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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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छोटी सी कविता हिंदी में

रिश्तों का गणित।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रिश्तों का गणित। ♦

रिश्तों का गणित
अक्सर कहते हैं लोग मुझे,
मैं गणित का ज्ञान रखती नहीं।
करती हूं किस प्रकार गृहस्ती में काम,
कुछ तो करो इस का बखान॥

चलो – गणित की शुरुआत,
मैं कुछ इस प्रकार करती हूं !
शून्य से प्रारंभ कर,
शून्य से ही अंत करती हूं॥

माना अंकगणित से,
ज्यादा नाता रखती नहीं।
पर इतना तो जरूर है,
की रिश्तों में मैं ज्यादा,
गुणा भाग करती नहीं॥

जोड़ना हो अगर तो,
दिलों को मैं जोड़ना हूं जानती।
घटने और घटाने की बात आए तो,
मैं नफरतों को देती हूं घटा॥

समीकरण तो ज्यादा समझ में आते नहीं,
पर रिश्तों में सामंजस्यता बैठा लेती हूं।
उठता है अगर अहंकार का जोड़ वाला चिन्ह,
तो उसे मैं दो मीठे बोल बोलकर घटा ही लेती हूं॥

ज्यादा पहाड़े तो आते नहीं,
लेकिन मुट्ठी भर खुशियों को,
उम्मीद के दामन के साथ गुणा करके,
पहाड़ जितना बना देती हूँ॥

हवा चलती है जब परेशानियों की,
तो मैं भाग कर देती हूं।
थोड़ी उम्मीद में देती हूं बाँट,
थोडा सब्र रखने की करती हूं बात॥

फिर भी जोड़ गुणा भाग – घटा,
में रह जाए कोष्ठक जैसा कोई सवाल,
उसे भी अलग रखकर देती हूं।
रिश्ते में नई पहचान,
ताकि वो ना हो जाये परेशान॥

अंको की इस भीड़ में फिर भी,
अपनी पहचान शून्य ही बताती हूँ।
शून्य से शुरुआत करके – शून्य,
पर ही खत्म हो जाती हूं॥

♦ कविता पाल जी – नई दिल्ली ♦

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  • “कविता पाल जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए समझाने की कोशिश की हैं — रिश्ता चाहे कोई भी है, उतार चढ़ाव तो रिश्तों में आता रहता है, प्रेम, समर्पण और समझदारी से हरेक रिश्तों को संभाला जा सकता हैं। रिश्तों का गणित तो बहुत सरल है बस जरूरत है समझदारी के साथ सभी से तालमेल बनाकर चलने की। चाहे बड़े हो या छोटे सबको प्रेम से मिलजुल कर रहना चाहिए। सभी का आदर व सम्मान करना चाहिए। मिलजुल कर हर एक कार्य करना चाहिए। आओ हम सब मिलकर एक सुखमय समाज का निर्माण करें।

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यह कविता (रिश्तों का गणित।) ” कविता पाल जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए, माता रानी की कृपा से।

नाम : कविता पाल
शिक्षा : पुस्तकालय विज्ञान में D.LIS, B.LIS, और M.LIS
PG Diploma in YOGA.

शौक : अध्यापन, लेखन, समाज सेवा द्वारा महिलाओं की स्थिति में जागरूकता लाना।

— अपने बारे में कुछ शब्द साहित्यिक गतिविधियां काव्य लेखन, गद्य लेखन एवं फेसबुक के विभिन्न साहित्यिक समूहों में सक्रिय सहभागिता रहती है अतः सक्रिय लेखक सम्मान एवं पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।
— मेरे द्वारा फेसबुक पर अनमोल अल्फाज नामक पेज का संचालन भी किया जाता है। जिसका एकमात्र उद्देश्य समाज में मेरी कविताओं द्वारा महिलाओं एवं अन्य क्षेत्र में जागरूकता का कार्य करना है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

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यादों में तुम हो।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ यादों में तुम हो। ♦

लबों पे वो, बाहों में ये, ख़्वाबों में तुम हो।
हर घड़ी हर पहर यादों में तुम हो॥

कैसी कशमकश है दुनिया हमारी,
सब कुछ मिला, न मिला दिलकरारी।
हिम्मत नहीं खुदकुशी की ऐ जानम,
कैसे बताऊं, है क्या बेकरारी॥

