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हिन्दी साहित्य

काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी। ♦

काशी आदि कालीन साहित्य नगरी है। प्रधानमंत्री जी बाबतपुर हवाई अड्डे पर 11:05 पर पहुंचने पर उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी सहित तमाम स्वागत कर रहे। उनसे मिलने के उपरांत काशी हिंदू विश्वविद्यालय सभा स्थल पर समय 11:15 बजे पहुंचे।
काशी सभा स्थल पहुंच गए।
भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी अपने काशी संसदीय क्षेत्र में।

कोरोना प्रो o काल का पालन किया। सभा स्थल पर लोग हैं।
प्रधानमंत्री का स्वागत मंच पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने किया। उन्हें राम नाम दुपट्टा दिया।
योगी बोल रहे थे प्रधानमंत्री का स्वागत किया।
योजनाएं चलेगी। पार्टी के सभी पदाधिकारी जिला तथा महानगर विश्व में भारत की संस्कृति सभ्यता और संस्कार को प्रधान मंत्री जी ने आगे बढ़ाया।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में काशी में जो नई पहचान दी है।

काशी में प्रधानमंत्री योजनाओं का उद्घाटन करेंगे और कई योजनाओं का शिलान्यास करने का भी काम किया जाएगा।
काशी वास्तव में काफी उन्नति की है। इसका विकास बहुत हुआ है। पिछले 70 सालों में केवल कैंट स्टेशन बना जबकि यहां से पंडित कमला पति त्रिपाठी आदि कई केंद्रीय मंत्री दिया। राज्य के उप सभापति और कृषि मंत्री श्याम लाल यादव जी को काशी ने दिया था इसके अलावा डॉक्टर संपूर्णानंद जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं, काशी ने अपने क्षेत्र से दर्जनों राज्य और मंत्री भी रहे परंतु जो उन लोगों से वह नहीं कर सका जिसकी काशी की जनता चाहती थी। जो विकास नहीं किया जा सका उसे गुजरात से आए हुए काशी के लाल आदरणीय नरेंद्र दास नरेंद्र मोदी जी ने कर दिखाया।

नरेंद्र मोदी जी की माता काशी में प्राय: स्नान करने आती और काशी विश्वनाथ का दर्शन तथा अन्य देवी-देवताओं का लगातार दर्शन और पूजन किया करती थीं।
ऐसा लगता है कि उनकी छाप आदरणीय नरेंद्र मोदी जी के ऊपर विशेष रूप से पड़ी थी।

आज काशी में क्या होगा देखे –

कुल 78 परियोजनाओं का उद्घाटन, परियोजनाओं का लोकार्पण आदरणीय नरेंद्र मोदी जी करेंगे।
लगभग डेढ़ हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं का उद्घाटन
उद्घाटन किया-
आदरणीय नरेंद्र मोदी जी ने एक सफेद तकनीकी से बटन दबाकर उद्घाटन किया।

उन परियोजनाओं में रुद्राक्ष का भी उद्घाटन है। रुद्राक्ष सिगरा क्षेत्र में नगर निगम के पास भारत जापान की मैत्री का प्रमुख परियोजना है जो प्रधानमंत्री और जापान के शिंजो आबे जी की विचार विमर्श के उपरांत बनाने का योजना बना था जब जापान के प्रधानमंत्री जी भारत आए थे और गंगा में नौका पर नौका विहार भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के साथ उसी समय यह योजना बनाई गई थी और आज वह पूरी हो रही है रुद्राक्ष का छत शिवलिंग के तरह दिखाई देता है।

आज होने वाले शिलान्यास और प्रस्तावित योजनाएं इस प्रकार हैं।

  • केंद्रीय पेट्रोकेमिकल इंजीनियरिंग एवं तकनीकी संस्थान द्वारा सेंटर फॉर स्क्रीन एवं एक बनी कल सपोर्ट का निर्माण जिसकी लागत 40 दशमलव 10 करोड़ है।
  • आईटीआई मनगांव का निर्माण 14.16 करोड़ का है।
  • राजघाट प्राथमिक विद्यालय का पुनर्निर्माण दोष 2.77 करोड़ लागत का है।
  • वाराणसी में ट्रांस बरुआ क्षेत्र में वाटर सप्लाई परियोजनाओं का स्काडा ऑटोमेशन 19.50 करोड़ का है।
    Water treatment plant Valupur.
  • वाराणसी नगर के वरुणा क्षेत्र में पेयजल संचालन के लिए संबंधित आवश्यक योजना 7.41 करोड़ में।
  • वाराणसी नगर के मोहन कटरा कोनिया घाट क्षेत्र के अंतर्गत ट्रेंचलेस विधि से सीवर लाइन बिछाने एवं तक संबंधित कार्य में 15.3 करोड़ रुपए।
  • घाट पंपिंग स्टेशन सीवेज पंपिंग स्टेशन एसटीपी पर इस कांडा ऑटोमेशन एवं ऑनलाइन इन फॉरेन मॉनिटरिंग सिस्टम का निर्माण 9 दशमलव 64 करोड़ है।
  • कोनिया में बम मेन पंपिंग स्टेशन 0.8 मेगावाट क्षमता का सोलर पावर प्लांट एवं वृद्ध कन्वेंशन की स्थापना 5.89 करोड़ रुपए।
  • मुकीम गंज एवं चौधरी क्षेत्र में सीवर लाइन बिछाने से संबंधित कार्य 2.83 करोड़ रुपए।
  • लहरतारा चौकाघाट फ्लाईओवर के नीचे अर्बन प्लेसमेकिंग का कार्य 8.50 करोड़ रुपए।
  • कारखियाओं औद्योगिक क्षेत्र में आम व वेजिटेबल इंटीग्रेटेड पंप हाउस का निर्माण 15.78 करोड़ रुपए।
  • पुलिस लाइन वाराणसी में ट्रांजिट हास्टल दो ब्लॉक का निर्माण व आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन सेक्टर इकाई वाराणसी के कार्यालय भवन का निर्माण 26 दशमलव 70 करोड़ रुपए।
  • राइफल एवं पिस्टल शूटिंग रेंज का निर्माण 5.04 करोड़ रुपए।
  • 152.092 किलोमीटर के 47 ग्रामीण संपर्क मार्ग की मरम्मत और चौड़ीकरण 111.26 करोड़ रुपए लगभग।
  • जल जीवन मिशन कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में 183 करोड़ हर घर नल से जल योजना का कार्यक्रम 428 दशमलव ₹540000000/ ।

इसके अतिरिक्त लोकार्पण के लिए प्रस्तावित परियोजनाएं

  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एवं सम्मेलन केंद्र रुद्राक्ष का निर्माण।
  • गोदौलिया पर मल्टी लेबल टू व्हीलर पार्किंग का निर्माण।
  • वाराणसी शहर में पुरानी सीवर लाइन का सीआईपीपी लाइनिंग द्वारा जीर्णोद्धार।
  • वाराणसी शहर में सीवर जीर्णोद्धार कार्यक्रम।
  • शहर के छह मुख्य स्थानों पर ऑडियो विजुअल बी एल ई डी स्कीम वाराणसी शहर के 4 पार्क का सौंदर्यीकरण।
  • वाराणसी में सौ बेड का निर्माण।
  • पंडित दीनदयाल उपाध्याय जिला चिकित्सालय पांडेपुर में 50 वार्ड एम सी एच का निर्माण।
  • बीएचयू में रीजनल इंस्टीट्यूट आफ पैथोलॉजी का निर्माण।
  • श्री लाल बहादुर शास्त्री चिकित्सालय रामनगर में आवासीय भवन का निर्माण।
  • 14 विभिन्न स्थानों अस्पतालों तथा स्वास्थ्य केंद्रों में सी एस ए ऑक्सीजन जनरेशन आदि।

प्रधानमंत्री जी का उद्बोधन काशी हिंदू विश्वविद्यालय से…

प्रधानमंत्री जी अपना उद्बोधन काशी हिंदू विश्वविद्यालय से कर रहे हैं, उन्होंने भारत माता की जय का नारा लगवाया, तदुपरांत हर हर महादेव के नारे से पूरा सभा, गूंज द्वारा किए जाने से पूरे बनारस में हर हर महादेव के नारे की आवाज सुनाई देने लगी।

उन्होंने भोलेनाथ और माता अन्नपूर्णा के चरणों में शीश झुका कर नमन किया। मंच पर उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए सामने सभा के बैठे हुए लोगों को धन्यवाद दिया।

आपने कहा कि बनारस के विकास के लिए जो कुछ भी हो रहा है, वह सब कुछ महादेव के आशीर्वाद और बनारस की जनता के प्रयास से ही जारी है। मुश्किल समय में भी काशी ने दिखा दिया है जो झुकता नहीं है वह थकता नहीं है।

कोरोना काल हम सभी के लिए मानव जांच के लिए बहुत मुश्किल की घड़ी रही है। पूरी ताकत के साथ हम सभी के ऊपर हमला किया परंतु देश का सबसे बड़ा प्रदेश उत्तर प्रदेश की आबादी दर्जनों देशों से भी ज्यादा है, वहां भी यूपी ने महामारी को फैलने से रोकने में सक्षम है। यह 100 साल में दुनिया पर आई सबसे बड़ी महामारी है। उत्तर प्रदेश में जो कुछ किया हुआ है बहुत ही सराहनीय और उल्लेखनीय है।

मैं लंबे समय के बाद काशी में आया हूं। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि मैं काशी में कोरोना काल में जिसको भी आधी रात को भी फोन किया, उसे देखा कि वह मोर्चे पर तैनात मिलता था। यही कारण रहा है कि आज यूपी में हालत संभलने लगे। आज उत्तर प्रदेश कोरोना की टेस्टिंग करने वाला सबसे बड़ा प्रदेश और वैक्सीनेशन करने वाला भी यह सबसे बड़ा राज्य रहा है।

अब गरीबी अमीरी की लड़ाई खत्म हो रही है। जो इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है वह भविष्य में भी काफी कल्याणकारी होगा।

बनारस में 14 ऑक्सीजन प्लांट का लोकार्पण।

बहुत सारे मेडिकल कॉलेजों का निर्माण उत्तर प्रदेश में किया जा रहा है। आज बनारस में 14 ऑक्सीजन प्लांट का लोकार्पण किया गया।
बच्चों तथा माताओं को विशेष तरह से ऑक्सीजन देने तथा उनकी व्यवस्था स्वास्थ्य सुविधाओं का ध्यान रखा गया। स्वास्थ्य सुविधा के लिए 23000 करोड का विशेष पैकेज दिया गया है।

काशी नगरी पूर्वांचल का बहुत बड़ा मेडिकल हब बन रहा है। जिन लोगों को इलाज के लिए दिल्ली और मुंबई जाना पड़ता था वह व्यवस्था अब काशी में उपलब्ध है।

महिलाओं और बच्चों के लिए नए हॉस्पिटल काशी को मिल रहा है 100 बेड काशी हिंदू विश्वविद्यालय में और 50 जिला अस्पताल को दिया जा रहा है जिसका लोकार्पण आज किया जाएगा।

आपने बताया कि कुछ ही देर में मैं बीएचयू में बनने वाले 100 बेड के अस्पताल को देखने भी जाने वाला हूं। काशी अपने मौलिक स्थान को बनाए हुए विकास के पथ पर अग्रसर है।

यह जल विद्युत व्यवस्था रेलवे पर्यटन तथा सड़कों गलियों का निर्माण घाटों का निर्माण सहित तमाम कार्य वाराणसी में किए जा रहे हैं।

नए प्रोजेक्ट नए संस्थान काशी के विकास गाथा को और आगे बढ़ा रहे हैं। काशी में ही दिल्ली वाला इलाज उपलब्ध होगा। आंखों की भी इलाज वाराणसी में हो सकेगा जो आज तक नहीं होता था।

गोदौलिया में मल्टी लेवल पार्किंग।

गोदौलिया में मल्टी level पार्किंग बनने से काफी सुविधा लोगों को मिलेगी।

लहरतारा से चौकाघाट बहुत जल्द ही यह परियोजना पूरी हो जाएगी। ग्रामीण क्षेत्र में हर घर में जल की योजना सरकारी चल रहा है, जो बहुत तेजी से चलाया जा रहा है बहुत अच्छी व्यवस्थाएं देने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।

शहर के 700 से ज्यादा स्थानों पर एडवांस कैमरा लगाने का भी काम जारी है। घाटों पर उनका इंफॉर्मेशन ब्रांच लगाए जा रहे हैं। काशी की कलाओं की जानकारी बड़ी स्क्रीनों के माध्यम से दिया जाएगा जो गंगा जी के घाट पर लगाया जाएगा।

जिससे सभी को सही तरह से जानकारी मिल सके। काशी विश्वनाथ में होने वाली आरती तथा गंगा घाट पर होने वाली आरती को पूरे विश्व तक उपलब्ध हो सके इसकी पूरी व्यवस्था की गई है।

