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प्रेरणादायक हिंदी कविता संग्रह

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kya Badlaav Layega Naya Saal | क्या बदलाव लायेगा नया साल।

नववर्ष 2026 पर प्रेरणादायक हिंदी कविता | उम्मीद और बदलाव

बीते को भुलाना, नए को अपनाना,
जो खोया उसका रोना, पाए पर इतराना,
अच्छाई से दोस्ती, बुराई से घबड़ाना,
खट्टी मीठी यादों का बीता सफर सुहाना,

यादों के झरोखों से बज रहा तराना,
गजब फलसफा है मेरे भाई,
जेहन में मेरे पुनः एक बात दोहराई,
अधूरी आस क्या इस वर्ष होगी पास,

नववर्ष के आगमन ने ज्यों ही खुशियां फैलाई,
तभी एक बार फिर उद्गार उमड़ आई,
2026, क्या बदलाव है लाई?
क्या सच्चाई की जीत और बेईमानी की होगी हार,

ईर्ष्या द्वेष मिटाकर भाईचारे का सपना होगा साकार,
क्या बेरोजगारी मिटेगी, रोजगार मिलेगी,
अमन चैन से भरी जिंदगी कटेगी,
कभी दिलासा कभी डर का छाया साया,

उम्मीदों ने मुझे हौसला है दिलाया,
डर को है झुकाना, हिम्मत को बढ़ाना,
शिक्षा, स्वच्छता और
सामाजिक कार्य को अपनाना,
इस मंत्र को कभी न भुलाना,

यही बात जन-जन को है समझाना,
बदलाव को है अपने देश में लाना,
नववर्ष में यही गीत गुनगुनाना।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता बीते वर्ष की स्मृतियों, अनुभवों और सीख को आत्मसात करते हुए नववर्ष से जुड़ी आशाओं और आत्ममंथन को अभिव्यक्त करती है। कवि कहता है कि जीवन में बीते दुख-सुख, हार-जीत, अच्छाई-बुराई सभी का अपना महत्व होता है, जिनसे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। यादों की खट्टी-मीठी अनुभूतियाँ मन में नए प्रश्न और नई उम्मीदें जगाती हैं।

    नववर्ष 2026 के आगमन पर कवि समाज और देश में सकारात्मक बदलाव की कामना करता है—सच्चाई की जीत, बेईमानी की हार, ईर्ष्या-द्वेष का अंत और भाईचारे का विस्तार। बेरोजगारी के समाप्त होने, रोजगार बढ़ने और अमन-चैन से भरे जीवन की आकांक्षा व्यक्त की गई है।

    कविता का संदेश है कि डर को परे रखकर हिम्मत बढ़ाई जाए और शिक्षा, स्वच्छता व सामाजिक कार्यों को अपनाकर देश में वास्तविक परिवर्तन लाया जाए। अंततः यह कविता नववर्ष को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मसुधार और सामाजिक जिम्मेदारी का संकल्प बनाने का आह्वान करती है।

—————

यह कविता (क्या बदलाव लायेगा नया साल।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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खो जाने दो।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kho Jaane Do | खो जाने दो।

खो जाने दो हमें गुमराहियों के अंधेरे में,
वाहवाहियों की हमें कोई दरकार नहीं।
नहीं चाहिए हमें ऐसी ख्याति विख्याती,
लोक मंगल का हो जिसमें विचार नहीं।

कहां खोए रहे हर क्षण छिछले से शब्द न्यास में,
बेकार वह बात जिसमें गरिमा का अधिभार नहीं।
नफरत भली है उस दिखावटी प्रेम से भी कहीं,
जिसमें हकीकत का हो लेश मात्र भी दीदार नहीं।

सजानी नहीं है जिन्दगी की महफिलें हमें,
खुशामदी के रंग बिरंगे बनावटी फूलों से।
फिल्मी किरदारी प्रेम की है चाह ही कहां?
जिन्दगी जीना चाहते हैं प्यार के उसूलों से।

कमबख्त यह जीवन भी बदलता है रंग,
हर रोज बस मौसम के मिजाज की भांति।
सुकून से जीने ही नहीं देता है किसी को भी,
जिन्दगी की उहापोह में है ही कहां शान्ति।

