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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2023-KMSRAJ51 की कलम से

शोर मचाती जब-तब।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शोर मचाती जब-तब। ♦

गा रहे पल हरदम,
गुनगुनाती सी शाम है।
उजाले में कशमशा कर,
मचाती शोर जब-तब।

दूर किसी झरोखे से झाँक,
देख रही सदा ये जिंदगी।
कानों में आ-आकर,
कहती कथा कोई पुरागी।

रहती ओट में सदा,
लुक-छिपकर कोलाहल करती है।

अंत:करण की मूक आवाजें,
कलरव करती साँसों में।
थम-थम सी जाती धमनियों को,
चेता जाती आती-जाती आहों में।

खामोश रहती चुपचुप,
गुमसुम-सी चंचल रहती है।

झुरमुट की झँझरी छिदी-छिदी,
झरझर हो गई प्रत्याशा।
क्षणभंगुर-सा जीने को,
राग वेदना गाती शाशा।

सरगम के सुर-तालों में,
वेदना व्यथा बतलाती है।

नोट: शाशा – मनमुख(मन), पुरागी – दफन।
(ये शब्द मैनें कबीलाई भाषा से ली है।)

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (शोर मचाती जब-तब।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सूना-सूना दूर गगन है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सूना-सूना दूर गगन है। ♦

प्रेम के धागे टूटे, टूटा रक्त का संबंध,
बोलते मुखड़े पर, सूना-सूना दूर गगन है।

रुनझुन गाती भोर है,
दालान की साँझ सुहानी।
कच्ची गलियाँ गाँवों की,
बन गई बिसरी कहानी।
घनी छाँव पीपल की,
ढूँढ़ता श्रापित मन है।

रसभरी अमराईयों की,
वेदना प्राणों में जन्मती।
रह गये आँखों में अश्रु अकेले,
खोजती अँखियां नेह प्रीति।
हाय! बेचैनियाँ अधरों पर,
मोह यादों की चुभन है।

रहा मानस के जंगल में,
पहन स्वांगों के मुखौटे।
हर दिन ताजा चोट लेकर,
किंवाड़ पीछे साँझ लौटे।
कुहासों में घुली साँस है,
घावों की थकन पाँव में है।

निरर्थक सी जिंदगी को,
जी रही गुमसुम उदासी।
श्याम-शित पन्थों पर भटकती,
पी कोलाहल की आशा प्यासी।
अनुरक्ति में कसमसाता वह,
आज तक लड़कपन है।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (सूना-सूना दूर गगन है।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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शिक्षा – सुन्दरता और सम्मान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षा – सुन्दरता और सम्मान। ♦

आज आधुनिकता के दौर में शिक्षा का गुणांक अच्छे अंक प्राप्त करना, सुन्दरता का मापदंड बाह्य रंग रूप तथा सम्मान का मानक पैसा हो गया है। यही पश्चिम की सोच थी कि भारतीय लोग अपनी संस्कृति के परम भाव से बाहर निकल जाए। ताकि उनकी सुरक्षात्मक आधारभूत विश्वास और नैतिकता प्रिय शक्ति टूट जाए और वे विदेशी भीरू और बेशर्म संस्कृति के गुलाम बन जाए।

आज रटा और सटा सिस्टम की शिक्षा पद्धति भारत में हावी हो गई है। या तो छात्र रटा मार कर परीक्षा पास कर देते हैं और अच्छे नम्बर ले आते हैं, समझ भले ही उस विषय की उन्हे हो या न हो। या फिर MCQ में सटा यानी तुका लगाकर अंक प्राप्त करते हैं।फिर बड़े खुश होते हैं कि देखो क्या जजमेंट है हमारी। न जाने क्यों शिक्षाविद यह आंकड़ों की शिक्षा प्रणाली निरन्तर हावी किए जा रहे हैं? जबकि यह सबको पता है कि शिक्षा का सम्बन्ध भावात्मक और विचारत्मक धरातल में विकास करने को ले कर होता है न कि मात्र बौद्धिक तौर पर विकसित करना।

पर आज के समय में तो बौद्धिक स्तर पर भी विकास कहां हो रहा है? बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने के लिए भी समझ का होना जरूरी है। आज की शिक्षा प्रणाली नौकरी के लिए रटा और सटा वाली बनाना मजबूरी है। शर्म आती है कभी-कभी तो। घोर स्वार्थी हो रहे है आज का शिक्षित इन्सान। क्या यही शिक्षा है?

