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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

डॉ भीमराव अम्बेडकर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Dr. Bhimrao Ambedkar | डॉ भीमराव अम्बेडकर।

बुद्धि से तेज,
विचारों से श्रेष्ठ,
ज्ञान में ज्ञानी।

सहनशीलता की मिशाल,
जला दी जिसने अलख ज्ञान की,
आओ करें नमन उस महान ज्ञानी को।

किताब, कलम को बना ढाल,
छा गए जो महान,
करोड़ों दिलों पर जिसका राज।

रख नारी को संग,
दिला कर महिलाओं को,
शिक्षा का अधिकार,
बने नारी रक्षक।

गरीबों वंचितों को दिया उठा,
समानता का पढ़ाया पाठ,
सहकर कठोर यातनाएं।

रख शिक्षा को आगे,
आम से बने खास,
लिख दिया जिसने संविधान।

कहलाए वे…
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर,
नमन मातृभूमि के लाल को।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — डॉ भीमराव अम्बेडकर एक महान देशभक्त , न्याय के पुजारी , शिक्षाविद और दलितों के मसीहा थे। भारत के संविधान के निर्माता के रूप में देश भर में वो प्रसिद्ध है। अम्बेडकर का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा संघर्षपूर्ण रहा , उन्हें छुआछूत , ऊंच नीच आदि का बचपन से ही सामना करना पड़ा। भीमराव रामजी अम्बेडकर , (जन्म 14 अप्रैल, 1891, महू, भारत- मृत्यु 6 दिसंबर, 1956, नई दिल्ली), दलितों के नेता (अनुसूचित जाति; पूर्व में अछूत कहलाते थे) और भारत सरकार के कानून मंत्री (1947-51)। भारत के इतिहास में महानतम नेताओं में से एक थे बाबा साहेब भीमराव रामजी अम्बेडकर। उन्हें भारतीय संविधान का जनक माना जाता है।

—————

यह कविता (डॉ भीमराव अम्बेडकर।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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ज्ञानसेनी।

Kmsraj51 की कलम से…..

GyanaSeni | ज्ञानसेनी।

“ज्ञानसेनी”
अधरों का पुष्प,
उम्मीदों का सूरज,
करें संकट दूर रघुवर,
ज्ञानसेनी सजाया है।

रिश्तों का मिठास,
हैं स्वप्नों में आप।
चलो फिर गीत गाएं,
ज्ञान दर्पण लाया हूं।

भोला का डिम डिम डमरू,
काशी की मस्ती भरी।
धनुष वाण में श्री राम,
ज्ञानसेनी भरत से मिलाया है।

स्मृतियों में अयोध्या धाम,
चक्रवर्ती साम्राज्य है नाम।
प्रकृति का आलिंगन,
ज्ञान सेनी ने दिखाया है।

ज्ञानसेनी …
ज्ञान की छोटी थाली,
नक्काशीदार थाली।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — अपने भारत देश में प्राचीन काल से ही हर रिश्तों का अपना – अपना महत्व व सम्मान है। श्री राम व उनके भाइयो लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न से हमे सीख़ मिलती है की भाई का भाई से कैसा प्रेम व व्यवहार होना चाहिए आपस में और माता-पिता का आदेश व सम्मान सर्वोपरि हैं। हमे गर्व है अपने प्राचीन काल से चली आ रही भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता पर, “गर्व से कहो हम सनातनी है, जय जय श्री राम!” जैसे – जैसे समय बदला वैसे – वैसे इंसान के सोचने व समझने की छमता ख़त्म होती जा रही है, अपने प्राचीन महत्वपूर्ण संस्कारों को भूलता जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप कई तरह के समस्याओं से परेशान है। हे मानव अब भी समय है सुधर जाओ वर्ना ये पृथ्वी रहने लायक नहीं रहेगी। याद रखें की – जिस देश के लोग अपनी प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को भूल जाते है, उनको विलुप्त होने से कोई भी नहीं बचा पायेगा। इसलिए अपने अंदरऔर वर्तमान पीढ़ी व आने वाली नई पीढ़ी को प्राचीन भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता का पूर्ण ज्ञान दो, और उन्हें अनुसरण करना भी सिखाओ।

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (ज्ञानसेनी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कोरोना भारतीय सेनेटाइजेशन को समझता था।

Kmsraj51 की कलम से…..

