिक है, आदि अनंत है, यह हम सबका है और यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम सब ही उसके ना आज तक हुए हैं ना भविष्य में हो सकेंगे, क्योंकि पूर्ण समर्पण जिन्होंने भी किया है वह बहुत कम है।

• कुछ लोग ईश्वरीय सत्ता को मानते ही नहीं •

कुछ लोग ईश्वरीय सत्ता को मानते ही नहीं और कुछ ऐसे हैं जो अपने जन्म, अपनी क्षमताओं, को अपनी उपलब्धियों को केवल अपने से ही संबंधित मानते हैं और इसका श्रेय केवल स्वयं को देते हैं। इसमें उन्हें किसी का सहयोग, किसी का आशीर्वाद, किसी की तपस्या, किसी का देवत्व नजर ही नहीं आता है।
खैर… जाने दो।

यहां बात सिर्फ मेरी और मेरे परम मित्र ईश्वर की है। जहां वह मेरे इतने निकट है कि मैं उनसे अधिकार से भी बहुत कुछ कह सकती हूं। वह मेरे अपने हैं जिनसे लिपट कर मैं रो सकती हूं। जिनको मैं अपने आसपास महसूस कर सकती हूं। यह एक भाव है, एक पागलपन है जिसे समझने के लिए उच्च कोटि की संवेदना, सुकोमल हृदय, पवित्र भावनाएं, निष्ठा, भक्ति और समर्पण चाहिए।
..… तो मैं अपनी बात कहना चाहती हूं अपने परम मित्र ईश्वर से कि सुनो; तुम करो वादा ….…

तुम तो सर्वशक्तिमान हो, तो आज मुझसे यह वादा करो कि तुम जब भी नई सृष्टि की रचना करो तो उसमें इंसान को इतना ज़हरीला ना बनाना जितना वह बन चुका है। तुम वादा करो मुझसे कि ऐसे इंसानों को इस धरती पर जन्म ही नहीं दोगे जो केवल स्वार्थी हैं, केवल अपने ही बातें करते हैं, अपने ही कामों के प्रति सचेत हैं, आत्म प्रशंसा के अतिरिक्त उन्हें कुछ आता ही नहीं। वे इतने निष्ठुर हैं कि किसी इंसान की भावनाएं, उसकी सेवा, उसकी निष्ठा, उसका भोलापन, उसकी निश्चल संवेदनाओं को एक पल में कुचल कर रख देते हैं वह भी इतने नुकीले कीलों से कि लहूलुहान कर के रख देते हैं।
तुम वादा करो….. मुझसे अपनी इस नई सृष्टि में उन इंसानों को जन्म नहीं दोगे जो दरिंदे हैं, छोटी बच्चियों को नोच खाते हैं, विक्षिप्त मानसिकता के शिकार हैं।

• तुम वादा करो…… •

तुम वादा करो….. अपनी नई दुनिया में उन लोगों को जगह नहीं दोगे तो अपनी वासना के लिए, क्षणिक शारीरिक आनंद के लिए अपनी संतान को प्लास्टिक की थैली में जिंदा ही फेंक देते हैं। तुम्हारी इस अनूठी, अप्रितम, अतुलनीय सृजन शक्ति का इतना घिनौना रूप सामने लाते हैं। एक जीव को, एक जीवन को इस दुनिया में लाकर कुत्तों के खाने के हवाले कर देते हैं। कूड़े के ढेर में तुम्हारे ही स्वरूप को फेंक देते हैं, क्योंकि बच्चे तो साक्षात भगवान का ही स्वरूप होते हैं। अपने जिगर के टुकड़े को स्वयं से ही दूर कैसे कर लेते हैं ये लोग?
तुम वादा करो मुझसे….. अपनी इस नई दुनिया में कहीं भी धोखा, फरेब नहीं होगा। इंसान को इंसान समझा जाएगा क्योंकि आज के हालात तो ऐसे हैं कि….

“कहीं गीता में ज्ञान नहीं मिलता,
कहीं कुरान में ईमान नहीं मिलता,
अफसोस तो है कि इस दुनियां में
इंसान को,
इंसान में,
इंसान नहीं मिलता”।

उस दुनियां में जहां रिश्तों की, भावनाओं की कद्र होगी। जहां कान खजूरे की टांगों की तरह उतने ही लोगों के दंश नहीं होंगे, क्योंकि सांप और बिच्छू के डंक और जहर से तो बचा जा सकता है क्योंकि उनका ज़हर दिखाई देता है परंतु इंसानी ज़हर आत्मा को छलनी कर देता है। मैं बहुत परेशान हूं तुम्हारी इस दुनियां से जहां इतना पाप, इतना धोखा, इतना छल भरा हुआ है कि हिंसक जानवरों से तो बचा जा सकता है परंतु जो इंसानों का ही शिकार करें उनसे कैसे बचा जाए? तुम ही बताओ …..