रंगीनियों की तलबगार रही है हमेशा से,
छिछोले से पन की वह मदहोश वासना।
प्रेम पूजा है, जरूरत है, रहम है, इबादत है,
प्रेम तो खुद ही है उस खुदा की उपासना।

सब जानते हैं लोग, लेकिन फिर भी न जाने क्यों?
जहां में नफरतों और वासनाओं का जहर घोलते हैं।
जिधर भी देखो उधर ही एक अजीब सी मदहोशी है,
अब तो लोग प्रेम को भी रूप और दौलत से तोलते हैं।

बस एक अजीब सी घुटन है हर किसी के भीतर,
बिरले ही है कोई जो दिल का हर राज खोलते हैं।
है अधूरे प्रेम की आज भी लाखों कहानियां यहां,
पर मजाल है कि कोई किसी से कुछ बोलते हैं।

गुजर जाती हैं जिन्दगियां सच्चे प्रेम की तलाश में,
नसीब कहां? मिल जाए तो खुद को खो जाने दो।
मन मसोसकर घुट – घुट के जीने से बेहतर तो यह है,
कि खुद को खुदा की इबादत से प्रेम में रो जाने दो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — दिखावटी वाहवाहियों की हमें कोई दरकार नहीं है, नहीं चाहिए हमें ऐसी ख्याति विख्याती, लोक मंगल का हो जिसमें विचार नहीं। ये सच है की नफरत भली है उस दिखावटी प्रेम से भी कहीं, जिसमें हकीकत का हो लेश मात्र भी दीदार नहीं। सजानी नहीं है जिन्दगी की महफिलें हमें, खुशामदी के रंग बिरंगे बनावटी फूलों से। हमें फिल्मी किरदारी प्रेम की है चाह ही कहां? हम जिन्दगी जीना चाहते हैं प्यार के उसूलों से। आज का मानव दहोश वासना में है, जबकि उसे जरुरत है प्रेम, स्नेह व भक्ति-भजन की, हम सब जानते है की प्रेम ईश्वर का ही रूप है। सब जानते हैं लोग, लेकिन फिर भी न जाने क्यों? जहां में नफरतों और वासनाओं का जहर घोलते हैं। जिधर भी देखो उधर ही एक अजीब सी मदहोशी है, अब तो लोग प्रेम को भी रूप और दौलत से तोलते हैं। बस एक अजीब सी घुटन है हर किसी के भीतर, बिरले ही है कोई जो दिल का हर राज खोलते हैं। गुजर जाती हैं जिन्दगियां सच्चे प्रेम की तलाश में, नसीब कहां? मिल जाए तो खुद को खो जाने दो।

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यह कविता (खो जाने दो।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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ज्ञानसेनी।

Kmsraj51 की कलम से…..

GyanaSeni | ज्ञानसेनी।

“ज्ञानसेनी”
अधरों का पुष्प,
उम्मीदों का सूरज,
करें संकट दूर रघुवर,
ज्ञानसेनी सजाया है।

रिश्तों का मिठास,
हैं स्वप्नों में आप।
चलो फिर गीत गाएं,
ज्ञान दर्पण लाया हूं।

भोला का डिम डिम डमरू,
काशी की मस्ती भरी।
धनुष वाण में श्री राम,
ज्ञानसेनी भरत से मिलाया है।

स्मृतियों में अयोध्या धाम,
चक्रवर्ती साम्राज्य है नाम।
प्रकृति का आलिंगन,
ज्ञान सेनी ने दिखाया है।

ज्ञानसेनी …
ज्ञान की छोटी थाली,
नक्काशीदार थाली।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — अपने भारत देश में प्राचीन काल से ही हर रिश्तों का अपना – अपना महत्व व सम्मान है। श्री राम व उनके भाइयो लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न से हमे सीख़ मिलती है की भाई का भाई से कैसा प्रेम व व्यवहार होना चाहिए आपस में और माता-पिता का आदेश व सम्मान सर्वोपरि हैं। हमे गर्व है अपने प्राचीन काल से चली आ रही भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता पर, “गर्व से कहो हम सनातनी है, जय जय श्री राम!” जैसे – जैसे समय बदला वैसे – वैसे इंसान के सोचने व समझने की छमता ख़त्म होती जा रही है, अपने प्राचीन महत्वपूर्ण संस्कारों को भूलता जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप कई तरह के समस्याओं से परेशान है। हे मानव अब भी समय है सुधर जाओ वर्ना ये पृथ्वी रहने लायक नहीं रहेगी। याद रखें की – जिस देश के लोग अपनी प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को भूल जाते है, उनको विलुप्त होने से कोई भी नहीं बचा पायेगा। इसलिए अपने अंदरऔर वर्तमान पीढ़ी व आने वाली नई पीढ़ी को प्राचीन भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता का पूर्ण ज्ञान दो, और उन्हें अनुसरण करना भी सिखाओ।