Corona Understand Indian Sanitization | कोरोना भारतीय सेनेटाइजेशन को समझता था।

भारतीय सेनेटाइजेशन को समझता था,
लेकिन कुछ दूसरों के पल्ले नहीं पड़ता था।
जब पूरी दुनिया में कोरोना पूरी तरह छाया,
सब दुनिया के लोगों को भारतीयता समझ में आया।

मुंह पर सभी लोगों ने अपने से मांस्क लगाया,
और हाथ पांव धोकर ही पावन भोजन पाया।
बाहर से घर आते ही आकर पहले नहाया,
कपड़ों को खुद धोकर ही डेटॉल आदि लगाया।

जूता चप्पल प्राचीन काल से बाहर रखा जाता था,
हाथ पैर धो कर ही मनुष्य भोजन पाता था।
चुपके से घर अंदर मौजा पहने प्रवेश कर जाता,
दादी माई की कड़क आवाज और डॉ ट खाता।

पत्नी कहती आपको समझ में नहीं है कुछ आता,
धोकर ही सब्जी – भाजी क्यों बनाई जाती है।
शौचालय को खुद ही चमकाया जाता है,
कोना – कोना का कचरा रोज साफ किया जाता।

रोज – रोज झाड़ू – पोछा क्यों घुमाया जाता है,
संपूर्ण कमरों को सप्ताह भर में धोया जाता है।
सारी दुनिया मेरी यह बात समझ में पाई थी,
संसार में इसीलिए कोरोना वायरस जी आई थी।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — भारतीय सेनेटाइजेशन को पूरी दुनिया ने अच्छा माना और समझा, पूरी दुनिया के लोगों को भारतीयता व भारतीयों की दया समझ में आया। मुंह पर सभी लोगों ने अपने से मांस्क लगाया, और हाथ पांव धोकर ही पावन भोजन पाया। जूता चप्पल हमारे यहां प्राचीन काल से ही बाहर रखा जाता था और हाथ पैर धो कर ही मनुष्य भोजन पाता था। अगर कभी चुपके से घर अंदर मौजा पहने प्रवेश कर जाता, तो दादी माई की कड़क आवाज और डॉ ट खाता। सारी दुनिया के लोगो को स्वच्छता की सीख़ देने के लिए ही इस संसार में कोरोना वायरस जी आई थी। हम सभी को गर्व है अपने प्राचीन भारतीय संस्कृति पर, जो हमे स्वच्छता के साथ जीवन जीना सिखाया था। जैसे – जैसे समय बदला वैसे – वैसे इंसान के सोचने व समझने की छमता ख़त्म होती जा रही है, अपने प्राचीन महत्वपूर्ण संस्कारों को भूलता जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप कई तरह के समस्याओं से परेशान है, फिर भी भौतिक विकास के नाम प्रकृति के पञ्च तत्वों से खिलवाड़ करने से नही चूक रहा है। हे मानव अब भी समय है सुधर जाओ वर्ना ये पृथ्वी रहने लायक नहीं रहेगी। याद रखें की – जिस देश के लोग अपनी प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को भूल जाते है, उनको विलुप्त होने से कोई भी नहीं बचा पायेगा। इसलिए अपने अंदरऔर वर्तमान पीढ़ी व आने वाली नई पीढ़ी को प्राचीन भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता का पूर्ण ज्ञान दो, और उन्हें अनुसरण करना भी सिखाओ।

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यह कविता (कोरोना भारतीय सेनेटाइजेशन को समझता था।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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विवेक और विचार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Vivek Aur Vichar | विवेक और विचार।

पंचायत नहीं विचारों में स्वतंत्रता लाएं,
विवेक कल्याण कारक होता है।
रीति – रिवाज, शास्त्र – नियम अपनाएं,
अंधानुकरण कभी ना करें।

समय – समय पर नियम बदलते रहते हैं,
विचार धाराओं में परिवर्तन होते रहते हैं।
उसमें कोई – कोई पिछड़ भी जाता है,
अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।

परीक्षा लेना मानव व्यवहार में आता है,
परमात्मा दीया विवेक और विचार है।
जो बात बुद्धि – विवेक में खरी उतरे,
उस पर ही हमें अमल करना चाहिए।