अब तुम जो कहोगे मैं जानती हूं ……
तुम कहोगे कि मैंने तो यह सृष्टि बहुत सुंदर, निर्मल, निश्चल ही बनाई थी। परंतु तुम इंसानों ने ही इसे अपने कर्मों के द्वारा ऐसा बनाया है। जहां मेरा कीर्तन, मेरा नाम लेकर कितने गलत काम किए जाते हैं। मुझे ‘बनाते’ हो, मुझे ही सजाकर बाजार में बेचते हो, भला कौन ऐसा है जो मुझे ‘बना’ सके? मेरा ‘निर्माण’ कर सके? मेरी बोली लगा सके? और मेरी कीमत में भी मोल – भाव करते हो।

• मैं तो केवल श्रद्धा, भक्ति, भाव और प्रेम से ही बिक जाता हूं। •

किसमें इतनी हिम्मत है कि मुझे पैसों में खरीद सके ? अरे मैं तो केवल श्रद्धा, भक्ति, भाव और प्रेम से ही बिक जाता हूं। परंतु इन सब केआभाव में तुम कलयुगी मानवों ने मेरा कितना मजाक उड़ाया है?…… तुम अपराधी होकर भी मेरा स्वरूप होने की घोषणा करते हो…….. और स्वयं भगवान होने के दावे करते हो……. क्या मैं ऐसा हूं? ……. तुम मेरी शक्तियों का इतना दुरुपयोग करते हो, मेरा कितना दोहन करते हो। मुझ पर पत्थर फेंकते हो। परंतु मैं तो फिर भी तुम्हें मधुर फल ही देता हूं, और क्या – क्या बताऊं तुम्हें। यदि मैं बोलने पर आया तो तुम कोई भी नहीं सुन पाओगे …….।
इसलिए सिर्फ इतना ही कि यह सब तुम्हारे कर्मों का फल है और इस धरती को तुमने ही ऐसा बनाया है, मैंने नहीं।

मैं जानती हूं तुमने जो कहा है, सब सत्य है। पर मेरे परम मित्र, मेरे आधार, मेरे आराध्य…. इसलिए इतना होने के बाद भी तो सिर्फ तुमसे….. और सिर्फ तुमसे ही तो यह कह सकती हूं कि अगली सृष्टि में इंसान बनाना ही नहीं क्योंकि केवल वही ऐसे हैं जो सब दूषित करते हैं। मैं यह भी जानती हूं कि बहुत से अच्छे लोग भी हैं जो अपना जीवन मानवता, वैश्विक मूल्यों पर, प्रकृति प्रेम, भाईचारे पर ही, न्यौछावर कर देते हैं। पर इनकी संख्या बहुत कम है क्योंकि यही तो पृथ्वी की धुरी कहे जा सकते हैं। तभी तो पृथ्वी निराधार, निरंतर घूम रही है।
पर तुम वादा करो….. यदि ऐसे ही दुनिया बनाओगे तो ठीक है वरना फिर उसमें भी यही सब व्याप्त हो जाएगा और जितनी तकलीफ मुझे हो रही है उससे ज्यादा तुम्हें होगी। पर तुम तो बर्दाश्त कर लोगे पर शायद मैं ना कर पाऊं…. क्योंकि मैं थक चुकी हूं दोगले इंसानों से, इस नकली हंसी से, इस झूठी शख्सियतों से।
मैं नहीं चाहती इस दुनिया में रहना……

तुम वादा करो मुझसे…. मुझे अपने साथ ही रखोगे, अपने पास ही रखोगे, जब भी मैं आऊंगी तुम्हारे पास मुझे अपनी बाहों में भर कर अपने अनंत वक्षस्थल से जुदा मत करना। मुझे अपने पास ही रखना और नई दुनियां में इंसान मत बनाना और बनाना तुम्हारी मजबूरी हो तो कृपया मुझे इंसान नहीं बनाना। कुछ भी बनाना पर इंसान नहीं।

• मीरा की तरह…… •

नहीं झेल पाऊंगी दोबारा से यह सब। मैं टूट जाऊंगी, बिखर जाऊंगी। तुम तो सब समझते हो ना….. तुम तो मेरे अपने हो ना….. फिर तुम ऐसा नहीं करना….. तुम करो वादा कि मुझे फिर छलने के लिए नहीं छोड़ोगे। खुश रखने के झूठे वादे करने वालों से तुम मुझे बचाओगे। तुम अपने पास ही मुझे रखना… वहीं जहां झूठ फरेब, धोखे यह सब ना हो।

जहां अनंत, अगाध प्रेम हो…. निष्कपटता हो….. निश्छलता हो….. मासूमियत हो….. भावनाएं हो…..आलिंगन हो….. स्पंदन हो…. खुशी हो…. आत्मा हो….. चेतना हो……. स्पर्श हो…. समर्पण हो….. भाव हो….. एकैक्य हो….. सरलता हो…… सहजता हो……साम्य हो…… अनंतता हो….. और वो सब सिर्फ तुम्हारे पास है….. तुम्हारे साथ है….. इसलिए तुम करो वादा .. कि……

बस मीरा की तरह तुम में ही समा जाऊं….. तुम में खो कर, तुमको ही पा जाऊं….
बस तुम करो वादा…. तुम करो वादा……

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा अगर गंदगी किसी प्राणी ने किया है तो वो प्राणी इंसान ही है। चाहे बात प्रकृति को गन्दा करने की हो या अन्य गंदगी की वो सब इंसान ने ही किया है। पूरी पृथ्वी को नर्क बना दिया है इंसानो ने। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार के वशीभूत हो, विकर्म पर विकर्म करता चला जा रहा है आज का इंसान। सत्य व अच्छे कार्यों से दूर होता जा रहा है। अभी भी समय है तू संभल जा इंसान वर्ना सिर्फ पछताता रह जायेगा बाकि बचे हुए जीवन भर। तुम वादा करो मुझसे…. मुझे अपने साथ ही रखोगे, अपने पास ही रखोगे, जब भी मैं आऊंगी तुम्हारे पास मुझे अपनी बाहों में भर कर अपने अनंत वक्षस्थल से जुदा मत करना। मुझे अपने पास ही रखना और नई दुनियां में इंसान मत बनाना और बनाना तुम्हारी मजबूरी हो तो कृपया मुझे इंसान नहीं बनाना। कुछ भी बनाना पर इंसान नहीं।

—————

यह लेख (एक पाती : अपने आराध्य के नाम।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

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