जिता हूँ तुमसे… मेरी सांसों में तुम हो।
हर घड़ी हर पहर यादों में तुम हो॥

जिस्म में और कोई, बातों में और कोई,
हृदय की ध्वनि में तेरे सिवा न और कोई।
जागूं तो तुम, सोऊं तो तुम, रोऊं तो तुम,
मेरे एक – एक इंद्रियों में ऐसे हो तुम खोई॥

सच यही है.मेरे जलते जज़्बातों में तुम हो।
हर घड़ी हर पहर यादों में तुम हो॥

ये थके हारे नैन अटके हैं कल पर,
तुझे ढूंढती है हरदम, प्रेमियों के पटल पर।
तेरे दरस बिन मचलती है आहें।
टीका लगा दे मेरे अंत: तल पर॥

आजा सनम, जाने कहां कब से गुम हो।
हर घड़ी हर पहर यादों में तुम हो॥

♦ अमित प्रेमशंकर जी — एदला-सिमरिया, जिला–चतरा, झारखण्ड ♦

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Conclusion

  • “अमित प्रेमशंकर“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — जब भी इंसान किसी से बेइंतहा प्यार करता है, उससे जब भी दूर होता है, उसे बहुत दर्द महसूस होता है। उसकी यादों वाली भावनाएँ दूर नहीं जातीं, उससे। अब महसूस होता है उसे – आज तन्हा हूं, अकेला हूं फिर भी बीते पल को याद करता हूं, जो यादों में भी करीब है। दूर (बिछड़ने) होने के दर्द को वही महसूस कर सकता है जो किसी से बेइंतहा प्यार करता है। उसे महसूस होता है हृदय की ध्वनि में तेरे सिवा न और कोई, जागूं तो तुम, सोऊं तो तुम, रोऊं तो तुम, मेरे एक – एक इंद्रियों में ऐसे हो तुम खोई।

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यह कविता (यादों में तुम हो।) “अमित प्रेमशंकर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। आपकी ज्यादातर कविताएं युवा पीढ़ी को जागृत करने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

नाम: अमित प्रेमशंकर
पता: एदला – सिमरिया
जिला: चतरा (झारखण्ड)
सम्प्रति: कवि, गीतकार व ढोलक वादक।

प्रकाशित पुस्तकें: आत्म सृजन, काव्य श्री, एक नई मधुशाला १, एक नई मधुशाला २, भावों के मोती, व अक्षर पुरूष।
प्रकाशित रचनाएं: देश के अलग-अलग पत्र पत्रिकाओं मे लगभग दो सौ रचनाएं प्रकाशित व समय समय पर सामाचार पत्रों के माध्यम से पत्राचार।
विशेष: “सीता माता सी कोई नहीं” तथा “आज राम जी आएंगे” महाराष्ट्र के वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओ. सी. पटले द्वारा पोवारी भाषा में अनुवाद।

प्राप्त सम्मान: काव्य श्री साहित्य सम्मान, आत्म सृजन साहित्य सम्मान, सरदार भगतसिंह साहित्य सम्मान, सुमित्रानंदन पंत कृति सम्मान, साहित्य कर्नल सम्मान, रैदास साहित्य सम्मान, द फेस ऑफ इंडिया सम्मान, दिल्ली युथ डेवलपमेंट से सम्मानित।
प्रकाशनार्थ: मन की धारा

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प्यार पर शोध।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्यार पर शोध। ♦

जब से मेरा साहित्य में अनुराग जगा,
मैंने नाना विधाओं का साहित्य पढ़ा।
किया गौर तो ये पाया मैंने कि आधा,
साहित्य प्रेम कथाओं से है भरा पड़ा।

गीत, गज़लें, कविता, दोहे, रुबाई, छन्द,
लेख, निबन्ध, मुक्तक न जाने कितने ग्रंथ।
रच डाले कवियों ने प्रेम की व्याख्या में,
फिर भी समझा न पाये है क्या प्रेम पंथ?