विवेक पूर्ण किया गया निर्णय ही,
सर्वथा कल्याणकारी होता है।
न्यायशीलता – निष्पक्ष- सतोगुणी,
सहृदय, उदार और हितैषी बनें।

विवेकी व्यक्ति दुराग्रही नहीं होता है,
नीर – क्षीर विवेक अलग करता है।
नेक व्यक्ति में बुराई हो उसे छोड़ें,
बुरे व्यक्ति की भी अच्छाई ग्रहण करें।

सिद्धांतों का परीक्षण करना आवश्यक है,
परस्पर विरोधी विचार निरर्थक होता है।
समर्थक और विरोधी कम नहीं होते हैं,
दोनों विचारधाराएं आपस में टकराती हैं।

परीक्षण से सच – गलत की पहचान है,
परीक्षा और समीक्षा ही आधार है।
दूसरों की नकल करना सुगम है,
अधिक माथापच्ची लोग पसंद नहीं करते हैं।

वाणी द्वारा प्रकट विचार क्षण स्थाई होता है,
लेखनीबद्ध किया हुआ चिरस्थाई होता है।
बुद्धि को जो उचित लगे उसे अपनाते हैं,
अंधानुकरण नहीं, हम कतराते हैं।

किसी के महानता को कम ना आंकिए,
पवित्र ग्रंथों का आदर करते रहिये।
बुद्धि संगत अंश ग्रहण करना चाहिए,
जिज्ञासु के सत्य खोज को अपनाएं।

दुनिया उज्ज्वल व्यक्तित्व पर सिर नवाती है,
उनके अनीश्वरवादी मत को नहीं मानती है।
उपयोगी तत्व को ग्रहण करना भी आता है,
महापुरुषों के लेखन में समरसता है।

काल से ही मानव का सम्मान था,
आधुनिक काल में कुत्ते पर स्वाभिमान।
मनुष्य रोटी के लिए कड़ी मेहनत करता है,
परंतु कुत्ता ए .सी .गाड़ी में चलता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जैसे – जैसे समय बदला वैसे – वैसे इंसान के सोचने व समझने की छमता ख़त्म होती जा रही है, अपने प्राचीन महत्वपूर्ण संस्कारों को भूलता जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप कई तरह के समस्याओं से परेशान है, फिर भी भौतिक विकास के नाम प्रकृति के पञ्च तत्वों से खिलवाड़ करने से नही चूक रहा है। हे मानव अब भी समय है सुधर जाओ वर्ना ये पृथ्वी रहने लायक नहीं रहेगी। याद रखें की – जिस देश के लोग अपनी प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को भूल जाते है, उनको विलुप्त होने से कोई भी नहीं बचा पायेगा। इसलिए अपने अंदरऔर वर्तमान पीढ़ी व आने वाली नई पीढ़ी को प्राचीन भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता का पूर्ण ज्ञान दो, और उन्हें अनुसरण करना भी सिखाओ।

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अनुरागी लालिमा कपोलों पर।

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Anuragi Lalima Kapolon Par | अनुरागी लालिमा कपोलों पर।

अनुरागी लालिमा कपोलों पर,
छटा इंद्रधनुषी-सी खिल गई।
प्रफुल्लित तरुणी की शायद,
कुमारत्व से नयन मिल गई।

दिन हो गये स्वप्निल-स्वप्निल,
आकुल बाट जोहती क्षुब्ध रजनी।
अंग-प्रत्यंगों में धूप बासंती,
नयन पटों पर खिली चाँदनी।
निंद्रित उर के धड़कन में,
मनभावन नवज्योति जल गई।

जगी मृदुल-मृदुल मादक वेदना,
अकेलेपन के आलिंगन में।
मधुर – मधुर मुग्धित कल्पना,
अरुनारा कमसिन नयन में।
हो गई निंदिया वैरागन-सी,
चेतना खोई निशा ढल गई।

परवाना पतंगे जैसी अभिलाषाएं,
श्वेत-श्याम विहंगों-सी घिरती।
अंतहीन अनंत महाशून्य में,
पंख फैलाये फिर बिचरती।
सशक्त शोभित भुजपाशों की,
बाँहों में आस लिये पल गई।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (अनुरागी लालिमा कपोलों पर।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मतलबी दुनिया।

Kmsraj51 की कलम से…..