सुन्दर का अर्थ है सु+अन्दर अर्थात जो अन्दर से अच्छा हो। पर हमने बाह्य रंग रूप को सुन्दर कहना शुरू कर दिया। जबकि वह सुरूप कहलाता था। शब्दों के आज अर्थ बदल दिए हैं।

पैसा सामाजिक जरूरतों के लिए एक अनिवार्य विनिमय था। पर आज वही मान सम्मान का परिचायक हो गया है। जबकि मान सम्मान व्यक्ति के ज्ञान और ध्यान, सेवा और सत्संग तथा तप व त्याग से सम्बन्ध रखता था।

आज अगर अष्टावक्र की माने तो हम चर्मकार हो गए हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज रटा और सटा सिस्टम की शिक्षा पद्धति भारत में हावी हो गई है। या तो छात्र रटा मार कर परीक्षा पास कर देते हैं और अच्छे नम्बर ले आते हैं, समझ भले ही उस विषय की उन्हे हो या न हो। या फिर MCQ में सटा यानी तुका लगाकर अंक प्राप्त करते हैं।फिर बड़े खुश होते हैं कि देखो क्या जजमेंट है हमारी। न जाने क्यों शिक्षाविद यह आंकड़ों की शिक्षा प्रणाली निरन्तर हावी किए जा रहे हैं? जबकि यह सबको पता है कि शिक्षा का सम्बन्ध भावात्मक और विचारत्मक धरातल में विकास करने को ले कर होता है न कि मात्र बौद्धिक तौर पर विकसित करना।

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यह लेख (शिक्षा – सुन्दरता और सम्मान।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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लें संकल्प पुनरावर्तन का।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ लें संकल्प पुनरावर्तन का। ♦

अंतस् का विश्वास यह स्वर्ण-चक्र रुके नहीं,
मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

प्रवाह रहे झिलमिल,
जैसे आदित्य की थाल।
वृन्तों पर अतीत के,
खिले आगम श्रीवास।
नैनों में धूप रक्तिम,
रंग उन अधरों की।
जिसके गातों तनुरूह में,
सिन्धुनंदनी की कली।

छाँव में पलकों के कलाधार कभी थके नहीं,
मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

मन-आत्मा का अटल विश्वास,
धरा में जैसे ज्वाल रहे।
नजरों की अँगड़ाईयों में,
जैसे अदृश्य मनुहार रहे।
मिट्टी की खुशबू जल में,
विटप-वृंद में बयार रहे।
विचारों की शुचीर्य की,
पैदावार बारंबार रहे।

उर-अंतस्-प्राणों के संघर्षों में वेदनायें कभी दुखे नहीं,
मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

भावी समय के पन्थ मिले,
अल्पना की कल्पना रंग भरे।
यामित रक्षित कंगूरों पर,
देश भविष्य का दीप धरे।
श्रद्धा आलंब आधार पर,
कभी न धूमिल साँझ घिरे।
आयुष्य प्रखर सुर-ताल बने,
युगों – युगों तक विश्व में,
भारत की जय गान बजे।

चरणों में अनाचार के मनु-आर्य के कभी झुके नहीं,
मानस के सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (लें संकल्प पुनरावर्तन का।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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तुम्हारे लिए।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तुम्हारे लिए। ♦

सरगम की लय ताल में अलाप जगाये,
गीतों काव्यों को मुखड़े का अंतराल बनाये।
जो धुन सजाये गाने की वो भी गाये,
बसंत बहार के मधु की उपमायें भी लाये।
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

कौतुक – विनोद सुन अश्रुधार गिरे,
दर्द – वेदना सुन कहकहे लगे।
रुदन राग जगाये हमनें सुर आलाप देकर,
अभी कण्ठों को रुलाया है हमने।
रुँधे स्वर को सुलाया है हमने,
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

तुम्हारे सङ्केत पर अभी राग सौंदर्य उठा सकता हूँ,
जिसे सुन कर नयन मद में मुँदने लगे।
जागने लगे स्वप्न मदहोशी से आने लगे,
हँसने लगे दीप सदा मेरी देखकर।
आग सुलगने लगे चित्त की बात होने लगे,
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

खामोश अधर भी जैसे मुस्कुराने लगे,
वेदना कसकती है मन के कोने में।
देखी नहीं अभी कही अनकही बातें,
तुम अगर चाहो तो कह सकता हूँ।
सुनकर जिसे बुझने लगे आग,
जलने लगे जिसे सुनकर राख।
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