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (ज्ञानसेनी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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आज न होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज न होगा। ♦

आज न होगा कोई मंगल गान प्रिये,
विपदा में व्यथित जो समूची धरती है।
नफरत के शोलों से विदीर्ण हर वक्ष आज है,
मानवता तिल – तिल कर आज यहां मरती है।

दर्द का दरिया बह रहा है दिल में,
हृदय की जमीन हो गई अब परती है।
मानस कल्पना की लहरों से भी अब तो,
आक्रोश – कटाक्ष की आग ही झड़ती है।

अतृप्त लालसाओं ने जग को है घेरा,
स्वार्थ बेड़ियों ने रूह ही मानो जकड़ी है।
अब उठती ही कहां है कोमल भावनाएं मन में?
हृदय भाव की गति भौतिकता ने जो जकड़ी है।

होता न आदर आज गांव के गलियारों में,
शहरों में तो पहले से ही रही आपाधापी है।
आज न नातों – रिश्तों की कद्र है कहीं पर,
मानव रूप में पाश्विक सभ्यता देखो आती है।

गांव की गुड्डी को गभरू बहन यहां कहते थे,
आज नव जवान देहाती भी खुराफाती है।
महफूज कहां रही अब अस्मत बहू – बेटी की?
वह अपनों के ही हाथों आज लूटी जाती है।

पढ़े-लिखे आदिमानव हो चले हैं हम क्या?
अर्धनग्न घूमते हैं और मद्य – मांस ही खाते हैं।
पशु सी करते हैं करतूतें सब उन्मादी में,
फिर खुद को सभ्य – सुसंस्कृत मानव बताते हैं।

हाय – हाय री! फैशन लाचारी और मानव दुर्दशे,
सच में आज विद्रूपता है जीती और हम है हारे।
शहर – शहर और गांव – गांव में देखो आज तुम,
हर कोई फिरते हैं फैशन के पीछे मारे – मारे।

आज न होगा कोई मंगल गान प्रिये,
इन सब घटनाओं से भीतर भारी पीड़ा है।
मानव समाज में विकृतियों आते देख को,
सोचता हूं, यह विधि की कैसी क्रीड़ा है?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — समस्त संसार का एक ही मूलमंत्र होना चाहिए, वो है जीवमात्र पर दया करना। यह दया भाव मनुष्य का मनुष्य के प्रति या मनुष्य का अन्य जीवों के प्रति होती है। जीवमात्र पर दया करना ही मानवता है। पृथ्वी पर मनुष्य सबसे उत्तम और सर्वश्रेष्ठ प्रजाति है। पर आजकल हो क्या रहा है? इसके बिलकुल उलट – सबकुछ हो रहा है आज का मानव शैतान व राक्षस हो गया है, शराब पीना, मांस खाना, बलात्कार करना, काम वासना व नशे में चूर होकर बड़े से बड़ा विकर्म करने से भी जरा भी नही डरता, क्यों ? पूर्ण रूप से शैतान व राक्षस बन गया है आज का मानव पढ़-लिखकर भी ऐसे कुकर्म करने से पहले एक बार भी नहीं सोचता की आने वाली पीढ़ी के लिए हम क्या सीख दे रहे हैं, हद हैं तेरी रे मानव क्या से क्या हो गया तू !