मां गंगा मैं चलने वाली नाव को सीएनजी में बदला जा रहा है जिससे प्रदूषण भी कम हो, ना के बराबर हो और खर्च भी कम हो।

रुद्राक्ष सेंटर…

काशी से विश्वस्तरीय संगीतकार, कलाकार जो विश्व स्तर पर उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर रहे हैं परंतु आज तक लोगों ने काशी के कलाकारों को उस तरह का माहौल नहीं दिया गया, आज रुद्राक्ष सेंटर हो जाने से उनको विश्वस्तरीय वह सुविधा काशी में ही उपलब्ध कराए जाने की योजना का आज उद्घाटन होने वाला है।

योगी जी के आने के बाद, योगी जी की सरकार ने इन सभी दिशाओं में काफी कार्य किया है तमाम नई सुविधाएं काशी को मिली है।

कुछ ऐसे संस्थान बनाए गए जिससे औद्योगिक विकास में बहुत मदद मिलेगी। की-पैड साइंस सेंटर के लिए घा के छात्रों को, युवाओं को विशेष रूप से प्रधानमंत्री ने बधाई दी।

मेक इन इंडिया।

कुछ साल पहले तक जिस यूपी में व्यापार कारोबार करना मुश्किल माना जाता था आज मेक इन इंडिया के मामले में उत्तरप्रदेश सबसे ज्यादा पसंद किया जाने लगा है। इसका एकमात्र कारण है योगी जी की सरकार द्वारा शिक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में काफी काम किया गया है।

एक्सप्रेस जो चाहे पूर्वांचल एक्सप्रेस गंगा एक्सप्रेस बुंदेलखंडी उसके बगल में मल्टीनेशनल औद्योगिक इकाइयां भी लगाई जाएंगी। जिससे यूपी का विशेष रूप से विकास होगा और उत्तर प्रदेश सहित पूर्वांचल का काफी हित साधन उपलब्ध कराया गया।

धान और गेहूं की रिकार्ड सरकारी खरीद।

इस बार धान और गेहूं की रिकार्ड सरकारी खरीद की गई है।
यहां इंटरनेशनल राय सेंटर खोला गया जो देश से ही नहीं पूरे विश्व को काम आएगा। विशेष रूप से छोटे किसान फल सब्जी का कार्य करने वालों को कृषि संबंधित किए गए उपायों से विशेष लाभ होगा।

समय अभाव के कारण मुझे भी यह सोचना पड़ रहा है कि यूपी के विकास के किन कार्यों की सराहना करूं और किन्हे मैं छोड़ दूं यह सब करना पड़ता है यद्यपि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी उत्तर प्रदेश के लिए समर्पित रूप से कार्य कर रहे हैं जो बहुत ही सराहनीय है।

योगी सरकार नहीं थी तब भी मुझे केंद्र से उतने ही प्रयास करने पड़ते थे जो आज मैं कर रहा हूं परंतु उत्तर प्रदेश में दूसरी सरकार होने की वजह से उत्तर प्रदेश में जो योजनाएं दी जाती थी उसमें रोड़ा लग जाता था।

यूपी में कानून का राज।

जितना प्रयास योगी जी बनारस के लिए कर रहे हैं उसी तरह से अलग-अलग जिलों में भी जा कर के वह विकास के लिए लगातार लगे रहते हैं। इसीलिए वह विकास के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं आज यूपी में कानून का राज है। इसके पहले माफिया राज और आतंकवाद था परंतु आज कानून का शिकंजा है।

जिससे बहू बेटियों को जो आतंक और भय से भी जीते थे उस पर रोक लगी है। आज बहू बेटियों पर आंख उठाने वाले अपराधियों को पता है कि हम उत्तर प्रदेश में रहकर कानून से बच नहीं पाएंगे।

उत्तर प्रदेश की सरकार आज भाई भतीजावाद नहीं, बल्कि विकास मार्ग के नाम पर आगे बढ़ रही है। इसीलिए आज जो भी केंद्र द्वारा योजनाएं दी जाती हैं उसका लाभ सीधा जनता को मिला।

साथियों इस विकास की यात्रा में यूपी के हर एक नागरिकों का हाथ है आपका यह आशीर्वाद उत्तर प्रदेश को नई ऊंचाइयों पर लेकर जाएगा। आपको सब आप की सबसे बड़ी इस समय आवश्यकता है कि आप कोरोना को आगे न बढ़ने दें और कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करें।

हमें कोरोना के सारे नियम कायदे का सख्ती से पालन करते रहना है और सबको वैक्सीन लगवाने और जांच करवाने के अभियान में लगे रहना है वैक्सीन जरूर लगवाना है।

हर हर महादेव करके प्रधानमंत्री जी ने अपने भाषण को समाप्त किया।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के काशी आगमन, और काशी में होने वाले विकास कार्यों का उद्घाटन की प्रक्रिया को आम बोलचाल की भाषा में प्रस्तुत किया हैं। हमें कोरोना के सारे नियम कायदे का सख्ती से पालन करते रहना है और सबको वैक्सीन लगवाने और जांच करवाने के अभियान में लगे रहना है वैक्सीन जरूर लगवाना है।

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यह लेख (काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें और लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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आखिर कहां जा रही है भारत की शिक्षा व्यवस्था?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आखिर कहां जा रही है भारत की शिक्षा व्यवस्था? ♦

दिल्ली सिर्फ देश की राजधानी ही नहीं है। वह राजधानी होने के साथ-साथ हिंदुस्तान का दिल और एक महानगर भी है। देश का हर कोई छोटा बड़ा नागरिक अपने बच्चों को यहां के सरकारी शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने के लिए बेताब रहता है। हो भी क्यों ना? हर कोई चाहता है कि मेरे बच्चे को एक अच्छी और किफायती शिक्षा प्राप्त हो। वह शिक्षा किसी अच्छे संस्थान में और अच्छे स्थान में प्राप्त हो।

सबकी सोच होती है कि मेरा बच्चा सेंट्रल यूनिवर्सिटी के अधीन आने वाले शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेकर शिक्षा ग्रहण करें। परंतु उन बच्चों और अभिभावकों का सपना तब चूर- चूर हो जाता है जब सेंट्रल यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले सभी शैक्षणिक संस्थानों में बी ए ऑनर्स राजनीतिक शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि में भी 100% का कट ऑफ प्रथम सूची में लगाया जाता है। 2015 में यह कट ऑफ कंप्यूटर साइंस में पहली बार लगाया गया था अब तो तकरीबन – तकरीबन सभी विषयों में यह कट ऑफ लगाया जा रहा है।

सवाल यह खड़ा होता है कि…

सवाल यह खड़ा होता है कि यदि 100% ही कट ऑफ लगाया जाएगा तो क्या इससे भी आगे कोई और अंक प्राप्त होते हैं क्या? प्रतिस्पर्धा के इस दौर में गरीब, मजबूर और मेहनती तथा परिश्रमी वह बच्चा तब निराश होता है जब उसके 99.9 प्रतिशत अंक होने पर भी इन संस्थानों में दाखिला नहीं मिलता। तब तो और भी ज्यादा परेशान होता है जब आस – पड़ोस के लोग अपने 100% अंक प्राप्त किए हुए बच्चे का दाखिला इन संस्थानों में करवातें हैं और पड़ोस के 99.9 प्रतिशत अंको को प्राप्त करने वाले बच्चों को या अभिभावकों को चिढ़ाने का काम करते हैं कि मेरे बच्चे का दाखिला तो उस कॉलेज में हो गया है आपके बच्चे का नहीं हुआ क्या?

मजबूरन निजी संस्थानों में दाखिला लेना।

समझ ही नहीं आता कि हमारे देश की शिक्षा प्रणाली किस ढर्रे की ओर चली जा रही है? 100% कट ऑफ लिस्ट कहां तक जायज है? सभी जानते हैं कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले इन कॉलेजों में दूसरी, तीसरी या चौथी कट ऑफ लिस्ट बहुत ही कम निकलती है। यदि निकल भी गई तो उसमें भी 97% अंक प्राप्त करने वाले को ही स्थान मिलेगा।

परंतु जो 90% से ऊपर के अंको को प्राप्त किए हुए अन्य प्रखर बुद्धि के छात्र है, जिनका सपना इन प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने का रहा है, वे कहां जाएंगे? उन्हें मजबूरन निजी संस्थानों में दाखिला लेना पड़ता है, जहां लाखों की डोनेशन दे कर के बड़ी महंगी शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है। आखिर आजादी के 74 साल बाद भी वे क्यों इस खर्चीली शिक्षा व्यवस्था में उलझ कर अपने साथ – साथ अपने परिवार वालों का भी नुकसान करें।

1965 में कोठारी कमीशन।

1965 में कोठारी कमीशन की अनुशंसाओं ने भारत सरकार को भारतीय शिक्षा प्रणाली पर देश की जी डी पी का 6% खर्च करने की अनुशंसा की थी। परंतु कमीशन की एक न मानी गई। वही पुराना शैक्षणिक ढर्रा अद्यतन आजादी के बाद अपनाया जाता रहा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू जरूर की गई है, जिसमें देश की जी डी पी का 6% शिक्षा पर खर्च करने का दावा भी केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। परंतु जनता को न्याय तब तक नहीं मिलेगा जब तक यह सारी बातें जमीनी स्तर पर हकीकत में क्रियाशील नहीं होती।

मात्र घोषणा करवाना और किसी व्यवस्था में प्रावधान करवा देना किसी बात को पूर्ण रूप से फलीभूत होने का प्रमाण नहीं होता। किसी बात की पूर्णता के लिए उसका विधिवत धरातल पर घटित होना बहुत जरूरी होता है।

प्रश्न उठता है…

सवाल खड़े होते हैं कि इतने लंबे अरसे के बाद भी आखिर क्यों देश की राजधानी में सरकारी शिक्षण संस्थानों की बढ़ोतरी नहीं हो पाई? क्यों हर सरकारें ‘थोथा चना बाजे घना ‘वाला राग आलापती रही?

संस्थान वही, संस्थानों में सीटें वही और उस पर छात्रों की तादात निरंतर बढ़ती जा रही है। बढ़ती छात्र तादात के हिसाब से सरकारों को शिक्षण संस्थानों का विकास करना चाहिए था और इन संस्थानों में सीटों की अभिवृद्धि करनी चाहिए थी। परंतु ऐसा नाम मात्र को ही देखने में मिला है।

प्रश्न उठता है क्या सरकार जानबूझकर के भारतीय शिक्षा व्यवस्था को निजी शिक्षण व्यवस्था की झोली में डालने के चक्कर में है या फिर उसे अपने देश में जी रहे नव शिक्षार्थियों की कोई चिंता ही नहीं है?

देश के मानव संसाधन को संचालित करना, व्यवस्थित करना और उनकी सुविधाओं के प्रावधानों को प्रबंधित करना राज्य एवं केंद्र सरकार का संयुक्त दायित्व होता है। परंतु इस मुद्दे पर सब के सब अपना पल्ला झाड़ते हुए से नजर आ रहे हैं। 100% की कटऑफ कहां तक तर्क संगत और न्याय संगत है? इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

सवाल भारतीय शिक्षा व्यवस्था के मूल्यांकन ढांचे पर।

इसमें तो सवाल भारतीय शिक्षा व्यवस्था के मूल्यांकन ढांचे पर भी खड़े होते हैं कि क्या सारे की सारी परीक्षाएं वस्तुनिष्ठ विधि से ही करवाई जाती है? क्या स्कूली शिक्षा प्रणाली के मूल्यांकन में व्याख्यात्मक और सरांशात्मक परीक्षाओं का कोई स्थान नहीं है? यदि है तो फिर 100 में से 100 अंक प्राप्त होने का सवाल ही खड़ा नहीं होता?