उसी पल मन में मेरे आया ये विचार,
करुँ शोध मैं भी, जानूँ क्या है प्यार ?
अपने अनेक मित्रों का आया मुझे ख्याल,
सबसे पूछा मैंने बस यही एक सवाल।

पहले एक डॉक्टर मित्र से की मुलाक़ात,
सुन कर प्रश्न हँसे वो, कही विचित्र बात।
कृती इट्स मीनिंगलैस वर्ड, मेक्स नो सेन्स,
यू कैन डिफाइन इट एज़ हॉर्मोनल इम्बैलेन्स।

किसी ने कहा इसे काल्पनिक अफसाना,
किसी ने कहा इसे जिंदगी का तराना।
कुछ थे गालिब से सहमत, बोले है ये,
आग का दरिया और डूब कर है जाना।

कोई बोला इश्क ने जीना सीखा दिया,
कोई बोला इश्क ने पीना सीखा दिया।
एक ने कहा बेकार की चीज है मुहब्बत,
खाम खां इंसान को निकम्मा बना दिया।

किसी ने नियामत कहा, किसी ने कयामत,
किसी ने शरारत कहा, किसी ने इबादत।
किसी के लिए आंसू और आह थी उल्फत,
किसी के लिये खुदा का नूर थी मुहब्बत।

परिभाषा प्यार की न कोई बता पाया,
सबने केवल अपना अनुभव ही सुनाया।
चकराई बुद्धि मेरी सोच – सोच कर फिर,
ढाई आखर की कितनी विचित्र है माया।

मन मस्तिष्क में चला वैचारिक संघर्ष,
गहन चिन्तन के बाद निकला ये निष्कर्ष।
निजी अनुभव नहीं है प्यार की परिभाषा,
प्यार तो है जीवन का उत्सर्ग, उत्कर्ष।

इस शोध के बाद एक सत्य तो पता चला,
प्यार ने किसी का किया भला या हो छल।
पर ये भावना हर किसी में थी मौजूद,
कोई भी हृदय प्यार से रिक्त नहीं मिला।

प्रेम होता नहीं दुखद जब तक रहे शुद्ध,
मिलावट हिंसा की करती है इसे अशुद्ध।
प्यार और मार का नहीं है कोई मेल,
सबका यही संदेश नानक हो या बुद्ध।

प्यार ही समझता है मानवता की हद,
नासमझी से हमारी हो जाता है बद।
होती है मिलावट इसमें हिंसा की जब,
खोकर स्वरूप अपना बन जाता है जिद।

यही भाव मेरे चिंतन में व्याप्त हुआ,
मुझे तो प्यार का यही अर्थ प्राप्त हुआ।
इसी ज्ञान और संदेश के साथ दोस्तों,
“प्रेम” विषय पर शोध मेरा समाप्त हुआ।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए समझाने की कोशिश की हैं — प्रेम होता नहीं दुखद जब तक रहे शुद्ध, मिलावट हिंसा की करती है इसे अशुद्ध। प्यार और मार का नहीं है कोई मेल, सबका यही संदेश नानक हो या बुद्ध।

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यह कविता (प्यार पर शोध।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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प्रातः उठ हरि हर को भज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रातः उठ हरि हर को भज। ♦

प्रातः उठ हरि हर को भज लो,
धरती का अभिनंदन कर लो।
उल्लसत मनसे बंदन कर लो,
मुक्त कंठ में चंदन धर लो॥

निर्मल पानी गुनगुन पी लो,
चाय की चुस्की रुक कर ले लो।
लिखनी ले साहित्य लिख लो,
प्रातः उठ हरि हर भज लो॥

नित्य – क्रिया में निवृत्ति हो,
गंगा जल ले काया धो लो।
धूप – दीप ले प्रभु से बोलो,
प्रातः उठकर आंखें खोलो॥

पेपर आया उसको पढ़ लो,
देश दुनिया की खबर ले लो।
दूरदर्शन से – मेल कर लो,
प्रातः उठ हरि विनती कर लो॥

भूखा – नंगा जो भी भेजा,
झोली सबकी भर के दे दो।
कोई खाली हाथ न जाये,
प्रातः उठकर प्रभु से बोलो॥