इक तेरी ही नहीं और बातें हैं भी बहुत,
रह-रहकर जो मुझे उदास करती हैं।
दर्द आदमी का आदमी को मालूम नहीं,
कितनी साँसें बिन जिंदगी जिया करते हैं।
भव रहे इकतार भैरवी राग मुझे गाने दो,
जिसे सुनकर झुकने लगे चंदा भी।
बवंडर भी उठने लगे धूल बनकर,
तुम्हारे लिए संगीत के सुर-ताल सजाये है हमनें।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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आँखों में अश्रु भरे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आँखों में अश्रु भरे। ♦

रख काँधे पर सर अपना,
अँखियों में अश्रु भरे हुए।
पहन अँधियारों को,
दर्द – पीड़ा की सुबकी लेते।
हर्ष – कर्ष की बातों में,
अब्धुमन की वीरानी खाती।

किसकी आहट सुनें,
पास कौन आयेगा।
अतिथि की आँखों को,
जो आँसू दे जायेगा।
किससे हम अनुरक्त हो,
भेजते उर-वेदना की पाती।

क्यूँ करे कोई याद,
इष्ट अपना यहाँ कौन।
जग इक बंधन है,
अनुराग इक सपन।
विचार कर अकुलाए,
अंत: करण को ढाँढ़स दे जाती।

है चंदा भी अकेला,
अकेली है उसकी चाँदनी।
मुग्ध हो हँसी दोनों,
ले ली है हृदय पर अपनी।
खाली मन प्राणों से,
मीत-प्रीति की चुटकियाँ ले आती।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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बीते काल की थकन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बीते काल की थकन। ♦

तू चल नये आगाज,
मिटा अपने तन-मन की थकन;
कर कथन अपने मन,
क्षुधा लिप्सा को कर अंतर्मन।
रे पंछी! न परवाज कर,
छोड़ अपने नीड़-चमन।

इस सृष्टि का कहीं न अन्त,
तू विश्राम कर आना – जाना।
पंखों को ले अपने समेट,
थकन तू अपनी ले मिटा।
रे तरंग! न सहला चल,
तू गुदगुदाते अपने पन्थ।

दिखे सब में प्रीति नेह विश्वास,
तटनी की भूल भुला दे।
वो कौन एक है जो,
छोड़े अपने शीलपन।
रे पवन! न हहर चल तू,
मौन हो संग-संग।

जग द्रोह से है भरा,
मोह तू छोड़ जरा।
ज्ञान-विज्ञान के लिये लड़ा,
क्यूँ जीवन – प्राण से भिड़ा।
प्रचंड प्रज्वलित रहा,
खुद में आनंद प्रसन्न रहा।
रे अंतस्! न विलासी तू,
तापस अंग को सुसुप्त कर।

जीवन का सकल आसय,
न ढो अब भ्रमित भाव से।
निष्कर्ष तू निकाल अभी,
मन को न तोल हार-जीत से।
अनगन न कर,
महा-वृन्त तू बन।
रे स्वरूप! न बिगाड़ तू,
संवार निरता का कर सृजन।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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रह गई आस्था मन में।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रह गई आस्था मन में। ♦

विधा – नववर्ष।

लिए हुए रह गई मैं अपनी आस्थाएं मन में,
पुरातन वर्ष जाने और नववर्ष के आगमन में।

आवरण तो तोड़ना था संकल्प लें सृजन मन में,
पुरातन भी कुछ संजोना है नववर्ष के संग में।

कुछ नया करने के लिए सोचती रह गई भीड़ में,
हसरतों के दीप जलते रहे महामारी के दौर में।

कुछ अपने बिछुडे कुछ नए दोस्त आए जीवन में,
आनलाइन से जुड़ करके नाते निभाए हमने।

प्रगति, समाजवाद के नारे रह गए कागज़ों में,
नजाने विकास कहां खो गया देखिए जमाने में।

सभी लगे हैं अपनी-अपनी झोलिया भरने में,
कोई ठिठुरती रात में ताउम्र के लिए सो गया दो गज कफन में।

देश और समाज में क्यूं और क्या देखूं मैं ?
कोई महज हसरत लिए ढह गया दो वक्त की रोटी में।

हौसले थे उसके मन में भी नव वर्ष के आगमन में,
पर वो बेचारा क्या करता आस्थाएं धरी रह गई मन में।

एकबार फिर नई हसरतों के दीप जलाए उसने मन में,
पुरातन में जो रह गई तमन्नाएं नववर्ष में पूरी करेंगे संकल्प लिया मन में।

विजयलक्ष्मी है कहती नई आशाओं को लेकर आगे बढ़ो जीवन में,
आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं नववर्ष के आगमन में।