आखिर क्यों हमारे देश के शिक्षाविद इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हैं? खैर सरकार और राजनीतिज्ञों से तो इस मामले में बात करना ही बेकार है। एक शिक्षक होने के नाते मैं यह बड़े दावे के साथ कह सकता हूं कि स्कूली शिक्षा में 100 में से 100 अंक प्राप्त करना वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता और वैधता पर कहीं ना कहीं सवाल जरूर खड़े करता है।

क्या एक भी बिंदी की गलती बच्चा नहीं कर रहा है? क्या एक भी सवाल या फिर एक भी शब्द बच्चों से गलत नहीं हो रहा है? इतना ही नहीं भाषा, राजनीतिक शास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और गणित जैसे कई विषयों में कहीं ना कहीं बच्चों से जरूर चूक हो जाती है। उन सब चूकों को नजरअंदाज करके 100 में से 100 अंक बच्चों को प्रदान करना कहीं से भी उचित नहीं जान पड़ता।

शिक्षा प्रणाली की और व्यवस्थाओं की तारतम्यता का ना होना।

इससे हम बच्चे को अहम और वहम के चक्रव्यू में डालते जा रहे हैं। और इसके साथ – साथ प्रतिस्पर्धात्मक बुद्धि को रखने वाले छात्रों और अभिभावकों को निराशा और हताशा की ओर धकेलते जा रहे हैं। अधिक से अधिक अंक प्राप्त करना आज के बच्चों और अभिभावकों का एक शौक और फैशन बन गया है।

यदि सर्वाधिक अंक किसी अभिभावक का बच्चा नहीं लाता है तो वह पड़ोसी के बच्चे का उदाहरण देकर उस पर अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने का दबाव बनाता है। प्रतिस्पर्धा की इस घिनौनी लड़ाई में वह बच्चा कई बार कम नंबर आने पर आत्महत्या जैसे कदम उठा लेता है, जो कहीं से भी तर्कसंगत और ठीक सिद्ध नहीं होता। इन सब बातों के पीछे मुख्य कारण शिक्षा प्रणाली की और व्यवस्थाओं की तारतम्यता का ना होना ही होता है।

भारत के बच्चे -बच्चे को सरकारी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने का पूरा-पूरा अधिकार प्राप्त हो।

जनसंख्या की दृष्टि से शिक्षण संस्थान और उनकी सीटें निरंतर बढ़ती जानी चाहिए न कि स्थिर रहनी चाहिए। कट ऑफ लिस्ट भी 100% कहीं से भी न्याय संगत नहीं हो सकती। निजी शिक्षण संस्थानों के चंगुल से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बाहर निकाल करके भारत के बच्चे -बच्चे को सरकारी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने का पूरा-पूरा अधिकार प्राप्त होना चाहिए।

भारत के शिक्षार्थी और अभिभावक का शोषण किसी भी हालत से नहीं होना चाहिए। इन्हीं सब बातों का प्रावधान करना देश की और राज्य की सरकारों का सामूहिक दायित्व होता है। परंतु सरकारें ऐसा कुछ भी नहीं कर रही है। आजादी के इतने दिनों के बाद भी देश में नाम मात्र को ही शिक्षण संस्थानों में वृद्धि की गई है और उन शिक्षण संस्थानों में सीटों के निर्धारण में भी नाम मात्र की ही वृद्धि हुई है।

देश का होनहार छात्र निराश – हताश।

ऐसे में देश का होनहार छात्र निराश – हताश होकर के गलत कदम नहीं उठाएगा तो और क्या करेगा? यहां यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि 90% अंक प्राप्त करने वाला छात्र भी कोई कमजोर नहीं होता। वह भी एक तीव्र बुद्धि और प्रखर व्यक्तित्व होता है। ऐसे में उसे निराश और हताश होने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि उसे अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहिए और निरंतर व्यवस्थाओं के साथ संघर्ष करके अपने भविष्य को संवार कर देश के भविष्य को संवारने की कोशिश करनी चाहिए।

निराशा और हताशा में गलत कदम उठाने की अपेक्षा विपरीत परिस्थितियों का सामना करके अपने लिए सफलता के नए रास्ते गढ़ना मानव जीवन का सबसे बड़ा कर्तव्य है। अतः देश के हर नौजवान को इन चुनौतियों से घबराना नहीं चाहिए बल्कि इनको उल्टी चुनौती देकर के इन्हें हराना चाहिए।

समाज की मानसिकता में बदलाव लाने की जरूरत।

समाज की मानसिकता को भी अपने आप में बदलाव लाने की जरूरत है। यदि आपके बच्चों ने सर्वाधिक अंक प्राप्त कर भी लिए हैं तो ऐसे में दूसरों को चिढ़ाने और जलील करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए बल्कि एक अच्छे नागरिक होने के नाते और एक अच्छा पड़ोसी होने के नाते या फिर एक अच्छा रिश्तेदार होने के नाते हमें एक दूसरे को निरंतर प्रोत्साहित करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय सर्वे में हमारे देश की शिक्षा प्रणाली।

सवाल यह भी खड़ा होता है कि यदि 100% अंक प्राप्त करने योग्य प्रतिभाएं निखारने की क्षमता हमारे देश की शिक्षा प्रणाली रखती है तो फिर वैश्विक शिक्षण पायदान पर अपने आप को लड़खड़ाता हुआ सा महसूस क्यों करती है? क्यों अंतरराष्ट्रीय सर्वे में हमारे देश की शिक्षा प्रणाली को विशेष स्थान प्राप्त नहीं होता?

किसी अमीर धनवान और रसूखदार घर आने का बच्चा तो निजी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर भी ले परंतु मध्यवर्ग और गरीब सर्वहारा वर्ग का होनहार छात्र इस 100% कटऑफ की व्यवस्था वाली शिक्षा प्रणाली में पिछड़ जाएगा।

.001 प्रतिशत से कटऑफ सूची में दाखिला ना मिलने के कारण एक तो वह बेचारा सरकारी शिक्षण संस्थानों से न्यारा रहेगा और उधर पैसों की तंगी के चलते उसे निजी स्कूलों से भी बाहर ही रहना पड़ेगा। ऐसे में उसकी अभिलाष, उसकी प्रतिभा और उसका स्वाभिमान सबका सब चोटिल हो जाता है।

सैद्धांतिक शिक्षा प्रणाली से हटकर प्रायोगिक शिक्षा प्रणाली की जरूरत।

समय रहते ही यदि देश की सरकारों ने इस दिशा की ओर ध्यान नहीं दिया तो देश में कुंठा और अराजकता का वातावरण धीरे – धीरे बढ़ता चला जाएगा। सैद्धांतिक शिक्षा प्रणाली से हटकर प्रायोगिक शिक्षा प्रणाली पर जब तक जोर नहीं दिया जाएगा तब तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति का समूचा मसौदा भी बेकार ही सिद्ध होगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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Conclusion:

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – सैद्धांतिक शिक्षा प्रणाली से हटकर प्रायोगिक शिक्षा प्रणाली पर जब तक जोर नहीं दिया जाएगा तब तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति का समूचा मसौदा भी बेकार ही सिद्ध होगा। 100% कटऑफ की व्यवस्था वाली शिक्षा प्रणाली को हटाना होगा।

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यह लेख (आखिर कहां जा रही है भारत की शिक्षा व्यवस्था?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मेरा ईश्वर से विश्वास उठने ही लगा था कि।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरा ईश्वर से विश्वास उठने ही लगा था कि। ♦

बचपन से सुनती आयी हूँ कि –
पत्ता भी नहीं हिलता ‘उसकी ‘ ( प्रभु की )
मर्ज़ी के बिना ….
फिर भी इंसान रह नहीं पाता अपनी
ख़ुदगर्ज़ी के बिना…
वर्तमान दौर में ये अटूट विश्वास
हिलने लगा था।

‘रब’ है ही नहीं, ऐसा ही लगने लगा था।
सारे मीडिया यंत्र दहाड़ रहे हैं,
मृत्यु के मंजर पर गला फाड़ रहे हैं।

अब लोग ईश्वर की मर्ज़ी से
या आयु पूरी होने पर नहीं मरते।
ईश्वर उनके प्राण नहीं हरते।
अब तो ख़ुदा कोई नया आ गया है,
जिसे विप्लव मौत का बहुत भा गया है।

ये भी सुना था और पढ़ा था बचपन से:
‘हर सौ वर्ष में एक महामारी फैलती है धरा पर-
जो निगल लेती है असंख्य ज़िंदगियाँ’।
और वसुन्धरा का हरापन –
जैसे चेचक, हैज़ा, टीबी इत्यादि।

कुछ अतीत की हैं महामारियाँ,
सभी प्राणघातक बीमारियाँ –
असंख्य जानें चली जातीं थीं।
फिर टीके बनते थे,
जो बच जाते थे उनको लगते थे।

फिर से वही दौर आ गया है-
फ़र्क़ ये है कि पहले टी वी नाम का
मूर्ख बक्सा नहीं था – इसलिए
जिन्हें वो रोग हो गया वे रोग से मर जाते थे।

कम से कम बाक़ी अफ़वाहों और भय से,
से बच कर सुरक्षित रह जाते थे।

जनसंख्या हज़ारों में थी – सैंकड़ों मरते थे।
जब जनसंख्या लाखों में हो गयी तो हज़ारों मर गये।
अब करोड़ों में है तो लाखों मर रहे हैं,
पर अब आविष्कारों के दुरुपयोग से।

रोगी रोग से और निरोगी रोग के भय,
से मर रहे हैं/ जो बचे हैं वो भी डर रहे हैं।
ईश्वर की भूमिका तो समाप्त हो चली है।
नये ईश्वर से अब ये सौग़ात ए मौत मिली है।

अब सबकी मृत्यु का ज़िम्मेदार या तो ‘प्रभु
कोरोना’ है या फिर देवी असुविधाएं या देवी दुर्व्यवस्थाएँ।

न उम्र न कोई अन्य रोग न लापरवाही,
कुछ बुद्धिजीवी यही चर्चा रोज़ कर लेते हैं।
एक दूसरे को चिन्ता की डोज़ दे कर,
कुछ देर सरकारों को कोस लेते हैं।

संवेदनशीलता दिखाने का सबसे सरल,
और टिकाऊ तरीक़ा है बुद्धिविलास।
और फिर सामर्थ्य अनुसार वाणी विलास,
बहुत से गुरू, शिक्षक सकारात्मक ज्ञान देते हैं।

गिलास आधा ख़ाली है के स्थान पर गिलास,
आधा भरा है ऐसा कहना सिखलाते हैं।

ताकि सकारात्मकता आये,
तो समाचार- कोविड से इतने **** मर गये ,
इसके स्थान पर इतने ***** बच गये।
क्यों नहीं कह सकते ?

अर्थात् गिलास आधा भरा है ये क्यों नहीं कह सकते ?
आख़िर बचने वाले मरने वालों से तो ज़्यादा हैं न।

ये भी कहेंगे- पर अभी नहीं-
कोविड ख़त्म होने के बाद अपने भाषणों में,
हाई – फ़ाई होटल के कमरों में ‘मोटिवेशनल स्पीच’ में
ये दौर जब चला जायेगा-

तब सकारात्मक संदेशों के वृक्ष पर,
उदाहरणों का बौर आयेगा।
जिनका स्रोत इस नकारात्मकता से ही तो आयेगा।
तब ये सबको बहुत भायेगा।

ख़ैर – मुझे इस राजनीति में नहीं पड़ना,
बस भरोसा भगवान पर कैसे लौटा ये है कहना।
तो – मुझे भी लगने लगा था कि
ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है अब।

पड़ोस के एक वृद्ध के बारे में पता चला तब,
कि वे क़रीब एक साल से मृत्यु की गोद में पल रहे हैं –
और अभी तक यमराज को छल रहे हैं-
आयु अस्सी के आसपास है।

प्राणघातक रोग से ग्रस्त हैं,
घर के लोग भी अब उनसे त्रस्त हैं।

कोरोना पॉजिटिव भी हो गये थे,
अपने आप नेगेटिव भी हो गये।
हॉस्पिटल वो जा नहीं सकते,
डॉ ० घर पर आ नहीं सकते।

जाँच रिपोर्ट के अनुसार उन्हें न दवा
बचा सकती है न दुआ।
पर वो अब तक बचे हुए हैं।
परिवार पर बोझ से लदे हुए हैं।
अपनों की ही ज़िल्लत सह रहे हैं।

जिन्हें खिलाया था गोद में वही,
‘कब मरेंगे ‘ मुँह पर कह रहे हैं।

ये बात मैंने अपनी एक मित्र को बतायी,
उसने भी मुझे एक ऐसी ही घटना बतायी।
धीरे – धीरे मुझे ऐसे बहुत से लोग मिले,
जो अनेकों रोगों से थे घिरे।

महीनों से कटे वृक्ष की तरह बिस्तर पर थे गिरे-
पर प्रभु कोविड भी कुछ न कर सके।
तब कहीं जा कर मेरा खोया विश्वास लौट आया।
और फिर मैंने ईश्वर की मर्ज़ी को सर नवाया 🙏🏼
ईश्वर की सत्ता पर भरोसा जताया।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश की हैं – कोरोना महामारी के आने से कैसे इंसानी जीवन अस्त व्यस्त हो गया है। कैसे इंसान के अंदर से इंसानियत खत्म हो गया। कोई भी किसी की भी मदद नहीं कर रहा है। रोगी रोग से और निरोगी रोग के भय से मर रहे हैं, जो बचे हैं वो भी डर रहे हैं।

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यह कविता/आर्टिकल (मेरा ईश्वर से विश्वास उठने ही लगा था कि।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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पिता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पिता। ♦

मां की महिमा तो सबने गाई,
बाप बेचारा क्यों भूल दिया?
जिसने हमेशा से नव राहें दी,
नई तालीम, नया उसूल दिया।

मां तो रो लेती है तंगी में उनके कंधों पर,
बाप बेचारे ने अपना सब दुख है पिया।
हम बच्चों के लालन – पालन में खोकर,
अपना जीवन भी उसने कहां है जीया?