Matlabi Duniya | मतलबी दुनिया।

बड़ी अदब से झुक कर,
दुआ मांगता था अपने लिए।
लोगों की बेरुखी इतनी बढ़ी,
कम हो गई दुआएं मेरे लिए।

मैं मुस्कुराना भूल गया,
बद्दुआ असर करने लगा।
हर नजर देखती है,
तीखी नजरों से मुझे,
बात करने को तरसता हूँ।

हर जुबां खंजर हो गई मेरे लिए,
कभी दोस्तों की भरमार थी।
सभी गले मिलते थे खुशी से मेरे,
वक़्त बहुत बदल गया।
आज राम -राम कहने की,
फुर्सत नहीं मेरे लिए।

जिन पर भरोसा था मुझे,
जो दुआ मांगते थे मेरे लिए,
आज बेख़ौफ़ बद्दुआ माँग रहे मेरे लिए।
जो मेरे अपने थे वे भी शामिल हो गए,
कहीं दोस्त नजर नहीं आते,
सभी दुश्मन बन बैठे मेरे लिए।

किससे करूँ बात,
सभी ग़द्दार निकल गए।
कभी जो बाहें सहारा बनतीं थी,
सभी हथियार निकल गए।

कुछ राज़ सीने में,
दफन थी वो सब जान गए।
सामने मुस्कराते रहे,
पीठ पीछे अखबार निकल गए।
जब तक आंख खुली मैं लूट चूका था।

किस किस को दोषी मानूं,
कोई फर्क़ नहीं पड़ता।
सभी अजनबी हो गए,
मौत को बुलाते हैं अपने पास।

हर दिल को शकुन मिले,
मेरे जाने के बाद।
हर आश टूट गई,
जिन्दगी बेवफ़ा हो गई मेरे लिए।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आजकल देखने में आता है कि रिश्ते स्वार्थ की बुनियाद पर टिके होते हैं। आधुनिक रूप में रिश्तों में किसी न किसी निजी स्वार्थ की तलाश की जा रही है और किसी निश्चित हेतु (उद्देश्य) साधने तक खूब आत्मीयता प्रकट की जाती है फिर अपना काम निकलने के बाद पहचानते भी नहीं है। इंसान के मन में जब स्वार्थ की वृद्धि होने लगे यदि उसी समय मन को शांत किया जाए तो सहजता से शांत किया जा सकता है अन्यथा इंसान का स्वार्थ पोषित होकर जीवन को विनाश के मार्ग पर ले जाता है एवं इंसान को परिणाम भुगतने के समय जब अहसास होता है तब तक बहुत देर हो जाती है। जीवन में यह समझना आवश्यक है कि स्वार्थ द्वारा भौतिक सुख तो जुटाए जा सकते हैं कितु सम्मान उस स्वार्थी व्यक्ति का धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है उसका सामाजिक पतन निश्चित होता है यदि सम्मान चाहिए तो स्वार्थ से दूर रहना आवश्यक है वरना यह आपका पतन कर देगा। “स्वार्थी लोग अपने लाभ के लिए झूठ बोलते है, बिना बात तारीफ करते है। आपसे प्रभावित होने का नाटक करते है। उनका स्वार्थ आपसे फलीभूत न हो तो आपके ऊपर गलत आक्षेप करके निंदा करने की कोशिश करते है। इन लक्षणों से पहचाना जा सकता है।”

—————

यह कविता (मतलबी दुनिया।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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ऑनलाइन पाँव पसारो।

Kmsraj51 की कलम से…..

Spread Your Feet Online | ऑनलाइन पाँव पसारो।

जमा न पाया पांव धरा पर,
पर उड़ते आकाश।
घास उखाड़ने कूबत नहीं,
धरा धर्म फैलाने की आस।

पवन की पूजा करते सभी,
छा जाते हैं बादल कभी-कभी।
धूल गुबार अंधड़ कभी भी,
इस डाल से उस डाल पर,
कूदते रहते हैं बंदर सभी।

मानव कितना भोला भाला,
बरसों से आया है सहता।
सहता है अपनों का झमेला,
धरा धर्म और समाज का।
आक्षादित विश्वासों का मेला,
मानों चारो तरफ घेरा खेला।

