Kmsraj51 की कलम से…..

Hospital | हस्पताल की।

उदासी में उगती हर सुबह यहां की,
उदासी में डूबती हर सांझ और रात।
उदासी में ही बीतता है दिन भी सारा,
बीमार बेटे के देख कर बिगड़े हालात।
कभी दिमाग में इन्फेक्शन तो कभी,
दिल में छेद की डाक्टर कहता बात।
हर रोज बीमारी नई – नई सुन कर,
कैसे खुश रहता जवान बेटे का बाप?
कब तक छुपाऊं बेटे से कितना और कैसे?
परेशान मां, दादी, छुटकू, कुल कुनबा साथ।
एक ही आश विश्वास कि रब राखेगा अब,
उसके आगे भला किसकी क्या औकात?
सिर तो फाड़ा है सीना भी चीरना है,
क्यों कर उदास न होगा एक बाप?
यह जगह है, जहां पैसा तो चाहिए ही,
पर सबसे ज्यादा चाहिए रब का साथ।
गुरुद्वारे का कीर्तन चहुँ ओर है गूंजता,
मस्जिद की गूंजती है ऊंची सी अजान।
मंदिरों का शंख – घंटा नाद भी है गूंजता,
पर तुम कहां छुपे हो हे करुणानिधान?
भूत का प्रारब्ध है भोग रहे यह या कि,
भविष्य का संचित वर्तमान का क्रियमाण?
पूछता हूं बार – बार सवाल कई ऐसे बस,
निरुत्तर है दीवारें हस्पताल की आलिशान।
जानता हूं हर जन्म का अन्त मरण है,
वह आएगा, यह एक कड़वी सच्चाई है।
अस्त व्यस्त हो जाए जवानी में जीवन,
कुदरत की भला इसमें कौन भलाई है?
हँसने खेलने के जो दिन होते हैं जीवन के,
क्या बीत जाएंगे बेटे के रोग शोकों में नाथ?
आक्रोश घना है, उतारूं तो उतारूं किस पर?
मानुष जीवन की विवशताएं कही न जात।
हर दोष दूसरों के ही सर पर मढ़ना,
यही तो फितरत जगत में इंसानी है।
गुनाह जरूर हमारा ही होगा दाता,
यह आक्रोश व तुझ पर मढ़ना दोष,
यह हमारी मनुष्य सोच की नादानी है।
Note : यह रचना मैंने अपने जीवन के वर्तमान हालात पर लिखी है।
♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦
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- “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कभी दिमाग में इन्फेक्शन तो कभी, दिल में छेद की डाक्टर कहता बात। हर रोज बीमारी नई – नई सुन कर, कैसे खुश रहता जवान बेटे का बाप? सिर तो फाड़ा है सीना भी चीरना है, क्यों कर उदास न होगा एक बाप? यह जगह है, जहां पैसा तो चाहिए ही, पर सबसे ज्यादा चाहिए रब का साथ। हँसने खेलने के जो दिन होते हैं जीवन के, क्या बीत जाएंगे बेटे के रोग शोकों में नाथ? आक्रोश घना है, उतारूं तो उतारूं किस पर? मानुष जीवन की विवशताएं कही न जात। जीवन को दर्द और आनंद के मिश्रण के रूप में देखने की हमारी क्षमता हमें जीवन को उसकी पूर्ण सीमा तक अनुभव करने की अनुमति देती है। जब आनंद आता है तो हम उसके लिए खुलना सीखते हैं, इसे अपनी इंद्रियों के माध्यम से लेना और इसकी सराहना करना सीखते हैं, ज्ञान के साथ यह एक आगंतुक है जो आता है और जाता है।
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यह कविता (हस्पताल की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।
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विज्ञान और ज्ञान की जंग मानव समाज में बहुत पुरानी है। भारतीय पौराणिक कथाओं को पढ़े तो सुरों – असुरों या देव – दानवों की मुख्य लड़ाई ही शायद विज्ञान और ज्ञान की थी। सुर या देव जहां ज्ञान आधारित जीवन पद्धति के समर्थक थे तो असुर या दानव विज्ञान आधारित जीवन पद्धति के समर्थक थे शायद। ज्ञानाधारित जीवन पद्धति यदि मर्यादाओं, शालिंताओं, आस्थाओं और विश्वासों पर टिकी थी तो उसका मनोबल और नैतिक चरित्र भी उतना ही दृढ़ और उन्नत था।