रोजी रोटी की चिन्ता में रहकर कभी,
कभी बच्चों के सपनों में ही वह जीया।
हो जाए मेरे बच्चे सफल कैसे न कैसे,
इस होड़ में ही अपना सर्वस्व है दिया।

कौन कुचलता है अपने अरमानों को इस कदर?
दूसरों के खातिर, जैसे पुत्र हेतु है पिता ने किया।
फिर भी न जाने इस निष्ठुर समाज ने आखिर,
क्यों पिता के बलिदान को है दरकिनार किया?

वह दफ्तर से लौटा थका हारा मांदा सा,
तलाश सकून की, मां ने परेशान किया।
लहू तक सुखा देता है वह बच्चों के लिए,
फिर भी कहते हैं कि तुमने क्या किया?

वाह री ओ! इन्सानी फितरत, क्या गजब?
बे एहसानों सा पल में उसे भुला है दिया।
मुंह का निवाला तक अपने तुझको दिया,
जिसने, तेरे खातिर अपना जीवन जिया।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – वैसे – माता और पिता दिवस ताे हर मनुष्य काे अपने अंतिम श्वास तक मनाना चाहिये। एक सच्चा पिता सदैव ही अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिये दिन-रात अनवरत (continuously) कार्य करता हैं। जहा माता अपने बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखती हैं ताे वही पिता उन्हे सही ज्ञान और समझ देते हैं। जहा प्रथम गुरु माँ हैं ताे वही पिता गुरु हाेने के साथ-साथ सच्चा संरक्षक भी हाेता हैं।

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यह कविता (पिता।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हिंदू – हिंदुस्तान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिंदू – हिंदुस्तान। ♦

हिंदू शब्द की उत्पत्ति कहां से,
उसी तुमी बतलाता हूं।
बुराइयों को दूर करने वाला,
सनातन हिंदू कहलाता है।

ऋग्वेद के बृहस्पति अह्यम में,
हिंदू शब्द का उल्लेख मिला।
देव वर्णन में कहा गया है –

हिमालयम समरंभ।
यावद इंदु सरोवरम।
तम देव निर्मित देशम,
हिंदुस्थानम प्रचचते।

हिमालय से इंदु सरोवर तक,
देव निर्मित देश हिंदुस्तान है।

शैव ग्रंथ में हिंदू शब्द का,
इस प्रकार उल्लेख किया गया –

‘हीनम च दुष्यतेव
हिंदुरित्युच्चते प्रिये।’
जो अज्ञानता और हीनता का,
त्याग करे उसे हिंदू कहते हैं।

कल्पद्रुम में कहा गया है –

‘हीनम दुष्यती इति हिंदू :।’
अज्ञानता और हीनता को त्यागें,
उसको ही हिंदू कहते हैं।

पारिजात हरण में कहा गया है –
हिनस्ती तपसा पापां
दैहिक म् दुष्टम।
हेतिभी: शत्रवर्ग च
स हिंदुभिरधियते।
जो अपने तब से शत्रु दुष्ट और
पाप का नाश करे वह हिंदू है।

माधव दिग्विजय में मिलता है कि –
ओमकार मंत्र मूला ढय
पुनर्जन्म दृढ़ाष्य :।
गौ भक्तो भारत :
गरुरहिंदुरहिर्सान बूषक।

जो ऊंकार को ईश्वरीय धुनि मान
कर्मा पर विश्वास करें,
बुराइयों को दूर रखें,
वह हिंदू है।

हिंदू शब्द की उत्पत्ति,
वेद से हुई है माननीय।
पुराणों ने भी हिंदू शब्द,
उल्लेख किया है जानिए।

झूठ बुत बताने वालों का,
भ्रम जाल खोल बोलिए।
हिंदू राजा ऋग्वेद काल से,
पराक्रमी दानी वर्णन मिलता।

गौमाता का दान मान,
वेदों का दुनिया में सम्मान।

ऋग्वेद मंडल में लिखा है,
उसको भी जानिए।
बुराइयों को दूर करने में प्रयासरत,
सनातन हिंदू है मानिए गोपाल।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने हिंदू, हिंदुत्व – हिंदुस्तान को कविता के रूप में प्रस्तुत किया है। आदि सनातन देवी देवता धर्म – जो बाद में हिंदू धर्म के नाम से जाना जाता हैं। जिसके बारे में सभी प्राचीन ग्रंथों में वर्णन है। इस कविता के माध्यम से आने वाली पीढ़ियां हिंदू धर्म को समझ पाएंगे। हमें गर्व है की हमारा जन्म हिंदू धर्म में, हिंदुस्तान में हुआ है।

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यह कविता (हिंदू – हिंदुस्तान।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में कौन बना है रोड़ा?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में कौन बना है रोड़ा? ♦

भारत के हिन्दी भाषी क्षेत्रों के अधिकांश पढ़े-लिखे लोग भी यही मानते है कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। यह जरूर है कि भारतीयों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा मान लिया है परंतु हमें शायद यह ज्ञान नहीं है कि संवैधानिक तौर पर हिन्दी आज भी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है। भले ही समूचे विश्व में हिन्दी को जानने वाले लोगों की तादाद 200 करोड़ से अधिक हो चुकी है, पर हिन्दी को अपने देश में न्याय नहीं मिल पाया है।

इतना ही नहीं संस्कृत भाषा की तकनीक को संगणकीय पृष्ठभूमि पर खरा पाए जाने के कारण आज हिन्दी को वैश्विक भाषा के रूप में प्रतिस्थापित किए जाने की मुहिम शुरू हो चुकी है क्योंकि संस्कृत तो अब अधिकतर चलन की भाषा नहीं रही, पर उससे उद्भूत हिन्दी को यह सम्मान दिए जाने की पूरी पैरवी की जा रही है। पर भारत में हिन्दी नगण्य क्यों है? इसके लिए हमें इतिहास से लेकर वर्तमान तक को एक नजर में जरूर देखना होगा।

इतिहास से लेकर वर्तमान तक को एक नजर में।

भारतीय इतिहास का ज्ञान रखने वाले प्रत्येक भारतीय को यह पूरी तरह से मालूम है कि हजारों वर्ष तक भारत की भाषाएं राजकाज के कार्यों से विदेशी आक्रांताओं की शासकीय पकड़ के चलते नदारद रही। मुगल शासन काल में राजकाज की भाषा अरबी और फारसी रही और उसके बाद अंग्रेजी शासन काल में यह स्थान अंग्रेजी ने लिया। भारत को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने के लिए आजादी की लड़ाई लड़ने वालों का एक लंबा चौड़ा इतिहास है।

उसी इतिहास में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एक विशेष स्थान रखते हैं। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए विशेष प्रयास किए थे। इसी के चलते उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के लिए सन 1917 में भरूच (गुजरात) में पहली बार हिंदी को राष्ट्रभाषा का नाम दिया था। इस मुहिम में नेहरू जी ने भी गांधी जी का साथ दिया था, यह भी पढ़ने को मिलता है। इसी के चलते आजादी के बाद इस मुद्दे पर भारतीय नेताओं के दो गुट बने, जिसके चलते संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को मुंशी आयंगर समझौते के तहत हिन्दी को संस्कृत की लिपि देवनागरी में टंकित किए जाने और राजभाषा का दर्जा दिए जाने की बात स्वीकार की।

भारतीय संविधान में केवल दो ऑफिशियल भाषाओं को स्थान।

भारतीय संविधान में केवल दो ऑफिशियल (राजभाषा भाषाओं) भाषाओं (अंग्रेजी और हिंदी) को स्थान दिया गया है। वहां किसी भी राष्ट्रभाषा का जिक्र न होने के कारण शायद हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के संदर्भ में एक बहुत बड़ा अड़ंगा बन गया है। इसमें यह भी जिक्र किया गया था की 26 जनवरी 1950 को भारत के संविधान के लागू होने से लेकर 26 जनवरी 1965 तक धीरे-धीरे अंग्रेजी का प्रयोग शासकीय कार्य में कम किया जाएगा और 15 सालों के बाद हिन्दी में ही भारत के शासकीय कार्य किए जाने हैं।

1950 में संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत देवनागरी लिपि में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया। ये राजभाषा संबंधी प्रावधान संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक अंकित किए गए हैं। 14 सितंबर 1953 को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर पहली बार हिंदी दिवस मनाया गया था। धीरे-धीरे हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की मुहिम और तेज होने लगी। इसमें हिन्दी के पक्षधर नेता बालकृष्ण और पुरुषोत्तम दास टंडन के आंदोलनों ने विशेष भूमिका निभाई।

1960 में राष्ट्रपति के आदेश पर इस संबंध में एक आयोग बना। 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित हुआ जिसके तहत राजभाषा के प्रयोग से सम्बन्धित तीन क्षेत्र क, ख, ग बनाए गए। इस अधिनियम में यह तय किया गया कि हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषा में किए गए पत्राचारों के जवाब:-

1. क क्षेत्र के राज्यों को हिन्दी में ही दिए जाएंगे।
2. ख क्षेत्र से प्राप्त अन्य भाषाई पत्रों का जवाब 60% हिन्दी और अंग्रेजी में तथा बाकी 40% सिर्फ अंग्रेजी में ही दिए जाएंगे।
3. ग क्षेत्र से प्राप्त ऐसे पत्राचारों का जवाब 40% हिन्दी और अंग्रेजी में और बाकी सिर्फ अंग्रेजी में दिया जाएगा।

ये प्रावधान संविधान में निर्दिष्ट संविधान लागू होने की 15 सालों के बाद हिन्दी को अधिमान दिए जाने के तहत किए गए।

द्विभाषी पद्धति को मान्यता।

1965 में जब कांग्रेस सरकार ने पूरे भारत में हिंदी के प्रयोग को सर्वत्र अनिवार्य किए जाने पर चर्चा की तो तमिलनाडु में इसके विरोध में हिंसक प्रदर्शन हुए। भले ही ये प्रदर्शन राजनीति प्रेरित थे, परंतु कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने इन प्रदर्शनों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया कि जब आजादी के 15 साल बाद भी पूरे भारत के सभी राज्य हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में ग्रहण करने को तैयार नहीं है तो यह फैसला वापस ले लेना चाहिए। इसी के चलते सन 1967 मैं पुनः 1963 के राजभाषा अधिनियम को संशोधित किया गया और पुनः शासकीय कार्य में राजभाषा के रूप में द्विभाषी पद्धति को मान्यता प्रदान की गई। ये दो भाषाएं वहीं पूर्व की अंग्रेजी और हिन्दी थी।

1971 मैं क्षेत्रीय भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने की कवायद तेज हुई। इसमें आजादी के समय में तो 14 भाषाएं जोड़ी गई थी। बाद में ये 17 हुई और अब 2007 तक इनकी संख्या 22 हो चुकी है। एक यह भी मुहिम चली कि इन्हें भी राजभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। ये भारतीय संविधान में भाषा अधिनियम के तहत भाषाएं तो स्वीकारी गई परंतु राजभाषा का दर्जा इन्हें पूर्ण तौर से नहीं दिया गया शायद।

फिर 1976 में राजभाषा अधिनियम की धारा 4 के तहत राजभाषा संसदीय समिति बनाई गई, जिसने राष्ट्रपति की अनुशंसा पर राजभाषा नीति बनाकर लागू की। अब राजभाषा विभाग मासिक, त्रैमासिक और अर्धवार्षिक सतत निगरानी व विश्लेषण भी करता है और समेकित रिपोर्ट 30 सदस्यों वाली (जिसमें 10 सदस्य राज्यसभा तथा 20 सदस्य लोकसभा के होते हैं) संसदीय राजभाषा समिति को सौंपता है। यह संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपती है।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के संबंध में गुजरात हाईकोर्ट में भी एक याचिका दायर की गई थी। 25 जनवरी 2010 को इस याचिका का फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों के आधार पर यह निर्णय दिया था कि जो दलीलें भारत में अधिकतर लोग हिन्दी भाषा बोलने और जानने वाले हैं आदि – आदि के आधार पर दी जा रही है। वे कहीं भी किसी रिकॉर्ड में अंकित नहीं है और न ही इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा किसी रिकॉर्ड में अंकित है। इसके अलावा संविधान में भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने की बात अंकित नहीं है। अतः यह पैरवी निराधार है। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद यह मामला पुनः ठंडे बस्ते में चला गया।

मुख्यतः चर्चित विवाद।

रही बात हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने वाले गुट और न देने वाले गुट की तो उसमें मुख्यत ये विवाद चर्चित रहे:-

1. हिन्दी का विरोध करने वाले गुट का यह मानना है कि जब भारत के 29 में से 20 राज्यों में हिन्दी बोलने वाले लोग बहुत ही कम है, तो फिर हिंदी को ही राष्ट्रभषा का दर्जा क्यों दिया जाए? राष्ट्रभाषा तो वह होनी चाहिए जिसे समूचे देश के अधिकतर भागों के लोग जानते, बोलते और समझते हो।

2. जो राज्य हिन्दी भाषी चिन्हित किए भी गए हैं, उनमें भी अधिकतर क्षेत्रों में जनजातिय और क्षेत्रीय भाषाएं बोली और समझी जाती है। ऐसे में उन्हें भी हिन्दी भाषी चिन्हित करना न्याय संगत नहीं है।

3. हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने वालों की यह दलील कि देश की पूर्ण जनसंख्या का 50% हिस्सा हिंदी बोलता और समझता है तथा शेष गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोगों का भी 20% हिस्सा हिन्दी समझता है। ऐसे में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला ही चाहिए।
उस पर विरोधी विद्वान टिप्पणी करते हैं कि जिन 50% लोगों की आप बात करते हैं, उनमें से अधिकतर जनजातिय और क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग करते हैं। तो फिर वे हिन्दी भाषी कैसे सिद्ध हुए?