कभी न गलती हरि करने दो,
स्वच्छ हृदय मन भरने को।
अपना हमको प्रभु बना लो,
प्रातः उठ हरिहर को जप लो॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में बताया है, सुबह उठकर आपका नित्य क्रिया कर्म, का क्या क्रम होना चाहिए। जिससे आपका हर एक कार्य शांति पूर्वक, सही समय पर पूर्ण हो जाये।

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यह कविता (प्रातः उठ हरि हर को भज।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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राजा पृथु को मुनिश्वरों का उपदेश।

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♦ राजा पृथु को मुनिश्वरों का उपदेश। ♦

पृथ्वी पालक पृथु महाराज का,
प्रजा जब स्तुत गान करती रही।
उसी समय चार तेजस्वी मुनीश्वर,
तेज पुंज, आकाश मार्ग से आए।

आकाश और से उतरते हुए उन्हें,
राजा पृथु – अनुचर पहचान गए।
आगे बढ़ महाराज किए सम्मान,
उचित संस्कार से मुनियों का मान।

राजा निवेदन सनकादी ने माना,
आपस में बातचीत से पहचाना।
मुनि के चरणों दक सीष लगाया।
सत्य पुरुषों सा व्यवहार दिखाया।

सोने के सिंहासन पर उन्हें बिठाया।
विधिवत पूजा पाठ उनका कराया।
अग्नि देवता सदृष्य तेज था उनका।
मुनियों के तेज से आह्लादित जनता।

विनम्रता पूर्वक राजा पृथु जी बोले,
आपका दर्शन योगियों को दुर्लभ।
यद्यपि आप सर्वव्यापी और सर्वत्र,
फिर भी सर्वसाक्षी आत्मा ना सुलभ।

जिस घर आप कुछ ग्रहण करते हैं,
धनहीन भी ध्यान कर धन्य हो जाता।
हम सभी इंद्रिय संबंधी भोगों को,
अपना पुरुषार्थ मान लिया करते हैं।

आप एकाग्र चित्त ब्रह्म चारी महान।
श्रद्धा भक्ति आचरण पालक विद्वान।
जिस पर आपकी कृपा दृष्टि बरसती,
वह इस संसार में हो जाता है महान।

इन कर्मों के निस्तार का कोई उपाय,
जो भी हो मुनिवर हमको बताइए।
सांसारिक मनुष्य का कैसे होता है,
कल्याण, उसको हमें समझाइए।

यह भी सच है कि उपासक धीर,
पुरुषों के ऊपर वह कृपा करते हैं।
अजन्मा नारायण भगवान जी,
भक्तों का अपने कल्याण करते हैं।

राजा के गंभीर मधुर वाणी सुनकर,
मुनीश्वर प्रशन्नता से कहने लगे?
आप सबकुछ जानते हैं फिर भी,
जन कल्याण हेतु अच्छी बातें पूछी।

साधु पुरुषों की ऐसी बुद्धि होती।
प्रश्न से उनके कल्याण होता है।
मधुसूदन के चरणों में आपकी प्रीत,
अविरल सुंदर है आप की नीति।

ईश्वर में अविरल प्रेम जाग जाता।
वासनायें उसकी सभी नष्ट हो जाती।
आत्म स्वरूप निर्गुण का मुनि ने,
राजा पृथु जी को ब्रह्म ज्ञान बताया।

मुनीश्वर ने राजा पृथु को पावन,
पुनीत प्रीति युक्त भजन सुनाए।
ब्रह्म में लीन हो जाने पर पुरुष,
सतगुरु की शरण में जाता बताए।

विषय इंद्रिय संबंधी भोगों से बचाएं।
विचार शक्ति को बढ़ाते ही जाएं।
विचार शक्ति नष्ट हो जाने पर,
पूर्व स्मृतियां भी नष्ट हो जाती हैं।

और स्मृतियों के नष्ट हो जाने पर,
ध्यान – ज्ञान नष्ट होने लगता है।
अपने द्वारा आत्मा नाश होने पर,
जीवन का सब हानि हो जाता है।

भगवान के चरण, चरण कमल ही,
दुस्तर समुद्र को पार कर देते हैं।
कुमार से आत्मीय उपदेश सुनकर,
राजा पृथु उनकी प्रशंसा करने लगे।

आप लोग बड़े ही दयालु कृपालु हैं।
श्रीहरि भेजी, मुझ पर कृपा की है।
जिस कार्य के लिए आप पधारे थे,
आपने अच्छी तरह उसे संपन्न किया।