♦ विजयलक्ष्मी जी – झज्जर, हरियाणा ♦

—————

  • “विजयलक्ष्मी जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए; इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की हैं — कुछ पुरानी खट्टी-मीठी यादें मन में संजोए बिट गया पुराना वर्ष २०२२, अब नव वर्ष 2023 का सुभारम्भ हुआ, नए संकल्पों व उमंग उत्साह के साथ । जो गलतिया किया हम सभी ने अब तक, उन गलतियों को पुनः दोहराये नहीं। 2020 से ही अब तक कोरोना काल ने बहुत कुछ सिखाया इंसान को, इंसानियत से बढ़कर कुछ भी नहीं है इस संसार में, मानव सेवा ही प्रभु सेवा है। सब मिलजुलकर समाज में सुधार लेन की कोशिश करें, सुधार अपने आप से व अपने परिवार से शुरू करें। जहां तक हो सके जरूरतमंदो की मदद करें, अपनी स्व रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर शस्त्र भी उठाएं। नए उमंग व उत्साह के साथ जीवन में आगे बढ़े, प्रकृति की रक्षा करें अच्छे स्वास्थ्य के लिए। विजयलक्ष्मी है कहती नई आशाओं को लेकर आगे बढ़ो जीवन में, आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं नववर्ष के आगमन में।

—————

यह कविता (रह गई आस्था मन में।) “विजयलक्ष्मी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विजयलक्ष्मी है। मैं राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय, छारा – 2, ब्लॉक – बहादुरगढ़, जिला – झज्जर, हरियाणा में मुख्य शिक्षिका पद पर कार्यरत हूँ। मैं पढ़ाने के साथ-साथ समाज सेवा, व समय-समय पर “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” और भ्रूण हत्या पर Parents मीटिंग लेकर उनको समझाती हूँ। स्कूल शिक्षा में सुधार करते हुए बच्चों में मानसिक मजबूती को बढ़ावा देना। कोविड – 19 महामारी में भी बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से पढ़ाना, वीडियो और वर्क शीट बनाकर भेजना, प्रश्नोत्तरी कराना, बच्चों को साप्ताहिक प्रतियोगिता कराकर सर्टिफिकेट देना। Dance Classes प्रतियोगिता का Online आयोजन कराना। स्वच्छ भारत अभियान के तहत विद्यालय स्तर पर कार्य करना। इन सभी कार्यों के लिए शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारी द्वारा और कई Society द्वारा बार-बार सम्मानित किया गया।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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चलो हम नववर्ष मनाएं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चलो हम नववर्ष मनाएं। ♦

चलो आज करें शुरुआत,
निराशाओं को देकर मात।
मन के मैल को हटाएं,
तम को मन से दूर भगाएं।
जीवन में रौशनी फैलाएं,
चलो हम नववर्ष मनाएं।

दे बेसहारे को सहारा,
भूखे को देकर निवाला।
भटके को दिखाकर राह,
सबके मंगल की कर चाह।
मन से ईर्ष्या द्वेष मिटाएं,
चलो हम नववर्ष मनाएं।

सब पर स्नेह लुटाकर,
मन को मंदिर बनाकर।
भेद-भाव मिटाकर,
स्वार्थ मोह सब त्यागकर।
परहित पर जीवन अर्पित कर,
चलो हम नववर्ष मनाएं।

आओ हमसब मिलकर,
एक नई उमंग जगाकर।
ऐसा वातावरण बनाएं,
नव ज्योति का प्रकाश फैलाएं।
चारों ओर खुशहाली लाएं,
चलो हम नववर्ष मनाएं।

दीप से दीप जलाकर,
हाथ से हाथ मिलाकर।
चाहूं ओर सुख शांति लाएं,
न रहे कोई भूखा बेसहारा।
ऐसी निर्मल धारा बहाएं,
चलो हम नववर्ष मनाएं।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मानव सेवा ही प्रभु सेवा है, सभी आपस में मिलजुलकर जरूरतमंदो की मदद करें। देकर बेसहारे को सहारा और भूखे को देकर निवाला। भटके को दिखाकर राह सदैव ही सबके मंगल की कर चाह। मन से ईर्ष्या द्वेष मिटाएं, चलो हम नववर्ष मनाएं। सब पर दिल से स्नेह लुटाकर, मन को मंदिर बनाकर। आपसी भेद-भाव मिटाकर, स्वार्थ मोह सब त्यागकर। परहित पर जीवन अर्पित कर, चलो हम नववर्ष मनाएं। हम अपनी रक्षा के लिए केवल शस्त्र उठाएं, निर्दोषों पर अत्याचार न करें कभी। उमंग के दीप से दीप जलाकर, हाथ से हाथ मिलाकर। आओ चाहूं ओर सुख शांति लाएं, कोशिश हो हम सबकी न रहे कोई भूखा बेसहारा। ऐसी निर्मल धारा हम बहाएं, चलो हम नववर्ष मनाएं।