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यह कविता (आज न होगा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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पावन माह सावन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पावन माह सावन। ♦

पावन माह सावन में, देव शिव भी चले आयें।
इंद्रदेव भी उनके स्वागत में, मेघों से जल बरसाये।
मंगल ही मंगल होगा, अब तो सब।
सारे संकट संसार के, भोले भंडारी हर लेगें अब॥

इस पावन श्रावण मास में जप से ही,
त्रिलोकी नाथ ने सबको भव से उतार दिया।
माता पार्वती की भक्ति से प्रसन्न हो,
उनको वर का उपहार दिया॥

श्रावण मास में ही शिव ने,
समुन्द्र मंथन का विष-पान कर डाला।
समस्त ब्रह्मांड के कष्टों को,
इस भोले ने पल में हर डाला॥

ऋषि मार्कण्डेय की भी भक्ति से,
प्रसन्न हो, दिया ऐसा वरदान।
यमदेव भी नतमस्तक हो सम्मुख इसके,
इसकी भक्ति को दिया मान॥

आओं इस सावन मास, हम सब
इस अमरनाथ को रिझाएँगे।
कर अर्पण दूध-जल शिवलिंग पर,
संसार की खुशियाँ ये त्रिलोकी दे जायेंगे॥

कष्टों का जो फैला दिया इस महामारी ने,
अपना प्रकोप, इस जग में।
शिव-शक्ति कर देगी कल्याण, इसकी श्रद्धा,
आस्था, भक्ति बसा लो, अपने रग-रग में॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से इस कविता में कवयित्री ने सावन का पवित्र महीना जो की, वर्षा, हरियाली, खेतों में रौनक, और शिव की भक्ति से सराबोर होता है, भोले शिव के गुणों और शक्तियों व उनका संसार के प्रति कल्याणकारी कार्यों का अच्छे से वर्णन किया है।

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यह कविता (पावन माह सावन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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अस्तित्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अस्तित्व। ♦

पीड़ा और शोक की कहानी,
आरोप-प्रत्यारोप की कहानी,
से बड़ी होती है।

संतोष और विवेक पूर्ण धरोहरों,
सुख शांति का एकमात्र साधन है।
अस्तित्व का कभी अंत नहीं होता।
वस्तु का ही सदा अंत होता है।

आत्मा न जन्म लेती है ना मरती।
जिसका जन्म नहीं होता,
उसकी मृत्यु नहीं होती है।
आत्मा का प्रारंभ ना और ना अंत।

इसलिए आत्मा की अमरता है।
जिसका कोई नहीं होता है।
उसकी मृत्यु नहीं होती है।

ब्रह्मांड में प्रकाशित होने वाला,
ब्रह्मांड के बगीचे का अंग है मनुष्य।

सब कुछ उसके अंदर होने के बावजूद।
प्रकृति और समाज पर निर्भर होता है मनुष्य।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
इसलिए वह समाज में रहता है।

अपने अस्तित्व के लिए,
वह समाज पर निर्भर है।
मनुष्य समाज से अलग हो जाता है,
तो उसका विनाश संभव है।

अपने बारे में केवल विचार करके,
मनुष्य खुशहाल नहीं जि सकता।
व्यक्ति समाज से अलग,
रह कर सुखी नहीं होता।

संत पुरुष समाज से अलग,
रह कर ईश्वर से लगन लगाते हैं।
ईश्वर और ऋषि जब साथ होते हैं,
तो वह आनंदा की अनुभूति होती हैं।

मनुष्य को समाज के,
अनुसार चलना पड़ता है।
व्यक्तिगत सोच समाज के,
अनुसार ही रखनी पड़ती है।

सभी व्यक्ति अपनी सोच के अनुसार,
के लोगों के साथ रहना चाहते हैं।
जबकि सब के विचारों में विविधता होती है।

आत्मा का अर्थ होता है अस्तित्व,
अस्तित्व तो कभी मरता नहीं है।
यह पंच तत्वों से निर्मित,
शरीर भी अपनी नहीं है।

आत्मा जब शरीर को छोड़ देती है,
तब शरीर पंचतत्व में ही मिल जाती है।
विद्वान पुरुष आत्मा और शरीर में अंतर जानते हैं।
आत्मा न जन्म लेती है और न हीं मरती है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – आत्मा का अर्थ होता है अस्तित्व, यह पंच तत्वों से निर्मित शरीर भी अपनी नहीं है। आत्मा के सभी गुणों का महत्व और रियलिटी को बताया हैं। मनुष्य क्या है और मनुष्य समाज में क्यों रहता है, इसे भी समझाया हैं।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (अस्तित्व।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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