इस उपकार के बदले आपको क्या दूं ?
मेरा जो वह महापुरुषों का प्रसाद है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है कि महाराजा पृथु ने कैसे मुनिश्वरों का स्वागत किया। आत्म स्वरूप निर्गुण मुनिश्वरों ने बहुत ही सरल शब्दों में राजा पृथु जी को ब्रह्म ज्ञान बताया।

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यह कविता (राजा पृथु को मुनिश्वरों का उपदेश।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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राजा पृथु के यज्ञ शाला में प्रभु का प्रादुर्भाव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राजा पृथु के यज्ञ शाला में प्रभु का प्रादुर्भाव। ♦

राजा पृथु ने सौ अश्वमेध – यज्ञ करने की दीक्षा ली,
पूर्व मुखी सरस्वती तट पर मनु के ब्रम्हावर्त क्षेत्र में यज्ञ की।
महाराज पृथु ने यज्ञ में खुश होकर आहुती दी,
सर्व लोक पूज्य जगदीश्वर भगवान श्रीहरि का साक्षात दर्शन की।

हाजिर जगदीश्वर के साथ ब्रह्मा रूद्र अनुचर लोकपाल भी जी,
नर -नारी देवी – देवता भी साथ साथ आए थे।
गंधर्व आदि और अप्सराएं प्रभु की गा रही थी गीत,
और प्राकृति कितने तरह – तरह की सामग्री समर्पित की।

छद्म वेश धारण कर इंद्र अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा खोला,
आकाश मार्ग से घोड़ा लेकर भागने का प्रयास किया।
ईर्ष्या वस गुपचुप इंद्र ने घोड़ा हरने का प्रयत्न किया,
और कवच रूप पाखंड धरवेश अपनी रक्षा में धारण किया।

पृथु अंतिम यज्ञ हेतु भगवान की पूजा में थे लीन,
एक दृष्टि, पृथु – महारथी पुत्र को अत्री ने इंद्र को मारने की आज्ञा दी।
पृथु – पुत्र महाबली घोड़े की रक्षा ने मानो ऐसे लगता,
जिस तरह रावण के पीछे जटायु ने सीता को बचाने दौड़ा।

उसका वह प्रारंभिक करती जी ने उसका नाम,
वीर विजिताश्व बहुत सोच समझकर ही है रखा।
फिर दुबारा वही इंद्र ने वहां पर घोर अंधकार फैला दिया,
उसी घोड़े को सोने की जंजीर सहित आकाश मार्ग ले जाता।

पृथु पुत्र राजकुमार को इंद्र हेतु फिर से अत्रि ने उकसाया,
राजकुमार गुस्से में आकर इंद्र पर लक्ष कर धनुष – बाण चढ़ाया।
देख, देवराज इंद्र छद्म वेष – घोड़ा छोड़ अंतर्ध्यान हो गया,
वीर विजिताश्व अपना घोड़ा लेकर पिता की व्यवस्था में आ गया।

इंद्र ने अश्व हरण की इच्छा से वो था रूप बनाया,
आपके खंड होने के कारण वही था पाखंड कहलाया।

लोक गुरु भगवान ब्रह्मा के समझाने पर प्रबल पराक्रमी,
महाराज पृथु ने अंतिम यज्ञ आग्रह को छोड़ दिया।
यज्ञांत में जब उन्होंने निवृत होकर स्नान किया,
यज्ञ से तृप्त देवताओं ने उन्हें अभीष्ट वर दिया।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है कि महाराजा पृथु ने सौ अश्वमेध – यज्ञ करने की दीक्षा ली, पूर्व मुखी सरस्वती तट पर मनु के ब्रम्हावर्त क्षेत्र में यज्ञ की। महाराज पृथु ने यज्ञ में खुश होकर आ-हुती दी, सर्व लोक पूज्य जगदीश्वर भगवान श्रीहरि का साक्षात दर्शन की। छद्म वेश धारण कर इंद्र अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा खोला, आकाश मार्ग से घोड़ा लेकर भागने का प्रयास किया। इंद्र से अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा लेन के लिए, पृथु अंतिम यज्ञ हेतु भगवान की पूजा में थे लीन, एक दृष्टि, पृथु – महारथी पुत्र को अत्री ने इंद्र को मारने की आज्ञा दी।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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पृथु का पृथ्वी पर क्रोध।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पृथु का पृथ्वी पर क्रोध। ♦