4. हिन्दी विरोधी विद्वानों का तर्क यह भी है कि भारत में हिंदी से भी पुरानी तमिल, कन्नड़, तेलुगू , मलयालम, मराठी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी ओड़िया, बंगला, नेपाली और असमिया जैसी भाषाएं हैं। तो ऐसे में इनसे कहीं बाद दिल्ली के आसपास की चर्चित खड़ी बोली से विकसित हिन्दी को कैसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए?

तर्क – वितर्क का यह सिलसिला तो तब तक चलता ही रहेगा जब तक किसी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल जाता। चर्चा में तो यह भी एक विषय उठता है कि संविधान सभा के समक्ष नेहरू जी ने यह भी प्रस्ताव रखा था कि हिन्दी और अंग्रेजी दोनों को ही राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए, परंतु वह प्रस्ताव भी खारिज कर दिया गया था। खैर कुछ भी हो। किसी भी राष्ट्र की निजी पहचान और उन्नति के लिए उसकी अपनी राष्ट्रभाषा का होना बहुत जरूरी होता है। इस संबंध में हमारा भारत देश आज तक बौना है। एन डी ए सरकार ने 2014 में अपने मंत्रियों और अधिकारियों को सारे शासकीय कार्य हिन्दी में करने की हिदायत जरूर दी थी, परंतु हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के संदर्भ में वह भी चुप्पी साधे है।

मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेजी के गुलाम है।

बड़े हैरत में डालता है संविधान समिति का वह निर्णय, जिस निर्णय ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं बल्कि राजभाषा का दर्जा दिलाया। सब जानते हैं कि एक लंबी जद्दोजहद के बाद भारत मुश्किल से अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा प्राप्त करता है। असल में यह गुलामी आज भी बरकरार है। यह सत्य है कि भारत का प्रत्येक नागरिक शारीरिक रूप से आज अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हो चुका है, परंतु इस सत्य को भी झूठलाया नहीं जा सकता कि मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेजी के गुलाम है।

14 सितंबर 1949 को हमारे संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दिया गया, परंतु हिंदी की हालत आज भी ऐसी है कि मानो अपने ही घर में अपनी ही मां के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा हो। न्यायालय की बड़ी-बड़ी टिप्पणियां, बहसें और न्याय प्रक्रिया के बाद आने वाले निर्णय के लिखित प्रारूप, चिकित्सा व्यवस्था की सारी लिखित और मौखिक जानकारी, शिक्षा व्यवस्था के वैज्ञानिक पहलुओं का लिखित एवं मौखिक ढांचा तथा अधिकतर उच्च प्रतियोगिताओं की परीक्षा भाषा आज भी अंग्रेजी ही बनी हुई है।

इतना ही नहीं, ये सब प्रारूप इतने जटिल और दुरूह होते हैं कि इन व्यवसायों और प्रक्रियाओं पर जिसने शिक्षा प्राप्त नहीं कर रखी है, उस शिक्षित व्यक्ति को भी इन प्रारूपों और व्यवस्थाओं की भाषा शैली को समझाने के लिए, इन्हीं व्यवसायों में काम करने वाले लोगों के पास जाना पड़ता है।

भले ही इन व्यवसायों के अंतर्गत काम न करने वाला व्यक्ति कितना ही पढ़ा लिखा क्यों न हो? या यूं कहें कि उसे अंग्रेजी का कितना ही अच्छा ज्ञान क्यों न हो फिर भी उसे इन प्रारूपों और व्यवस्थाओं को समझने में कहीं न कहीं दिक्कत आ ही जाती है। ऐसे में उसे पढ़ा – लिखा होने के बावजूद भी कई बार लाखों का खर्चा मात्र इन चीजों को समझने और समझाने के लिए ही मुफ्त में करना पड़ता है।

प्रायोजित साजिश तो नहीं है?

समझ ही नहीं आता कि आखिर क्यों इन व्यवस्थाओं को आजादी के आज 74 साल बाद भी अंग्रेजी में प्रारूपित किया जाता है? किया भी जाता है तो फिर भी सवाल उठता है कि क्यों इतना जटिल भाषा शैली में यह सब लिखा जाता है? और देखिए! राजस्व विभाग की भाषा शैली आज भी मुगलिया सल्तनत के दौर की ही बरकरार है। फिर तो जहन में सवाल कौंधे गा ही कि कहीं यह एक सोची-समझी और प्रायोजित साजिश तो नहीं है?

भारत की अधिकांश जनता हिन्दी बोलती है, हिन्दी जानती है और हिन्दी समझती है। उसके बावजूद भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा आज तलक प्राप्त नहीं हो सका। राजभाषा होने के बावजूद भी राजकाज के अधिकतर कार्य आज तक अंग्रेजी में ही संपादित किए जाते हैं। सबसे बड़ी हैरत तो तब होती है, जब एक छोटे से छोटे कार्यालय का सामान्य दस – बारह पढ़ा-लिखा बाबू भी बड़े रूआब से जवाब देता है, “सर अंग्रेजी में बोलिए अंग्रेजी में, हिन्दी मुझे लिखनी नहीं आती।”

भले ही उसे अंग्रेजी समझ नहीं आती हो पर चिट्ठी वह भी अंग्रेजी में ही लिखता है। फिर चाहे उसे उसके लिए नकल ही क्यों ना मारनी पड़े? फिर हर कार्यालय में वही रटी रटाई अंग्रेजी की प्रारूपित चिट्ठियां अंग्रेजों के जमाने से आज तक प्रचलित है। कोई कुछ नया अपनी मौलिक शब्द शक्ति के साथ करना चाहे, तो कार्यालय के बड़े अधिकारी पुनः ड्राफ्टिंग करवाते हैं। यानी नकल करो बस। नया बिल्कुल भी न सोचो। यह उनका दोष नहीं है। यह तो हमारी अंग्रेजी मानसिकता का दोष है।

अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने का भूत।

आज के दौर में तो एक और नया भूत लोगों पर सवार हुआ है। अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने का भूत। बड़े-बड़े कान्वेंट स्कूल में तो व्यवस्था यह भी है कि बच्चों को दाखिल करवाने से पहले उनके अभिभावकों का टेस्ट होता है। यदि उन्हें अंग्रेजी बोलनी और समझनी न आए तो उनके बच्चों को इन कॉन्वेंट स्कूलों में दाखिला नहीं दिया जाता। ऐसी स्थिति में उन अभिभावकों को मायूस होना पड़ता है। आखिर इसमें बच्चों का क्या दोष?

भले ही हिन्दी स्कूल कितना ही अच्छा क्यों न हो? वहां पर कितने ही पढ़े लिखे और प्रशिक्षित अध्यापक क्यों न हो? फिर भी लोगों की मानसिकता शटर में चलने वाले अंग्रेजी स्कूलों के प्रति इतनी दृढ़ है कि जिसे तोड़ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

जब किसी कारोबार की बात होती है तो तब सारा का सारा बड़ा कारोबार हिन्दी में किया जाता है। राजनीति की भाषा (भाषण)हिन्दी। फिल्मी कारोबार की भाषा हिन्दी। प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अधिकतम भाषा हिन्दी।

अरे भाई जब अंग्रेजी इतनी महत्वपूर्ण है तो फिर ये सब कारोबार भी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं करते हो? सवाल तो बनता है। शायद इसलिए कि इन कारोबारों का उपभोक्ता या मतदाता आम व्यक्ति है, जिसे अंग्रेजी नहीं आती। कमाई तो उसी से करनी है। कमाने के लिए हिंदी और भुनाने के लिए अंग्रेजी। वाह! यह कैसी आजादी और कैसी व्यवस्था?

संत श्रेष्ठ तुलसीदास जी।

हमें याद है कि संत श्रेष्ठ तुलसीदास जी ने संस्कृत की अधिकृतता को चुनौती देते हुए अवधि में जब रामायण को लिखना शुरू किया था तो लोगों ने उनकी प्रतिलिपि को ही पानी में फेंक दिया था। क्योंकि संस्कृत को जानने वाले वर्ग के भीतर एक खासा आक्रोश था, कि कहीं यह महान ग्रंथ आम जन भाषा में संपादित हो गया तो हमारी प्रतिष्ठा और रोटी को बट्टा लग सकता है।

जिस तरह से वे नहीं चाहते थे कि आम जनता को इस समूची महाविद्या का सरल ज्ञान हो जाए, ठीक उसी तरह आजाद भारत का एक तथाकथित प्रतिष्ठित और शारीरिक रूप से आजाद तथा मानसिक रूप से अंग्रेजी का गुलाम वर्ग भी शायद यह नहीं चाहता कि भारत की आम जनता को उसकी जन भाषा में उपरोक्त सभी जटिल भाषाई पहलुओं के साथ जटिल विषयों का ज्ञान प्राप्त हो जाए। यदि ऐसा हुआ तो सभी व्यक्ति कानून के अच्छे खासे जानकार हो जाएंगे। सभी को चिकित्सा संबंधी और राजस्व संबंधी सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारियां स्वयं प्राप्त हो जाएगी।

आम जनता का मेहनती और बुद्धिमान बच्चा बड़े-बड़े ओहदों को प्राप्त कर लेगा। जनता इतनी चालाक हो जाएगी कि वह हुक्मरानों, अफसरानों और बड़े – बड़े कारोबारियों के नको दम कर देगी। अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। इसके बिना आज की दुनियां में जीना असंभव है। आदि – आदि बातें इतनी ज्यादा सशक्त नहीं है, जीतने की इन तथाकथित अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम लोगों के निजी स्वार्थ है।

शिक्षा संबंधी एक बार खड़ी करना चाहते हैं।

ये लोग जानबूझकर आम जनमानस और विशिष्ट जनमानस के बीच में शिक्षा संबंधी एक बार खड़ी करना चाहते हैं ताकि इनकी और इनके परिवारों की प्रतिष्ठा और विशिष्टत्व बना रहे। बाकी जनमानस इनके आगे हाजिर सलामी करता रहे। यदि ऐसा नहीं है तो फिर विश्व के अनेक विकसित देशों के लोग अपनी भाषा को महत्व देकर तरक्की क्यों कर रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर हमारे पड़ोसी देश चीन को ही लिया जाए। क्या वह वैश्विक धरातल पर खड़ा नहीं हुआ है? खड़ा होना ही नहीं बल्कि उसे तो वैश्विक धरातल पर दौड़ना आता है।

यह बात अलग है कि आज वह करोना, सीमा विवादों, तथा कूटनीतिक राजनीतिक हलचलों के चलते चौतरफा घिरा हुआ है, परंतु इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि उसने आज जो तरक्की प्राप्त की है वह अपनी भाषा के बलबूते ही प्राप्त की है।

उसने सूक्ष्म से सूक्ष्म विज्ञान को अपनी जन भाषा में लोगों को मुहैया करवाया और प्रत्येक व्यक्ति को इतना दक्ष बनाया कि वह छोटे से लेकर बड़ा प्रोडक्ट तैयार करने के लिए सक्षम है।

हमारे भारत में हमारे बच्चों की आधी जिंदगी तो अंग्रेजी सीखने में ही गुजर जाती है। जब उसे अंग्रेजी का थोड़ा बहुत ज्ञान होता है तो तब वह कहीं वैज्ञानिक पहलुओं को समझने लगता है। जितने को वह इन वैज्ञानिक पहलुओं की थोड़ी सी समझ तैयार करता है, उतने को उसकी जिंदगी ढल चुकी होती है।

मुझे राष्ट्रभाषा का दर्जा दो।

हमारी तो आज हालत यह है कि हम न तो अंग्रेजी के हो पा रहे हैं और न ही हिन्दी के रह गए हैं। हिंदी ने हर भाषा को अपने भीतर समेटा। तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी आदि विशाल शब्दकोश के साथ अब हमारे सामने खड़ी है। हमें पुकार रही है कि “मैं तुम्हारे हिसाब से हर तरह से ढलने को तैयार हूं, पर तुम मेरा दर्द समझो और मुझे राष्ट्रभाषा का दर्जा दो। मुझे हजारों सालों से आक्रांताओं के द्वारा कुचलने की पूरी कोशिश की गई, पर मैं तुम्हारे लिए आज तक जिंदा हूं।”