लोगों संग कुनबे का रेला,
से ऑनलाइन में बढ़ रहा खेला।
फिल्म समीक्षा में ठेलम ठेला,
होती है भारत में वर्षों से ही सही।
लगभग डेढ़ सौ मिलियन से खरीद,
धरती पर पांव जमा लुटते हैं शरीर।

ऑस्ट्रेलिया, शॉपिंग में आया उछाल,
सत्य छिपा है कहीं भूल में।
मूल छिपा है कहीं भूल में,
पांव जमाने को खोजना मुश्किल,
पांव पसारने को जमीन आवंटित।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जिस तरह से ऑनलाइन लोगों को बेवकूफ बनाकर लुटा जा रहा हैं, चाहे वह फर्जी फिल्म समीक्षा करके हो, अन्य ऑनलाइन शॉपिंग का लोभ दिखाकर लूटना हो, आजकल विदेशी कंपनियां बहुत तेजी से अपने देश में ऑनलाइन पाँव पसार रही है, और अपने भारत देश का पैसा विदेश लेकर जा रही है। जरा सोचों और कोशिश करों की अपने देश का पैसा अपने देश में रहे। अपने भारत में बने भारतीय वस्तुओं को अपने भारतीय भाई – बहनों खरीदों, जिससे भारत का पैसा भारत में रहे।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (ऑनलाइन पाँव पसारो।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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हनुमान जन्मोत्सव।

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Hanuman Janmotsav | हनुमान जन्मोत्सव।

प्रकट दिवस हनुमान जी का आया आज।
श्रीराम का बन भक्त सबके सँवारे काज॥

माँ वैष्णों का तो ये तो है राज दुलारा।
सिंह वाहिनी का ले लाल झंडा चले ये पुत्र प्यारा॥

चैत्र माह की पूर्णिमा का दिन शुभ हो आया।
पावन दिन हनुमान जन्म के संजोग समाया॥

सेवक न होय कोई इस बजरंग बली जैसे।
उर में समाए जो भगवान को ऐसे॥

इनकी सेवक भक्ति ही जग को राह दिखाए।
हनुमान चालीसा हर बला को दूर भगाए॥

अपने प्रभु की सहज कही हर बात को गले लगाया।
हर असम्भव को संभव कर दिखलाया॥

हे पवनपुत्र हनुमान तेरी भक्ति, शक्ति को नमन हमारा।
जग की नकारात्मकता को दूर कर फैला दो उजियारा॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — देश भर में आज, 6 अप्रैल 2023 को हनुमान जयंती मनाई जा रही है। श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी ज्ञान, बुद्धि, विद्या और बल का प्रतीक माने जाते हैं। दरअसल जयंती और जन्मोत्सव का अर्थ भले ही जन्मदिन से होता है। लेकिन जयंती का प्रयोग ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो संसार में जीवित नहीं है और किसी विशेष तिथि में उसका जन्मदिन है। लेकिन जब बात हो भगवान हनुमान की तो इन्हें कलयुग संसार का जीवित या जागृत देवता माना गया है। हनुमान आठ चिरंजीवी में से एक हैं।

—————

यह कविता (हनुमान जन्मोत्सव।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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हनुमान जन्मोत्सव।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hanuman Janmotsav | हनुमान जन्मोत्सव।

चैत्र शुक्ल पूर्णिमा तिथि,
जन्में वीर बलवान हनुमान है।
केसरी पिता जिनके,
माँ अंजनी के लाल है।

आया जन्मदिन…
महावीर हनुमान का।
खुशियां चारों ओर छायी है,
सूर्य देवता को निगला,
बाल्यकाल से पराक्रमी है।

राम के राज दुलारे,
पवन पुत्र महावीर कहलाये।
मां सीता की खातिर,
लंका को जला आएं।

दानवों को मार गिराया,
मां सीता को वापिस लायें।
युद्ध में लक्ष्मण मूर्छित हुए,
वीर संजीवनी बूटी लायें।

बने राम सीता के…
प्यारे भक्त और पुत्र कहाएं।
चीर कर छाती में…
अपने राम सीता को बिठाएं।