—————

यह कविता (चलो हम नववर्ष मनाएं।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नया साल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नया साल। ♦

यह नया साल हमारा और वह तुम्हारा,
हैप्पी न्यू ईयर, नव संवत्सर की बधाई।
जश्न तो नए साल का है दोनो जगह पर,
फिर भी है भावों और विचारों की लड़ाई।

न जाने क्यों नफ़रत सी होती है मन में मुझे,
अंग्रेजी नव वर्ष के हर एक बधाई संदेश से।
जब ये नहीं मानते हैं नव संवत्सर हमारा तो,
मैं कहीं धोखा तो नहीं कर रहा हूं स्वदेश से?

हम क्यों भूल दें जी सनातन तहजीब हमारी?
और उपनिवेशवादियों का सब अपनाते चले।
भौतिक वैभव तो लूट ही गए थे हमारा ये सब,
और आज भावों से भी जाए क्यों हम ही छले?

आज, मंजूर है मुझको इनका हर त्यौहार मानना,
पर ये भी तो हमारे पर्वों को मिलजुल कर मनाएं।
पर हां, यह तो नहीं चलेगा कि हर बार ये इठले,
और हम हमेशा बस यूं ही मौन रह मुंह की खाएं।

ताली कहां सुना है बजाते तुमने एक हाथ से भाई,
आओ मिलकर मित्रवत दोनों ही हाथों से बजाएं।
हमने अपनाया आपका बहुतेरा है जी आज तक,
तुम भी तो संस्कृति का कुछ हमारी जी अपनाएं।

हमारे नव संवत्सर में मौसम नूतन वसंत है आता,
तुम्हारे नव वर्ष में आती महज पतझड़ और सर्दी।
अपनाने दो हमे भी कुछ अपनी ही संस्कृति का,
तुम्हारी नकल की तो हमने आज हद ही है कर दी।

लिवास तुम्हारे हैं, है हर एक अजब अंदाज़ तुम्हारा,
हमारे पास तो आज बचा ही क्या कुछ है हमारा?
अन्दर से बाहर, कुछ भी देखो, पैंट कोट चाहे शरारा,
चिन्तित हूं कि क्यों रंगा है पछुआ रंग में देश हमारा?

फैला दिया है जैसे रायता सा मेरे देश में तुमने आज,
छोड़ा ही क्या है तुमने आज शेष, बाकी देने लेने को?
कुछ तो रहने दो हमारे भी शेष अपनी संस्कृति का,
हमारे पास भी कोई थाती हो, नई पीढ़ी को देने को।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अब भी समय है संभल जाओ, वर्ना अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद फिर सुगंध भी सुलभ न होगा। वैसे जश्न तो नए साल का है दोनो जगह पर फिर भी है भावों और विचारों की लड़ाई। न जाने क्यों नफ़रत सी होती है मन में मुझे, अंग्रेजी नव वर्ष के हर एक बधाई संदेश से। जब ये नहीं मानते हैं नव संवत्सर हमारा तो, मैं कहीं धोखा तो नहीं कर रहा हूं स्वदेश से? जरा सोचे हमने क्यों भूला दिया अपने सनातन तहजीब को? हमारी भौतिक वैभव तो लूट ही गए थे हमारा ये सब, और आज भावों से भी जाए क्यों हम ही छले? आज, मंजूर है मुझको इनका हर त्यौहार मानना, पर ये भी तो हमारे पर्वों को मिलजुल कर मनाएं। हमारे नव संवत्सर में मौसम नूतन वसंत है आता, चारों तरफ हरियाली और खुशियां ही खुशियां और तुम्हारे नव वर्ष में आती महज पतझड़ और सर्दी। अब तो लिवास तुम्हारे हैं, है हर एक अजब अंदाज़ तुम्हारा, हमारे पास तो आज बचा ही क्या कुछ है हमारा? फैला दिया है जैसे रायता सा मेरे देश में तुमने आज, छोड़ा ही क्या है तुमने आज शेष, बाकी देने लेने को हमारे पास? कुछ तो रहने दो हमारे भी शेष अपनी संस्कृति का, हमारे पास भी कोई थाती हो, अपनी नई पीढ़ी को देने को।

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यह कविता (नया साल।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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