दुख तब होता है जब आजादी के इतने लंबे दौर के बाद भी हम अपने देश की जन भाषा को राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं दे पा रहे हैं। माना कि उस दौर में सब कुछ अंग्रेजी में और मुगलिया सल्तनत की भाषा शैली में प्रारूपित था। उस सब को एकदम से तब्दील नहीं किया जा सकता था।

परंतु आज तक तो धीरे-धीरे सब कुछ बदला जाना चाहिए था ना। फिर क्यों नहीं बदला गया? क्या यह एक साजिश है? ऐसे बहुत सारे सवाल आज की नई पीढ़ी के भीतर घर कर रहे हैं। हमारी हालत आज ऐसी हो गई है कि एक वाक्य में यदि चार शब्द हम अंग्रेजी के रूआब झड़ने के लिए बोलना शुरू करते हैं तो हर पांचवा शब्द हिन्दी का बोलना ही पड़ता है।

यह हालत बड़े से बड़े तथाकथित विद्वानों की भी कई बार हो जाती है। ऐसे में क्यों फिर यह बवंडर बना कर रखा है? क्यों न हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्रदान करके भारतीय जनमानस के शैक्षिक धरातल पर प्रस्तुत किया जाता है? ताकि आम व्यक्ति लूटने से बचे और अपने भारत के पुरातन विज्ञान को अपनी जन्म भाषा में खंगाल कर भारत को पुनः विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित कर सकें।

विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में एजुकेशन हब।

हम इतिहास को जानते है। हमें यह मालूम है कि एक समय भारत और चीन दो ऐसे देश थे जो पूरे विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में एजुकेशन हब माने जाते थे। भारत की तक्षशिला और नालंदा यूनिवर्सिटी पूरे विश्व में शिक्षा के लिए विख्यात थी।

क्या वहां पर उस दौर में अंग्रेजी में शिक्षा दी जाती थी? नहीं ऐसा नहीं है। यदि उस दौर में हमारी जन भाषा में या फिर संस्कृत में शिक्षा ग्रहण करने लोग बाहर से हमारे देश में आते थे, तो आज भी आ सकते हैं।

परंतु इस सब के लिए राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति का होना और भारतीय जनमानस को अंग्रेजी मानसिकता की गुलामी से मुक्त करवाना बहुत जरूरी है। चीन ने तो अपनी भाषा को आज तक बनाए रखा है, इसीलिए वह आज विकसित की श्रेणी में है शायद। और एक हम हैं कि अपनी भाषा को तवज्जो ही नहीं देना चाहते।

आज लोग अधिकतर मैकाले को ही हिन्दी की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। मैं कहूंगा इसमें न तो अंग्रेजी का दोष है और न ही तो मैकाले का। वे दोनों सन 1947 में भारत छोड़कर चले गए थे। फिर क्यों आजाद भारतीयों ने उनके द्वारा स्थापित किए गए मापदंडों को हारिल की लकड़ी की तरह पकड़ के रखा?

क्या हमारे आजाद देश की राजनीति, व्यवस्था और जनता इतने आलसी हो गए कि आजादी के 74 साल बीत जाने के बाद भी उन अंग्रेजों और मुगलों द्वारा प्रतिस्थापित किए गए मापदंडों को हटाकर हिंदी में प्रतिस्थापित नहीं कर सके? यह दोष न मुगलों का है और न ही तो अंग्रेजों का है।

यह हमारी राजनैतिक और व्यवस्था जनक साजिशों का परिणाम है। आज पार्टियां भले ही एक दूसरे के सिर पर इस बात का ठीकरा फोड़ती हो। परंतु यह कटु सत्य है कि ये सब पार्टियां सत्ता में बारी बारी से आ चुकी है। सब का यही परिणाम है। इसके लिए जनता भी कम उत्तरदाई नहीं है।

विदेशों में प्रतिष्ठित लोगों के घरों में भी अपनी भाषा की पत्रिकाएं और समाचार पत्र पढ़ने को मिलेंगे। एक हमारा देश है, जिसमें बड़े – बड़े घरानों में अपनी भाषा के पत्र – पत्रिकाओं के स्थान पर अंग्रेजी भाषा के अखबार या पत्रिकाएं पढ़ने को मिलेंगे। हमारे भारत के उच्च मध्यवर्गीय या फिर उच्च वर्गीय लोग तो इसको अपनी शान समझते हैं और हिन्दी में कुछ पढ़ना – लिखना अपनी तौहीन समझते हैं।

यह भी सत्य है।

यह भी सत्य है कि देश की सत्ता और व्यवस्था में इन्हीं लोगों का सिक्का चलता है। आम जनता का उसमें कोई लेना-देना नहीं होता। वह तो महज वोटर थी, है और रहेगी शायद।

फिर क्यों जनाक्रोश का बहाना बनाकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया जाता? यदि ये तीन समुदाय के लोग अपनी एंठ और राजनैतिक स्वार्थ छोड़ दें, तो भारत के किसी भी प्रांत और किसी भी धर्म, जाति तथा संप्रदाय के लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने से कभी मना नहीं करेंगे।

समूची शिक्षा प्रणाली भारतवर्ष में हिंदी होना चाहिए।

वैश्विक धरातल पर आज हिंदी का बोलबाला धीरे-धीरे हो रहा है। हमारे कई कवि महोदय और धर्मगुरु विदेशों में अपने धर्म का प्रचार – प्रसार और कविताओं का प्रचार – प्रसार करने जाते हैं।

करोड़ों की तादात में लोग विदेशों में भी उनके अनुयाई बन चुके हैं, तो फिर हमारी सरकारें और व्यवस्थाएं यह कैसे कह सकती है कि हिन्दी वैश्विक धरातल पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती? अंग्रेजी पूरे विश्व की भाषा है, इसलिए इसे महत्व देना ही होगा।

इन प्रचार – प्रसारों से यह स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि हिन्दी कमजोर नहीं है, कमजोर है तो वह है हमारी अपनी मानसिकता। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में यदि कोई रोड़ा है तो वह हमारी अंग्रेजी की गुलाम मानसिकता ही है, दूसरा कोई नहीं है।

अंग्रेजी बुरी नहीं है और न ही तो कोई दूसरी भाषा बुरी है। परंतु मेरे कहने का अर्थ यह है कि इन भाषाओं को मात्र एक विषय के रूप में, अन्य भाषाओं को सीखने की दृष्टि से स्कूलों कालेजों में पढ़ाया जाना चाहिए।

न कि इन्हें समूची शिक्षा प्रणाली का माध्यम बनाना चाहिए। समूची शिक्षा प्रणाली का यदि कोई माध्यम हो, तो भारतवर्ष में वह हिंदी होना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने से देश को कोई घाटा होगा बल्कि उल्टा मुनाफा होगा।

नई शिक्षा नीति।

आज जो नई शिक्षा नीति भारत में अधिसूचित की गई है उसमें प्रारंभिक स्तर पर स्थानीय भाषाओं को महत्त्व जरूर दिया गया है, परंतु हिन्दी को पूर्ण मान – सम्मान वहां भी नहीं मिल पाया है।

उच्च शिक्षाओं की किताबे फिर से उन्हीं जटिल भाषा और शिल्प में ही पढ़नी पड़ेगी। एक लंबे अरसे के बाद बड़ी जद्दोजहद के बाद भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने इस मसौदे को मंजूरी दी। पर उस मंजूरी में भी हिन्दी को न्याय नहीं मिल सका। प्रारंभिक स्तर में तो पहले भी ऐसी व्यवस्था थी।

हम लोगों ने अंग्रेजी पांचवी या छठी के बाद पढ़ी है। मेरे हिसाब से यह हिन्दी के लिए कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो पाया है। महत्वपूर्ण तो तब होता जब उच्च शिक्षा व्यवस्था में भी हिन्दी भाषा में ही शिक्षा देने का प्रावधान किया जाता। परंतु यह हमारे देश के शिक्षाविदों को और सत्ता धारियों को रास नहीं आया शायद।

आजादी से आज तक निरंतर राष्ट्रभाषा हिन्दी बनने का सपना बहुतों ने संजोया और वह अभी तक संजोया हुआ ही रह गया है। बस उम्मीद बाकी है कि एक न एक दिन यह सपना जरूर पूरा होगा। अब देखना यह है कि इस मुद्दे पर कौन कब क्या करता है? मेरे देश की आम जनता को कब न्याय मिलता है?

नोट: यह आर्टिकल बड़ा है, अगर आप एक बार में पूरा आर्टिकल नहीं पढ़ पा रहे है तो घबराये नही, आर्टिकल के लिंक को अपने लैपटॉप या कंप्यूटर / स्मार्टफोन के ब्राउज़र पर बुकमार्क कर ले, जिससे आप इस आर्टिकल को दो से तीन बार में पूरा पढ़ ले।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में आखिर कब तक रुकावट आता रहेगा। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का कब और किसके द्वारा क्या प्रयास हुआ, इसका विस्तार से वर्णन किया है। हिन्दी भाषा के महत्व को भी समझाया है, सभी जानते है की भारत देश में एकमात्र हिंदी भाषा ही राष्ट्रभाषा बनने लायक हैं। आखिर क्यों हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बनाया जा रहा है। क्यों हम अंग्रेजो की बनाई हुई नीति को आज तक ढ़ो रहे है। अपने आप से हम सभी क्यों प्रश्न नहीं करते की – मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेजी के गुलाम क्यों है। बहुत जल्द हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना ही होगा, इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। किसी भी देश के विकास के लिए एक राष्ट्रभाषा का होना बहुत जरूरी है।

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यह लेख (हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में कौन बना है रोड़ा?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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शनि की साढ़ेसाती।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शनि की साढ़ेसाती। ♦

साढ़ेसाती जब भी आती है।
शारीरिक कष्ट बढ़ाती है।
जीवन में कई बार यह आती है।
आर्थिक कष्ट दे जाती है।
अवसाद जीवन में ले आती है।
दुर्घटना देकर जाती है।

मानसिक संताप इसने दिखाती है।
हिम्मत दिल से दूर भगाती है।
कल क्लेश बढ़ा मनुष्य भरमाती है।
घर – घर का खर्च बढ़ाती है।
व्यक्ति को दूर बेसन ले जाती है।
तबाही परिवार में आती है।

आपस मैं ही कलह – कलह कराती है।
पराया अपने को बनाती है।
मन बुद्धि को भ्रमित करने आती है।
घबराहट मन में जगा जाती है।
ढाई – ढाई बरस का तीन चरण होता है।
इसका मकसद इस तरह होता है।

प्रथम ढाई वर्ष में यह सीख सिखाती।
मानसिक परेशानी जीवन में आती।
दूसरे भाग में आर्थिक क्षति पहुंचाती।
शारीरिक कष्ट देने आती।
विश्वास को भी भ्रमित करते जाती।
सारे डगर में अगर फैलाती।

आखरी ढाई वर्ष में भरपाई करती।
अंत समय व्यक्ति को ज्ञान कराती।
शनि सत्य का मर्यादा कहलाता।
सत्कर्म की मर्यादा बतलाता है।
राहत के लिए ‘मंगल’ उपाय बताता।
सनी इससे प्रसन्ना हो जाता।

पीपल वृक्ष की पूजा से लाभ मिलता।
पीपल में देवताओं का वास होता है।
मानव के मन और बुद्धि को शांत देता।
ऑक्सीजन यहां पर्याप्त होता है।
पीपल के वृक्ष की पूजा सार्थक होती।
व्यक्ति को भी राहत पहुंचाती है।

पीपल में अर्घ देने से बहुत लाभ होता।
शिव की उपासना से राहत मिलती है।
शनि की उपासना के लिए शनि स्तोत्र पढ़ें।
रूद्र अवतार हनुमान जी का जप करें।
महामृत्युंजय मंत्र से शिव का अभिषेक करें।

शनिवार को पीपल के वृक्ष में जलदान करें।
तेल, तिल तेल, काला तिल, काला कपड़ा भेंट करें।
गुड, लोहा, काला कपड़ा, गरीब को दान करें।
शनिवार को खिचड़ी का भोग लगाने से लाभ होता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – शनि की साढ़ेसाती, जब जीवन में आती है तो, क्या – क्या परेशानी होती है। इन परेशानियों को कम करने के लिए क्या करें, शनि देव को कैसे प्रसन्न करें, जिससे परेशानिया कम हो। शनि देव की उपासना कैसे करें।

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यह कविता (शनि की साढ़ेसाती।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन। ♦