अन्न – औषधि छिपा के पृथ्वी,
सृष्टि में, रूप बदल कर डाले।
प्रजा भूख से हो रही व्याकुल,
श्री मैत्रेय, विदुर से बोले।

जीवन सभी का अटका – अटका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

प्रजा करुण – क्रंदन सुन पृथु ने,
शस्त्र उठा लिया हाथ में।
पृथ्वी, गौ का रूप धारण कर,
थर-थर – थर-थर लगी कांपने।

पृथ्वी ने सर, पांव पर पटका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

गौ रूपी पृथ्वी ने आकर,
विनीत भाव से नमन किया।
आप जगत – उत्पत्ति – संहारक,
विश्व – रचना का मन बना।

मेरा हाल तो नटनी – नट का,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

मेरी अन्न – औषधि सब,
राक्षस मिलकर खा जाते थे।
सही ढंग से जिन्हें था मिलना,
अन्न – औषधि नहीं पाते थे।

यह सब देख के माथा ठनका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है कि महाराजा पृथु ने पृथ्वी पर क्यों क्रोध, किया। महाराजा पृथु सदैव ही अपनी प्रजा को सुखमय जीवन देने के लिए तत्पर रहते थे, चाहे कैसी भी विकट समय क्यों न हो। हर विकट समस्या से बाहर निकलने की पूर्ण क्षमता थी उनमे।

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यह कविता (पृथु का पृथ्वी पर क्रोध।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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महाराजा पृथु अभिषेक।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ महाराजा पृथु अभिषेक। ♦

पृथु – अभिषेक आयोजन हुआ।
अभिनंदन वेदमयी ब्राह्मणों ने किया।
पृथ्वी, नदी, गौ, समुद्र, पर्वत, स्वर्ग,
सब ने अर्पण उपहार किया।

उपहार मिला सब तटका – टटका
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

गंधर्व ने मिल किया गुणगान,
सिद्धों ने मिल पुष्प वर्षा कर बढ़ाया मान।
समवेत स्तुति ब्राह्मणों ने किया करके,
दिया मुक्त मन से समुचित ज्ञान।

दीया ज्ञान सब ने दस – दस का
हूं कवि मैं सरयू तट का।

विश्वकर्मा ने दिया सुंदर रथ।
चंदा ने अश्व दिये अमृत मय।
सुदृढ़ धनुष दिया अग्नि ने।
सूर्य ने बाण दिया तेजोमय।

शत्रु को करारा दे जो झटका,
कवि हूं मैं सरयू तट का।

सुदर्शन चक्र दिया विष्णु ने।
लक्ष्मी ने दी संपत्ति अपार।
अंबिका चंद्राकार चिन्हों की ढाल।
रूद्र दे दिए चंद्राकार तलवार।

काम जो करे सरपट सरपट का,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

पृथ्वी दी योगमयि पादुकाएं।
आकाश ने नित्य पुष्प मालाएं।
सातों समुद्र ने दिया शंख।
पर्वत नदियों ने हटाई पथ बालाएं।

बना दिया आपको जीवट का,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

जल – फुहिया जिससे प्रतिपल झ,
वरुण ने छत्र – छत्र श्वेत चंद्र – सम।
धर्म ने माला वायु दो चंवर दिया।
मुकुट इंद्रने ब्रह्मा ने वेद कवच का दम।

संपूर्ण सृष्टि का माथा ठनका,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

सुंदर वस्त्रों – अलंकारों से,
हुये सुसज्जित श्री पृथु राज।
स्वर्ग – सिंहासन विराजमान,
आभार अग्नि की जस महाराज।

पहुंचे सभी न कोई अटका,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

सूत – माधव बंदीजन गाने लगे।
सिद्ध गंधर्व आदि नाचने बजाने लगे।
प्रीति को मिली अंतर्ध्यान शक्ति।
महाराज को सभी बहलाने लगे।