जय – जय वीर हनुमान,
का जन्मोत्सव मनाएं।
भजे उनको रात दिन,
मनोकामना पूर्ण करें।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — देश भर में आज, 6 अप्रैल 2023 को हनुमान जयंती मनाई जा रही है। श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी ज्ञान, बुद्धि, विद्या और बल का प्रतीक माने जाते हैं। दरअसल जयंती और जन्मोत्सव का अर्थ भले ही जन्मदिन से होता है। लेकिन जयंती का प्रयोग ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो संसार में जीवित नहीं है और किसी विशेष तिथि में उसका जन्मदिन है। लेकिन जब बात हो भगवान हनुमान की तो इन्हें कलयुग संसार का जीवित या जागृत देवता माना गया है। हनुमान आठ चिरंजीवी में से एक हैं।

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यह कविता (हनुमान जन्मोत्सव।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हस्पताल की।

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Hospital | हस्पताल की।

उदासी में उगती हर सुबह यहां की,
उदासी में डूबती हर सांझ और रात।
उदासी में ही बीतता है दिन भी सारा,
बीमार बेटे के देख कर बिगड़े हालात।

कभी दिमाग में इन्फेक्शन तो कभी,
दिल में छेद की डाक्टर कहता बात।
हर रोज बीमारी नई – नई सुन कर,
कैसे खुश रहता जवान बेटे का बाप?

कब तक छुपाऊं बेटे से कितना और कैसे?
परेशान मां, दादी, छुटकू, कुल कुनबा साथ।
एक ही आश विश्वास कि रब राखेगा अब,
उसके आगे भला किसकी क्या औकात?

सिर तो फाड़ा है सीना भी चीरना है,
क्यों कर उदास न होगा एक बाप?
यह जगह है, जहां पैसा तो चाहिए ही,
पर सबसे ज्यादा चाहिए रब का साथ।

गुरुद्वारे का कीर्तन चहुँ ओर है गूंजता,
मस्जिद की गूंजती है ऊंची सी अजान।
मंदिरों का शंख – घंटा नाद भी है गूंजता,
पर तुम कहां छुपे हो हे करुणानिधान?

भूत का प्रारब्ध है भोग रहे यह या कि,
भविष्य का संचित वर्तमान का क्रियमाण?
पूछता हूं बार – बार सवाल कई ऐसे बस,
निरुत्तर है दीवारें हस्पताल की आलिशान।

जानता हूं हर जन्म का अन्त मरण है,
वह आएगा, यह एक कड़वी सच्चाई है।
अस्त व्यस्त हो जाए जवानी में जीवन,
कुदरत की भला इसमें कौन भलाई है?

हँसने खेलने के जो दिन होते हैं जीवन के,
क्या बीत जाएंगे बेटे के रोग शोकों में नाथ?
आक्रोश घना है, उतारूं तो उतारूं किस पर?
मानुष जीवन की विवशताएं कही न जात।

हर दोष दूसरों के ही सर पर मढ़ना,
यही तो फितरत जगत में इंसानी है।
गुनाह जरूर हमारा ही होगा दाता,
यह आक्रोश व तुझ पर मढ़ना दोष,
यह हमारी मनुष्य सोच की नादानी है।

Note : यह रचना मैंने अपने जीवन के वर्तमान हालात पर लिखी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कभी दिमाग में इन्फेक्शन तो कभी, दिल में छेद की डाक्टर कहता बात। हर रोज बीमारी नई – नई सुन कर, कैसे खुश रहता जवान बेटे का बाप? सिर तो फाड़ा है सीना भी चीरना है, क्यों कर उदास न होगा एक बाप? यह जगह है, जहां पैसा तो चाहिए ही, पर सबसे ज्यादा चाहिए रब का साथ। हँसने खेलने के जो दिन होते हैं जीवन के, क्या बीत जाएंगे बेटे के रोग शोकों में नाथ? आक्रोश घना है, उतारूं तो उतारूं किस पर? मानुष जीवन की विवशताएं कही न जात। जीवन को दर्द और आनंद के मिश्रण के रूप में देखने की हमारी क्षमता हमें जीवन को उसकी पूर्ण सीमा तक अनुभव करने की अनुमति देती है। जब आनंद आता है तो हम उसके लिए खुलना सीखते हैं, इसे अपनी इंद्रियों के माध्यम से लेना और इसकी सराहना करना सीखते हैं, ज्ञान के साथ यह एक आगंतुक है जो आता है और जाता है।

—————

यह कविता (हस्पताल की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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