उपरोक्त दोनों संस्कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन से पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि संस्कृति होती क्या है? आदरणीय भदंत आनंद कौसल्यायन के लेख “संस्कृति” के सार के आधार पर कहा जा सकता है कि संस्कृति शब्द अपने आप में इतना विशाल शब्द है, जिसका व्याख्यान करना आसान नहीं है। उसको सूक्ष्म शब्दों में बस इतना ही कहा जा सकता है कि मनुष्य को पीढ़ी दर पीढ़ी जो परंपरागत आंतरिक संस्कार, मानसिक उदगार और मनोभाव तथा भावात्मक एवं संकल्पनात्मक आयाम उत्तरोत्तर मिलते जाते हैं, उन्हें ही संस्कृति कहा जाता है।

यानी संस्कृति किसी समाज विशेष के मानव समुदाय का आंतरिक भावों से युक्त वह व्यवहार है, जो उसके बाह्य अचार व्यवहार में स्पष्ट नज़र आती है। इसे बाहरी तौर पर पुष्ट करने के तरीके व प्रसाधन सभ्यता है। पर जो सेवा, सत्कार और सामाजिक शिष्टत्व तथा मेजबानी के साथ-साथ लोकाचार के तौर तरीके होते हैं, वहीं संस्कृति है।

यानी संस्कृति मानव प्राणी का अन्तःकरण है और सभ्यता उसकी बाहरी जीवन शैली व प्रसाधन। ये आंतरिक संस्कार ये भाव किसी समाज विशेष के अपने होते हैं। इनके यूं एक समाज विशेष का लहदा-सा होने के कारण, यह उस समाज विशेष की संस्कृति को अपना नाम देते हैं। इसी सन्दर्भ में भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति के तुलनात्मक अध्ययन को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है:—

भारतीय संस्कृति ज्ञानधर्मी है तो पाश्चात्य संस्कृति विज्ञानधर्मी।

भारत की संस्कृति सनातनी संस्कृति रही है। यह ऋषि – मुनि परंपराओं से उद्भासित और विकसित होने के साथ – साथ अनेकों आततायियों के अक्रमणों और कब्जों से भी लम्बे समय तक प्रभावित रही। यहां तक कि पश्चिम के देशों के कब्जे में भी रही।

परंतु इस संस्कृति की प्रधान बात यह रही कि इतना कुछ होने के बाबजूद भी इसने विश्वभर में अपना अस्तित्व अभी तक नहीं खोया। यह इस संस्कृति का ज्ञानधर्मी होने का नतीजा है। यहां जो भी अक्रांता आया, वह इस संस्कृति को नष्ट करने की हर सम्भव कोशिश करता गया पर इस संस्कृति ने अक्रांताओं की संस्कृति के आवश्यक गुणों को उल्टा अपने संस्कारों में समेट कर खुद की संस्कार सृजनाता में इज़फा ही किया। अपना कुछ नहीं खोया। अपना ज्ञान बढ़ाया ही है घटाया नहीं है।

मैकाले जैसे लोगों ने तो इस संस्कृति को नष्ट करने के लिए 1936 ई. में भारत की शिक्षा नीति तक बदल डाली। परन्तु इतना कुछ होने के बाबजूद भी भारतीय संस्कृति का वे कुछ नहीं बिगड़ पाए। इसके पीछे असलियत यह है कि संस्कृति आंतरिक विषय है यह कोई बाह्य विषय नहीं है, जिसे अपनी मर्जी से हम ढाल सके।

यह एक बार जिस तरह से जिस सांचे में ढल जाता है फिर उसी ढांचे में ही तब तक रहता है, जब तक उसी आचार व्यवहार के लोगों को छोड़ कर व्यक्ति कहीं दूर सदा के लिए नहीं चला जाता।

उधर पश्चिम की संस्कृति विज्ञानधर्मी है। उसे तो बात – बात पर प्रयोग चाहिए। बिना प्रयोग के वह किसी बात को मानने को तैयार ही नहीं है। परन्तु यह एक शाश्वत सत्य है कि दुनियां की कई बाते ऐसी है, जो मात्र ज्ञान से ही समझ में आती है। वे विज्ञान के प्रयोगवाद का हिस्सा न कभी थी, न आज है और न ही तो कभी होगी।

भारतीय संस्कृति योगधर्मी और पाश्चात्य संस्कृति प्रयोगधर्मी।

यह पूरी दुनियां जानती है कि भारत की भूमि तप और त्याग की भूमि रही है। विश्वभर की प्राच्य विद्याओं का उद्गम स्थल यही आर्य क्षेत्र ही इतिहास में भी बताया जाता है। यहां की संस्कृति योगधर्मी रही है। यहां मनुष्यता को जांचने और मापने का पैमाना तो सदियों से योग रहा ही रहा है पर समृद्ध और खुशहाल जीवनयापन का सशक्त साधन भी यही योग माना जाता आ रहा है। इतना ही नहीं यह एक सटीक और कारगर सूत्र भी सिद्ध हो चुका है। वरना पूरी दुनियां आज भारत की इस विद्या का अनुसरण क्यों करती?

उधर पश्चिम में जीवनयापन और मनुष्यता के मूल्यांकन का आधार प्रयोगवाद है। प्रयोगवाद स्वार्थ आधारित होता है। जब तक कोई व्यक्ति या वस्तु हमारे काम की है, तब तक तो उससे हम जुड़े रहते हैं और जब वह हमारे लिए बेकार हो जाती है, उस वक्त हम उसे उसी के हाल पर छोड़ देते हैं। यह व्यवस्था पारिवारिक विघटन, वृद्ध जीवन अव्यवस्था और सामाजिक विघटन की पैरोकार है।

भारतीय संस्कृति संस्कारधर्मी है और पाश्चात्य संस्कृति विकारधर्मी है।

भारत की आद्य संस्कृति में संस्कारों का जो प्रावधान बनाया गया था, वे संस्कार आज भी उतनी ही अहमियत हमारे समाज में रखते हैं। ये संस्कार 16 संस्कारो के नाम से जाने जाते हैं। गर्भाधान से ले कर मृत्यु संस्कार तक इन संस्कारों में एक क्रमिक व्यवस्था है और एक पवित्र प्रावधान है।

जन्म, मुंडन, उपनयन, विवाह, मृत्यु इत्यादि संस्कार विशेष महत्व के हैं। हमारे यहां प्रेम भी विवाह के बाद ही होता है जबकि पश्चिमी संस्कृति विकार के हिसाब से चलती है।

जैसे मानव शरीर में विकार आता है वैसे ही वह सांसारिक सुखों को भोगने की पैरोकारी करती है। कोई संयम साधना नहीं। भले ही फिर चाहे समय से पूर्व ही व्यक्ति इन भौतिक सुख सुविधाओं से विमुख हो कर निराशा और हताशा में ही क्यों न चले जाए।

किसी आयु विशेष में किसी कार्य को करने का कोई उचित क्रम व प्रावधान पश्चिमी संस्कृति में नहीं है, जिसके कारण पश्चिमी संस्कृति के लोग समय से पहले ही जीवन के कई क्षणों का उपभोग करके परेशान होते हैं और भारतीय योग साधना की शरण में आते हैं।

भारतीय संस्कृति अध्यात्मवादी है और पश्चिमी संस्कृति भौतिकतावादी है।

यह सर्वविदित है कि भारत पुरातन काल से ही अध्यात्म का पैरोकार रहा है और उसी लीक पर चल रहा है। भारतीय संस्कृति बाह्य भौतिक संसार की अपेक्षा आंतरिक आध्यात्मिक जगत की ओर ज्यादा ध्यान देती है, जो इस संस्कृति का मुख्य आकर्षण भी है और ताकत भी।

इसी आकर्षण और ताकत को तोड़ने के लिए मैकाले जैसे लोगों ने भी आधुनिक शिक्षा प्रणाली का प्रारम्भ कर के यहां की गुरुकुलीय व्यवस्था को विलुप्त करवाने की योजना बनाई। इसमें वे लोग कामयाब भी हुए। चलो वैश्विक धरातल पर यह व्यवस्था एक अच्छी व्यवस्था है पर इससे भारत की पुरातन कई विद्याएं समाप्त हो गई। हमारे यहां सूक्ष्म शरीरों द्वारा स्थूल शरीर से बाहर निकल कर लोक लोकोतर की यात्रा करने की गुप्त विद्याओं का प्रचलन गुरुकुलों में था।

वह जाता रहा। रही अध्यात्म की बात तो वह तो आस्था का विषय है। उसी का परिणाम है कि भारतीय संस्कृति में झाड़ – झांखड़ में भी देवी देवताओं के प्रतिरूप विद्यमान होते हैं, और उनके प्रति भी लोगों की वही आस्था व विश्वास होता है, जो बड़े मंदिरों में रहने वाले देवी देवताओं के प्रति होता है।

उधर पश्चिमी संस्कृति में अन्तरिक जीवन शैली की अपेक्षा बाह्य सुख सुविधाओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इस बाह्य जीवन समृद्धि की दौड़ में पश्चिमी संस्कृति का समाज आंतरिक रूप से विद्रुप सा हो गया है, क्योंकि असली सुख बाहर नहीं अंदर मिलता है।

भारतीय संस्कृति अस्थावादी है और पश्चिमी संस्कृति विरास्तवादी।

भारत की संस्कृति आंतरिक भावनाओं से सम्बन्ध रखने वाली एक विशुद्ध संस्कृति है। इसमें जीवन का हर रिश्ता आस्था और विश्वास पर ही टिका है। हमारे आपसी व्यवहार और क्रियाव्यपार आस्था पर आधारित है।

भारतीय समाज में बजुर्गों के पास कुछ हो या नहीं पर फिर भी जीवन की आस्था के आधार पर हम उनके प्रति पूर्ण जबावदेह रहते हैं। पश्चिमी संस्कृति में यह जवाबदेही मात्र विरासत के आधार पर सुनिश्चित होती है।

भारतीय संस्कृति संतोषवादी है और पश्चिमी संस्कृति मदहोशवादी।

भारतीय संस्कृति का जनमानस स्थिरीकरण और संतोष का पक्षधर है। यहां की मानवीय भावना थोड़े में ही गुजर कर संतोष करने वाली है। अनावश्यक भ्रमण के खिलाफ और एक जगह ठहराव करके संतोष करने वाली संस्कृति है। पश्चिमी संस्कृति निरन्तर भ्रमण प्रिय और मदहोशवादी है।

भारतीय संस्कृति सतरकतावादी है और पश्चिमी संस्कृति तर्कतावादी।

भारतीय संस्कृति सतरकतावादी संस्कृति है। यहां की मानव प्रकृति अपने जीवन के उद्धार के लिए हमेशा सतर्क रहती है। पाप – पुण्य का ख्याल क्षण-क्षण यहां के मानव मस्तिष्क को झकझोरता रहता है।

पश्चिमी संस्कृति के लोगों का मस्तिष्क हर बात को तर्क की कसौटी पर तोलता रहता है। बिना तर्क के उस संस्कृति में कुछ भी नहीं किया जाता।

भारतीय संस्कृति समष्टि वादी है और पाश्चात्य संस्कृति व्यष्टि वादी है।

भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् की समष्टि वादी सोच को रखने वाली है। इसमें ” परहित सरिस धर्म न ही भाई,” की भावना से कार्य किया जाता है और पश्चिमी संस्कृति व्यक्तिवादी विचारधारा की पक्षधर है। वहां अस्तित्ववाद का विशेष महत्व है।

भारतीय संस्कृति आदर्शवादी है और पाश्चात्य संस्कृति यथार्थवादी है।

भारतीय संस्कृति आदर्शवादी है। हमारे यहां कोई न कोई जीवन का आदर्श बनाया जाता है और हम उस आदर्श का अनुसरण करके अपने जीवन के चरित्र को उद्घाटित करते हैं।

वहां पश्चिम में आदर्श के स्थान पर यथार्थ को महत्व दिया जाता है। यथार्थ भी वे भौतिक संसार को ही मानते हैं। भारतीय संस्कृति के वेदान्तिक यथार्थ को नहीं।

निष्कर्ष—Conclusion

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि संस्कृति कोई भी बुरी नहीं होती है, परन्तु जिस संस्कृति में मानवता, प्रेम, करुणा, एकता, समग्रता के गुणों के साथ – साथ वैविध्य में भी एकत्व का समग्र भाव विद्यमान हो; वह संस्कृति अधिक उदात्त और विशाल समझी जाती है। इन सभी गुणों का समावेश भारतीय संस्कृति में ही देखने को मिलता है।

यहां, शकों, हुणों, डचों, मंगोलों से लेकर अंग्रेजों तक के आक्रमणों और साम्राज्यवादों के चलते कई बार व्यवस्थाएं विदेशी हाथों में गई और उन्ही व्यवस्थाओं के चलते भारतीय संस्कृति ने अपने सर्वग्रही स्वभाव के चलते उन सभी संस्कृतियों का भी बहुत कुछ अपने आप में शामिल कर लिया।