दे दे करके लटकी – लटका,
हूं कवि मैं सरयू – तट का।

गुण कर्मों का बंदीजन गुणगान किया।
महाराज ने सभी को मुक्त भाव से दान दिया।
मंत्री पुरोहित पुरवासी सेवक का मान किया।
चारों वर्णों का महाराज ने सम्मान किया।

गुंजाइश नहीं किसी खटपट का,
कवि हूं मैं सरयू – तट का ।

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने राजा पृथु के अभिषेक का मनोरम सुन्दर दृश्य का सटीक वर्णन किया है। बहुत ही सरल शब्दों में बताया है, की किस किस दैवी शक्ति ने कौन – कौन सा अस्त्र दिया महाराजा पृथु को। इस कविता को पढ़ते समय आप महाराजा पृथु के दरबार की अनुभूति करेंगे।

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यह कविता (महाराजा पृथु अभिषेक।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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पृथु का प्रादुर्भाव।

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♦ पृथु का प्रादुर्भाव। ♦

कवि हूं मैं सरयू – तट का।
समय चक्र के उलट पलट का।

मानव मर्यादा की खातिर,
मेरी अयोध्या खड़ी हुई।
कालचक्र के चक्कर से ही,
विश्व की आंखें गड़ी हुई।

हाल ये जाने है घट घट का।
कवि मैं सरयू – तट का।

प्रादुर्भाव हुआ पृथु – अर्ती का,
अंग – वंश वेन- भुजा मंथन से।
विदुर – मैत्रेय का हुआ संवाद,
गंधर्व ने सुमधुर गान किया मन से।

मन भर गया हर – पनघट का।
भाग्यशाली घूंघट का।

मनमोहक हरियाली छाई।
सकल अवध खुशियाली आई।
राजा पृथु का आना सुनकर।
ऋषियों की वाणी हरसाई।

मगन हुआ मन घट – पनघट का।
कवि हूं मैं सरयू तट का।

पृथु के पृथ्वी पर प्रादुर्भाव से,
दोस्तों को लगा बड़ा झटका।
माया – मोह को उसी ने पटका,
काबिल हूं मैं सारी घूंघट का।

विवेकी पुरुष कहीं ना भटका।
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने राजा पृथु के प्रादुर्भाव का, अवध के मनोरम सुन्दर दृश्य का वर्णन किया है। ऋषियों के वाणी हरसाई, सकल अवध खुशियाली आई।

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अपने घर में मगन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अपने घर में मगन। ♦

रच – रच कर रचनाएं,
कालिख पन्नों पर घोली।
अपनी ही गति में मगन,
प्रतिबिंब कही नहीं खोली।

मन – मजीरा चौरस खापें,
चौखट – चौखट पे खांचा।
धरा की संरचना ऐसी की,
जाकर चारों तरफ से भागा।

आस – पास में खतरे सारे,
भीड़ भरी सड़कों को नापा।
उबड़ खाबड़ गिरी बस्ती में,
गीत गांव – गांव नया गाता।

चिकने – चिकने रंग रूप से,
लिख पढ़ कर सभी लुभाता।
राग – रंग व्यापारिक सपना,
दुनिया को अपना ही भाता।

दूर-दूर अपरिचित सब जैसे,
कैसे कहां कौन हंसा पाता।
रोशनी में बंधा हुआ अंधरा,
कोई कैसे किसे समझा पाता।

मोहित होता है अपना मन,
पढ़-पढ़ कर रचना की पक्ति।
ज्ञात नहीं पीतल की उत्पत्ति,
करता रहता सुवरण पर गर्व।

ओ कुशल लेखनी का संभल,
निश्चित जगत में तेरा है पथ।
पवन घन को जैसे है हांकता,
दिनकर की किरणों सा चल।

वाह्य जगत में जीवन मेरा,
हो अंतर जीवन प्रतिबिंवित।
सुख की अभिलाषा में कवि,
रचते रहें वह रचना उत्कृष्ट।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने एक लेखक / कवि के मन में चलने वाले विचारों के प्रवाह में बसने वाले एक-एक शब्द को जोड़ कर उसे सही तरीके से संजोने को बहुत ही अच्छी तरह से कई सारे उदहारण देकर बताया हैं।

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यह कविता (अपने घर में मगन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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