भले ही आज भारत स्वतंत्र राष्ट्र है पर फिर भी उन सभी संस्कृतियों का समावेश भारतीय संस्कृति में आज भी विद्यमान मिलता है। यही समावेश भारतीय लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता का समूचे विश्व में एक सशक्त उदाहरण है। इसी के चलते आज भारत पुनः विश्वगुरु होने की ताकत रखता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – संस्कृति होती क्या है? भारतीय संस्कृति, पाश्चात्य संस्कृति में क्या – क्या मुख्य फर्क है, किसी भी समाज के लिए संस्कृति क्यों जरूरी है। योग और ध्यान का हमारे जीवन में क्या महत्व है, संस्कृति मानव प्राणी का अन्तःकरण है और सभ्यता उसकी बाहरी जीवन शैली व प्रसाधन क्यों हैं। भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का बहुत ही अच्छे से तुलनात्मक व्याख्या किया है। भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् की समष्टि वादी सोच को रखने वाली है। इस लेख के माध्यम से आने वाली अगली पीढ़ी को भारतीय संस्कृति को समझने में आसानी होगी। उन्हें गर्व होगा अपने ज्ञान और योग से पूर्ण महान भारतीय संस्कृति पर। आपने कम शब्दो में सभी मुख्य फर्क है को सरलता पूर्व समझाया हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है इस लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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यह लेख (भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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अस्तित्व।

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♦ अस्तित्व। ♦

पीड़ा और शोक की कहानी,
आरोप-प्रत्यारोप की कहानी,
से बड़ी होती है।

संतोष और विवेक पूर्ण धरोहरों,
सुख शांति का एकमात्र साधन है।
अस्तित्व का कभी अंत नहीं होता।
वस्तु का ही सदा अंत होता है।

आत्मा न जन्म लेती है ना मरती।
जिसका जन्म नहीं होता,
उसकी मृत्यु नहीं होती है।
आत्मा का प्रारंभ ना और ना अंत।

इसलिए आत्मा की अमरता है।
जिसका कोई नहीं होता है।
उसकी मृत्यु नहीं होती है।

ब्रह्मांड में प्रकाशित होने वाला,
ब्रह्मांड के बगीचे का अंग है मनुष्य।

सब कुछ उसके अंदर होने के बावजूद।
प्रकृति और समाज पर निर्भर होता है मनुष्य।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
इसलिए वह समाज में रहता है।

अपने अस्तित्व के लिए,
वह समाज पर निर्भर है।
मनुष्य समाज से अलग हो जाता है,
तो उसका विनाश संभव है।

अपने बारे में केवल विचार करके,
मनुष्य खुशहाल नहीं जि सकता।
व्यक्ति समाज से अलग,
रह कर सुखी नहीं होता।

संत पुरुष समाज से अलग,
रह कर ईश्वर से लगन लगाते हैं।
ईश्वर और ऋषि जब साथ होते हैं,
तो वह आनंदा की अनुभूति होती हैं।

मनुष्य को समाज के,
अनुसार चलना पड़ता है।
व्यक्तिगत सोच समाज के,
अनुसार ही रखनी पड़ती है।

सभी व्यक्ति अपनी सोच के अनुसार,
के लोगों के साथ रहना चाहते हैं।
जबकि सब के विचारों में विविधता होती है।

आत्मा का अर्थ होता है अस्तित्व,
अस्तित्व तो कभी मरता नहीं है।
यह पंच तत्वों से निर्मित,
शरीर भी अपनी नहीं है।

आत्मा जब शरीर को छोड़ देती है,
तब शरीर पंचतत्व में ही मिल जाती है।
विद्वान पुरुष आत्मा और शरीर में अंतर जानते हैं।
आत्मा न जन्म लेती है और न हीं मरती है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – आत्मा का अर्थ होता है अस्तित्व, यह पंच तत्वों से निर्मित शरीर भी अपनी नहीं है। आत्मा के सभी गुणों का महत्व और रियलिटी को बताया हैं। मनुष्य क्या है और मनुष्य समाज में क्यों रहता है, इसे भी समझाया हैं।

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यह कविता (अस्तित्व।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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कटु सत्य।

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Katu Satya | कटु सत्य।

नारी उत्थान पर निबंध।

आत्म शलाघाओं के नशे में चूर भारतीय समाज नारी के विषय में प्राय एक वेदोक्त मंत्र बड़े चाव से जपता नज़र आता है। वह मंत्र है, “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।” मैं नारी शक्ति की पूजा करने के खिलाफ नहीं हूँ। परंतु सवाल खड़ा होता है कि क्या हम इस पंक्ति के सही मायने को समझ पाए? यदि हाँ तो मेरा सवाल यह है कि इस पंक्ति में कौन से रमण करने वाले देवताओं की बात की गई है?

सृष्टि की सृजन शक्ति की महानायिका

क्या उन्ही इंद्र सरीखे देवताओं का ज़िक्र किया गया है जिन्होंने त्रेता काल की अहल्या माता का चालाकी से उपभोग करके उसे सदा-सदा के लिए सजा भोगने के लिए छोड़ दिया? क्या यही उनके दैवत्व का लक्षण है? चापलूसी, छल, प्रपंच धोखा, आदि उपहार ही तो नारी के खाते में अनादिकाल से पड़ते आए हैं। यह कितनी भयंकर विडंबना है कि वह संसार का महा सौंदर्य और सृष्टि की सृजन शक्ति की महानायिका हमेशा से ठगी-सी गई है और आज भी समाज उसे निरन्तर ठगता ही चला जा रहा है।

इसने छोटे-बड़े सभी घरों में सिवाए ज़लालत के कुछ नहीं पाया है। पर फिर भी यह बेचारी अपनी तनिक प्रशंसा सुन कर फुली न समाती है। उस चापलूसी भरी प्रशंसा के उन्माद में यह अपने साथ हुए तमाम जुल्मों को भूल कर यूं महसूस करती है मानो इसने संसार का सब सुख पा लिया हो। यही इसकी उस कमजोरी का वह पहलू है जिसके बूते यह ऊपर कही पंक्ति इजाद की गई हो शायद। अर्थात नारी सदा से सौंदर्य की प्रतिमूर्ति समझी जाती आई है और समझी जा रही है।

विलासी समाज

यह सब मैं अपनी मर्जी से नहीं कह रहा हूँ। यह स्वयं नारी की अपनी मनःस्थिति और व्यवहार सिद्ध करता है। हम प्राय स्त्री के हार शृंगार के प्रति रुचि और दूसरों की देखा – देखी में सौंदर्य प्रसाधनों का ज़रूरत से ज़्यादा प्रयोग करने की प्रवृति को सदियों से देखते आए हैं।

उसका यह सज धज कर रहना, यह सिद्ध करता है कि वह सौंदर्य की प्रतिमूर्ति है। उसकी यही वृती कई बार उस बेचारी के गले की फांस भी बन चुकी है। यदि इंद्र जैसे देवताओं के रमण की बात की जा रही है तो वह देवताओं के विलासी समाज की ओर ही इशारा करती है।

तो यह सिद्ध हुआ कि नारी की पूजा का समर्थन, इसलिए भारतीय समाज में किया जाता है ताकि वह अपनी खुशामद से रीझ कर हमारी उपभोग की वस्तु बनना स्वीकार करती रहे बस। देवताओं की बात करें तो स्वयं ब्रह्मा तक ही नारी सौंदर्य से अभिभूत हो कर अपनी ही बेटी संध्या के रूप पर लट्टू हो बैठे। क्या यही नारी की पूजा है? क्या यही देवताओं का रमण है? फिर चाहे सीता, अहिल्या, द्रोपदी, पद्मावती जैसी उच्च गृहस्थ नारियों के साथ हुए शोषण की बात हो या फिर आम घरों की बहन-बेटियों की ज़लालत का मामला हो।

पौराणिक आख्यानों पर चर्चा

खैर मैं यहाँ पौराणिक आख्यानों पर चर्चा करने नहीं आया हूँ पर वेदोक्त उक्त पंक्ति का सहारा ले कर नारी का चापलूसी से शोषण करने और उसे बहकाने वाले समाज की पोल खोलने ज़रूर आया हूँ। पीछे जो हुआ सो हुआ। उसे हमने भी किताबों में ही पढ़ा है। वह अपनी आंखों से घटते नहीं देखा, इसलिए वह कितना सत्य है और कितना असत्य, इसका ठीक समझ पाना मुश्किल है। अतः उसे छोड़ देना ही उचित समझा जाना चाहिए।

वर्तमान समाज में ही नारी जीवन

आइये वर्तमान समाज में ही नारी जीवन पर एक नज़र पक्षपात रहित हो कर डालते हैं। आज हम देखें तो आज भी नारी के साथ वही कुछ हो रहा है। वही बलातकार, वही चापलूसी और वही शोषण।

छोटे घरों से ले कर बड़े घरों तक। अब आप कहेंगे कि कैसे? तो सिद्ध करते हैं। छोटे घरों में तो हम आए दिन पत्नियों, बेटियों के कत्लों और तलाकों की खबरें सुनते ही रहते हैं पर यह बीमारी बड़े घरों में भी कम नहीं है।

यहाँ मीडिया, फ़िल्म जगत और प्रतिष्ठित समझा जाने वाला उच्च वर्गीय समाज नारी की चापलूसी से बाज नहीं आते। वे उसे उत्तरोत्तर गर्त में धकेल रहे हैं। वह बेचारी अपनी उसी वाहवाही की कमजोरी के कारण इस भंवर में डूबती जा रही है।

ये सभी उसे अपनी-अपनी ज़रूरतों के मुताबिक चंद पैसों के लालच में यूं प्रयोग करते हैं कि जैसे वह कोई एक वस्तु है मानव नहीं। यह सब अनादि काल से हो रहा है।

विरोध क्यों नहीं ?

हैरानी तो इस बात की है कि इस नारी ने कभी विरोध क्यों नहीं किया कि क्यों मैं ही सदा से हर महफ़िल में नचाई जाती आ रही हूँ? क्यों मुझे ही फ़िल्मों, समाचार पत्रों के विज्ञापनों में या फिर सामाजिक सूचना प्रसारण में अर्धनग्न हो कर परोसा जा रहा है?

मैं भी तो किसी की मां, बहन, बेटी या पत्नी हूँ। जब वे सब मेरी ये तस्वीरे देखते होंगे तो वे क्या सोचते होंगे? क्यों न मेरे काम को अब स्वयं मर्द करें? ये सवाल खड़ा करना आज नारी समाज की ज़रूरत बन गया है वरना ये समाज के धुरंधर नारी के जिस्म से सब कुछ उतार कर एक दिन इतना शर्मिंदा करेंगे कि वह बेचारी ख़ुद की दुर्दशा पर रो भी नहीं पाएगी। तब भी ये मीडिया वाले यही पंक्ति हमेशा की तरह कहेंगे कि हमें नज़रिया बदलना चाहिए जी।

समाज के आयने

बदलाव तो समाज का नियम है और फिर नारी की यह हालत मैंने थोड़े ही न की है। यह तो ख़ुद ही यह सब करने को राजी हुई थी। कृपया ध्यान दें कि चंद पैसों की लालच में हमें अपना ज़मीर नहीं बेचना चाहिए।

जो चंद मातृ शक्ति इन व्यवसायों में काम करती भी है, उन्हें भी इस वस्त्र अल्पिकरण का सामूहिक विरोध करना चाहिए। क्योंकि सिनेमा, मीडिया और उसके कर्णधार आप समाज के आयने तथा आदर्श होते हैं।

नज़रिया बदलने की नसीहत

समाज में बहू-बेटियाँ आदि आपकी नक़ल करती है और वस्त्र अल्पता के नशे में मदहोश अनजाने में अपना ही अहित कर बैठती है। मीडिया के लोग किसी की घटना पर जब बात करते हैं तो बस बार-बार नज़रिया बदलने की ही नसीहत देते हैं।

अरे भाई नज़रिया जब विश्वामित्र जैसे राजर्षी नहीं बदल पाए तो आम लोग कैसे बदलेंगे। वहाँ अगर कोई यह कह दें कि यदि पुरुष समाज अपने बदन को ढक कर रहता है तो क्या नारी समाज नहीं रह सकता।

वे भी तो उसी वातावरण में रहते हैं। तो पुरुष को दबाने में सब लग जाते हैं। अरे बहादुरों सत्य को तुम्हारे प्रमाण पत्र की ज़रूरत नहीं है। यदि तुम्हें सच में नारी की इतनी ही चिंता है तो उसे सही दिशा की ओर ले चलो और शोषण से बचाओ। तो जानूं कि आपने कुछ अच्छा किया है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – अनादि काल से चले आ रहे, नारी के ऊपर होने वाले अत्याचार व शोषण को इस लेख के माध्यम से। अब नारी समाज नहीं जागी तो कब जागेगी। कही ऐसा न हो जाये की बहुत देर हो जाये – वर्ना बेचारी ख़ुद की दुर्दशा पर रो भी नहीं पाएगी।

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यह लेख (कटु सत्य।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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